राष्ट्रीय संग्रहालय प्रयाग में संग्रहीत प्राचीन जैन प्रतिमाएँ

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राष्ट्रीय संग्रहालय प्रयाग में संग्रहीत प्राचीन जैन प्रतिमाएँ

ध्रुव कुमार जैन
—कटरा मेंदनीगंज, प्रतापगढ़ (उ. प्र.)

राष्ट्रीय संग्रहालय प्रयाग म्युनिस्पल कार्पोरेशन इलाहाबाद के अन्तर्गत पुरातन कलाकृतियों का एक सुन्दर संग्रह है। प्रयाग संग्रहालय में प्राचीनतम पाषाण एवं मृणमृर्तियों के अतिरिक्त मृणवर्तन, मनके, प्राचीन समय में घरों के निर्माण में लगने वाले उपकरण, प्राचीन अस्त्र—शस्त्र, देश के प्रसिद्ध कवियों एवं लेखकों की रचनायें उनके चित्रों के साथ, प्राचीन समय के मृत—जन्तुओं के जीवन्त चित्र, महात्मा गाँधी, पं. जवाहरलाल नेहरू, इन्दिरा गाँधी आदि की जीवन्त तस्वीरें एवं उनके उपयोग में लाई गयी वस्तुओं को बहुत ही आकर्षक ढंग से संजोकर रखा गया है।

जैन पुरातत्व का भी इस संग्रहालय में अपना महत्त्वपूर्ण स्थान है। जैन कलाकृत्रियों का यहाँ अनुपम संग्रह है ये कलाकृतियाँ कौशाम्बी, पभौसा, गया आदि विभिन्न स्थानों से प्राप्त हुई है। प्राचीनता और कला दोनों ही दृष्टियों से इनका विशेष महत्त्व है। म्यूजियम कम्पाउण्ड में बहुत सीमूर्ति याँ खण्डित और अखण्डित दोनों प्रकार की रखी गई हैं परन्तु उन पर प्राप्ति स्थान और काल कुछ भी नहीं लिखा गया है। अधिकांश प्रतिमाओं पर लांछन भी नहीं है और न ही कोई लेख है। प्रयाग संग्रहालय में जितनी जैनमूर्ति याँ प्रदर्शित हैं उनसे कई गुना अधिकमूर्ति याँ उनके गोदामों में भरी हुई है। जिनका स्थान के अभाव मे प्रदर्शन नहीं हो सका है। यहाँ उन्हींमूर्ति यों का संक्षिप्त परिचय दिया जा रहा है जो संग्रहालय कक्ष में विद्यमान है।

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१. अम्बिका कीमूर्ति

इस संग्रहालय में सबसे अधिक महत्त्वपूर्णमूर्ति अम्बिका की है। यहमूर्ति छह फुट ऊँची एवं तीन फुट चौड़े पाषाण फलक पर शोभित है। अम्बिका कीमूर्ति चतुर्भुजी है किन्तु इनकी चारों भुजायें खण्डित हैं। इस देवीमूर्ति के शीर्ष भाग पर भगवान् नेमिनाथ कीमूर्ति विराजमान है। देवीमूर्ति रत्नाभरणों से अलंकृत है। सिर पर किरीट, गले में अक्षमाला, रत्नहार, कटि पर मेखला, कानों में कुंडल और भुजाओं में केयूर है। सिर के पीछे अलंकृत प्रभामण्डल है। इसमूर्ति का समस्त अलंकरण कलापूर्ण है। इसकी एक विशेषता यह भी है कि इस फलक पर अम्बिका के अतिरिक्त तेईस और यक्षणियाँ उत्कीर्ण हैं और उनके नाम भी नीचे लिखे हुए हैं। ये सभी तीर्थंकरों की शासन देवियाँ हैं। इसके अतिरिक्त अम्बिका कीमूर्ति के दोनों तरफ चार—चार कुल आठ खड्गासन प्रतिमायें भी बनी हैं। उपरिभाग में भी पाँच प्रतिमायें अंकित हैं, जिनमें दो खड्गासन और तीन पद्मासन। अम्बिका की यह बड़ीमूर्ति सतना (म. प्र.) के पास एक ग्राम पतौरा के निकट सिन्दूरिया पहाड़ी पर र्नििमत मंदिर से यहाँ संग्रहालय में लाई गई है। संग्रहालय के शिलापट्ट पर इसमूर्ति का काल ११वीं शती ई. दर्शाया गया है।

२. सर्वतोभद्रिका —

इस संग्रहालय में दूसरी जैनमूर्ति सर्वतोभद्र प्रतिमा है। सर्वतोभद्र का अर्थ ऐसी प्रतिमा से है जो चारों तरफ से दिखलाई दे। इस सर्वतोभद्रिकामूर्ति में भी चार खड्गासन प्रतिमायें हैं। जो चारों तरफ से एक ही रूप में दिखलायी पड़ रही है। यह प्रतिमा घुटनों से खंडित है। यह प्रतिमा कौशाम्बी से प्राप्त हुई थी। संग्रहालय के शिलापट्ट के अनुसार इसका निर्माण काल ९ वीं — १० वीं शती ई. है।

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३. शांतिनाथ कीमूर्ति —

यहाँ अवस्थित प्रतिमाओं में तीसरी प्रतिमा शांतिनाथ के नाम से जानी जाती है। पद्मासन में स्थित इसमूर्ति की अवगाहना दो पुâट तीन इंच है। इसमूर्ति के दोनों ओर एक—एक खड्गासन प्रतिमा है। उनके ऊपर भी कोष्ठक में पद्मासन प्रतिमायें उत्कीर्ण हैं। भामण्डल का अंकन अत्यन्त कलापूर्ण है। अधोभाग में दोनों ओर दो—दो यक्ष—यक्षिणी हैं। शीर्षभाग में दोनों ओर पुष्पमाल लिए आकाशचारी देव हैं। छत्र के ऊपर कईमूर्ति याँ हैं जो खण्डित हैं। यह प्रतिमा पभोसा से प्राप्त हुई थी और यह भूरे बलुए पाषाण की है। संग्रहालय के शिलापट्ट के अनुसार यह १२ वी शती ई. की है।

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४. आदिनाथ कीमूर्ति —

यहाँ प्रदर्शितमूर्ति यों में चौथीमूर्ति भगवान् आदिनाथ की है। एक शिलाफलक पर कृष्ण पाषाण की भगवान् आदिनाथ की यह प्रतिमा गया (बिहार) से प्राप्त हुई थी। इस प्रतिमा के सिर पर बालों का जटा—जूट है। इनके चरणों के दोनों ओर चमरवाहक खड़े हैं। इस प्रतिमा के दोनों ओर चौबीस तीर्थंकरों की खड्गासनमूर्ति याँ बनी हैं। इसका काल १०वीं शताब्दी शिलापट्ट पर अंकित है।

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५. आदिनाथ की प्रतिमा —

जैनमूर्ति यों में पांचवीं प्रतिमा भी आदिनाथ की ही है। हलके लालवर्ण की पाषाण शिला पर अंकित भगवान् आदिनाथ की यह पद्मासन प्रतिमा जिसके हाथ और पाँव खंडित हैं, संग्रहालय की शोभा बढ़ा रहे हैं। इस प्रतिमा के कन्धे और पीठ पर जटायें हैं, नीचे के भाग में यक्ष—यक्षिणी हैं और इधर—उधर दो चंवरवाहक खड़े हैं। इस प्रतिमा के दोनों ओर दो—दो पद्मासनस्थ तीर्थंकर प्रतिमायें उत्कीर्ण हैं। छत्र के ऊपर दोनों ओर दो देवियाँ और दो देवता पुष्प लिये दिखाई दे रहे हैं। यह प्रतिमा जसो (सतना म. प्र.) से प्राप्त हुई थी। इसका काल १० वीं शती ई. प्रदर्शित है।

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६. आदिनाथ कीमूर्ति —

प्रयाग संग्रहालय में रखी प्रतिमाओं में अगली प्रतिमा भी आदिनाथ की है। इसका पाषाण लाल है। ये प्रतिमा पद्मासन में है और इसके हाथ पैर खण्डित हैं। इसके बायीं ओर यक्ष—यक्षिणी बैठे हैं। उसके ऊपर तीन पंक्तियों में दो खड्गासन, दो पद्मासन और तीन खड्गासन प्रतिमाएँ हैं। सभी के सिर खण्डित हैं। इसी प्रकार दायीं ओर नीचे एक पद्मासन और दो खड्गासन प्रतिमायें हैं। ये भी तीनों खण्डित हैं। ऊपर भी प्रतिमाएँ उत्कीर्ण हैं, किन्तु अधिक स्पष्ट नहीं है। यह प्रतिमा भी जसो (सतना म. प्र.) से प्राप्त हुई थी। इसका अनुमानित और प्रर्दिशत काल १२ वीं शती ई. है।

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७. यक्ष दम्पति कीमूर्ति —

संग्रहालय में प्रर्दिशत अगली प्रतिमा यक्ष दम्पति की है, जिसे संग्रहालय में जैन दम्पत्ति का नाम दिया गया है। इस प्रतिमा में यक्ष गोमेद और यक्षी अम्बिका सिंहासन पर ललितासन में आसीन हैं। दोनों की गोद में एक—एक बालक है। अम्बिका के हाथ में आम्रफल है। बालकों का सिर खंडित है। आसन के अधोभाग में सात भक्त श्रावक बैठे हुए हैं। ऊपर नेमिनाथ की लघु प्रतिमा बनी हुई है। यहमूर्ति भी जसो (सतना) से प्राप्त हुई थी। इसका काल १२ वीं शती ई. निर्धारित किया गया है।

८. चन्द्रप्रभु कीमूर्ति —

इन प्रतिमाओं के अतिरिक्त एक चन्द्रप्रभु की प्रतिमा भी संग्रहीत है जो दो िंसहों के ऊपर बने हुए आसन पर पद्मासन में विराजमान है जिसका वर्ण भूरा, बलुआ पाषाण और अवगाहना ३ फुट ९ इंच है। जिसके दोनों ओर चमरवाहक हैं, सिर के ऊपर पाषाण छत्र है, ऊपर की ओर पुष्पवर्षा करते हुए दो आकाशचारी देव अंकित हैं। यह प्रतिमा म्यूजियम में जैन प्रतिमाओं के बीच दिखलायी नहीं पड़ी। इस प्रतिमा का प्राप्ति स्थल कौशाम्बी और निर्माणकाल छठी शती ई. र्विणत है।

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९. सिरविहीन प्रतिमा

यह प्रतिमा म्यूजियम के अहाते में बाहर जाने वाले रास्ते के किनारे रखी हुई है। यह प्रतिमा पूरी तरह से खंडित और सिरविहीन है। हाथ भी खंडित है। इसलिए इसके बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता। इन जैन पुरातात्त्विक कलाकृतियों में हमारी जैन संस्कृति आकर्षक ढंग से प्रतिबिम्बित हो रही है।

संदर्भ

१. उत्तर प्रदेश के दिगम्बर जैन तीर्थ—बलभद्र जैन

२. श्री ऋषभदेव—पन्नालाल जैन