रोहिणी

ENCYCLOPEDIA से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

रोहिणी (नाटक)

नांदीमंगल

त्रिभुवनतिलक! त्रिभुवनमहित! त्रिभुवन शिखर पर राजते।
प्रभु आप अनुपम ज्योति से, त्रिभुवननिकेत प्रकाशते।।
अब आइये जिनदेव! मेरे, मनकमल में राजिए।
परिपूर्ण परमानंद सुखमय, शांतिरस में साजिए।।
पुष्पांजलि:

प्रस्तावना सूत्रधार—अहा! हा! आज मुझे विदित हुआ कि सच्चा सुख, उपमारहित अलौकिक सुख कहाँ है ? मैं समझ गया, समझ गया। (आनंद में विभोर हो झूम्नो लगता है तभी नर्तकी प्रवेश करती है।)

नर्तकी—महानुभाव! सभा में उपस्थित हुए दर्शकगण आपके अभिनय की प्रशंसा सुनकर आते ही चले जा रहे हैं। देखिए ना, सामने दृष्टि डालिए।

सूत्रधार—(आश्चर्य से) ओहो! तो क्या मुझे अभी कोई दृश्य उपस्थित करना है!

नर्तकी—हाँ, हाँ, अतिशीघ्र ही! और ऐसा अद्भुत दृश्य दिखाइये कि जनता अपने आपको भी भूल जाये।

सूत्रधार—ठीक, (कुछ सोचकर) हाँ, मैंने दर्शकों को बहुत बार शृंगार रस में डुबकी लगवायी है तथा कभी-कभी उन्हें वीर रस में भी खूब ही उत्तेजित किया है अत: ये कुछ नाटक अद्भुत तो नहीं रहेंगे। (पुन: सोचने की मुद्रा बनाकर) हाँ हाँ, याद आ गया, आ गया। (खुशी से उछल पड़ता है।)

नर्तकी—आर्य! आप अकेले-अकेले आनंद लूट रहे हैं, भला मुझे भी तो बतलाइये कि आप आज क्या दृश्य दिखाने वाले हैं ?

सूत्रधार—हाँ, क्यों नहीं, भला तुम्हें कैसे नहीं बतलाऊँगा! अच्छा तो बड़ी सावधानी से सुनो!

नर्तकी—सुनाइए!

सूत्रधार—हस्तिनापुर के महाराजा अशोक और महारानी रोहिणी जी का अभिनय दिखाऊँगा।

नर्तकी—उसमें कौन-कौन से रस भरे हुए हैं ?

सूत्रधार—उसमें नवों रस भरे हुए हैं। शृंगार रस, वीर रस, करुण रस, हास्य रस, अद्भुत रस, भयानक रस, रौद्र रस और वीभत्स रस ये तो हैं ही हैं किन्तु अंत में शांत रस ने सबको जलांजलि देकर अपना एकमात्र साम्राज्य फैला दिया है। अत: इस नाटक में तो वही प्रधान है।

नर्तकी—(मुख विवर्ण करके) अरे! शृंगार रस की प्रधानता से तो सभी लोग अंत में प्रिय मिलन को देखकर विभोर हो उठते हैं और... इसमें अंतिम फल क्या होगा ?

सूत्रधार—अरी मुग्धे! तूने समझा ही नहीं, इस शांतरस की प्रधानता में तो अंतिम फल सबसे ही उत्तम प्रिय वस्तु का—सबसे ही श्रेष्ठ परम सौख्य को देने वाली मुक्तिवल्लभा का मिलन होगा, समझी।

नर्तकी—हूँ, तो क्या वह अशरीरी मुक्तिकन्या कुछ आनंद भी दे सकेगी ? क्या मोक्षमहल में चलचित्र, टेलीविजन, रेडियो आदि मनोरंजन के साधन मिलेंगे ? क्या वहाँ पर मनोहर गीत गाने वाली, मन को हरण करने वाली रमणियाँ मन को रमाएंगी ? वहाँ तो शायद कुछ भी सामग्री नहीं है।

सूत्रधार—नहीं, नहीं! वहाँ तो इन तुच्छ कुछ क्षणमात्र सुख देने वाली वस्तुओं से भी बढ़कर अनुपम अनंत गुणरत्न भरे हुए हैं। वहाँ का सुख... ओहो! क्या कहना, तीनों लोकों के सुखों से विलक्षण अपूर्व सुख है! अरी मुग्धे! यदि किसी को वह सुख एक क्षण को भी मिल जाय तो वह फिर उस सुख को सदा-सदा काल तक छोड़ेगा ही नहीं और वापस कभी भी यहाँ पर आयेगा ही नहीं।

नर्तकी—(आश्चर्य से) तो क्या वह अंगूरों की मिठास से भी अधिक मीठा है ?

सूत्रधार—हाँ, हाँ सुन! चक्रवर्ती सम्राट्, जो कि छह खण्ड पृथ्वी का उपभोग करते हैं जिनके छियानवे हजार रानियाँ होती हैं और जिनका वैभव समुद्र के समान अपार होता है, उन्हें तुम जानती हो ?

नर्तकी—क्यों नहीं, अवश्य जानती हूँ।

सूत्रधार—देखो! उन चक्रवर्तियों के सुख से भोगभूमिया जीवों का सुख अनंतगुणा अधिक होता है।

नर्तकी—(आश्चर्य से) अनंतगुणा!

सूत्रधार—हाँ, हाँ, अनंतगुणा! और भी सुनते जाइये। इन भोगभूमियों से धरणेन्द्र का सुख अनंतगुणा है, इन धरणेन्द्र से देवेन्द्र का सुख अनंतगुणा है, उस देवेन्द्र से भी अहमिन्द्र का सुख अनंतगुणा है, इन सभी के अनंतानंत गुणित अतीतकाल के सुखों को एकत्रित कीजिए पुन: इन सभी के ही भविष्यकाल के सम्पूर्ण अनंतानंत गुणित सुखों को इकट्ठा कीजिए तथा पुनरपि इन सभी के अनंतानंत गुणित वर्तमान कालसंबंधी सुखों को भी एकत्रित कीजिए और सबको मिला दीजिए। तीन लोक से भी अधिक ढेर के समान सम्पूर्ण सुखों की अपेक्षा भी अनंतानंत गुणा अधिक सुख सिद्ध भगवान को एक क्षण में उस मुक्तिकान्ता के समागम से प्राप्त होता है।

नर्तकी—(हर्ष से नाचकर) ओहो! तब तो इसी एक सुख के लिए ही हम सबको प्रयत्न करना चाहिए।

सूत्रधार—जरूर, जरूर! इसीलिए तो मैंने यह शांतरस प्रधान अभिनय दिखाना चाहा है।

नर्तकी—तो फिर अब आप देरी न कीजिए! जनता भी देखने के लिए अब अतीव उत्सुक हो रही है।

सूत्रधार—बस ठीक है, अब आप भी श्री ऋषभदेव की भक्ति में विभोर हो अपनी नृत्यकला का प्रदर्शन कीजिए। (नर्तकी नृत्य करने लगती है। पुन: दोनों ही निकल जाते हैं।) (पटाक्षेप)

प्रथम स्तम्भ

(सौराष्ट्र देश के गिरिनगर के राजा भूपाल अपनी रानी और राजश्रेष्ठी वैश्यपति गंगदत्त के साथ अनेक परिकर से सहित बसंतोत्सव के लिए बगीचे की तरफ प्रस्थान कर रहे हैं। साथ में गंगदत्त की पत्नी सिंधुमती भी है। वह यौवन से उन्मत्त है और अपने रूप का अधिक गर्व करने वाली है। अकस्मात् मुनि को देखकर सेठजी अपनी भार्या को आहारदान हेतु वापस कर देते हैं, वह क्रोध में आकर मुनि को कड़वी तूमड़ी का आहार देकर उन्हें परलोक भेज देती है। राजा वापस आकर सारी स्थिति जानकर सिंधुमती को दण्डित करते हैं और वह मरकर दुर्गति को प्राप्त कर लेती है। अनंतर पूतिगंधा होकर अत्यंत दु:ख से पीड़ित हुई गुरु के उपदेश से रोहिणी व्रत करती है।)

प्रथम दृश्य

समय—मध्यान्ह स्थान—शहर का मध्य भाग १. सूत्रधार २. नर्तकी ३. भूपाल गिरिनगर के नरेश ४. रानी गिरिनगर के नरेश ५. मंत्री गिरिनगर के नरेश ६. गंगदत्त राजश्रेष्ठी ७. सिंधुमती सेठानी ८. यमुना धाय ९. सैनिकगण १०. नागरिकगण ११. प्रतिहारी रानी की दासी १२. पुरुष लकड़हारा १३. स्मृति कन्या १४. ईहा कन्या (महल के बाहर सेठ गंगदत्त अपनी भार्या सिंधुमती से वार्तालाप करते हुए चल रहे हैं। महाराजा साहब की सवारी आगे बढ़ चुकी है, सब सैनिक लोग आगे बढ़ते जा रहे हैं।)

गंगदत्त—प्रिये! महाराज की सवारी आगे बढ़ गई है वे मेरी प्रतीक्षा में काफी देर तक रथ को यहीं रोके रहे थे। किन्तु आप तो अपनी सजावट के आगे कुछ परवाह ही नहीं करती हो।

सिंधुमती—प्रियतम! देखो! अब मैं कितनी सुंदर दिख रही हूँ। सचमुच में, मेरा रूप अनूप है। क्या मेरे जैसा रूप किसी अन्य महिला का है ? क्या मेरे जैसा शृंगार कोई अन्य महिला कर सकती है ?......अहा हा! क्या यौवन की बहार है। इस छलकते हुए यौवन के उन्माद में बसंत की शोभा भी तो अपार है।

गंगदत्त—अब जल्दी करो, देरी न करो, महाराज साहब बहुत आगे निकल जाएंगे।

सिंधुमती—प्रियतम! क्या मेरे सौभाग्य की उपमा यहाँ की रानी को मिल सकती है ?... ऐं! यह देखो, मेरा मनमोहक रूप! (अपने आप ही खुशी से झूम उठती है।)

गंगदत्त—प्रिय! अपना वैभव भी क्या राजा से कम है ? और आपका रूप-सौन्दर्य भी क्या महारानी जी से कम है ? और इसीलिए तो मैं अपने को बहुत भाग्यशाली समझता हूँ।

सिंधुमती—(उन्मत्त सदृश चलती हुई) इस शहर में तो क्या इस धरा पर ही मुझे तो अपने जैसी सुंदर कोई भी स्त्री नहीं दिख रही है।

गंगदत्त—(सहसा) देखो, देखो! वे महामुनी समाधिगुप्त, ओहो! कैसे निस्पृहमना, अिंकचन वेष को धारण करने वाले!

सिंधुमती—कौन ? कहाँ, कहो ?

गंगदत्त—(अंगुली के इशारे से) वो देखो प्रिये! वे तो अपने घर की तरफ ही तो जा रहे हैं। हाँ... आहार की बेला है। ठीक है! इसीलिए ये महामना बस्ती में आये हैं, नहीं तो ये वन में ही ध्यान लगाने वाले ऋषिराज हैं। प्रिये! जावो! तुम बहुत ही जल्दी वापस जावो! इन महातपस्वी को आहारदान देकर वापस आ जाना।

सिंधुमती—(चौंककर) ऐं... मैं जाऊँ ? क्या आप मुझे इस बसंतोत्सव से वापस कर देंगे ? (कटाक्ष से देखती है)

गंगदत्त—नहीं नहीं, देवि! मेरा अभिप्राय ऐसा नहीं है किन्तु अपने घर की तरफ जाते हुए इन मुनिराज को आहार तो कराना ही है। यह तो महान पात्र का लाभ बड़े भाग्य से ही मिला है।

सिंधुमती—मैं बिना वनक्रीड़ा के वापस कैसे..... ?

गंगदत्त—तुम जल्दी जावो! आहारदान का लाभ लेवो। हाँ, देखो! मुझे तो महाराज साहब की आज्ञा में उनके साथ जाना ही है। (सिंधुमती पति की आज्ञा से अपनी धाय के साथ वापस लौटते हुए मार्ग में वार्तालाप कर रही है।)

सिंधुमती—देख यमुना! यह कौन सा दुष्टात्मा बीच में ही आ गया कि जिसने मेरे भोगों में, मेरी वनक्रीड़ा में विघ्न डाल दिया। (दीर्घ नि:श्वास लेकर) ओह! सखी! मेरे तो पैर जड़ हो रहे हैं, मुझे तो इतना गुस्सा आ रहा है कि इस दुष्ट साधु को अभी ही समाप्त कर दूँ। (क्रोध में कांपने लगती है)

यमुना—अरे रे रे! (कान में हाथ लगाकर) सेठानी जी! आप यह क्या बोल रही हैं ? हाय, हाय! ये बेचारे निरपराधी महात्मा! हमेशा जंगल में रहने वाले, ओह! आप इन्हें बड़े प्रेम से पड़गाहें और नवधा भक्ति से आहार देवें। आपका मनुष्य जन्म सफल हो जावेगा।

सिंधुमती—अरी रांड! तू भी क्या शिक्षा दे रही है ? मालूम होता है कि तू इन्हीं की ही दासी है। बस! बस! देख, न होगा बाँस न बजेगी बाँसुरी। (जल्दी-जल्दी चली जाती है) (कुछ देर बाद महाराजा की सवारी वापस आ रही है और इधर से विमान में महामुनि को बिठाकर तमाम लोग उसे कंधे पर लेकर बारह भावना का पाठ बोलते हुए आ रहे हैं। बीच में महाराज स्वयं सामने आकर पूछते हैं)

भूपाल—अरे, अरे! यह किनका विमान है ? मंत्री! जल्दी बताओ।

मंत्री—(आगे बढ़कर) महाराजाधिराज! मैं अभी सारा निर्णय किये लाता हूँ। अरे प्रतिहारी! देख तो भला यह कैसा दृश्य है ?

प्रतिहारी—हाँ मालिक! मैं अभी आई! (किसी से कुछ बात कर पुन: मंत्री के पास आकर) मंत्री महोदय! गजब हो गया।

मंत्री—(आश्चर्य से) ऐं, क्या हो गया ? जल्दी बोल!

प्रतिहारी—महात्मा...जी को मार डा...ला।

मंत्री—अरे! किसने ?

प्रतिहारी—ग... ग-गंगदत्त की भा-भार्या ने।

मंत्री—अरे! जो राजश्रेष्ठी गंगदत्त है, उन्हीं की भार्या ने ?

प्रतिहारी—हाँ-हाँ! उन्हीं की भार्या ने।

मंत्री—क्यों ? कैसे मार डाला ? (महाराज स्वयं आगे बढ़ते हैं)

महाराज—हाँ, क्या बात है प्रतिहारी ? जल्दी से स्पष्ट बता।

प्रतिहारी—(हाथ जोड़कर) अन्नदाता! आ... आ... आ...प के से... सेठ की भा... भार्या ने।

महाराज—तू इतनी घबरा क्यों रही है, ठीक से बता। (बीच में एक सैनिक आकर बोलता है)

सैनिक—महाराजा साहब! मैं सही हकीकत आपको समझाये देता हूँ। पृथ्वीनाथ! अभी चार घण्टे पहले वनविहार के प्रस्थान के समय आपके सेठ गंगदत्त जी भी अपनी भार्या के साथ चल रहे थे। उन्होंने मार्ग से ही अपने महल की तरफ जाते हुए मासोपवासी श्री समाधिगुप्त नामक महामुनि को देखा। आपको मालूम ही है कि ये सेठ जी बड़े धर्मात्मा हैं अत: उन्होंने अपनी सेठानी जी को आहारदान हेतु वापस भेज दिया। वन विहार से वापस जाने में सेठानी जी को बहुत गुस्सा आ गया चूँकि वे मिथ्यादृष्टि हैं अत: उन्होेंने घर जाकर मुनिराज का पड़गाहन करके उन्हें कडुवी तूमड़ी का आहार दे दिया। मुनिराज ने समताभाव से वह आहार ग्रहण कर लिया और मंदिर जी में आकर श्रीजी के सामने चतुराहार का त्याग करके परमसमाधि ग्रहण कर ली। उसी क्षण श्रावकगण दौड़ पड़े, मुनिराज तो महाप्रयाण कर गये। उनके इस पार्थिव शरीर को विमान में स्थापित कर ये लोग महोत्सव के साथ नशियाँ जी के बगीचे में ले जा रहे हैं। वहीं पर इस मृत शरीर का विधिवत् संस्कार करेंगे।

महाराज—(बहुत ही दु:ख से) हाय, हाय! बड़ा अनर्थ हो गया।

रानी—हाँ राजन्! बहुत ही बड़ा अनर्थ हो गया। (विह्वल होकर) हाय देव! आपके इस न्यायपूर्ण शासन में यह क्या हो गया ?

महाराज—हाँ देवि! सचमुच में आज तो गजब ही हो गया (आगे बढ़कर) आवो, आवो एक बार अंत में गुरुदेव के शरीर की वंदना तो कर लें। (दोनों ही पंचांग नमस्कार करते हैं।) नमोस्तु गुरुदेव! नमोस्तु! नमोस्तु! नमोस्तु। (पुन: मंत्री द्वारा प्रदत्त नारियल लेकर राजा मुनिराज के सम्मुख चढ़ाते हैं। सब लोग जय-जयकार ध्वनि से आकाश गुंजा देते हैं।) (सवारी और सेना निकल जाती है पुन: दो महिलाएँ आकर चर्चा करती हैं)

स्मृति—सखी ईहा! आवो-आवो, क्या तुमने कुछ सुना ?

ईहा—हाँ सखी, कुछ सुना तो सही, किन्तु जिज्ञासा तृप्त नहीं हुई तभी तो तुम्हें ढूंढते-ढूंढते मैं यहाँ आ पहुँची हूँ। तुम मुझे अब सभी बातें सुना दो।

स्मृति—हाँ सुनो ईहे! सुनो! अभी-अभी तो महातपस्वी समाधिगुप्त की विमानयात्रा यहाँ से निकली है, मैंने स्पष्टतया देखा है।

ईहा—उसे तो मैंने भी देखा है। फिर आगे क्या हुआ ? स्मृति—उसका सिर मुंडवा कर, फटे कपड़े पहनाकर उसके माथे में पाँच बेलफल बँधवाये हैं।... (इसी बीच में सिंधुमती को गधे पर बिठाकर लोग उसके आगे-आगे ढोल बजाते हुए आ रहे हैं। तमाम जनसमुदाय इकट्ठा हो जाता है।)

ईहा—बहन! यह क्या है ? (आश्चर्य से आँखें फाड़-फाड़कर देखने लगती है।

स्मृति—बस बहन! यह वही दृश्य है। हाँ तो देखो ना, पाप का फल कितनी जल्दी मिल गया।...अभी क्या है बहन! आगे देखना मुनि हत्या का फल क्या होता है ? (सभी चले जाते हैं) (कुछ देर बाद कुष्ट रोग से ग्रसित सिंधुमती विलाप करते हुए प्रवेश करती हैं।)

सिंधुमती—हाय, हाय! अब मैं कहाँ जाऊँ ? उस दुष्टात्मा नंगे ने मुझे शाप दे दिया। अब मैं इस रोग की वेदना कैसे सहूँ। अरे पतिदेव! तुमने मुझे कैसे नहीं रखा ? अरे बाप रे... अरे भगवान! मैं भूखी मर रही हूँ। कोई तो सुनो रे! मुझे एक रोटी दे दो। (जोर-जोर से चिल्लाते हुए रोती है) (लकड़ी काटने वाला पुरुष सामने आकर कपड़े से नाक बंदकर पूछता है)

पुरुष—तू कौन है ? यहाँ क्यों आ गई ? अरे रे रे! मेरी तो नाक फटी जा रही है। तेरे शरीर से कितनी भयंकर दुर्गन्ध निकल रही है। जा-जा! यहाँ से भाग जा।

सिंधुमती—अरे भइया! मैं कहाँ जाऊँ ? मैं तो मरी... (गिर पड़ती है फिर उठकर) अरे भइया! एक पैसा दे दो... मैं तो दो-तीन दिन से भूखी हूँ।

पुरुष—तू है कौन ? तेरा शरीर तो खूब गोरा गुमटा दिख रहा है क्या कोई महारानी थी ?

सिंधुमती—अरे भइया! न पूछो, न पूछो...। मैं महारानी से कम नहीं थी (आँसू पोंछकर) लेकिन एक नंगे भिखारी ने मेरी यह दशा कर दी है।

पुरुष—(आश्चर्य से) ऐं! नंगे ने ? वह कौन था ? मुझे भी तो बता दे।

सिंधुमती—मैं गिरिनगर के राजश्रेष्ठी की सेठानी हूूँ। मैं महारानी से भी अधिक सुंदर थी (रोने लगती है पुन:) एक दिन बसंत विहार में मेरे स्वामी ने मुझे नंगे साधु को खाना खिलाने के लिए भेज दिया। तब मुझे गुस्सा आया। मैंने उस दुष्ट को कडुवी तूमड़ी खिला दी।

पुरुष—और उसने खा ली ? (विस्मय से मुंह फाड़ता है।)

सिंधुमती—हाँ, कहते हैं कि ये नंगे साधु बड़े शांत परिणामी, बड़े समताभावी होते हैं। फिर वह मर गया। तब राजा ने मुझे निकाल दिया और दूसरे दिन ही मुझे सारे शरीर में कुष्ठ फूट निकला....... (रोती है)

पुरुष—(मुंह बिगाड़कर) तभी तो तुझे ऐसा फल मिला। अरे बहन! क्या महात्माओं की हत्या से किसी को शांति मिल सकती है ? और फिर जैन मुनि तो कभी भी शाप नहीं दे सकते, वे तो पूर्ण क्षमाशील होते हैं। हाय! तूने बहुत बड़ा पाप किया है (दूर हटकर) अभी तो क्या ? जब तुझे नरकों के दुख भोगने पड़ेंगे, तब पता चलेगा।

सिंधुमती—अरे भइया! पानी पिला दे। हाय रे। (जोरों से रोने लगती है) दोनों चले जाते हैं।) (पटाक्षेप) (कनकपुर नगर के राजा सोमप्रभ के पुरोहित का नाम सोमदत्त था, उसकी भार्या लक्ष्मीमती थी। सोमदत्त के बड़े भाई सोमशर्मा ने लक्ष्मीमती से संबंध स्थापित कर लिया। यह बात सोमशर्मा की भार्या सुकांता ने अपने देवर से कह दी। उसने इस घटना से मुनि दीक्षा ले ली, तब सोमशर्मा पुरोहित हो गया। एक समय राजा पुरोहित के साथ शकट देश के राजा के साथ युद्ध करने निकले। प्रस्थान में सोमदत्त मुनि के दर्शन होने से भाई सोमशर्मा ने उसकी हिंसा कर डाली। उसका फल उसे क्या मिला, सो देखिए—)

द्वितीय दृश्य

समय—रात्रि स्थान—महल १. सोमशर्मा पुरोहित का बड़ा भाई २. सुकान्ता पुरोहित के भाई की पत्नी ३. सोमदत्त पुरोहित ४. लक्ष्मीमती पुरोहित की भार्या ५. चपला दासी ६. स्मृति कन्या ७. ईहा कन्या

सोमशर्मा—क्या करूँ, समझ में नहीं आता ? उस मनमोहनी के अधरामृत का पान किये बिना तो मेरा जीवन निरर्थक ही है। मैं राजपुरोहित का ही तो पुत्र हूँ, भले ही आज मेरा छोटा भाई पुरोहित पद पर है तो क्या होता है ? क्या मेरा सम्मान कोई कम है ?... (कुछ सोचकर) मैं क्यों न उस लक्ष्मीमती को अपनी लक्ष्मी बना लूँ। अरी चपले! इधर आ।

चपला—आई, सरकार आ गई। कहिये, क्या आज्ञा है ?

सोमशर्मा—देख! मैं तुझे सारी अपनी स्थिति बताए देता हूँ। तू तो मेरी पूर्ण विश्वासपात्र है। हाँ, ध्यान रख, तेरी मालकिन से बहुत सावधान रहते हुए यह काम करना है।

चपला—(हँसकर) कहिए मालिक! आप चिन्ता न कीजिये। मैं इन कार्यों में बहुत ही कुशल हूँ।

सोमशर्मा—हाँ, तो अब मुझे लक्ष्मीमती के बिना चैन नहीं है। मैं कई दिनों से बहुत ही बेचैन हो रहा हूँ। बस तू उसे मेरी प्रिया बना दे, तू जो चाहेगी सो इनाम दूँगा। तेरी जन्म-जन्म की गरीबी को मैं समाप्त कर दूँगा।

चपला—ऐं! लक्ष्मीमती! ओ हो। वह तो आपके छोटे भाई की पत्नी है। वह तो आपकी पुत्रीतुल्य है। फिर आप यह क्या...। (बीच में ही बात काटकर)

सोमशर्मा—बस-बस! तू मुझे उपदेश न सुना, मैंने तुझे उपदेश सुनाने के लिए नहीं बुलाया है, बल्कि मेरी पीड़ा दूर करने के लिए बुलाया है।

चपला—(कुछ सहमकर) ठीक, तो आप मुझे क्या इनाम देंगे ?

सोमशर्मा—जो तू चाहेगी।

चपला—अच्छा! मैं मिनटों में आपका काम बनाये देती हूँ। (चपला चली जाती है और पुरोहितजी अपनी जनेऊ को ठीक करते हुए दर्पण में अपना तिलक देखते हैं, चोटी को खड़ी करते हैं और सोचते हैं)

सोमशर्मा—ओह! सुना है कि महादेव जी ने अपने तीसरे नेत्र से अग्नि निकालकर कामदेव को भस्म कर दिया था फिर भला यह कैसे जीवित हो गया... ? हाँ, मालूम है। शायद उसे पार्वतीजी ने संजीवनी औषधि से जिला दिया था। खैर कुछ भी हो, बड़े-बड़े योद्धा भी जिस कामदेव के वश में हैं, इंद्र, धरणेन्द्र और चक्रवर्ती भी जिसके बाणों के निशाने हो चुके हैं, भला वह कामदेव हम जैसों को कैसे छोड़ सकता है ?... अरे! मैंने लक्ष्मीमती को बुलाने तो भेज दिया है लेकिन यदि मेरी लक्ष्मी जी को पता चल जायेगा तो क्या होगा ? और अपने प्राणों की रक्षा तो करनी ही है और वह लक्ष्मीमती के संभोग बिना सम्भव नहीं है। बड़े-बड़े ऋषियों ने भी तो स्त्रियों के आधीन होकर अपनी तपश्चर्या नष्ट कर डाली। सही मायने में देखा जाये तो परस्त्री है क्या चीज ? और यह तो छोटे भाई की ही तो भार्या है फिर क्या मेरा इस पर अधिकार नहीं है... (चपला लक्ष्मीमती को साथ लेकर प्रवेश करती है।)

सोमशर्मा—(खुशी से नाचकर) वाह चपले वाह। तूने आज अपने नाम को सार्थक कर दिया। शाबाश! तूने मुझे कृतार्थ कर दिया।

चपला—महाराज! मैं इस प्रशंसा के योग्य नहीं हूँ। यह तो आप अपना ही सौभाग्य समझिये कि ये लक्ष्मीमती जी मानो जैसे आपके लिए उत्कंठित ही हो रही हों। (लक्ष्मीमती लज्जा से सकुचाती हुई एक तरफ होने लगती है और सोमशर्मा उसका हाथ पकड़कर अपनी ओर खींच लेते हैं तथा कुर्सी पर बैठकर उसे बिठा लेते हैं। चपला निकल जाती है।)

सोमशर्मा—देवी! अब लज्जा को छोड़ो और मेरी ओर देखो। इस समय मैं तुम्हारे विरह में पागल हो रहा हूँ। (लक्ष्मीमती हाथ छुड़ाने की कोशिश करती है।)

सोमशर्मा—बस-बस, अब यह छुड़ाने की चेष्टा मत करो। देवि! मैं आपका दास हूँ अब मुझे आज्ञा करो और मेरे साथ भोगों को भोगकर अपना यौवन सफल करो। अब तो मुझे गाढ़ आलिंगन में आबद्ध करो। (अंदर से सुकांता आवाज लगाती है।)

सुकांता—अरी चपले! चपले! तू कहाँ है ? पता नहीं चलता है कि यह निगोड़ी कहाँ चली गई ? इतनी रात हो गई है, न तो अभी तक पुरोहित जी पधारे हैं और न देवर जी ही। ओ चपले!... (पुरोहितजी जल्दी से उठकर भाग जाते हैं और लक्ष्मीमती खड़ी हो जाती है।)

लक्ष्मीमती—आइये भाभी जी! बैठिए! (घबड़ा रही है)

सुकांता—ऐं लक्ष्मी! तू घबरा क्यों रही है ? और यहाँ से अभी कौन भागा ? पट-पट की पदचाप किसकी सुनाई दी ? (गुस्से में गुर्राने लगती है)

लक्ष्मीमती—(डरते हुए) न, न, भाभी जी। यहाँ तो कोई भी नहीं आया। मैं जब से अकेली बैठी हूँ।

सुकांता—तू आज इस बैठक में कैसे आ गई ?

लक्ष्मीमती—यूँ ही आ गई, कमरे में मन नहीं लगा तो मैंने सोचा चलो, बैठक में ही थोड़ी देर आराम करें।

सुकांता—(संदेह से) हूूँ, मालूम पड़ता है कि कुछ दाल में काला है। (सुकांता बड़बड़ाती हुई चली जाती है पुन: पुरोहितजी आ जाते हैं)

सोमशर्मा—क्या हुआ ?

लक्ष्मीमती—जिठानी जी आ गई थीं, कहती थीं कि कुछ दाल में काला है।

सोमशर्मा—अरे, बकने दो, आओ अपन तो अपनी काम अग्नि को शांत करें। ये तो औरतों का झगड़ा चलता ही रहता है। (ठुड्ढी में हाथ लगाकर मुख को ऊँचा करते हुए) तुम कुछ भी चिंता नहीं करना। (सोमदत्त अंदर से आवाज लगाता है...)

सोमदत्त—लक्ष्मीमती। (लक्ष्मीमती आगे बढ़कर पति का स्वागत करती है सोमशर्मा निकल जाते हैं।

सोमदत्त—प्रिये! यहाँ आते ही दिनभर की थकान समाप्त हो जाती है। सचमुच ही जैसे विष्णु भगवान को लक्ष्मी प्यारी है वैसे ही तुम मुझे प्यारी हो।

लक्ष्मीमती—स्वामिन्! आपका असीम स्नेह मिलना यह मेरा अहोभाग्य ही है। मेरे लिए भी तो बस एक आप ही सर्वस्व हैं। (दोनों चले जाते हैं। पुन: आकर सोमदत्त अकेले कुछ सोच रहे हैं)

सोमदत्त—संसार में विधाता ने सुख के लिए एक ही ऐसी सृष्टि निर्माण की है कि जिसके आगे तीन लोक का राज्य भी फीका है। अहो! क्या स्त्री सुख से भी बड़ा कोई सुख विश्व में हो सकता है ? मेरी लक्ष्मीमती भार्या मुझे प्राणों से भी अधिक प्यारी है और हो भी क्यों न, उसका निखरता हुआ रूप, छलकता हुआ यौवन, कोयल से भी अधिक मीठी वाणी, जब वह हँसती है तब ऐसा लगता है कि मानों फूल ही झड़ रहे हैं। उसकी हंस जैसी चाल, उसकी संगीत कला, उसकी कार्यकुशलता, सभी एक से एक बढ़कर ही तो हैं।... उसमें मेरा कितना विश्वास है, वह सीता से बढ़कर शीलवती सती है, मैना से बढ़कर पतिसेवा परायणा पतिव्रता है। ओह! उसने मुझे अपने प्रेमपाश में बाँध रखा है। मैं उसे स्वप्न में भी तो नहीं भुला पाता हूँ। (सुकांता प्रवेश करती है)

सोमदत्त—आइये भाभी जी, आइये। आज कैसे आपने मेरा कक्ष पवित्र किया है।

सुकांता—देवर जी। मैं कुछ आश्चर्यकारी घटना सुनाने आई हूँ ?

सोमदत्त—सुनाइये, जल्दी सुनाइये। (उत्सुकता प्रकट करते हुए)

सुकांता—आपकी भार्या लक्ष्मीमती महा कुलटा है।

सोमदत्त—(चौंककर) ऐं! भाभी जी! आप क्या कह रही हैं ? (आवेश में) जरा होश में बोलिये। मेरी प्रिया को क्या आप लांछन लगाना चाहती हैं ?

सुकांता—हाँ-हाँ देवर जी! जो मैं कह रही हूँ वह बिल्कुल सत्य है। चलो मेरे साथ चलो, मैं तुम्हें स्पष्ट दिखाऊँ।

सोमदत्त—(दीर्घ नि:श्वास लेकर) ओह! यह क्या ?... अच्छा तो चलिये मैं आपके साथ चलकर देखना चाहता हूँ।

सुकांता—चलिये, चलिये! आपके अपने भ्राता की और अपनी लक्ष्मीजी की करतूतों को देखिये।

(दोनों उठकर जाते हैं। इधर सोमशर्मा और लक्ष्मीमती हँसते हुए और परस्पर में हाथ पकड़े हुए प्रवेश करते हैं)

लक्ष्मीमती—मैं आपके भाई को इस तरह रिझा लेती हूूँ कि वे मेरे प्रेम में पागल हो जाते हैं। (हँसने लगती है)

सोमशर्मा—वह तो बेवकूफ हैै। छोड़ो उसकी बात... अपनी तो गुलछर्रे उड़ रही हैं और कुछ बढ़िया बात सुनाइये।

लक्ष्मीमती—यह लीजिए रत्नहार, आपके भाई को महाराजा ने उपहार में आज दिया है।

सोमशर्मा—ओ हो! (हर्ष में विभोर होकर उसे देखते हुए) क्या सुंदर हार है! फिर भी बल्लभे! तुम्हारे प्यार से अधिक मोहकता इसमें नहीं है, यह जड़ ही तो है। (सुकांता दूर से झाँकती है और देवर को दिखाती है पुन:)

सुकांता—(दाँत किटकिटाते हुए) देखो भइया! मुझे तो इतनी गुस्सा आ रही है कि दुष्टा का सिर धड़ से अलग कर दूँ।... पापिनी, कुलकलंकिनी क्या यह मुख दिखाने लायक है ?

(सोमदत्त कपड़े से अपना मुख ढँककर वापस चला जाता है। कुछ आहट पाने से इधर-उधर देखकर ये दोनों भी सहमे हुए चले जाते हैं पुन: सोमदत्त वापस आता है।)

सोमदत्त—आह! प्रभात हो गया, मुझे तो रात भर िंकचित् भी नींद नहीं आई।... स्त्रियों का यह चरित्र! आह! मेरा तो हृदय धड़क रहा है। मैं क्या करूँ ? सचमुच में इस असारसंसार में अगर कुछ सारभूत है तो एक धर्म ही है! बस उसके बिना और कुछ भी अपने लिए हितकर नहीं है। (दीर्घ श्वांस लेकर) ओह! जिस लक्ष्मी को मैं अपने हृदयकमल में विराजमान किये हुए था, वो ही लक्ष्मी यह है क्या मेरी आँखें धोखा तो नहीं दे रही है, क्या मैंने कुछ ऐसा ही स्वप्न तो नहीं देख लिया है ? नहीं-नहीं, बिल्कुल नहीं, इन आँखों ने बिल्कुल ही स्पष्ट रूप से उसी लक्ष्मी को तो देखा है। बड़े भाई ओह! पितातुल्य और उनके साथ यानी जेठ के साथ रमते हुए। धिक्कार हो ऐसी कुलटा स्त्रियों को! (कुछ सोचकर) अच्छा तो ठीक, बहुत ठीक (प्रसन्न होकर) बस-बस मैंने अपने जीवन का सार पा लिया। हाँ, बस किससे पूछना है अब तो शीघ्र ही गुरुदेव के पादमूल में पहुँचकर जैनेश्वरी दीक्षा ग्रहण कर लेनी है। बहुत ही बढ़िया विचार उत्पन्न हुआ है। ओहो! आत्मा का सच्चा सुख, परमानंदमय अनुपम स्वात्मानुभव रस का आस्वादन! मैं कृतकृत्य हो गया। (चला जाता है, उधर से स्मृति और ईहा प्रवेश करती हैं)

ईहा—बहन! कुछ सुना ?

स्मृति—हाँ, मैंने तो सब कुछ सुन लिया है और तुझे भी सुनाती हूँ।

ईहा—हाँ, हाँ, सुनाओ।

स्मृति—सखी! अपने महाराजा सोमप्रभ के जो पुरोहित थे सोमदत्त, उनको तो तू जानती ही है।

ईहा—हाँ, और उनकी भार्या लक्ष्मीमती को तथा उनके भाई सोमशर्मा और उनकी भार्या सुकांताजी को मैं खूब जानती हूँ।

स्मृति—और आगे ?

ईहा—न, और आगे की मुझे कुछ मालूम नहीं है।

स्मृति—हाँ, तो सुन। बहुत दिनों से सोमशर्मा का लक्ष्मीमती के साथ व्यभिचार चल रहा था।

ईहा—(आश्चर्य से) अच्छा! तो फिर पता कैसे चला ?

स्मृति—फिर क्या हुआ, सोमदत्त ने घर से विरक्त होकर जैनेश्चरी दीक्षा ले ली और वे विश्ववंद्य महामुनि बन गये।

ईहा—फिर क्या हुआ ?

स्मृति—फिर राजा ने सोमशर्मा को पुरोहित पद पर प्रतिष्ठित कर दिया है।

ईहा—अच्छा! तो क्या राजा को उसके व्यभिचार की बात नहीं मालूम हुई।

स्मृति—नहीं, तभी तो राजा ने उसे सम्मान्य पद पर प्रतिष्ठित कर दिया है।

ईहा—तो अब राज्य की व्यवस्था सुचारु है ना ?

स्मृति—शकट देश के महाराजा वसुपाल के यहाँ एक राजहाथी है वह बहुत ही सुंदर और बलवान् है। उसका नाम त्रिलोकसुंदर है। अपने महाराजा ने दूत को भेजकर उस हाथी की माँग की थी चूँकि शकट देश अपने अधीन ही तो था, किन्तु सुना है कि राजा वसुपाल ने हाथी देने से इंकार कर दिया है। अत: महाराज प्रात:काल युद्ध के लिए प्रस्थान करेंगे।

ईहा—अच्छा! फिर क्या होगा ? सो भी बतलाइये।

स्मृति—फिर आगे होने के बाद ही सुनाऊँगी। (दोनों चली जाती हैं) (पटाक्षेप) (महाराजा सोमप्रभ सेना सहित प्रस्थान कर शहर के बाहर ठहर गये। सोमदत्त मुनि को सामने देख सोमशर्मा पुरोहित ने अपशकुन बताकर उन्हें मारना चाहा किन्तु अन्य निमित्तज्ञ ने राजा को मुनिदर्शन का शकुन बताकर प्रसन्न किया और हुआ भी वैसा ही। तब सोमशर्मा ने कुपित होकर मुनि को मार डाला, अनंतर उसके फलस्वरूप राजदण्ड पाकर कुष्ट रोग से पीड़ित हो दुर्गति में चला गया।)

तृतीय दृश्य

समय—प्रात:काल स्थान—वन में शिविर का प्रांगण। १. सोमप्रभ कनकपुर नरेश २. सोमदत्त पुरोहित ३. मंत्री ४. विश्वदेव पुरोहित ५. वसुपाल शकटपुर नरेश ६. सभासद ७. सैनिक दल ८. दूत शकटपुर नरेश का ९. द्वारपाल कनकपुर नरेश का १०. स्मृति कन्या ११. ईहा कन्या (महाराज सोमप्रभ चिंतित मुद्रा में बैठे हैं, पुरोहित सोमशर्मा बोल रहे हैं और कुछ सभासद उपस्थित हुए सुन रहे हैं।)

सोमशर्मा—महाराज आप बिल्कुल चिंता छोड़िए, अपने यहाँ शास्त्रों में सभी विघ्नों की शांति के लिए उपाय बतलाए गये हैं। देखिए, इसी नंंगे साधु को मारकर उसके खून को सब दिशाओं में क्षेपण कर देने से संपूर्ण विघ्नों की शांति हो जावेगी, फिर आप आगे बढ़िए।

राजा—(दोनों हाथ से अपने कान ढ़ककर खेद और आश्चर्य से) आह! पुरोहित! तुमने यह क्या कह दिया ? ओह! हिंसा ? और मुनि की हिंसा ? हाय! हाय! ऐसे शब्द तो सुनना भी महापाप है।

पुरोहित—(निर्भीकता से) महाराज! कुछ भी हो, इस मंगलमय प्रस्थान में नंगे भिखारी का दर्शन तो... बहुत बड़ा अनिष्टसूचक है, अमंगलसूचक है। अब आप पुन: आगे प्रस्थान कैसे करेंगे ?

राजा—जो भी हो (गाल पर हाथ रखकर कुछ सोचकर) तो क्या वापस चलना चाहिए! मंत्रिन्! बोेलो क्या करना ?

मंत्री—महाराज की जैसी आज्ञा हो। (एक निमित्तज्ञानी विश्वदेव प्रवेश करते हैं।)

विश्वदेव—महाराजाधिराज की जय हो, नंदो, वर्धो महाराजाधिराज।

राजा—पधारिये पण्डित जी, पधारिये। आप बड़े मौके से आये!

विश्वदेव—आज्ञा दीजिए महाराज।

राजा—हम लोेग तो शकट देश के राजा को जीतने के लिए निकले हुए हैं किन्तु...।

विश्वदेव—किन्तु क्या महाराज! आप स्पष्ट कहिये।

राजा—शाम को यहाँ पर पड़ाव डाल दिया और उसी समय एक नग्न दिगम्बर मुनि आकर स्कंधावार में एक तरफ ध्यानस्थ खड़े हो गये।

विश्वदेव—(गद्गद होकर) जय हो महाराज! जय हो, आप तो बड़े भाग्यशाली हैं। ओहो! ‘रवात्पतिता वो रत्नवृष्टि:’ आपके लिए तो आकाश से रत्न की वर्षा हो गई।

राजा—(आश्चर्य से निमित्तज्ञानी का मुख देखते हुए) क्या, क्या ? आप क्या कह रहे हैं पंडित जी ? यह तो मेरे कार्य में बहुत बड़ा अपशकुन हो गया है।

विश्वदेव—(विस्मय से) सो कैसे ?

राजा —पंडितजी! नंगों का दर्शन तो अशुभ ही है।

विश्वदेव—ओहो! आपको किसने भरमा दिया ?

राजा—(सोमशर्मा पुरोहित की तरफ देखकर विश्वदेव की तरफ देखते हुए) क्यों पंडित जी! क्या ऐसा नहीं है ?

विश्वदेव—(उच्च स्वर से) बिल्कुल नहीं महाराज! अरे! दिगम्बर मुनि का दर्शन तो सम्पूर्ण मंगलों में एक मंगल है और सर्वश्रेष्ठ शकुन है। सुनिए महाराज! मैं आपको यह बात सप्रमाण सिद्ध करके बताता हूँ।

राजा—(उत्सुकता से) हाँ, बताइए पुरोहित जी! मैं तो आज बहुत ही चिंतित हो गया था।

विश्वदेव—जिसने भी आपसे नग्न मुनि के दर्शन से अपशकुन बताया है उसने शास्त्रज्ञान से अपनी अनभिज्ञता ही व्यक्त कर दी है। सभी प्राणियों को अभयदान देने वाले ये मुनिराज सर्वकार्य की सिद्धि को करने वाले हैं। वे यति- पुंगव समस्त कार्यों की सफलतारूप हैं, समस्त शकुनों के उपमाभूत हैं, संपूर्ण कल्याण को करने वाले ऐसे ये मुनिराज आपको दिख रहे हैं। प्रमाण देखिए— मार्ग में सामने से यतीश्वर को आते हुए देखकर युद्ध के लिए प्रयाण करते हुए श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा है कि—

आरुरोह रथं पार्थ! गांडीवं चापि धारय।

निर्जितां मेदिनी मन्ये, निग्र्रंथोयतिरग्रत:।।

हे अर्जुन! तुम रथ पर चढ़ जावो और गाँडीव धनुष को धारण कर लो। मैं इस पृथ्वी को जीती हुई ही समझ रहा हूँ, चूँकि सामने निग्र्रंथ यति दिख रहे हैं। उसी प्रकार से संपूर्ण शकुन शास्त्रों में विलक्षण बुद्धि वाले विद्वानों ने समस्त लोक में प्रसिद्ध ऐसा एक सुभाषित कहा है—

श्रमणस्तुरगो राजा, मयूर: कुंजरो वृष:।

प्रस्थाने वा प्रवेशे वा, सर्वे सिद्धिकरा स्मृता:।।

श्रमण मुनि, घोड़ा, राजा, मोर, हाथी और बैल ये सभी प्रस्थान के समय अथवा प्रवेश करने के समय दिखें तो सिद्धि को करने वाले माने गये हैं। ऐसा ही ज्योतिष शास्त्रों में भी कहा है—

पद्मिन्यो राजहंसाश्च, निग्र्रंथाश्च तपोधना:।

यद्देशमभिगच्छंति तद्देशे शुभमादिशेत्।।

पद्मिनी जाति की स्त्रियाँ, राजहंस और निग्र्रंथ तपोधन ये जिस देश में प्रवेश करते हैं उस देश में शुभ-मंगल हो जाता है। और भी देखिए राजन्! सभी जनों को पुण्य प्रदान करने वाले ऐसे धर्मशास्त्रों में भी विद्वानों ने बतलाया है—

योगी च ज्ञानी च तपोधनाश्च, शूरोऽथ राजा च सहस्रदश्च।

ध्यानी व मौनी च तथा शतायु:, संदर्शना देव पुनन्ति पापम्।।

योगी, ज्ञानी, तपोधन—दिगम्बर मुनि, शूरवीर, राजा, अश्व, ध्यानी, मौनी और सौ वर्ष की आयु वाले मनुष्य ये अपने दर्शन से ही पापों को धो डालते हैं। इसलिए हे राजाधिराज! आप का यह प्रस्थान शत्रु से विजयसूचक ही है। इस मार्ग में ये मुनिराज शकुनरूप ही हो रहे हैं। ये साधु संपूर्ण जगत को पवित्र करने वाले हैं। क्रोध, मान आदि कषायशत्रुओं का नाश कर चुके हैं। इन साधु- पुंगव के दर्शन से आपकी कार्यसिद्धी निश्चित ही है। मुनिराज के अवलोकन का फल आपको तत्क्षण ही मिलने वाला है। आप देखिये! प्रात: ही शकट देश का राजा, त्रिलोकसुंदर नामक हाथी लाकर आपको भेंट करेगा।

राजा—(प्रसन्नचित्त होते हुए) तो फिर हमें आज यहीं पर ठहरना उचित है।

विश्वदेव—हाँ महाराज! आप आज यहीं विराजिये और हमारे निमित्तज्ञान की परीक्षा कीजिए। (सभा विसर्जित हो जाती है। राजा अपने प्रधानमंत्री के साथ सांयकाल में उसी बगीचे में टहल रहे हैं)

राजा—मंत्रिन्! दिगम्बर जैन मुनियों का माहात्म्य अचिन्त्य है, सो ठीक ही है क्योंकि ये प्राकृतिक वेष को धारण करने वाले हैं। ये नंगे नहीं माने जाते।

मंत्री—हाँ महाराज! यथाजातरूप के धारी ये महामुनि अगणित गुणों से युक्त होते हैं। कभी किसी से द्वेष या क्रोध नहीं करते हैं। ये परम क्षमाशील होते हैं।

राजा—अच्छा चलो, अब विश्राम करें। मन तो अतीव उत्सुकता से प्रात:काल की प्रतीक्षा कर रहा है।

मंत्री—सो ठीक ही है महाराज। (दोनों चले जाते हैं। पुन: प्रात: राजसभा लगी हुई है और सामने से सेना की धूल दिख रही है। सैनिक लोग शस्त्र ले-लेकर खड़े हो जाते हैं)

एक सैनिक—(गरजकर) किसकी मौत नजदीक आई हुई है ? कौन यह धूल उड़ाता हुआ आ रहा है ?

दूसरा सैनिक—(उछलकर) आने दो, हम लोग भी तो हर वक्त शत्रुओं की प्रतीक्षा ही करते रहते हैं। (एक दूत सामने आता है और आगे बढ़कर द्वारपाल से अंदर जाने की आज्ञा चाहता है)

द्वारपाल—(अंदर घुसकर) महाराज की जय हो, महाराज एक दूत आया है और वह आपसे मिलना चाहता है।

राजा—अंदर आने दो।

द्वारपाल—महाराज को मेरा प्रणाम स्वीकार हो। (घुटने टेक कर नमस्कार करता है।)

राजा—(हाथ के इशारे से एक तरफ खड़े होने का संकेत करते हुए) कहो, तुम कहाँ से आये ?

दूत—महाराज! आपके प्रेम से प्रेरित होकर शकट देश के राजा वसुपाल आपसे मिलने पधार रहे हैं।

राजा—ठीक है मंत्री! देखिये, उनका स्वागत कीजिये।

मंत्री—जो आज्ञा महाराज। (मंत्री बाहर जाकर बहुत लोगों के साथ राजा वसुपाल को लेकर आते हैं और त्रिलोकसुंदर हाथी को बाहर प्रांगण में खड़ा कर देते हैं)

वसुपाल—(प्रवेश करके) कनकपुर नरेश महाराज को मेरा नमस्कार हो (रत्नों का थाल भेंट में रखकर) त्रिलोक सुंदर हाथी भी सामने प्रांगण में आपकी स्वीकृति को चाह रहा है।

सोमप्रभ—बहुत ठीक राजन्! (हाथ के संकेत से पास के आसन पर बिठाते हुए तथा प्रसन्न मुद्रा में) कहिये। शकट देश में सर्वत्र कुशल है न और आप भी पूर्णतया कुशल हैं न ?

वसुपाल—पृथ्वीनाथ! आपके प्रसाद से हम और शकटदेशवासी सभी कुशलक्षेम से हैं और हम लोग सदैव आपके कुशल मंगल की कामना किया करते हैं। (सोमप्रभ राजा भी उन्हें यथोचित भेंट देकर विदा कर देते हैं और आप हाथी को लेकर अपने नगर में वापस आ जाते हैं) (स्मृति और ईहा प्रवेश करती हैं।)

ईहा—बहन! कई दिन हुए आपसे मिलना नहीं हुआ आज तो मैं आपके लिए बेचैन हो उठी।

स्मृति—(मुस्कराकर) बहन! आपसे मिले बगैर चैन तो मुझे भी नहीं पड़ती है। अच्छा! अब कुछ काम की बात करें।

ईहा—हाँ, हाँ, मुझे कुछ नया-नया समाचार सुनाओ।

स्मृति—सुनो-सुनो, अपने कनकपुर के नरेश शकटदेश के राजा का राजहाथी चाहते थे सो तो तुम्हें मालूम ही है।

ईहा—हाँ, और वह तो उन्हें मिल भी गया, यह भी मालूम है।

स्मृति—पुन: आगे का हाल ?

ईहा—अब आगे का ही तो आपसे सुनना है।

स्मृति—(कुछ मुख बिगाड़कर) क्या सुनाऊँ सखी! गजब हो गया।

ईहा—(आश्चर्य से) ऐं, क्या हुआ ? जल्दी सुनाओ सखी क्या हुआ ?

स्मृति—अरे जो राजा सोमप्रभ का सोमशर्मा पुरोहित था न, उसे तो तुम जानती ही हो!

ईहा—खूब-खूब, वही न कि जो छोटी भावज से व्यभिचार करता है और जिसे सोमदत्त की दीक्षा के बाद राजा ने पुरोहित बना दिया है।

स्मृति—हाँ-हाँ वही। कल महाराज को विजय लाभ मिलने के बाद वह खिसिया गया। फिर उसे जब कुछ नहीं सूझा तब रात्रि में नंगी तलवार लेकर वहीं बगीचे में पहुँचा जहाँ कि वे महामुनि सोमदत्त ध्यानस्थ खड़े हुए थे और क्रोध में आगबबूला होकर उन मुनि के टुकड़े-टुकड़े कर डाले।

ईहा—(कांपकर) हाय रे! यह क्या किया ? उस पापी ने मुनिहत्या कर डाली।

स्मृति—सखी! मुनिहत्या और भ्रातृहत्या, दोनों ही तो कर डाली।

ईहा—हाँ सच है ये सोमदत्त उसी के तो लघु भ्राता थे कि जिन्होेंने अपनी भार्या का व्यभिचार देखकर दीक्षा ले ली थी।

स्मृति—बस इसीलिए तो वह उनसे बैर बाँधे हुए था कि जिसको निकालने का मौका उसे मिल गया।

ईहा—सखि! फिर क्या हुआ।

स्मृति—फिर क्या! महाराजा सोमप्रभ को पता चलते ही उन्होंने उसे दण्डित करके अपने देश से निकाल दिया।

ईहा—फिर अब वह कहाँ गया ? उसकी क्या स्थिति... (बीच में किसी के करुण व्रंदन की आवाज को दोनों सुनने लगती हैं।)

ईहा—बहन! यह करुण व्रंदन किसका है ? (इतने में वह सोमशर्मा गलित कुष्ट से बिलखता हुआ प्रवेश करता है।)

स्मृति—देखा न, सामने यह वही पापी हत्यारा बिलख रहा है।

ईहा—(विस्मय से) अरे! इतनी जल्दी इसे कुष्ट रोग हो गया है। (दोनों ही आँचल से अपनी नाक बंद करती हैं।)

स्मृति—इसके शरीर की दुर्गन्ध से तो नाक फटी जा रही है (िंकचित् दूर सरक कर) सच है, मुनि हत्या का फल तो कुष्ट होेगा ही किन्तु मुनि निंदा करने मात्र से भी तो कुष्ट हो जाता है ऐसा सुनने में बहुत बार आ चुका है।

ईहा—हाँ, हाँ बहन! हजारों उदाहरण तो मैंने भी सुन रखे हैं।

सोमशर्मा—अरे बहन जी! (रोते हुए) अब मैं क्या करूँ ? कहाँ जाऊँ ? मारे वेदना के चैन नहीं है। हाय रे! मैं मरा—मैं मरा—! बहन जी! मेरी रक्षा करो!

स्मृति—भाई ! धैर्य धारण करो, देखो, पाप कर्म का फल तो जीव को भोगना ही पड़ता है अब.......किंचित् शांति......।

सोमशर्मा—(उठता है, गिरता है, फिर जोरों से चिल्लाता है) अरे भगवान! तू बड़ा निर्दयी है। मेरे ऊपर दया क्यों नहीं करता ?

स्मृति—भाई! तुमने जो मुनि हत्या की, इसी से तो यह कुष्ठ रोग हो गया है, अब अपने पापों का पश्चात्ताप करो जिससे कुछ पाप हल्का हो जावे।

सोमशर्मा—(दाँट किटकिटाते हुए) अरे वह दुष्ट साधु, ढों्रगी, पाखंडी। मैंने उसकी बोटी-बोटी काटकर बिखेर दी फिर भी वह मुझे कष्ट दे रहा है। अच्छा! देख मैं तेरी क्या दशा करूँगा (पुन: रोने लगता है) हाय बाप रे! कोई मेरी रक्षा करो, मुझे प्यास लगी है, मर जाऊँगा। (बिलखता है)

स्मृति—चलो बहन! चलें, अपने से तो यहाँ खड़ा भी नहीं हुआ जाता और यह पापी तो अभी क्रोध कषाय में ही चूर है। इतना कठोर दण्ड इसे विधाता ने दिया है फिर भी यह पापों का प्रायश्चित्त करने को तैयार नहीं है।

ईहा—अब बेचारे का क्या होगा! स्मृति—अरे! यह दु:ख जो यहाँ दिख रहा है वह कुछ भी नहीं है। यह पापी तो नरकों में युग-युग तक न जाने कितने दु:ख भोगेगा। चलो सखी! हम चलें। (दोनों चली जाती हैं) (पटाक्षेप)

द्वितीय स्तम्भ

(हस्तिनापुर के राजश्रेष्ठी धनमित्र की भार्या धनमित्रा से एक कन्या उत्पन्न हुई जिसके शरीर से अत्यंत दुर्गन्धि निकल रही थी, इसलिए उसका नाम पूतिगंधा रखा गया। यौवन अवस्था में उसी नगर के वसुमित्र सेठ की वसुमती भार्या से उत्पन्न हुए कुमार श्रीषेण के साथ उसका विवाह हो गया किन्तु उसकी दुर्गन्धि से श्रीषेण घर छोड़कर भाग गया। तब वह पिता के घर आकर रहने लगी। अनंतर एक बार चारण मुनि के मुख से अपने पूर्व भव सुनकर तथा धर्म ग्रहण करके रोहिणीव्रत ले लिया, उसी का विस्तार देखिये)

चतुर्थ दृश्य

समय—मध्यान्ह स्थान—सेठ का महल १. पूतिगंधा दुर्गन्धित महिला २. चमेली पड़ोसिन ३. सास आदि परिवार की महिलायें ४. धनश्री श्राविका (पूतिगंधा विलाप कर रही है, दूर-दूर खड़ी हुई महिलाएं नाक ढँककर हँस रही हैं। पड़ोस की एक चमेली नाम की महिला पहुँचकर उसे समझा रही है।)

पूतिगंधा—अरे भगवान! मैंने ऐसे कौन से पाप किए हैं ? बताओ तो सही, (रोते हुए) हाय हाय! मेरे पतिदेव कहाँ चले गये ? अब मेरा क्या होगा ?

चमेली—बहन! तुम इतना क्यों रो रही हो ? अब धीरज से समय तो निकालना ही पड़ेगा। देखो न, तुम्हारी सासू बक रही है कि कहाँ की बहू आई ? उसकी दुर्गंधि से कल खाना हराम हो गया। मेरा बेटा भी तो न जाने कहाँ चला गया ? अब उसे जल्दी घर से निकालो। उस समय तुम्हारे ससुरजी उसे समझा रहे थे।

पूतिगंधा—(विस्मय से और उत्सुकता से) क्या समझा रहे थे ?

चमेली—वे कह रहे थे कि अपना पुत्र श्रीषेण तो कुपुत्र निकल गया। देखो न, उसने सातों व्यसन में से एक भी तो नहीं छोड़ा और चोरी करते हुए कोतवाल ने उसे पकड़ लिया तब राजदण्ड से वह बाँधकर देश से निकाला जा रहा था। बेचारे धनमित्र ने उस पर दया की और अपना स्वार्थ भी साधा। उसने कहा कि यदि तू मेरी पुत्री पूतिगंधा से शादी करना स्वीकार कर ले तो मैं तुझे बंधन से मुक्त करा सकता हूँ। चूँकि वह राजश्रेष्ठी था। श्रीषेण यद्यपि अच्छी तरह जानता था कि उस लड़की के शरीर से भयंकर दुर्गंध आ रही है कि कोई भी उसके पास ठहर नहीं सकता फिर भी उसने बंधन से छूटने के लिए स्वीकृति दे दी और राजश्रेष्ठी ने तुरंत ही उसे बंधन से छुड़वाकर उसके साथ पुत्री ब्याह दी। अब वह गया तो गया, आखिरकार पहले भी तो वह उस देश से निकाला जा रहा था। तुम्हारे ससुर के उतना कहने के बाद वे तुम्हारी सासूजी चुप हो गर्इं। अब देखो न, दूर से ही तुम्हें देख-देखकर नाक मुँह सिकोड़कर हँस रही हैं।

पूतिगंधा—(इधर-उधर देखते हुए आँसू पोंछकर) बहन! अब मेरे जीवन के दिन कैसे कटेंगे ? कैसे पेट भरूँगी ?

चमेली—तुम इतनी क्यों दु:खी हो रही हो ? तुम्हारे पिता ने बड़े धैर्य से तुम्हें इतने दिन अपने घर में रखा है। अभी भी तुम वहीं चली जाओ (कुछ सोचकर) हाँ बहन! तुम मेरी राय मानो, इस समय तुम्हें अपने पीहर चले जाना ही उचित है।

पूतिगंधा—(चिंतित मुद्रा से कुछ सोचकर) अच्छा बहन! मैं ऐसा ही करूँगी। (उठकर चल देती है) (कुछ दिन बाद पूतिगंधा जिनमंदिर में वासुपूज्य भगवान की उपासना कर रही है। विशेष भक्ति में तल्लीन है। दर्शक लोग दर्शन करके जा रहे हैं। एक धनश्री नाम की महिला अंत में आती है। पूतिगंधा पूजन के बाद शास्त्र भवन में बैठती है और शास्त्र खोलने लगती हैं।

धनश्री—गंधा! आज तुम्हें पूजन में इतनी देर कैसे हो गई ? पहले तो तुम कभी पूजन ही नहीं करती थीं और आज बारह बजा दिये ? गंधा—बहन! तूने इतनी देर क्यों कर दी ? तू तो बहुत ही जल्दी दर्शन कर जाती थी ?

धनश्री—(गुस्से में) आज मेरे पति दो ब्रह्मचारियों को उठा लाये, बोले उन को जिमाओ। क्या बताऊँ बहन! नाक में दम आ रही है, कोई मुनियों का संघ आया हुआ है बस कहते हैं कि रोज आहार देना है टाइम पर आकर पड़गाहन के लिए खड़े हो जाते हैं। मेरा तो जी जल जाता है काम करते-करते मैं हार जाती हूँ। बस इसीलिए तो आज देरी हो गयी।

गंधा—(करुणा से) अरे बहन! तू ऐसा मत बोल! हाय! मुनियों के प्रति दुर्भाव का मैंने कैसा फल भोगा है यदि तू सुनेगी तो रो पड़ेगी। यदि मैं याद कर लेती हूँ तो मेरा सारा शरीर कांपने लगता है (काँपते हुए) हाय-हाय, मुनि निंदा का फल बहुत ही कडुवा मिलता है और उनकी भक्ति अनंत पापों को क्षणमात्र में नष्ट कर देती है।

धनश्री—(कौतुक से) अच्छा! तो बहन, सुनाओ-सुनाओ। मुझे अपनी कथा जल्दी सुनाओ।

गंधा—सुनो बहन! एकाग्रचित्त होकर सुनो (दोनों ही सामने का शास्त्र बंद कर देती हैं।) सौराष्ट्र देश के गिरिनगर में राजा भूपाल के राजश्रेष्ठी का नाम गंगदत्त था, मैं उनकी प्यारी सिंधुमती सेठानी थी। उस समय मुझे अपने रूप-यौवन और वैभव का अत्यधिक अभिमान था। एक दिन पति के साथ बसंत-विहार हेतु जाते समय एक मुनि हमारे महल की तरफ आ रहे थे सो उन्हें देखकर मेरे पति ने जबरदस्ती मुझे उन्हें आहार देने हेतु भेज दिया। मैंने क्रोध में उन्हें कड़ुवी तूमड़ी का आहार करा दिया। जिससे वे स्वर्गस्थ हो गये तब राजा ने मुझे दंडित करके देश से निकाल दिया मैं वन में पहुँची मुझे दूसरे दिन ही भयंकर कुष्ट फूट निकला। बड़ी भयंकर वेदना भोगकर अतीव संक्लेश परिणाम से मैं मरी और छठे नरक में बाईस सागर की आयु लेकर जन्म ले लिया.....।

धनश्री—(दुखित होती हुई) हाय रे! वहाँ के दु:ख कैसे भोगे ? और कहीं सातवें नरक चली जाती तो ?

पूतिगंधा—बहन! स्त्री पर्याय से मरकर सातवें नरक नहीं जा सकते क्योंकि उन्हें उत्तम संहनन नहीं रहता है। मैंने वहाँ छठे नरक में भी जो दु:ख भोगे हैं उनको असंख्य जिह्वा से भी मैं नहीं कह सकती। पुन: वहां से निकलकर व्रूर पशु हुई फिर नरक गर्ई, ऐसे कई बार नरकों में जा-जाकर बहुत ही दु:ख भोगे हैंं। पुन: कुछ पाप मंद होने से तिर्यंचयोनि में भटकती रही। वहाँ पर भी दो बार कुत्ती हुई, फिर सूकरी हुई, फिर सियारनी हुई, फिर चुहिया हुई, फिर जोंक हुई पुन: हथिनी हो गई, पुन: गधी हो गई, फिर गोह हो गई। हाय! हाय! मैंने इन तिर्यंचयोनियों में कैसे-कैसे कष्ट सहे हैं ? कैसे कहूूं ? और क्या कहूँ.... ? बहन! पुन: जब पाप बहुत कुछ हल्का हो गया, तब मैं इसी हस्तिनापुर के राजश्रेष्ठी धनमित्र की पुत्री हुई किन्तु यहाँ पर भी अभी पाप का फल भोगना शेष था। मेरे शरीर से ऐसी दुर्गंध निकलती थी कि जैसे कुष्ट रोेग से गलित और मरे हुए कुत्ते के कलेवर से दुर्गंध निकलती है। मेरे पास कोई भी खड़ा नहीं हो सकता था। मेरे पिता ने जैसे-तैसे प्रयत्न करके यहीं के सेठ वसुमित्र के पुत्र श्रीषेण के साथ विवाह भी कर दिया लेकिन मेरे पति एक रात में ही मेरी दुर्गंधि से घबड़ाकर कहीं भाग गये। मैं पुन: पीहर में आकर अपने किये का फल भोग रही थी कि अकस्मात् एक दिन उस शहर के उद्यान में अमितास्रव और पिहितास्रव नाम के चारण युगल मुनि पधारे। राजा लोग बड़ी भक्ति से वंदना करने गये थे और मैं भी अपने परिवार के साथ वहाँ पहुँची। दर्शन-पूजन के अनंतर गुरु का उपदेश हुआ, अनंतर समय पाकर मैंने महामुनि से निवेदन किया कि हे भगवन्! मैंने कौन-सा ऐसा पाप किया है कि जिससे मेरा शरीर ऐसा दुर्गन्धित हो रहा है। मुनिराज दिव्य मन:पर्ययज्ञान के धारी थे अत: परमकारुणिक बुद्धि से उन्होंने सिंधुमती से लेकर इस पर्याय तक के सारे भव-भवांतर सुना दिये। मैं काँप गई और रुदन करने लगी। गुरुदेव ने समझाया कि बेटी! तू अब शोक मत कर। अब दु:ख के छूटने का उपाय कर। मैंने निवेदन किया कि हे प्रभो! किस उपाय से मेरा यह संकट दूर होगा ? तब उन्होंने मुझे जैनधर्म का स्वरूप समझाया और रोहिणी व्रत करने के लिए कहा। मैंने विधिवत् गुरु के पास वह व्रत ग्रहण कर लिया। विधिवत् उसका अनुष्ठान करते हुए आज मेरे व्रत का अंतिम दिन है, व्रत के दिन मैं दिन भर और रात में भी मंदिर जी में ही रहती हूँ।

धनश्री—ओहो! आपने आज करुणा से भरी हुई आश्चर्यकारी घटना सुनाई। क्या बहन! आपने सचमुच में नारकीय, पाशवीय यातनाएँ भोगी हैं ? हाय हाय! मेरा तो सुनकर हृदय काँप रहा है। आपने सहन कैसे किया ? (आँखों के अश्रु पोंछने लगती है)

गंधा—सखी! मैं तुम्हें क्या बताऊँ, जिस दिन से महामुनि के मुख से मैंने अपने पूर्वभव सुने हैं, उस दिन से मेरे परिणाम बहुत ही शांत हो गये हैं। साधुओं की तो क्या, मैं अब किसी निंदनीय की भी निंदा नहीं करती हूँ और न सुनती ही हूँ। यदि कोई किसी की निंदा, किसी का अपमान या तिरस्कार करता है तो मैं उसे अपना इतिहास सुनाकर उसे उस कार्य से विरत कर देती हूँ।

धनश्री—बहन! आज मैं जिनेन्द्रदेव के सम्मुख यह प्रतिज्ञा करती हूँ कि कभी भी साधु-साध्वी, ब्रह्मचारी या ब्रह्मचारिणी की निंदा नहीं करूँगी, न सुनूँगी प्रत्युत् उन्हें आदरभाव से आहारदान आदि देकर उनकी सेवा भक्ति करूँगी तथा कोई कैसा भी निन्दनीय हो मैं उसकी निंदा नहीं करूँगी।

गंधा—(प्रसन्न होकर) बहुत अच्छा किया। बहन! आज मुझे बहुत खुशी हुई।

धनश्री—अब आप मुझे यह भी बताइए कि रोहिणीव्रत की विधि क्या है ?

गंधा—जिस दिन चंद्रमा रोहिणी नक्षत्र में स्थित हो, उसके पहले दिन शाम को गुरु के पास जाकर चार प्रकार के आहार का त्याग करके उपवास ग्रहण कर लेवे और जिस दिन रोहिणी नक्षत्र है उस दिन प्रात: शुचिर्भूत होकर अष्टद्रव्य की सामग्री लेकर जिनमंदिर में भगवान वासुपूज्य की अभिषेकपूर्वक पूजाविधि सम्पन्न करके जाप करे। दिन भर स्वाध्याय, धर्मचर्चा आदि में समय बिताकर रात्रि में भी धर्मध्यान करते हुए जागरण करे। यह रोहिणी नक्षत्र सत्ताइसवें दिन में आता है। उस दिन इसी विधि से उपवास किया जाता है। इस व्रत में पाँच वर्ष नौ दिन में सरसठ उपवास होते हैं। उनको करके अंत में शक्तिप्रमाण उद्यापन विधि करना चाहिए।

धनश्री—यह व्रत मुझे भी दिला दो।

गंधा—हाँ, हाँ, चलो बहन! तुम्हें मुनिराज के पास यह व्रत दिला दूूँगी। (दोनों चली जाती हैं) (पटाक्षेप) (सिंहपुर के राजा सिंहसेन की रानी का नाम कनकप्रभा था। इनके एक पुत्र हुआ जिसके शरीर से बहुत ही दुर्गंध निकल रही थी और उसका नाम पूतिगंध रख दिया। एक दिन विमलवाहन भगवान को केवलज्ञान होने पर आकाश से देवों का आगमन होता देख पूतिगंध मूच्र्छित हो गया। अनेकों उपचार से होश आने पर उसे जातिस्मरण हो गया। पिता के आग्रह से उसने सारी आत्मकथा सुनाई। अनंतर समवसरण में जाकर दिव्य उपदेश सुनकर भगवान से रोहिणी व्रत ग्रहण किया। तब उसका शरीर दिव्य सुगन्धित हो गया। पिता के राज्य को सम्भाल कर अंत में उसने सल्लेखनामरण कर स्वर्ग प्राप्त किया।)

दृश्य पंचम

समय—प्रात:काल स्थान—राजमहल १. सिंहसेन सिंहपुर नरेश २. कनकप्रभा सिंहपुर रानी ३. पूतिगंध राजकुमार ४. धाय ५. चम्पा दासी ६. वनपाल ७. स्मृति ८. ईहा (राजकुमार मूच्र्छित हो जाता है तब धाय दौड़कर संभालती है और महाराजा आदि को बुलाने के लिए कहती है। कुछ लोग शीतोपचार में लग जाते हैं।) धाय—अरी चंपा! जल्दी दौड़, महाराजा साहब को और महारानी जी को सूचना दे दे कि कुमार मूच्र्छित हो गये हैं।

चंपा—हाँ, हाँ, मैं जा रही हूँ। (चली जाती है) (चंपा के साथ महाराज और महारानी प्रवेश करते हैं।)

राजा—अरे-अरे! यह क्या हुआ ? (घबराते हुए कुमार को संभालते हैं)

रानी—(शोकार्त होकर) क्या कारण हुआ ? आह....बेटा! तुझे क्या हो गया है ? बोल तो सही। (पास बैठ जाती है) महाराज! अब क्या करना ?

राजा—देवी! तुम इतना मत घबड़ाओ ? कुमार को मूच्र्छा आ गयी है शीतोपचार चल रहा है अभी होश आने पर स्थिति स्पष्ट हो जावेगी।

रानी—(दु:खित स्वर से) जब से इसने जन्म लिया है न मुझे शांति है न इसको ही। हाय! पता नहीं मेरे कौन से कर्मों का उदय अपना फल दे रहा है।

राजा—देवि! तुम्हारे कर्मों का इसमें क्या दोष है ? अरे! उसने ही कुछ पूर्वजन्म में पापकर्म संचित किया होगा जिससे उसको ऐसा दुर्गंधित शरीर मिला है। इसके लिए तुम क्यों सोच रही हो ? मैंने उपचार में आज तक कोई कमी नहीं रखी, कोई वैद्य नहीं छोड़े और न कोई सुगंधित चूर्ण ही उसके शरीर में लेप करवाने से छोड़ा है किन्तु फिर भी जब उसकी दुर्गंधि दूर नहीं होती तो क्या करूँ ?

रानी—हाय! मुझे यहाँ बैठना ही मुश्किल हो रहा है क्या करूँ ?

राजा—तुम चलो, मैं संभाल तो रहा हूँ।

रानी—कैसे चली जाऊँ ? अपना जन्म दिया हुआ बेटा। जी तो नहीं मानता है। (कुमार को होश आ जाता है और वह उठकर चिंतित मुद्रा में बैठ जाता है)

राजा—बेटा! क्या बात है ? अब ठीक है, बोलो, तुम्हें मूच्र्छा क्यों आ गई थी ? क्या किसी का स्मरण हो आया ? या और कोई बात है ?

पूतिगंध—मैं क्या कह दूँ पिताजी ? (रो पड़ता है)

राजा—बोलो बेटा, बोलो! ऐसा क्यों कहते हो ? (आँसू पोंछने लगते हैं और मस्तक पर हाथ फैरते हैं।)

पूतिगंध—आकाश से देवों के विमान जा रहे थे, वे जय-जयकार कर रहे थे कि अकस्मात् मैं मूच्र्छित हो गया और अब मुझे एकदम अपने कई भवों का जातिस्मरण हो आया है।

राजा—(विस्मय से) जातिस्मरण ? तो तुम चिंता क्यों करते हो कुमार! जो बीत गई सो बीत गई। अब तुम्हें क्या कमी है ? पुत्र! तुम रुदन क्यों कर रहे हो ? बताओ तो सही, आखिर तुम्हें क्या-क्या स्मरण हुआ है ?

रानी—(अपने आंचल से पुत्र के आँसू पोंछते हुए) रोओ नहीं बेटा! तुम इतने बड़े राजाधिराज के पुत्र हो, क्यों दु:खी होते हो ? अपना जातिस्मरण मुझे भी सुनाओ।

पूतिगंध—मात:! मेरा इतिहास बड़ा ही विचित्र है। माँ क्या कहूँ और कैसे कहूँ। मुझे कहते हुए भी लज्जा आती है।

रानी—नहीं बेटा! हम लोगों के सामने तुम्हें कोई भी बात कहने में संकोच क्यों ? कहो-कहो। कह देने से तुम्हारा मन भी हल्का हो जायेगा।

पूतिगंध—पूर्व जन्मों में मैंने बहुत पाप किये हैं और उनका फल भी मैंने ओह! (दीर्घ नि:श्वास लेकर) कितने दु:ख भोगे हैं ? क्या कहूूँ......

राजा—बेटा! तुम समझदार हो। ऐसा शोक नहीं करना चाहिए। बोलो तो सही, आखिर तुम्हें क्या स्मरण हुआ है ?

पूतिगंध—(कुछ शांत होकर) सुनो! यदि आप लोगों की इच्छा है तो मैं भी इतिहास सुनाता हूँ। कनकपुर के राजा सोमप्रभ के यहाँ मेरा भाई सोमदत्त पुरोहित पद पर आसीन था। मैंने उसकी भार्या के साथ दुराचार किया। जब मेरे भाई को यह पता चला, तब उसने दिगम्बर दीक्षा ले ली। उस समय राजा ने मुझ सोमशर्मा को पुरोहित पद दे दिया। एक दिन महाराज ने शकट देश के राजा पर चढ़ाई करने के लिए प्रस्थान किया। मार्ग में वे ही मुनि मिले मैंने उनके दर्शन का फल अपशकुन बताया तब अन्य निमित्तज्ञ ने आकर उसका फल उत्तम बताकर राजा को सन्तुष्ट कर दिया। मैंने क्रोध में आकर मुनि को मार डाला। राजा ने इस अपराध से मुझे दंडित कर निकाल दिया। मेरे कुष्ट रोग पूâट निकला। (दीर्घ नि:श्वास लेकर) ओह! पिताजी! मैं मरकर सातवें नरक में चला गया। वहाँ की घोर वेदना... स्मरण करते ही कलेजा फटने लगता है। वहाँ पर मैंने तैंतीस सागर तक समय निकाला। वहाँ से निकलकर स्वयंभू-रमणसमुद्र में चार हजार कोश विस्तृत शरीर वाला महामत्स्य हो गया। वहाँ के दु:ख भोगकर फिर मरकर छठे नरक में चला गया, वहाँ की बाईस सागर की आयु भोगकर जैसे-तैसे निकला तो यहाँ पर सिंह हो गया। अरे रे! खूब हाथियों को और हिरणों को मार-मार कर खाया और फिर मरकर पाँचवें नरक में पहुँच गया। वहाँ की आयु भोगकर निकलकर सर्प हो गया। सर्प की पर्याय पूरी कर चौथे नरक में चला गया, वहाँ से निकलकर व्याघ्र हो गया। पुन: मरकर तीसरे नरक में चला गया। वहाँ से निकलकर दुष्ट पक्षी हो गया, पुन: पाप के फल से दूसरे नरक में चला गया। वहाँ से निकलकर बगुला हो गया। खूब मछलियों को खाया और उस पाप के फल से पुन: पहले नरक में चला गया और वहाँ पर एक सागर की आयुपर्यंत दु:ख भोगता रहा (काँपने लगता है)। पूज्य पिता! फिर कुछ पाप कर्म के हल्के हो जाने से मैंने यह मनुष्य पर्याय पायी है और आपके घर में जन्म लिया है। यहाँ पर भी अभी कुछ पाप शेष रहा था कि जिसके फलस्वरूप यह दुर्गन्धित शरीर मिला है। यदि मैंने सुकृत किया होता तो देवों के विमान में जन्म लेकर स्वर्ग के सुखों का अनुभव करता किन्तु पाप से नरकगति और तिर्यंचगति ही मिलती है।

राजा—(खेद और आश्चर्य से) बेटा! संसार की स्थिति बड़ी विचित्र है। यह जीव अनादिकाल से न जाने क्या-क्या करता आया है और न जाने कैसे-कैसे दु:ख भोगता आया है! अब शोक छोड़ो। (बीच में वनपाल आता है)

वनपाल—(नमस्कार करके) महाराज की जय हो (सामने छहों ऋतुओं के फल-पूâलों को रखकर) महाराज! आपके पुण्योदय से भगवान विमलवाहन को केवलज्ञान हो गया है और देवों ने आकर समवसरण की रचना कर दी जो कि अपने शहर के उत्तर के उद्यान में स्थित है। (राजा-रानी आदि सभी उठकर उत्तर दिशा की तरफ सात पैंड चलकर ३ बार नमोस्तु कहकर पंचांग नमस्कार करते हैं।)

राजा—जय हो, जय हो! विमलवाहन भगवान की जय हो (हर्ष से विभोर होकर) मंत्री! शहर में घोषणा कर दो। सभी लोग भगवान की वंदना के लिए चलें (पुत्र की तरफ देखकर) उठो बेटा, चलो, अपने महान पुण्योदय से भगवान का आगमन हुआ है उन्हीं के पास तुम्हारे शोक दूर करने का उपाय पूछेंगे।

पूतिगंध—हाँ-हाँ पिताजी, चलिये। भगवान के चरण सानिध्य में ही मैं अपने पूर्वभवों को पूर्णतया स्पष्ट करके और अपनी इस दुर्गंधि से छूटने का उपाय पूछूँगा। (सभी चले जाते हैं। स्मृति और ईहा प्रवेश करती हैं)

ईहा—सखी! बहुत दिन हो गये, आपने कोई नई बात नहीं सुनाई। आज जरुर सुनाइये।

स्मृति—हाँ-हाँ सखी! मैं सुनाने के लिए ही तो आई हूँ। बहुत शुभ समाचार सुनाऊँगी।

ईहा—(उत्सुकता से) हाँ तो जल्दी सुनाइये।

स्मृति—सखी! अपने शहर के उद्यान में भगवान विमलवाहन को केवलज्ञान प्रकट हुआ है अत: इंद्रों की आज्ञा से रचित समवसरण में प्रभु विराजमान हैं।

ईहा—आपने दर्शन किया ?

स्मृति—हाँ-हाँ, मैंने प्रत्यक्ष में दर्शन किया है। भगवान का अतिशय महान है। वहाँ पर अपने महाराज सिंहसेन और महारानी कनकप्रभाजी भी अपने पुत्र पूतिगंध के साथ गये थे।

ईहा—अच्छा! तो राजकुमार ने अपने दुर्गंधि का कारण पूछा होगा।

स्मृति—हाँ सखी! पहले तो उसे देवों के आगमन को देखते ही जातिस्मरण हो गया था। उसने पिता के आग्रह से अपने सारे भव-भवांतर सुना दिये। अनंतर भगवान के समवसरण में पहुँचकर पुन: उसने अपने सारे भव प्रभु की दिव्यध्वनि से श्रवण किये और अपने बचे हुए पाप को हल्का करने के लिए उसने उपाय पूछा।

ईहा—तो भगवान ने क्या बताया ?

स्मृति—भगवान ने बताया कि तुम इस पाप को नष्ट करने के लिए रोहिणी व्रत करो और कुमार ने अतीव भक्ति के साथ व्रत ग्रहण कर लिया। तब प्रभु के पादमूल में उसने सम्यक्त्व सहित पाँच अणुव्रत, तीन गुणव्रत और चार शिक्षाव्रत इन बारह व्रतों को भी ग्रहण कर लिया। उसने विधिवत् रोहिणी व्रतों को करना प्रारंभ कर दिया है। यह व्रत अभी पूरा नहीं हुआ और उसके शरीर से दुर्गंधि कहाँ को पलायमान हो गई पता ही नहीं है, बल्कि उसका सारा शरीर अतीव सुगन्धित हो गया है। इसलिए अब सभी लोग उसे सुगंध कुमार कहते हैं। राजा ने धर्म के माहात्म्य को प्रत्यक्ष देखकर अपने पुत्र सुगंध कुमार का राज्याभिषेक कर दिया है और आप स्वयं आत्मकल्याण में तत्पर हो गये हैं। आजकल महाराज सुगंध कुमार न्यायनीति से प्रजा का पालन करते हुए निरंतर धर्मकार्य में अपना काल यापन कर रहे हैं। ईहा—अच्छा, रोहिणी व्रत का बड़ा माहात्म्य है!

स्मृति—हाँ सखी! यह व्रत संपूर्ण शोक को नष्ट करने वाला है। (दोनों चली जाती हैं।)

तृतीय स्तम्भ

(हस्तिनापुर नरेश महाराजा अशोक और रानी रोहिणी के आठ पुत्र तथा चार पुत्रियाँ थीं। एक समय राजा अपनी रानी के साथ महल की छत पर बैठे हुए शहर की शोभा देख रहे थे तथा पास में बसंततिलका धाय भी छोटे बालक लोकपाल को गोद में लिए हुए थी। अकस्मात् कुछ महिलाएँ गली से रोती हुई निकलीं। रानी ने कौतुक से पूछा कि ये कौन-सी नृत्य कला है। ‘‘यह शोक से रोना है’’ ऐसा धाय के द्वारा समझाये जाने पर भी जब वह नहीं समझ सकी तब महाराजा ने स्वयं लोकपाल को उठाकर छत से नीचे डाल दिया। एक क्षण में ही देवताओं ने बालक को सिंहासन पर बिठाकर उसका लालन किया। यह दृश्य देख अशोक महाराज विस्मय में पड़ गये कि इस रोहिणी के कितने विशेष पुण्य का उदय है कि ‘‘शोक क्या है ?’’ यह मालूम नहीं हो रहा है। अस्तु! मुनिराज के पास में राजा ने अपने व रोहिणी के भवांतर पूछे जिसमें ‘रोहिणीव्रत’ के महत्त्व को सुनकर अतीव प्रसन्न हुए। सो ही देखिये—)

दृश्य षष्ठम

समय—मध्यान्ह स्थान—राजमहल १. महाराज अशोक हस्तिनापुर नरेश २. रोहिणी महादेवी ३. धाय ४. लोकपाल राजा का शिशु ५. महिला वर्ग दु:खियारी ६. देवियाँ (महाराज अशोक महारानी को शहर की शोभा दिखा रहे हैं और धाय बालक को प्यार कर रही है)

महाराज—देखो प्रिये! सामने जो ध्वजायें फहरा रही हैं वे भी जिनमंदिर की हैं। इस शहर के बीचोंबीच में यह जिनमंदिर सबसे उन्नत और विशाल है। इसके मध्य का शिखर मानों स्वर्ग लोक के देवों को बुलाने के लिए ही मस्तक उठा रहा है और उस पर फहराती हुई ध्वजा मानों दर्शकों के पापधूलि को साफ कर रही है। देखो न, इस मंदिर पर हजारों शिखर हैं और उन सभी पर ध्वजायें लहरा रही हैं।

रानी—स्वामिन्! मैंने मुनियों के मुखारिंवद से सुना है कि जिस शहर में मंदिर का शिखर सबसे अधिक ऊँचा होता है वहाँ पर हमेशा उन्नति ही उन्नति हुआ करती है।

राजा—हाँ हाँ, यह बात तो बिल्कुल सच है तभी तो अपना हस्तिनापुर नगर सर्वतोमुखी उन्नति को कर रहा है और (अंगुली से दिखाते हुए) इधर देखो, ये सभी हवेलियाँ अपने शहर के जौहरियों की हैं जो एक से एक बढ़कर हैं।..... (इसी बीच में बालक लोकपाल कभी पिता की गोद में आता है तो कभी माता की गोद से कंधे पर चढ़ने लगता है। कभी पिता के मस्तक के मुकुट को उतारना चाहता है तो पुन: धाय उसे पकड़कर गोद में लेती है)

रानी—यह बालक कितना चंचल है, देखो न, आपके मस्तक से मुकुट को ही उतार रहा है (हँसकर) ऐसा लगता है कि मानों यही आपका उत्तराधिकारी बनेगा।

राजा—महारानी जी! यह तो उसकी बालसुलभ चेष्टा है भला ऐसा भी कभी कहीं हो सकता है। अरे! आपके बड़े सातों पुत्रों में तो सभी एक से एक बढ़कर ही हैं। सबसे बड़े ‘युवराज वीतशोक’ जो कि आज बहुत ही प्रौढ़ दिख रहे हैं क्या वे बचपन में कम चंचल थे ?

रानी—(लोकपाल का गाल चूमकर कहती हैं) क्यों कुमार ? क्या तुम पिताजी के राज्य भार को सम्भालोगे ? (बालक खिलखिलाकर हँस पड़ता है सभी हँसने लगते हैं।) (नीचे मार्ग में कुछ महिलाएँ बाल बिखेरे हुए छाती कूट-कूट कर रोती हुई आ रही हैं।)

रानी—(अतीव आश्चर्य से) ओहो!....यह कौन सी नृत्य कला है ? (धाय से) अरी माँ! तू देख तो सही, ये कैसा नाटक है ? मुझे नृत्यकला के विद्वानों ने सिग्नटक, भानी, छत्र, रास और दुम्बिली ऐसे पाँच तरह के नृत्य सिखाये हैं और उन्होंने बताया है कि भरत महाराजा के द्वारा कहे गये ये नृत्य पाँच प्रकार के होते हैं। पुन: इन महिलाओं का यह ‘‘सादिकुट्टन’ नृत्य कौन सा है ? इसमें तो सात स्वर भी नहीं हैं। भाषा और मूच्र्छनायें भी नहीं हैं। भला यह कौन सी नृत्य कला है ?

धाय—(प्रेम से समझाते हुए) बेटी! यह नृत्य कला नहीं है। यह शोक है, यह दुखीजनों द्वारा महादुख के समय किया जाता है।

रानी—(कौतुक भाव से) हे माँ, शोक किसे कहते हैं ? अथवा दु:ख क्या है तू मुझे बता ?

धाय—(क्रोध में आकर) अरे! क्या तुझे उन्माद हो गया है अथवा पांडित्य या ऐश्वर्य का मद चढ़ रहा है ? या तुझे अपने रूप और सौभाग्य का अतीव घमंड हो रहा है ? कि जिससे तू इस शोक को नाटक कह रही है और शोक तथा दु:ख की परिभाषा भी नहीं समझ रही है।

रानी—भद्रे! तुम मेरे ऊपर क्रोध मत करो। गंधर्वों के द्वारा बताये गये अनेक चित्रों को, अक्षरों और स्वरों को, चौंसठ प्रकार के विज्ञानों को और बहत्तर प्रकार की कलाओं को मैंने सीखा है किन्तु मुझे किसी विद्वान् ने भी ऐसी नृत्य कला नहीं बताई है। मैंने न कभी ऐसा देखा ही है और न सुना ही है इसीलिए मैं आपसे पूछ रही हूँ।

धाय—रानी! न यह नाटक का प्रसंग है और न गीतभाषा का ही स्वर है किन्तु अपने बंधु की मृत्यु हो जाने से अत्यन्त दु:ख से दुखित हो रोते हुए प्राणियों का यह शोक है। हे वत्से! इसे शोक कहते हैं ऐसा तू समझ।

रानी—हे भद्रे! मैं रोने का अर्थ नहीं समझती हूँ। तुम पुन: मुझे समझाओ।

धाय—जब अपने हृदय में वेदना उत्पन्न होती है तब आँखों से आँसू बहने लगते हैं उसे ही रोना कहते हैं।

रानी—माँ! आँखों में आँसू अपने आप कैसे आते हैं ?

धाय—जब अंतरंग में शोक उमड़ता है तब आँसू आने लगते हैं।

रानी—शोक कैसे उत्पन्न होता है, पुन: मुझे समझाओ। मुझे अतीव कौतुक हो रहा है कि आखिर यह कौन सी कला है ?

धाय—बेटी! यह कला नहीं है यह पीड़ा से उत्पन्न हुआ करुण क्रन्दन है। (राजा आश्चर्य से रानी के मुख की तरफ एकटक देख रहे हैं।)

रानी—माते! पीड़ा किसे कहते हैं और करुण क्रन्दन किसका नाम है ?

धाय—(पुन: चिढ़कर) क्या बताऊँ तुझे, और कैसे समझाऊँ ? (कुछ सोेचने लगती है) बेटी! जब घर में कोई मर जाता है या कहीं और कुछ निमित्त से अपना अनिष्ट हो जाता है तो उस समय हृदय में बहुत गहरी चोट पहुँचती है, उस समय शोक उत्पन्न हो जाता है और रोना आने लगता है। पुन: जब शोक अतीव मात्रा में पहुँच जाता है तब यह प्राणी छाती कूट-कूट कर बिलख-बिलख कर रोने लगता है, वह बेभान हो जाता है उसी का नाम करुण क्रन्दन है। अब कुछ समझ में आया ?

रानी—मुझे अभी तक यह नहीं समझ आया कि रोना किसे कहते हैं ? (समझ में न आने से खिन्न हो उठती है)

राजा—(आवेश में धाय की गोद से बालक को छीनते हुए) हाँ देखिए! रोने का अर्थ मैं अभी समझाए देता हूँ। (बालक को सात मंजिल की छत से एकदम नीचे छोड़ देते हैंं।) (दूसरे क्षण ही रानी के साथ राजा जब नीचे दृष्टि डालते हैं तब क्या देखते हैं कि अशोक वृक्ष के अनुभाग पर दिव्य सिंहासन पर बालक विराजमान है और देवियाँ कार्य में व्यस्त हैं। बालक को अभिषेक कराकर दिव्य वस्त्रालंंकार से सुसज्जित कर रही हैं। कुछ देवियाँ चमर ढोर रही हैं, कुछ देवियाँ ‘‘जैनधर्म की जय-जयकार’’ से आकाश को गुँजा रही हैं। महादेवी रोहिणी, महाराजा अशोक और बसंततिलका आश्चर्यसागर में निमग्न हो कुछ क्षण के लिए अपने को ही भूल जाते हैं और अनुपम दृश्य देखते रह जाते हैं)

राजा—(आश्चर्य पूर्ण स्वर से) ओहो! प्रियतमे! तुम्हारा पुण्य अद्भुत है कि जिससे देवताआें ने तुम्हें रोना किसे कहते हैं ? शोक क्या है ? अर्थ समझाने ही नहीं दिया प्रत्युत् बीच में ही आकर उन्होंने अमंगल को भी मंगल कर दिया। दु:ख को आने ही नहीं दिया। ऐसा लगता है कि तुमने पूर्व जन्म में कोई विशेष ही पुण्य संचित किया है।

धाय—महाराज! आपका कहना बिल्कुल सत्य है। अवश्यमेव महारानी जी ने कोई खास ही धर्मानुष्ठान किया होगा अन्यथा ऐसा चमत्कार कैसे होता ?

राजा—हाँ, सच है! धर्म का माहात्म्य अचिन्त्य है उसके प्रभाव से सर्प भी रत्नहार हो जाता है, अग्नि भी शीतल जल हो जाती है, विष भी अमृत हो जाता है, आकाश से रत्नों की वर्षा होने लगती है। और देखो न, साक्षात् देव-देवियाँ भी िंककर बन जाते हैं।

धाय—धन्य हो महादेवि! धन्य हो, आपका भाग्य अलौकिक है। (इसी बीच वे देवियाँ बालक को सजा रही हैं। चारों तरफ से भीड़ उमड़ती चली आ रही है ‘महाराजा अशोक की जय, महादेवी रोहिणी की जय, कुमार लोकपाल की जय, इत्यादि जयकारों की ध्वनि से जनता आकाशमंडल को गुंजा देती है। अनंतर देवतागण पुत्र लोकपाल को लाकर महाराजा अशोक को सौंप देते हैं। बालक खिलखिलाकर हंस रहा है।) (पटाक्षेप) (महाराज अशोक उद्यान के जिनमंदिर में आये हुए चारण मुनि के दर्शन करके अपनी रानी के ‘शोक और दु:ख’ न समझने का कारण पूछते हैं। तब रूप्यकुम्भ मुनिराज पूर्व भव का सारा वर्णन सुनाते हैं। अनंतर महाराज प्रसन्नमना राज्य संचालन करते हुए एक दिन विरक्त होकर भगवान के समवसरण में पहुँच जाते हैं। दीक्षा लेकर भगवान के गणधर हो जाते हैं। रोहिणी भी दीक्षा लेकर अच्युत स्वर्ग में इंद्रपद प्राप्त कर लेती हैं। इस इतिहास से रोहिणी व्रत का माहात्म्य आज तक चला आ रहा है और भविष्य में रोहिणी नक्षत्र रहने तक चलता ही रहेगा।)

दृश्य सप्तम

१. राजा अशोक हस्तिनापुर नरेश २. रोहिणी रानी ३. राजपुत्र आठों ही ४. मंत्री ५. ज्योतिषी ६. वनपाल ७. स्मृति कन्या ८. ईहा कन्या ९. नागरिक गण (स्मृति और ईहा प्रवेश करती हैं)

ईहा—सखी! कुछ नई बात सुनाओ।

स्मृति—हाँ सखी! बहुत बढ़िया बात सुनाने की है और मैं कई दिन से तुम से मिलना चाह रही थी।

ईहा—तो सखी, जल्दी सुनाओ।

स्मृति—महाराजा अशोक ने अपने शिशु लोकपाल को सात मंजिल वाली छत से नीचे फैक दिया था सो तो तुम्हें मालूम ही है।

ईहा—हाँ-हाँ, रोहिणी महादेवी को ‘रोना किसे कहते हैं ?’ यह समझाने के लिए न।

स्मृति—हाँ, उसके बाद उद्यान में रूप्यकुंभ और सुवर्णकुंभ नामक दो चारण मुनि पधारे। महाराज ने परिजन और पुरजन के साथ उनकी वंदना करके उनसे अपनी प्रिया रानी रोहिणी व अपने भवांतर पूछे। तब मुनिराज ने कहा कि—उस रोहिणी ने कितने ही भव पूर्व सौराष्ट्र देश के गिरिनगर में राजश्रेष्ठी की सेठानी अवस्था में मासोपवासी महामुनि को कटुक तूमड़ी आहार में देकर उनको स्वर्गलोक पहुँचा दिया था। उसके फलस्वरूप कई भवोें तक नरक और तिर्यंच के दु:ख भोगती रही, पुन: हस्तिनापुर नरेश के राजश्रेष्ठी की कन्या हुई जिसके शरीर से दुर्गन्धि निकल रही थी। आर्यिकाजी को आहारदान देकर कुछ पुण्य संचित किया पुन: मुनि के उपदेश से पिछले भव सुनकर दु:खों की शांति के लिए रोहिणी व्रत ग्रहण किया। अंत में समाधि से मरणकर अच्युत स्वर्ग में इंद्र हो महादेवी हो गई। वहाँ से चलकर चंपापुर के महाराजा मघवा की पुत्री रोहिणी हुई है। जिसने कि स्वयंवर में अपने महाराजा अशोक को वरमाला डालकर वरण किया है। आज रोहिणी जी के आठ पुत्र और चार पुत्रियाँ हैं। उनका इतना असीम पुण्य है कि वह ‘रो्नाा क्या है ?’ सो भी नहीं समझ पाती हैं। यह बस रोहिणी व्रत का माहात्म्य है।

ईहा—पुन: अशोक महाराजा के क्या भव सुनाये ?

स्मृति—हाँ, वे भी सुनो। कनकपुर क्षेत्र के पुरोहित सोमदत्त के बड़े भाई ने अपनी छोटी भावज से व्यभिचार किया। पुन: सोमदत्त के मुनि हो जाने पर एक दिन कुछ कारण बनाकर उनकी हत्या कर डाली। अनंतर राजदंड पाकर कुष्ठ रोग से गलित होकर नरकों और तिर्यंचों के दु:ख भोगता रहा। कदाचित् पाप के हल्के हो जाने से सिंहपुर के राजा सिंहसेन का पुत्र हुआ, जिसके शरीर से अतीव दुर्गन्धि निकल रही थी। उसका नाम पूतिगंध रखा गया। एक समय उस राजपुत्र ने पूर्व भवों के जातिस्मरण से उपशम भाव को प्राप्त होकर विमलवाहन भगवान की वंदना की तथा उनसे अपने तमाम पूर्व भवों को सुनकर जैनधर्म धारण कर लिया। पश्चात् दु:ख की शांति के लिए भगवान के दिव्य उपदेश से रोहिणी व्रत ग्रहण कर लिया तथा विधिवत् व्रत का पालनकर अंत में मरण कर प्राणत नामक चौदहवें स्वर्ग में महान् ऋद्धिधारी देव का वैभव प्राप्त किया। अनंतर वहाँ से च्युत होकर पूर्व विदेह क्षेत्र की पुंडरीकिणी नगरी में राजा विमलकीर्ति की महारानी श्रीमती से जन्म लेकर अर्वâकीर्ति नाम का प्रसिद्ध पुत्र हुआ। उसने यौवनकाल में चक्ररत्न, छियानवे हजार रानियाँ और छहखंड के साम्राज्यरूप चक्रवर्ती का वैभव प्राप्त कर लिया। चिरकाल तक सम्पूर्ण पृथ्वी के सुखों का अनुभव करके पुन: ‘शीलगुप्त’ मुनिराज के समीप निग्र्रंथ मुनिदीक्षा ले ली। घोरातिघोर तपश्चरण करके अंत में समाधि से मरण कर अच्युत नामक सोलहवें स्वर्ग में इंद्र के पद को प्राप्त कर लिया। पूर्वकथित पूतिगंधा का जीव रोहिणी व्रत के प्रभाव से इन्हीं इंद्र की महादेवी हुआ था। वहाँ की आयु पूर्ण कर अच्युत इंद्र इस हस्तिनापुर के नरेश वीतशोक महाराज का पुत्र हुआ जिसका नाम अशोक कुमार रखा गया। सखी! ये वे ही अशोक कुमार आज अपने देश के महाराजा हैं और महारानी रोहिणी के साथ सुखपूर्वक राज्य संचालन कर रहे हैं। उनके विगतशोक, गतशोक, जिनशोक, विनष्टशोक, धनपाल, वसुपाल और गुणपाल ये सात पुत्र हुए हैं। उनके बाद वसुन्धरा, सुरकांता, लक्ष्मीमती और सुप्रभा ये चार कन्यायें हुई हैं। अनंतर लोकपाल नाम का सबसे छोटा और सबसे प्यारा महान् पुण्यशाली बालक हुआ है जो कि देवों द्वारा सन्मान को प्राप्त हो चुका है। मुनिराज रूप्यकुम्भ ने बतलाया है कि हे राजन्! उस सम्पूर्ण वैभव को तुम एक ‘रोहिणीव्रत’ का ही फल समझो। कुछ दिन बाद तुम वासुपूज्य भगवान के समवसरण में जैनेश्वरी दीक्षा ग्रहण करोगे और गणधर पद को प्राप्त कर लोगे। पुन: उसी भव से मुक्तिकांता का वरण करोगे और महारानी रोहिणी भी आर्यिका पद ग्रहण कर अंत में समाधि से मरण कर स्त्रीपर्याय को छेदकर सोलहवें स्वर्ग में इंद्र पद को प्राप्त करेंगी और वहाँ से मुनि पद धारण कर निर्वाण को प्राप्त कर लेंगी। राजा ने अतीव प्रसन्नता और धर्मानुराग व्यक्त करते हुए मुनियों की बार-बार वंदना की और वे अपने महल में चले आये।

ईहा—सखी! इस शहर में हम सभी लोग बहुत ही पुण्यशाली हैं जो कि ऐसे महाराजाधिराज की छत्रछाया में रह रहे हैं। धन्य हैं ये महाराज, जो कुछ ही दिनों में भगवान के गणधर होकर अपनी देशना से असंख्य जीवों का उद्धार करने वाले हैं। सखी! मैंने सुना है कि गणधर देव को दीक्षा लेते ही अंतर्मुहूर्त में मन:पर्यय ज्ञान प्रकट हो जाता है और सभी ऋद्धियाँ भी उत्पन्न हो जाती हैं तथा वे उसी भव से मोक्ष प्राप्त करते हैं। क्या यह सच है ?

स्मृति—हाँ सखी। बिल्कुल सच हैं। (बाजों की ध्वनि उठती है)

ईहा—सखी! आज शहर में विशेष ही सजावट है। सर्वत्र तोरण द्वार दिख रहे हैं। फूलों की मालायें लटक रही हैं। चंदन का छिड़काव किया गया है और ये बाजे भी बज रहे हैं। आज कोई उत्सव है क्या ?

स्मृति—हाँ सखी! आज अपने महाराजाधिराज का जन्मदिवस होने से सर्वत्र वर्धापन दिवस की खुशी में महोत्सव मनाया जा रहा है। चलो चलें, हम भी देखें क्या-क्या हो रहा है ? (दोनों चली जाती हैं) (महाराजा अशोक मंगल स्नान के बाद अपनी रोहिणी के साथ भद्रासन पर बैठे हुए हैं। पास में राजकुमार बैठे हुए हैं। रानी ने अकस्मात् राजा के मस्तक पर एक सपेâद केश देखा और बोली)

रानी—महाराज! देखिये यह यमराज का दूत आ गया।

राजा—(आश्चर्य से) कहाँ है प्रिये, कहाँ है ? मुझे भी दिखाओ।

रानी—(केश उखाड़कर राजा के कर-कमल में रखते हुए) यह लीजिए महाराज! आपके कर-कमल में उपस्थित है।

राजा—(सहसा विरक्तचित्त होकर) ओहो! मैंने अपना इतना अमूल्य मनुष्य जीवन यूँ ही बिता दिया। ओहो! यह संसार असार है, ये विशाल राज्यवैभव तृण पर पड़ी हुई बिन्दुओं के समान चंचल है, पुरुषों का जो यौवन चला जाता है वह वापस नहीं आता है। मिष्ट भोजनों से ललित किया गया यह शरीर भी क्षणभंगुर है। जब मैंने अर्वâकीर्ति के भव में चक्रवर्ती के वैभव का उपभोग किया और अच्युत स्वर्ग में इंद्र के वैभव का अनुभव किया है तो भी तृप्ति नहीं हुई तो फिर इस क्षणिक तुच्छ राज्य से क्या तृप्ति होगी ? उन सभी क्षणभंगुर वस्तुओं में एक आत्मा ही अविनाशी अजर-अमर है। वह ज्ञानधन है, परमानंद स्वरूप है। यद्यपि यह आठ कर्मों से सहित होने से अपने स्वभाव से च्युत हो रहा है फिर भी शुद्ध निश्चयनय से विचार करके देखा जाए तो यह अनंत गुणों का पुंज है, अनंत सौख्यस्वरूप है। यह चेतन आत्मा अपने पुरुषार्थ के बल से इन जड़ कर्मों को नष्ट करके अपने शुद्ध स्वभाव को प्राप्त कर सकता है। फिर क्या कारण है कि जो यह अनंत शक्तिशाली आत्मा इस मोह के चंगुल में पंâसा हुआ है ? अब मुझे शीघ्र ही इस मोहराज से युद्ध करने के लिए सन्नद्ध होना है...। बीच में ही रानी घबराती हुई बोलती है—

रोहिणी—(खिन्न होकर) प्राणनाथ! आप यह क्या कह रहे हैं ? आपके बिना हम लोग कैसे रह सकेगे ?

राजा—देवि! आपने अच्युत स्वर्ग में मेरे साथ असंख्य वर्षों तक दिव्य सुखों का उपभोग किया है तब तृप्ति नहीं हुई तो यहाँ मनुष्य पर्याय में कुछ वर्षों की आयु में तृप्ति कैसे होगी ? इसलिए अब मोह छोड़ो और खुशी से मुझे दीक्षा की आज्ञा दे दो।

रानी—(उद्विग्न होकर) स्वामिन्! अभी आप कुछ दिन और राज्यभार सम्भालिए अनंतर...। (बीच में ही बात काटकर)

राजा—बेटा! विगतशोक! मंत्रीगणों को और ज्योतिषी महाराज को बुलाओ।

विगतशोक—जो आज्ञा पिताजी! (उठकर प्रतिहारी को बुलाने भेज देते हैं।)

राजा—अब तुम इस विशाल राज्य की धुरा को धारण करो और न्यायनीतिपूर्वक प्रजा का पालन करो।

विगतशोक—पिताजी! जब आप ही उसे छोड़ रहे हैं, तब मुझे क्यों संभला रहे हैं ? ऐसे क्षणिक राज्य को लेकर मैं क्यों अपने अमूल्य जीवन को व्यर्थ गवाऊँ ? मैं भी आपके साथ दीक्षा ग्रहण करूँगा।

राजा—अरे बेटा! अभी तुम्हारी उम्र ही क्या हुई है ? अभी तो कुछ दिन गार्हस्थ्यधर्म का पालन करते हुए सुखों का उपभोग करो, अनंतर दीक्षा लेकर आत्मा का कल्याण करना।

विगतशोक—पिताजी! यह यमराज किसी की छोटी या बड़ी उम्र को नहीं देखता है। इसलिए मैं तो आपके साथ ही जैनेश्वरी दीक्षा लेऊँगा। (महाराज गतशोक आदि पुत्रों की तरफ दृष्टि डालते हैं कि सभी पुत्र भी उठकर खड़े हो जाते हैं।)

सभी पुत्र—(हाथ जोड़कर) पूज्य तात! हम लोग भी आपके साथ ही मोक्षमार्ग में लगेंगे! हमें यह तुच्छ क्षणभंगुर राज्य नहीं चाहिए। हम लोग भी शाश्वत मुक्तिसाम्राज्य के इच्छुक हैं। (इसी बीच में मंत्रीगण और ज्योतिषी महाराज आ जाते हैं। यथोचित अभिवादन कर बैठ जाते हैं।)

मंत्री—(घबराते हुए हाथ जोड़कर) महाराजाधिराज! आपने आज के इस मंगल दिवस पर क्या सोच लिया ? ओह! हम लोगों के लिए आज बहुत ही अमंगल हो गया। राजा—मंत्रिन्! तुम इतने विचारशील होकर कैसी बातें कर रहे हो ? देखो न, हमारे लिए तो आज सच में ही मंगलमय दिन हो रहा है। अथवा यों समझो कि आज ही मेरा जन्म सफल हुआ है जो कि मैं मोहराजा से युद्ध करके मुक्ति साम्राज्य को प्राप्त करके शाश्वत काल तक उसका उपभोग करूँगा।

ज्योतिषी—प्रभो! आज्ञा दीजिए।

राजा—हाँ, पंडितजी! प्रिय पुत्र लोकपाल के राज्याभिषेक का मुहूर्त निकालिये।

ज्योतिषी—(आश्चर्य से बड़े पुत्र की तरफ देखते हुए) कृपानाथ! विगतशोक राजकुमार के नाम से देखूँ या लोकपाल राजकुमार के नाम से!

राजा—ये सातों कुमार दीक्षा के लिए उत्सुक हैं अत: लोकपाल के नाम से ही देखिये।

ज्योतिषी—महाराज एक मुहूर्त के बाद आज ही बहुत उत्तम मुहूर्त है। (पंडितजी को दक्षिणा देकर विदा करते हैं)

राजा—मंत्रिन्! राज्याभिषेक की तैयारी करो! (कुछ क्षण बाद मंगल बाजे बजने लगते हैं। महाराज अपना मुकुट उतारकर लोकपाल के मस्तक पर रख देते हैं और चारों तरफ से जय-जयकार की ध्वनि होने लगती है। मध्य में वनपाल आकर छहों ऋतुओं के फल-फूल रखकर महाराज को प्रणाम कर निवेदन करता है)

वनपाल—कृपानाथ! अपने परम पुण्य से आज भगवान वासुपूज्य का समवसरण उत्तरदिशा के उद्यान में आया हुआ है।

राजा—(हर्ष से विभोर होकर) जय हो, जय हो, (सभी लोग आसन से उठकर उत्तर दिशा में सात पैंड चलकर नमस्कार करते हैं) नमोस्तु भगवन्! नमोस्तु-नमोस्तु! (राजा वनपाल को अपने गले का रत्नहार दे देते हैं।)

राजा—मंत्रिन्! शीघ्र ही शहर में घोषणा करा दो कि सभी लोग प्रभु की वंदना के लिए चलेंगे। (सब चले जाते हैं। महाराज सभी परिजन के साथ उद्यान में पहुंचते हैं। समवसरण को देखते ही गद्गद हो जाते हैं और पैदल ही चलकर समवसरण में पहुँचकर प्रभु का दर्शन-स्तवन करते हैं। सभी लोग भी दर्शन-स्तवन करते हैं।)

राजा—हे भगवन्! आज मेरा जीवन सफल हो गया। साक्षात् तीन लोक के नाथ का मैं दर्शन कर रहा हूँ। (हर्ष में विभोर होकर)

—स्तुति पाठ—

धन्योऽस्मि पुण्यनिलयोऽस्मि निराकुलोऽस्मि।
शान्तोऽस्मि नष्टविपदस्मि विदस्मि देव!।।
श्रीमज्जिनेन्द्र! भवतोंऽघ्रियुगं शरण्यम्।
प्राप्तोऽस्मि चेदहमतीन्द्रियसौख्यकारि।।
प्रभु! आज नयनयुग सफल हुए, तव चरणाम्बुज अवलोकन से।
भववारिधि चुल्लू भर जल सम, मम त्रिभुवनतिलक! आज भासे।।
हे वासुपूज्य! भगवान आप, परमात्मप्रकाशक परमात्मन्।
निज आत्मप्रकाशन हेतू मैं, नित नमूँ तुम्हें हे सिद्धात्मन्।।१।।
हे प्रभो! अब मुझे संसार समुद्र से तारने वाली ऐसी जैनेश्वरी दीक्षा देकर कृतार्थ कीजिए।
(राजा अपने मुकुट को उतार कर गले से रत्नहार आदि निकालते हैं।)

चारों तरफ से जय-जयकार होने लगता है। महाराज मुनि हो जाते हैं और तमाम लोग दीक्षा ग्रहण कर लेते हैं तथा रोहिणी देवी आर्यिका हो जाती हैंं उनकी पुत्रवधुएँ और अन्य बहुत सी महिलाएं भी दीक्षा ले लेती हैं। अशोक महाराज कुछ क्षण में गणधर पद प्राप्त कर लेते हैं। सभी लोग—श्री वासुपूज्य भगवान की जय, श्री गणधरदेव अशोक मुनिनाथ की जय, रोहिणीमती आर्यिका माता की जय, सभी मुनियों की जय, सभी आर्यिकाओं की जय, रोहिणी व्रत की जय। (सभी मंगलगान करते हैं।) (पटाक्षेप) ।।इति शं भूयात्।।

भजन

तर्ज—भगवान मेरी नैय्या उस पार लगा देना...
हे वासुपूज्य भगवन् हम शरण तेरी आए...।
उद्धार करो मेरा, कर्मों से हैं सताये...।। टेक.।।
यह मोह कर्म वैरी, बहु दु:ख दे रहा है,
प्रभु भक्ति तेरी करके, कर्मों से छूट जायें...।। हे...।।१।।
स्वारथ के इस जगत् में, अपना हितू न कोई,
सच्चा हितू वही जो, शिवमार्ग को दिखाये।। हे...।।२।।
यह समय व्यर्थ बीता, रागी जनों के संग में,
प्रभू भूल रही भारी, वैराग्य को न पाये।। हे...।।३।।
जो पुण्य कुछ किया है, फल एक चाहुँ प्रभुवर,
बस शीघ्र आतमा की, चित् ज्योति को जगायें।। हे...।।४।।