वन्दन बारम्बार है

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वन्दन बारम्बार


तर्ज—मेरा नम्र प्रणाम है.....

वन्दन बारम्बार है,
षट्खण्डागम ग्रन्थराज को, वन्दन बारम्बार है।
श्री सिद्धान्त सुचिन्तामणि, टीका जिसमें साकार है।।
षट्खण्डागम......।। टेक.।।

वीरप्रभू के शासन का, सबसे पहला यह ग्रन्थ है।
लिखने वाले पुष्पदन्त, अरु भूतबली निग्र्रन्थ हैं।।
श्रीधरसेनाचार्य से जिनको, मिला ज्ञान भण्डार है।
षट्खण्डागम ग्रन्थराज को, वन्दन बारम्बार है।।१।।

वीरसेन सूरी ने उस पर, धवला टीका रच डाली।
प्राकृत संस्कृत के वचनों में, मोती माल बना डाली।।
गूढ़ रहस्यों सहित ग्रन्थ वह, विद्वत्मणि सरताज है।
षट्खण्डागम ग्रन्थराज को, वन्दन बारम्बार है।।२।।

गणिनी माता ज्ञानमती ने, नव इतिहास बनाया है।
संस्कृत टीका सरल रची, सिद्धान्तसार समझाया है।।
चिन्तामणि सम चिन्तित फल, देने में जो साकार है।
षट्खण्डागम ग्रन्थराज को, वन्दन बारम्बार है।।३।।

श्रीधरसेन व पुष्पदन्त, आचार्य भूतबलि को वन्दन।
वीरसेन गुरु को वंदूँ, अरु गणिनी ज्ञानमती को नमन।।
इनसे ही ‘चंदनामती’, यह मिला जिनागम सार है।
षट्खण्डागम ग्रन्थराज को, वन्दन बारम्बार है।।४।।

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