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विघ्नहरण भगवान पार्श्वनाथ

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विघ्नहरण भगवान पार्श्वनाथ

लेखक-श्री प्रदीप कुमार जैन,बहराइच (उ.प्र.)
(१)

जम्बूद्वीप के भरतक्षेत्र में, नगर बनारस अति सुन्दर।
राज्य करें नृप अश्वसेन, जिनके यहाँ जन्में तीर्थंकर।।
(२)
महल था नौ मंजिल का उनका, रानी थी वामा देवी।
धन्य भाग्य थे उन दोनों के, जग में उनसा नहिं कोई।।
(३)
धनकुबेर प्रतिदिन रत्नों की, वर्षा करके थे हरषे।
तीर्थंकर के जन्म से पहले, पन्द्रह महिने तक बरसे।।
(४)
प्रतिदिन कई करोड़ रतन, राजा के महल में बरसे थे।
नृप अश्वसेन थे रतन लुटाते, नर नारी सब हरषे थे।।
(५)
एक रात वामा देवी, जब महल में अपने सोई थी।
देखा सोलह सपने, ऐरावत हाथी, सिंह, बैल आदी।।
(६)
आँख खुली प्रात: स्नान किया, जिनवर पूजा करके।
पति के पास गई पूछा फल, अपने स्वप्न बता करके।।
(७)
अवधिज्ञान से महाराज ने, बतलाया फल क्या होगा।
हे देवी तेरे गर्भ से, तीर्थंकर का जन्म यहाँ होगा।।
(८)
देव देवियाँ सभी मात की, सेवा में लग जाते हैं।
इन्द्र भी आकर गर्भकल्याणक, उत्सव वहाँ मनाते हैं।।
(९)
नृप अश्वसेन का वैभव तो, स्वर्गों से भी बढ़ चढ़कर था।
लगता था जैसे धरती पर, मानो इक स्वर्ग उतर आया।।
(१०)
नव महिने पूरे होने पर, तिथि पौष कृष्ण एकादशि को।
जन्म दिया वामा देवी ने, पाश्र्वनाथ तीर्थंकर को।।
(११)
स्वर्ग में भी सौधर्म इन्द्र का, आसन डोल गया उस क्षण।
तीर्थंकर का जन्म जानकर, आया स्वर्ग से धरती पर।।
(१२)
इन्द्राणी ने माँ को फिर, गहरी निद्रा में सुला दिया।
माया से इक दूजा बालक, वहाँ पास में लिटा दिया।।
(१३)
पर्वत सुमेरु की पाण्डुशिला पर, प्रभुवर को ले गये सभी।
एक हजार आठ कलशों से, अभिषेक प्रभू का किया तभी।।
(१४)
दिव्य वस्त्र आभूषण पहनाये, फिर खूब शृंगार किया।
सौधर्म इन्द्र ने बालप्रभू को, ‘पाश्र्वनाथ’ यह नाम दिया।।
(१५)
बालक प्रभु को फिर ले जाकर, माता की गोद में दे दीना।
प्रभु रूप देख नहिं तृप्त हुआ, तब नेत्र हजार इन्द्र कीना।।
(१६)
स्वर्ग के देव बने बालक, धरती पर प्रभु संग रहते थे।
क्रीड़ा करते वे मन हरते, धन्य अपना भाग्य समझते थे।।
(१७)
जन्म से थे प्रभुवर अति सुन्दर, तन में दिव्य सुगंधी थी।
मल मूत्र नहीं उनके तन में, वाणी हितकर व कर्ण प्रिय थी।।
(१८)
था रहित पसीने से तन प्रभु का, अद्भुत बल के धारी थे।
वे लक्षण एक हजार आठ, और रुधिर श्वेत तन धारी थे।।
(१९)
बङ्कावृषभ-नाराच संहनन, समचतुष्क संठान सहित।
ऐसे प्रभुवर के चरणों में, शीश नवाऊँ भक्ति सहित।।
(२०)
पाश्र्वनाथ प्रभु मरकत मणि के, सदृश हरित वर्ण के थे।
मति, श्रुत, अवधी, तीन ज्ञान के, धारी प्रभू जनम से थे।।
(२१)
सोलह वर्षों बाद प्रभू, जब नवयौवन से युक्त हुए।
एक बार वे भ्रमण हेतु, मित्रो के संग उद्यान गये।।
(२२)
उस उद्यान में महीपाल, राजा मिथ्या तप में रत था।
निकल नरक से जीव कमठ का, बना महीपाल नृप था।।
(२३)
महीपाल थे नाना प्रभु के, अपनी रानी के वियोग में।
पंचाग्नि तप में थे लीन, मिथ्या तापसियों के संग में।।
(२४)
पाश्र्वनाथ प्रभु पास में पहुँचे, नमस्कार नहिं किया उन्हें।
महीपाल ने जब यह देखा, क्रोध आ गया तुरत उन्हें।।
(२५)
बोले हे कुमार मैं नाना, तेरा महा तपस्वी हूँ।
तूने मेरा अपमान किया, मैं तो कुछ भी कर सकता हूूँ।।
(२६)
बोले तब पाश्र्व कुमार तभी, क्यों तुम मिथ्या तप करते हो?
इससे नहिं होता पुण्य कभी, क्यों तुम पापास्रव करते हो?
(२७)
अज्ञानी जब तप करते, इस लोक में दुख उन्हें मिलता।
भव वन में ही वह भ्रमण करें, परलोक में भी सुख नहिं मिलता।।
(२८)
जो आप्त और आगम को तजकर, मिथ्या तप में रत रहते।
उनको निर्वाण नहीं होता, केवल निज को ठगते रहते।।
(२९)
सम्यक्त्व प्राप्त करके ही जो, जग में तप को धारण करते।
उनका ही तप मंगलकारी, वे ही तो मोक्षधाम लहते।।
(३०)
उपदेश सुना प्रभु का क्रोधित हो, अपना क्रोध जताने को।
उठा कुल्हाड़ी लगा चीरने, लकड़ी एक जलाने को।।
(३१)
बोले तब पाश्र्वकुमार सुनो, इस लकड़ी में हैं नाग युगल।
मत काटो इसे कुल्हाड़ी से, जायेंगे इनके प्राण निकल।।
(३२)
यह सुनकर क्रोधित और अधिक, हो गया उसी क्षण वह तपसी।
बात नहीं माना प्रभु की, और काट लिया लकड़ी फिर भी।।
(३३)
लकड़ी के टुकड़े होते ही, नाग-नागिनी निकल पड़े।
हो गये थे तन के दो टुकड़े, पीड़ा से दोनों तड़फ रहे।।
(३४)
प्रभु ने उपदेश दिया उनको, धर्मामृत पान कराया था।
शांत भाव से मरकर के, दोनों ने देव पद पाया था।।
(३५)
वे नागयुगल धरणेन्द्र तथा, पद्मावति बनकर जन्मे थे।
यक्ष जाति के देव और, देवी बने प्रभू कृपा से थे।।
(३६)
पाश्र्व प्रभू ने इसी तरह, कई जीवों का कल्याण किया।
समय बड़ी तेजी से चलता, तीस वर्ष था बीत गया।।
(३७)
मात-पिता ने जब शादी, करने को कहा पाश्र्वप्रभु से।
बोले थे पाश्र्वकुमार तभी, शादी है बंधन इस जग में।।
(३८)
शादी करके मुझको यूँ अपना, जीवन व्यर्थ नहीं करना।
नेमिनाथ प्रभु के समान, मुझको भी आतम हित करना।।
(३९)
सुख वैभव से सम्पन्न प्रभू, इक दिवस महल में बैठे थे।
उस समय अयोध्या के नरेश, जयसेन ने भेंट उन्हें भेजे।।
(४०)
भेंट समर्पित कर सेवक ने, प्रभु के चरण प्रणाम किया।
हर्षित होकर तब पाश्र्वनाथ, प्रभु ने उसका सम्मान किया।।
(४१)
पूछा कुशल क्षेम नृपवर का, हाल अयोध्या का पूछा।
बोला दूत प्रभो आपकी, कृपा मिले तब कष्ट कहाँ?
(४२)
सर्वप्रथम प्रभु ऋषभदेव के, दश भव का वर्णन करके।
बतलाया साकेत का वैभव, दूत ने फिर मृदुता धर के।।
(४३)
वचन दूत के सुनकर के, प्रभु पाश्र्व सोचने लगे तभी।
हैं धन्य धन्य प्रभु ऋषभदेव, उनका अनुसरण करें हम भी।।
(४४)
उस ही क्षण उनको अपने, उन पूर्व भवों का ज्ञान हुआ।
हो गया जातिस्मरण उन्हें, मन में अपूर्व वैराग्य हुआ।।
(४५)
संसार असार समझ करके, शिवपथ पर चलने को ठाना।
उसी समय लौकान्ति-देव, आ गये किया स्तुति नाना।।
(४६)
इन्द्रादिक देवों ने आकर, प्रभुवर का अभिषेक किया।
मनाके दीक्षा कल्याणक, फिर उत्सव और अनेक किया।।
(४७)
सबको सम्बोधित कर प्रभुवर, विमला नाम पालकि पर।
होकर के आरूढ़ चल दिये, निज सुख हेतु मोक्ष पथ पर।।
(४८)
पहुँच अश्ववन में भगवन, बेला का नियम लिया उस क्षण।
हुए विराजमान पर्यंकासन से, एक शिलातल पर।।
(४९)
पौष कृष्ण एकादशि के दिन, प्रात:काल की बेला में।
सिद्धप्रभू को नमस्कार कर, दीक्षा धारण की प्रभु ने।।
(५०)
पंच मुष्टियों के द्वारा, प्रभुवर ने केशलोंच कीना।
इन्द्र ने क्षीर समुद्र में उन, केशों का क्षेपण कर दीना।।
(५१)
दीक्षा लेते ही प्रभु ने, मन:पर्ययज्ञान को प्राप्त किया।
ऐसे प्रभुवर के चरण कमल में, नमन है बारम्बार मेरा।
(५२)
एक बार मुनि पाश्र्वनाथ, आहार हेतु थे निकल पड़े।
था शुभ दिन वह गुल्मखेट, नामक नगरी में पहुँच गये।।
(५३)
धन्य नामके राजा ने, मुनिवर का पड़गाहन करके।
आहार दिया नवधा भक्ती से, अपना जन्म सफल करके।
(५४)
आहार दान के फलस्वरूप, पंचाश्चर्य प्राप्त किया नृप ने।
तीर्थंकर ले आहार जहाँ, उस नृप के भाग्य के क्या कहने?
(५५)
चार माह छद्मस्थ अवस्था, के प्रभुवर ने बिता दिये।
वन में जाकर देवदारू, नामक इक वृक्ष तले तिष्ठे।।
(५६)
सात दिनों का योग लिया, मन में विशुद्धता लिये हुए।
धर्मध्यान से भी बढ़कर, शुद्धात्म ध्यान में लीन हुए।।
(५७)
वह महीपाल मिथ्या तपसी, सो पाश्र्वनाथ का नाना था।
था जीव कमठ का पूर्वभवों में, वैर प्रभू से ठाना था।।
(५८)
मिथ्या तप के फल से मरकर, वह ‘शम्बर’ ज्योतिषी देव हुआ।
आकाश मार्ग से एक दिवस, उसने विमान से गमन किया।।
(५९)
प्रभुवर थे ध्यान लीन उनके, ऊपर से जब विमान गुजरा।
रुक गया अचानक वह विमान, नहिं थोड़ा सा भी खिसक रहा।।
(६०)
उसको विभंग अवधि ज्ञान, के द्वारा सब कुछ ज्ञात हुआ।
पूर्व भवों के वैर के बारे में, उसने सब जान लिया।।
(६१)
उसने फिर क्रोधित होकर, उपसर्ग भयंकर शुरू किया।
और भयानक रूप बना, अग्नी वर्षा प्रारंभ किया।।
(६२)
मूसलाधार वर्षा करके, जोरों से आँधी चलवाया।
फिर भी अचलित धीर वीर, प्रभुवर को नहीं डिगा पाया।।
(६३)
सात दिनों तक लगातार, उसने उपसर्ग अनेक किये।
बड़े बड़े पत्थर लाकर, पास प्रभू के पटक दिये।।
(६४)
जब प्रभुवर पर उपसर्ग हुआ, धरणेन्द्र का आसन काँप उठा।
अवधिज्ञान से जान सभी, भार्या पद्मावति संग चला।।
(६५)
पाताल लोक से चलकर के, दोनों प्रभु पाश्र्व के पास गये।
शम्बर के द्वारा किये गये, उपसर्ग सभी थे दूर किये।।
(६६)
पद्मावति ने प्रभुवर को उठा, अपने मस्तक पर बिठा लिया।
धरणेन्द्र ने मणियों से निर्मित, तब कई फणों का छत्र किया।।
(६७)
धरणेन्द्र तथा पद्मावती, प्रभुवर के उपकार नहीं भूले।
हम भी जीवन में उपकारी के, उपकारों को याद रखें।
(६८)
धरणेन्द्र तथा पद्मावति ने, प्रभुवर की बहुविध भक्ति किया।
उपसर्ग निवारण करके उनने, अपना जीवन सफल किया।।
(६९)
ध्यान के बल से प्रभुवर ने, मोहनीय कर्म का नाश किया।
कमठ ने जो उपसर्ग किया था, उसी समय सब दूर हुआ।।
(७०)
जिस भूमी पर प्रभुवर ने, उपसर्ग था सारा सहन किया।
‘अहिच्छत्र’ नाम से वह तीरथ, है आज भी जग में शोभ रहा।।
(७१)
प्रभु पाश्र्वनाथ ने चार घातिया, कर्म का नाश किया क्षण में।
लोकालोक प्रकाशी केवलज्ञान, को प्राप्त किया प्रभु ने।।
(७२)
इन्द्र की आज्ञा से कुबेर ने, समवसरण की रचना की।
इन्द्र ने भक्ती से प्रभुवर के, केवलज्ञान की पूजा की।।
(७३)
जैसी विभूति तीर्थंकर प्रभु के, समवसरण में दिखती है।
वैसी विभूति मिथ्यादेवों को, कभी नहीं मिल सकती है।।
(७४)
भगवान की महिमा देख, ज्योतिषी देव ने भी तब वैर तजा।
सम्यग्दर्शन को धारण कर, आखिर में प्रभु के चरण झुका।।
(७५)
वहाँ सात सौ तापसियों ने, सम्यग्दर्शन ग्रहण किया।
प्रभु पाश्र्वनाथ की बार-बार, भक्ती कर संयम ग्रहण किया।।
(७६)
जब केवलज्ञान प्रभू को होता, ये दश अतिशय होते है।
सौ सौ योजन तक प्रभुवर के, चहुँ ओर सुभिक्ष ही होते हैैं।।
(७७)
आकाश गमन होता प्रभु का, इक मुख होकर भी चार दिखे।
हिंसा, उपसर्ग नहीं होता, आहार नहीं भगवन लेते।।
(७८)
सब प्रकार की विद्यायें, प्रभुवर के पास सदा रहती।
नख, केश नहीं बढ़ते प्रभु के, नेत्रों की पलवेंâ नहिं लगती।।
(७९)
अरिहंत प्रभू का तन, छाया से रहित सदा ही है होता।
ऐसा अतिशय अरिहंत प्रभू के, सिवा अन्य को नहिं होता।
(८०)
अठ प्रातिहार्य एवं चौदह, अतिशय देवों द्वारा होते।
अठारह दोषों से भी रहित, केवल अरिहंत प्रभू होते।।
(८१)
सोलह हजार मुनिराज, प्रभू के समवसरण में थे ज्ञानी।
थे दस गणधर उनमें से प्रमुख, ‘स्वयंभू’ गणधर अतिज्ञानी।।
(८२)
वहाँ एक लाख श्रावक एवं, तीन लाख श्राविका सहित।
छत्तीस हजार आर्यिकाएँ, आर्यिका सुलोचना प्रमुख कथित।।
(८३)
प्रभु पाश्र्वनाथ ने समवसरण में, सबको धर्म उपदेश दिया।
पाँच माह कम सत्तर वर्षों तक, प्रभुवर ने विहार किया।।
(८४)
केवलज्ञानी पाश्र्वनाथ प्रभु, जब जब थे विहार करते।
स्वर्ण कमल की रचना, उनके चरणों तले देव करते।।
(८५)
अंत में जब प्रभुवर की आयू, एक माह की शेष रही।
सम्मेदशिखर पर पहुँच गये, संग में थे छत्तिस मुनि भी।।
(८६)
किया बंद विहार तथा फिर, प्रतिमायोग किया धारण प्रभु ने।
शुक्लध्यान से अष्ट कर्म, सब नष्ट किया क्षण में प्रभु ने।।
(८७)
श्रावण शुक्ला सप्तमि के दिन, तब मुक्ति रमा ने वरण किया।
अविनाशी अक्षय सुख पाकर, निर्वाण धाम को प्राप्त किया।।
(८८)
इन्द्रों ने भी तब पाश्र्वनाथ, प्रभु की पूजा भक्ती करके।
निर्वाण कल्याणक उत्सव खूब, मनाया हर्षित हो करके।।
(८९)
प्रतिवर्ष भक्तगण भक्ती से, सम्मेदशिखर पर जाते हैं।
मोक्षकल्याणक के शुभ दिन, वहाँ लाडू खूब चढ़ाते हैं।
(९०)
पाश्र्वनाथ प्रभु के जीवन से, हमको यह शिक्षा मिलती।
वैर, क्रोध, तुम करो कभी ना, यह भव-भव में दुख देती।।
(९१)
क्षमा आत्मा का गुण है, जिसे पाश्र्वप्रभू ने धारा था।
कमठ ने वैर ठान करके, नरकों में जा दुख पाया था।।
(९२)
सौ वर्ष आयु थी प्रभुवर की, नौ हाथ प्रमाण शरीर कहा।
थे बाल ब्रह्मचारी भगवन ने, उग्र वंश में जन्म लिया।।
(९३)
क्षमावान प्रभु पाश्र्वनाथ, मेरे पापों को क्षमा करो।
करता ‘प्रदीप’ विनती भगवन, मेरे दुखों को दूर करो।।
(९४)
प्रज्ञाश्रमणी चंदनामती, माताजी जो अति विदुषी हैं।
जिनकी वाणी वीणा जैसी, निकले सबका मन हरती हैं।।
(९५)
पाश्र्वनाथ प्रभु का जीवन, है लिखा उन्होंने अति सुन्दर।
उसका ही आश्रय ले करके, मैंने यह काव्य लिखा रुचिकर।।
(९६)
मुझको नहिं काव्य का ज्ञान जरा, यह तो बस मात्र प्रयास मेरा।
इसमें जो भी त्रुटियाँ होवें, कर ले विद्वान सुधार जरा।।
(९७)
माँ ज्ञानमती, चंदनामती, का मिले मुझे आशीष सदा।
ऐसी गुरु माँ के चरणों में, करता ‘प्रदीप’ है नमन सदा।।