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विनम्रता,

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विनम्रता

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आज चारों और विघटन और अनुशासनहीनता का वातावरण दिखाई दे रहा है इस कारण से मनुष्य का आंतरिक विश्वास डगमगाने लगता है। भौतिकता की अंधी दौड़ में सम्मिलत हुए आज के युग के मनुष्य की दृष्टि अहंकारी हो गई है।मनुष्य ने विनम्रता का दामन छोड़ दिया है। आज मनुष्य को सभी साधन और सुख सुविधायें सहज तया उपलब्ध हो रही हैं। अत: विनम्रता की चर्चा भी उसे रूचिकर प्रतीत नहीं हो रही है।

दुनियां में जितने भी महापुरुष या लोकप्रिय व्यक्ति हुए है उनके कार्य क्षेत्र भिन्न—भिन्न हो सकते हैं, परन्तु उनके जीवन की विवेचना करें तो एक सामान्य अवश्य ही नजर आता है कि चरित्र के अन्य गुणों के साथ—साथ विनम्रता गुण ने उनको महान बनाने में अत्यंत महत्वपूर्ण काम किया है। विनम्रता ऐसा आभूषण है, जिसकी चमक के आगे सोने—चांदी के आभूषणों की चमक भी फीकी पड़ जाती है। विनम्रता गुण मनुष्य के मन में कोमलता, धैर्य, उदारता और कृतज्ञता के भावों को सहेज कर रखता है।अपने आपको जगत में सबसे छोटा मानना ही विनम्रता है। विनम्रता मनुष्य को यह शिक्षा देती है कि सामने खड़ा हुआ मनुष्य अपने समान ही एक मनुष्य है, उसके प्रति अपनत्व भाव रखना और उसके साथ मानवोचित व्यवहार करना मेरा कत्र्तव्य है। जो व्यक्ति वैभवशाली या ऊँचे ओहदे पर होने के साथ—साथ विनम्र भी होता है वह सोने पर सुहागा का जीता—जागता उदाहरण है।

विनम्रता व्यवहार में एक ऐसा सुद्दढ़ कवच है कि जिस पर दुव्र्यवहार के शस्त्र अपना असर नहीं दिखा पाते। विनम्रता से मानव में पात्रता आविर्भूत होती है, जिससे मनुष्य, धर्म, दर्शन और विज्ञान को प्राप्त कर आत्मकल्याण के लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है। जो झुकता है, वह पाता है, इस लोकोक्ति की चरितार्थता विनम्र मनुष्य के जीवन में प्रत्यक्ष देखी जा सकती है विनम्रता ही समस्त क्षेत्रों में सफलता को प्राप्त करने की एकमात्र कुंजी है। जिस प्रकार सुशील कन्या सत्पुरुष को पाकर धन्यता का अनुभव करती है उसी प्रकार लक्ष्मी विनम्र मनुष्य का समागम पाकर धन्यता का अनुभव करती है।

ऋषभ देशना'
फरवरी,२०१२'