Whatsappicon.jpg
Whatsappicon.jpg
ज्ञानमती नेटवर्क से जुड़ने के लिये ADD ME < मोबाइल नं.> लिखकर +91 7599002108 पर व्हाट्सएप पर मेसेज करें|


गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ससंघ का मंगल चातुर्मास टिकैतनगर-बाराबंकी में चल रहा है, दर्शन कर लाभ लेवें |

पारस चैनल पर प्रातः ६ से ७ बजे तक देखें जिनाभिषेक एवं शांतिधारा पुन: ज्ञानमती माताजी - चंदनामती माताजी के प्रवचन ।

विश्व धर्म संसद में गूंजा वह स्वर,सारे भारत का था

ENCYCLOPEDIA से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

विश्व धर्म संसद में गूंजा वह स्वर,सारे भारत का था

—रवीन्द मालवा'

जबकि भारत में ब्रिटिश तथा विश्व राजनीति में ब्रिटेन का दबदबा चरमोत्कर्ष पर था, अमेरिका के प्रसिद्ध नगर शिकागो में, सितम्बर १८९३ में ‘विश्व धर्म संसद’ का आयोजन हुआ। यह वह युग था, जबकि यूरोप में एशियाई सभ्यता, संस्कृति और आध्यात्मिक विचार-धाराओं को जानने की जिज्ञासा तीव्र से तीव्रतर होती जा रही थी।

सन् १८९० में इन जिज्ञासाओं की पूर्ति के उद्देश्य से तत्कालीन प्रतिष्ठित अमरीकी विद्वान चाल्र्स करौल बॉनी ने विज्ञान, कला, धर्म, समाजशास्त्र, राजनीतिशास्त्र अर्थशास्त्र आदि विषयों पर विश्व संसद के आयोजन का संकल्प कर उन्हें कार्यरूप देना प्रारम्भ किया। तीन वर्षों के कठोर परिश्रम तथा सद्प्रयासों के प्रतिफल स्वरूप विभिन्न विषयों पर विश् व संसद के आयोजनों की श्रृंखला मई १८९३ से प्रारम्भ हुई, जो अक्टूबर १८९३ तक चली।

इस श्रृंखला की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी ‘ विश्व धर्म यह संसद का उद्घाटन ११ सितम्बर १८१३ की शिकागो के कोलम्बस हॉल में हुआ। संसद २७ सितम्बर तक चली। भारत से इस हेतु आंमत्रित जिन विद्वानों ने भाग लिया, वे थे— श्रीमती एनी बेसेन्ट तथा सर्व श्री वीरचन्द्र राघव जी गांधी, प्रतापचन्द्र मजुमदार व जगह करो। इनके अतिरिक्त व्यक्तिगत प्रतिनिधि की हैसियत से इसमें स्वामी विवेकानन्द ने भी भाग लिया, जिन्हें भारत से हिन्दू प्रतिनिधित्व हेतु आंमत्रित संगठन द्वारा नामांकित न किये जाने के तकनीकि कारणों से हिन्दू धर्म के प्रतिनिधि के रूप भाग में लेने की अनुमति नहीं मिल सकी थी। उन्हें अंतिम क्षणों में व्यक्तिगत प्रतिनिधि के रूप में अनुमति मिलने से उन्होंने लिखित निबन्ध प्रस्तुत नहीं किया तथा मौखिक रूप से अपने विचार रखे।

अपनी व्यापकता, उपयोगिता, प्रामाणिकता तथा गम्भीरता के कारण यह आयोजन विश् व इतिहास में प्रथम एवं अभूतपूर्व घटना थी, जिसने विभिन्न धर्मों के विद्वानों में ज्ञान व विचारों के आदान—प्रदान तथा परस्पर संवाद व समझ के विकास के सुखद वातावरण का सूत्रपात किया। इस धर्म संसद के पूर्व यूरोप में भारतीय मूल के धर्मों के संबंध में जो भी धारणायें व्याप्त थीं, वे भारत से लौटने वाले ईसाई पादरियों द्वारा पूर्वाग्रहों के आधार पर प्रकट प्रतिक्रियाओं पर आधारित थीं। तब वहाँ हिन्दू समाज की छवि ढ़ोंग पाखंड, कुरीतियोंं, व्यभिचार तथा शोषण पर आधारित समाज की बनी थी। जैन धर्म को बुद्ध धर्म की शाखा समझा जाता था। इस धर्म संसद में भारतीय प्रतिनिधियों द्वारा प्रस्तुत एवं पठित निबंधा ने इन धारणाओं को घ्वस्त किया। सम्मेलन में पढ़े गये निबन्धों के आधार पर जिस भारतीय प्रतिनिधि की सर्वाधिक चर्चा हुई, वे थे वीरचन्द्र राघव जी गांधी।

उस समय अमेरिका के प्रसिद्धतम समाचार पत्रों ने उनकी चर्चा करते हुए लिखा था— ‘अनेकों जगह विख्यात विद्वान, दार्शनिक, पंडित और धार्मिक नेता परिषद् में सम्मिलित हुए और उन्होंने व्याख्यान दिये, उनमें से कुछ एक की गिनती तो विद्वत्ता, दया तथ चरित्र में किसी भी जाति के बड़े से बड़े विद्वान में होती है। यह कहना कोई अत्युक्ति नहीं कि पूर्वीय विद्वानों मेंजिस रोचकता के साथ जैन नवयुवक श्रावक का व्याख्यान, जो कि जैन धर्म तथा चरित्र के सम्बन्ध मैं था, सुना गया और किसी का नहीं।’

विश्व धर्म संसद में श्री वीरचन्द्र गांधी का मुख्य भाषण २५ सितम्बर को हुआ था। वे जैन धर्म का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। श्री वीरचन्द गांधी ने अपने व्याख्यान का प्रारम्भ करते हुए कहा— मैं जैन धर्म का प्रतिनिधि हूँ, यह धर्म बुद्ध से अति प्राचीन है। इसका आचार शास्त्र बुद्ध धर्म के समान है। किन्तु आध्यमिक तत्त्वों की दृष्टि से यह उससे भिन्न है इस समय भारत में इसके पन्द्रह लाख अनुयायी हैं, जो शान्तिप्रिय और नियमानुसार व्यवहार करने वाले समझे जाते हैं।’

उन्होंने जैन धर्म के मौलिक सिद्धान्तों और इसके तत्त्व ज्ञान, सत्य अहिंसा, अपरिग्रह की परिभाषा से जैन दर्शन के मूलतत्त्वों पर प्रकाश डाला तथा जैन साधुओं की जीवन चर्या एवं जीवन दर्शन, आचार और परम्पराओं से अवगत कराया। जैन दर्शन में कर्मवाद और योगवाद पर उनकी व्याख्या पर गहन चर्चा हुई। अनेकान्त दर्शन की व्याख्या करते हुए जब उन्होंने सात अन्धों और हाथी वाली लोक कथा का दृष्टांत रखा तो कई श्रोताओं ने यह अनुभव किया कि अनेकान्त के विचार से जैसे उनके दिव्य—चक्षु खुल गये हैं। उन्होंने अपने व्याख्यान में जिन महत्वपूर्ण विषयों पर प्रकाश डाला तथा इनके समर्थन में जो मुख्य तत्त्व प्रस्तुत किये उनका सार इस प्रकार है—

भारत की आत्मा क्षमाशील है। प्रतिशोध इनके स्वभाव में नहीं है।

जैन धर्म में संचित कर्मों को क्षय करने का सर्वाधिक महत्व है।

किसी भी जीव को, किसी भी प्रकार की पीड़ा पहूँचाना अधर्म है।

सभी प्राणियों से समान रूप से मैत्री का पाठ ही तीर्थंकरों ने पढ़ाया है।

सृष्टि के सभी प्राणी मेरे मित्र हैं, मेरा कोई बैरी नहीं है।

प्रायश्चित से, भीतर का मैल घुल जाता है। निर्मलता का भाव उभरता है।

यद्यपि भारत में अनेक वर्ग, अनेक रंग, उनके मत और सम्प्रदाय हैं, पर अहिंसा भारतीय जीवन दर्शन की धुरी है।

विदेशी शासकों ने भारत के उज्ज्वल इतिहास और गौरव की गाथाओं को नष्ट कर देने का पूरा यत्न किया, यहाँ तक कि ब्रिटिश कूटनीतिज्ञों ने भारतवाषियों की दासता और दु—र्बलता का लाभ उठाकर हमारी संस्कृति का विकृत रूप ही दुनिया के समाने रखा है।

भयानक उपद्रवों के बावजूद भारतीय संस्कृति पूर्णत: सजीव है और कश्मीर से कन्याकुमारी तक पूरा राष्ट्र एक सूत्र में बद्ध है।

वीरचन्द्रजी, यों भले ही जैन धर्म के प्रतिनिधि के रूप मेें इस सम्मलेन में भाग ले रहे थे, किन्तु वस्तुत: वे सारे देश के प्रतिनिधि थे। जब कभी किसी भी अवसर पर, किसी भी वक्ता ने भारत के किसी भी धर्म या यहाँ की सभ्यता, संस्कृति अथवा रीति—रवाज पर अनुचित आक्रमण किया तो आपकी देशभक्त आत्मा तड़प उठी और आपने उसका युक्ति—युक्त खंडन किया।

परिषद के चौदहवें दिन २४ सितम्बर को जब एक वक्ता ने हिन्दू धर्म की नैतिकता पर कटाक्ष करते हुए कहा कि— ‘ब्राह्मण धर्म के अनुयायियों ने हजारों मन्दिरों में स्त्रियों को पुजारिन बनाया और वे पुजारिन थीं, अत: वेश् याओं का काम करती थी।’

अगले दिन जब वीरचन्द्रजी अपना निबन्ध पढ़ने लगे तो प्रारम्भ में ही उन्होंनें इस भद्दे आक्रमण का उत्तर देते हुए कहा— मैं प्रसन्न हूँ कि किसी ने मेरे धर्म पर आक्रमण करने का साहस नहीं किया, ऐसा करना भी नहीं चाहिये, जो आक्रमण किये गये हैं, वे सामाजिक कुरीतियों से सम्बन्ध रखते हैं।.........ये बुराईयों धर्म के कारण नहीं हैं, प्रत्युत धर्म के होने पर भी हैं और ऐसी बातें देशों में हुआ करती हैं।’

अपनी महत्वाकांक्षाओं को लक्ष्य में रखकर कुछ लोग यह समझते हैं कि वे महात्मा पाल हैं और इस पर वे विश्वास भी कर लेते हैं। ये पाल (?) भारत छोड़कर अपने विचारों का प्रदर्शन करने और कहाँ जाये ? वे ईसाई धर्म को न मानने वालों को अपने धर्म की परिधि में लेने के लिये भारत में जाते हैं, जब उनके स्वप्न भंग हो जाते हैं, तब वे जीवन भर हिन्दुओं की निन्दा करने के लिये वापिस आ जाते हैं। किसी भी धर्म की निन्दा करना, उस धर्म के विरुद्ध कोई प्रमाण नहीं है। इसी प्रकार अपने धर्म की पंशसा अपने धर्म का प्रमाण नहीं है।......... दक्षिण भारत में कुछ ऐसे मन्दिर हैं, जिनमें विशेष अवसरों पर गाने के लिए गाने वाली स्त्रियां रखी जाती हैं, उनमें कुछ का चरित्र संदिग्ध भी होता है। हिन्दू इसे अनुभव करते हैं और इस बुराई को दूर करने का प्रयास कर रहे हैं। उनके पुजारिन होने के सम्बन्ध में यह कहना पर्याप्त है कि हिमालय से लेकर कन्याकुमारी तक एक भी स्त्री पुजारिन नहीं है।.......यदि भारत की वर्तमान बुराईयां हिन्दू धर्म के कारण उत्पन्न हुर्इं है। तो इसी धर्म में ही ऐसा ‘‘राष्ट्र बनाने की शक्ति थी जिसके विषय में यूनानी इतिहासकारों ने कहा है कि—‘‘कोई हिन्दू झूठ बोलता नहीं देखा गया और कोई हिन्दू नारी शील—पतित नहीं सुनी गई। आधुनिक काल में भी भारत से बढ़कर चरित्रवती नारियाँ और नम्र हृदय पुरुष संसार में और कहाँ हैं?’’

परिषद् के अन्तिम दिन उनकी गम्भीर ध्वनि और विचारों की शालीनता पुन: गुंजित हो उठी जब उन्होंने कहा कि— ‘यदि आप किसी गैर ईसाई को शांति और प्रेम का संदेश देने की आज्ञा दें तो मैं आपसे अनुरोध करूंगा कि आप उन विविध विचारों का उदार दृष्टि से मनन करें, जो यहाँ आपके सम्मुख उपस्थित सम्मुख उपस्थित किये गये हैं। हाथी और सात अंधों की कहानी के समान अंधविशवास तथा पक्षपात की दृष्टि से विचार करना अनुचित होगा।’

श्री वीरचन्द गांधी अमेरिका में दो वर्ष रहे। इस दौरान उन्होंने अमेरिका के विभिन्न नगरो में पाँच सौ पैंतीस व्याख्यान दिये। कई व्याख्यानों में उपस्थिति हजारों तक होती थी। इनमें निर्भीकता, स्पष्टवादिता, सत्यप्रियता तथा विश्व बन्धुत्व की भावना की झलक तो थी ही, राष्ट्र गौरव की अनुभूति तथा विदेशी दासता के विरूद्ध तड़प तथा विद्रोह भावना भी थी, जिसे उस समय अभिव्यक्त करना भी , अपने जीवन को जोखिम में डालना था, तथापि यह भावना उनके भाषणों में स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होती थी। उनके भाषणों के निम्न दो उदाहरणों में इसकी स्पष्ट झलक मिलती है।

‘आप जानते हैं कि हम स्वतंत्र राष्ट्र के निवासी नहीं हैं। हम महारानी विक्टोरिया की प्रजा हैं। किन्तु यदि हम राष्ट्र शब्द के सच्चे अर्थ के अनुसार अपना राष्ट्र होने का गौरव कर सकते, हमारी अपनी सरकार होती और अपने ही शासक होते, हमारे कानून और हमारी संस्थाओं का संचालन स्वतंंत्रतापूर्वक हमारी स्वेच्छा के अनुसार होता तो मे। निश्चयपूर्वक कह सकता हूँ कि हम संसार में सभी राष्ट्रों के साथ शान्तिपूर्ण संबंध स्थापित कर और उन्हें हमेशा के लिए स्थिर रखने का सतत प्रयत्न करते। हम न तो आपके सम्मान को कम करने का प्रयत्न करेंगे और न ही आपके अधिकारों अथवा भूमि पर छापा मारने की कोशिश करेंगे। हम राष्ट्रों के कुटुम्ब में सबको वही पद देंगे जो कि आप इस समय हमें मनुष्य जाति के कुटुम्ब में प्रदान करते हैं। संस्कृत कवि ने कहा कि— ‘यह मेरा देश है, यह तुम्हारा है’ ये विचार संकुचित हृदय वाले व्यक्तियों के होते हैं। उदारचेताओं के लिये सारा विश्व ही एक कुटुम्ब है।’

जहाँ उनके इस भाषाणांश में विश्व—बन्धुत्व, वसुदेव कुटुम्बकम् और शांतिपूर्ण सह अस्तित्व का संदेश है, वहीं अग्रलिखित उदाहरण तत्कालीन ईसाई धर्म प्रचारकों द्वारा पाले पांखड का सटीक, अकाट्य और तार्विक प्रत्युत्तर प्रकट होता है— ‘ईसाई संसार का यह नारा है कि सारा विश्व ईसा का है, यह सब क्या है? इसका अर्थ क्या है? वह कौन सा ईसा है, जिसके नाम पर आप विश्व विजय प्राप्त करना चाहते है ? क्या अत्याचार का कोई ईसा है ? क्या अन्याय का कोई ईसा है। क्या अन्यायपूर्ण और अत्यधिक ऐसे करों (टेक्सेज) का कोई ईसा है, जो सरकार की मदद के लिये लगाये जाते हैं, जो कि हमारे ज्ञान, विचार, धर्म और सहमति के प्रतिकूल हैं, विदेशी हैं?.......यदि ऐसे ईसा के नाम पर और ऐसे झंड़ो के आधार पर आप हमें जीतना चाहते हैं तो हम पराजित नहीं होंगे, किन्तु यदि आप हमारे पास शिक्षा, भातृ भाव और विश्व प्रेम के ईसा के नाम से आते हैं। तब हम आपका स्वागत करेंगे। ऐसे ईसा को हम जानते हैं और हमें उनसे भय नहीं है।’

भारत के अध्यामिक एवं सांस्कृतिक वैभव की अस्मिता के चारों ओर बुने जा रहे विदेशी शासकों एवं धर्म प्रचारकों के भ्रम जाल को वर्षों तक यूरोप के अनेक देशों में घूम—घूम अपने अकाटय तर्कों, तर्व संगत एवं प्रमाणिक विचारों से काटकर, खण्ड—खण्ड कर देने वाले इस युवक का जन्म गुजरात राज्य के भावनगर के पखिर में २५ अगस्त १८६४ को हुआ था।

राधवजी स्वयं समाज सुधारक थे, व्यक्ति निधन पर छाती तथा माथा पीटने की प्रथा को उन्होंने अपने ही घर से बन्द किया था। गाँव में प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त कर वीरचन्द्र गांधी भावनगर चले गये। सोलह वर्ष की आयु में उनहोंने हाईस्कूल तथ बीस वर्ष की आयु में बी.ए.की परीक्षा उत्तीर्ण की। वे श्वेताम्बर जैन समाज के प्रथम व्यक्ति थे।, जिसने स्नातक की डिग्री प्राप्त की थी।

स्थातक परीक्षा उत्तीर्ण करने के तत्काल बाद ही आपने सार्वजनिक कार्यों में भाग लेना शुरु कर दिया था। उन्होंने बाद में वकालत भी शुरू की तथ सम्मेदशिखर पर जैनों का अधिकार प्रमाणित कर वहाँ बधशाला के निर्माण को रुकवाने जैसे अनेक महत्वपूर्ण मुकदमों में प्रष्ठिात्मक सफलता प्राप्त की। आप सालीसिटर की परीक्षा की भी तैयारी करते रहे, जिसमें बाद में आपने सफलता प्राप्त की।

१८९३ में आयोजित विश्व धर्म संसद हेतु जैन प्रतिनिधि के रूप में जब जैन धर्मगुरु श्वेताम्बर जैनचार्य श्री विजयनन्दजी सूरि को निमंत्रण प्राप्त हुआ तो जैन साधु मर्यादा के कारण वे समुद्र पार विदेश यात्रा और वाहन प्रयोग नहीं करते थे, अत: उन्होंने यह निमंत्रण जैन एसोशियन के पास विचारार्थ भेजा, जिसने इस हेतु वीरचन्द्र गांधी का चयन किया। वे विदेश में जाने वाले प्रथम व्यक्ति थे। चयनोपरांत वे छह माह तक आचार्य श्री की सेवा में अमृतसार रहे जहाँ उन्होंने जैन—धर्म दर्शन का विशेष अभ्यास किया विदेश जाते समय विशेष अभ्यास किया। विदेश जाते समय आचार्यश्री ने उन्हें तीन नियमों के पालने का व्रत दिलाया— (१) विदेश यात्रा में ब्रह्मचर्य का पालन, (२) स्वदेशी वेशभूषा तथा (३) शाकाहारी भोजन। आपने इसका पूर्ण पालन किया।

विश्व धर्म संसद के पश्चात् दो वर्ष और अमेरिका में रुककर आपने सैकड़ों व्याख्यान दिये। १८९५ में वापिस आने के एक वर्ष पश्चात् ही अमेरिका से प्राप्त आमंत्रण को स्वीकार कर १८९६ में पुन: अमेरिका गये। आते हुए इग्लैण्ड में भी व्याख्यान दिये तथा वहाँ बैरिस्टरी का अध्ययन पूर्ण कर लिया। आपने अनेकों स्थानों पर अभ्यास वर्ग स्थापित किये। आपको स्वर्ण व रजत पदकों से सम्मानित किया गया। वे १८९८ में जैन समाज के काम से भारत वापिस आये। १८९९ में वे पुन: विदेश चले गये। इस प्रवास के दौरान इंग्लैण्ड में आपका स्वास्थ्य कुछ खराब हो गया, अत: आप वापिस भारत आ गये। दुर्भाग्यवश कुछ सप्ताह बाद ७ अगस्त १९०१ को मात्र वर्ष की आयु में इस तेजस्वी एवं प्रतिभाशाली युवक का निधन हो गया।

सच्चे जैन संस्कारों से विभूषित होने के कारण उनकी दृष्टि समन्वयशील थी। वे चौदह भाषाओं के ज्ञाता थे। उनके भाषण जैन धर्म दर्शन और आचार तक ही सीमित न थे। उन्होंने भरत की चमत्कार विद्या, ईसामसीह के धर्म का स्याद्वाद मतानुसार अर्थ, भारत के प्राचीन धर्म गायन विद्या, अमेरिका में स्त्रियों को टोपियों में पंख नहीं पहनना चाहिये, समाचार पत्र तथा नाटक का सम्बन्ध (अन्तिम तीनों भाषण केवल महिलाओं की सभा मे दिये गये), अमेरिका राजनीति पर वर्तमान सामाजिक कानूनों का प्रभाव, यूरोपिया दर्शन के तीन मौलिक मिथ्या व्यवहार और रीति—रवाज,बुद्ध, भारत की राजनीतिक व्यवस्था, हिन्दू—मुस्लिम धारणाएँ, हिन्दुओं का सामाजिक दर्शन और अंग्रेजी राज्य में भारत में नारी का स्थान, भारत की अमेरिका को देन आदि विभिन्न विषयों पर व्याख्यान दिये।

धर्म, साहित्य और राजनीति के मर्मज्ञ विद्वान ख्यातिप्राप्त नि:स्वार्थ सेवक भगवानदीनजी ने अपनी संस्मरणात्मक पुस्तक ‘मेरे साथी’ में वीरचन्द्र गांधी के व्यक्तित्व का वर्णन करते हुए लिखा है। कितना अकर्षण रहा होगा उस वीरचन्द्र राधवली गांधी ने जिस वक्त मैसानिक टैम्पल में हिप्नोटिज्म पर बोलते हुए उन्होंने लोगों से कहा कि कमरे की बत्तियाँ हल्की कर दी जायें और जेसे ही ये हल्की हुर्इं उस सपेद कपड़े धारी हिन्दुस्तानी देह से एक आभा चमकने लगी कि मानों उस आदमी के चेहरे के पीछे कोई सूरज निकल रहा हो और जिसे देखकर अमेरिकावासियोंका कहना है कि उनकी आँखे बन्द हो गई ओर थोड़ी देर के लिये उन्हें ऐसा मालूम पड़ा मानो वह समाधि अवस्था में हों।

वीरचन्द्र गांधी जैसे आदमी भारत भूमि न पैदा करती तो हम हिन्दुस्तान के बड़प्पन का सन् सत्तावन के बाद कोई प्रभाव दूसरे देशों पर न छोड़...... यह ठीक है कि किसी एक धर्म की तरफ से ही वे शिकागो के धर्म सम्मेलन में शामिल हुए थे, पर वहाँ पहुँचकर जिस तरह बोले, उससे सारे भारत की इज्जत बढ़ी ओर अमेरिका के लोगों ने उनकी बातों को ऐसे ही अपनाया मानों वे ईसा को सुन रहे हों।



अर्हत् वचन २००१