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वीरसागर काव्य चरित

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आचार्य श्री वीरसागर काव्य चरित

1st Pattacharya Shri Veer Sagar Ji Maharaj.jpg


(१)


तर्ज-जिन्दगी एक सफर है........

गुरुपद से है प्रीति लगाना ।
गुरुभक्ति के गीत है गाना ।।
सुन भाई, सुन भाई, सुन भाई...।।टेक.।।
शान्तिसिन्धु आचार्य प्रवर।
उनके पट्टाचार्य प्रवर।।
वीरसागर जी का वर्ष सुहाना ।
गुरुभक्ति के गीत है गाना ।।
सुन भाई, सुन भाई, सुन भाई...।।१।।

प्रान्त महाराष्ट्र में जन्म हुआ ।
वीर ग्राम तब उनसे धन्य हुआ ।।
भाग्यवती माँ का लाल सुहाना ।
गुरुभक्ति के गीत है गाना ।।
सुन भाई, सुन भाई, सुन भाई...।।२।।

पिता रामसुख जी का भाग्य खिल गया ।
हीरा जैसा हीरालाल पुत्र मिल गया ।।
खुल गया माता-पिता का खजाना ।
गुरुभक्ति के गीत है गाना ।।
सुन भाई, सुन भाई, सुन भाई...।।३।।

हीरालाल बालब्रह्मचारी बन गये ।
धीरे-धीरे वीरसागर मुनी बन गये ।।
उनकी पुण्यकथा है सुनाना ।
गुरुभक्ति के गीत है गाना ।।
सुन भाई, सुन भाई, सुन भाई...।।४।।

इसीलिए ज्ञानमती माताजी ने ।
दी है प्रेरणा गुरु का वर्ष मना लें।।
‘चन्दनामती’ यही है बतलाना ।
गुरुभक्ति के गीत है गाना ।
सुन भाई, सुन भाई, सुन भाई...।।५।।

सूत्रधार द्वारा- जनसमूह के द्वारा
जैनी वीरो! हाँ भाई हाँ (सामूहिक स्वर)
मेरी बात सुनोगे- हाँ भाई हाँ (सामूहिक स्वर)
कुछ और सुनोगे- क्या भाई क्या (सामूहिक स्वर)
मेरे संग में बोलो- जय जय जय (सामूहिक स्वर)
जैनं जयतु शासनम् वन्दे वीरसागरम् (सामूहिक स्वर)
जैनं जयतु शासनम् वन्दे शान्तिसागरम् (सामूहिक स्वर)

वन्दे वन्दे मातरम् वन्दे ज्ञानमति मातरम् (सामूहिक स्वर)

(2)


तर्ज-भावों के फूलों से........
गुरुओं की भक्ति से सब सुख मिलते हैं।
गुरुओं की शक्ति से सब दुख टलते हैं।।
सारी उमर क्योंकी तप ये करते हैं।।गुरुओं की.।।टेक.।।
हीरालाल जी ने एक बार सुन लिया।
शांतिसागर मुनि जी का नाम सुन लिया।।
फिर वे इक मित्र के संग घर से चलते हैं।
चलकर कोन्नूर में ये मुनि से मिलते हैं।।
उनसे निज मन की शंका दूर करते हैं।।गुरुओं की.।।१।।

बोले वे इस कलि युग में नहिं मुनि हो सकते हैं।
आपको भी हम कैसे मुनिवर कह सकते हैं।।
क्योंकि मुनि ऋद्धि सिद्धि सुख को वरते हैं।।गुरुओं की.।।२।।

शांतिसिन्धु ने उनको युक्ति से समझाया था।
‘चन्दनामती’ मुनिपद की महिमा को बतलाया था।।
दोनों ही मित्र गुरु के पद में झुकते हैं।।गुरुओं की.।।३।।

कुछ दिन में ही दोनों ने दीक्षा धारण कर ली।
क्षुल्लक एवं मुनि बनकर गुरुशिक्षा पालन कर ली।।

वीरसागर व चन्द्रसागर बनते हैं।।गुरुओं की.।।४।।

Religious Gentlemen and Sisters ! Listen my talk and open your heart. Acharya Shri Veer Sagar Maharaj was the first disciple of Charitra Chakravarti Acharya Shri Shantisagar Ji Maharaj and first Pattacharya of this pious Shantisagar tradition. Once Acharya dev was in very painful condition during his initiated life, because a big Adeeth forha (Deoer" heâesÌ[e) that is, an Abcess appeared on his back. Even a Surgeon was also not ready for surgery without injection or anesthesia, but Acharya shri told him that you do your work of operation without injection; I will do my work by sitting in deep meditation. I will not make any disturbance in your operation work; don’t worry doctor! I can bear all pain ful condition. Doctor operated him successfully and Acharya deva remained seated like a marble stone idol. Seeing this, all the Jain Community present there shouted-Jai ho, Jai ho, Jai ho, Acharya Shri Veersagar Maharaj ki Jai ho. Think! Such a great endurance was lying in Acharya Shri.

अब सुनिये आगे का कथानक कि आचार्य श्री वीरसागर जी महाराज केवल नाम से ही महान नहीं थे, वहाँ अपने शरीर पर उपसर्ग एवं कष्टों को भी सहन करने में सचमुच महावीर के समान अपने नाम को सार्थक करने वाले महापुरुष थे।

(3)


तर्ज-भगत माँ (दीवाना गुरुवर का)........
कहानी मुनिवर की, कहानी गुरुवर की,
रोमांचक है महान-कहानी मुनिवर की।।
वीरसिन्धु गुरुवर थे मानो,
वीरप्रभू के समान.......कहानी.....।।टेक.।।
श्री आचार्य शान्तिसागर के पट्टाचार्य बने थे।
आगम एवं गुरु आज्ञा का पालन वे करते थे।।
चउविध संघ का संचालन,
करते थे पिता समान.....कहानी.....।।१।।

एक बार इक फोड़ा भयंकर उनकी पीठ में निकला।
असहनीय पीड़ाकारी डॉक्टर भी देख के पिघला।।
बिन बेहोशी आप्रेशन को,
देख थे सब हैरान......कहानी.......।।२।।

समयसार का भेदज्ञान इनमें साकार हुआ था।
पुद्गल काया भिन्न है मुझसे यह आभास हुआ था।
तभी ‘‘चन्दनामती’’ इन्हें सब,

करते कोटि प्रणाम....कहानी....।।३।।

प्यारे भाइयों और बहनों! आप सुन रहे हैं बीसवीं सदी के प्रथमाचार्य चारित्रचक्रवर्ती श्री शांतिसागर जी महाराज के प्रथम शिष्य एवं प्रथम पट्टाचार्य श्री वीरसागर महाराज की जीवन झाँकी। वे आचार्य देव समता की प्रतिमूर्ति थे। ख्याति-लाभ-पूजा से दूर रहकर वे मात्र आत्म साधना में लीन रहते थे और अपने चतुर्विध संघ के साधु-साध्वियों के प्रति परम वात्सल्य भाव रखते थे। इसीलिए सभी शिष्य-शिष्याओें के हृदय में उनके लिए अपने पिता के समान भाव रहता था। आप आगे सुनिये कि आचार्य श्री किस प्रकार से अपने वचनामृत से सभी के शारीरिक-मानसिक दु:खों को शान्त कर दिया करते थे।

(4)


तर्ज-णमोकार णमोकार, महामंत्र णमोकार........
मुनिराज मुनिराज, वीरसागर मुनिराज।
जिनकी शरण में आकर सबके बन जाते हैं काज।।
मुनिराज.।।टेक.।।
सभी शिष्य-शिष्याएँ अपना, सुख-दुख कहते गुरु से।
मंद मंद मुस्कान से गुरुवर हरते सबका दुख थे।।
माता-पिता-बन्धु बनकर वे रखते सबका ख्याल।।मुनिराज.।।१।।

एक बार गुरुवर ने कहा, दो रोग मुझे दुख देते।
नींद व भूख यही दो मुझको, परेशान हैं करते।।
उनकी वाणी सुन शिष्यों ने झुका दिया निज माथ।।मुनिराज.।।२।।

बोले इक दिन सुई का काम करो केची नहिं बनना।
करो सृजन का काम ‘‘चन्दनामती’’ न विघटन करना।।
ऐसे सूत्र वचन से ही वे कहलाये गुरुराज।।मुनिराज.।।३।।

जय बोलिये-आचार्य परमेष्ठी भगवान की जय।

आचार्य श्री वीरसागर गुरुवर्य की जय।

बन्धुओं! आप समझ चुके हैं कि सन् २०११-२०१२ में ‘‘आचार्य श्री वीरसागर वर्ष’’ के माध्यम से आप सभी को उन आचार्यश्री के विषय में कुछ प्रसंग जानने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। यह तो सभी को मालूम है कि जैन समाज की सर्वोच्च साध्वी, सरस्वती की प्रतिमूर्ति, चारित्रचन्द्रिका एवं बीसवीं सदी की प्रथम बालब्रह्मचारिणी आर्यिका परमपूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी सम्पूर्ण जैन समाज को समय-समय पर कोई न कोई महान आयोजन करने की प्रेरणा प्रदान किया करती हैं। इसी शृँखला में उन्होंने अपने गुरुदेव आचार्य श्री वीरसागर महाराज का वर्ष मनाने की प्रेरणा प्रदान की है। इसीलिए अक्टूबर सन् २०११ से २०१२ तक आचार्यश्री के विषय में पूरे देश के अन्दर अनेकानेक कार्यक्रम आयोजित किये गये हैं।

(5)


तर्ज-जपूँ मैं जिनवर जिनवर........
सभी मिल बोलो जय जय, जैन सन्तो की जय जय।
मुक्तिमार्ग के ये ही पथिक हैं सच्चे, मुनिवर सच्चे, गुरुवर सच्चे।।
सभी मिल बोलो जय जय..।।टेक.।।
वीरसिन्धु आचार्य प्रवर थे, रत्नपारखी वे गुरुवर थे।
शिष्यरत्न बनते थे तभी तो उनके, मुनिवर सच्चे, गुरुवर सच्चे।।
सभी मिल बोलो जय जय..।।१।।

घटना है उन्निस सौ छप्पन की, दीक्षा ज्ञानमती जी को दी थी।
अतिशयकारी नाम दिया तब तुमने, मुनिवर तुमने, गुरुवर तुमने।।
सभी मिल बोलो जय जय..।।२।।

नाम ज्ञानमती सार्थक हो गया, रत्नत्रय से युक्त हो गया।
वृद्धि हुई गुरुकुल उपवन की उनसे, गुरुवर तुमसे, मुनिवर तुमसे।।
सभी मिल बोलो जय जय..।।३।।

युग युग कीर्ति बढ़े गुरुवर की, यही ‘चन्दनामति’ है विनती।
हमको भी आशीष मिले गुरु तुमसे, गुरुवर तुमसे, मुनिवर तुमसे।।

सभी मिल बोलो जय जय..।।४।।


(6)


तर्ज-माई रे माई........
श्री आचार्य वीरसागर की, ज्ञानवाटिका प्यारी।
उनके ज्ञान पुष्प से तुम, महका लो अपनी क्यारी।।
जय हो वीर सिन्धु की जय, जय हो वीर सिंधु की जय.।।टेक.।।
सदी बीसवीं के श्री प्रथमाचार्य शान्तिसागर हैं।
उनके प्रथम शिष्य अरु पट्टाचार्य वीरसागर हैं।।
उनकी शिष्या ज्ञानमती जी की, महिमा बड़ी निराली।
उनके ज्ञानपुष्प से तुम, महका लो अपनी क्यारी।।
जय हो वीरसिन्धु की जय........४।।१।।

महाराष्ट्र के वीर ग्राम में, जन्म हुआ था इनका।
शान्तिसिंधु के दर्शन करके धन्य किया तन मन था।।
बाल ब्रह्मचारी यति बनकर, किया तपस्या भारी।
उनके ज्ञान पुष्प से तुम, महका लो अपनी क्यारी।।
जय हो वीरसिन्धु की जय........४।।२।।

शरदपूर्णिमा दो हजार ग्यारह को दीप जलाया।
गणिनी माता ज्ञानमती ने नूतन वर्ष चलाया।।
इसीलिए ‘चन्दनामती’ इस वर्ष की महिमा निराली।
उनके ज्ञान पुष्प से तुम, महका लो अपनी क्यारी।।

जय हो वीरसिन्धु की जय........४।।३।।