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21 फरवरी को मध्यान्ह 1 बजे लखनऊ विश्वविद्यालय में पूज्य गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी का मंगल प्रवचन।

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शांतिसागर परम्परा

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शांतिसागर परम्परा – Shantisaagar Paramparaa.

The tradition of first Digambar Jain Acharya Charitra Chakravarti Shri Shantisaagarji Maharaj of 20th century, the  renovator of Jaina asceticism of new age.
बीसवीं सदी के प्रथम दिगम्बर जैनाचार्य चरित्र चक्रवर्ती श्री शांतिसागर जी महाराज ने चूँकि इस युग में मुनिपरम्परा को पुनः जीवंत कर चतुर्विध संघ परम्परा को 
वृद्धिंगत किया, इसीलिए सम्पूर्ण दिगम्बर जैन समाज उन्हें निर्विवाद रूप से प्रथम चारित्र चक्रवर्ती के रूप में पहचानती है तथा उनकी परम्परा को बीसवीं सदी की 
मूल परम्परा के रूप में माना है | उनके पश्चात् ही अनेक प्रकार की आचार्य परम्परा का भेद पड़ा है (जैसे-अंकलीकर, छाणी इत्यादि) | इस परम्परा के आचार्यो के 
नाम क्रमशः इस प्रकार हैं-आचार्य शांतिसागर जी, आचार्य वीरसागर जी, आचार्य शिवसागर जी, आचार्य धर्मसागर जी, आचार्य अजितसागर जी, आचार्य श्रेयांससागर 
जी, एवं वर्तमान आचर्य अभिनंदन सागर जी | इस नाम से आचार्यश्री कल्याणसागर महाराज के एक प्रसिद्द शिष्य (ई.श. 20-21) भी हुए हैं |