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शाकाहार के लिए सही समझ

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शाकाहार के लिए सही समझ

‘शाकाहार’ का सीधा-सादा अर्थ है जीवन का क्रम जिसमें दूसरों के लिए समुचित आदर और आत्मीय गुँजाइश हो और सब सारा सिर्फ खुदगर्जी या स्वार्थ पर टिका हुआ न हो।

शाकाहार का मतलब सिर्फ भोजन या आहार ही नहीं है वरन् उससे काफी आगे है। इसे माँसाहार के मुकाबले खड़े शब्द के रूप में कभी नहीं लेना चाहिये बल्कि दुनिया को उसकी सही रूप में उससे शक्ल और वास्तविक परिप्रेक्ष्य में देखने/पहनना का आधार इसे मानना चाहिये।

जो लोग शाकाहार को एक संकीर्ण जीवन-दर्शन और माँसाहार/मादक पदार्थों के उपयोग को प्रगतिशील जीवन की अनिवार्यता मानते हैं, उन्हें चाहिए वे तंग नजरिये से थोड़ा हिलें और सोचे कि वे दोनों मात्र आहार पादक ही नहीं है बल्कि दो अलग-अलग जीवन-शैलियों के प्रतीक हैं।

शाकाहार का मतलब है एक सादा सुखद, दूसरी के लिए प्रीतिकार/निरापद जिन्दगी जीना। जीना कुछ इस तरह की कुदरत के चेहरे पर कालिख न आये और जो जीव जन्तु/पेड़ पौधे सदियों से हमारे सह अस्तित्व में हैं उन्हें कोई नुकसान न पहुँचे। यह मानकर चलना कि आदमी चूंँकि ज्ञानी और खोजी है इसलिए उसे इस लोक पर या प्रकृति पर एकाधिकार किया गया है- भ्रामक है। दुनिया में जो/जितनी वस्तुएँ हैं, जिनको लेकर हाथी तक उनमें-से हर एक की अपनी कोई-न-कोई सार्थक भूमिका है। ऐसा संभव ही नहीं है कि प्रकृति अपनी छाती पर फिजुल, निकम्मा और निरर्थक अस्तित्वों का अनावश्यक बोझ ढोती रहे। वह कुली नहीं है, शोषक नहीं है, पोषक है।

यदि हम विकासवाद पर विश्वास करते हैं तो बहुत साफ है कि मनुष्य का विकास इन्हीं जीव-जन्तुओं में-से हुआ है जो आज सहअस्तित्व में हैं तो क्या इन सबके प्रति हमें किसी गहरी कृतज्ञता का अनुभव नहीं करना चाहिए?

और यदि हम यह मानते हैं कि हम सब एक ही पिता की सृष्टि/संतान हैं तो फिर सबके साथ एक व्यापक भाई-चारे का अहसास हम क्यों नहीं करते ? क्यों करते हैं इन पर इतने सारे जुल्म ? क्यों मान रहे हैं इन सबको अपना दुश्मन नं. १।

क्या हम आहार में-से आचार और विचार की जन्म-प्रक्रिया को कभी देख पायेंगे ? क्या हम आने वाली पीढ़ी के लिए सिर्फ अभाव, संत्रास, तनाव, युद्ध, हिंसा तामसिकता, रक्तपात और विषमता विरासत में छोड़ना चाहते हैं? या उसकी झोली में समृद्धि, सुख, संतुलन, शांति, अहिंसा, सामाजिकता, परस्पर प्रीति और समता डालना चाहते हैं ? हमारे इस सवाल में-से ही आवाज अयेगी कि हमें क्या और कैसा खाना चाहिए और क्या औ कैसा नहीं खाना चाहिए ? शाकाहार का मतलब है असल में जीवन के खरे-खोटे/भले-बुरे के लिए सही समझ।

तीर्थंकर, जनवरी २०१५