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शाकाहार बनाम अहिंसकाहार

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शाकाहार बनाम अहिंसक आहार

सारांश

वर्तमान में मूलतया कृषि से उपलब्ध शाकाहार को अहिंसकाहार नहीं माना जा सकता। कृषि कार्य में जुताई, बुवाई, सिंचाई, कटाई तक अनन्त पृथ्वीकायिक, जलकायिक एवं त्रसकायिक जीवों की हिंसा होती है । रासायनिक उर्वरकों से भूमि एवं जल स्रोतों के असंख्य जीव मरते हैं , साथ ही भूमि एवं जलस्रोत प्रदूषित होते हैं। कृषि में बढ़ता हुआ कीटनाशकों का प्रयोग स्पष्टरूपेण संकल्पी हिंसा है क्योंकि कृषक "कीड़े मरें" यह संकल्प करके कीटनाशकों का उपयोग करता है। जैन दर्शन में कृत, कारित, अनुमोदना से कीटनाशकों, रासायनिक उर्वरकों के कारण इस संकल्पी हिंसा का पाप कृषकों के साथ उपभोक्ता श्रावकों एवं मुनियों को भी लगता है। कीटनाशकों से भूमि, जल, वायु प्रदूषण बढ़ रहा है और ये खाद्य, पेय पदार्थों के साथ मानव शरीर में जाकर भयंकर कैंसर जैसे रोग उत्पन्न कर रहे हैं। निस्सन्देह शाकाहार मांसाहार से श्रेष्ठ है, अधिक पोषक है, स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद है किन्तु अहिंसकाहार नहीं है|

यदि हम चाहें तो हिंसाजनित शाकाहार का विकल्प अहिंसकाहार वर्तमान में संभव है । मेरा प्रोजेक्ट ‘‘वनों से भोजन’’ भारत सरकार के प्रौद्योगिकी एवं विज्ञान विभाग से स्वीकृत हुआ था जिस पर स्नेह शर्मा ने शोध करके पी—एच.डी. की है। उपलब्ध समय एवं धनराशि में बीस वन वृक्षों के बीजों का विश्लेषण करके उनमें प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, वसा, खनिज रेशे की मात्रा का आकलन किया गया है। यह पाया गया कि वृक्षों से प्राप्त बीज हमारे अधिकांश खाद्यान्नों से अधिक पौष्टिक हैं। खाद्य बीजों के अलावा वृक्षों से खाद्य फल, फूल, पत्र, औषधियां, अनेक रसायन, वस्त्रों के लिए रेशे, आवास के लिए लकड़ी मिलेगी और वे सभी वस्तुऐं जो जीवन के लिए आवश्यक हैं। खाद्य बीज देने वाले वृक्ष यदि कृषि भूमि में लगा दिए जावें तो प्रतिवर्ष प्रति हेक्टेयर लगभग दो टन बीज उपलब्ध होंगे जबकि कृषि का औसत उत्पादन १.२५ टन प्रति हेक्टेयर प्रतिवर्ष है। वन एक बार लगाने पर चिरन्तर प्राकृतरूप से बने रहे हैं। स्वत: नये पौध पनपते रहते हैं यदि वनों का वैज्ञानिक प्रबन्धन किया जावे। वृक्ष मात्र एक बार ही लगाने होंगे। इसके बाद किसी प्रकार के गड्ढे खोदने, पौधे लगाने, सिंचाई, उर्वरक एवं कीटनाशकों की आवश्यकता नहीं होगी और किसी भी प्रकार की हिंसा नहीं होगी। कृषि की भांति प्रति फसल बार—बार जुताई,बुवाई, सिंचाई आदि पर धन व्यय नहीं करना पड़ेगा। मेरे प्रोजेक्ट का संक्षिप्त परिचय मेरी पुस्तक ‘‘‘Environmental Ethics’’’ में उपलब्ध है।

सव्वे जीवा वि इच्छंति जीविउं ण मरिउं।

तम्हा पाणवहं घोरं, निग्गंथा वयंति णं।।

अर्थात् सभी जीव जीना चाहते हैं, मरना नहीं इसलिए प्राणीवध को घोर पाप कहकर निर्ग्रन्थ (सर्वज्ञ केवली) इसे वर्जित करते हैं। प्राणिवध चाहे एकेन्द्रित जीव का हो या दो इन्द्रिय से लेकर पंचेन्द्रिय जीव का, हिंसा ही है और एकेन्द्रिय का घात कम या छोटी हिंसा और द्वीन्द्रिय से पंचेन्द्रिय की हिंसा क्रमश: अधिक या बड़ी हो, ऐसा भी नहीं है। यह भी एक भ्रान्ति है कि एकेन्द्रिय जीव को उसके वध पर कम कष्ट होगा और द्वीन्द्रिय,त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय और पंचेन्द्रिय को क्रमश: उसी अनुपात में (इन्द्रियों की अधिकता के अनुसार) अधिक कष्ट होगा। जैनागम एवं वैज्ञानिक प्रमाणों के अनुसार जितनी जितनी इन्द्रियाँ कम होंगी शेष उपलब्ध इन्द्रियों की क्षमता उसी अनुपात में अधिक होगी जिससे अनुपलब्ध इन्द्रियों के अभाव में अक्षमता या अपूर्णता नहीं रहती| उदाहरणार्थ चींटी आदि जीवों की घ्राणेन्द्रिय क्षमता चतुरिन्द्रिय से अधिक होती है। जैविक विकास क्रम में जैसे—जैसे अवयवों (इन्द्रियों आदि) की संख्या, विभिन्नता बढ़ती गई वैसे—वैसे कार्य का विभाजन बढ़ता गया। एकेन्द्रिय जीव द्वारा जीवन निर्वाह के सभी कार्य कलाप भोजन ग्रहण, पाचन, ऊर्जा उत्पादन (क्रिया कलापों के लिए), मल निष्कासन, दु:ख— सुख, अनुकूल अनुभूतियाँ उपलब्ध एक इन्द्रिय द्वारा ही सम्पादित होती हैं जो अधिक इन्द्रियों के जीवों में उपलब्ध क्रमश: अधिक दो से पांच इन्द्रियों द्वारा होती है। वनस्पतिकायिक एकेन्द्रिय जीव पेड़ पौधे भी कटु और मधुर शब्दों से दुखी—सुखी होते हैं, मधुर संगीत से उनकी वृद्धि अच्छी होती है। यदि कोई व्यक्ति उनके पास काटने के अभिप्राय से जावे और कोई पानी देने जावे तो पौधों की क्रमश: दुखी और सुखी अनुभूतियाँ विज्ञान द्वारा प्रमाणित हैं। पौधों की जड़ें पोषक तत्वों, जल स्रोतों की पहचान कर, खोज कर उसी दिशा में बढ़ती हैं, संभवता उनकी उपलब्ध एक इन्द्रिय घ्राणेन्द्रिय का भी कार्य कर लेती है। हिंसा के सन्दर्भ में एकेन्द्रिय या पंचेन्द्रिय की हिंसा में कोई भेद नहीं है। जीव मात्र की इकाई कोशिका है जो समानरूप से संवेदनशील है। जीन्स के आधार पर उनके कार्य और कार्य प्रणाली भिन्न होती है।

निस्सन्देह शाकाहार मांसाहार से श्रेष्ठ है। शाकाहार स्वास्थ्य के लिए अधिक लाभप्रद है, अधिक पोषक है, प्राकृतिक और सामाजिक पर्यावरण को सन्तुलित रखने में भी सहायक है, जबकि मांसाहार सभी प्रकार से हानिकारक है। मांसाहार में मूक पशु—पक्षियों के प्रति उनके पालन, आहार, परिवहन और मारने में अत्यधिक क्रूरता अन्तर्निहित है। इसके साथ ही मांसाहारी शाकाहारी से दस गुना वस्तुत: शाकाहार नष्ट करता है। जिन पशु पक्षियों से मांसाहार प्राप्त होता है वे शाकाहार पर ही निर्भर होते हैं। ये पशु जितना शाकाहार खाते हैं उसकी १० प्रतिशत ऊर्जा ही मांस निर्माण में काम आती है शेष उसके हलन—चलन, श्वांस, पाचन आदि क्रियाओं में व्यय हो जाती है। यदि मांसाहारी सीधा शाकाहार ले तो १० प्रतिशत में काम चल जावेगा। मांसाहारियों के लिए पशुओं काे जितना अन्न खिलाया जाता है, उससे सारे विश्व की खाद्य समस्या हल हो सकती है।मांसाहारियों का यह तर्क निराधार है कि मांसाहार बंद करने से पशुओं की संख्या बढ़ जावेगी। प्राकृतिक अवस्था में संख्या नहीं बढ़ती क्योंकि प्रजनन क्रिया प्रकृति में उपलब्ध आहार के अनुरूप नियोजित रहती है जैसा कि जर्मनी में भेड़ियों पर किये वैज्ञानिक प्रयोग से सिद्ध हुआ है। व्यापारिक स्तर पर उत्पादन से ही पशु पक्षियों की संख्या बढ़ती है किन्तु शाकाहार को अहिंसकाहार प्रतिपादित करना तर्क संगत नहीं है। जैनागम में भी सचित्त अर्थात् हरी पत्तियों, कच्चे फल, भूमि खोद कर निकाले कन्द— मूल अभक्ष्य बताए हैं। शाकाहार के नाम पर वनस्पतिकाय के जीवों की निर्मम हिंसा को अपरिहार्य बताने के लिए यह तर्क दिया जाता है कि जल, वायु, पृथ्वी, अग्निकायिक एकेन्द्रिय जीवों की हिंसा से नहीं बचा जा सकता उसी प्रकार वनस्पतिकायिक जीवों की हिंसा से बचना संभव नहीं है। पानी पीने, श्वांस लेने में जलकायिक एवं वायुकायिक जीवों के साथ अन्य सूक्ष्म त्रसकायिक जीवों का घात होता ही है। यह तर्क भी विज्ञानसम्मत नहीं है। वस्तुत: श्वांंस प्रक्रिया में वायुकायिक एवं वायु के साथ सूक्ष्म जीवों का घात नहीं होता क्योंकि शरीर के तापक्रम आदि से ये अप्रभावित रहते हैं उसी प्रकार जिस प्रकार शरीर के बाहर त्वचा पर एवं अन्दर आंतों में असंख्य जीवराशि सहजीवी व्यवस्था से निरन्तर रहती है। आंतों में रहने वाले सूक्ष्म जीव यद्यपि वहां से अपना भोजन लेते हैं तो साथ ही पाचन क्रिया में सहायक भी होते हैं। सूक्ष्म जीवों में अनुकूलन की अपरिमित क्षमता है, कई ज्वालामुखी में और कई शीतकटिबंध में जीवित रहते हैं। इसी सहजीवी व्यवस्था को जैन दर्शन के चिरन्तन सिद्धान्त ‘‘परस्परोपग्रहो जीवानाम्’’ से प्रतिपादित किया है जो पूर्णतया विज्ञानसम्मत है। मधुमक्खी फूलों से शहद निर्माण के लिए रस लेती है और साथ ही परागण में सहायक होती है। जीव जगत में इसके अनेक उदाहरण हैं।इनका विस्तार से वर्णन मेरी पुस्तकद्वय ‘Pristine Jainism‘‘ एवं ‘‘Environmental Ethics‘‘ में उपलब्ध है।२ जैन—दर्शन में जीवो जीवस्य भोजनम् ’’ या ‘‘ जीवो जीवस्य जीवनम् ’’ की हिंसक अवधारणाओं की स्वीकृति नहीं है।

‘‘अहिंसा परमो धर्म:’’ जैन धर्म का मूलभूत सिद्धान्त है। जैनाचार में जीवाणि क्रिया में पानी को कपड़े में छानने के पश्चात् कपड़े को पानी के स्रोत कुएँ , बावड़ी, नदी में पुन: डालकर जो सूक्ष्म जीव कपड़े में रह जाते हैं उन्हें उनके पूर्व पर्यावरण में पहुँचाने का विधान है ताकि वे सभी जीव अपने उपयुक्त वातावरण में सकुशल रह सकें। विभिन्न सूक्ष्म जीव विभिन्न वातारण में सुरक्षित रहते हैं । जैन साधु धूप से छांव तथा छाँव से धूप में आने से पूर्व शरीर को पिच्छी से बुहारते हैं ताकि छाँव के जीव धूप में आने पर और धूप के जीव छाँव में आने पर अपने अनुकूल वातावरण में ही रहें। पारिस्थितिकी विज्ञान के इस सिद्धान्त के ऐसे उदाहरण अन्य किसी आचार संहिता में नहीं मिलते। जैन धर्म के नियम पूर्णरूपेण अहिंसा के लिए समर्पित हैं। जैन साधुओं एवं श्रावकों को मन, वचन और शरीर की प्रत्येक क्रिया सावधानीपूर्वक अहिंसक रूप से करने का विधान है। गमन करते समय इस प्रकार चलें कि मानों खोये बहुमूल्य मोती को ढूंढ रहे हैं। किसी भी वस्तु को एक स्थान से दूसरे स्थान पर रखते समय घसीटा नहीं जावे, वरन् सावधानीपूर्वक उठाकर दूसरी जगह को भली प्रकार देखकर रखें ताकि किसी जीव का हनन न हो। गौतम गणधर ने भगवान महावीर से पूछा :—


कदं चरे ? कदं चिट्ठे ? कहमासे? कहं सए ?

कहँ भुंजंतो भासंतो पावं कम्मं न बंधई ?

अर्थात् किस प्रकार चलें, ठहरें, खाएँ, बोलें, सोएं ताकि पापकर्म का बंध न हो।

भगवान ने बताया :—

जयं चरे, जयं चिट्ठे,जयं सए।

जयं भुंजंतो, भासंतो पावं कम्मं न बंधई।

अर्थात् यत्नपूर्वक चलें, ठहरें, खाएँ, बोलें, सोएं, इससे पापकर्म का बंध नहीं होगा। भगवान ने प्रमाद को पाप का सबसे प्रमुख कारण कहा है। जैन वाङ्गमय में हीनाधिक हिंसक और अहिंसक मनोवृत्तियों और प्रवृत्तियों का विवेचन षट् लेश्याओं के आधार पर बहुत ही सहज, सरल और स्पष्ट रूप से किया गया है। निर्मम अत्यधिक हिंसक को काले रंग कृष्ण लेश्या से अभिव्यक्त किया गया है। क्रमश: कम हिंसक को नील (कबूतर का रंग), पीत (पीला), पद्म से और पूर्ण अहिंसक मनोवृत्ति एवं प्रवृत्ति को शुक्ल लेश्यायुक्त बताया है। इसे विभिन्न मनोवृत्ति एवं प्रवृत्ति वाले व्यक्तियों को वृक्ष से फल लेने के तरीके से समझाया गया है। जो व्यक्ति पेड़ से स्वत: गिरे पके हुए फल ही लेता है वह पूर्ण अहिंसक है अर्थात् उसके शुक्ल (धवल) लेश्या है।दूसरा व्यक्ति जो पेड़ से ही चुन चुन कर केवल पके हुए फल तोड़ता है वह बहुत कम हिंसक है उसके पद्म (कमल वर्ण) लेश्या होती है। तीसरा व्यक्ति छोटी पतली डाली तोड़ता है जिसमें पके, कच्चे दोनों प्रकार के फल आ जाते हैं वह दूसरे से अधिक हिंसक है और उसके नील कापोत लेश्या होती है। पाँचवाँ व्यक्ति प्रमुख बड़ी शाखा तोड़ता है वह बहुत हिंसक है। उसके पीत लेश्या है। चौथा व्यक्ति और बड़ी डाली तोड़ता है। वह और अधिक हिंसक है। और उसके कृष्ण नील है। छठा व्यक्ति घोर हिंसक होकर निर्ममता से पूरा वृक्ष नीचे से ही काट देता है, उसके कृष्ण लेश्या है। इन छ: व्यक्तियों के क्रमश: अधिकाधिक प्रमाद एवं हिंसा की मनोवृत्ति एवं प्रवृत्ति है। इस प्रकार जैन धर्म में पूर्ण रूपेण अहिंसक भाव और क्रिया को ही उपादेय माना है। जैन दर्शन का सम्पूर्ण चिन्तन एवं आचार संहिता का केन्द्र बिन्दु अहिंसा है। इस परिप्रेक्ष्य में शाकाहार को जिसमें वनस्पतिकाय की निर्मम हिंसा हो उसे अहिंसकाहार नहीं कहा जा सकता।

हम यह भूल जाते हैं कि वनस्पतिकाय जीव ही हैं जिनमें सूर्य के प्रकाश के माध्यम से हवा से कार्बनडाइआक्साइड को एवं भूमि से जल एवं जटिल तत्वों को ग्रहण कर उनसे विभिन्न प्रकार के खाद्य फल, फूल, बीज, रंग, रेश, गोंद , औषधियाँ आदि बनाने की क्षमता है। मनुष्य, पशु—पक्षियों एवं विभिन्न जीवों का भोजन वनस्पतिकाय जीव ही बनाते हैं। मांसाहारी भी जिन जीवों पर निर्भर हैं वे अन्ततोगत्वा वनस्पति पर ही निर्भर होते हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण जीव जगत पर वनस्पतिकाय का सर्वाधिक उपकार है। यह एक विडम्बना है कि पशु—पक्षियों की सुरक्षार्थ उनकी हिंसा एवं उत्पीड़न, हिंसा के विरुद्ध विश्व के अधिकांश देशों में कानून है किन्तु वनस्पतिकाय के उत्पीड़न के विरूद्ध कहीं कोई कानून नहीं है। वनस्पतिजगत के प्रति मनुष्य की यह घोर कृतघ्नता ही है। वनस्पतिकायिक जीवों के प्रति उपेक्षा और क्रूरता की पराकाष्ठा है।कई व्यक्ति निष्प्रयोजन निठल्ले बैठे, खड़े व्यर्थ ही दूब या पत्तियाँ तोड़कर उन्हें मसलते रहते हैं। बकरियों के चरवाहे वृक्षों की छोटी टहनियाँ बांस में लगी दरॉती से इतना काटते हैं कि वृक्ष पर एक भी पत्ती नहीं रहती। पत्तियाँ वृक्षों के पाचन, श्वसन आदि के लिए आवश्यक हैं, इनके अभाव में वृक्षों की वृद्धि अवरूद्ध हो जाती है। वृक्षों, पौधों के फूल तोड़ना अत्यधिक प्रचलित है, प्रतिदिन ही देव पूजा और अन्य अधिकांश समारोहों में फूलों की मालाओं, गुलदस्तों, पुष्पवर्षा (जैन मुनियों और समारोहों में भी) प्रचुरता से फूलों का उपयोग किया जाता है। हम यह भूल जाते हैं कि फूलों के बाद ही फल बनते हैं अत: फूल तोड़ना वनस्पति जीवों की भ्रूण हत्या है।फूलों के अभाव में उन पर निर्भर कीट—पतंगे भी नष्ट हो जाते हैं जिन पर हमारी अधिकांश कृषि उपज, तिलहन, धान्य एवं फलों की उपज पर निर्भर हैं क्योंकि ये परागण में सहायक होते हैं । प्रयोगों से यह सिद्ध हुआ है कि किसी खेत या उद्यान में मधु मक्खी पालन किया जावे तो उपज में २५ प्रतिशत और इससे भी अधिक वृद्धि हो जाती है। वनस्पतिकायिक जीवों का मनुष्य एवं अन्य जीवों पर अत्यधिक उपकार है अत: पशु क्रूरतानिवारण कानूनों की भाँति वनस्पतिकाय के प्रति क्रूरतानिवारण कानून भी बनने चाहिए।

वर्तमान में शाकाहार का जिस प्रकार उत्पादन एवं प्रयोग किया जाता है उसमें वनस्पतिकाय के साथ पृथ्वीकाय, जलकाय और त्रस जीवों की अपरिमित हिंसा अवश्यम्भावी है। कृषि के लिए भूमि तैयार करने में पृथ्वीकाय के असंख्य त्रस जीवों का घात होता है। रासायनिक ऊर्वरकों से कृषि के लिए ही उपयोगी अवशिष्ट सूक्ष्म जीवाणु भी नष्ट हो जाते हैं। सिंचाई की विभिन्न पद्धतियों में जलकायिक और त्रस जीवों की विराधना होती है। कीटनाशकों में प्रत्यक्षत: संकल्पी हिंसा ही है, क्योंकि कृषक कीड़े मारने के संकल्प से ही इनका प्रयोग करता है। कृत, कारित, अनुमोदन से कृषि उपज खाने वाले श्रावकों एवं मुनियों को भी इस संकल्पी हिंसा का दोष लगता ही है। कीटनाशकों के बढ़ते एवं अनियन्त्रित प्रयोग से उपयोगी कीट—पतंगों एवं पशु—पक्षियों का घात होता है और कई प्रजातियाँ लुप्त हो गई हैं एवं शेष तीव्रता से लुप्त हो रही हैं। भोजन के माध्यम से कीटनाशक मनुष्यों के शरीर में आ रहे हैं जिसके फलस्वरूप कैंसर, हृदय रोग आदि प्राणघातक रोगों का प्रकोप बढ़ रहा है। रासायनिक ऊर्वरकों एवं कीटनाशकों के कारण भूमि, जल एवं वायु का प्रदूषण भी निरन्तर बढ़ रहा है और इसके कारण अनेक रोग बढ़ रहे हैं।

इस सबका यह अर्थ नहीं है कि अहिंसकाहार संभव ही नहीं है। हमारे परम हितोपदेशी तीर्थंकर भगवंतों ने अहिंसा को जैनधर्म का सर्वोत्कृष्ट सिद्धान्त बताया है तो अहिंसकाहार का भी उपदेश दिया है। इसके लिए जैन वाङ्गमय के त्रिलोकसार,तिलोयपण्णति आदि ग्रन्थों में विस्तार से उल्लेखित काल—परावर्तन के परिप्रेक्ष्य में समझना होगा।कालचक्र अनादि अनन्त है जो अनवरत प्रवाहित है।प्रत्येक काल—चक्र में अवसर्पिणी—उत्सर्पिणी का क्रम होता है। अवसर्पिणी में प्रथम सुखमा—सुखमा फिर क्रमश: सुखमा,सुखमा दुखमा, दुखमा सुखमा, दुखमा और दुखमा—दुखमा के छ: काल खंडों में अत्यधिक सुखद काल से क्रमश: कम सुखद और निरन्तर बढ़ते दु:ख के काल खंड़ों में अवनति का क्रम है। उत्सर्पिणी में यह क्रम अत्यधिक दु:खद काल से क्रमश: कम दु:खद रूप उन्नति का क्रम होता है जो अनादि से चल रहा है। सुखमा—सुखमा काल में सभी घटक प्राकृतिक वायु, जल,पृथ्वी, छोटे—बड़े सभी जीव, मनुष्य भी पूर्णरूपेण सहजीवी व्यवस्था में रहते हैं। कोई किसी को किसी प्रकार की हानि नहीं पहुँचाते सारी व्यवस्था पूर्णरूपेण अहिंसक होती है। अहिंसकाहार कल्प वृक्षों से उनके द्वारा स्वत: गिराए फल—फूलों से उपलब्ध होता है। आयु पूर्ण किये वृक्षों की सूखी लकड़ी ही आवास, पात्र आदि के निर्माण में प्रयुक्त होती है। कल्पवृक्षों के सम्बन्ध में यदि वैज्ञानिक दृष्टि से विश्लेषण किया जावे तो यह स्पष्ट होगा कि उनसे बनी बनाई रोटी, सब्जी, कपड़े आदि नहीं मिलते थे वरन् इनके लिए आवश्यक सामग्री मिलती थी। विभिन्न दस प्रकार के वृक्ष (कल्पवृक्ष) जिनमें कई खाद्य सामग्री, कई पेय, कई आवास निर्माण के लिए उपयुक्त लकड़ी एवं अन्य विभिन्न प्रकार की सामग्री तेल, प्रकाशकीय पदार्थों, अनेक प्रकार के रसायन, वस्त्रों के लिए रेशे रंग, औषधियाँ आदि देने वाले वृक्ष वर्तमान् में हीनाधिक मात्रा में अवशिष्ट वन प्रान्तरों में उपलब्ध हैं। इसके अतिरिक्त कल्पवृक्षों पर नवीन कोपलों , फूलों आदि का शास्त्रों में वर्णन यह स्पष्ट करता है कि कल्पवृक्ष पृथ्वीकायिक नहीं थे, वरन् वनस्पतिकायिक ही थे और पाषाणयुगीन सभ्यता में उन्हें उपमा—उपमेय ही अलंकारिक साहित्यिक भाषा में पृथ्वीकायिक बना दिया गया |

काल परावर्तन में प्रथम सुखमा—सुखमा काल से द्वितीय सुखमा काल में कल्पवृक्षों (वस्तुत: वृक्ष ही, कल्पवृक्ष संज्ञा उनके उपकार के कारण ही) की संख्या कम हो गई और आगे आगे के काल खंडों में क्रमश: बढ़ती जनसंख्या और उपभोगवाद के कारण अधिकाधिक कम होती गई और उसी अनुपात में सुख कम होता गया, दु:ख बढ़ता गया। यह क्रम आज भी प्रत्यक्ष प्रमाणित है। विगत् पाँच दशकों में जनसंख्या विस्फोट और बढ़ती उपभोक्ता संस्कृति के कारण वन क्षेत्र तीव्र गति से कम हुए और अवशिष्ट वनों में भी घनत्व अर्थात् प्रतिहेक्टर वृक्षों की संख्या कम हुई है। चतुर्थ दुखमा—सुखमा काल में कल्पवृक्ष बहुत कम रह गए थे और खाद्यान्न के लिए कृषि का अाविर्भाव हुआ। आदि तीर्थंकर ऋषभदेव पर कृषि का उपदेश आरोपित किया जाता है जो उचित प्रतीत नहीं होता। आदिनाथ तो अहिंसा धर्म के प्रथम उद्घोषक एवं अहिंसा के स्वयं साक्षात् मूर्तिमान प्रतीक थे। वे अपरिमित हिंसा के कारण कृषि का उपदेश कदापि नहीं दे सकते जबकि विगत शताब्दी के पंडित दौलतराम जी ने अपनी सुप्रसिद्ध आध्यात्मिक रचना छहढ़ाला में कृषि को हेय माना है :—

‘‘‘देय न उपदेश, होय अध बनज कृषि से ।’’

‘‘कर प्रमाद जल, भूमि, वृक्ष, पावक न विराधे।’’
असि, धन, हल हिंसोपकरण नहिं दे यश लाधे।।

वैदिक साहित्य यजुर्वेद, मनुस्मृति आदि में भी कृषि को हेय माना है :—

‘‘‘ वैश्यकृत्यादि जीवंस्तु ब्राह्मण: क्षत्रियोऽपि वा।

हिंसा प्रायां पराधीन: कृषिं यत्मेन वर्जयेत।।
कृषिं साध्विति मन्यन्ते सा वृत्ति: सद्विगर्हितो।
भूमिं भूमिशयांश्चैव हान्ति काष्ठ मयोमुख।।

अर्थात् वैश्यवृति से जीते हुए भी ब्राह्मण और क्षत्रिय बहुत हिंसा वाली पराधीन (वर्षा आदि पर निर्भर) खेती को यत्न से छोड़ दें। खेती अच्छी है ऐसा लोग कहते हैं परन्तु सत्पुरुषों द्वारा इसलिए निन्दित है कि किसान का लोहा लगा हुआ हल भूमि में रहने वालों का नाश कर देता है और क्योंकि धान्य की खेती से वनों का नाश हो जाता है, पशुओं के चरागाह नष्ट हो जाते हैं। वन वृक्षों से जो शीतलता प्राप्त होती है वह नहीं रहती। इस शीतलता के अभाव में वर्षा कम हो जाती है और प्राणनाशक वायु (कार्बनडाइऑक्साइड आदि) के बढ़ने से वायु जहरीली हो जाती है और नाना प्रकार की बीमारियाँ पैदा हो जाती हैं। अवर्षण से भूमि नीरस हो जाती है .........।

‘‘बहृन्नमकृषिवलम’’

अर्थात् वन वृक्षों से बिना खेती के बहुत सा अन्न अर्थात् मनुष्य के आहार की उत्पत्ति होती है।

‘‘स्वादो: फलस्य जग्ध्वाय’’'

अर्थात् मोक्षमार्गी को सुस्वादु फलों का आहार करना चाहिए।

‘‘पुष्प—मूल— फलैर्वापि केवलैर्वतैयेत्सदा।

काल पक्वै: स्वयं शीर्णर्वैरवानसमेत स्थित:।।

अर्थात् पुष्प—मूल अथवा काल पाकर पके स्वयं टपके फलों से वानप्रस्थी निर्वाह करे। वाल्मीकि रामायण में राम के फलाहार पर ही रहने का उल्लेख है:—

‘‘कुशचीरा जिन धरं फल मूलाशनं च माम् ।’’'

अर्थात् मैं कुशचीर पहने हुए .... केवल फल—फूल खाकर ही रहता हूँ । ऐसा ही भरत, लक्ष्मण, सीता के लिए भी उल्लेख है। वैज्ञानिकों के अनुसार कृषि का आविर्भाव या आविष्कार लगभग दस हजार वर्ष पूर्व ही हुआ। इसके पूर्व मनुष्य का आहार वनों से प्राप्त फलफूल ही थे। यह अवधारणा कि प्रारम्भ में मानव मांसाहारी था।नितान्त निराधार है। जीवों के विकास के क्रम में चिम्पेंजी आदि के बाद उन्हीं से सम्बद्ध श्रेणी में मानव का विकास हुआ। मनुष्य के अवयव पैर, आँतें, दांत आदि इन्हीं शाकाहारी प्राणियों के समान हैं। शिकार के लिए आवश्यक हथियारों (प्रारम्भ में पत्थरों से ही) के निर्माण की बुद्धि मनुष्य में उसके उद्भव के बहुत समय बाद ही आई जिस प्रकार पहिए आदि के निर्माण के लिए। मनुष्य के दांत, नख आदि भी मांसाहारी सिंह आदि की भांति बिना शस्त्र के शिकार करने के उपयुक्त नहीं थे। जनसंख्या कम थी और पृथ्वी पर सर्वत्र सघन वन क्षेत्र थे जिनसे प्रचुर मात्रा में स्वत: गिरे फल—फूल आहार के लिए पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध थे। मनुष्य किसी जलस्रोत नदी, नाले, झील आदि के पास वनों से प्राप्त स्वत: गिरी सूखी लकड़ी एवं सूखे घास आदि से बनाए आवासों में रहते थे। वे सुविधानुसार प्रात: या सायंकाल समीप के वनों से स्वत: गिरे फल—फूल और सूखे घास के बीज गेहूँ, जौ आदि एकत्र कर आहार जुटाते थे। एक व्यक्ति से वनों से एकत्र किए विभिन्न घासों के कतिपय सूखे बीज वर्षा ऋतु से पूर्व अनायास उसकी कुटिया के बाहर बिखर गये बीज प्रस्फुटित होकर पौधे बन गए हैं। उसने इनके बीजों को इकट्ठा किया और सोचा कि वनों में घूम फिर कर परिश्रम से खाद्य फल—फूल—बीज लाने से तो अच्छा है कि एक ही जगह बीज बिखेर दिए जावें और फिर वर्षा ऋतु के पश्चात् पकने एवं सूखने पर संग्रह कर लिए जावें । कृषि का इस प्रकार अनायास आविर्भाव, आविष्कार हुआ। परिश्रम से बचने के लिए प्रमादवश कई इसे अपनाते गए। इनमें एक बड़ा समुदाय बन गया जो सुर या देव कहलाए। ‘सुर’ शब्द ‘सु’ धातु से बना है जिसमें क्रिया (कृषि क्रिया) अभीप्सित है। फिर भी एक समुदाय दृढ़ प्रतिज्ञ था कि प्रकृति प्रदत्त वनों का संरक्षण किया जावे और उससे उपलब्ध सामग्री से ही जीवन निर्वाह किया जावे। ये राक्षस कहलाए। ‘राक्षस’ शब्द ‘रक्षा’ से बना है। ये वनों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध रहे। विशाल पौराणिक साहित्य सुर—असुर, देव राक्षस संग्राम से भरा पड़ा है। सुर चुपचाप वनों को काटकर जलाकर नष्ट करके भूमि को कृषि योग्य बना देते थे। राक्षसों को विवश अवशिष्ट वन—प्रान्तरों में पीछे हटना पड़ता था। यद्यपि वे सुरों से अधिक शक्तिशाली, समृद्ध एवं सुसंस्कृत थे, किन्तु सुरों (देवों) के छल—कपट से वे पीछे हटते गए, हारते गए और एक प्रकृतिवादी आदर्श सभ्यता नष्ट हो गई। इसके बाद विशाल वन क्षेत्र कृषि भूमि के लिए नष्ट किए गए। महाभारत का खाण्डवदाह इसी का ज्वलन्त उदाहरण है। वर्तमान में गत् सदी तक विश्व में लगभग सर्वत्र वनों को नष्ट कर भूमि को कृषि योग्य बनाने के लिए अनेक प्रलोभन दिये जाते थे। वनों के विनाश से प्रगट दुष्परिणामों के कारण अभी कुछ दशकों से इस पर रोक लगाने के प्रयास किये जा रहे हैं, लेकिन जनसंख्या की अनियन्त्रित अतिवृद्धि के कारण कठोर कानूनों की भी धज्जी उड़ाते हुए वन—क्षेत्रों में काफी अतिक्रमण हो रहे हैं जिन्हें वोट—बैंक की विवशता में कालान्तर में नियमित किया जा रहा है।

ऋषभदेव का उत्कृष्ट व्यक्तित्व अत्यधिक प्रभावी था । भीषण युद्धों से संत्रस्त देव और राक्षसों में उनके समझाने से समझौता हुआ होगा जिसके अनुसार कृषि और वानिकी साथ—साथ की जा सकती थी। वृक्षों की कतारें इस प्रकार दिशा में लगाई गई कि उनकी छाया से कृषि—उपज पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। इस व्यवस्था के प्रमाण हड़प्पा—मोहनजोदड़ो क्षेत्रों के सेटेलाइट चित्रों में भी मिले हैं। यह कृषिवानिकी पद्धति आधुनिक वैज्ञानिक—प्रबन्धन में द्वितीय विश्व—युद्ध के समय भारत में प्रचलित हुई जिसे टोंग्या पद्धति कहा गया और इसे वानिकी महाविद्यालयों के पाठ्यक्रम में भी सम्मिलित किया गया । ब्रिटिश शासन में विश्व युद्ध के समय वनों से उनकी क्षमता से अधिक लकड़ी निकाली गई और उसकी क्षति पूर्ति के लिए वृक्षारोपण की आवश्यकता थी, किन्तु शासन के पास इसके लिए आर्थिक संसाधन नहीं थे अत: वनक्षेत्रों में भूमिहीन व्यक्तियों को कृषि के लिए भूमि इस शर्त पर दी गई कि वे १०—१५ फीट के फासले पर वृक्षों के पौधे लगाएंगे जो उन्हें वन विभाग से दिये जावेंगे। पाँच—छ: वर्ष में जब पौधे बड़े होकर छाया करने लगे तो अन्य स्थान पर इसी शर्त पर कृषि की अनुमति क्रमश: दी गई। इसी पद्धति से बिना किसी व्यय के सफल वृक्षारोपण वृहत् क्षेत्र में हो गया, ऐसा अच्छा जो अब करोड़ों की राशि में भी नहीं हो पा रहा है। यह पचास के दशक के अन्त तक रहा । बाद मेंं स्वार्थी नेताओं ने भूमिहीन कृषकों को उकसाया और टीनेन्सी और राजस्व एक्ट्स के प्रावधानों के अन्तर्गत वनभूमि पर स्वामित्व दिलाने लगे। वन विभाग को विवश इसे बंद करना पड़ा।

जैन वाङ्गमय में काल परावर्तन का जो विशद विवरण मिलता है उसमें यह उल्लेख विशेष रूप से विचारणीय है कि कुछ क्षेत्र जिन्हें विदेह क्षेत्र कहा गया है और उनके अलग अलग नाम भी दिये गये हैं, इनमें काल परावर्तन नहीं होता, कहीं सुखमा तो कहीं सुखमा—दुखमा रूप ही प्रवर्तता रहता है। वैज्ञानिक अवधारणा में ये कहीं सुदूर ऐसे पृथ्वी—साम्य ग्रह होंगे जहां जीवन है, मानवीय सभ्यताएं हैं। यह बिन्दु महत्वपूर्ण है कि काल—परावर्तन सुखमा—सुखमा रूप नहीं वरन् इससे अवनत स्थितियों सुखमा या सुखमा—दुखमा रूप है। इसका स्पष्ट अर्थ है कि वहां के निवासियों ने कल्पवृक्षों आदि प्राकृतिक संसाधनों की बढ़ती कमी के अनुपात में अवनति पर विचार कर उनके संरक्षण को जनसंख्या और उपयोग को उनकी नैसर्गिक क्षमता के अनुरूप करके सुनिश्चित किया। इससे अवनति का क्रम अवसर्पिणी परावर्तन रूक गया। जिस प्रकार मशीनों, भारवाहक पशुओं की अपनी—अपनी क्षमताएं होती है और इनकी क्षमता से अधिक भार डालने पर नुकसान होता है उसी प्रकार वनों, नदियों, झीलों, वायु आदि की भी क्षमताएं हैं। क्षमता की सीमा में ही भार डाला जावे इनका दोहन किया जावे तो ये यथावत सुव्यवस्थित, प्रदूषणविहीन बने रहते हैं। कुछेक उदाहरणों से यह स्पष्ट हो जावेगा कम हार्स पावर से अधिक हार्स पावर की क्षमता अधिक होती है। घोड़े से ऊँट की ऊँट से हाथी की भार वाहन क्षमता अधिक है। किन्तु यदि क्षमता से अधिक होती है किन्तु यदि क्षमता से अधिक भार डालें तो इनको हानि होगी। किसी घास के मैदान की क्षमता एक गाय, किसी की दो गाय प्रति एकड़ चराने की क्षमता है और यदि इससे अधिक गाय या अन्य मवेशी चराई जावे तो घास के मैदान (चरागाह) से घास नष्ट हो जावेगी। एक भैंस का भार दो गायों के बराबर होता है। किसी वन खंड की क्षमता उसमें छोटे—बड़े विभिन्न प्रजातियों की वार्षिक वृद्धि की सीमा में होती है।यदि वन खंड के सभी वृक्षों की लकड़ी का घनफल दस हजार वर्ग फीट है और वार्षिक वृद्धि सौ घन फीट है तो इतनी ही (सौ घन फीट ही) लकड़ी प्रतिवर्ष निकाली जावे तो वन—खण्ड की स्थिति यथावत बनी रहेगी, किसी प्रकार का घन ह्रास नहीं होगा, उसी प्रकार जैसे बैंक में जमा राशि का यदि केवल ब्याज ही निकाला जावे । सभी प्राकृतिक घटकों, भूमि, वायु, जल आदि स्रोतों की क्षमताएं मापने व जानने की वैज्ञानिक विधियाँ उपलब्ध हैं किन्तु उनका अनुपालन नहीं हो रहा है। सभी संसाधनों पर भार क्षमता से कई गुना है और निरन्तर बढ़ रहा है।

जैनागम में प्रतिपादित उत्सर्पिणी—अवसर्पिणी काल— परावर्तन का ही रूपान्तर वनस्पति विज्ञान में सक्सेशन एवं रिट्रोग्रेशन की प्राकृतिक प्रक्रिया है। उदाहरणार्थ उष्ण कटिबन्ध क्षेत्र में किसी नदी प्रवाह के मार्ग बदलने पर रिक्त भूमि पर पशु—पक्षियों, वायु आदि द्वारा लाए विभिन्न बीजों में सर्वप्रथम साधारण घास ही आवेगी जिससे पारिस्थितिकी का सुधार होगा, भूमि किंचित् उर्वरा बनेगी। फिर छोटी झाड़ियाँ, फिर बबूल जैसे वृक्ष पनपेंगे, यद्यपि बीज अन्य कई वृक्ष प्रजातियों के भी लाए जा रहे हैं। पारिस्थितिकी के क्रमश: सुधार से इसके बाद शीशम, सिरस आदि वृक्ष और बाद में सागवान जैसे वृक्ष पनप सकेंगे। यदि मानवीय हस्तक्षेप नहीं हो तो वानस्पतिक विकास क्रम में अन्तत: आम जामुन जैसे वृक्ष पनपेंगे। इस प्रकार उत्तरोत्तर विकास—क्रम में पूर्व—पूर्व की प्रजातियाँ क्रमश: कम होकर लुप्त होती रहती हैं। इसे सक्सेशन कहते हैं। चरम विकास की अवस्था को क्लाइमेक्स कहते हैं । इस अवस्था में आगे परिवर्तन नहीं होता और इसी रूप रहती है। यदि मानवीय हस्तक्षेप से कटाई, चराई, आग आदि होती है तो उनकी अधिकता के अनुरूप मन्द तीव्र गति से क्षरण प्रारंभ हो जाता है, चरण क्लाइमेक्स से क्रमश: नीचे की अवस्था आने लगती है और अन्तत: भूमि वनस्पतिविहीन हो जाती है। इसे रिट्रोग्रेशन कहते हैं। सक्सेशन (विकास) और रिट्रोग्रेशन (पतन) को स्थिति के अनुरूप प्रबन्धन से किसी भी स्तर पर रोका जा सकता है। वानिकी में सागवान विकास क्रम में क्लाइमेक्स से नीचे के अन्तर की प्रजाति है और चरम विकास (क्लाइमेक्स) की प्रजातियों से मूल्यवान है अत: नियन्त्रित कर काल—परावर्तन को नियन्त्रित करना निश्चितरूपेण संभव है। विदेह—क्षेत्रों में इसी सिद्धान्त के अनुसार काल—परावर्तन पर नियन्त्रण संभव हुआ होगा। इस पृथ्वी पर भी यदि इस सिद्धान्त का अनुपालन किया जावे तो वर्तमान दुखमा—सुखमा, सुखमा—दुखमा, सुखमा,सुखमा—सुखमा की स्थिति भी लाई जा सकती है। यह मात्र परिकल्पना नहीं है, विज्ञान—सम्मत प्रक्रिया है।

सुखमा—सुखमा और सुखमा काल—खण्डों में मानव समुदाय पूर्णरूपेण कल्पवृक्षों अर्थात् वनों पर ही निर्भर रहता था । सभी आवश्यकताएं विभिन्न प्रजातियों के वृक्षों से उपलब्ध विभिन्न पदार्थों से पूरी होती थीं। मनुष्य की आवश्यकता की ऐसी कोई वस्तु नहीं है जो वनों से उपलब्ध नहीं हो सकती। वर्तमान् में भी यह संभव है। प्रथम टोंग्या पद्धति से कृषि—वानिक प्रारम्भ की जावे। जब तक वृक्ष बड़े होकर फल—फूल—बीज, आदि नहीं देने लगें तब तक कृषि उपज से काम चलाया जाता रहे। पांच— छ: या अधिकतम दस वर्षों में वृक्ष उपज देने लगेगें फिर कृषि बंद कर दी जावे। वन एक बार सुस्थापित होने पर बिना किसी मानवीय श्रम एवं धन के चिरकालीन यथावत् रहते हैं, यदि उनका क्षमता के अनुरूप ही दोहन किया जावे। किसी भी प्रकार की भूमि की क्रिया (हल चलाना आदि) नहीं करनी पड़ती, चूहे आदि जीव भूमि को उलट—पुलट करते रहते हैं। पशु —पक्षी विभिन्न प्रजातियों के बीज बिखेरते रहेगें। सिंचाई की कोई आवश्यकता नहीं होती क्योंकि जल—संरक्षण के लिये वृक्षों से अधिक सक्षम और सस्ता वस्तुत: नि:शुल्क अन्य कोई उपक्रम नहीं है, प्रयोगों से यह प्रमाणित किया गया है कि सघन वन—क्षेत्र में वर्षा का ९९ प्रतिशत से अधिक पानी वहीं रुक जाता है, सोख लिया जाता है, जिससे भूमिगत जलाशय परिपूर्ण रहते हैं। मात्र एक प्रतिशत पानी ही बहता है जिससे वर्षाकाल में विनाशकारी बाढ़ों का प्रकोप समाप्त हो जाता है। इसके विपरीत वृक्षविहीन भूमि में वर्षा का ९९ प्रतिशत जल बह जाता है और मात्र एक प्रतिशत ही रुक पाता है जिससे वर्षाकाल में विनाशकारी बाढ़ें आती हैं और फिर जलस्रोत नदी, नाले वर्ष भर सूखे रहते हैं। वनों में किसी प्रकार के ऊर्वरकों की आवश्यकता नहीं होती, निरन्तर गिरती पत्तियों , टहनियों से उत्तम ऊर्वरक सदैव उपलब्ध रहता है। चूंकि वन क्षेत्रों में विभिन्न प्रजातियाँ एक साथ होती है और उन पर रहने वाले कीड़े भी विभिन्न प्रकार के होते हैं अत: प्राकृतिक संतुलन रहता है। किसी भी प्रकार का कीटों का प्रकोप नहीं होता अत: कीटनाशकों की आवश्यकता नहीं होती। वनों (कल्पवृक्षों) पर आधारित जीवन—शैली में किसी भी प्रकार की हिंसा, प्रदूषण या क्षरण नहीं होता। पूर्णरूपेण सहजीवी— सहयोगी व्यवस्था रहती है। सभी जीव परस्पर सहयोगी—सहजीवी रहकर ‘‘परस्परोपग्रहोजीवानाम्’’ चिरन्तन सूत्र की सार्थकता को प्रतिपादित करते हैं । मनुष्य भी स्वत: गिरे फलों को खाकर उनके बीजों को बिखेर कर वृक्षों की सहायता करते हैं। वनों पर आधारित जीवनशैली में किसी प्रकार का श्रम या धन का व्यय नहीं होता।

आधुनिक कृषि में जुताई,बुवाई, सिंचाई, खाद एवं कीटनाशकों से अत्यधिक हिंसा होती है, प्रदूषण बढ़ रहा है, क्षरण हो रहा है। कृषि की लागत इतनी बढ़ गई है और निरन्तर बढ़ रही है कि अरबों रुपयों के अनुदान की बैसाखी पर ही चल पा रही है। कृषक आत्महत्या भी कर रहे हैं। मेरा प्रोजेक्ट वनों से भोजन भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग से स्वीकृत हुआ था और उस पर स्नेह शर्मा ने पी.एच.डी. की है। इसके अन्तर्गत वनों के वृक्षों के खाद्य बीजों की पौष्टिकता (उपलब्ध प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, वसा, रेशे, खनिज तत्व) का आकलन किया गया। स्वीकृत धन राशि एवं निर्धारित समय सीमा में बीस प्रकार के वृक्षों के बीजों का विश्लेषण किया जा सका जिनकी पौष्टिकता कृषि से प्राप्त अनाजों, दालों से अधिक पाई गई। वनों से औसत २ से ५ टन पौष्टिक खाद्य बीज प्रति हेक्टर प्रतिवर्ष बिना किसी श्रम एवं धन के व्यय के उपलब्ध हो जाते हैं, खाद्य, फल, फूल, पत्ते आदि इसके अतिरिक्त हैं। वनों से खाद्य सामग्री के अतिरिक्त आवासीय लकड़ी, औषधीय सामग्री एवं अनेक रसायन भी उपलब्ध होते हैं जिन पर आधारित लघु—वृहत् उद्योग चल सकते हैं। यदि अहिंसकाहार ही अभीप्सित है तो कल्पवृक्षों (वनों) पर आधारित जीवन—शैली अपनाना आवश्यक है। यह संभव है और इसी में प्राणी—मात्र का हित अन्तर्निहित है।

सन्दर्भ स्थल:—

१. समणसुत्तं, गाथा १४८, सर्व सेवा संघ प्रकाशन, राजघाट, वाराणसी, सन् १९७५।

२. पुस्तक द्वय—

१..Pristine Jainism by S.M.Jain, Parshvanath Vidyaprrth] Varanasi, 2003,

२. Envronmentel Ethics by S.M. Jain] Prakrit Bharati Academy, Jaipur, 2006,

३. महावीर — गौतम संवाद

४. वही

५. छहढ़ाला , कविवर दौलतराम, ढाल ४, छंद २।

६. वही, ढाल ६, छंद १२

७. मनुस्मृति, १०/८३—८४

८. ऋग्वेद, १०/१४६/६

९. वही, १०/१४६/५

१०. मनु स्मृति, ६/२१

११. वाल्मीकि रामायण, अयोध्याकांड, ५०/४४

१२. वही,५०,३१/२६, २७/१६

१३. तत्वार्थसूत्र, अध्याय— ५,सूत्र—२१

सूरजमल जैन
अर्हत् वचन जुलाई—सितम्बर—२००७ पेज न. २३-३२