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21 फरवरी को मध्यान्ह 1 बजे लखनऊ विश्वविद्यालय में पूज्य गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी का मंगल प्रवचन।

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शास्त्रोक्त आर्यिका चर्या एवं गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी

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शास्त्रोक्त आर्यिका चर्या एवं गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी

प्रस्तुति -स्वस्तिश्री कर्मयोगी पीठाधीश रवीन्द्रकीर्ति स्वामी जी

इस कर्मयुग के प्रारंभ में जिस प्रकार से तीर्थंकर आदिनाथ ने दीक्षा लेकर मुनि परम्परा को प्रारंभ किया, उसी प्रकार उनकी पुत्री ब्राह्मी-सुन्दरी ने दीक्षा लेकर आर्यिका परम्परा का शुभारंभ किया है। विंâवदन्ती में ऐसा लोग कह देते हैं कि भगवान् आदिनाथ को अपने दामाद के समक्ष मस्तक झुकाना पड़ता इसीलिए उनकी कन्याओं ने विवाह बंधन ठुकरा कर दीक्षा धारण की थी किन्तु यह बात कुछ युक्तिसंगत नहीं प्रतीत होती है, न ही इतिहास इस तथ्य को स्वीकार करता है। तीर्थंकर की तो प्रत्येक क्रिया ही अद्वितीय होती हैै। वे शैशव अवस्था से ही अपने माता-पिता एवं दिगम्बर मुनि को भी नमस्कार नहीं करते हैं, इसमें उनका अहंकार नहीं, बल्कि तीर्थंकर पदवी का माहात्म्य प्रगट होता है। माता-पिता या दिगम्बर मुनिराज उनकी इस क्रिया का प्रतिरोध भी नहीं करते हैं प्रत्युत् तीर्थंकर के पुण्य की सराहना करते हैं।
कहने का तात्पर्य यह है कि ब्राह्मी-सुन्दरी कन्याओं ने उत्कट वैराग्य भावना से आर्यिका दीक्षा धारण की थी तथा हजारों आर्यिकाओं में ब्राह्मी माता ने प्रधान ‘गणिनी’ पद को प्राप्त किया था। ‘सार्वभौम जैनधर्म प्राणिमात्र का हित करने वाला है’ यह सोचकर हृदय में संसार समुद्र से पार होने की भावना को लेकर कोई महिला पहले साधु संघ में प्रवेश करती है पुन: उसके वैराग्य भावों में वृद्धि प्रारंभ होती है। चतुर्विध संघ के नायक आचार्य उसे समुचित शिक्षाएँ प्रदान कर संघ की प्रमुख आर्यिका या गणिनी के सुपुर्द कर देते हैं क्योंकि आर्यिकाएँ ही महिलाओं की सुरक्षा एवं पोषण कर सकती हैं।
जिस प्रकार से मूल-जड़ के बिना वृक्ष नहीं ठहरता, मूल-नींव के बिना मकान नहीं बनता, उसी प्रकार मूल-प्रधान आचरण के बिना श्रावक और साधु दोनों की सार्थकता नहीं होती है। यहाँ पर आर्यिकाओं की चर्या का प्रकरण चल रहा है अत: उनके मूलगुणों का ही कथन किया जा रहा है।
मुख्यरूप से मुनियों के मूलगुण २८ होते हैं। जैसा कि प्रतिक्रमण पाठ में स्थान-स्थान पर कथन आता है-


वदसमिदिंदिय रोधो, लोचो आवासयमचेलमण्हाणं।

खिदिसयणमदंतवणं, ठिदिभोयणमेगभत्तं च।।१।।

एदे खलु मूलगुणा, समणाणं जिणवरेहिं पण्णत्ता।

एत्थ पमादकदादो, अइचारादो णियत्तो हं।।२।।


पाँच महाव्रत, पाँच समिति, पाँच इन्द्रियनिरोध, षट् आवश्यक- क्रिया, लोच, आचेलक्य, अस्नान, क्षितिशयन, अदन्तधावन, स्थितिभोजन और एकभक्त ये २८ मूलगुणों के नाम हैं। इन्हें तीर्थंकर आदि महापुरुष भी मुनि अवस्था में पालन करते हैं एवं ये स्वयं महान हैं अत: इन व्रतों को महाव्रत भी कहते हैं।
आर्यिकाओं के ये २८ मूलगुण वैसे होते हैं? इस बात का खुलासा परमपूज्य गणिनी आर्यिकारत्न श्री ज्ञानमती माताजी द्वारा लिखित ‘आर्यिका’ नामक पुस्तक में है। यथा-
प्रायश्चित्त ग्रंथ में आर्यिकाओं के लिए आज्ञा प्रदान की है कि ‘‘आर्यिकाओं को अपने पहनने के लिए दो साड़ी रखना चाहिए। इन दो वस्त्रों के सिवाय तीसरा वस्त्र रखने पर उनके लिए प्रायश्चित्त होता है।’’
इन दो वस्त्रों का ऐसा मतलब है कि दो साड़ी लगभग १६-१६ हाथ की रहती हैं। एक बार में एक ही पहनना होता है, दूसरी धोकर सुखा देती हैं जो कि द्वितीय दिवस बदली जाती है। सोलह हाथ की साड़ी के विषय में आगम में कहीं वर्णन नहीं आता है, मात्र गुरु परम्परा से यह व्यवस्था चली आ रही है, आगम में तो केवल दो साड़ी मात्र का उपदेश है।
चारित्रचक्रवर्ती आचार्य श्री शांतिसागर महाराज के प्रथम पट्टशिष्य आचार्य श्री वीरसागर महाराज (ज्ञानमती माताजी के दीक्षा गुरु) कहते थे कि दो साड़ी रखने से आर्यिका का ‘आचेलक्य’ नामक मूलगुण कम नहीं होता है किन्तु उनके लिए आगम की आज्ञा होने से यही मूलगुण है। हाँ! तृतीय साड़ी यदि कोई आर्यिका रखती है, तो उसके मूलगुण में दोष अवश्य आता है। इसी प्रकार से ‘स्थितिभोजन’ मूलगुण में मुनिराज खड़े होकर आहार करते हैं और आर्यिकाओं को बैठकर आहार लेना होता है, यह भी शास्त्र की आज्ञा होने से उनका मूलगुण ही है। यदि कोई आर्यिका आगमाज्ञा उलंघन कर खड़ी होकर आहार ले लेवे तो अवश्य उसका मूलगुण भंग होता हैै। इसीलिए उनके भी अट्ठाईस मूलगुण मानने में कोई बाधा नहीं है। यही कारण है कि आर्यिकाओं को उपचार से महाव्रती संज्ञा दी गई है।
प्रायश्चित्त ग्रंथ में भी आर्यिकाओं को मुनियों के बराबर प्रायश्चित्त का विधान है तथा क्षुल्लक आदि को उनसे आधा इत्यादि रूप से है-


साधूनां यद्वदुद्दिष्टमेवमार्यागणस्य च

दिनस्थान त्रिकालोनं प्रायश्चित्तं समुच्यते।।११४।।


जैसा प्रायश्चित्त साधुओं के लिए कहा गया है, वैसा ही आर्यिकाओं के लिए कहा गया है। विशेष इतना है कि दिन, प्रतिमा, त्रिकालयोग चकार शब्द से अथवा अन्य ग्रंथों के अनुसार पर्यायच्छेद (दीक्षा छेद) मूलस्थान तथा परिहार ये प्रायश्चित्त भी आर्यिकाओं के लिए नहीं हैं।
आर्यिकाओं के लिए दीक्षाविधि भी अलग से नहीं है। मुनिदीक्षा विधि से ही उन्हें दीक्षा दी जाती है।
इन सभी कारणों से स्पष्ट है कि आर्यिकाओं के व्रत, चर्या आदि मुनियों के सदृश हैं।
मुनियों के समान ही ये आर्यिकाएं श्रावक के घर में करपात्र में आहार ग्रहण करती हैं उसके पश्चात् श्रावक इनके कमण्डलु में गरम जल भर देते हैं। बिना गरम किया हुआ कच्चा जल वे नहीं छूती हैं। श्राविकाएँ या तो छने जल से इनकी साड़ी धोकर सुखा देती हैं अथवा ये स्वयं कमण्डलु के जल से साड़ी धोकर सुखा सकती हैं। आर्यिकाएं साबुन आदि का प्रयोग नहीं कर सकती हैं। वे दो, तीन या चार महीने में अपने सिर के बालों का लोंच करती हैं। मुनियों की वसतिका में आर्यिकाओं का रहना, लेटना, बैठना आदि वर्जित है।
आर्यिकाएँ अपनी आवश्यक क्रियाओं का पालन करते हुए शेष समय निरन्तर शास्त्र स्वाध्याय, अध्ययन-अध्यापन में लगाती हैं। वे सूत्र ग्रंथों का भी अध्ययन कर सकती हैं। जैसा कि आचार्य श्री कुन्दकुन्द स्वामी ने मूलाचार ग्रंथ में स्पष्ट किया है-
‘अस्वाध्याय काल में मुनि और आर्यिकाओं को सूत्रग्रंथों का अध्ययन नहीं करना चाहिए किन्तु साधारण अन्य ग्रंथ अस्वाध्याय काल में भी पढ़ सकते हैं।’ इससे यह बात सिद्ध हो जाती है कि आर्यिकाएँ भी स्वाध्यायकाल में सिद्धांत ग्रंथों को पढ़ सकती हैं।
दूसरी बात यह है कि आर्यिकाएँ द्वादशांग श्रुत के अन्तर्गत ग्यारह अंगों को भी धारण कर सकती हैं, जैसा कि हरिवंशपुराण में कथन आया है-


द्वादशांगधरो जात: क्षिप्रं मेघेश्वरो गणी।

एकादशांगभृज्जाता सार्यिकापि सुलोचना।।


अर्थात् मेघेश्वर जयकुमार शीघ्र ही द्वादशांग के पाठी होकर भगवान के गणधर हो गये और आर्यिका सुलोचना भी ग्यारह अंगों की धारक हो गर्इं।
वर्तमान में दिगम्बर सम्प्रदाय में ग्यारह अंग और चौदह पूर्व की उपलब्धि नहीं है, उनका अंश मात्र उपलब्ध है अत: उन्हीं का अध्ययन करना चाहिए।
वर्तमान की आर्यिकाएँ-प्राचीनकाल में जैसे आर्यिकाएं, आचार्यों के संघ में भी रहती थीं और पृथक् भी आर्यिका संघ बनाकर विचरण करती थीं, उसी प्रकार वर्तमान में भी आचार्य श्री अभिनंदनसागर महाराज, आचार्य श्री वर्धमानसागर जी महाराज आदि बड़े-बड़े संघों में भी आर्यिकाएँ-क्षुल्लिकाएँ रहती हैं तथा गणिनी आर्यिका श्री ज्ञानमती माताजी, गणिनी आर्यिका श्री सुपाश्र्वमती माताजी, गणिनी आर्यिका श्री विशुद्धमती माताजी आदि अनेकों विदुषी आर्यिकाएँ अपने-अपने पृथक् संघों के साथ भी विचरण करती हुई धर्म की ध्वजा फहरा रही हैं।
गणिनी आर्यिका श्री ज्ञानमती माताजी वर्तमान में समस्त आर्यिकाओं में सर्वप्राचीन दीक्षित सबसे बड़ी आर्यिका हैं, जिन्होंने चारित्रचक्रवर्ती आचार्य श्री शांतिसागर महाराज के दर्शन कर उनकी आज्ञा से उनके प्रथम पट्टशिष्य आचार्य श्री वीरसागर महाराज के करकमलों से आर्यिका दीक्षा धारण कर ‘ज्ञानमती’ इस सार्थक नाम को प्राप्त किया है तथा शताब्दी के प्रथम आचार्य से लेकर अद्यावधि समस्त आचार्यों से अनुभव ज्ञान प्राप्त किया है।
आर्यिकाओं की उत्कृष्ट चर्या चतुर्थकाल में ब्राह्मी, चंदना आदि माताएँ पालन करती थीं तथा पंचमकाल के अंत तक भी ऐसी चर्या का पालन करने वाली आर्यिका होती रहेंगी। जब पंचमकाल के अन्त में वीरांगज नाम के मुनिराज, सर्वश्री नाम की आर्यिका, अग्निदत्त श्रावक और पंगुश्री श्राविका इस प्रकार चतुर्विध संघ होगा, तब कल्की द्वारा मुनिराज के आहार का प्रथम ग्रास टैक्स के रूप में मांगने पर अन्तराय करके चतुर्विध संघ सल्लेखना धारण कर लेगा, तभी धर्म, अग्नि और राजा तीनों का अन्त हो जायेगा। अत: भगवान महावीर के शासन में आज तक अक्षुण्ण जैनशासन चला आ रहा है। मुनि- आर्यिकाओं की परम्परा भी इसी प्रकार से पंचमकाल के अन्त तक चलती रहेगी, इसमें कोई संदेह नहीं है ।