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21 फरवरी को मध्यान्ह 1 बजे लखनऊ विश्वविद्यालय में पूज्य गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी का मंगल प्रवचन।

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शीतलनाथ विधान

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श्री शीतलनाथ विधान

मंगलाचरण

-अनुष्टुप् छंद-
शीतलेश! नमस्तुभ्यं, वचस्ते सर्वतापहृत्।
श्रीमत् शीतलनाथाय, शीतीभूताय देहिनाम्।।१।।
-इंद्रवङ्काा छंद-
संसारदावाग्निषु दग्धजीवा:, शीतीभवन्त्याश्रयतस्तवैव।
श्रीशीतलेशो भुवनत्रयेश:, शीतं मनो मे कुरु वाक्सुधाभि:।।२।।
श्री शीतलजिनस्तवनम्—
न शीतलाश्चन्दन—चन्द्र रश्मयो।
न गाङ्गमम्भो न च हार—यष्टय:।
यथा मुनेस्तेऽनघ वाक्य—रश्मय:।
शमाऽम्बु—गर्भा: शिशिरा विपश्चितां।।३।।
सुखाऽभिलाषाऽनल—दाह—र्मूिच्छतं।
मनो निजं ज्ञानमयाऽमृताम्बुभि:।
व्यदिध्यपस्त्वं विष—दाह—मोहितं—
यथा भिषग्—मन्त्र—गुणै: स्व—ाqवग्रहम्।।४।।
त्वमुत्तम—ज्योतिरज: क्व निर्वृत:
क्व ते परे बुद्धि—लवोद्धव—क्षता:।
तत: स्व नि:श्रेयस—भावना—परै—
र्बुधप्रवेवैर्âिजन! शीतलेऽड्यसे१।।५।।
श्री शीतलजिन स्तोत्र
यदि किसी तरह से हे शीतल! शशि किरण सदृश तव वचन मिले।
भव आतप से झुलसे प्राणी, के तत्क्षण ही मन कुमुद खिले।।
फव्वारागृह अमृतवाणी, मलयाचल चंदन भी फिर क्या ?
त्रिभुवन दुख दाव शांत करते, शीतल तव वचन अहो फिर क्या?।।१।।
वह भद्रपुरी प्रभु जन्म लिया, जग भद्रकरी सुर पूज्य हुई।
दृढ़रथ नरनाथ सुनंदा भी, सुरवंद्य प्रजा भी धन्य हुई।।
वदि चैत्र अष्टमी गर्भ बसे, वदि बारस माघ सुजन्मे थे।
शुभ माघ वदी बारस के प्रभु, दीक्षा ले वन—वन घूमे थे।।२।।
वदि पौष चतुर्दशि केवल रवि, किरणों ने जगत प्रकाश किया।
आश्विन सित अष्टमि के प्रभु ने, वर मुक्ति नगर का राज्य लिया।।
सम्मेदशिखर है पूज्य धाम, शीतल प्रभु शीतल कृत जग में।
सबसे शीतल है स्वात्मधाम, उसमें ही आप विराज रहे।।३।।
इक्ष्वाकु वंश कनकाभतनु, श्रीवृक्ष चिन्ह से जाने सब।
तनु तुंग तीन सौ साठ हाथ, आयु इक लक्ष वर्ष पूरब।।
शीतल प्रभु तुमको नमूं सदा, मेरे मन को शीतल करिए।
भव—भव में भक्ति रहे तुझमें, बस मुझ पर कृपा दृष्टि धरिये।।४।।
।।अथ जिनयज्ञप्रतिज्ञापनाय मंडलस्योपरि पुष्पांजलिं क्षिपेत्।।
त्वमुत्तम—ज्योतिरज: क्व निर्वृत:
क्व ते परे बुद्धि—लवोद्धव—क्षता:।
तत: स्व नि:श्रेयस—भावना—परै—
र्बुधप्रवेवैर्âिजन! शीतलेऽड्यसे१।।५।।
श्री शीतलजिन स्तोत्र
यदि किसी तरह से हे शीतल! शशि किरण सदृश तव वचन मिले।
भव आतप से झुलसे प्राणी, के तत्क्षण ही मन कुमुद खिले।।
फव्वारागृह अमृतवाणी, मलयाचल चंदन भी फिर क्या ?
त्रिभुवन दुख दाव शांत करते, शीतल तव वचन अहो फिर क्या?।।१।।
वह भद्रपुरी प्रभु जन्म लिया, जग भद्रकरी सुर पूज्य हुई।
दृढ़रथ नरनाथ सुनंदा भी, सुरवंद्य प्रजा भी धन्य हुई।।
वदि चैत्र अष्टमी गर्भ बसे, वदि बारस माघ सुजन्मे थे।
शुभ माघ वदी बारस के प्रभु, दीक्षा ले वन—वन घूमे थे।।२।।
वदि पौष चतुर्दशि केवल रवि, किरणों ने जगत प्रकाश किया।
आश्विन सित अष्टमि के प्रभु ने, वर मुक्ति नगर का राज्य लिया।।
सम्मेदशिखर है पूज्य धाम, शीतल प्रभु शीतल कृत जग में।
सबसे शीतल है स्वात्मधाम, उसमें ही आप विराज रहे।।३।।
इक्ष्वाकु वंश कनकाभतनु, श्रीवृक्ष चिन्ह से जाने सब।
तनु तुंग तीन सौ साठ हाथ, आयु इक लक्ष वर्ष पूरब।।
शीतल प्रभु तुमको नमूं सदा, मेरे मन को शीतल करिए।
भव—भव में भक्ति रहे तुझमें, बस मुझ पर कृपा दृष्टि धरिये।।४।।
।।अथ जिनयज्ञप्रतिज्ञापनाय मंडलस्योपरि पुष्पांजलिं क्षिपेत्।।
पूजा नं. १
अर्हंत पूजा
स्थापना—गीता छंद
अरिहंत प्रभु ने घातिया को घात निज सुख पा लिया।
छ्यालीस गुण के नाथ अठरह दोष का सब क्षय किया।।
शत इंद्र नित पूजें उन्हें गणधर मुनी वंदन करें।
हम भी प्रभो! तुम अर्चना के हेतु अभिनन्दन करें।।१।।
ॐ ह्रीं अर्हन् नम: हे अर्हत्परमेष्ठिन्! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननं।
ॐ ह्रीं अर्हन् नम: हे अर्हत्परमेष्ठिन्! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनं।
ॐ ह्रीं अर्हन् नम: हे अर्हत्परमेष्ठिन्! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणं।
—बसन्ततिलका छंद—
श्रीमज्जिनेंद्र पद में जलधार देऊं।
आतंक पंक जग का सब दूर होवे।।
इच्छानुसार फलदायक कल्पतरू ये।
पूजा जिनेन्द्रप्रभु की त्रय ताप नाशे।।१।।
ॐ ह्रीं अर्हन् नम: परमेष्ठिभ्य: स्वाहा। (जलं निर्वपामीति स्वाहा।)
काश्मीरि केशर सुचंदन को घिसाउँâ।
चर्चूं जिनेन्द्र पदपंकज में रुचि से।।
संसार के सकल ताप विनाश करती।
पूजा जिनेन्द्र प्रभु की सब सौख्य देती।।२।।
ॐ ह्रीं अर्हन् नम: परमात्मकेभ्य: चंदनं ... ।
जो वुंâदपुष्प कलियों सम दीखते हैं।
धोये सु तंदुल लिये भर थाल में हैं।।
अर्हंत सन्मुख रखूँ बहु पुंज नीके।
पाथेय मोक्षपथ में जन के लिये हो।।३।।
ॐ ह्रीं अर्हन् नम: अनादिनिधनेभ्य: अक्षतं ... ।
मल्ली गुलाब वर पुष्प सुगंधि करते।
अर्हंत के चरण में रुचि से चढ़ाउँâ।।
पापान्धवूâप मधि डूब रहे जनों को।
उद्धार हेतु जिनपूजन ही जगत् में।।४।।
ॐ ह्रीं अर्हन् नम: सर्वनृसुरासुरपूजितेभ्य: पुष्पं ... ।
शालीय ओदन सुगंधित भोज्यवस्तू।
पीयूष तुल्य चरु लेकर थाल भरके।।
अर्हंत सन्मुख चढ़ा क्षुध व्याधि नाशूँ।
तृप्ती अनंत जिनपूजन से मिलेगी।।५।।
ॐ ह्रीं अर्हन् नम: अनंतज्ञानेभ्य: नैवेद्यं ... ।
जो चित्त का तमसमूह विनाश करके।
त्रैलोक्यगेह वर दीपक दीप ज्योति।।
ले दीप आरति करूँ वरज्ञानज्योति।
पाउँâ अनंत निजज्ञान विकास करके।।६।।
ॐ ह्रीं अर्हन् नम: अनंतदर्शनेभ्य: दीपं ... ।
जो धूप सुन्दर सुगंध बिखेरती है।
अग्नी विषे जलत धूम्र उड़ावती है।।
खेऊं दशांगवर धूप जिनेन्द्र आगे।
संपूर्ण पाप जलते वर सौख्य होगा।।७।।
ॐ ह्रीं अर्हन् नम: अनंतवीर्येभ्य: धूपं ... ।
ये कल्पवृक्ष फल सम अति मिष्ट ताजे।
अमृत समान रस से परिपूर्ण दीखें।।
पूजा करूँ फल चढ़ाकर आपकी मैं।
स्वात्मैक सिद्धि फल प्राप्त करूँ इसी से।।८।।
ॐ ह्रीं अर्हन् नम: अनंतसौख्येभ्य: फलं ... ।
नीरादि आठ वर द्रव्य संजोय करके।
घंटा ध्वजा चंवर छत्र सुदर्पणादी।।
मांगल्य द्रव्य शुभ लेकर पूजते ही।
संपूर्ण मंगल मिले निज सौख्य पाउँâ।।९।।
ॐ ह्रीं अर्हन् नम: परममंगलेभ्य: अर्घ्यं ... ।
श्रीपूज्यपाद जिन के चरणाब्ज नमते।
संपूर्ण इंद्र शिर से अतिभक्ति भावे।।
श्री पूज्य के पदनिकट जलधार देते।
हो शांति लोक त्रय में मुझ भक्त को भी।।१०।।
ॐ ह्रीं अर्हन् नम: स्वस्ति भद्रं भवतु जगतां शांतये शांतिधारां निष्पादयामि शांतिकृद्भ्य: स्वाहा।
(शांतिधारा करें)
जो इन्द्र भक्ति वश नेत्र हजार करके।
बाहू हजार कर तांडव नृत्य करता।।
ऐसे जिनेन्द्रपद पुष्प चढ़ाय करके।
पूजा त्रिकाल कर अनुपम सौख्य पाउँâ।।११।।
ॐ ह्रीं अर्हन् नम: ध्यातृभि: अभीप्सितफलदेभ्य: स्वाहा।
(पुष्पांजलि चढ़ावें)
जाप्य मंत्र—ॐ ह्रीं अर्हं अर्हत्परमेष्ठिभ्यो नम:।
जयमाला
—दोहा—
श्री अरिहंत जिनेन्द्र का, धरूँ हृदय में ध्यान।
गाउँâ गुणमणिमालिका, हरूँ सकल अपध्यान।।१।।
—शम्भु छंद—
जय जय प्रभु तीर्थंकर जिनवर, तुम समवसरण में राज रहे।
जय जय अर्हंत् लक्ष्मी पाकर, निज आत्मा में ही आप रहे।।
जन्मत ही दश अतिशय होते, तन में न पसेव न मल आदी।
पयसम सित रुधिर सु समचतुष्क, संस्थान संहनन है आदी।।१।।
अतिशय सुरूप, सुरभित तनु हैं, शुभ लक्षण सहस आठ सौ हैं।
अतुलित बल प्रियहित वचन प्रभो, ये दश अतिशय जन मन मोहें।।
केवल रवि प्रगटित होते ही, दश अतिशय अद्भुत ही मानों।
चारों दिश इक-इक योजन तक, सुभिक्ष रहे यह सरधानो।।२।।
हो गगन गमन नहिं प्राणीवध, नहिं भोजन नहिं उपसर्ग तुम्हें।
चउमुख दीखें सब विद्यापति, नहिं छाया नहिं टिमकार तुम्हें।।
नहिं नख औ केश बढ़े प्रभु के, ये दश अतिशय सुखकारी हैं।
सुरकृत चौदह अतिशय मनहर, जो भव्यों को हितकारी हैं।।३।।
सर्वार्ध मागधीया भाषा, सब प्राणी मैत्री भाव धरें।
सब ऋतु के फल औ पूâल खिलें, दर्पणवत् भूरत्नाभ धरें।।
अनुवूâल सुगंधित पवन चले, सब जन मन परमानंद भरें।
रजवंâटक विरहित भूमि स्वच्छ, गंधोदक वृष्टी देव करें।।४।।
प्रभु पद तल कमल खिलें सुन्दर, शाली आदिक बहु धान्य फलें।
निर्मल आकाश दिशा निर्मल, सुरगण मिल जय जयकार करें।।
अरिहंत देव का श्रीविहार, वर धर्मचक्र चलता आगे।
वसु मंगल द्रव्य रहें आगे, यह विभव मिला जग के त्यागे।।५।।
तरुवर अशोक सुरपुष्प वृष्टि, दिव्यध्वनि चौंसठ चमर कहें।
सिंहासन भामंडल सुरकृत, दुंदुभि छत्रत्रय शोभ रहें।।
ये प्रातिहार्य हैं आठ कहे, औ दर्शन ज्ञान सौख्य वीरज।
ये चार अनंत चतुष्टय हैं, सब मिलकर छ्यालिस गुण कीरत।।६।।
क्षुध तृषा जन्म मरणादि दोष, अठदश विरहित निर्दोष हुए।
चउ घाति घात नवलब्धि पाय, सर्वज्ञ प्रभू सुखपोष हुए।।
द्वादशगण के भवि असंख्यात, तुम धुनि सुन हर्षित होते हैं।
सम्यक्त्व सलिल को पाकर के, भव भव के कलिमल धोते हैं।।७।।
मैं भी भवदु:ख से घबड़ा कर, अब आप शरण में आया हूँ।
सम्यक्त्व रतन नहिं लुट जावे, बस यही प्रार्थना लाया हूँ।।
संयम की हो पूर्ती भगवन्! औ मरण समाधी पूर्वक हो।
हो केवल ‘ज्ञानमती’ सिद्धी, जो सर्व गुणों की पूरक हो।।८।।
ॐ ह्रीं णमो अरिहंताणं अर्हत्परमेष्ठिभ्य: जयमाला महाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।
शांतये शांतिधारा, पुष्पांजलि:।
—दोहा—
मोह अरी को हन हुए, त्रिभुवन पूजा योग्य।
नमो नमो अरिहंत को, पाउँâ सौख्य मनोज्ञ।।१।।
।।इत्याशीर्वाद:।।
तीर्थंकर श्री शीतलनाथ जिनपूजा
-अथ स्थापना (शंभुछंद)-
हे शीतल तीर्थंकर भगवन्! त्रिभुवन में शीतलता कीजे।
मानस शारीरिक आगंतुक, त्रय ताप दूर कर सुख दीजे।।
चारण ऋद्धीधारी ऋषिगण, निज हृदय कमल में ध्याते हैं।
हम भी प्रभु का आह्वानन कर, सम्यक्त्व सुधारस पाते हैं।।
ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथतीर्थंकर! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननं।
ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथतीर्थंकर! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनं।
ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथतीर्थंकर! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणं।
-अथ अष्टवंâ (शंभु छंद)-
भर जावे पूरा त्रिभुवन भी, प्रभु इतना नीर पिया मैंने।
फिर भी नहिं प्यास बुझी अब तक, इसलिए नीर से पूजूँ मैं।।
हे शीतल तीर्थंकर! तुमको, पूजत मन शीतल हो जावे।
वच शीतल हों सब व्याधि नशें, तनु में शीतलता आ जावे।।१।।
ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।
प्रभु त्रिभुवन में भी घूम घूम, शीतलता चाही चंदन से।
प्रभु अब शीतलता होवेगी, चंदन तुम पद में चर्चन से।।हे.।।२।।
ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय संसारतापविनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा।
त्रिभुवन में सब पद प्राप्त किया, वे खंड खंड हो बिखर गये।
अक्षत से पूजूँ पद पंकज, हो मुझ अखंड पद इसीलिए।।हे.।।३।।
ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा।
तुम कीर्ति सुगंधी त्रिभुवन में, प्रभु पैâल रही गणधर गायें।
इसलिए सुगंधित कुसुम लिये, तुमपद पूजें निज यश पायें।।हे.।।४।।
ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।
प्रभु तीनलोक से अधिक अन्न, पकवान खा चुका मैं जग में।
फिर भी नहिं भूख मिटी इनसे, अतएव चरू से पूजूँ मैं।।हे.।।५।।
ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।
अज्ञान अंधेरा त्रिभुवन में, नहिं देख सका निज आत्मा को।
इसलिए दीप से मैं पूजूँ, निज ज्ञान ज्योति मुझ प्रगटित हो।।हे.।।६।।
ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय मोहांधकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
ये कर्म त्रिजग में दु:ख देते, इनको अब शीघ्र जलाने को।
मैं धूप अग्नि में खेऊँ अब, प्रभु पूजा यश पैâलाने को।।हे.।।७।।
ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
नानाविध फल की प्राप्ति हेतु, मैं घूम चुका प्रभु त्रिभुवन में।
अब एक मोक्ष फल प्राप्ति हेतु, फल मधुर चढ़ाऊँ तुम पद में।।हे.।।८।।
ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।
निज आत्मनिधी को भूल गया, बस मूल्य विषय सुख का आंका।
वर ‘ज्ञानमती’ हित अघ्र्य चढ़ाकर, प्रभु पाऊँ रत्नत्रय सांचा।।हे.।।९।।
ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अनघ्र्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
-दोहा-
प्रभु त्रयधारा करूँ, त्रिभुवन शांती हेतु।
शीतल जिन की भक्ति है, भवि को भवदधि सेतु।।१०।।
शांतये शांतिधारा।
शीतल जिन पदकमल में, पुष्पांजलि विकिरंत।
तिहुंजग यश विस्तार के, त्रिभुवन सौख्य भरंत।।११।।
दिव्य पुष्पांजलि:।
पंचकल्याणक अघ्र्य
-गीता छंद-
शीतल प्रभू अच्युत सुरग से, भद्रिकापुरि आ गये।
दृढ़रथ पिता माता सुनंदा, के गरभ में आ गये।।
तिथि चैत्र कृष्णा अष्टमी, धनपति रतन बरसा रहा।
इन्द्रादि गर्भोत्सव किया, पूजत गरभ के दुख दहा।।१।।
ॐ ह्रीं चैत्रकृष्णाअष्टम्यां श्रीशीतलनाथतीर्थंकरगर्भकल्याणकाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
तिथि माघ कृष्णा द्वादशी, प्रभु जन्मते बाजे बजे।
देवों के आसन वंâप उठे, सुर इन्द्र थे हर्षित तबे।।
सुरशैल पर पांडुकशिला पे, जन्म अभिषव था हुआ।
जिन जन्म कल्याणक जजत, मेरा जनम पावन हुआ।।२।।
ॐ ह्रीं माघकृष्णाद्वादश्यां श्रीशीतलनाथतीर्थंकरजन्मकल्याणकाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
हिमनाश देखा नाथ के, मन में विरक्ती छा गई।
वदि माघ बारस पालकी, शुक्रप्रभा तब आ गई।।
सुरपति सहेतुक बाग में, लेकर गये प्रभु चौक पे।
सिद्धं नम: कह लोच कर, दीक्षा ग्रही पूजूँ अबे।।३।।
ॐ ह्रीं माघकृष्णाद्वादश्यां श्रीशीतलनाथतीर्थंकरदीक्षाकल्याणकाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
तिथि पौष वदि चौदश जिनेश्वर, शुक्ल ध्यानी हो गये।
तब बेलतरु तल मेें त्रिलोकी, सूर्य केवल पा गये।।
सुंदर समवसृति में अधर, तिष्ठे असंख्यों भव्य को।
संबोध वचपीयूष से, तारा जजूँ जिनसूर्य को।।४।।
ॐ ह्रीं पौषकृष्णाचतुर्दश्यां श्रीशीतलनाथतीर्थंकरकेवलज्ञानकल्याणकाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
आश्विन सुदी अष्टम तिथी, सम्मेदगिरि पे जा बसे।
इक सहस साधू साथ ले, मुक्तीनगर में जा बसे।।
अतिशय अतीन्द्रिय सौख्य, परमानंद अमृत पा लिया।
शीतल प्रभू का मोक्षकल्याणक, जजत निजसुख लिया।।५।।
ॐ ह्रीं आश्विनशुक्लाअष्टम्यां श्रीशीतलनाथतीर्थंकरमोक्षकल्याणकाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
-पूर्णाघ्र्य (दोहा)-
शीतल तीर्थंकर प्रभो! आप त्रिजग के नाथ।
मन-वच-तन शीतल करो, जजूँ नमाकर माथ।।६।।
ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथतीर्थंकरपंचकल्याणकाय पूर्णाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।
शांतये शांतिधारा, दिव्य पुष्पांजलि:।
श्री शीतलनाथ दिव्यध्वनि वाणी के अघ्र्य
(५६ अघ्र्य)
—दोहा—
चौबीसों तीर्थेश की, द्वादशांगमय वाणि।
दिव्यध्वनी है एक सम, अतिशय जगकल्याणि।।१।।
शीतल जिनवर के वचन, द्वादशांगमय शीत।
पुष्पांजलि कर पूजहूँ, कोटि नमूं धर प्रीत।।२।।
।।इति मंडलस्योपरि पुष्पांजलिं क्षिपेत्।।
अथ प्रथमदले पुष्पांजलि:
—चौपाई-
मुनियों के आचार प्रधान, उनका पूरण करे बखान।
करो यत्नपूर्वक सब क्रिया, जिससे मिले शीघ्र शिवप्रिया।।
—दोहा—
पद हैं आचारांग में, अठरह सहस प्रमाण।
शीतल जिनवर वचन को, जजत सौख्य निर्वाण।।१।।
ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथमुखकमलविनिर्गत-आचारांगाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
—चौपाई-
स्वसमय परसमयों को कहे, स्त्री के लक्षण वरणये।
सूत्रकृतांग दूसरा अंग, इसको नमत मिले सुख संग।।
—दोहा—
इसी दूसरे अंग में, पद छत्तीस हजार।
शीतल जिनवर वचन को, जजत समय का सार।।२।।
ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथमुखकमलविनिर्गतसूत्रकृतांगाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
—चौपाई-
जीव और पुद्गल के भेद, एक दोय त्रय आदि अनेक।
वर्णे स्थानांग सदैव, पूजत मिले ज्ञान स्वयमेव।।
—दोहा—
तीजे स्थानांग में, पद ब्यालीस हजार।
शीतल जिनवर वचन को, जजत स्वात्मनिधि सार।।३।।
ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथमुखकमलविनिर्गतस्थानांगाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
—चौपाई-
द्रव्य अपेक्षा रहें समान, उसे कहें समवाय सुमान।
क्षेत्र काल अरु भाव समान, इनका भी यह करे बखान।।
—दोहा—
एक लाख चौंसठ सहस, पद इसके हैं जान।
पूजत ही जिनके सदृश, मिलता स्वात्म निधान।।४।।
ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथमुखकमलविनिर्गतसमवायांगाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
—चौपाई-
जीव अस्ति या नास्ती आदि, साठ हजार प्रश्न इत्यादि।
इनका उत्तर देवे नित्य, व्याख्या प्रज्ञप्ती वह सिद्ध।।
—दोहा—
पद माने दो लाख अरु, अट्ठाईस हजार।
वसुविध अर्घ चढ़ाय हूँ, मिले सुगुण भंडार।।५।।
ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथमुखकमलविनिर्गतव्याख्याप्रज्ञप्ति-अंगाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
—चौपाई-
तीर्थंकर की धर्म कथादि, दिव्यध्वनि से वर्णे सादि।
त्रय संध्या में खिरती ध्वनी, संशय आदि दोष को हनी।।
—दोहा—
पांच लाख छप्पन सहस, पद हैं इसमें जान।
नाथ१ धर्म-कथांग यह, जजूँ इसे गुणखान।।६।।
ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथमुखकमलविनिर्गत-नाथधर्मकथांगाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
—चौपाई-
पाक्षिक नैष्ठिक साधक भेद, श्रावक के प्रतिमादि अनेक।
इनका वर्णन करे अमंद, सो उपासकाध्ययन सुअंग।।
—दोहा—
ग्यारह लख सत्तर सहस, पद हैं इसमें सिद्ध।
जो पूजें नित भाव से, वे पद लहें अनिंद्य।।७।।
ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथमुखकमलविनिर्गत-उपासकाध्ययनांगाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
प्रति तीर्थंकर तीरथकाल, दश दश मुनि निज आत्म संभाल।
घोर घोर उपसर्ग सहंत, केवलि हो निर्वाण लहंत।।
—दोहा—
अन्त:कृत दश नाम यह, अंग जजूँ धर नेह।
तेइस लख अठवीस सहस, पद से यह वर्णेय।।८।।
ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथमुखकमलविनिर्गत-अंत:कृतदशांगाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
—चौपाई-
चौबिस तीर्थंकर का तीर्थ, उनमें हो दश दश मुनि ईश।
घोरोपसर्ग सहनकर मरे, अनुत्तर में इन्द्र अवतरे।।
—दोहा—
अनुत्तरौपपादिक दशं, अंग जजूँ सुखकार।
पद हैं बानवे लाख अरु, चव्वालीस हजार।।९।।
ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथमुखकमलविनिर्गत—अनुत्तरौपपादिकदशांगाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
—चौपाई-
आक्षेपिणि विक्षेपिणि तथा, संवेदनि निर्वेदनि कथा।
नष्ट मुष्टि चिंतादिक प्रश्न, वर्णन करता है यह अंग।।
—दोहा—
इसमें पद तिरानवे, लाख व सोल हजार।
प्रश्न व्याकरण अंग को, जजूँ मिले सुखकार।।१०।।
ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथमुखकमलविनिर्गतप्रश्नव्याकरणांगाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
—चौपाई-
शुभ अरु अशुभ कर्मफल पाक, वर्णन करता अंग विपाक।
द्रव्य क्षेत्र काल अरु भाव, इनके आश्रय कहे स्वभाव।।
—दोहा—
इस विपाक सूत्रांग में, पद हैं एक करोड़।
लाख चुरासी भी कहें, जजूँ सदा कर जोड़।।११।।
ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथमुखकमलविनिर्गतविपाकसूत्रांगाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
—चौपाई-
तीन शतक त्रेसठ मत भिन्न, उनका वर्णन करे अखिन्न।
नाना भेद सहित यह अंग, दृष्टिवाद नाम यह अंत।।
—दोहा—
इक सौ आठ करोड़ अरु, पद हैं अड़सठ लाख।
छप्पन हजार पाँच भी, जजूँ नमाकर माथ।।१२।।
ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथमुखकमलविनिर्गतदृष्टिवादांगाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:।
अथ द्वितीयदले पुष्पांजलि:
—शंंभु छंद-
इस दृष्टिवाद के पाँच भेद, परिकर्म सूत्र प्रथमानुयोेग।
पूरबगत अरु चूलिका कही, इनमें भी कहे प्रभेद योग।।
पहले परिकर्म के पांच भेद, उनमें शशि प्रज्ञप्ती पहला।
उसमें पद छत्तिस लाख पांच, हज्जार जजूँ ले अर्घ भला।।१३।।
ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथमुखकमलविनिर्गतचन्द्रप्रज्ञप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
दूजा सूरज प्रज्ञप्ति कहा, परिकर्म सूर्य से संबंधी।
आयू मंडल परिवार ऋद्धि, अरु गमन अयन दिन-रात विधी।।
इन सबका वर्णन करता यह, इसको भक्ती से पूजूँ मैं।
पद पांच लाख अरु तीन सहस, इन वंदत भव से छूटूँ मैं।।१४।।
ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथमुखकमलविनिर्गतसूर्यप्रज्ञप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
प्रज्ञप्ती जंबूद्वीप नाम, यह मेरु कुलाचल क्षेत्रादिक।
वेदिका सरोवर नदी भोग, भू जिनमंदिर सुरभवनादिक।।
इस जंबूद्वीप के मध्य विविध, रचना का वर्णन करता है।
पद तीन लाख पच्चीस सहस, इनका अर्चन भव हरता है।।१५।।
ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथमुखकमलविनिर्गतजंबूद्वीपप्रज्ञप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
इस मध्यलोक में द्वीप और, सागर हैं संख्यातीत कहे।
किसमें क्या है? यह सब वर्णे, व्यंतर आदिक आवास कहे।।
इसमें पद बावन लाख तथा, छत्तीस हजार बखाने हैं।
हम भक्ती से पूजें इसको, जिससे भव भव दु:ख हाने हैं।।१६।।
ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथमुखकमलविनिर्गतद्वीपसागरप्रज्ञप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
व्याख्या प्रज्ञप्ती परीकर्म, जीवाजीवादिक द्रव्यों को।
भव्यों व अभव्यों सिद्धों को, वर्णे बहु वस्तू भेदों को।।
इसमें पद लाख चुरासी अरु, छत्तीस हजार बखाने हैं।
हम इसकी पूजा करके ही, निज आत्मा को पहचाने हैं।।१७।।
ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथमुखकमलविनिर्गतव्याख्याप्रज्ञप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:।
अथ तृतीयदले पुष्पांजलि:
उस दृष्टिवाद का भेद दूसरा, सूत्र नाम का माना है।
है जीव अबंधक अवलेपक, इत्यादिक करे बखाना है।।
यह क्रिया-अक्रियावादों को, अरु विविध गणित को वर्णे है।
पद हैं अट्ठासी लाख कहे, इसको पूजूँ भवतरणी ये।।१८।।
ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथमुखकमलविनिर्गतदृष्टिवादभेदसूत्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:।
अथ चतुर्थदले पुष्पांजलि:
तीर्थंकर चक्री हलधर अरु, नारायण प्रतिनारायण हैं।
त्रेसठ ये शलाकापुरुष कहे, इनके चरित्र को वर्णे ये।।
जिनवर विद्याधर ऋद्धीधर, मुनियों राजादिक पुरुषों को।
वर्णे पद इसमें पाँच सहस, प्रथमानुयोग पूजूँ इसको।।१९।।
ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथमुखकमलविनिर्गतदृष्टिवादभेदप्रथमानुयोगाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:।
अथ पंचमदले पुष्पांजलि:
चौथा है भेद पूर्वगत जो, इसके भी चौदह भेद कहे।
उत्पाद पूर्व पहला यह भी, उत्पत्ति नाश स्थिति कहे।।
सब द्रव्यों की पर्यायों को, यह वर्णे इसको पूजूँ मैं।
इसमें पद एक करोड़ कहे, वंदत भव दु:ख से छूटूँ मैं।।२०।।
ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथमुखकमलविनिर्गत-उत्पादपूर्वाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
अग्रायणीय पूरब दूजा, यह सुनय सात सौ अरु दुर्नय।
छह द्रव्य पदार्थों को वर्णे, इसमें पद छ्यानवे लाख अभय।।
इस द्वितिय पूर्व को पूजूँ मैं, इसका कुछ अंश आज भी है।
षट्खण्डागम जो सूत्रग्रंथ, उन भक्ती भवभय हरती है।।२१।।
ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथमुखकमलविनिर्गत-अग्रायणीयपूर्वाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
वीर्यानुवाद है तृतिय पूर्व, यह आत्मवीर्य परवीर्यों को।
तपवीर्यादिक को कहता है, पद सत्तर लाख इसी में हों।।
इसकी भक्ती से शक्ति बढ़े, फिर युक्ति मिले शिवमारग की।
फिर ज्ञान पूर्ण हो मुक्ति मिले, मैं पूजा करूँ सतत इसकी।।२२।।
ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथमुखकमलविनिर्गतवीर्यानुप्रवादपूर्वाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जो अस्तिनास्ति प्रवाद पूर्व, स्वद्रव्य क्षेत्र कालादिक से।
सब वस्तू का अस्तित्व कहे, नास्तित्व अन्यद्रव्यादिक से।।
यह दुर्नय का खंडन करके, नय द्वारा विधि प्रतिषेध कहे।
इसमें पद साठ लाख मानें, इसको पूजत सम्यक्त्व लहे।।२३।।
ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथमुखकमलविनिर्गत-अस्तिनास्तिप्रवादपूर्वाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जो ज्ञानप्रवाद नाम पूरब, प्रत्यक्ष परोक्ष प्रमाणों का।
मतिश्रुत अवधी मनपर्यय अरु, केवल इन पांचों ज्ञानों का।।
बहुभेद प्रभेद सहित वर्णे, इसको पूजत हो ज्ञान पूर्ण।
इसमें पद इक कम एककोटि, इस वंदत हो अज्ञान चूर्ण।।२४।।
ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथमुखकमलविनिर्गतज्ञानप्रवादपूर्वाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
यह सत्य प्रवाद पूर्व दशविध, सत्यों का वर्णन करता है।
यह सप्तभंग से सब पदार्थ का, सुन्दर चित्रण करता है।।
इसके पूजन से झूठ कपट, दुर्भाषायें नश जाती हैं।
पद एक कोटि छह हैं पूूजूँ, दिव्यध्वनि वश हो जाती हैं।।२५।।
ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथमुखकमलविनिर्गतसत्यप्रवादपूर्वाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
आत्मा निश्चय से शुद्ध कहा, फिर भी अशुद्ध संसारी है।
व्यवहार नयाश्रित ही कर्मों का, कर्ता है भवकारी है।।
यह आत्मप्रवाद पूर्व कहता, इसमें पद छब्बिस कोटि कहे।
इसको पूजत ही आत्मनिधी, मिलती है जो भव दु:ख दहे।।२६।।
ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथमुखकमलविनिर्गत-आत्मप्रवादपूर्वाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
यह कर्मप्रवाद पूर्व नाना, विध कर्मों का वर्णन करता।
ईर्यापथ कर्म कृतीकर्मों को, अध:कर्म को भी कहता।।
इसमें पद एक करोड़ लाख, अस्सी हैं इसको पूजूँ मैं।
निज पर का भेद ज्ञान करके, इन आठ करम से छूटूँ मैं।।२७।।
ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथमुखकमलविनिर्गतकर्मप्रवादपूर्वाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जो प्रत्याख्यान प्रवाद पूर्व, वह द्रव्य क्षेत्र कालादिक से।
नियमित व अनियमित कालों तक, बहुत्याग विधी को बतलाके।।
वस्तू सदोष का त्याग करो, निर्दोष वस्तु भी तप रुचि से।
पद हैं चौरासी लाख कहें, पूजूँ इसको मैं बहु रुचि से।।२८।।
ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथमुखकमलविनिर्गतप्रत्याख्यानप्रवादपूर्वाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
यह विद्यानुप्रवाद रोहिणी, आदिक महविद्या पांच शतक।
अंगुष्ठ प्रसेनादिक विद्या, मानी हैं लघु ये सात शतक।।
इनके सब साधन विधी आदि को, वर्णे इसको जजूँ यहाँ।
पद एककोटि दश लाख कहे, इस पढ़ च्युत हों कुछ साधु यहाँ।।२९।।
ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथमुखकमलविनिर्गतविद्यानुप्रवादपूर्वाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
कल्याणप्रवाद पूर्व वर्णे, शशि सूर्य ग्रहादिक गमन क्षेत्र।
अष्टांग महान निमित्तादिक, पद इसमें छब्बिस कोटि मात्र।।
तीर्थंकर के कल्याणक को, चक्री आदिक के वैभव को।
यह कहता इसको पूजें हम, इससे कल्याण हमारा हो।।३०।।
ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथमुखकमलविनिर्गतकल्याणप्रवादपूर्वाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
यह प्राणावाय प्रवाद पूर्व, इंद्रिय बल आयु उच्छ्वासों का।
अपघात मरण अरु आयुबंध, आयू अपकर्षण आदी का।।
यह आयुर्वेद के अष्ट अंग, का विस्तृत वर्णन है करता।
इसमें पद तेरह कोटि इसे, पूजत ही स्वास्थ्य लाभ मिलता।।३१।।
ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथमुखकमलविनिर्गतप्राणावायप्रवादपूर्वाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जो नृत्यशास्त्र संगीतशास्त्र, व्याकरण छंद अरु अलंकार।
पुरुषादी के लक्षण कहता, जिसमें नवकोटी पद विचार।।
सो है किरिया विशाल पूरब, इसको जो रुचि से भजते हैं।
वे सब शास्त्रों में हों प्रवीण, फिर स्वपर भेद को लभते हैं।।३२।।
ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथमुखकमलविनिर्गतक्रियाविशालपूर्वाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
परिकर्म और व्यवहार रज्जु-राशी गुणकार वर्ग घन को।
बहु बीजगणित को भी वर्णे, कहता है मुक्ती स्वरूप को।।
पद बारह कोटि पचास लाख, इसको पूजूँ ले अर्घ भले।
यह लोकविंदुसार पूरब, इसके वंदत लोकाग्र मिले।।३३।।
ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथमुखकमलविनिर्गतलोकविंदुसारपूर्वाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:।
अथ षष्ठदले पुष्पांजलि:
दृष्टिवाद का भेद चूलिका, पांच भेद भी उसके हैं।
जलगता प्रथम जल में स्थलवत्, चलना इत्यादिक वर्णे हैं।।
जलस्तंभन के मंत्र तंत्र तप, आदि अग्नि भक्षण आदिक।
पद दो करोड़ नव लाख नवासी, सहस द्विशत पूजूँ नितप्रति।।३४।।
ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथमुखकमलविनिर्गतजलगताचूलिकायै अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जो स्थलगता चूलिका है, मेरू कुलपर्वत क्षेत्रों को।
उन पर गमनादिक मंत्र तंत्र, तप आदिक बहुविधि कहती वो।।
पद दो करोड़ नव लाख नवासी, हजार दो सौ इसमें हैं।
इसको पूजूँ मैं अर्घ लिये, यह साधन भवदधि तरने में।।३५।।
ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथमुखकमलविनिर्गतस्थलगताचूलिकायै अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जो मायागता चूलिका वह, माया का खेल सिखाती है।
बहु इन्द्रजाल क्रीड़ाओं की, मंत्रादि विधी बतलाती है।।
पद दो करोड़ नव लाख नवासी, हजार दो सौ इसमें हैं।
मैं जजूँ इसे यह कुशल सदा, सब जग की माया हरने में।।३६।।
ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथमुखकमलविनिर्गतमायागताचूलिकायै अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
यह रूपगता चूलिका सिंह, गज घोड़ा मनुजादिक बहुविध।
रूपों को धरने के मंत्रों, तप आदिक को वर्णे नितप्रति।।
पद दो करोड़ नव लाख नवासी, हजार दो सौ माने हैं।
मैं जजूँ मिले मुझ आत्मरूप, मुझको पररूप हटाने हैं।।३७।।
ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथमुखकमलविनिर्गतरूपगताचूलिकायै अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
आकाशगता चूलिका सदा, नभ में गमनादि सिखाती है।
बहु विध के मंत्र तंत्र तप के, साधन की विधी बताती है।।
पद दो करोड़ नव लाख नवासी, हजार दो सौ हैं वर्णे।
मैं इस आशा से जजूँ मिले, मुझ लोकाकाश अग्र क्षण में।।३८।।
ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथमुखकमलविनिर्गत-आकाशगताचूलिकायै अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:।
अथ सप्तमदले पुष्पांजलि:
—दोहा-
अंगबाह्य के भेद हैं, चौदह शास्त्र प्रसिद्ध।
नाम प्रकीर्णक से यही, सामायिक आदीक।।
—रोला छंद-
नियत काल सामायिक, त्रय संध्या में करना।
अनियत काल सदैव, रागद्वेष परिहरना।।
समताभावस्वरूप, सामायिक कहता है।
प्रथम प्रकीर्णकरूप, जजें मोक्ष मिलता है।।३९।।
ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथमुखकमलविनिर्गत-अंगबाह्यस्य सामायिकप्रकीर्णकश्रुताय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
चौबीसों तीर्थेश, इनकी स्तुति वंदन का।
उसका फल वर्णेय, वही प्रकीर्णक दूजा।।
जिन प्रतिमा जिनयज्ञ, बहुविधान यह वर्णे।
मैं पूजूँ बहु भक्ति, जिनवर की ले शरणे।।४०।।
ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथमुखकमलविनिर्गत-अंगबाह्यस्य चतुर्विंशतिस्तव-प्रकीर्णकश्रुताय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जिनवर या जिनगेह, एक एक का वंदन।
सिद्ध वंदना येह, करता पाप निवंâदन।।
वंदन विधि फल आदि, सबका वर्णन करता।
पूजूँ मन-वच-काय, महापुण्य यह भरता।।४१।।
ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथमुखकमलविनिर्गत-अंगबाह्यस्य वंदनाप्रकीर्णकश्रुताय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
दिवस रात्रि अरु पक्ष, चातुर्मास संवत्सर।
ईर्यापथ उत्तमार्थ, इन सबका आश्रय कर।।
प्रतिक्रमण के सात, भेदों का बहु वर्णन।
प्रतिक्रमण यह नाम, पूजूँ शुचिकर तन मन।।४२।।
ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथमुखकमलविनिर्गत-अंगबाह्यस्य प्रतिक्रमणप्रकीर्णक-श्रुताय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
दर्शन ज्ञान चरित्र, तप उपचार विनय हैं।
इनके लक्षण भेद, फल आदिक वर्णन है।।
नाम वैनयिक येह, पंचम भेद कहाता।
पूूजूँ भक्ति समेत, मिले सर्व सुख साता।।४३।।
ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथमुखकमलविनिर्गत-अंगबाह्यस्य वैनयिकप्रकीर्णकश्रुताय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
हो स्वाधीन करेय, प्रदक्षिणा त्रय अवनति।
त्रय उपवेशन और, भक्त्या चार शिरोनति।।
द्वादश हों आवर्त, बहु कृतिकर्म विधी से।
जिन सिद्धादि नमेय, जजूँ इसे बहुरुचि से।।४४।।
ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथमुखकमलविनिर्गत-अंगबाह्यस्य कृतिकर्मप्रकीर्र्णकश्रुताय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
दशवैकालिक ग्रंथ, मुनि के आचारों को।
भिक्षाटन विधि आदि, चर्या उसके फल को।।
वर्णे बहुत विशेष, उसे जजूँ मन वच तन।
जिन सूत्रों की भक्ति, करे ज्ञान का वर्धन।।४५।।
ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथमुखकमलविनिर्गत-अंगबाह्यस्य दशवैकालिक-प्रकीर्णकश्रुताय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
चार तरह उपसर्ग, बाइस परिषह आदिक।
इनका सहन विधान, फल शिव या स्वर्गादिक।।
इन सबको वर्णेय, उत्तराध्ययन वही है।
पूजूँ धर मन नेह, मिलती सौख्य मही है।।४६।।
ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथमुखकमलविनिर्गत-अंगबाह्यस्य उत्तराध्ययन-प्रकीर्णकश्रुताय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
ऋषियों को यदि दोष, लगे व्रतादिक में जो।
प्रायश्चित विधान, बहुविध से वर्णे जो।।
कहा कल्प्यव्यवहार, सूत्र प्रकीर्णक नामा।
पूजूँ रुचि मन धार, मिले शीघ्र शिवरामा।।४७।।
ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथमुखकमलविनिर्गत-अंगबाह्यस्य कल्प्यव्यवहार-प्रकीर्णकश्रुताय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
साधू के यह योग्य, यह अयोग्य इस विध से।
द्रव्य क्षेत्र अरु काल, भाव निमित इन धर के।।
कल्प्याकल्प्य सुनाम, इन सबको कहता है।
पूजूँ करूँ प्रणाम, मन पावन करता है।।४८।।
ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथमुखकमलविनिर्गत-अंगबाह्यस्य कल्प्याकल्प्य-प्रकीर्र्णकश्रुताय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
दीक्षा शिक्षा संघ, पोषण निजसंस्कारा।
सल्लेखन उतमार्थ, मुनि के छहों प्रकारा।।
द्रव्यादी के निमित्त, इन सबको वर्णे जो।
महाकल्प्य वह सूत्र, जजूँ भक्ति धर उसको।।४९।।
ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथमुखकमलविनिर्गत-अंगबाह्यस्य महाकल्प्य—प्रकीर्णकश्रुताय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
चउविध देव व इंद्र, सामानिक इत्यादी।
इनके सुख विभवादि, इनके कारण आदी।।
पूजा दान तपादि, इन सबको कहता जो।
पुंडरीक है नाम, जजूँ नमाकर शिर को।।५०।।
ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथमुखकमलविनिर्गत-अंगबाह्यस्य पुंडरीकप्रकीर्णकश्रुताय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
देव देवियों आदि, के उपपाद इत्यादी।
तप शीलादि निमित्त, कहें सदा सुख आदी।।
महापुंडरीकास्य, वर्णन करे निरन्तर।
पूजूँ भक्ति संभाल, मिले शीघ्र शिवसुन्दर।।५१।।
ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथमुखकमलविनिर्गत-अंगबाह्यस्य महापुंडरीक—प्रकीर्णकश्रुताय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
ऋषिगण के बहुभेद, युत प्रायश्चित वर्णे।
निषिद्धिका है नाम, मुनिचर्या को वर्णे।।
चौदहवाँ अंगबाह्य, भेद प्रकीर्णक माना।
पूजूँ भक्ति बढ़ाय, मिले शीघ्र निजधामा।।५२।।
ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथमुखकमलविनिर्गत-अंगबाह्यस्य निषिद्धिकाप्रकीर्णक-श्रुताय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
-पूर्णाघ्र्य (शंभु छंद)-
यह द्वादश अंग व अंगबाह्य, इन रूप दिव्यध्वनि जिनवर की।
हैं जितने जैनशास्त्र अब भी, सब साररूप ध्वनि जिनवर की।।
गंगा का जल घट में भर लें, वैसे हि ग्रन्थ जिनवर वाणी।
मैं पूजूँ पूरण अर्घ लिये, इस युग में यह ही कल्याणी।।१।।
ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथमुखकमलविनिर्गतद्वादशांग-अंगबाह्यस्य सर्वश्रुतज्ञानाय पूर्णाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।
शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:।
अथ अष्टमदले पुष्पांजलि:
—दोहा-
सर्ववाङ्मय में कहे, चार अनुयोग प्रसिद्ध।
प्रथम करण अरु चरण अरु, द्रव्य नाम से सिद्ध।।१।।
—शंभु छंद-
जो धर्म अर्थ अरु काम मोक्ष, पुरुषार्थ कहे अरु चरित कहे।
त्रेसठ शलाका पुरुषों के, आदर्श महान पुराण कहे।।
वह पुण्य रूप है रत्नत्रयमय, बोधि समाधि निधान महा।
मैं पूजूँ उसको उस ही का, प्रथमानुयोग यह नाम कहा।।५३।।
ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथमुखकमलविनिर्गतप्रथमानुयोगसम्यग्ज्ञानाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जो लोक अलोक विभाग कहे, षट्काल परावर्तन कहता।
चारों गति के संसरण कहें, भव पंच परावर्तन कहता।।
दर्पण समान वह त्रिभुवन का, सब चित्त सामने झलकाता।
मैं जजूँ उसे करणानुयोग यह, नाम धरे भवि सुखदाता।।५४।।
ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथमुखकमलविनिर्गतकरणानुयोगसम्यग्ज्ञानाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
श्रावक मुनि के आचाररूप, चारित्र सही जो बतलाता।
उसकी उत्पत्ती वृद्धी औ, रक्षा के साधन सिखलाता।।
चरणानुयोग है शास्त्र वही, जो मोक्ष महल में चढ़ने को।
चरणों को रखने हेतु सहज, सोपानरूप पूजूँ इसको।।५५।।
ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथमुखकमलविनिर्गतचरणानुयोगसम्यग्ज्ञानाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जो जीव-अजीव सुतत्त्वों को, अरु पुण्य-पाप को बतलाता।
आस्रव-संवर अरु बंध-मोक्ष, तत्त्वों को विधिवत् समझाता।।
वह दीपसदृश द्रव्यानुयोग, द्रव्यों को प्रकट दिखाता है।
श्रुतविद्या का सुन्दर प्रकाश, मैं जजूँ इसे सुखदाता है।।५६।।
ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथमुखकमलविनिर्गतद्रव्यानुयोगसम्यग्ज्ञानाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
—पूर्णाघ्र्य-दोहा-
शीतल तीर्थंकर वचन, शीतलदायी मान्य।
पूर्ण अघ्र्य ले मैं जजूँ, पाऊँ निजसुख साम्य।।१।।
ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथमुखकमलविनिर्गतचतुरनुयोगसम्यग्ज्ञानेभ्य: पूर्णाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।
शांतये शांतिधारा। दिव्यपुष्पांजलि:।
अथ नवमदले पुष्पांजलि:
(१०८ अघ्र्य)
—दोहा—
श्रीशीतल जिनराज के, गुण अनंत अभिराम।
कतिपय गुण को मैं जजूं, शत शत करूं प्रणाम।।१।।
।।अथ मंडलस्योपरि नवमदले पुष्पांजिंल क्षिपेत्।।
ॐ ह्रीं शुक्लध्यानबलेन कर्मनिर्मूलसमर्थाय योगिगुणविशिष्टाय श्रीशीतल-नाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।१।।
ॐ ह्रीं धर्मश्रवणमुखकमलविकसितबुद्धिप्रदाय प्रव्यक्तनिर्वेदगुण—समन्विताय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।२।।
ॐ ह्रीं रागद्वेषविर्विजतसमताभावप्रापणकराय साम्यारोहणतत्परगुण—विशिष्टाय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।३।।
ॐ ह्रीं सर्वजीवसमपरिणामपरिणताय सामयिकिगुणविशिष्टाय श्रीशीतल—नाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।४।।
ॐ ह्रीं सर्वसावद्ययोगविरतिलक्षणैकचारित्रप्राप्ताय सामायिकगुण—समन्विताय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।५।।
ॐ ह्रीं विकथाकषायेन्द्रियविषयादिप्रमादविरहिताय नि:प्रमादगुणविभूषिताय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।६।।
ॐ ह्रीं निश्चयप्रतिक्रमणरूपध्यानलीनपदप्रदाय अप्रतिक्रमगुणसमन्विताय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।७।।
ॐ ह्रीं सर्वसावद्ययोगविरहितपदप्रदाय यमगुणसमन्विताय श्रीशीतलनाथ—तीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।८।।
ॐ ह्रीं मोक्षपदप्राप्तिसाधनभूतप्रमुखनियमानुष्ठानधारकाय प्रधाननियम—गुणविशिष्टाय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।९।।
ॐ ह्रीं अतिशयाभ्यस्तपद्मासनधारकाय स्वभ्यस्तपरमासनगुण—समन्विताय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।१०।।
ॐ ह्रीं वुंâभक—पूरक—रेचकादिलक्षणवायुप्रचारप्रवीणाय प्राणायामगुण—समन्विताय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।११।।
ॐ ह्रीं पंचेन्द्रियविषयव्यापारेभ्यो मनोव्यावृत्य—ललाटे अर्हं बीजाक्षर—स्थापनविधिप्रतिपादकाय सिद्धप्रत्याहारगुणसमन्विताय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।१२।।
ॐ ह्रीं पंचेन्द्रियविषयविरतस्वात्मतत्त्वतन्मयाय जितेन्द्रियगुणविशिष्टाय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।१३।।
ॐ ह्रीं र्पािथवी—आग्नेयी—मारुती—वारुणी—तात्त्विकीपंचविध—धारणा—धारक—योगिगणीश्वराय धारणाधीश्वरगुणसमन्विताय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।१४।।
ॐ ह्रीं व्यवहारनिश्चयधर्मध्यानप्रतिपादकाय धर्मध्याननिष्ठगुणसमन्विताय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।१५।।
ॐ ह्रीं शुक्लध्यानबलेन केवलज्ञानप्राप्ताय समाधिराट्गुणसमन्विताय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।१६।।
ॐ ह्रीं सर्वजीवशुद्धबुद्धस्वभावरूपसाम्यभावपरिणताय स्पुâरत्समरसी—भावगुणसमन्विताय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।१७।।
ॐ ह्रीं संकल्पविकल्पविरहितैकाद्वितीयात्मस्वरूपप्राप्ताय एकाकिगुण—समन्विताय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।१८।।
ॐ ह्रीं पंचेन्द्रियमनोवशीकरणसमर्थाय अध:करणापूर्वकरणानिवृत्तिकर—णपरिणामप्रापणविधिप्रतिपादनाय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।१९।।
ॐ ह्रीं पुलाक—वकुश—कुशील—निग्र्रंथ—स्नातकनामपंचविधनिग्र्रंथमुनीनां स्वामिने निग्र्रंथनाथगुणविशिष्टाय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।२०।।
ॐ ह्रीं सम्पूर्णपरिग्रहविरहितसाधुगणस्वामिने योगीन्द्रगुणविशिष्टाय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।२१।।
ॐ ह्रीं चतुष्षष्टि—ऋद्धिसमन्विताय ऋषिगुणविशिष्टाय श्रीशीतलनाथ-तीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।२२।।
ॐ ह्रीं मोक्षकारणभूतव्यवहाररत्नत्रयधर्मप्रतिपादकाय साधुगुणमंडिताय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।२३।।
ॐ ह्रीं उभयविधोपशमक—क्षपकश्रेण्यारोहणविधिप्रतिपादकाय यतिगुणविशिष्टाय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।२४।।
ॐ ह्रीं प्रत्यक्षज्ञानेन चराचरजगज्ज्ञात्रे मुनिगुणसमन्विताय श्रीशीतलनाथ— तीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।२५।।
ॐ ह्रीं ऋद्धिसंपन्नर्षींणामपि प्रमुखपदप्राप्ताय मर्हिषगुणसमन्विताय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।२६।।
ॐ ह्रीं रत्नत्रयधारिसाधुगणाग्रेसराय साधुधौरेयगुणविशिष्टाय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।२७।।
ॐ ह्रीं निष्कषायानां स्वामिने यतिनाथगुणसमन्विताय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।२८।।
ॐ ह्रीं प्रत्यक्षज्ञानिनां स्वामिपदप्राप्ताय महामुनिगुणसमन्विताय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।२९।।
ॐ ह्रीं वचनगुप्तिबलेन दिव्यध्वनिवचनप्राप्ताय महामुनीश्वरगुणसमन्विताय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।३०।।
ॐ ह्रीं छद्मस्थावस्थायां वाचंयमधारकाय महामौनिगुणसमन्विताय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।३१।।
ॐ ह्रीं धम्र्यशुक्लध्यानबलेन कर्मेन्धननाशसमर्थाय महाध्यानिगुण—विशिष्टाय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।३२।।
ॐ ह्रीं महापुरुषानुष्ठानयोग्यमहद्व्रतप्रतिपादकाय महाव्रतिगुणसमन्विताय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।३३।।
ॐ ह्रीं अन्यजनासाधारणक्षमागुणधारकाय महाक्षमगुणसमन्विताय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।३४।।
ॐ ह्रीं अष्टादशोत्तरसहस्रभेदयुक्तब्रह्मचर्यप्राप्ताय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।३५।।
ॐ ह्रीं रागद्वेषमोहरूपकषायशांतकराय महाशान्तगुणसमन्विताय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।३६।।
ॐ ह्रीं इन्द्रियदमन—तप:क्लेशसहिष्णुताबलेन स्वात्मपदप्राप्ताय महादमगुण—समन्विताय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।३७।।
ॐ ह्रीं कर्ममलकलंकलेपविरहिताय निर्लेपगुणसमन्विताय श्रीशीतलनाथ— तीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।३८।।
ॐ ह्रीं संशय—विपर्यय—अनध्यवसायरहिताय निभ्र्रमस्वान्तगुणविशिष्टाय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।३९।।
ॐ ह्रीं रत्नत्रयस्वरूपधर्म—अिंहसापरमधर्म—दशधर्माणामधिकारपूर्वक—प्रतिपादनदक्षाय धर्माध्यक्षगुणसमन्विताय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।४०।।
ॐ ह्रीं करुणामार्ग—गमनसमर्थयोगिजनहृदयस्थिताय ब्रह्मयोनिगुण—समन्विताय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।४१।।
ॐ ह्रीं ब्रह्मशब्देनात्माज्ञानमोक्षचारित्राणामुत्पत्तिस्थानभूताय श्रीशीतलनाथ— तीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।४२।।
ॐ ह्रीं गुरुमन्तरेण निर्वेदप्राप्ताय स्वयंबुद्धगुणसमन्विताय श्रीशीतलनाथ— तीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।४३।।
ॐ ह्रीं स्वात्मतत्त्वज्ञात्रे ब्रह्मज्ञगुणसमन्विताय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।४४।।
ॐ ह्रीं ब्रह्मशब्देन मोक्ष—ज्ञान—तपश्चारित्रस्वरूपवेदिने ब्रह्मतत्त्वविद्गुण समन्विताय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।४५।।
ॐ ह्रीं कर्ममलकलंकरहितपवित्रात्ने पूतात्मगुणसमन्विताय श्रीशीतलनाथ— तीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।४६।।
ॐ ह्रीं द्रव्यकर्म—भावकर्म—नोकर्मविरहिताय स्नातकगुणविशिष्टाय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।४७।।
ॐ ह्रीं अभयदानस्वभावाय दान्तगुणविशिष्टाय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।४८।।
ॐ ह्रीं इन्द्रचन्द्रधरणेन्द्रमुनीन्द्रादीनां पूज्यपर्यायप्राप्ताय भदन्तगुणविशिष्टाय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।४९।।
ॐ ह्रीं शुभकर्मद्वेषकरभावविर्विजताय वीतमत्सरगुणसमन्विताय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।५०।।
ॐ ह्रीं स्वर्गमोक्षफलप्रदायक—कर्मशत्रुनिपातप्रहरणधारकाय धर्मवृक्षायुध—गुणसमन्विताय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।५१।।
ॐ ह्रीं त्रैलोक्यक्षोभकारिवङ्कााग्निदिभिरपि चारित्राच्चालयितुमशक्य—शक्तिप्राप्ताय अक्षोभ्यगुणसमन्विताय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।५२।।
ॐ ह्रीं भव्यजीवपवित्रकारणदक्षाय प्रपूतात्मगुणविशिष्टाय श्रीशीतलनाथ— तीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।५३।।
ॐ ह्रीं भव्यजीवानां मोक्षोत्पत्तिकारणसमर्थाय अमृतोद्भवगुणसमन्विताय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।५४।।
ॐ ह्रीं णमो अरिहंताणमित्यादिसप्ताक्षरमंत्रस्वरूपाय मंत्रर्मूितगुणसमन्विताय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।५५।।
ॐ ह्रीं स्वयमेव परमसमरसीभावस्वरूपाय स्वसौम्यात्मगुणविशिष्टाय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।५६।।
ॐ ह्रीं पराधीनशरीरविरहिताय स्वतंत्रगुणविशिष्टाय श्रीशीतलनाथ-तीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।५७।।
ॐ ह्रीं ब्रह्मस्वरूप—निश्चयचारित्रोत्पत्तिकारकाय ब्रह्मसंभवगुणप्राप्ताय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।५८।।
ॐ ह्रीं अतिशयप्रहसितवदन—स्वर्मोक्षदायकाय सुप्रसन्नगुणसमन्विताय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।५९।।
ॐ ह्रीं अनन्तकेवलज्ञानदर्शनवीर्यसौख्यसम्यक्त्वास्तित्व—प्रमेयत्व—चैतन्या—द्यनन्तगुणसमुद्राय गुणाम्भोधिगुणसमन्विताय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।६०।।
ॐ ह्रीं शुभाशुभास्रवनिरोधरूपपूर्णसंवरप्राप्ताय पुण्यापुण्यनिरोधकगुण—समन्विताय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।६१।।
ॐ ह्रीं आत्मतत्त्वस्वरूपस्थितसंवरगुणपूर्णाय सुसंवृतगुणधारकाय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।६२।।
ॐ ह्रीं स्वात्मस्थितसर्वप्रकारसुरक्षिताय सुगुप्तात्मगुणसमन्विताय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।६३।।
ॐ ह्रीं कर्मांजनविरहितकृतकृत्याय सिद्धात्मगुणप्राप्ताय श्रीशीतलनाथ— तीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।६४।।
ॐ ह्रीं सर्वोपद्रवनिवारकाय निरूपप्लवगुणविशिष्टाय श्रीशीतलनाथ- तीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।६५।।
ॐ ह्रीं सर्वकर्मनिर्मोक्षजातानन्तकेवलज्ञानादिलक्षणोत्तरफलप्राप्ताय महोदर्वâगुणमंडिताय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।६६।।
ॐ ह्रीं सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रलक्षणमोक्षोपायप्रतिपादकाय महोपायगुण—समन्विताय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।६७।।
ॐ ह्रीं अधोमध्योध्र्वस्थितभव्यलोवैâकाद्वितीयजनकस्वरूपपरमहित—कारकाय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।६८।।
ॐ ह्रीं सर्वजीवदयालक्षणधर्मोपदेशकाय परमकारुणिकगुणसमन्विताय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।६९।।
ॐ ह्रीं चतुरशीतिलक्षोत्तरगुणधारकाय गुण्यगुणसमन्विताय श्रीशीतलनाथ— तीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।७०।।
ॐ ह्रीं तप: संयमपरीषहसहनादिक्लेशलक्षणांकुशेन मनोमत्तगजोन्मार्ग—निरोधकाय महाक्लेशांकुशगुणमंडिताय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।७१।।
ॐ ह्रीं जन्मकालादेव मलमूत्रादिरहित—शुद्धबुद्धैकस्वभावरूपपरमपवित्र—तीर्थाय शुचिगुणसमन्विताय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।७२।।
ॐ ह्रीं अष्टािंवशतिभेदभिन्नमोहमहाशत्रुविजयकराय अरिंजयगुणमंडिताय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।७३।।
ॐ ह्रीं सर्वकालालब्धलाभलक्षणपरमशुक्लध्यानधारकाय सदायोगगुण—समन्विताय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।७४।।
ॐ ह्रीं सर्वकालनिजशुद्धबुद्धैकस्वभावपरमात्मैकलोलीभावलक्षणपरमानंदा—मृतरसास्वादस्वभावभोगप्राप्ताय सदाभोगगुणसमन्विताय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।७५।।
ॐ ह्रीं सर्वकालपरमधैर्यधारकाय सदाधृतिगुणविशिष्टाय श्रीशीतलनाथ— तीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।७६।।
ॐ ह्रीं शत्रु—मित्र—तृण—कांचनादिषु परममध्यस्थभावप्राप्ताय परमौदासितृ—गुणविशिष्टाय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।७७।।
ॐ ह्रीं कवलाहाररहिताय शाश्वतकल्याणमार्गारूढाय अनाश्वान्गुण समन्विताय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।७८।।
ॐ ह्रीं अभयदानरूपसफलाशीर्वादप्रदाय सत्याशी:गुणमंडिताय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।७९।।
ॐ ह्रीं रागद्वेषमोहशान्तकारिसाधुगणस्वामिने शान्तनायकगुणसमन्विताय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।८०।।
ॐ ह्रीं जन्मप्रभृत्यपि व्याधितप्राणिनां नाममात्रेण सर्वव्याधिविनाशनसमर्थाय—जन्मजरामरणभवरोगमूलादुन्मूलनकुशलाय अपूर्ववैद्यगुणविशिष्टाय श्रीशीतलनाथ— तीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।८१।।
ॐ ह्रीं निर्विकल्पसमाधिलक्षणशक्लध्यानध्यात्रे योगज्ञगुणसमन्विताय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।८२।।
ॐ ह्रीं परमचारित्रलक्षणस्वरूपाय धर्मर्मूितगुणसमन्विताय श्रीशीतलनाथ— तीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।८३।।
ॐ ह्रीं िंहसादिलक्षणपापभस्मीकरणकुशलाय अधर्मधग्गुणविशिष्टाय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।८४।।
ॐ ह्रीं स्वात्मज्ञाननिष्ठाय ब्रह्मेड्गुणविशिष्टाय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।८५।।
ॐ ह्रीं पंचमकेवलज्ञानपतये महाब्रह्मपतिगुणविशिष्टाय श्रीशीतलनाथ— तीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।८६।।
ॐ ह्रीं संपूर्णीकृतसर्वात्मकार्याय कृतकृत्यगुणविशिष्टाय श्रीशीतलनाथ— तीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।८७।।
ॐ ह्रीं इन्द्रादिभि: पूजाप्राप्ताय कृतक्रतुगुणसमन्विताय श्रीशीतलनाथ— तीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।८८।।
ॐ ह्रीं केवलज्ञानाद्यनन्तगुणोत्पत्तिनाथाय गुणाकरगुणविशिष्टाय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।८९।।
ॐ ह्रीं क्रोधादिविभावभावविनाशनाय गुणोच्छेदिगुणविशिष्टाय श्रीशीतलनाथ— तीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।९०।।
ॐ ह्रीं नेत्रमेषोन्मेषरहितदिव्यनेत्राय निर्निमेषगुणसमन्विताय श्रीशीतलनाथ— तीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।९१।।
ॐ ह्रीं गृहपरिकराद्याश्रयविगताय निराश्रयगुणविशिष्टाय श्रीशीतलनाथ— तीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।९२।।
ॐ ह्रीं सर्वोच्चबुद्धिजनकाय सूरिगुणसमन्विताय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।९३।।
ॐ ह्रीं स्यात्कारशब्दोपलक्षितसुनयमर्मप्रतिपादकाय सुनयतत्त्वज्ञगुण—विशिष्टाय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।९४।।
ॐ ह्रीं सर्वजीवजीवनबुद्धिप्रदायकाय महामैत्रीमयगुणविशिष्टाय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।९५।।
ॐ ह्रीं सर्वकर्मोपशामनविधिविधायकाय शमिगुणसमन्विताय श्रीशीतलनाथ— तीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।९६।।
ॐ ह्रीं प्रकर्षरूपकर्मबंधविनष्टाय प्रक्षीणबन्धगुणविशिष्टाय श्रीशीतलनाथ— तीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।९७।।
ॐ ह्रीं असहिष्णुभावोत्पन्नकलहविरहिताय निद्र्वन्द्वगुणविशिष्टाय श्रीशीतलनाथ— तीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।९८।।
ॐ ह्रीं केवलज्ञानद्र्धिप्राप्ताय मर्हिषगुणविशिष्टाय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।९९।।
ॐ ह्रीं पुनरागमनविरहितमोक्षधामप्राप्ताय अनन्तगगुणसमन्विताय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।१००।।
ॐ ह्रीं शुद्धस्वरूपविनाशविरहिताय अव्ययगुणविशिष्टाय श्रीशीतलनाथ— तीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।१०१।।
ॐ ह्रीं अनादिकालीनसर्वोत्कृष्टस्थानस्थिताय पुराणपुरुषगुणसमन्विताय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।१०२।।
ॐ ह्रीं अिंहसालक्षणसर्वोत्कृष्ट—धर्मप्रवर्तकाय धर्मसारथिगुणसमन्विताय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।१०३।।
ॐ ह्रीं परमकल्याणदायकतीर्थंकरनामगोत्रकारकस्तुतिप्राप्ताय शिव—कीर्तनगुणविभूषिताय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।१०४।।
ॐ ह्रीं लोकजीवकारिक्रियोपदेशकाय विश्वकर्मगुणविभूषिताय श्रीशीतलनाथ— तीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।१०५।।
ॐ ह्रीं आत्मन्येकलोलीभावरूपाच्यवनस्वरूपाय अक्षरगुणविभूषिताय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।१०६।।
ॐ ह्रीं छद्म—ज्ञानावरणदर्शनावरणकर्मविघातकाय अच्छद्मगुणविभूषिताय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।१०७।।
ॐ ह्रीं केवलज्ञानापेक्षया विश्वव्याप्ताय विश्वभू-गुणसमन्विताय श्रीशीतलनाथ— तीर्थंकराय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।१०८।।
पूर्णाघ्र्य—गीताछंद
शीतल जिनेश्वर! आप वृद्धिंगत गुणों के नाथ हो।
सौ इन्द्र नितप्रति भक्ति श्रद्धा, से नमाते माथ को।।
निज आत्म का दर्शन कराया, पथ दिखाया विश्व को।
पूर्णाघ्र्य से हम पूजते, निज आत्म संपति प्राप्त हो।।१।।
ॐ ह्रीं योगिगुणादि-अष्टोत्तरशतगुणसमन्विताय श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय पूर्णाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।।१।।
शान्तये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलिं।
जाप्य मंत्र—ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय नम:।
जयमाला
-दोहा-
अति अद्भुत लक्ष्मी धरें, समवसरण प्रभु आप।
तुम ध्वनि सुन भविवृृंद नित, हरें सकल संताप।।१।।

-शंभु छंद-
जय जय शीतल जिन का वैभव, अंतर का अनुपम गुणमय है।
जो दर्शज्ञान सुख वीर्यरूप, आनन्त्य चतुष्टय गुणमय है।।
बाहर का वैभव समवसरण, जिसमें असंख्य रचना मानी।
गुरु गणधर भी वर्णन करते, थक जाते मनपर्यय ज्ञानी।।२।।
यह समवसरण की दिव्य भूमि, इक हाथ उपरि पृथ्वी तल से।
सीढ़ी से ऊपर अधर भूमि, यह तीस कोश की गोल दिखे।।
यह भूमि कमल आकार कही, जो इन्द्रनीलमणि निर्मित है।
है गंधकुटी इस मध्य सही, जो कमल कर्णिका सदृश है।।३।।
पंकज के दल सम बाह्य भूमि, जो अनुपम शोभा धारे है।
इस समवसरण का बाह्य भाग, दर्पण तल सम रुचि धारे है।।
यह बीस हजार हाथ ऊँचा, शुभ समवसरण अतिशय शोभे।
एकेक हाथ ऊँची सीढ़ी, सब बीस हजार प्रमित शोभें।।४।।
अंधे पंगू रोगी बालक, औ वृद्ध सभी जन चढ़ जाते।
अंतर्मुहूर्त के भीतर ही, यह अतिशय जिन आगम गाते।।
इसमें शुभ चार दिशाओं में, अति विस्तृत महा वीथियाँ हैं।
वीथी में मानस्तंभ कहे, जिनकी कलधौत पीठिका हैं।।५।।
जिनवर से बारह गुणे तुंग, बारह योजन से दिखते हैं।
इनमें हैं दो हजार पहलू, स्फटिक मणी के चमके हैं।।
उनमें चारों दिश में ऊपर, सिद्धों की प्रतिमाएँ राजें।
मानस्तंभों की सीढ़ी पर, लक्ष्मी की मूर्ति अतुल राजें।।६।।
ये दूर-दूर तक गाँवों में, अपना प्रकाश पैâलाते हैं।
जो इनका दर्शन करते हैं, वे निज अभिमान गलाते हैं।।
मानस्तंभों के चारों दिश, जलपूरित स्वच्छ सरोवर हैं।
जिनमें अतिसुंदर कमल खिले, हंसादि रवों से मनहर हैं।।७।।
प्रभु समवसरण में इक्यासी, गणधर सप्तद्र्धि समन्वित हैं।
सब एक लाख मुनिराज वहाँ, मूलोत्तर गुण से मंडित हैं।।
गणिनी धरणाश्री तीन लाख, अस्सी हजार आर्यिका कही।
श्रावक दो लाख श्राविकाएँ, त्रय लाख भक्ति में लीन रहीं।।८।।
नब्बे धनु तुंग देह स्वर्णिम, इक लाख पूर्व वर्षायू थी।
है कल्पवृक्ष का चिन्ह प्रभो! दशवें तीर्थंकर शीतल जी।।
चिंतित फलदाता चिंतामणि, वांछित फलदाता कल्पतरू।
मैं पूजूँ ध्याऊँ गुण गाऊँ, निज आत्म सुधा का पान करूँ।।९।।
हे नाथ! कामना पूर्ण करो, निज चरणों में आश्रय देवो।
जब तक नहिं मुक्ति मिले मुझको, तब तक ही शरण मुझे लेवो।।
तब तक तुम चरण कमल मेरे, मन में नित सुस्थिर हो जावें।
जब तक नहिं केवल ‘ज्ञानमती’, तब तक मम वच तुम गुण गावें।।१०।।
ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथतीर्थंकराय जयमाला महाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।
शांतये शांतिधारा, दिव्य पुष्पांजलि:।
-शेरछंद-
जो भव्य शीतलनाथ का विधान करेंगे।
प्रभु दिव्यध्वनि द्वादशांग वाणि नमेंगे।।
संसार परिभ्रमण का संताप हरेंगे।
निज ‘ज्ञानमती’ पूर्णकर भगवान बनेंगे।।१।।
।।इत्याशीर्वाद:।।
प्रशस्ति
-दोहा-
तीर्थंकर चक्री मदन, त्रयपद धारी ईश।
शांतिनाथ भगवान को, नमूँ-नमूँ नत शीश।।१।।
वुंâथुनाथ-अरनाथ प्रभु, तीन-तीन पद नाथ।
इनके श्री चरणाब्ज को, नमूँ नमाकर माथ।।२।।
वर्तमान में वीर प्रभु, शासनपति भगवान।
इनके शासन में हुये, बहु आचार्य महान।।३।।
मूल-संघ में वुंâदवुंâद गुरु, अन्वय सरस्वति गच्छ।
बलात्कार गण में हुए , सूरि नमूँ मन स्वच्छ।।४।।
सदी बीसवीं के प्रथम, गुरु दिगंबराचार्य।
चरित चक्रवर्ती श्री, शांतिसागराचार्य।।५।।
इनके शिष्योत्तम श्री, वीरसागराचार्य।
पहले पट्टाचार्य गुरु, नमूँ भक्ति उर धार्य।।६।।
वीर अब्द पच्चीस सौ, चालिस जगत्प्रसिद्ध।
पौष कृष्ण चौदश तिथी, हस्तिनागपुर तीर्थ।।७।।
मैंने गणिनी ज्ञानमती, किया विधान प्रपूर्ण।
शीतलनाथ विधान यह, भरे सौख्य संपूर्ण।।८।।
जब तक जम्बूद्वीप की, कीर्ति जगत् में व्याप्त।
तब तक ‘‘ज्ञानमती’’ कृती, रहे विश्व विख्यात।।९।।
(इति श्रीशीतलनाथविधानं संपूर्णम्)
वद्र्धतां जिनशासनं |