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शौरसेनी प्राकृत ग्रन्थों में निहित गणितीय सामग्री

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शौरसेनी प्राकृत ग्रन्थों में निहित गणितीय सामग्री

अनुपम जैन— एवं श्वेता जैन
सारांश

प्राचीन जैन आगम प्राकृत भाषा में निबद्ध हैं। जैनधर्म की दिगम्बर एवं श्वेताम्बर परम्पराओं के आगम मुख्यत: क्रमश: शौरसेनी एवं अद्र्धमागधी भाषाओं में उपलब्ध होते हैं। इन आगम ग्रन्थों की रचना का मूल उद्देश्य आध्यात्मिक विषयों का प्रतिपादन एवं दार्शनिक पक्षों का प्रस्तुतिकरण है। फिर भी विषय के विवेचनों को पुष्ट करने, कथनों को प्रामणिक बनाने एवं उनको सूक्ष्मतया व्याख्यापित करने के उद्देश्य से इन आगमों एवं उनकी टीकाओं में गणितीय सिद्धान्तों, सूत्रों तथा उदाहरणों का व्यापक प्रयोग हुआ है। ये ग्रन्थ उस काल में प्रचलित / विकसित गणित के बारे में यथेष्ट सूचनाएँ देते हैं। साथ ही जैनाचार्यों की इस विषय में रूचि को भी प्रतिबिम्बित करते हैं।

विषयानुसार विभाजन के क्रम में करणानुयोग एवं द्रव्यानुयोग के ग्रन्थों में गणितीय सामग्री की बहुलता एवं उनके समीचीन अध्ययन हेतु परिष्कृत गणितीय ज्ञान की अपरिहार्यता के कारण अनेक पूर्णत: गणितीय ग्रन्थों का भी सृजन जैनाचार्यों द्वारा किया गया। प्रस्तुत आलेख में शौरसेनी प्राकृत भाषा में निबद्ध आगमों, उनकी टीकाओं एवं उन पर आधारित ग्रन्थों में निहित विषयों की मौलिकताओं, विषयवस्तु, अनुपलब्ध ग्रन्थों, उद्धरणों एवं प्रयोगों की चर्चा की हैं। , इस विवेचन से स्पष्ट है कि शौरसेनी परम्परा में विकसित गणित का मूल्यांकन एवं समकालीन इतर साहित्य से उसका तुलनात्मक अध्ययन अत्यन्त आवश्यक है। ऐसे अध्ययन के बिना भारतीय गणित इतिहास का लेखन अपूर्ण है।

‘बहुर्भिर्विप्रलापै :किं त्रैलोक्ये सचराचरे।

यत्विंकंचिद्वस्तु तत्सर्व गणितेन बिना न हि।।

जैन परम्परा ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण भारतीय गणितज्ञों में अति विशिष्ट स्थान रखने वाले आचार्य महावीर (८५० ई.) के उक्त कथन से जैन साहित्य में गणित की स्थिति स्पष्ट हो जाती है। शौरसेनी प्राकृत भाषा में निबद्ध आगमों की मुख्यत: २ धारायें हैं— अ. द्वादशांग के अन्तर्गत १२ वें दृष्टिवाद अंग के चतुर्थ खण्ड पूर्व के ज्ञानप्रवाद शीर्षक, पांचवे पूर्व के दसवें वस्तु अधिकार के तृतीय खण्ड पेज्जोदास पाहुड के आधार पर आचार्य गुणधर द्वारा रचित कषायपाहुड़ २ —२३३ सूत्रों के इस ग्रन्थ की आचार्य यतिवृषभ (२—७ सी.श.ई.) ने चूर्णिसूत्रों में व्याख्या की। पुन: आचार्य वीरसेन (१८१६ ई.) एवं उनके विषय आचार्य जिनसेन प्रण्ीत जयधवला टीका तथा आचार्य नेमिचन्द सिद्धान्तचक्रवर्ती (९८१ इ/) का लब्धिसार (क्षपणासार सहित) उपलब्ध होता है। इस शृ्रंखला को केशववर्णी की जीवतत्व प्रदीपिका टीका एवं भट्टारक नेमिचन्द्र ज्ञानभूषण की संस्कृत टीका तथा पं. टोडरमल की सम्यग्ज्ञानचन्द्रिका टीका (१७६१ ई.) से विस्तार मिला। ब. दूसरी शृ्रंखला द्वितीय पूर्व आग्रायणीय के चयनलब्धि शीर्षक पंचम वस्तु अधिकार के २० अधिकारों में से महाकर्म प्रकृति के अनुयोगद्वारों के आधार पर धरसेन, पुष्पदन्त एवं भूतबलि द्वारा रचित षट्खण्डागम पर आधारित है। इस पर कुन्दकुन्द (?), शामकुंड, तुम्बुलूर, बप्पदेव एवं वीरसेन द्वारा टीकायें लिखी गई । वीरसेन की प्रसिद्ध धवला टीका (८१६ ई.) के आधार पर गोम्मटसार (जीवकाण्ड एवं कर्मकाण्ड), माधवचन्द्र त्रैविध देव की टीका, केशववर्णी की जीवतप्त टीका, भट्टारक नेमिचन्द्र ज्ञानभूषण की टीका एवं टोडमल की सम्यग्ज्ञानचन्द्रिका टीका मिलती है। एक तीसरी धारा आचार्य कुन्दकुन्द के साहित्य की मिलती है । आचार्य कुन्दकुन्द के साहित्य एवं उनके टीकाकारों के द्वारा रचित साहित्य में विद्यमान गणित की स्वतंत्र रूप से चर्चा हम अपने एक अन्य लेख में कर चुके हैं अत: विस्तारभय से उसकी चर्चा यहाँ नहीं करेंगे । इसके अतिरिक्त आचार्य उमास्वामी कृत तत्वार्थसूत्र की सवार्थसिद्धि तत्वार्थराजवार्तिक एवं तत्वार्थश्लोकवार्तिक शीर्षक टीकाएँ भी गणितज्ञों के रूचिकर बन सकती हैं। इन दोनों शृ्रंखलाओं में हमको क्रमश:— क. संख्याप्रमाण, उपमाप्रमाण, संख्या सिद्धान्त, संख्यात, असंख्यात एवं अनन्त विषयक गणित

ख. अष्ट परिकर्म (योग, अन्तर, गुणा, भाग, वर्ग, वर्गमूल, घन एवं घनमूल) तथा भिन्न एवं भिन्न परिकर्माष्टक

ग. विस्तृत संकेतन प्रणाली, बीजीय एवं ज्यामितीय संकेत

घ. दीर्घ संख्याओं को व्यक्त करने के प्रकार, वर्गित—संवर्गित की रीति, घातांक के सिद्धान्त, लघुरिक्थ गणित

ड. क्रमचय एवं संचय (भंग)

च. धारायें एवं अल्पबहुत्व

छ. समुच्चय सिद्धान्त, एवैकी संगति एवं उनके अनुप्रयोग

ज. कर्म एवं निकाय सिद्धान्त आदि।

अनेक मौलिकताओं के साथ प्राप्त होते हैं। इन सबकी बिन्दुवार विवेचना एक शोध पत्र में नहीं आ सकती। किन्तु यह प्रकरण अत्यन्त महत्वपूर्ण है। इसकी उपेक्षा से भारतीय गणित इतिहास को कितनी क्षति हो रही है यह इस बात से स्पष्ट है कि Logarithms के आविष्कारक के रूप में इतिहास में John Napier(११५० ई.) एवं Just Bergi (१६१७ ई.) को पढ़ाया जाता है। जबकि धवला में यह सम्पूर्ण विवेचन आधार २,३ एवं ४ के साथ क्रमश: अद्र्धच्छेद, त्रिच्छेंद तथा चतुर्थच्छेद के नाम से उपलब्ध है। क्रमचय एवं संचय, एवैकी भिन्न, वितत भिन्न, संख्या एवं समुच्चय सिद्धान्त के बारे में कई भ्रांतियाँ विकसित हो रही हैं।४ लेखक की शीघ्र प्रकाश्य कृति जैन गणित की मौलिकतायें एवं ऐतिहासिक विसंगतियों में इनकी सप्रमाण विस्तृत चर्चा की गई है। श्वेताम्बर जैन आगम स्थानांग सूत्र की ७४७ वीं गाथा जैनागमों में निहित विषयों की ओर संकेत करती है किन्तु उससे मिलती जुलती अन्य गाथाओं की चर्चा मैंने अपने एक शोध पत्र ‘अद्धमागधी जैनागमों में निहित गणितीय अध्ययन के विषय’ में की है। अब तक के अध्ययन से हम इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि शौरसेनी ग्रन्थों में निहित गणित अधिक उपेक्षित हो रहा है जबकि अनुयोगद्वार सूत्र, उत्तराध्ययन सूत्र, तत्वार्थाधिगमसूत्रभाष्य, जम्बूद्वीप समास, जम्बूद्वीप संघायणी, वृहत्क्षेत्र समास, जम्बूद्वीप प्रज्ञप्ति का कुछ गणित सामने आ रहा है। डॉ. अवधेश नारायणसिंह यदि Mathematics of Dhavala न लिखते तो शायद धवला का गणित भी प्रकाश में नहीं आता।

प्रो.एल.सी. जैन द्वारा लिखित ‘तिलोयपण्णत्ति का गणित’ एवं ‘गोम्मटसार की गणितात्मक प्रणाली’ ने भी आधारभूत कार्य किया है। A Brief Survey of Workdone on Jaina Mathematics में लेखक ने अब तक सम्पन्न कार्य का विस्तृत सर्वेक्षण दिया है। ‘जैन गणितीय साहित्य’१० शीर्षक लेख में पूर्णत:/ अंशत: गणितीय ग्रन्थों का अवलोकन किया जा सकता है। लगभग १८ वर्ष पूर्व ७—८ दिसंम्बर ८० को भारतीय गणित इतिहास परिषद के चतुर्थ वार्षिक समारोह में लेखक ने दिल्ली वि.वि. में ‘कतिपय अज्ञात जैन गणित ग्रन्थ’ शीर्षक शोध पत्र पढ़ा था जो कि गणित भारती में प्रकाशित हुआ है। क्या हम इन अनुपलब्ध ग्रन्थों को प्रकाश में लाने का प्रयास करेंगे ? भगवान ऋषभदेव राष्ट्रीय कुलपति सम्मेलन के अवसर पर उपस्थित सम्मानित वरिष्ठ विद्वानों से हमारा आग्रह है कि वे एक ऐसी प्रोजेक्ट तैयार करें एवं शासन से उसे स्वीकृत कराये जिसमें प्राकृत भाषा में निबद्ध गणितीय सामग्री को व्यवस्थित एवं पूर्ण सन्दर्भो सहित प्रकाश में लाया जा सके। दाशमिक स्थानमान पद्धति, शून्य के अविष्कार, अनन्त के विरोधाभासों की समस्याओं का समाधान प्राकृत ग्रन्थों में निहित है। इन विषयों में रुचि रखने वाले विद्वानों से मार्गदर्शन की अपेक्षा है।

मूल षड्खंडागम के सूत्रों में एक से लगातार सौ, एक हजार, दस हजार , लाख, करोड़, कोड़ा— कोड़ी व कोड़ाकोड़ाकोड़ाकोड़ी तक की संख्या, संख्यात, असंख्यात, अनन्त व अनन्तानन्त के नाम, जोड, बाकी, गुणा, वर्ग व वर्गमूल, धन आदि की गणितीय प्रक्रियाएँ , अंगुल , योजन, श्रेणी, विष्कम्भ, सूचि, प्रतर व धन आदि क्षेत्र संबंधी माप उल्लिखित है जो यह व्यक्त करते है कि प्रथम शताब्दी के आचार्य पुष्पदंत एवं भूतबलि को गणितशास्त्र का यथेष्ट ज्ञान था। प्राकृत के ग्रन्थों में कितना गणितीय ज्ञान भरा है इसका अनुमान मात्र एक धवला टीका को देखकर लगाया जा सकता है। जहाँं तक इस टीका में निहित गणित का सवाल है उसको प्रो. सिह (१९४६) एवं प्रो. जैन (१९७६) ने अपने लेखों में विवेचित कर दिया था । मैं यहाँ उन अंशों को दे रहा हूँ उस समय उपलब्ध अन्य प्राचीन ग्रन्थों की जानकारी देते हैं। इससे यह तय है कि प्राचीन भारतीय गणितीय ज्ञान हेतु शौरसेनी प्राकृत महत्वपूर्ण स्रोत हैं।

इस टीका में कम से कम तीन प्राचीन गणित ग्रंथों के उद्धरण मिलते है— (क) संस्कृत भाषा में निबद्ध पद्यमय ग्रंथ।

(ख) प्राकृत गाथामय ग्रन्थ।

(ग) प्राकृत गद्य ग्रन्थ, परियम्यसुत्तं (परिकर्म सूत्र)

धवला के अन्तर्गत क्षेत्र प्ररूपणा एवं स्पर्शन परूपणा में एक आर्या का उल्लेख क्रमश: एक—एक बार आया है । संस्कृत के आर्या छंद में निबद्ध इस श्लोक में व्यास से परिधि निकालने का नियम दिया गया है। जो निम्नवत् है।

व्यासं षोडशगुणितं षोडशसहितं त्रिरूपरूपैर्भक्तम् ।

व्यास त्रिगुणितसहितं सूक्ष्मादपि तद्भवेत्सूक्ष्मम् ।।

व्यास को १६ से गुणा करके उसमें १६ जोड़कर ११३ से भाग देने एवं पुन: उसमें व्यास का तीन गुणा जोड़ने पर परिधि का सूक्ष्मतम् मान प्राप्त होता है। बीजीय रूप से यदि व्यास हो एवं म् परिधि हो, तो म्ृ १६ ्ृ + १६ / ११३/ + ३् इस पूर्ण आर्या के अतिरिक्त अनेक आर्याखण्ड भी यत्र—तत्र मिलते हैं। दाशमिक स्थान मान पद्धति को व्यक्त करने वाली अन्य अनेक प्राकृत गाथाएँ ‘द्रव्यप्रमाणानुगम’ में मिलती है। कतिपय आर्याखण्ड निम्न हैं—

रूपेषु गुणमर्थेषु वग्गणं।

रूपोनमादिसंगुणमेकोनगुन्मथितमिच्छा।
व्यासार्घकृतित्रिंक समस्तफलितम् ।

ये सभी आर्याएं, आर्याखण्ड एवं सूत्र किसी एक ही ग्रन्थ से उद्घृत हैं या भिन्न—भिन्न, यह निश्चयपूर्वक कहना संभव नहीं है, तथापि अधिक संभावना इस बात की है कि ये सभी किसी पद्यात्मक संस्कृत भाषा निबद्ध ग्रंथ से उद्धृत हैं। जैनाचार्यों की प्रमाण रूप में जैन ग्रंथों से ही उद्धरण देने की परम्परा के आधार पर यह कहा जा सकता है कि प्राचीन काल में कम से कम एक संस्कृत भाषा का पद्यमय गणित ग्रन्थ अवश्य था, जो वर्तमान में उपलब्ध नहीं है। प्राकृत गाथाओं के गणित सम्बन्धी उद्धरण भी इसी धवला टीका के द्रव्य—प्रमाणानुगम एवं क्षेत्रप्ररूपणा के प्रकरणों में मिलते हैं। गणित सम्बन्धी ये गाथायें ‘एत्थ उत्वज्जंतीओगाहाओ’ एवं ‘ एत्थ करणगाहा वृत्तंच’ आदि उत्थानिका वाक्य उद्धृत की गई हैं। इस टीका में करणानुयोग से सम्बन्धित खगोलीय नियमों को स्पष्ट करने वाली गाथाएँ तो बहुत हैं किन्तु हम यहाँ शुद्ध गणित शास्त्र सम्बन्धी कतिपय गाथाओं को उद्धृत कर रहे हैं। द्रव्यप्रमाणानुगम में हमें कुछ गाथाएँ मिलती हैं जिनमें भाज्य, भाजक एवं भिन्नों के हानिवृद्धि रूप नियम दिये गये हैं। गाथाएँ निम्नलिखित हैं—

अवहार वडिढरूवाणवहारादो हु लद्धअवहारो।

रूबहिओ हाणिए होदि हु बड्ढीए विवरीदो।

अवहार विसेसेण य छिण्णवहारादु लद्धरूवा जे।
रूवाहियाउणा वि य अवहारो हाणिबड्ढीणं।।

लद्धविसेसच्छिण्णं लद्धं रूवाहिऊणयं चावि।
अवहारहाणि वाड्ढोणवहारो सो मुणेयव्वो।।

लद्धंतरसगुणिदे अवहारे भज्जमाणरासिम्हि।
पक्किखत्ते उप्पज्जढ लद्धस्सहियस्स हो रासी।।

हारान्तरहृतहाराल्लब्धेन हतस्य पूर्व लब्धस्य।
हाराहृतभोज्यशेष: स चान्तरं हानिवृद्धि स्त:।।

अवणयणरासिगुणिदो अवरायेगुणएण लद्धेण।
भजिदो हू भागहारो पंक्खेवो होदि अवहारो।

पक्खेवरासिगुरिदो पक्खेवेणाहिएण द्धेण।
भजिओ हु भागहारो अवणेज्जो होइ अवहारे।

जे अहिया अवहारे रूवा तेहि गुणित्तु पुव्वफलं।
अहियवहारेण हिए लद्धं पुव्वफलं ऊणं।।

जे ऊणा अवहारे रूवा तेहिं गुणित्तु पुव्वफलं।
उणवहारेण हिए लद्धं पुव्वफलं अहियं।।

इसके अतिरिक्त, ‘राशि विसेसेण वहिदं’१७ एवं ‘विक्खम्भा इस गुणं करणी’१८ आदि गाथाएँ क्रमश: द्रव्यप्रमाणानुगम एवं स्पर्शन प्ररूपणा में मिलती है। उपर्युक्त गाथाओं का मूल स्रोत कोई प्राकृत गाथामय गणित ग्रन्थ धवलाकार के सम्मुख अवश्य रहा होगा। धवला में गणित शास्त्र सम्बन्धी उल्लेखों का तीसरा आधारभूत ग्रंथ परियम्म सुत्तं है। यह प्राकृत गद्यमय ग्रंथ था। इस ग्रंथ का उल्लेख द्रव्यप्रमाणानुगम (पु,—३) एवं क्षेत्रप्ररूपणा (पु.—४) में लगभग २० बार आया है। संख्यात, असंख्यात, अनन्त आदि के स्वरूप, जीव राशि के प्रमाण, द्वीप सागर गणना, स्वर्ग एवं नरक में जीवराशि के प्रमाण, रज्जु, जगश्रेणी व लोक के प्रमाण, आदि से सम्बन्ध रखने वाले अवतरण इस ग्रंथ से उद्धधृत किये गये हैं। उद्धरण देने की शैली से स्पष्ट है कि यह ग्रंथ गणित एवं करणानुयोग विषयक प्रामाणिक ग्रंथ था। वर्तमान में इस नाम के किसी ग्रंथ का कोई पता नहीं चलता है। एक मत के अनुसार प्राचीन काल में आचार्य कुन्दकुन्द ने षट्खण्डागम के प्रथम तीन खंडों पर परिकर्म नामक टीका लिखी है। गणित में परिकर्म का अर्थ गणितीय प्रक्रिया होता है । डॉ. हीरालाल जैन के विचार से परिकर्म नाम का गणित सम्बन्धी कोई प्राचीन गद्यात्मक ग्रंथ था, जो षट्खण्डागम से भी सम्बन्ध रखता था या इसके गणितीय भाग का विशदीकरण रूप था। उनका यह अनुमान तर्वâसंगत प्रतीत होता है।

सन्दर्भ—

१. गणितसार संग्रह,मूल— आ. महावीर, सं. एवं अनुवाद — प्रो.एल.सी.जैन, जैन संस्कृति संरक्षक संघ, शोलापुर, १९६३, पृ.— ३ अध्याय—१, गाथा—१६

२. अपुपम जैन, गणित के विकास में जैनाचार्यों का योगदान झ्प्.D. शोध प्रबन्ध, मेरठ वि.वि., मेरठ, १९९२, अप्रकाशित, पृ. १७१—१७२

३. अनुपम जैन, आचार्य कुन्दकुन्द के साहित्य में विद्यमान गणितीय तत्व, अर्हत् वचन (इन्दौर), १(१) सित. १९९८, पृ.४७—५२

४. A.N.Singh, Mathematics of Dhavala, Published whit Dhavala, Vol.-4, Amraoti,1942 ye L.C. Jain, On Cretain Mathematical Topics of Dhavala Texts, I.J.H.S. (calcutla), 11 (2), 1976, P. 85- 111

५. अनुपम जैन, जैनागमों में निहित गणितीय अध्ययन के विषय, तुलसीप्रज्ञा (लाडनूं), १३, १९८७, पृ. ५७—६४

६. देखें सन्दर्भ—२

७. देखें सन्दर्भ— ४ अ

८. अ लक्ष्मीचन्द्र जैन तिलोयपण्णत्ति को गणित, अन्तर्गत जम्बुद्दीवपण्णत्तिसंगहो, शोलापुर, १९८९

ब. लक्ष्मीचन्द्र जैन, गोम्मटसार की गणितात्मक प्रणाली, गोम्मटसार कर्मकाण्ड, भाग—२, भारतीय ज्ञानपीठ, दिल्ली, १९८१, पृ. १३९७—१४३०

९. Anupam jain, Survey of the Workdone on Jaina Mathematics, Tulsi Prajna (Ladnun), 9 (1-3), 1983

१०. अनुपम जैन, जैन गणितीय साहित्य, तुलसीप्रज्ञा (लाडनूं), ११(३), १९८५, पृ. ३—१६, १२ (२), १९८६, पृ.३१—४६

११. अनुपम जैन, कतिपय अज्ञात जैन गणित ग्रन्थ, गणित भारती (दिल्ली), ४ (१—२), १९८१, पृ.६१—७१

१२. षट्खखंडागम— धवला टीका सहित, टीकाकार—आचार्य वीरसेन, संपादन—स्व.पं. फूलचन्द सिद्धान्तशास्त्री, द्वितीय संस्करण,१९९३, जैन संस्कृति संरक्षक संघ, शोलापुर

१३. धवला पुस्तक, ४ क्षेत्रप्ररूपणा, पद १४ एवं अन्य भी अनेक स्थल

१४. वही, ४ क्षेत्रप्ररूपणा, पृ. १९८ एवं २००

१५. वही, पृ. १६९

१६. धवला पु. ३, गाथा २४—३२, पृ.४६—४९

१७. वही, पृ. ३४२

१८. धवला, पुस्तक ६, स्पर्शन प्ररूपणा, पृ. २०९

इससे स्पष्ट है कि शौरसेनी प्राकृत भाषा में निबद्ध ग्रन्थ गणित इतिहास की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है।

प्राप्त— जनवरी—९८