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श्री ऋषभदेव काव्य शतक

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श्री ऋषभदेव काव्य शतक

प्रस्तुति—श्रीमती त्रिशला जैन, लखनऊ

१. विधिवेत्ता भगवन आदिनाथ ऐसे क्षण में अवतरित हुए।

जब प्रजा विचित्र अवस्था को थी प्राप्त कर रही सुनो प्रिये।।
थे कल्पवृक्ष के इच्छित फल से जब प्राणी सुख भोग रहे।
पर हुआ अचानक वज्रपात जब वृक्ष अचानक लुप्त हुए।।

२. जब पेट भरा हो भोजन से तब इच्छाएं सीमित होती।
आसक्ति भावना शुरु हुई तब संग्रह वृत्ति शुरु कर दी।।
सब धान्य पुष्प फल पृथ्वी पर थे लगे हुए पर समझ नहीं।
इनका उपयोग करे वैसे जनता इससे अनभिज्ञ सही।।

३. तब क्षुभित प्रजाजन मिलकर के श्री ऋषभ देव की शरण गए।
अब दूर करो ये कष्ट प्रभो! ये कल्पवृक्ष सब कहाँ गए।।
तब भगवन ने असिमसि आदिक षट क्रिया उन्हें समझायी थी।
गायों का दूध दही वैसे उपयोग विधि बतलायी थी।

४. ऐसे ऋषभदेव भगवान का जीवन दर्श कराऊँ।
दशभव के वृत्तांत प्रिये मैं आज तुम्हें बतलाऊँ।।
प्रथम करूँ श्री ज्ञानमती माता को मैं अभिवंदन।
आगे वृषभदेव से लेकर वीर प्रभु को है नमन।।

५. है जम्बूद्वीप में विदेहक्षेत्र ‘‘गंधिला’’ नाम का देश कहा।
अरु उसके बीचों बीच शिखर विजयार्ध वहां पर शोभ रहा।।
उस पर्वत की उत्तर श्रेणी में नगरी इक सुंदर ‘‘अलका’’ है।
है राज्य कर रहे सुखपूर्वक शुभ नाम ‘‘महाबल’’ उनका है।

६. उनके थे मंत्री चार मगर थे स्वयंबुद्ध प्रतिभाशाली।
मिथ्या मति से थे तीन पूर्ण पर समझें खुद को वे ज्ञानी।।
एक दिवस जन्मदिन राजन का उत्सव चल रहा बहुत भारी।
शुभ पुण्य उदय से ही त्रिशला मिलती है सुख सुविधा सारी।।

७. इस तरह विवेचन कर मंत्री ने समझाया था राजन को।
राजा और प्रजा प्रसन्न हुई सुन करके धार्मिक वचनों को।।
पर तीनों मंत्री बोल उठे सब इसी जन्म में होता है।
आगे की किसने देखी है सब पुण्य पाप तो धोखा है।।

८. सर्वोदय और समाजवाद तब तक कैसे आ सकता है।
जब तक ऐसे मक्कारों से इस रामराज्य का रिश्ता है।।
सच्चे मारग को दिखलाने वाले जग में कम होते हैं।
सब तरफ देखिए अनाचार और दुराचार के डेरे हैं।।

९. जल में थल में नीले नभ में मेरु की छटा निराली थी।
वंदन करने को गये मंत्रिवर सुमनस वन में क्या लाली थी।
पर अकस्मात् देखा उसने आकाश मार्ग से मुनियों को।
आ रहे उधर ही दर्शन को देखा जैसे दो हंसों को।।

१०. पूजा स्तुति कर बैठ गए मुनिवर एक मन में शंका है।
मेरे राजा श्री महाबली वैसे क्या जीवन उनका है।।
बोले तब मंत्री से मुनिवर हैं राजन् बहुत भव्य प्राणी।
तीर्थंकर बनने वाले हैं बस प्रथम सुनो तेरे स्वामी।।

११. विद्याधर का ये रूप उन्हें पिछले निदान का ही फल है।
कुछ स्वप्न उन्होंने देखे हैं उनका भविष्य अति निर्मल है।।
उनका फल जाकर बतलाओ जिससे सन्यास धार लेंगे।
अगले भव में शुभ भावों से मरकर ‘‘ललितांग’’ देव होंगे।।

१२. क्या कहें स्वर्ग की हम महिमा हर तरफ वहाँ खुशहाली थी।
वाद्यों की मधुर धुने बजती देवियाँ बहुत बलिहारी थी।।
जो भोग दिव्य वह भोग रहे उनसे तो तृप्ति हुई नहीं।
पर कालचक्र न रुकता है चलने की आई घड़ी सही।।

१३. अपनी आयु अवशेष जान मन में छा गयी उदासी थी।
था कौन पूछता पतझड़ को बरसात स्वयं जब प्यासी थी।।
समझाया देवों ने आकर इस तरह मित्र नहीं खेद करो।
जो जन्ममरण से छुड़वाये उस जैन धर्म की शरण गहो।।

१४. आ गयी भाव में निर्मलता मन में विरागता आयी थी।
जैसे बदली के हटने से नभ में छायी हरियाली थी।।
णमोकार मंत्र पढ़ते पढ़ते तजकर शरीर आये भूपर।
पुष्कलावती में वसुन्धरा का पुत्ररत्न आये बनकर।।

१५. सुनिये अब उधर स्वर्ग में भी प्रिय स्वयंप्रभा बेहाल हुई।
ललितांग देव के मरने से बेहद दुख को थी प्राप्ति हुई।।
तब देवों के समझाने से उनमें भी कुछ ढाढ़स आया।
णमोकार मंत्र को पढ़ने से उनका जीवन भी रंग लाया।।

१६. मेरु के पूर्व विदेह—क्षेत्र की देखें शोभा क्या न्यारी थी।
रानी लक्ष्मीमति के घर में वह कन्या बन कर आयी थी।।
हो उठी दिशाएं लाल लाल उल्लास ओज बन झाँक उठा।
सुन्दर सी कन्या पाकर के राजन का मन भी नाच उठा।।

१७. थी अपने धुन में पता न कुछ कब रात हुई कब दिन आया।
बस इसी इसी में बाल्यकाल भोगा यौवन ने सहलाया।।
क्या कहें सुनो वह यौवन की शोभा कितनी ही पावन थी।
तब तन निखार करके ‘‘त्रिशला’’ खुद ही लग रही सुहागन थी।।

१८. इक दिवस देव आगमन देख स्मरण देव का आया था।
तब पूर्व प्रेम के वश होकर एक चित्र स्वयं बनवाया था।
ललितांग देव की घटनायें उसने उसमें दुहरायी थीं।
अपने प्रियवर से मिलने की ये कैसी युक्ति बनायी थी।।

१९. जब चित्र जिनालय में देखा स्मरण उन्हें भी हो आया।
तब स्वयं का चित्र बनाकर के उसे दासी के संग भिजवाया।।
कैसा देखो ये चमत्कार कैसा देखो ये मिलन हुआ।
‘‘श्रीमती’’ और श्री ‘‘वज्रजंघ’’ दोनों का पाणिग्रहण हुआ।।


२०. एक समय कहीं जाते—जाते वन में डेरा जब डाला था।
आए दो मुनिवर तभी वहाँ उनका आहार कराया था।।
देवो ने की तब पुष्पवृष्टि देखो उनकी क्या महिमा थी।
दोनों ये युगल पुत्र मेरे यह जान हृदय में खुशियां थीं।।

२१. उनकी भक्ति पूजा करके उनसे तब धर्म स्वरूप सुना।
अरु विनय सहित राजा रानी ने अगले भव का वह रूप सुना।।
हे राजन! तीर्थंकर होगे अठवें भव में इस भारत के।
अरु दान तीर्थकर्ता ‘‘श्रेयांस’’ रानी ‘‘श्रीमती’’ बनेगी वे।।

२२. इस तरह सभी के भव सुनकर राजा रानी अति मुदित हुए।
तब लौटे राजमहल को वे मन में अतिशय उल्लास लिए।।
सुख पूर्वक भोग भोग करके स्वप्निल निद्रा में खाये थे।
क्या पता किसी को आखिर वे अंतिम निद्रा में सोये थे।।

२३. जो भाेग वस्तुएं सुख देती वे भी कैसी दुखदायी हैं।
इसको अब तुम्हें सुनाएं हम यह कैसी विपदा आयी है।।
जो धूप सुगन्धित कमरे में खेई थी उनके िंककर ने।
बस उसी धुएं से कण्ठ हुए अवरुद्ध युगल दम्पत्ती के।।

२४. इस नश्वर तन को तज करके वे दोनों बने भोगभूमिज।
बैठै सुखपूर्वक भार्या संग तब आये गगन से मुनिवर द्विज।।
बोले भगवन! मेरे मन में क्यों अतिशय प्रेम उमड़ता है।
प्रभु आप कहां से आये हैं और मेरे संग क्या रिश्ता है।।

२५. तब मुनिवर प्रीतिंकर बोले जब आप महाबल राजा थे।
मैं था मंत्री तब स्वयंबुद्ध उस क्षण भी बोध कराये थे।।
बिन सम्यग्दर्शन के राजन् जो तुमने ये भव पाया है।
वो है प्रभाव आहारदान का अतएव समय अब आया है।।

२६. तुम ग्रहण करो सम्यग्दर्शन जिससे तुमको वो निधि मिले।
जिससे छुट जाए जन्म मरण ऐसी तुमको तो सिद्धि मिले।।
इस तरह आर्य को समझाकर रानी को भी समझाया था।
स्त्रीजीवन से छूट सके ऐसा व्रत उन्हें दिलाया था।।

२७. दोनों को धर्मवृद्धि देकर आकाश मार्ग से चले गए।
उनके जाने से राजन तब किंचित् वियोग में डूब गए।।
पर सोचा तभी गुरु मेरे जन्मों जन्मों से रिश्ता है।
इनके संबोधन से ही नर यह भव समुद्र तिर सकता है।।

२८. अब वज्रजंघ और श्रीमती का हाल सुनो बतलाते हैं।
दोनों ही देव बने क्रमश: श्रीधर स्वयंप्रभ कहलाते हैं।।
सम्यग्दर्शन के पाते ही यह मानव क्या बन जाता है।
स्वर्गों के तो ऐश्वर्य हैं क्या वह स्वयं प्रभु बन जाता है।।

२९. अब सुनें मुनि श्री प्रीतिंकर को केवल ज्ञान हुआ जिस क्षण।
श्रीधर आदिक सब देव चले स्तुति पूजा करने उस क्षण।।
कर युगल जोड़ प्रभु से पूछा तीनों मंत्री भी कहाँ गए।
प्रभु मुख से सुना उन्होंने जो धरती अम्बर भी कांप गए।।

३०. मिथ्यादर्शन से ऐसा भी हो सकता सबको विदित नहीं।
मानव हर पल मरता रहता इक श्वांस काल में सुनो सही।।
जैसे समुद्र में राई का इक दाना डाल कोई उसको।
ढूंढे पर मिले नहीं वैसे दूजा भव मिलता है इसको।।

३१. दो मंत्री गए जगह ऐसी जिसका निगोद है नाम कहा ।
शतमति मंत्री है नरक गया क्या कहें वहाँ के दुख अहा।।
वृक्षों के पत्ते तलवारें खौलते तेल में तले वहाँ।
पीने की प्यास लगे इतनी पर पानी मिलता नहीं वहाँ।।

३२. श्रीधर के संबोधन से वह शतमति क्रमश: ब्रह्मेन्द्र बना।
तब उनकी पूजा की आकर सम्यग्दर्शन से श्रेष्ठ बना।।
श्रीधर का अगला भव सुनिए पृथ्वी पर जाकर वुंवर बने।
था ‘‘सुविधि’’ नाम उनका प्यारा सुन्दरनंदा के पुत्र हुए।।

३३. रानी श्रीमती पूर्वभव की आकर के सुविधि का पुत्र बना ।
विधि का विधान देखे प्रियवर राजन् को उससे प्यार घना।।
स्नेह पुत्र में इतना था न दीक्षाधारण की उनने।
घर में रहकर ही व्रत पाले उत्कृष्ट बने श्रावक जन में।।

३४. अंतिमक्षण में दीक्षा लेकर वे अच्युत स्वर्ग के इंद्र बने।
न रहा पुत्र उनसे पीछे वह भी जाकर प्रतीन्द्र बने।।
सिंहादिक चार पशु भी थे उनसे उस क्षण से जुड़े हुए।
जब वन में राजा रानी ने मुनिवर को थे आहार दिए।।

३५. क्या हुआ समागम बतलाये वे भी चारों जब देव बने।
सब साथ साथ विचरण करते सुख सागर में थे मग्न बड़े।।
सुख भोग भोगते भी वे सब थे तत्वज्ञान चर्चा करते।
ऋद्धि सिद्धि से युक्त सभी मेरु गिरि का वंदन करते।।

३६. आओ अब तुम्हें बताएं हम वे इन्द्र स्वर्ग से कहां गए।
श्री ‘‘वज्रसेन’’ तीर्थंकर के आकर के चक्री पुत्र हुए।।
ऐसी है जगह जहां हरदम तीर्थंकर जन्म लिया करते।
वह पूर्व विदेह कहा जग में वे जम्बूद्वीप में ही होते।।

३७. है ‘‘वज्रनाभि’’ यह नाम रखा रानी श्रीकांता ने उनका।
छह खंड वसुधा को जीतेगा आशीष मिला था राजन का।।
पिछले भव से जो चले साथ आ करके भ्रात बने सारे।
अत्यन्त पुण्य से ही देखो ऐसा संयोग मिले प्यारे।।

३८. छयानवें हजार रानियां थी अरु एक सहस्र पुत्र उनके।
वह चक्ररत्न से शोभ रह सब राजन् झुकते चरणों में।
ऐसे सुख वैभव को तजकर जब वे जिन दीक्षा लेते हैं।
तब तीनों लोकों में ‘‘त्रिशला’’ इक अद्भुत कंपन होते हैं।।

३९. शुभ सोलह कारण भाने से तीर्थंकर प्रकृति का बंध किया।
अतिशय विशुद्ध परिणामों से सर्वार्थसिद्धि में गमन किया।।
सब स्वर्गों में स्त्री सुख है पर इसका सुख सर्वोत्तम है।
यहाँ बाल ब्रह्मचारी रहते कहते इसको अंतिम भव है।।

४०. अब तक बतलाये नव भव ये अब आगे जो बतलायेगे।
प्रभु स्वर्गपुरी से आकर के अब ऋषभदेव बन जायेंगे।
आचार्य प्ररूपित दशभव से प्रभु दशावतारी कहलाये।
सृष्टि के आप विधाता हैं ब्रह्मा विष्णु भी कहलायें।।

४१. चौदह कुलकर में नाभिराज अंतिम कुलकर कहलाये थे।
मरुदेवी कन्या के संग में इन्द्रों ने ब्याह रचाये थे।।
इनसे ही प्रभुवर जन्मेंगे यह जान इन्द्र ने पूजा की।
और नाम ‘‘अयोध्या’’ है जिसका ऐसी नगरी की रचना की।।

४२. आ गया स्वर्ग मानो भू पर ऐसा वह नगर सजाया था।
छह महीने तक नभ से कुबेर ने रत्न वहाँ बरसाया था।।
गन्धर्व सुरों के वाद्य बजे किन्नरियों ने संगीत रचा।
सब देव देवियाँ नृत्य कर स्वागत करे नाभिराज जी का।।

४३. इक दिन माता श्री मरुदेवी कोमल शय्या पर सोई थी।
देखे जो सोलह स्वप्ने थे उन सपनों में ही खोई थी।।
फिर सोचा चले प्रभु सम्मुख वे इसका फल बतलायेंगे।
रोमांच हुआ सुन रानी को तीर्थंकर मां कहलायेंगे।।

४४. अब सुनिये माँ मरुदेवी के देखे क्या ठाठ निराले थे।
श्री आदि देवियाँ माता की सेवा करके सुख पाते थे।।
कोई पैर दबाती माता के कोई नृत्य गान कर खुश करती।
जो दे न सके कोई ऐसे माता से प्रश्नोत्तर करतीं।।

४५. आ गया सुनहरा पल वह भी जब सूर्य उदय का समय हुआ।
माता मरुदेवी ने उस क्षण तीर्थंकर प्रभु को जन्म दिया।।
इन्द्रादि चल लिए स्वर्गों से दर्शन करने को आतुर थे।
पर अंदर नहीं प्रवेश मिला इसलिए हुए चिंतातुर थे।

४६. इंद्राणी को तब आज्ञा दी जिनगृह में आप प्रवेश करो।
तुम धन्य बहुत हो हे! देवि इसलिए प्रथम प्रभु दर्शन करो।
क्षीरोदधि का जल लाकर के इन्द्रों ने था तब न्हवन किया।
वाद्यों की मुधर धुनें बजती सबने मिल अनुपम नृत्य किया।।

४७. किस तरह मनाया जन्मोत्सव सुनिये अब तुम्हें सुनाते हैं।
मेरुगिरिवर की पांडुशिला पर जिन प्रभु को ले जाते हैं।।
क्षीरोदधि का जल लाकर के इन्द्रों ने था तब न्हवन किया।
वाद्यों की मधुर धुनें बजती सबने मिल अनुपम नृत्य किया।।

४८. स्वर्गों से लाये वस्त्र और आभूषण शचि ने पहनाये।
वह रूप अनूपम लख करके सूरज चंदा भी शरमाये।।
अंगूठे में अमृत भर के माता के ढिग ला लिटा दिया।
जब आँख खुली थी माता की मानो निद्रा से जगा दिया।।

४९. मुख मयंक को निरख—निरख कर मरुदेवी माँ पुलकित होतीं।
नजर कहीं न लग जाये यह सोच सोच आशंकित होतीं।।
मन में उमड़ रहा रहा था सागर अंखियों में छवि समा रही थी।
मणियों से था बना पालना मोतियन लड़ियां झुला रहीं थी।।

५०. श्री नाभिराज भी निजसुत को थे देख—देख प्रमुदित होते।
उनकी वह बालसुलभ क्रीड़ा से दोनों आनंदित होते।।
इस तरह महोत्सव हुआ बड़ा वह चैत्र कृष्ण नवमी दिन था।
और नगर वासियों की खातिर वह बना बहुत ही शुभ दिन था।।

५१. जब शैशवकाल व्यतीत हुआ आया था तब यौवन उन पर।
श्री नाभिराज तब थे आये उनसे कुछ आशाएं लेकर।।
हैं आदिपुरुष इस सृष्टि के इसलिए आप अनुमति दीजे।
संतति का मार्ग चले आगे इस हेतु विवाह कार्य कीजे।।

५२. श्री ऋषभदेव ने हंस करके स्वीकार किया पितु वचनों को।
सबने मिल प्रभु का ब्याह किया थी यशस्वती और सुनंदा दो।।
उस क्षण की शोभा क्या कहिए जब दुल्हन बनी अयोध्या थी।
इन्द्राणि देवगण नृत्य करें क्या कहें वहाँ क्या खुशियाँ थीं।।

५३. कुछ समय काल जब बीत गया उनके घर शिशु का जन्म हुआ।
एक सूरज था दूजा चंदा दोनों का वैसा मिलन हुआ।
वे पुत्र नहीं थे साधारण इक चक्री दूजा कामदेव।
ऐसा शुभ योग नहीं मिलता यह सब महिमा उन ऋषभदेव।।

५४. आगे भी रानी यशस्वती ने इक कम सौ पुत्र दिये जग को।
ब्राह्मी कन्या भी देन उन्हीं की सुंदरी मिली थी सुनंदा को।।
है भरत नाम से यह भारत जग में प्रसिद्धि को प्राप्त हुआ।
छह खंड वसुधा तो जीती थी पर बाहुबली से हार गया।।

५५. इक समय राज्य सिंहासन पर सुखपूर्वक बैठे थे राजन्।
ब्राह्मी और सुन्दरी कन्यायें आकर बैठी कर अभिवादन।।
प्रभु आदिनाथ ने बड़े प्रेम से उन्हें गोद में बिठा लिया।
और कहा पढ़ो अब विद्यायें ऐसा उनको आशीष दिया।।

५६. इक तरफ बिठाया ब्राह्मी को अरु उसको स्वर विद्यायें दी।
सुन्दरी बैठकर बायीं तरफ देखो अंकविद्या थी सीखी।।
जब वरदहस्त हो तीर्थंकर का सरस्वती जिनके मुख में।
तब नहीं विषय कुछ छूट सका पढ़ लिया वाङमय था उनने।।

५७. सब पुत्रों को भी वृषभदेव ने सब विषयों का ज्ञान दिया।
वाणिज्य शिल्प अरु अर्थशास्त्र गन्धर्वशास्त्र सब पढ़ा दिया।।
वे बुद्धि वीर्य बल शौर्य सहित अरु अनुपम आभाशाली थे।
वे विश्वविजेता थे क्योंकि सब तद्भव मुक्तिगामी थे।।

५८. इस तरह पुत्र और पुत्री संग उनका बीता कुमारकाल।
पर तभी अचानक शक्ति हीन हो कल्पवृक्ष का गया काल।।
तब व्याकुल चित्त प्रजा आई श्री नाभिराज के चरणों में।
उनको भेजा सम्मुख सुत के वे दूर करेंगे कष्टों से।।

५९. हम भूख प्यास से व्याकुल हैं रहने की भी कुछ जगह नहीं।
इत्यादिक दीन वचन बोले प्रभुवर से जाकर सुनो सही।।
तब भगवन ने स्मरण किया इन्द्राणि देवगण आये थे।
मंदिर का कर निर्माण चहुं तरफ सबके आवास बनाये थे।।

६०. सबको सुखपूर्वक स्थिर कर षटक्रिया उन्हें समझायी थी।
उस समय सरागी थे भगवन नहीं वीतरागता आई थी।।
फिर मनुषों के कर्मानुसार वर्णों का उनने चयन किया।
क्षत्रिय वैश्य और शूद्र वर्ण इस तरह उन्हें फिर नाम दिया।।

६१. युग की आदी में हुए आप इसलिए आदि ब्रह्मा तुम हो।
हो सृष्टि विधायक कृतयुग के इसलिए विधाता भी तुम हो।।
युगस्रष्टा कहें आपको ही इसमें न कोई भी अतिशय है।
हो प्रजापति सारे जग के इसलिए नमन अब सविनय है।।

६२. बीते कुछ काल और आगे श्री नाभिराज के जीवन में।
सम्राट बना के भगवन को सुख से बैठे निज उपवन में।।
इन्द्रादिक राजागण आकर राज्याभिषेक करवाया था।
प्रभु के चरणों में झुके सभी जब राजमुकुट पहनाया था।।

६३. इस तरह काल के बीते दिन कितने देखो ये पता नहीं।
वह खोये थे सुख वैभव में आभास उन्हें कुछ हुआ नहीं।।
इन्द्राणि गणों ने चितित हो फिर ऐसी युक्ति बनायी थी।
उन नृत्यसभा में अल्पायु की देवी इक भिजवाई थी।।

६४. वह देव नर्तकी नीलांजना रस भाव लय सहित नृत्य किया।
उस रूपसुन्दरी ने अपने यौवन से सबको मुग्ध किया।।
पर तभी अचानक आयु के दीपक बुझने से अदृश्य हुई।
कोई न समझ सका इसको इस क्षण में दूजी प्रकट हुई।।

६५. था वही नृत्य स्थान वही सबके मन को भाने वाला।
पर अवधिज्ञानी प्रभुवर ने उसके अंतर को पहचाना।।
वैराग्य भावना उदित हुई भोगों से तुरत विरक्ति हुई।
है रूप और यौवन धोखा अंत: भावना विशुद्ध हुई।।

६६. इन्द्रादिक और लौकान्तिक गण आये स्वर्गों से पृथ्वी पर।
तप कल्याणक की पूजा की चरणों में पुष्प समर्पण कर।।
आ गये अयोध्या पुर में तब चारों निकाय के देव सभी।
प्रभुवर का महाभिषेक किया पहनाये वस्त्राभूषण भी।।

६७. देकर अपना साम्राज्य भरत को भारतवर्ष सनाथ किया।
युवराज बनाकर बाहुबली को पोदनपुर का राज्य दिया।।
सब पुत्रों को भी बांट दिया उनके अनुरूप राज्य देकर।
दीक्षा लेने चल दिए नाथ सबसे ममता माया तजकर।।

६८. प्रभु जी दीक्षा धारण करके षट्मास योग में लीन हुए।
उनके संग चार हजार अन्य राजा भी वस्त्र विहीन हुए।।
नहीं समझ उन्हें थी दीक्षा क्या बाहर से बने दिगम्बर वे।
जब भूख प्यास से व्यथित हुए खाये फल फूल उदुम्बर थे।।

६९. मुनिवेष में ऐसा करने को वनदेवों ने था मना किया।
आपस में सबने चर्चाकर मनमाना था आचरण किया।।
बालों की जटा बढ़ाकर के वृक्षों की छाल पहन ली थी।
पाखण्ड चलाया था सबने परिब्राजक कुछ बन गये तभी।।

७०. षट्मास योग पश्चात् प्रभो मुनिचर्या बतलाने निकले।
नहि कोई जानता था उस क्षण भगवान भ्रमण को क्यों निकले।।
कोई निजकन्या को लाकर कहता प्रभु इनको ग्रहण करो।
कोई रत्न आभूषण आदिक लाकर कहता कुछ तो बोलो।।

७१. पर मौनव्रती प्रभु कुछ क्षण रुक आगे ही बढ़ते जाते थे।
सब श्रद्धावश आकर उनके चरणों में ही गिर जाते थे।।
इस तरह कर्म के वश होकर भगवन घूमे छह महीने तक।
आहारविधि नहि मिली कहीं हस्तिनापुरी आये थे तब।।

७२. उस रात्रि में राजा श्रेयांस ने सात स्वप्न देखे अद्भुत।
प्रभु आज कोई घर आयेंगे इनका फल बतलाया अति शुभ।।
तत्क्षण प्रभु का आगमन सुना निजभ्राता संग बाहर आये।
झुक गये चरण में प्रभुवर के उनको पिछले भव याद आये।।

७३. आहार दिया था मुनियों को जंगल में जब श्रीमती साथ।
श्री वज्रजंघ राजा थे प्रभु वे आज बने है ‘‘आदिनाथ’’।।
उन पूर्व भवों की स्मृतिवश श्रेयांस तुरत ही बोल पड़े
हे स्वामी अत्र! तिष्ठ! आदि उनके स्वर झरने फूट पड़े।।

७४. था इंतजार इस ही क्षण का श्री आदिनाथ हो गये खड़े।
नवधा भक्ति की शक्ति से प्रभुचरण सोम के महल पड़े।।
भाई भाभी संग नृप श्रेयांस ने इक्षुरस आहार दिया।
तब हुई रत्न और पुष्पवृष्टि देवों ने जयजयकार किया।।

७५. वैशाख सुदी तृतीया शुभ दिन ‘‘अक्षयतृतीया’’ से प्रसिद्ध हुई।
अक्षय हो गया वहाँ भोजन उस दिन इतनी समृद्धि हुई।।
हस्तिनापुरी भी धन्य हुई राजा श्रेयांस हो गए धन्य।
भरतेश ने आकर पूजा की तुम सा नहि दाता कोई अन्य।।

७६. मुनिमार्ग चला है तबसे ही और चला करेगा युगयुग तक।
पर ये मिथ्यात्व नहीं रहता बस रहता है ये कलियुग तक।।
श्री आदिनाथ के पोते ने जग में पाखंड चलाये थे।
पर सम्यग्ज्ञान हुआ था जब क्रमश: ‘‘महावीर’’ कहाये थे।।

७७. अब और कहे क्या आगे हम श्री मुख से ही उपदेश सुने।
प्रभु ध्यानयोग में हो विलीन निज धातिकर्म का नाश करें।।
आ गये देवगण तत्क्षण ही प्रभु केवल ज्ञान मनाने को।
और समवसरण की रचना की जग को संदेश सुनाने को।।

७८. वह मणियों से था बना हुआ खंभे सुवर्णमय उसके थे।
जो मानस्तंभ बने उसमें वे मानहरण सबके करते।।
दुनिया में कोई वस्तु नहीं जो उसकी तुलना कर सकती।
आभा इसकी इतनी प्यारी नहि कोई लेखनी लिख सकती।।

७९. अब सुनिए ऋषभदेव जिन की ओंकार ध्वनि जब प्रकट हुई।
पशु पक्षी देव मनुज सबने निज निज भाषा में ग्रहण करी।।
बन गये पुत्र श्री ‘‘वृषभसेन’’ दीक्षा लेकर पहले गणधर।
भरतेश और श्री बाहुबलि ने पहले पूजा की आकर।।

८०.दोनों सुकुमारी कन्यायें भी बनी आर्यिकाएं जाकर।
भगवन की शीतल छाया में गणिनी वह प्रथम बनी आकर।।
इतिहास उठाकर यदि देखें नारी हर युग में बलशाली।
इनसे ही तीर्थंकर होते इनसे ये जग वैभवशाली।।

८१. जब प्रभु का श्री विहार होता तब रचे कमल पग के नीचे।
षट्ऋतु के फूल फलित होते अरु धर्मचक्र चलता आगे।।
पृथ्वी दर्पणवत् स्वच्छ हुई वायु चल रही सुगन्ध मंद।
धर्मामृत रूपी वर्षा से भव्यों को मिलता परमानंद।।

८२. उस समय करोड़ों देवों के जयकारों से नभ व्याप्त हुआ।
और चार चार सौ कोशों तक यह थल सुभिक्ष को प्राप्त हुआ।।
भव्यों को सम्बोधन करके भगवन पहुंचे कैलाशगिरी।
अब अंतिमधाम यहीं होगा अब जायेंगे वे सिद्धपुरी।।

८३. अब सुने इधर भरतेश्वर नृप षट्खंड वसुधा जय कर आयें।
पर नहीं अयोध्या में प्रवेश कर रहा अत: वे सकुचायें।।
भेजा दूतों को भ्रात पास पर नहीं अधीनता स्वीकृत थी।
जा समवसरण आदीश्वर के सबने दीक्षा अंगीकृत की।।

८४. जब गया बाहुबलि निकट दूत तैयार हुए न झुकने को।
नहि हम उनसे कुछ मांग रहे पितु ने यह राज्य दिया हमको।।
इसलिए युद्ध हमसे करके यदि जीते तभी राज्य दूंगा।
यदि हार गया तो जाकर के चरणों में वंदन कर लूंगा।।

८५. मंत्रीगण ने विमर्श करके सोचा ये चरमशरीरी है।
जिसमें न हो जन का विनाश ऐसा हो काम जरूरी है।।
सबके प्रयास से दोनों ने था दृष्टियुद्ध जलयुद्ध किया।
और मल्लयुद्ध इन तीनों में था बाहुबलि ने विजय किया।।

८६. भरतेश्वर ने क्रोधित होकर तब चक्ररत्न था चला दिया।
उनका ऐसा दुष्टकृत्य देख जनता ने हाहाकार किया।।
पर यह क्या देखा चमत्कार वह चक्र वहीं निस्तेज हुआ।
इस घटना से होकर विरक्त था बाहुबलि ने योग लिया।।

८७. हो गयी विरक्ति जीवन से अरु एक वर्ष तक ध्यान किया।
कुछ शल्य रही इससे उनको तब तक नहीं केवल ज्ञान हुआ।।
चढ़ गयी लतायें पैरों पर सर्पों ने वामि बनाई थी।
भरतेश्वर ने जा पूजा की तब मुक्तिवल्लभा पाई थी।।

८८. अब सुनिये समवसरण महिमा और भगवन दर्शन की शक्ति।
भरतेश्वर के नौ सौ तेइस थे पुत्र अनादि मिथ्यादृष्टि।।
जैसे ही प्रभु के दर्श हुए आश्चर्य तुरत संयम धर कर।
उस भी भव से सब मोक्ष गये पहला मानुषभव था पाकर।।

८९. इस तरह सुनो सम्राट भरत सुखपूर्वक राज्य चलाते हैं।
कुछ दान करे संपत्ति का मन में विचार ये आते हैं।।
सबको बुलवाया निजपुर में सद्वृत्तियों का सम्मान किया।
षट्कर्मों से उपदेशित कर ‘‘ब्राह्मण’’ उनका यह नाम दिया।।

९०. कुछ समय बाद भरतेश्वर को रात्रि में सोलह स्वप्न दिखे।
तब उठे अचानक निद्रा से सोचे फल सभी अशुभ होंगे।।
इसलिए चले प्रभु के सन्निध पूछा मैंने क्या पाप किया।
क्या ब्राह्मण वंश बना करके हमने कोई अपराध किया।।

९१. प्रभु की दिव्यध्वनि खिरी तभी हे वत्स! नहीं है दोष कोई।
फिर भी आगामी कालों में यह बीज दोष का बोया ही।
और स्वप्न जो तूने देखे हैं वे पंचमकाल में फल देंगे।
जिन धर्म मार्ग से च्युत होकर ज्यादातर पाप रक्त होंगे।।

९२. जो स्वप्न उन्होंने देखे थे वो आज सभी हो रहा घटित।
यदि आप सभी पढ़ना चाहें जो पढ़िये ऋषभदेव चरित।।
भरतेश्वर ने अनिष्ठ शान्ती हेतु तब महाभिषेक किया।
वापस आ गये अयोध्या वे और जगत्गुरू को नमन किया।।

९३. बहुमूल्य रत्न से बने हुए चौबीस घंटे बनवाये थे।
जिन प्रतिमाओं से सजे हुए सब द्वारों पर टंगवाये थे।।
भरतेष मुकुट का अग्रभाग जब भी उनका स्पर्श करे।
तब आत्मविशुद्धि हेतु वे चौबीस जिन का स्मरण करें।।

९४. बस उसी समय से द्वारों पर तोरणद्वारों का प्रचलन है।
मंगलकार्यों से शुरु करें शुभ होते कर्म समापन हैं।।
ये मंगल चिन्ह सदा घर में सुख शांति सुधा बरसाते हैं।
इसका महत्त्व सारे जग में हर धर्म इसे अपनाते हैं।।

९५. देवाधिदेव आदीश्वर ने कितने दिन सुनो विहार किया।
इक सहस वर्ष तक योगी बन प्रभुवर ने मौन विहार किया।।
इक लाख सहस है पूर्व कहे उसमें चौदह दिन जब कम थे।
तब पहुँचे थे कैलाशगिरी अरु साथ सभी ही गणधर थे।।

९६. वह पौष सुदी दिन पूनम का प्रभुवर ने योग निरोध किया।
चौदह मुनि के पश्चात् प्रभु ने मुक्तिस्मा को वरण किया।।
वह माघ सुदी चौदश शुभ दिन था शुभ मुहूर्त सूर्योदय का।
पर्यकासन से बैठ गये और नाश किया सब कर्मों का।।

९७. प्रभु नित्यनिरंजन अशरीरी शिवधाम बसे थे वे जाकर।
प्रभुवर को मोक्ष हुआ ये जान इन्द्रों ने पूजा की आकर।।
देवोपुनीत शुभ अग्नि से ऋषभेश्वर का संस्कार किया।
निर्वाण कल्याण महोत्सव से अपना जीवन उद्धार किया।।

९८. पितु के वियोग से व्यथित हुआ भरतेश्वर का यह अंतर्मन।
तब वृषभसेन जी गणधर ने उनको कीना ये सम्बोधन।।
ये मोहकर्म ही है राजन्! जग में सबको रुलवाता है।
तुम ज्ञानवान होकर के भी क्यों रखो इससे नाता है।।

९९. दुनिया में देखो कितने ही हंसते हैं हँस हँस रोते हैं।
जीवन का लक्ष्य नहीं कुछ भी यह दुर्लभ जीवन खोते हैं।।
इसलिए सभी को जीवन में पुरुषार्थ सदा करना चाहिए।
श्री ऋषभदेव के जीवन से हमको शिक्षा लेना चाहिए।।

१००. श्री ऋषभदेव के जीवन का ये किचित दर्श कराया है।
जिनराज वृषभ की भक्ति ही मेरे उर भाव जगाया है।।
हे दु:खित जनों के शरणागत प्रतिपालक प्रभुवर तुम्हें नमूं।
‘‘त्रिशला’’ को भी तुम शरण मिले अतएव भक्ति से मैं प्रणमूं।।