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श्रेणी:जिन सहस्रनाम स्तोत्र

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जिनसहस्रनाम स्तोत्र

(गणिनी ज्ञानमती कृत-पद्यानुवाद)
—शंभु छंद—


जिनवर की प्रथम दिव्य देशना, नंतर सुरपति अति भक्ती से ।

निज विकसित नेत्र हजार बना, प्रभु को अवलोके विक्रिय से ।।
प्रभु एक हजार आठ लक्षण—धारी सब भाषा के स्वामी ।

शुभ एक हजार आठ नामों, से स्तुति करता वह शिवगामी ।।१।।


- दोहा -


एक हजार सु आठ ये, श्रीजिननाम महान् ।

उनका मैं वंदन करूँ, कर कर के गुणगान ।।२।।
नाम असंख्यों धारते, गुण अनंत भंडार ।

नमूं नमूं नित भक्ति से, स्वात्म सौख्य कर्तार ।।३।।

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