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पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ससंघ ऋषभदेवपुरम्-मांगीतुंगी में विराजमान है ।

प्रतिदिन पारस चैनल के सीधे प्रसारण पर प्रातः 6 से 7 बजे तक प.पू.आ. श्री चंदनामती माताजी द्वारा जैन धर्म का प्रारंभिक ज्ञान प्राप्त करें |

षट्खण्डागम ग्रंथ

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षट्खण्डागम ग्रंथ-पूज्य ज्ञानमती माताजी द्वारा मिलता है सभी भक्तों को ज्ञान रुपी अमृत-

मांगीतुंगी सिद्धक्षेत्र ऋषभदेव में विराजमान दिव्यशक्ति गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी जिन्होंने १०८ फुट भगवान ऋषभदेव की विशाल मूर्ति पर्वत पर प्रगटाई, ऐसी माताजी जिन्होंने १००-२०० ग्रंथ नहीं बल्कि ४०० से अधिक ग्रंथ लिखे हैं। उनमें से एक षट्खण्डागम ग्रंथ है, जिसकी सिद्धान्तचिंतामणि संस्कृत टीका पूज्य ज्ञानमती माता जी ने किया है |

पूज्य चंदनामती माताजी सभी भक्तों को प्रात:काल ६ बजे से पारस चैनल पर बहुत ही सुन्दर कहानी-कथाओं के माध्यम से सभी युवा वर्ग एवं बालक-बालिकाओं को अपनी मधुर वाणी से काव्य कथा सुनाती है, जो बहुत ही रोमांचक लगती है। इस समय माताजी एक कथानक सुना रही है एक ग्वाला बन गया सेठ तत्पश्चात् गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी सभी विद्वान् सुदर्शन एवं भक्तों को षट्खण्डागम का सार बहुत ही सरल और सरस भाषा में बताती हैं। माताजी ने सर्वप्रथम मंगलाचरण बताया-

सिद्धान् सिद्ध्यर्थ मानम्य, सर्वांस्त्रैलोक्यमूर्ध्वगान् इष्ट: सर्वक्रियान्तेसौ, शान्तीशो हृदि धार्यते।।

षट्खण्डागम-पाँच खण्डों पर धवला टीका १६ पुस्तके हैं। इसमें कुल ६८४१ सूत्र हैं।

ग्रंथ का मंगलाचरण णमोकार महामंत्र है। इसका आचार्य श्री पुष्पदंत स्वामी ने नहीं बनाया है, यह महामंत्र अनादिनिधन है। सभी सिद्ध भगवान तीन लोक के मस्तक पर विराजमान हैं। ऐसे सिद्ध भगवान सिद्धि के लिए (आत्मा) की सिद्ध के लिए नमस्कार करके शांतिनाथ भगवान जो सभी क्रियाओं में इष्ट है, प्रसिद्ध है, ऐसे शांतिनाथ भगवान को हृदय में धारण किया।

श्री धरसेनाचार्य को नमन किया, पुष्पदंत, भूतबलि को नमस्कार करके षट्खण्डागम ग्रंथ को नमस्कार किया। पुन: शांतिसागर जी व वीरसागर जी महाराज को भी नमन किया। पूज्य माताजी ने सन् १९९५ में वीर निर्वाण २५२१ में शरदपूर्णिमा के दिन षट्खण्डागम ग्रंथ पर सिद्धान्त चिंतामणि टीका रची।

षट्खण्डागम ग्रंथ में मंगलाचरण करते है-

णमो अरिहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आइरियाणं
णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्वसाहूणं

णमो अरिहंताणं-लोक में जितने भी अरहंत भगवान है ढाई द्वीप में ही अरहंत भगवान होते हैं। अरहंत भगवान से लेना तीर्थंकर भगवान, अरहंत में सामान्य केवली, गणधर देव आदि जितने भी केवली भगवान है, सब इसी में आ जाते हैं। मोहनीय कर्म के नाश हो जाने पर शेष सात कर्म संसार का कारण नहीं हो सकते हैं। श्री गौतम स्वामी ने चैत्यभक्ति में कहा है- मोहारिसर्व दोषारि- अरि-मोहनीय कर्म रज-ज्ञानावरण, दर्शनावरण रहस-वेदनीय कर्म घातियाँ कर्मों की ४७ अघातिया कर्मों की १६·६३ ज्ञानावरण की ५, दर्शनावरण की ९, मोहनीय की २८, अन्तराय की ५·४७, तिर्यंचायु और नरकायु·३ नरकगति, नरकगत्यानुपूर्वी, तिर्यंचगति, तिर्यंचगत्यानुपूर्वी दो इन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय, उधाते, आतप, एकेन्द्रिय, स्थावर, बादर और सूक्ष्म·१३ प्रकृतियाँ नामकर्म की है।

४७ +३ + १३ = ६३ प्रकृतियाँ

अतिशय पूजा के योग्य है, वे अर्हंत कहलाते हैं। अतिशय पूजा-गर्भावतरण कल्याणक, जन्मकल्याणक देवों द्वारा मनाया जाना, दीक्षाकल्याणक आदि पाँच कल्याणकों का देवों द्वारा मनाया जाना।

श्री गौतम स्वामी ने चैत्यभक्ति में पंच परम गुरुओं को नमन किया है-

अर्हत्सिद्धाचार्यो-

अरिहंत भगवान्-१३वें-१४वें गुणस्थानवर्ती ३४ अतिशय से सहित और १८ दोषों से रहित अरहंताणं-अरूहा सिद्धाइरिया जो अब पुन: उत्पन्न नहीं होंगे, अर्थात् जन्म-मरण नहीं करेंगे, वह अरूहंत है।

दग्धे बीजे........ जिस प्रकार बीज को जला देने के बाद पुन: उसमें अंकुर उत्पन्न नहीं होगा, उसी प्रकार कर्मबीज जला देने के बाद पुन: भवरूपी अंकुर उत्पन्न नहीं हो सकता।

णमो सिद्धाणं-नम: सिद्धेभ्य: जो सिद्ध हो गये हैं, कृतकृत्य हो गये हैं, अब आपको कुछ भी करना शेष नहीं है, आठ कर्मों से-

मोहनीय के नाश से क्षायिक सम्यक्त्व प्रगट हो गया ज्ञानावरण के नाश से अनंतज्ञान दर्शनावरण के नाश से अनंतदर्शन अन्तराय के नाश से अनंतवीर्य आयु कर्म के नाश से अवगाहन गोत्रकर्म के नाश से अगुरूलघु वेदनीय कर्म के नाश से अव्याबाध नामकर्म के नाश से सूक्ष्मत्व गुण अनंतानंत गुण के पुंज स्वरूप हैं। वैसे सिद्धों में अनंतानंत गुण विराजमान हैं।

णमो आइरियाणं-णम: आचारेभ्य:-आचार्य परमेष्ठी को नमस्कार हो, जो १२ तप, १० धर्म, ५ आचार, ६ आवश्यक, ३ गुप्ति का पालन करते हैं, वह आचार्य परमेष्ठी कहलाते हैं, ये ३६ मूलगुणधारी होते हैं। षट्खण्डागम ग्रंथ में पृष्ठ ५० पर गाथा है- जो शिष्यों का संग्रह, अनुग्रह करने में कुशल हैं। जिनेन्द्र देव की पूजा आदि का उपदेश देते हैं, आचार्य परमेष्ठी होते हैं। ३६ मूलगुण आचार्य परमेष्ठी के इस तरह है- १२ तप, आचार उत्तरादि के ८ गुण, १० प्रकार के धर्म, ६ आवश्यक, ये ३६ मूलगुण हैं। एक श्लोक ग्रंथ में आया है-

देश कुल जाई शुद्धा.... जो देश कुल जाति से शुद्ध हैं, अनादि परम्परा पिंड शुद्धि शुद्ध है। ऐसे जो दिगम्बर साधु बनते हैं, वह २८ मूलगुण का पालन करते हैं। सभी क्रियाओं को करने और कराने में और गलत मार्ग पर जाने का निषेध करते हैं और व्रतों की शुद्धि करने वाले इन सभी क्रियाओं में जो उद्यमशील है। वह आचार्य परमेष्ठी होते हैं। उपाध्याय परमेष्ठी-नम: उपाध्याय:-उपाध्याय परमेष्ठी को नमस्कार हो। १४ विद्यास्थानों के ज्ञाता उपाध्याय परमेष्ठी कहलाते हैं। १४ विद्यास्थान अर्थात् १४ पूर्व के जानने वाले भद्रबाहु स्वामी तक १४ पूर्व रहे हैंं तत्कालिक श्रुत में कुशल है, अपने मन से जो कुछ नहीं बोलते हैं। आगम के परिपेक्ष्य में बोलते हैं, वह उपाध्याय कहलाते हैं।

णमो लोए सव्वसाहूणं-नम: सर्वसाधुभ्य:

ढाईद्वीपों और दो समुद्रों में जितने भी साधुगण है उनको यहाँ नमस्कार किया गया है।

गुरूभक्त्या वयं.....

३ कम ९ करोड़ महामुनि (भावलिंगी) छट्ठे गुणस्थान से बारहवें गुणस्थानपर्यंत ढाईद्वीप में है। १८ हजार शील की पूर्ति १४वें गुणस्थान के अंत में होती है।

साधु के २८ मूलगुण-

श्री गौतम स्वामी ने- वदसमिदिंदिय..... भूमिशयन-मूलाचार में ३ प्रकार के संस्तर माने हैं। पाटा, चटाई, घास ५ महाव्रत, ५ समिति, ५ इन्द्रिय निरोध, ६ आवश्यक क्रियाएँ केशलोंच करना, नग्न दिगम्बर, स्नान नहीं करना, भूमि पर सोना, अदंतधावन, स्थिति भोजन, एक भक्त ये २८ मूलगुण साधु के होते हैं। इस प्रकार संक्षेप में पंचपरमेष्ठियों का वर्णन हुआ।

शंका-जब सिद्ध भगवान आठ कर्मों से सहित हो गये हैं और सिद्धशिला पर विराजमान हो गये हैं, तो सिद्धों को पहले नमस्कार न करके पहले अरिहंतों को क्यों नमस्कार किया है ?

समाधान-धवला टीकाकार समाधान करते हैं- यद्यपि सिद्ध भगवान बड़े हैं, गुणों की अपेक्षा। फिर भी उपकार की अपेक्षा अरिहंत की दिव्यध्वनि खिरती है। यह पक्षपात दोष के लिए नहीं है, यह शुभ पक्ष है, यह मोक्षमार्ग का हेतू है।

जसंंतियं........

गौतम स्वामी ने कहा कि-

शंका-आप भगवान महावीर को बार-बार क्यों नमस्कार करते हैं ?

समाधान-जिनके सान्निध्य में मैंने मोक्ष पद पाया, उनके प्रति विनय करना मेरा कर्तव्य है, पंचांग नमस्कार करके मैं उनके गुणों को गाता हूँ। यह सिद्धों का अपमान नहीं है। आचार्य, उपाध्याय, साधु देव पूज्य है।

शंका-देखो घाती कर्म से रहित अरहंत भगवान और घाती, अघाती कर्म से विरहित सिद्ध भगवान इसलिए इनको नमस्कार क्यों करना, कब मोक्ष जायेंगे, इनमें देवपना नहीं है ?

समाधान-नहीं, ऐसा नहीं करना, देव ही तीन रत्न है। आचार्य, उपाध्याय, साधु भी देव हैं, क्योंकि रत्नत्रय का अस्तित्व इनमें विद्यमान है। इनकी महिमा बहुत ही अचिन्त्य है। शंका -आचार्य, उपाध्याय, साधु में जो रत्नत्रय है, वह एक देश है, सम्पूर्ण कर्मों का क्षय करने में हेतू नहीं है ?

समाधान-ऐसी शंका नहीं करना देखो अग्नि को बहुत सारा पूâस का ढेर डाल दिया एक अग्नि की छोटी सी चिंगारी भी डाल दो तो पूरा पूâस जल कर भस्म हो जायेगा। रत्न का एक भी आचार्य, उपाध्याय, साधु है, उनमें भी कर्मों को नष्ट करने की ताकत है। इसी मुद्रा से मोक्ष जा सकते हैं।

प्रश्न-इस महामंत्र में पूरा द्वादशांग समाहित है। इसमें इस, अक्षर, पद, मात्राएं कितनी हैं।

उत्तर-णमोकार महामंत्र में ३५ अक्षर ५ पद, ५८ मात्राएं होती हैं। णमोकार मंत्र में ५८ मात्राएं- णमो अरिहंताणं में ३ मात्रा णमो सिद्धाणं में ८ मात्रा णमो आइरियाणं में ११ मात्रा णमो उवज्झायाणं में १२ मात्रा

णमो लोए सव्वसाहूणं में १६ मात्रा = ५८ मात्राएँ होती हैं।