संसार में समता धर्म ही सर्वोपरि है

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संसार में समता धर्म ही सर्वोपरि है

समता धर्म सुविवेक की ओर ले जाने वाला है तथा अज्ञान रूपी अंधकार को नष्ट करने वाला है, और पाप से पुण्य की ओर ले जाने वाला है। भारतीय संस्कृति का अनादिनिधन शाश्वत धर्म है। भावों पर आधारित सर्वोपरि है। मानव से मानवेश्वर बनाने वाला जगत में एकमात्र धर्म है। अष्ट कर्मों के नाश हेतु समता धर्म के अष्ट सूत्रों का पालन करना अनिवार्य रहता है। इन्हीं के माध्यम से मानव समता की ओर बढ़कर मानवेश्वर अर्थात् भगवान बन जाता है। जहाँ आठ हैं वहाँ ठाठ हैं के अष्ट सूत्र हैं—समता, संयम, सुविवेक, सप्रेम, समर्पण, सदाचार, सहकार, शाकाहार। इन्हीं से मानव जीवन का उत्थान होता है। आज हर मानव भौतिकता से त्रस्त हो रहा है। वर्तमान में भौतिक साधनों से छुटकारा पाने के लिये बच्चों को संस्कारित करना परम आवश्यक है। बड़ों की आज्ञा पालन कर अपने भविष्य का निर्माण करना परम आवश्यक है। इन्हीं तत्वों के आधार पर भारतीय संस्कृति संसार में सर्वोपरि रह सकती है।

सत् समता और अहिंसा के मार्ग भगवान बनते हैं और कैवल्य की प्राप्ति से अरिहंत होते हैं। यही जिनेन्द्रिय अनादि निधन से होते आ रहे हैं और आगे भी होते रहेंगे। उक्त आलम्बन ही आगम का सभी वेदों का सार रहा है तथा गीता में परिलक्षित भी हुआ है। यही आत्कल्याण का मार्ग संसार में अपनी भूमिका को दर्शाता है। गीता में जो कर्म सिद्धांत है, वही समता धर्म का सार है जो सदा सदा से सत पथ बतलाता चला आ रहा है। सिर्फ मानव ही अपने कर्मफल से भगवान और अरिहंत बनता है। मानव से बढ़कर इस संसार में और कोई नहीं है। मानव ही संसार का दुर्लभ प्राणी है। मानव से मानवेश्वर कहलाने के योग्य है। बाल, युवा, वृद्ध और नर नारी को भारतीय संस्कृति को सुसंस्कारित रूपों में ले जाना होगा। इसके लिये अथक प्रयासों की आवश्यकता रहेगी, तभी भारतीय संस्कृति संसार में सर्वोपरि रह सकती है। निम्न भावनाओं के साथ भारत के हर घर में इन नैतिक उद्देश्यों का पालन करना परम आवश्यक है। भारतीय संस्कृति के संवर्धन के उपाय—


समता धर्म अपनाओ, विश्व मे अिंहसा फैलाओ।
मानव से मानवेश्वर बन जाओ, नर से नारायण कहलाओ।।
संयम को घर घर में फैलाओ, सुविवेक से आँगन सजाओ।
सप्रेम का नारा लगाओ, समर्पण की भावना को अपनाओ।।
सदाचार का वातावरण बनाओ, सहकार से जियो और जीने दो।
शुद्ध शाकाहारी समाज बनाओ, मानवेश्वर बन मुक्ति पद पाओ।।

मानव से मानवेश्वर बन जाओ, समात धर्म को अपनाओ।।


मानमल जैन ‘मानवेश’ सन्मतिवाणी २५ दिसम्बर २०१४