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सप्तऋषि भगवान की आरती

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सप्तऋषि भगवान की आरती

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तर्ज—मैं तो आरती.........


मैं तो आरती उतारूं रे, सप्त ऋषीश्वर की।
जय-जय-जय सप्तऋषि, जय जय जय।। टेक.।।
पहले मुनिवर हैं सुरमन्यु, चारण ऋद्धीधर.....चारणऋद्धीधर।
दूजे ऋषिवर हैं श्रीमन्यु, जन जन के हितकर....जन जन के।
इनको नमस्कार करूं, इनका सत्कार करूं, इनको निहारूं रे,
हो-प्यारा-प्यारा मुखड़ा निहारूं रे...मैं तो.....।।१।।
श्रीनिचय मुनीश्वर तृतीय, तपलक्ष्मी भर्ता.....तपलक्ष्मी भर्ता।
सर्वसुन्दर ऋषीश्वर चतुर्थ, आतम सुखकर्ता....आतम सुखकर्ता।।
भक्ति करूं झूम-झूम, नृत्य करूं घूम-घूम, जीवन सुधारूं रे,
हो-प्यारा-प्यारा मुखड़ा निहारूं रे...मैं तो.....।।२।।
श्री जयवान मुनी पंचम, हैं पंचमगतिदाता.....पंचमगतिदाता।
विनयलालस व जयमित्र नाम, गुरूवर सुखदाता....गुरूवर सुखदाता।
सातों ये ऋद्धि धरें, विहरण इक संग करें, प्रतिमा निहारूं रे।
हो पावन इनकी प्रतिमा निहारूं रे... मैं..........।।३।।
मथुरापुर की महामारी, दूर हुई इनसे........दूर हुई इनसे।
राजा शत्रुघ्न की नगरी, पवित्र हुई इनसे......पवित्र हुई इनसे।।
‘‘चंदना’’ गुरू भक्ति करूं, काया में शक्ति भरूं, पल-पल पुकारूं मै,

हो इन्हीं को पल-पल पुकारूं मैं......मैं तो.....।।४।।