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सल्लेखना

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सल्लेखना

लेखक :—परम पूज्य १०८ आचार्यकल्प श्री श्रुतसागरजी महाराज ( समाधिस्थ )

सल्लेखना के विषय में मुख्यत: निम्नांकित पाँच बातों पर विचार किया जाता है—सल्लेखना का क्या स्वरूप है ? उसे कब और क्यों धारण करना चाहिये तथा सल्लेखना का कितना काल है? और इसके धारण करने से क्या लाभ है ?

१. सल्लेखना का स्वरूप :—

सम्यक् प्रकार से काय और कषाय को कृश करने का नाम सल्लेखना है। आचार्यों ने सल्लेखना के लक्षण में कषाय के पहिले ‘‘काय’’ पद डाला है ; क्योंकि जब तक काम (शरीर) के प्रति निर्ममत्त्वता नहीं आती, तब तक कषायों की कृशता पूर्वक आत्मा की पुष्टि अर्थात् आत्मा का कल्याण नहीं हो सकता। इसी बात को पूज्यपाद स्वामी कहते हैं कि—

यज्जीवस्योपकाराय, तद्देहस्यापकारकम्।
यद्देहस्योपकाराय, तज्जीवस्यापकारकम् ।।१९।। इष्टो.।।

जिस कार्य से आत्म कल्याण होता है, उससे शरीर को हानि पहुँचती है, और जिन विषय भोगादि के सेवन से शरीर पुष्ट होता है उससे आत्मा का अपकार होता है। अर्थात् आत्मा की दुर्गति होती है। इससे यह सिद्ध होता है कि आत्मार्थी को व्रत, उपवास एवं समीचीन तपश्चरण आदि के द्वारा काय कृश करना चाहिये। क्योंकि कायक्लेश की भावना के बिना जो आत्म साधना की जाती है वह परीषह उपसर्गादि शारीरिक कष्ट आने पर छूट सकती है, इसलिये सुखिया स्वभाव को छोड़ कर कष्ट सहिष्णु होना अति आवश्यक है। इसी को पूज्यपाद स्वामी कहते हैं :—

अदु:खभावितं ज्ञानं, क्षीयते दु:खसन्निधौ।
तस्माद्यथाबलं दु:खैरात्मानं भावयेन्मुनि।।१०२।। समाधि.।।

शरीर का, सुखियापने से पोषण करते हुये त्यागी, साधु या ज्ञानी बनने वाले किसी भी प्रकार का शारीरिक कष्ट आ जाने पर विचलित हो जाते हैं। अत: शिवार्थी को शरीर का सुखिया स्वभाव छोड़ने और काय कृश करने का निरन्तर अभ्यास करना चाहिये। यह समीचीन प्रकार से की हुई काय की कृशता कषाय कृषता में परम सहयोगी है।

२. सल्लेखना कब धारण करना चाहिये :—

मन्दाक्षत्वेऽतिवृद्धत्वे, चोपसर्गे व्रतक्षये।

र्दुिभक्षे तीव्ररोगे चासाध्ये कायबलात्यये।।
धर्मध्यान—तनूत्सर्ग, हीयमानदिके सति।

सन्यास विधिना दक्षै मृत्यु: साध्य: शिवाप्तये।।

इन्द्रियों की शक्ति मन्द हो जाने पर, अतिवृद्धपना एवं उपसर्ग आने पर, व्रतक्षय की सम्भावना होने पर, दुर्भिक्ष पड़ने पर, असाध्य रोग आ जाने पर, शारीरिक बल क्षीण होने पर तथा धर्मध्यान और कायोत्सर्ग करने की शक्ति हीन हो जाने पर सल्लेखना अङ्गीकार करें। इनमें उपसर्ग आदि कुछ कारण ऐसे हैं कि जिनके उपस्थित होने पर तत्काल सल्लेखना धारण की जाती है, किन्तु इन्द्रियों की क्षीणता एवं अतिवृद्धता आदि कुछ कारण ऐसे हैं कि जिनका अभ्यास होने पर श्रमण ज्योतिष शास्त्र, जातक शास्त्र, निमित्त शास्त्र एवं कला शास्त्र आदि से तथा ग्रहों के उपचय एवं ग्रह बलों की क्षीणतादि निमित्त विशेषों से ‘‘मेरी आयु १२ वर्ष पर्यनत की या उससे कम रह गई है’’ ऐसा भान हो जाने पर संघस्थ सभी साधु एवं साध्वियों को जिनमें हीन ज्ञान वाले, वृद्ध, बाल, रोगी, निरोगी, ज्ञानी, ध्यानी एवं तपस्वी आदि सभी हैं उन्हें एवं जो संघ संचालन करने में दक्ष हैं, गम्भीर एवं प्रौढ़ हैं, बहुत काल के दीक्षित होने से अनुभवी हैं। तथा गुरु की सानिध्यता से जिन्होंने चारित्र के संरक्षण की कुशलता प्राप्त करली है। जो मद एवं पक्षपात आदि अवगुणों से रहित तथा वात्सल्य आदि गुणों से सहित हैं ऐसे भावी आचार्य को बुलाकर अपने अमृत रस से भरे हुये सुमधुर उपदेश द्वारा सर्व प्रथम परस्पर के मनोमालिन्य को दूर करते हैं। तत्पश्चात् गुरु वियोग से उत्पन्न संक्लेश का शमन कर नवीन आचार्य को समस्त संघ का उत्तरदायित्व सौंप कर अनियत विहार करते हुये उत्तम क्षेत्र में उत्तम गुणों से युक्त निर्यापकाचार्य के समीप जहाँ परिचर्या करने वाले ४८, २४, १६, ८, ४ या कम से कम दो श्रमण अवश्य हों उनके निकट जाकर सल्लेखना धारण करता है।

३. सल्लेखना क्यों ली जाती है :—

मोक्षार्थी श्रमण सोचता है कि जिस समय मैंने जैनेश्वरी दीक्षा धारण की थी उस समय यह प्रतिज्ञा की थी कि संयम के साधन भूत इस शरीर को मैं आहार तभी तक दूँगा जब तक यह चर्या के लिये स्वयं बिना किसी सहारे के गमन करेगा, आहार करते समय स्वयं निरालम्ब खड़ा रह सकेगा, अंजुलिपुट में आये हुये आहार को स्वयं ग्रहण कर सकेगा, नेत्रों से स्वयं आहारादि का शोधन कर सकेगा, तथा कर्णपुटों से नवधा भक्ति आदि क्रिया सम्बन्धी वचनों का श्रवण कर सकेगा। किन्तु जब इसका जङ्घाबल क्षीण हो जावेगा, अञ्जुलिपुट में आये हुए आहार को स्वयं मुख तक न ले जा सकेगा, अथवा छोटित आदि दोष विशेष (आहार का बहुभाग नीचे गिरना) लगने लगेगे, नेत्रादि इन्द्रियाँ भी अपने शोधनादि कार्यों में असमर्थ हो जावेगी तब मैं इसे आहार नहीे दूंगा। कारण कि लोक में भी किसी मनुष्य को कार्य पर रखते हैं, तो जब वह पूरे एक माह कार्य कर चुकता है, तब वेतन माँगता है, किन्तु यह नोकर्म वर्गणावों का पिण्ड कितना स्वार्थी है कि षट्रस व्यञ्जन एवं चतुर्विंध आहार आदि के द्वारा जीवन भर इसकी सेवा की है और अभी भी प्रतिदिन (यथायोग्य) कर रहा हूँ फिर भी यह अपना कार्य पूरा नहीं करता। अत: इस कृतघ्नी की अब मैं भी उपेक्षा करता हूँ। ऐसा दृढ़ संकल्प करने वाला श्रमण इस नश्वर देह से निर्मोही होकर सल्लेखना धारण कर लेता है।

४. सल्लेखना का काल :—

काय सल्लेखना को बाह्य सल्लेखना भी कहते हैं। इसका जघन्य काल अन्तर्मुहूर्त, मध्यम काल अनेक भेद वाला और उत्कृष्ट काल बारह (१२) वर्ष प्रमाण है। इस उत्कृष्ट काल के विषय में—

उक्कस्सएण भत्तपइण्णाकालो जिणेिंह णिद्दिट्ठो।
कालम्मि संपहुत्ते, बारस वरिसाणि पुण्णाणि।।२५२।।आश्वास ।

शिवकोटि आचार्य कहते हैं कि भक्तप्रत्याख्यान का उत्कृष्ट काल १२ वर्ष प्रमाण है। ऐसा जिनेन्द्र भगवान ने कहा है। ‘‘जिणेहिं णिद्दिट्ठो’’ पद इस बात का निर्णायक है कि यह उत्कृष्ट काल का प्रमाण सर्वज्ञ प्रतिपादित है, मात्र छद्मस्थों द्वारा नहीं। इस बारह वर्ष प्रमाण काल में सल्लेखना का कर्तव्य क्रम कैसा होता है ? उसे आचार्य दो गाथाओं द्वारा कहते हैं :—

जोगेिंह विचित्तेहिं दु खवेइ संवच्छराणि चत्तारि।

वियडी णिज्जूहित्ता चत्तारि पुणो वि सोसेदि।।२५३।।
आयंबिलणिव्वियडीहिं, दोण्णि आयंबिलेण एक्क च।

अद्धं णादिविगट्ठेिंह अदो अद्धं विगट्ठेहिं।।२५४।। आश्वास ३।।

क्षपक अनेक प्रकार के काय क्लेशों द्वारा चार वर्ष, दूध दही घी गुड़ आदि रसत्याग द्वारा पुन: चार वर्ष, आचाम्ल और निर्विकृति द्वारा दो वर्ष, मात्र आचाम्ल भोजन द्वारा एक वर्ष, मध्यम तप द्वारा ६ माह और उत्कृष्ट तप द्वारा अतिन्त ६ माह व्यतीत करता हुआ शरीर को कृश करता है। इस काय सल्लेखना के विषय में वीरनन्दी आचार्य कहते हैं कि—

कर्तव्या विदुषा तथोक्तविधिभिर्बाह्यैस्तप: प्रक्रमै—
राचार्याऽनुमतै: समाधिफलदैरेषाङ्गसल्लेखना।।९।। अध्याय १०।।

शास्त्रों में लिखी हुई विधि के अनुसार ध्यान रूपी उत्तम फल को देने वाले और आचार्यों को मान्य ऐसे बाह्य तपश्चरणों को धारण कर उन विद्वान मुनियों को सल्लेखना धारण करना चाहिये।

कषाय सल्लेखना :— अनादि काल से जीव इन कषायों के चक्र में फसा हुआ है। इन्हें सहसा नष्ट नहीं किया जा सकता, इसलिये शनै: शनै: इन्हें नष्ट करने के लिये ‘स्नेहं वैरं सङ्ग परिग्रहं चापहाय शुद्धमना:’’ स्नेह, वैर, मोह और परिग्रह को छोड़कर शुद्धमना: होता हुआ क्षमादि गुणों का अवलम्बन लेवे। इस उत्तम कषाय सल्लेखना की प्राप्ति इस जीव को तभी हो सकती है जब यह आत्र्तरौद्र ध्यानों का बुद्धि पूर्वक त्याग कर धर्म ध्यान में संलग्न होते हुये आत्म स्थिरता को बढ़ावे, जिससे कषायें मन्द होती जावें। इस विषय में वीरनन्दी आचार्य आचारसार में कहते हैं कि—‘‘सद्ध्यानप्रकरै: कषायविषया सल्लेखना श्रेयसी’’ कषायों का कृश करना है लक्षण जिसका ऐसी यह उत्तम कषाय सल्लेखना उत्तम ध्यान के समूह से होती है। कषायों की कृशता परिणामों की निर्मलता में कारण है। इतना ही नहीं किन्तु सम्पूर्ण कषायों की कृषमा मोक्ष प्रदान करने वाली है। अत: वीरनन्दी आचार्य पुन: कहते हैं कि :—

दीक्षामादाय शिक्षामथ गणधरतां रक्षणार्थं गणस्य,

संस्कारं स्वस्य भावै: शमदम विभवैर्योऽत्र सल्लेखनां च।
क्रोधादीनां विधाय प्रथित पृथुयशा: साधयेदुत्तनार्थं,

स: स्यात्सद्भव्यसस्योत्पलनिकरमुदे मेघचन्द्रो मुनीन्द्र:।।६२।।अ. १०।

५. सल्लेखना से लाभ :—

उत्कृष्ट आराधना धारक महाश्रमण तो (कम्मरयविप्पमुक्का तेणेव भवेण सिज्झन्ति) उसी भव से मुक्ति प्राप्त करते हैं। मध्यम सल्लेखना धारी महामना: तीन भवों में और जघन्य आराधक ‘‘सत्तमजम्मेण सिज्झन्ति’’—अर्थात् सप्तम भव में मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं। इन मध्यम एवं जघन्य संयमियों के लिये सल्लेखना उसी प्रकार कार्यकारी है जिस प्रकार विदेश गमन करने वाले पथिक को कटोरदान (टिफिन केरियर) अर्थात् यह सल्लेखना मोक्ष के पहिले लोक के सम्पूर्ण सारपद अर्थात् देवेन्द्रादि के सर्व अभ्युदय सुखों का प्रदान करने वाली है। जैसा कि भगवती आराधना में कहा है कि—

किं जंपियेण बहुणा, जो सारो केवलस्य लोगस्य।
तं अचिरेण लहन्ते, फासित्ताराहणं णिखिलं।।
भगवती आराधना में गाथा नं. १९९७ से २००५ अर्थात् ९ गाथाओं द्वारा सल्लेखना के कत्र्ता, करयिता, अनुमोदक और दर्शकों की भी भूरि भूरि प्रशंसा की गई है, किन्तु खेत है कि आज कितने ही प्राणी अपने प्रचार व प्रख्याति के लिये इस मोक्ष प्रदायिनी सल्लेखना की आत्म घात से तुलना कर अपनी संसार सन्तति की वृद्धि करते हैं। जिसमें कषाय का तीव्र आवेश है, मिथ्यात्व जिसका जनक है, अज्ञानता रूपी तम से जो आच्छादित है, शस्त्र प्रयोग, विष भक्षण, अग्नि एवं जल प्रवेश आदि जिसके साधन हैं, तथा नरक निगोदादि जिसके फल हैं ऐसे आत्मघात से जो सल्लेखना की तुलना करते हैं वे त्रैलोक्य पूज्य सल्लेखना के अवर्णावाद द्वारा मानों सर्वज्ञ और सर्वज्ञ की वाणी का ही अवर्णावाद कहते हैं।