सिद्धचक्र विधान का माहात्म्य

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सिद्धचक्र विधान का माहात्म्य

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‘‘सिद्धचक्र’’ का अर्थ है सिद्धों का समूह। तीनलोक के अग्रभाग पर अनन्तानन्त सिद्ध विराजमान रहते हैं। उन सबको सिद्धचक्र विधान के माध्यम से नमन किया गया है। अष्टान्हिका पर्व में प्राय: सभी जगह सिद्धचक्र विधानों के आयोजन देखे जाते हैं क्योंकि मैना सुन्दरी ने अष्टान्हिका में इसकी विधिवत् आराधना करके अपने पति एवं सात सौ कुष्ठियों का कुष्ठ रोग दूर किया था।

‘‘सिद्ध’’ यह शब्द विशेष मंगलसूचक है। इस पद के नामोच्चारण से अनेक कार्यों की सिद्धि होती है। आचार्य श्री पूज्यपाद स्वामी ने ‘‘जैनेन्द्रप्रक्रिया’’ नामक व्याकरण ग्रंथ का शुभारंभ ‘‘सिद्ध’’ शब्द से किया है। उसका प्रथम सूत्र है-’‘सिद्धिरनेकान्तात्’’ जिसका अर्थ है-अनेकान्त से शब्दों की सिद्धि होती है। इसी प्रकार शर्ववर्म आचार्य ने कातन्त्ररूपमाला में ‘‘सिद्धो वर्णसमाम्नाय:’’ इस सूत्र से शुभारंभ किया है जिसका अर्थ है कि ‘‘वर्णों का समुदाय अनादिकाल से सिद्ध है।’’

ग्रंथ के प्रारंभ में ‘‘सिद्धि’’ एवं ‘‘सिद्ध’’ शब्द का प्रयोग स्वयमेव मंगलाचरण का रूप धारण कर लेता है जिससे कृति का निर्माण निर्विघ्न सम्पन्न होता है। ‘‘सिद्ध’’ शब्द से ‘‘सिद्धान्त’’ बनता है। जिन शास्त्रों-ग्रंथों के अन्त में सिद्धों का वर्णन आता है उसे ‘‘सिद्धान्त’’ कहते हैं।

सिद्धान्त शब्द की व्याख्या करते हुए कहा भी है-


'सिद्धानां कीर्तनादन्ते, य: सिद्धान्तप्रसिद्धवाक्।
सोऽनाद्यनन्तसन्तान:, सिद्धान्तो नोऽवताच्चिरम्।।

अर्थात् जिन ग्रंथों के अन्त में सिद्धों का कीर्तन किया गया हो उन्हें सिद्धान्त कहा जाता है, वह अनादि अनन्तकाल से चला आया सिद्धान्त चिरकाल तक हम सबकी रक्षा करे। इस कथन के अनुसार किसी अपेक्षा से चारों अनुयोग भी ‘‘सिद्धान्त’’ कहलाते हैं क्योंकि इन सबके अन्त में सिद्धों का वर्णन आया है।

अष्टान्हिक पर्व

आपकी, हमारी और समस्त जीवों की आत्मा निश्चयनय से सिद्ध है। व्यवहारनय से हम सभी संसारी हैं क्योंकि पंचपरिवर्तनशील संसार में परिभ्रमण कर रहे हैं। जब तक हम सिद्ध नहीं बन जाते, तब तक सिद्धों की आराधना करनी होगी। अष्टान्हिक पर्व अनादिनिधन पर्व है, आषाढ़, कार्तिक और फाल्गुन इन तीन महीनों की शुक्ला अष्टमी से लेकर पूर्णिमा तक यह पर्व वर्ष में तीन बार आता है। इनमें प्राय: श्रावक लोग व्रतादि भी करते हैं और सिद्धचक्र, नन्दीश्वर, कल्पद्रुम, इन्द्रध्वज आदि मंडल विधानों के आयोजन भी करते देखे जाते हैं।

आष्टान्हिक पर्व को मुख्यरूप से ‘‘नन्दीश्वर पर्व’’ कहते हैं क्योंकि इस पर्व में चारों प्रकार के इन्द्र, देवगण नन्दीश्वर द्वीप में जाकर वहाँ के बावन जिनालयों की पूजा करते हैं। आप भी नन्दीश्वर की पूजन में पढ़ते हैं-


हमें शक्ति सो नाहिं इहाँ करि थापना।
पूजूँ जिनगृह प्रतिमा, है हित आपना ।।

अर्थात् मनुष्य नन्दीश्वर द्वीप में नहीं पहुँच सकते हैं क्योंकि वह मनुष्य क्षेत्र से बाहर है। जिस प्रकार आप लोगों के लिए पर्वों में नैमित्तिक पूजा-विधान आदि क्रियाएँ बतलाई हैं उसी प्रकार हम साधुओें के लिए नन्दीश्वर पर्व की अलग से नैमित्तिक क्रिया शास्त्रों में बताई है। हम लोग भी प्रतिदिन नन्दीश्वर क्रिया में सिद्धभक्ति, नन्दीश्वर भक्ति, पंचगुरुभक्ति, शान्तिभक्ति और समाधिभक्ति पढ़ते हैं। आज जगह-जगह नन्दीश्वर द्वीप की रचनाएं भी बन गई हैं जिनके माध्यम से उन अकृत्रिम चैत्यालयो का अनुमान लगाया जा सकता है। सबसे बड़ी बात वहाँ पर मनुष्य क्षेत्र के समान रात-दिन का कोई भेद नहीं है। कर्मभूमि की तिथियों के अनुसार ही वहाँ अष्टमी से पूर्णिमा तक देवगण अहर्निश पूजन करते हैं। त्रिलोकसार, तिलोयपण्णत्ती आदि करणानुयोग के ग्रंथों में नन्दीश्वर द्वीप के वैभव का बड़ा विस्तृत सुन्दर वर्णन है।

सम्यग्दृष्टि मनुष्य समाधिमरणपूर्वक शरीर त्याग करके जब वैमानिक देवों में उत्पन्न होते हैं तो वे स्नानादि से निवृत्त होकर इच्छानुसार इन अकृत्रिम चैत्यालयों की वंदना करने जाते हैं। आप लोगों को भी जिनेन्द्र भक्ति करते हुए अपना सम्यग्दर्शन निर्मल करना है तभी मैना सुन्दरी के समान फल की प्राप्ति हो सकती है।

एक बार जंगल में कोई शिकारी राजा शिकार के लिए बाण छोड़ रहा था लेकिन उस दिन उसका प्रत्येक बाण निष्फल जाता था। उसे आश्चर्य हो रहा था कि मेरे सधे हुए हाथों से प्रतिदिन तो एक बार में छोड़े गये बाण से काम सिद्ध हो जाता था और आज मेरा प्रत्येक बाण खाली जा रहा है। ‘‘आखिर इसका कारण क्या है?’’ यह विचार करता हुआ वह राजा जंगल में आगे बढ़ता है। कुछ दूर जाने पर उसकी दृष्टि एक शिलातल पर ध्यानमग्न दिगम्बर मुनिराज पर पड़ती है। मुनि के समीप जाकर नमस्कार करने पर मुनिराज का ध्यान भंग होता है और वे राजा को अहिंसा धर्म का मार्मिक उपदेश सुनाते हैं। राजा ने प्रभावित होकर अहिंसाधर्म स्वीकार किया और वह जैनधर्मी बन गया। अहिंसा धर्म विश्व में सर्वश्रेष्ठ धर्म है जिसे सभी जातियों ने किसी न किसी रूप में स्वीकार किया है। भारतीय संस्कृति विशेषरूप से अहिंसा प्रधान संस्कृति है।

जैन की पहचान

एक बार दिल्ली में डॉ. कैलाशचंद जी (राजा टॉयज) ने मुझे बताया कि माताजी! मैंने जापान में जाकर विदेशियों के बीच बैठकर भी हमेशा छना हुआ जल पिया। वहाँ मेरे द्वारा पानी मांगने पर एक गिलास में पानी और एक खाली गिलास आता था जिसमें मैं अपने रूमाल से पानी छान लेता था। उन्होंने उसी बातचीत के दौरान अपनी एक कमी भी बतलाई कि एक दिन मेरे पास पानी का मात्र एक गिलास ही आया, दूसरा गिलास न होने से छानने की समस्या आ गई। मैं संकोचवश वही अनछना जल पीने लगा तो एक जापानी ने मुझसे कहा कि जैनसाहब! आप आज अनछना जल कैसे पी रहे हैं? मैं झेप गया, उन्होंने तुरन्त मेरे लिए दूसरा गिलास मंगवाया और तब मैंने पानी छानकर पिया।

यह है आप जैनियों की पहचान, जो पाश्चात्य देशों में भी आपका सम्मान बढ़ाती है। इसके लिए हमारे जैन बंधुओं को कहीं भी किसी प्रकार का संकोच नहीं करना चाहिए।

इसी प्रकार से सम्यग्दर्शन की दृढ़ता में भी शिथिल नहीं होना चाहिए तभी आगामी भव में स्त्रीपर्याय, पशुयोनि, नरकगति आदि का छेद हो सकता है। आचार्यश्री समन्तभद्र स्वामी ने भी कहा है-


सम्यग्दर्शनशुद्धा, नारकतिर्यङ्नपुंसकस्त्रीत्वानि।
दुष्कुलविकृताल्पायुर्दरिद्रतां च व्रजन्ति नाप्यव्रतिका:।।

अर्थात् सम्यग्दर्शन से शुद्ध मनुष्य नारकी, तिर्यंच, नपुंसक, स्त्रीपर्याय, नीचकुल, विकृतांग, अल्पायु और दरिद्रता को नहीं प्राप्त होता है।

एक बार स्वर्ग से दो देव एक सम्यग्दृष्टि श्रावक की परीक्षा करने हेतु मध्यलोक में आये। मथुरा के राजा चंपापुर में वासुपूज्य तीर्थंकर के समवसरण का दर्शन करने हेतु रथ पर बैठकर चले। उन देवों ने रास्ते में ही उनका रथ कीलित कर दिया। काफी प्रयास करने पर भी रथ हिला तक नहीं। राजा के मंत्री, पुरोहित तथा सभी लोग बोले-अब तो घर की ओर वापस चलना चाहिए किन्तु राजा ने कहा कि मैं बिना दर्शन किए वापस घर नहीं जाऊँगा। अनेक विघ्नों का सामना करते हुए राजा ने श्रद्धापूर्वक वासुपूज्य भगवान की जय बोली और तुरंत रथ चल पड़ा। देवताओं की शक्ति राजा की श्रद्धा के समक्ष कुण्ठित हो गई। तब उन्होंने अपना असली रूप प्रकट कर राजा के सम्यक्त्व की भूरि-भूरि प्रशंसा की।

सम्यग्दर्शन आत्मा में प्रकट करने की वस्तु है उसे किसी के भय से, लौकिक सुख प्राप्ति की इच्छाओं से, लाभ से कभी छोड़ना नहीं चाहिए। हमारे गुरु आचार्य श्री वीरसागर महाराज कहा करते थे-पत्थर बनो, तिनका मत बनो। क्योंकि तिनका तो थोड़ी ही हवा के झोंके में भी उड़ जाता है और पत्थर आंधी-तूफान आने पर भी अडिग रहता है अत: धर्म की दृढ़ता में पत्थर के समान अडिग रहना चाहिए। मेरा कहने का अभिप्राय यही है कि पाश्चात्य संस्कृति में बहकर अपनी संस्कृति मत भूलो। वैदिक रामायण में भी टी.वी. पर देखने वालों ने मुझे बताया कि दशरथ की मृत्यु के बाद उन रानियों ने सफेद साड़ी पहनी, उन लोगों ने कोई अलंकार-गहना आदि नहीं पहना, यह थी प्राचीन वैदिक संस्कृति।

आज हमारे देश पर पश्चिमी सभ्यता की छाप पड़ती जा रही है इसीलिए अनेक विकृतियाँ, कुरीतियाँ, फैशनपरस्ती बढ़ती जा रही है। जिसका दुष्परिणाम यह निकल रहा है कि आप शाकाहारी होकर भी अनजान में मांसाहार कर रहे हैं। अपने जीवन को आधुनिकता का खिताब देकर हिंसा को बढ़ावा दे रहे हैं। यदि हमारे सभी जैन बंधु, महिलाएं अपने क्षणिक आनन्द से मुख मोड़कर शैम्पू, लिपिस्टिक, नेलपॉलिश, तरह-तरह के साबुन, मंजन आदि प्रयोग करने का त्याग कर दें तो बड़ी मात्रा में निरीह पशुओं की हिंसा बच सकती है। केवल इन छोटे-छोटे विषयों पर चिन्तन करने की आवश्यकता है। न तो इनसे आपकी लोकप्रियता मे कोई फर्व पड़ता है और न ही शारीरिक स्वास्थ्य अच्छा होता है, प्रत्युत् धर्म और स्वास्थ्य दोनों ही दृष्टि से इन हिंसक पदार्थों का सेवन हितकारी नहीं है।

आप स्वयं अपने खान-पान, आचार-विचार, आत्मशुद्धि से निर्णय कर सकते हैं कि आपको सम्यग्दर्शन है या नहीं। व्यवहार सम्यग्दर्शन का स्थूल रूप में यही थर्मामीटर है। वास्तविक व्यवहार सम्यग्दर्शन तथा निश्चय सम्यग्दर्शन का फैसला तो केवली भगवान ही कर सकते हैं। अष्टान्हिका, दशलक्षण आदि पर्वों में आत्मशुद्धि पर विशेष ध्यान देना चाहिए तभी क्रमपरम्परा से सिद्ध पद की प्राप्ति हो सकती है। अनन्त गुणों के धारी सिद्ध परमेष्ठी की भक्ति से आपको मनवांछित फल प्राप्त होवे यही मेरा मंगल आशीर्वाद है।