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सुदर्शन मेरु पूजा

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सुदर्शन मेरु पूजा

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अथ स्थापना-शंभु छंद

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त्रिभुवन के बीचों बीच कहा, सबसे ऊँचा मंदर पर्वत।
सोलह चैत्यालय हैं इस पर, अकृत्रिम अनुपम अतिशययुत।।
निज समता रस के आस्वादी, ऋषिगण जहाँ विचरण करते हैं।
तीर्थंकर के अभिषव होते, उस गिरि की पूजा करते हैं।।
ॐ ह्रीं सुदर्शनमेरुसंबंधि-षोडशचैत्यालयस्थ-सर्वजिनबिम्बसमूह! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननं।
ॐ ह्रीं सुदर्शनमेरुसंबंधि-षोडशचैत्यालयस्थ-सर्वजिनबिम्बसमूह! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनम् ।
ॐ ह्रीं सुदर्शनमेरुसंबंधि-षोडशचैत्यालयस्थ-सर्वजिनबिम्बसमूह! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणम्।
समरस सम निर्मल जल लेकर, मन से मेरू पर जा करके।
जिनवर प्रतिमा के चरणों में, भक्ती से जलधारा करके।।
निज साम्य सुधारस पीकर के, भव तृष्णा दाह बुझा पाऊँ।
जिन प्रतिमा सम निज में निज को, निश्चल कर निज सुख पा जाऊँ।।

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ॐ ह्रीं सुदर्शनमेरुसंबंधि-षोडशजिनचैत्यालयस्थ सर्वजिनप्रतिमाभ्यो जलं निर्वपामीति स्वाहा।
जिन वच सम शीतल चंदन ले, मन से मेरू पर जा करके।
जिनवर प्रतिमा के चरणों में, भक्ती से गंधार्चन करके।।
निज में सहजिक शीतलतामय, आनंद सुधारस को पाऊँ।
जिन प्रतिमासम निज को निज में, निश्चल कर निज सुख पा जाऊँ।।

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ॐ ह्रीं सुदर्शनमेरुसंबंधि-षोडशजिनचैत्यालयस्थ सर्वजिनप्रतिमाभ्यो चंदनं निर्वपामीति स्वाहा।
निज गुण सम उज्ज्वल अक्षत ले, मन से मेरू पर जा करके।
जिनवर प्रतिमा के चरण निकट, भक्ती से पुंज चढ़ा करके।।
निज शुद्ध अखंडित आत्मा के, अगणित गुणमणि को पा जाऊँ।
जिन मूर्ती सम निज में निज को, निश्चल कर निज सुख पा जाऊँ।।

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ॐ ह्रीं सुदर्शनमेरुसंबंधि-षोडशजिनचैत्यालयस्थ सर्वजिनप्रतिमाभ्यो अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा।
जिन यश सम सुरभित पुष्प लिये, मन से मेरू पर जा करके।
जिनवर प्रतिमा के चरणों में, भक्ती से पुष्प चढ़ा करके।।
सौगंध्य सहित निज समयसारमय, स्वात्म स्वभाव सहज पाऊँ।
जिन प्रतिमासम निज में निज को, निश्चल कर निज सुख पा जाऊँ।।

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ॐ ह्रीं सुदर्शनमेरुसंबंधि-षोडशजिनचैत्यालयस्थ सर्वजिनप्रतिमाभ्यो पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।
शुभ भावामृत के पिंड सदृश, नैवेद्य सरस घृतमय लाके।
मन से मेरू पर जाकर के, भक्ती से चरू चढ़ा करके।।
चित पिंड अखंड सुगुण मंडित, पीयूष पिंड निज को पाऊँ।
जिन प्रतिमासम निज में निजको, निश्चल कर निज सुख पा जाऊँ।।

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ॐ ह्रीं सुदर्शनमेरुसंबंधि-षोडशजिनचैत्यालयस्थ सर्वजिनप्रतिमाभ्यो नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जिन केवल सूर्य किरण सदृश, जगमगता दीप जला करके।
मन से मेरू पर जाकर के, भक्ती से युग आरति करके।।
अविभागी अनवधि ज्योतिर्मय, निज परम बोध रवि प्रगटाऊँ।
जिन प्रतिमासम निज में निज को, निश्चल कर शिव सुख पा जाऊँ।।

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ॐ ह्रीं सुदर्शनमेरुसंबंधि-षोडशजिनचैत्यालयस्थ सर्वजिनप्रतिमाभ्यो दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
चंदन संमिश्रित धूप लिये, मन से मेरू पर जा करके।
कर्मों को दहन करूँ संप्रति, अग्नी में धूप जला करके।।
सब कर्म मलों से रहित शुद्ध, निर्मल निज अक्षय गुण पाऊँ।
जिन प्रतिमासम निज में निज को, निश्चल कर शिव सुख पा जाऊँ।।

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ॐ ह्रीं सुदर्शनमेरुसंबंधि-षोडशजिनचैत्यालयस्थ सर्वजिनप्रतिमाभ्यो धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
निज परमभाव सम सुखदायी, उत्तम रस युत फल ले करके।
मन से मेरू पर जा करके, जिन प्रतिमा ढिग अर्पण करके।।
निज परमामृत आह्लादमयी, सुखमय शिवफल को पा जाऊँ।
जिन प्रतिमासम निज में निज को, निश्चल कर शिव सुख पा जाऊँ।।

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ॐ ह्रीं सुदर्शनमेरुसंबंधि-षोडशजिनचैत्यालयस्थ सर्वजिनप्रतिमाभ्यो फलं निर्वपामीति स्वाहा।
जल चंदन आदिक अर्घ्य लिये, मन से मेरू पर जा करके।
जिनवर प्रतिमा के चरण निकट, भक्ती से अघ्र्य चढ़ा करके।।
सुख सत्ता दर्शन ज्ञानमयी, शुद्धात्म स्वरूप स्वयं पाऊँ।
जिन प्रतिमा सम निज को निज में, निश्चल कर शिव सुख पा जाऊँ।।

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ॐ ह्रीं सुदर्शनमेरुसंबंधि-षोडशजिनचैत्यालयस्थ सर्वजिनप्रतिमाभ्यो अर्घं निर्वपामीति स्वाहा।
जिन छवि सम कंचन झारी में, शीतल सरिता जल भर करके।
मन से मेरू पर जा करके, जिन सन्निध जल धारा करके।।
इंद्रिय विषयों पर विगत सहज, स्वाभाविक निज शांती पाऊँ।
जिन मूर्ती सम निज को निज में, निश्चल कर निज सुख पा जाऊँ।।
शांतये शांतिधारा।
कुवलय चंपक बेला आदिक, सुरभित कुसुमों को ले करके।
मन से मेरू पर जाकर के, पुष्पांजलि शुभ अर्पण करके।।
सहजात्म समुद्भव गुण सौरभ से, निज को सुरभित कर पाऊँ।
जिन प्रतिमा सम निज को निज में, निश्चल कर निज पद पा जाऊँ।।
दिव्य पुष्पांजलि:।

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जाप्य-ॐ ह्रीं सुदर्शनमेरुसंबंधिषोडशजिनालयस्थसर्वजिनबिम्बेभ्यो नम:।
(जाप्य-१०८ बार सुगंधित पुष्पों या पीले तंदुलों से करना चाहिए।)
जयमाला
-शंभु छंद-
श्रीमेरु सुदर्शन के ऊपर, सोलह चैत्यालय भास रहे।
उसमें क्रमश: वन भद्रसाल, नंदन सौमनसरु पांडुक हैं।।
चारों वन के चारों दिश में, शुभ चार-चार जिनमंदिर हैं।
प्रति जिनमंदिर में जिनप्रतिमाएँ, इकसौ आठ प्रमाण कहें।।१।।
ये इंद्रिय सुख से रहित अतीन्द्रिय, ज्ञान सौख्य संपतिशाली।
सब रागद्वेष विकाररहित, जिनवर प्रतिमा महिमाशाली।।
तनु बीस हजार हाथ ऊँची, पद्मासन मूर्ति सुखद सुन्दर।
प्रभु नासा दृष्टि सौम्य मुद्रा, संस्मित मुखकमल अतुल मनहर।।२।।
यह एक लाख चालिस योजन, ऊँचा शैलेन्द्र सुदर्शन है।
पृथ्वी पर चौड़ा दश हजार, ऊपर में चार हि योजन है।।
भूपर है भद्रसाल कानन, चंपक अशोक तरु आदि सहित।
चारों दिश में जिनभवन चार, उनमें जिनमूर्ति अकृत्रिम नित।।३।।
पृथ्वी से पांच शतक योजन, ऊपर नंदनवन राजे हैं।
स्वात्मैक निरत ऋषिगण गगने-गामी वहाँ निज को ध्याते हैं।।
उससे साढ़े बासठ हजार, योजन ऊपर सौमनस वनी।
सुरगण विद्याधर से पूजित, जिनवर मंदिर हैं अतुल धनी।।४।।
उससे छत्तीस सहस योजन, उâपर पांडुकवन शोभ रहा।
चारों दिश चार जिनालय से, ध्यानी मुनिगण से राज रहा।।
चारों विदिशाओं में सुन्दर हैं, पांडुक आदिक चार शिला।
तीर्थंकर शिशुओं के अभिषव, महिमोत्सव से हैं वे अमला।।५।।
भू से मेरू इकसठ हजार, योजन तक चित्रित रत्नमयी।
उससे ऊपर कांचन छविमय, चूलिका कही वैडूर्यमयी।।
जिनमंदिर में ध्वजमंगल घट, है रत्न कनकमणिमालाएँ।
हैं रत्नजटित सिंहासनादि, अनुपम वैभवयुत मन भाएँ।।६।।

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पूजन वंदन दर्शनकर्ता, भविजन को पुण्य प्रदान करें।
ज्ञानी ध्यानी मुुनिगण को भी, परमानंदामृत दान करें।।
उनकी मुद्रा को निरख-निरख, पापों का पुंज विनाश करें।
उनकी मुद्रा को ध्या-ध्या कर, परमाह्लादक निज में विचरें।।७।।
जय जय षोडश जिनवर मंदिर, जय जय अकृत्रिम सुखदाता।
जय जय मृत्युञ्जयि जिनवर की, प्रतिमा कल्पद्रुम समदाता।।
जय जय जय सकल विमल केवल, चैतन्यमयी आह्लाद भरें।
वे स्वयं अचेतन होकर भी, चेतन को सिद्धि प्रदान करें।।८।।
मैं भी उनको पूजूँ ध्याऊँ, वंदूँ प्रणमूँ गुणगान करूँ।
जिनसदन अकृत्रिम वंदन कर, निजका भव भ्रमण समाप्त करूँ।।
निज आत्मा में निज आत्मा को, पाकर निज में विश्राम करूँ।
दो केवल ‘ज्ञानमती’ मुझको, जिससे याचना समाप्त करूँ।।९।।

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ॐ ह्रीं सुदर्शनमेरुसंबंधि-षोडशजिनालयस्थ-सर्वजिनबिम्बेभ्यो जयमाला पूर्णार्घं निर्वपामीति स्वाहा।
शांतये शांतिधारा। पुष्पांजलि:।
-दोहा-
जो श्रद्धा भक्ती सहित, पूजें जिनवर धाम।
क्रम से ईप्सित सौख्ययुत, वे पावें निजधाम।।

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।।इत्याशीर्वाद:।।