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सुनो रे, सुनो रे कुन्दकुन्द की कहानी

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सुनो रे सुनो

सुनो रे सुनो कुन्दकुन्द की कहानी, कौण्डकुण्डपुर ग्राम की निशानी।

कलियुग में बतलाई जिनने, वीर प्रभू की वाणी।। टेक.।।
समयसार है प्रगट जहाँ, वहाँ मूलाचार भी छिपा नहीं है।
नियमसार में वर्णित रत्नत्रय संगम की धार वहीं है।।
सुनो रे, सुनो रे......।।१।।
कुन्दकुन्द ने निश्चय अरु व्यवहार समन्वय बतलाया।
जिसे साधकर स्वयं उन्होंने निज आत्मा को लख पाया।।
यदि एकान्त रहेगा मन में नहिं होगा सम्यग्ज्ञानी।
सुनो रे, सुनो रे......।।२।।
नहीं शास्त्र को शस्त्र बनाओ, गुरुमुख से अध्ययन करो।
कहे ‘चंदनामति’ श्रावक, मुनिचर्या का चिन्तवन करो।।
पद के योग्य क्रिया करने से, बनोगे तुम श्रद्धानी।
सुनो रे, सुनो रे......।।३।।

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