सूर्यग्रहारिष्टनिवारक श्रीपद्मप्रभू चालीसा

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सूर्यग्रहारिष्टनिवारक श्रीपद्मप्रभू चालीसा



पद्मप्रभू भगवान को,नमन करूँ शत बार ||
कर्मबंध को काटकर,फल पाऊं अविकार ||
चालीसा कर भक्ति से,पूर्ण करूँ सब काज |
मनवांछितपूरक प्रभो !पद्मप्रभू जिनराज ||
-चौपाई -
जय जय पद्मप्रभु भगवंता,वरण करी तुमने शिवकांता ||१||
षष्ठम तीर्थंकर जगनामी,जन्मे थे कौशाम्बी स्वामी ||२||
धरणराज पितु हर्ष मनाएं,मात सुसीमा भी हरषायें ||३||
इंद्र इंद्राणी आ स्वर्गों से,गिरि सुमेरु अभिषेक रचायें ||४||
एक सहस उत्तुंग तनू था,लाल कमल सम कान्तीयुत था||५|
जातिस्मरण हुआ जब उनको,दीक्षा लेने चल दिए वन को ||६||
छोड़ा राज पाट सब क्षण में,सुभग मनोहर वन में पहुचें ||७||
नमः सिद्ध कह दीक्षा ले ली,कार्तिक कृष्णा तेरस शुभ थी||८||
शुक्लध्यान से घात कर्म को,केवलज्ञान प्रगट हुआ प्रभु को ||९||
धनपति समवसरण रचता था,पुण्य बढा पुलकित होता था ||१०||
दिव्यध्वनी का पान करें सब,निज आतम उत्थान करें सब ||११||
गिरि सम्मेदशिखर पर जाकर,मुक्तिवधू को था परणा तब ||१२||
सिद्धशिला पर राजे जाकर,शाश्वत सुख मिलता है वहाँ पर ||१३||
हे पद्मा के आलय स्वामी,तीन काल तिहुं जग में नामी||१४||
पदमपुरी को धन्य कर दिया,अपना अतिशय प्रगट कर दिया ||१५||
रोमांचक है कथा वो प्यारी,जैनधर्म की कीर्ति प्रसारी ||१६||
मूला नामक जाटपुत्र था,गृहनिर्माण हेतु तत्पर था ||१७||
नींव खोदते मूर्ति दिखाई,जनता को जब बात बताई||१८||
सुन्दर इक मंदिर बनवाया,उसमें प्रभुवर को पधराया ||२०||
मनवांछा की पूर्ती होती,आत्मज्ञान की कलिका खिलती ||२१||
स्वेतवर्णयुत सुन्दर प्रतिमा,अतिशययुत है दिव्य अनुपमा ||२२||
सच्चे मन से जो जन ध्याते,सब संकट को दूर भगाते ||२३||
भूत प्रेत के कष्ट मिटाते,पुत्र पौत्र धान्यादिक पाते ||२४||
दुखी जीव सुखमय हो जाते,गुण गाते नहिं थकते जाते ||२५||
जिनशासन में नवग्रह माने,सूर्य,चन्द्र,बुध आदि बखाने ||२६||
पुण्य पाप से वह फल देते,प्राणी उनसे दुखी हैं रहते ||२७||
उच्च अगर गृह सब सुखदाता,निम्न होय तो होत असाता ||२८||
इसकी शांती हेतू प्राणी,भटक रहे बनकर अज्ञानी ||२९||
गर करते जिनप्रभु आराधन,संकट उनका नशता तत्क्षण ||३०||
रहे सूर्यगृह कुपित अगर तो,पद्मप्रभू जिन नाम जपो तुम ||३१||
उस गृह की उपशान्ती होगी,स्वास्थ्य सुखद यशकीर्ति बढ़ेगी ||३२||
नवग्रह शांतिविधान करो सब,तत्संबंधी जाप्य करो तब ||३३||
दूर होएगी सभी असाता,शास्त्र ग्रन्थ में है विख्याता ||३४||
प्रभु भक्ती कितनों को तारे,कितनों के संकट निरवारे||३५||
लौकिक सुख तो पाता प्राणी,क्रम से पा ले शिव रजधानी ||३६||
ऐसी महिमा है जिनवर की, वीतराग छवियुत प्रभुवर की ||३७||
हे प्रभु!मेरे दुख निवारो,सांसारिक दुखों से तारो ||३८||
रविग्रह की सब बाधा हर लो,पूर्ण सुखी मुझको अब कर दो ||३९||
तुम चरणों में विनती मेरी,काटो प्रभु भव भव की फेरी ||४०||
-दोहा-
चालीसा श्री पद्म का,पढ़ो भविक मन लाय|
रविग्रह की बाधा टरे,सुख संतति मिल जाय ||१||
भव का भ्रमण मिटाय के,'इंदु'बनूँ निष्पाप|
पद्मप्रभू जिनराज जी,हरो सकल संताप ||२||
    

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