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स्याद्धाद चक्र

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स्याद्वाद चक्र

अत्यंतनिशित धारं दुरासदं जिनवरस्य नयचक्रम्।

खण्डयति धार्यमाणं मूर्धानं झटिति दुर्विदग्धानाम्।

यह जिनेश्वर का स्याद्धाद चक्र (नयचक्र) महान कष्ट से प्राप्त होता है। इस चक्र की धार अत्यन्त पैनी होती है। इसको धारण करने वाला अत्यन्त शीघ्र मिथ्याज्ञान के अहंकार युक्त व्यक्तियों के मस्तक को विदीर्ण कर देता है। अर्थात यह उनके मिथ्याज्ञान क्षय कर देता है। संसार में तीन सौ तिरेसठ प्रकार की मिथ्या मान्यताओं वाले मूढ़ जीव अविवेक तथा मिथ्यात्व से प्रेरित हो अपनी आत्मा को कुगति में डालते हैं तथा दूसरे भी अभागे प्राणियों को वे कुपथ में लगाते हैं। वे ‘‘अंधे गुरु, लालची चेला दोनों नरक में ठेलम ठेला’’; यह कहावत चरितार्थ करते हैं। एकान्तवाद की महामारी जैन समाज में फैल रही है और समाज का अहित कर रही है। एकान्तवादी वर्ग को स्याद्धाद चक्र की शक्ति को स्मरण कर विवेक से काम करना चाहिए। मिथ्यात्वी के पतन की बात उनके ध्यान में रहनी चाहिए। (एकान्तवादी लोग अनेक प्रकार की कपोलज कल्पित आगम बाधित बातों का प्रचार कर मिथ्या ज्ञान की ओर जनसाधारण के मन को मोेड़ा करते हैं। हमने कुछ प्रश्नोें का उल्लेख कर उस सम्बन्ध में आगम की दृष्टि समाधान रूप मेें प्रस्तुत की है जैनधर्म के रहस्य को समझने के लिए स्याद्वाद दृष्टि अवलंबन लेना बुद्धिमत्ता है।वही सच्चा मार्ग है। एकान्त पक्ष कुगतिप्रद है। यह जिनेश्वर का स्याद्वाद चक्र एकान्तवाद का नाश करता है।)

<शंका— कानजी पंथी मण्डली में अनेक अद्भुत बातें प्रचारित होती रहती हैं। वहाँ कहा जाता है कि कुन्दकुन्द स्वामी विदेह गए थे। तथा सीमंधर तीर्थंकर की दिव्यवाणी सुनने के पश्चात् समयसार रूप श्रेष्ठ शास्त्र उन्होंने बनाया। इससे एकान्तवादी वर्ग उस महाशास्त्र को ही अपनी सर्वोच्च निधि मानते हैं, तथा अन्य शास्त्रों के प्रति हीनता की भावना रखा करते हैं । समीक्षा—कुन्दकुन्द स्वामी विदेह गए या नहीं, इस चर्चा से यहाँ प्रयोजन नहीं है। प्राचीन शिलालेखों में कुन्दकुन्द स्वामी की तरह पूज्यपाद स्वामी के विदेह गमन की चर्चा है। श्रवणबेलगोल के १०२ नं० के शिलालेख में पूज्यपाद स्वामी के बारे में कहा है ‘देव पूजित:’ वे देव पूजित थे। ‘विदेह—जिनदर्शन पूत गात्र:— विदेह के जिनेश्वर के दर्शन से उनका शरीर पवित्र हो चुका था। अप्रियमौषधर्द्धि:——लोकोत्तर औषधि ऋद्धि से वे युक्त थे। यत्पाद धौतजल स्पर्शात् कालायसं किल तदा कनकीचकार’—उनके चरण के प्रक्षालन से प्राप्त जल के स्पर्श द्वारा लोहा स्वर्ण हो जाता था। इससे यह प्रतीत होता है, उस पुरातन युग में विशेष सिद्धि सम्पन्न अनेक साधुरत्न हो गए हैं जिनका हमें पता नहीं है। पूज्यपाद स्वामी की श्रेष्ठ श्रुत सम्पत्ति का बोध उनकी आध्यात्मिक रचना इष्टोपदेश, समाधि शतक के सिवाय सर्वार्थसिद्धि जैनेन्द्र व्याकरण आदि से होता है। अत: विदेह गमन करने से प्राप्त महत्ता कुन्दकुन्द स्वामी के समान पूज्यपाद महर्षि को भी प्राप्त होती है और उनकी रचनाओं की भी विशिष्टता ध्यान में आती है। यह बात विशेष चिंतनीय है कि समयसार यदि विदेह यात्रा के पश्चात् रचित होता, तो कुन्दकुन्द स्वामी उस ग्रन्थ को सुयकेवली भणियं अर्थात् श्रुत केवली कथित न कहते। उन्होंने समयसार के मंगलाचरण में कहा है—

वोच्छामि समयपाहुडमिणमो सुयकेवली भणियं।।१।।

मैं (कुन्दकुन्द) श्रुत केवली (भद्रबाहु गुरु) कथित समयसार को कहता हूँ। केवली शब्द के पूर्व में ‘श्रुत’ शब्द सर्वज्ञ केवली का निराकरण करता है। जैसे घोड़ाशब्द के पूर्व यदि सफेद विशेषण लगा हो , तो उससे श्याम वर्णीय अश्व का निराकरण हो जाता है परोक्षज्ञानी श्रुत केवली से भिन्न है। शंका — कुन्दकुन्द स्वामी ने छन्दशास्त्र की कठिनतावश श्रुतकेवली शब्द का उपयोग किया।

समाधान — यदि काव्य शास्त्र की कठिनाई थी, तो ‘‘वे केवलि सुय—केवली भणियं’’ शब्द का प्रयोग कर सकते थे। नियमसार के मंगलाचरण के अनुसार वे उपरोक्त रूप में कह सकते थे। नियमसार में उन्होंने कहा है—

‘‘वोच्छामि णियमसारं केवलि सुयककेवली भणिदं।।’’

इससे इस बात की असत्यता स्पष्ट हो जाती है, जो कानीजी महोदय कहा करते हैं कि समयसार साक्षात् तीर्थंकर की वाणी सुनने के बाद रचा गया है। सम्यक् चिंतन इस कथन को झूठा प्रमाणित करता है।

(२)

कानजी पंथी पत्र ‘‘आत्मधर्म’’ में छपा था, कि कुन्दकुद स्वामी विदेह गये थे, तब कानजी राजकुमार की पर्याय में समवशरण में थे (विदेह में शरीर की ऊँचाई ५०० धनुष होती है। अत: वे राजकुमार उतने ही उच्च शरीर के रहे होंगे।) समोशरण में अनेक अंगपूर्व के ज्ञाता, अनेक ऋषिधारी महामुनि आदि भी थे, किन्तु राजकुमार की कुन्दकुन्द स्वामी पर ही विशेष दृष्टि रही आई। ‘‘आत्माधर्म’’ पत्र कहता है, आचार्य वहाँ आठ दिन ठहरे थे।’’

समीक्षा

साक्षात् — साक्षात् तीर्थंकर का सानिध्य पाकर भरतक्षेत्र मे विदेह जैसे सुदूरवर्ती प्रदेशों में पहुँचकर केवल आठ दिन पर्यंत वहाँ आवास कर कुन्दकुन्द स्वामी का शीध्र भरत क्षेत्र को वापिस लौट आने का कथन, यह ध्वनित करता है कि कानजी बाबा की बात सत्य की कसौटी पर कसने लायक नहीं है। कसौटी पर सोना कसा जाता है, टीन का टुकड़ा नहीं। कोई भी समझदार आदमी सोच सकता है, कि श्रेष्ठ आत्मा—कल्याण के साधन को पाकर विवेकी व्यक्ति अधिक से अधिक काल यापन कर स्वहित संपादन करता है। दक्षिण भारत के यात्रा करने वाले साधु जब शिखरजी पहुँचते हैं, तो वे वहाँ अधिक से अधिक समय देने का प्रयत्न करते हैं। संघ के संचालक का गृहस्थ होने के कारण कदाचित शिखरजी में अधिक रुकना सम्भव न भी हो, किन्तु विदेह में रुकने में कोई भी बाधा नहीं थी, कारण कोई संघ संचालक नहीं था। मुनीश्वर होने से कोई लौकिक झंझट भी नहीं हो सकती।

गहरा माया जाल—

यदि कानजी बाबा को विदेह में अपनी राजकुमार पर्याय, चंपा बहिन आदि का उनकी स्त्री होना स्मरण हैं, तो यह भी तो स्मरण होगा कि दिव्यध्वनि की भाषा प्राकृत, अपभ्रंश थी या वह अनक्षरी थी। कितनी बार दिव्य ध्वनि खिरती थी। मुख्य प्रश्नकर्त्ता गृहस्थ का क्या नाम था, मुख्य गणधर कौन थे? विदेह के लोगों की ऊँचाई, भोजन आदि के बारे में भी जाति स्मरण उद्बोधन करा देता। इस विषय में वे चुप हैं। अत: जाति स्मरण आदि की बात शत प्रतिशत असत्य तथा कल्पना—जाल मात्र है। तीर्थंकर सीमंधर भगवान की दिव्य ध्वनि को सुनकर आत्मज्ञान प्राप्त करने वाला सम्यक्त्वी नियम से स्वर्ग जाता, कारण अविरत गुण—स्थानवर्ती सम्यक्त्वी मनुष्य मरण कर स्वर्ग ही जाता है, यदि उसने आयु—बन्ध नहीं किया है। मनुष्यायु का बंधक मानव मरकर भोगभूमिका मनुष्य होता, तथा सौराष्ट्र में जन्म धारण नहीं करता। यह बात भी विचारणीय है कि विदेह में दीर्घायु मनुष्य होते हैं; जिनकी एक कोटि पूर्व प्रमाण आयु आगम मेें कही है। आश्चर्य है कि दो हजार वर्ष के भीतर ही तथाकथित राजकुमार (वर्तमान स्वामीजी) विदेह से यहाँ मरणकर कैसे आ गए? शिष्या चंपाबेन का भी शीघ्र मरण विदेह में कैसे हो गया? यह याद है क्या? यह भी सोचना चाहिए कि , तीर्थंकर के चरणों के समीप तत्वज्ञान रूप अमृतपान करने वाला जन्म से सम्यक्त्वहीन परिवार में कैसे उत्पन्न हुआ और कैसे बहुत समय तक मिथ्या साधु बनकर उस जीव ने धर्म के विपरीत प्रचार किया? यदि पूर्व के उच्च संस्कार होते, तो वह व्यक्ति इंद्रियों की दासता को छोड़कर हीन प्रवृत्ति के त्यागरूप सदाचार को अवश्य ग्रहण करता। उदाहरणार्थ आचार्य शांतिसागर महाराज पूर्वभव के उच्च संस्कारी थे। इससे बचपन से ही उनके मन में वैराग्य के भाव विद्यमान थे और वे दीक्षा लेकर मुनि बनना चाहते थे, यद्यपि अपने पिता श्री भीमदौड़ा पाटील के कहने से बहुत समय तक गृह त्याग नहीं कर सके थे। कानजी पंथी वर्ग में मिथ्या बाते प्रचारित की जाती है। जिससे उनके पंथ का अधिक प्रचार हो।

आत्मधर्म के कानजी (८७ वीं) जयन्ती अंक में अनेक असत्य बातों का वर्णन पढ़कर आश्चर्य होता है कि अपने मिथ्यात्व प्रेरित पक्ष को पुष्ट करने के लिए किस प्रकार माया तथा असत्य का आश्रय लेते हैं। कानजी अपने भक्तों से कहते है। ‘‘मेरा यह भव तीर्थंकर प्रकृति का बन्ध’’ करने से पूर्व का भव है अर्थात् अगले मनुष्य भव में तीर्थंकर प्रकृति का बन्ध होगा। साक्षात् तीर्थंकर भगवान के समवशरण में चंपा बहिन ने यह बात सुनी है। गुरु देव ने चंपा बहिन से कहा, बहिन यह हकीकत सत्य है। तुझे भी कई बार ऐसा भास होता था। उसका स्पष्ट हल नहीं मिलता था। उसका अर्थ समझ में आया, कि मैं तीर्थंकर का जीव हूँ।’’

वे अपने जीवन के बारे में बताते हैं ‘‘१७ वर्ष की उम्र में रामलीला देखकर उनके हृदय में वैराग्य की मस्ती चढ़ गई। विक्रम संवत् १९७८ में ज्येष्ठ कृष्ण अष्टमी के दिन स्वाघ्याय करके वे लेटे, तो ओंकार ध्वनि का नाद व साढ़े बारह करोड़ बाजों की ध्वनि का स्मरण हुआ।’’ (पृष्ठ १८)‘‘तीर्थंकर के साथ’ लेख में एक भक्त इस प्रकार स्तुति करता है, ‘‘उनका वर्तमान जीवन देखो , तो चैतन्य भगवान की भनक से भरा है। उनका भावी जीवन देखो तो भगवान से सम्बन्धित। यदि हम ज्ञान को मात्र चारभव तक लम्बाकर देख सके तो हमें गुरुदेव के बदले में साक्षात् ‘‘सूर्य ’’ के समान तेजस्वी तीर्थंकर के दर्शन होते हैं (पृष्ठ २४)’’। एक अविवेक मूर्ति भक्त लिखता है ‘‘अनंत तीर्थंकर हो गये, मगर अपने तो गुरुदेव श्री सबसे अधिक हैं। (पृष्ठ ४२) आजकल अनेक व्यक्ति स्वयं को भगवान कहकर अपनी पूजा करवा रहे हैं।

यदि पाठक गहराई से सोचे, तो उपरोक्त बातें मोह रूपी मदिरा पीने वालों की बहक सदृश है। मिथ्यात्व का आश्रय लेने वाला, मिथ्यात्व का प्रचार करने वाला एकान्तवादी का आगामी भव अंधकार पूर्ण ज्ञात होता है। इस प्रसंग में महापुराण का यह कथन वस्तु—स्थिति को समझने में विशेष लाभप्रद रहेगा। भगवान ऋषभदेव दश भव पूर्व महाबल नाम के राजा थे। उनके चार मंत्री थे। आगम पक्ष का समर्थक स्वयं बुद्ध मन्त्री कुछ उच्चभव धारण कर मोक्ष गए। मिथ्यात्व का समर्थन करने वाले महामति और संभिन्नमति मंत्री द्वय निगोद में गए। शतमति मिथ्यात्व के परिपाक से नरक गया, ‘‘गत: शतमति: श्वभ्रं मिथ्यात्व परिपाकत:’’ (१०—८)। इस संम्बन्ध में महाकवि जिनसेन स्वामी कहते हैं।

तमस्यंधे निमज्जंति सज्ज्ञान द्वेषिणो नरा:।

आप्तोपज्ञ मतोज्ञानं बुधोभ्यस्येदं अनारतम्।।१०—१०)

सम्यग्ज्ञान के द्वेषी व्यक्ति नरक रूपी गाढ़ अंधकार में निमग्न होते हैं, इसीलिए बुद्धिमान पुरुषों को आप्त प्रतिपादित सम्यग्ज्ञान का सदा अभ्यास करना चाहिये। दस कोड़ा कोड़ी सागर के अवसर्पिणी काल में भरत क्षेत्र से अगणित मुनि मोक्ष गए, किन्तु चौबीस ही आत्माओं ने तीर्थंकर प्रकृति रूप महान पुण्य का बन्धकर रत्नत्रय की समाराधना कर मोक्ष को प्राप्त किया कुन्दकुन्द स्वामी के तीर्थंकर होने का उल्लेख नहीं है। केवल मोक्ष जायेंगे, यह भी ज्ञान नहीं है, किन्तु मिथ्यात्व की मदिरा पान कराने वाले, पिलाने वाले मोक्ष जायेंगे और अगले भव में तीर्थंकर प्रकृति का बंध करेंगे, यह कथन असत्य की पराकाष्ठा है। वे भव्य हैं या अभव्य है, यह सर्वज्ञ देव ही बता सकेंगे। मिथ्या मार्ग प्रचारक राजा वसु के पतन के प्रकाश में इस समस्या का सच्चा समाधान मिलेगा।

(३)

शंका— निश्चय नय रूप पवित्र दृष्टि को धारण करने वाली आत्मा मोक्ष जाती है। समय सार में कहा है—

‘‘णिच्छय णयासिदा पुण मुण्णिो पावंति णिव्वाणं।।२७२।।

निश्चयनय का आश्रय लेने वाले मुनिगण निर्वाण प्राप्त करते हैं। निश्चयनय आत्मा को शुद्ध मानता है; व्यवहार दृष्टि अपरमभाव वालोें के कही है। परमभाव वाले शुक्लध्यानी निश्चय दृष्टि का अवलम्बन ले सिद्ध पदवी पाते हैं। हम कानजी पंथी निश्चयनय की चर्चा करते हैं। उसका निरूपण करने वाले आगम रूप समयसार को पढ़ते है; आप भी तो निश्चयनय को हमारे समान पूज्य मानते हो, समयसार ग्रंथ को भी ग्रंथराज स्वीकार करते हो; तब आप हमारे विरुद्ध हो हल्ला क्यों मचाते हो?

समाधान—

यह बात पूर्ण सत्य है कि निश्चय नय की दृष्टि मोक्ष पद है, किन्तु यह सत्य भी आपको शिरोधार्य करना चाहिए, कि निश्चय दृष्टि के पूर्व व्यवहारनय की भी आवश्यकता है। शक्ति की अपेक्षा आप आत्मा को शुद्ध अबद्ध कहते हैं, इसमें कोई आपत्ति नहीं है, किन्तु आप अपनी वर्तमान अशुद्ध बद्ध संसारी पर्याय को अस्वीकार करते हैं। अत: आपकी मान्यता स्याद्वाद दृष्टिसे बाधित होती है। हम सबका यह प्रत्यक्ष अनुभव है कि हम अल्पज्ञानी हैं। ज्ञान का एक अंश हमारे पास है। अज्ञान के सागर में हम डूबे हैं। हमारी शक्ति बहुत कम है। अनंत शक्ति का पता नहीं हैं। दु:खो से अक्रांतक होने से यह हम कैसे कह दें, कि हम सिद्ध भगवान के समान अव्याबाध अनंत सुख भोगते हैं? सर्वज्ञोक्त आगम पर विश्वास कर हम यह मानते हैं, कि यदि हमने चार घातिया कर्मों का क्षय कर दिया, तो हम अनंतज्ञानी आदि बन सकते है; अभी अनंत ज्ञानी नहीं हैं। शक्ति और व्यक्ति अर्थात् शक्ति का व्यक्त हो जाना इसमें अंतर है। आगम में कहा है; सिद्ध भगवान लोक के अग्रभाग में सिद्ध शिला के ऊपर विराजमान हैं। यदि हम संसारी पर्याय सहित न होते, तो हम भी सिद्धोें के समीप अशरीरी होकर निवास करते। आगम सच्चे ज्ञान का केन्द्र है। यह जीव को संसारी और मुक्त दो प्रकार का मानता है। निश्चय दृष्टि शुद्ध मुक्त दशा को प्रधान रूप से अपना लक्ष्य बनाती है, व्यवहार दृष्टि संसार की बद्ध दशा का मुख्यता से निरूपण करती है। नियमसार में कुन्दकुन्द स्वामी ने कहा है—

सव्वे सिद्ध सहावा सुद्धणया संसिदी जीवा।।४८।।

शुद्ध नय से सभी संसारी जीव सिद्ध स्वरूप हैं। व्यवहार नय की अपेक्षा जीव शुद्ध तथा अशुद्ध दो प्रकार के माने गए हैं। एकान्त पक्ष सत्य शासन के विपरीत होता है, और स्याद्वाद विरोधी है। यह एक दृष्टि है। दूसरी दृष्टि और है, कि संसारी जीव शरीर युक्त हैं, मुक्त जीव शरीर रहित हैं। पंचास्तिकाय में कुन्दकुन्द स्वामी यह भी कहते हैं—

जीवा संसारत्था णिव्वादा चेदणप्पगा दुविहा।।

उवओगसक्खणा वि य देहाप्पवीचारा।।१०९।।

जीव दो प्रकार के हैं, एक संसारी, दूसरा सिद्ध। दोनों चैतन्य रूप हैं। उपयोग अर्थात् ज्ञानोपयोग, दर्शनोपयोग सहित हैं। देह सहित संसारी हैं। देह रहित सिद्ध हैं। टीकाकार अमृतचंद्र सूरि ने लिखा है—

जीवा: हि द्विविधा: संसारस्था अशुद्धा, निर्वृत्ता: शुद्धाश्च’’।

कानजी पंथी कथन अनेकांत दृष्टि का प्रतिनिधित्व नहीं करने से सत्यशासन के विपरीत हो जाता है। वह स्याद्वाद विरोधी है। समन्वय दृष्टि से पूर्ण सत्य का परिज्ञान होता है। बुद्ध ने वस्तु को अनित्य माना है, यह सत्यांश है। वह वस्तु के नित्य पक्ष को अस्वीकार करता है, इससे वह सत्य कथन भी असत्य हो जाता है। इसी प्रकार कानजी पंथ में व्यवहार को सर्वथा मिथ्या मानकर निश्चय पक्ष को ही मान्यता दी जाती है; इससे वह कथन स्याद्वाद विद्या के प्रकाश में असत्य हो जाता है। मनुष्य के दो नेत्र होते हैं। सीधी आँख फूटी हो तो वह काना है, बाई आँख फूटी हो तो काना होगा। जो नय व्यवहार पक्ष को ही सत्यमानकर निश्यच पक्ष को अस्वीकार करेगा, वह मिथ्यात्वी है, इसी प्रकार जो निश्चय को सत्य मानकर व्यवहारनय को मिथ्या मानेगा, वह भी मिथ्यात्वी है। एकांत निश्चय को पकड़कर हम मोक्ष से दूर हो जावेंगे। कुन्दकुन्द स्वामी की यह बात ध्यान देने योग्य है कि निश्चयनय भगवान को सर्वज्ञ नहीं मानता और यदि व्यवहारनय का कथन मिथ्या है, तो सर्वज्ञ का लोप हो जायगा तथा सम्पूर्ण जिनागम आप्त वाणी नहीं रहेगा।

जाणदि पस्सदि सव्वं वंवहारणयेण केवली भयवं।

केवलणाणी जाणदि पस्सदि णियमेण अप्पाणं।।१६०।। नियमसार।

केवली भगवान व्यवहारनय से सर्व पदार्थों को जानते हैं, देखते हैं, किन्तु निश्चयनय से केवली भगवान अपनी आत्मा को देखते हैं, जानते हैं। इस प्रकार निश्चयनय सर्वज्ञता को अस्वीकार करता है। स्याद्वाद दृष्टि से दोनों कथन सत्य हैं। केवली भगवान सर्वज्ञ हैं ; आत्मज्ञ भी हैं। एकांतवादी के द्वारा समस्या उलझ जाती है।

विशेष बात—

यह बात ध्यान देने योग्य है। नियमसार में कहा है निश्चय दृष्टि से पुद्गल का परमाणु शुद्ध द्रव्य है। उस दृष्टि में स्कंध का कोई स्थान नहीं है। व्यवहार की दृष्टि से स्कंध का सद्भाव माना गया है, यदि व्यवहार दृष्टि को अप्रमाण तथा झूठा माना जाय, तो शून्यवाद आ जायगा, कारण निश्चय दृष्टि से स्कंध का अभाव है और स्कंध का अभाव मानने पर उसके कारण रूप परमाणु का भी अभाव हो जायेगा; अत: सर्व झंझटों से बचने के लिये दोनों नयों की वास्तविकता स्वीकार करनी चाहिये।

शंका — कुछ भी कहो हमें तो निश्चय कथनी में मजा आता है, व्यवहारनय की बात हमें नहीं रुचती। निश्चयनय का पक्ष लेने से हमारी आत्मा का उत्थान होगा।

समाधान — यह बहुत बड़ा भ्रम है। किसी भी दृष्टि के एकांत पक्ष से मोक्ष तो कदापि नहीं मिलेगा, यह सत्य है। पंचास्तिकाय की अंतिम गाथा १७२ की टीका में अमृतचंद्र सूरि ने कहा है; केवल व्यवहारदृष्टि वाला सत्कार्यों के करने के कारण दुर्गति से बचकर उच्चगति में जाकर सुखी रहेगा। निश्चय पक्ष का एकांतवादी अपने को पूर्ण शुद्ध समझ बैठे हैं। त्याग, संयम सदाचार का उनकी दृष्टि में कोई मूल्य नहीं होने से वे प्रमाद की कादम्बरी (मदिरा) पान के फलस्वरूप ‘‘केवलपापमेव वध्यनाति’’—केवल पाप का ही बंध करते हैं, इससे वे कुगति में जाकर दु:ख भोगते हैं। सदाचार की बड़ी महत्ता है। यदि सम्यक्त्व रहित जीव भी हीनाचार का त्याग करता है, तो सदाचार के प्रभाव से वह नरक, पशु पर्याय में नहीं जाता है। अकेला सम्यक्त्व मोक्ष नहीं देता है। प्रवचनसार में कुन्दकुन्द स्वामी ने कहा—

सद्दहमाणो अत्थे असंजदो वा ण णिव्वपादि।।२३७।।

तत्व श्रद्धान हो जाने पर भी असंयमी व्यक्ति मोक्ष नहीं पाता। चारित्र का चमत्कार— कानजी पंथी मंडली को यह बात नहीं भूलना चाहिये, कि सम्यक्त्व से अकेला काम नहीं बनेगा। भरतेश्वर ने अंतर्मुहूर्त में केवलज्ञान प्राप्त किया था, यह सम्यक्चारित्र का चमत्कार था। वे क्षायिक सम्यक्त्वी होने से गृहस्थावस्था में भी ज्ञानी थे, किन्तु उनके केवलज्ञान नहीं हुआ। जब परिग्रह त्याग करके उन्होंने शुक्ल ध्यान रूप चारित्र का आश्रय लिया, तब कैवल्य का प्रकाश उन्हे प्राप्त हो गया। अन्तर्मुहूर्त मे केवल प्रदान कराने की क्षमता सम्यक्चारित्र में ही है—

अनंतसुख सम्पन्नं येनात्मा क्षमामपि

नमस्मस्मै पवित्राय चारित्राय पुन: पुन:।।

यह आत्मा क्षण मात्र में जिसके कारण अनंत सुख को प्राप्त होता है, उस पवित्र चारित्र (यथाख्यात चारित्र) को बारम्बार नमस्कार है।

शंका — आश्चर्य है आत्मार्थी पूज्य कानजी महाराज को स्वामी कहे जाने पर आप लोग ऐतराज करते हैं? ऐसे ही हम लोगों को मुमुक्षु कहे जाने पर आप लोग आक्षेप क्यो करते हैं?

समाधान —‘स्वामी ’ शब्द मालिक का पर्यायवाची है। दिगम्बर जैन धर्म में परिग्रह त्यागी इंद्रियों को वश करने वाले मुनि को स्वामी कहा जाता है। स्वामी इंद्रियों का दास नहीं होता है। जिसे इंद्रियों ने अपना गुलाम बना लिया है, उसे स्वामी कहना ऐसी ही बात है, जैसे दरिद्र व्यक्ति के पुत्र का नाम करोड़ीमल रखना अथवा सूरदास को नैनसुख नाम प्रदान करना। जब कानजी स्वयं अपने को अव्रती, असंयमी कहते हैं, तब इंद्रियों के सेवक उनको स्वामी अर्थात् इंद्रियों का विजेता कहना उचित नहीं है। वैसे आपको अधिकार है, आप एक टूटी झोपड़ी को शौक से राजमहल कहें।

मुमुक्षु का रहस्य—

‘मुमुक्षु’ शब्द का प्रयोग समंतभद्र स्वामी ने ऋषभनाथ भगवान के स्तवन में किया है, जब उन्होंने नीलांजना के नृत्य को देखकर विषयों से विरक्त हो, राज्य का परित्याग किया था। आशाधरजी ने सागार धर्मामृत में उस गृहस्थ के लिये भी मुमुक्षु शब्द का उपयोग किया है, जो हृदय में मुनि बनने की सच्ची कामना करता है। देशविरति: खलु सर्व विरति लालसा’’।जहाँ जीवन संयम को सुवास से सम्पन्न न हो तथा विषय भोगों से छूटने के बदले उसके जाल में फँसने का निरन्तर काम चले वहाँ मुमुक्षु शब्द का उपयोग अद्भुत लगता है; यह हिंसक दयासागर कहने सदृश वचन हैं। मुमुक्षु शब्द के चार भेद हो सकते हैं। नाम, स्थापना, द्रव्य तथा भाव रूप से चतुर्विध मुमुक्ष हैं। व्रत नियम शून्य तथा सदाचार विरोधी व्यक्ति यदि अपने को मुमुक्षु कहते हैं, तो वे नाममात्र के मुमुक्षु हैं। किसी वस्तु में मुमुक्षु की स्थापना करना स्थापना मुमुक्षु है। जो व्यक्ति परिग्रह पिशाच के चक्कर से छूटकर जीवन में साधुत्व की भावना करते हैं, वे द्रव्य मुमुक्षु हैं। परिग्रह त्यागकर आत्म प्रकाश से जिनकी आत्मा अलंकृत है, वे भाव मुमुक्षु हैं। एक कमजोर आदमी है, जो बिना सहारो के खड़ा तक नहीं हो सकता, उसे पहलवान कहने सदृश संयम से डरने वालों तथा संयमी से भयखाने वालों को मुमुक्षु कहना है। शब्द का गलत प्रयोग देखकर ऐतराज करना न्यायोचित बात है। इसमें विद्वेष नहीं है। इसके भीतर पवित्र सत्य विद्यमान है।

शंका — हमारे बारे में यह कहा जाता है, कि हम लोग मुनि को नहीं मानते। हम मुमुक्षु णमोकार मंत्र पढ़ते समय ‘‘णमो लोए सव्व साहूणं’’ पाठ पढ़कर सभी सच्चे भावलिंगी मुनीश्वरों को प्रणाम करते हैं। वर्तमान मुनि द्रव्य लिंगी हैं, अत: हम उनको आराध्य नहीं मानते, कारण हमारे परम पूज्य कुन्दकुन्द भगवान ने ‘दंसण पाहुड’ में कहा है ‘‘दंसणहीणी ण वंदिव्वो (२) सम्यग्दर्शन हीन व्यक्ति को नमस्कार नहीं करना चाहिये।

समाधान — अंतरंग भावों का परिज्ञान केवली भगवान को होता है तथा मन: पर्यय ज्ञानी महर्षि मनोगत बात को जानते हैं। गृहस्थ के श्रुत—ज्ञान में दूसरों के सम्यक्त्व है या नहीं, इसको जानने की क्षमता नहीं है। मुनि जीवन के आधारभूत महाव्रत, दिगम्बर मुद्रा आदि को देखकर मुनिराज को प्रणाम करने का आगम में कथन है। जिनेश्वरी मुद्रा धारण करने वाले, नकली मुनि बनने वाले,देव से सम्यक्त्वी उद्दायन ने धृणा नहीं की तथा उनको सच्चा साधु मान परिचर्या की। इससे सम्यक्त्व के निर्विचिकित्सा अंग पालने वालों में राजा उद्दायन का उदाहरण दिया जाता है। आदिनाथ भगवान पूर्व भव में वङ्काजंघ राजा थे। उनके सम्यक्त्व नहीं उत्पन्न हुआ था। उन्होंने अपनी श्रीमति रानी ( जो आगे भव में महादानी राजा श्रेयांस हुई) के साथ चारण ऋद्धिधारी भावलिंगी मुनि युगल को आहार दिया था। जिससे पंचाश्चर्य हुए थे।

उद्दायन राजा के कथानक में दाता सम्यक्त्वी था, पात्र सम्यक्त्वी नहीं था। मुनि मुद्रा का सम्यक्त्वी राजा ने सम्मान किया। इस प्रकार आज भी अपने को सम्यक्त्वी मानने वाला यदि जिन मुद्राधारी साधु को आहार देता है तो उसके सम्यक्त्वी पने पर संकट का पहाड़ नहीं टूटेगा।

वङ्काजंघ राजा का कथानक यह बताता है, कि भावलिंगी ऋद्धिमुनि युगल ने द्रव्यलिंगी गृहस्थ के द्वारा प्रदत्त आहार लिया था। राजा वङ्काजंघ के सम्यक्त्व नहीं था, ऐसा महापुराण में कहा है। श्रावक का आचार व्यवहार धर्मानुसार होना चाहिये। उसके अन्तरंग भाव के आधार पर लोक व्यवस्था नहीं बनती । उपशम तथा क्षयोपशम सम्यक्त्व असंख्यात बार उत्पन्न होते हैं; ऐसा आगम है। इस काल में क्षायिक सम्यग्दर्शन नहीं होता है। इस कारण दातार या पात्र के भावों में अनेक बार सम्यक्त्व का आना तथा जाना सम्भव है, इस बात को भगवान सीमंधर स्वामी सदृश महाज्ञानी जान सकते हैं। भरत क्षेत्र में उत्पन्न इस काल का व्यक्ति नहीं जान सकता। ऐसी स्थिति में आहार दान का क्या हाल होगा? दातार का सम्यक्त्व अंतरंग से चला गया, तो मुनि आहार लेना छोड़ देगें या पात्र का सम्यक्त्व से चला गया तो आहार देना बन्द कर देगा। ऐसी व्यर्थ की झंझटों में स्वयं को डालना आत्म कल्याण करने वाले विवेकी को उचित नहीं हैं।

चौथे काल की बात है। वारिषेण मुनि ने द्रव्यलिंगी मुनि पुष्पडाल को अपने साथ रखकर बड़ी कुशलता पूर्वक सच्चा मुनि बनाया था। इस कारण स्थितिकरण नामक सम्यक्त्व के अंग में वारिषेण मुनि मान्य कहे गए हैं। द्रव्यलिंगी पुष्पडाल मुनि को धार्मिक जन आहार देते थे।

सुन्दर मार्ग दर्शन—

भावलिंगी, द्रव्यलिंगी की जटिल समस्या का सुन्दर समाधान आशाधर जी ने सागारधर्मामृत में इस प्रकार किया है—पाषाणादि की प्रतिमाओं में जिनाकार होने से स्थापना निक्षेप द्वारा उन्हें जैसा पूजा जाता है तथा पूजक स्वहित सम्पादन हैं, उसी प्रकार वर्तमान में दिगम्बर मुनि मुद्राधारी साधु में पूर्वकालीन मुनियों की स्थापना कर इनको माध्यम बना पूर्व कालीन मुनियों की स्थापना कर आराधना करनी चाहिए। सागर—धर्मामृत के शब्द इस प्रकार हैं।

विन्यस्यैदं युनीनेषु प्रतिमासु जिनानिव।

भक्त्या पूर्व मुनीनर्चेत् कुत: श्रेयोति चर्चिनाम्।

कुन्दकुन्द स्वामी ने दर्शन पाहुड में मार्मिक बात कही है—जो सह—जोत्पन्न अर्थात् दिगम्बर रूप को देखकर ईर्ष्यावश आदर नहीं करता, वह संयमयुक्त होता हुआ भी मिथ्यात्वी है।वह उपयोगी गाथा इस प्रकार है—

सहजुप्पण्णं रूवं दट्ठं जो मण्णए ण मच्छरियो।

सो संजकपडिवण्णो मिच्छा इट्ठी हवइ एसो।।२४।।

आगम कहता है पंचमकाल के अन्त तक अर्थात् आज से १८५०० वर्ष बाद तक भी दिगम्बर मुद्राधारी मुनि होंगे। वे अन्तिम मुनि समाधि सहित मरण करेगें। उनको अवधि ज्ञान प्राप्त होगा, ऐसा त्रिलोक पण्णति में कहा है।

स्मरणीय—

हमारे आत्मार्थी मुमुक्षु भाइयों को कुन्दकुन्द महर्षि के इन वचनों को विचारपूर्वक ध्यान से पढ़ना चाहिये, ‘‘असंजदं ण वंदे’’ (२६)— असंयमी की वंदना न करे। कानजी बाबा स्वयं को असंयमी कहते हैं। वे अपनी जीवन में संयम को आने भी नहीं देते। उनकी वंदना रूप कार्य सम्यक्त्व का पोषक है या विघातक है? यह बात कानजी पंथी प्रवक्ताओं तथा भक्तों को न्याय बुद्धि से सोचना चाहिये। कुन्दकुन्द स्वामी असंयमी को वंदना का अपात्र कहते हैं, और हमारे सोनगढ़ पंथी उनको गुरु नहीं, ‘सद्गुरुदेव’’, जैनधर्म के प्रवर्तक’’ कहते हैं। कुछ भक्त जन उन कानजी बाबा के चरणों की छाप कपड़े में लगवाकर उसको पूजते हैं। कानजी बाबा की अंधी भक्ति अद्भुत काम कराती है एक कानजी पंथी प्रचारक भगवान के अभिषेक प्राप्त जल को गंधोदक न कहकर गंदोदक—गंदा पानी कहते थे और स्वयं कानजी बाबा के पैरों को धोने से प्राप्त यथार्थ में गन्दे पानी को अधिक मान देते हैं। अद्भुत स्थिति है। भीलनी गजमुक्ता को फैक देती है और गुंजा (गोंगची) को बड़े प्रेम से अपनाती है। मिथ्यात्व का उदय बड़ी विचित्र बातें कराता है। कांंजी पंथी वर्ग को बाल ब्रह्मचारी उच्च तपस्वी दिगम्बर मुनि भी अनादर योग्य लगते हैं और उन्हें असंयमी व्यक्ति अधिक अच्छा लगता है। यह वृत्ति मिथ्यात्वी की होती है।

दिगम्बर मुनि विद्धेषी—

सन् १९५९ की बात है। कुंभोज बाहुबली आश्रम में आत्मार्थी नामधारी सत्पुरुष छह सात सौ यात्री ठहरे थे। वहां से करीब दो किलोमीटर पर सत्तानवे वर्षीय मुनि १०८ वर्धमान महाराज (जो आचार्य शांतिसागर महाराजके ज्येष्ठ बन्धु थे) मन्दिर जी में थे। बाहुबली आश्रम वालों ने कहा था। ‘‘स्वामी जी! यहाँ समीप में महान अाध्यात्मिक मुनिराज वर्धमान सागर महाराज का दर्शन कीजिये।’’ मुनि विद्वेषी हृदय होने से उन लोगों ने उस जिनमंदिर का ही दर्शन नहीं किया। साक्षात् मुनि को देखकर उनका अनादर करना और कल्पनागत मुनि को प्रणाम की बातें करना स्पष्ट करता है कि यथार्थ में उनके दिल में दिगम्बर मुनि के प्रति आँतरिक विद्वेष विद्यमान है। परिग्रह धारी की पूजा और अपरिग्रही महान् योगियों का निरादर आंतरिक दूषित मनोदशा को स्पष्ट करते हैं। इससे असली सम्यग्दृष्टि तथा मिथ्यात्वी का रूप पूर्णतया समझा जा सकता है। एक नीतिकार कहता है—

सर्प डस्यो तब जानिये रुचिकर नीम चबाय।

कर्म डस्यो तब जानिये जिनवानी न सुहाय।

दूषित भाव—

एक विचारक व्यक्ति ने कहा था, कांजी भक्तों द्वारा दिगम्बर जैनों के गुरु के विरुद्व प्रचार करने का आंतरिक अभिप्राय दिगम्बर आम्नाय और संस्कृति पर भीतर से प्रहार करना है। लड़ झगड़कर यह काम नहीं होता। यह मीठा विष है, जो संस्कृति के प्राण हरणार्थ खिलाया जा रहा है। दिल्ली के एक जौहरी जैन भाई ने मजेदार बात कही थी, कि कानजी पंथी या अन्य भक्त सोनगढ़ के संयम शून्य बाबा के पास जाकर आज्ञा प्रधानी बनते हैं और दिगम्बर जैन सच्चे वीतरागी मुनियों के पास परीक्षा प्रधानी बनने की बात करते हैं।ये लोग दूर वीक्षण यंत्र (ऊातेम्दज्) द्वारा पानी के कीड़े देखना चाहते हैं और सूक्ष्मवीक्षण यंत्र द्वारा नक्षत्रोें का दर्शन करने की इच्छा करते हैं। फल यह होता कि वे अविवेकवश वस्तु के यथार्थ रहस्य से वंचित होते हैं।

एक बार आचार्य महावीर कीर्ति महाराज के पास कुछ अध्यात्म पंथी पहुँचे थे। दि० मुनियों के विरुद्ध उनसे घंटो बहस की। विद्वान साधु की एक भी बात उनके हृदय में नहीं घुसी । इसका एक कारण है— ये लोग अपनी अपनी सुनाने की कला में प्रवीण हैं; दूसरे की सुनने की आदत नहीं है। इसी कारण इनके उपदेशों में शंकाकारों को उत्तर नहीं दिया जाता है, और ये दूसरे पक्ष के प्रवचनों में प्रश्न करने को तत्पर होकर सभा भंग करने का प्रयत्न करते हैं। एक प्रांत के मुख्य मन्त्री बहिरे थे। जब काम की बात होती थी, तब वे कान में श्रवण यंत्र लगाकर बातें सुना करते थे, और जब मतलब की बात नहीं रहती थी, तब उस श्रवण यंत्र को दूर रखकर सुनने का अभिनय करते थे। महावीर कीर्ति महाराज ने उन प्रश्नकर्ताओं से अन्त में पूछा मुनि की परीक्षा करना चाहते हो। बताओ साधुओं के २८ मूलगुण कौन कौन हैं? वे चुप हो गये ओर वहाँ से चले गये। यह दुर्भाग्य की बात है कि निरंतर साधु निन्दा का उपदेश सुनते सुनते एकांतवादी इस जमाने में भी अपूर्व व्यक्तित्व सम्पन्न महापुरुष के अंत: सौन्दर्य को सोचने में असमर्थ हो जाते हैं।उदाहरणार्थ कोल्हापुर के समीपवर्ती गलतगा स्थान के मुनि सिद्धसेन महाराज का जीवन बड़ा सौरभ पूर्ण तथा पवित्रता समलंकृत हैं। गृहस्थावस्था में वे मैसूर विधान सभा के यशस्वी सदस्य थे।धन धान्यादि से सम्पन्न थे। वे अंग्रेजी में सुन्दर भाषण देते थे। पचासों प्रतिष्ठायें उन्होंने बिना भेंट लिए करार्इं। महान शास्त्रज्ञ मुनि होते हुये अहंकार का लेश भी उनमें नहीं देखा जाता। जनवरी १९७६ में शिखरजी यात्रा से लौटते हुये वे सिवनी पधारे थे।

उनके बारे में ‘आचार्य—कल्प’ शब्द का प्रयोग जब मैंने किया तब उन्होंने मुझसे कहा, —‘‘पण्डितजी, मैं तो बच्चे समान अल्पज्ञ हूँ।मेरी बड़ी स्तुति नहीं कीजिये।’’ पचहत्तर वर्ष के होते हुये भी वे मूलाचार प्रतिपादित मुनि अवस्था के नियमों का बड़ी सावधानी से पालन कर रहे हैं। ऐसी अनेक विभूतियों के होते हुये भी एकांतवादी चश्मा वाले उन महापुरुषों को प्रणाम नहीं करते। अहंकार और अविवेक वश ये उनके सत्समागम से अपने जीवन को विशुद्ध नहीं बनाते। पंचमकाल में मुनि बनने वाले महापुरुषों में महान् आत्मबल तथा जितेन्द्रियपन है। भावसंग्रह में आचार्य देवसेन ने कहा है—चौथे काल में हजार वर्ष तपस्या करने पर जो फल मिलता था, वह इस काल में हीन संहनन होते हुये एक वर्ष की तपस्या द्वारा प्राप्त होता है। वह गाथा इस प्रकार है—

वरिस सहस्सेण पुरा जं कम्मं हणइ तेण कायेण।

तं संपइ वरिसेण हुं णिज्जरयई हीण संहणणे।।१३१।।

शास्त्र में देव, गुरु तथा शास्त्र की श्रद्धा को सम्यक्त्व कहा है। उस सम्यक्त्व के अंगरूप साधु परमेष्ठी के विरुद्ध होकर तथा जन—मानस को विकृत बनाने से कितना अधिक स्व तथा पर का अकल्याण होता है, यह एकांतीवर्ग नहीं सोचता। इस प्रसंग में बौद्ध ग्रन्थ धम्मपद की यह सूक्ति मननीय है—

पापोपि पस्सदि भद्रं यान पापं न पच्चति।

यदा च पच्चति पापं अथ पापो पापानि पस्सति।।११९।।

जब तक पाप का फल नहीं मिलता है, तब तक पापी को पाप कर्म भला दिखाई देता है; किन्तु जब पाप का फल मिलता है, तब उसको पाप दिखता है।

भद्रोपि पस्सदि पापं याव भद्रं न पच्चति।

यदा च पच्चति भद्रं अथ भद्रोभद्रानि पस्सति।।१२०।।

जब तक भद्र कार्य का फल नहीं प्राप्त होता है, तब तक वह अच्छा नहीं लगता है, किन्तु जब उस सत्कार्य का फल प्राप्त होता है, तब वह व्यक्ति पुण्य कार्य को अच्छे रूप में देखते हैं। मुनि निंदकों को यह बात नहीं भूलना चाहिये कि क्षायिक सम्यक् त्वी बनने पर भी राजा श्रेणिक द्वारा यशोधर मुनिराज के गले में मरा सर्प डालने से उपार्जित पाप का पूर्ण रूप से क्षय नहीं हो पाया, और आगामी तीर्थंकर होने वाले उन श्रेणिक राजा के जीव को वर्तमान में नरक पर्याय में अपार कष्ट भोगना पड़ रहा है। अत: अहंकार को त्यागकर एकांतवादी वर्ग को विवेक से काम लेना चाहिये। मुनि निन्दा को महापाप कहा गया है।

प्रश्न — हम वीतरागता को धर्म मानते हैं, अत: दया, दान हमारी दृष्टि में धर्म कार्य नहीं हैं। शरीर जड़ है। उसके द्वारा किया जाने वाला उपवासादि जड़ क्रिया है। मोक्ष प्राप्ति के लिये आंतरिक वीतरागता चाहिये। हमारा निश्चयनय कहता है, मोक्ष के लिये बाहरी वेष से कोई प्रयोजन नहीं है। कषाय आदि का त्याग यदि श्वेताम्बरधारा करता है या वह पीताम्बर या दिगम्बर है तो वह मोक्ष जाता है। इस विषय में हमें कुन्दकुन्द स्वामी का ही अभिप्राय मान्य है; कारण जिनागम के मर्म को स्वामी कुंदकुद तथा अमृत—चन्द्र आचार्य के बाद अध्यात्म योगी सत्पुरुष सच्चे जैनधर्म के प्रवर्तक श्री कानजी जान पाये हैं।

उत्तर — कुन्दकुन्द स्वामी ने कहा है कि द्वादशांग श्रुतज्ञान तथा आचार्य परम्परा से प्राप्त आगम पूज्य तथा मान्य है। उन्होंने दिगम्बर ऋषि प्रणीत परम्परा को आदरणीय कहा है। उन्होंने रयणसार में कहा है—

पुव्वं जिणेहि भणियं जहट्ठियं गणहरेहि वित्थरियं।

पुव्वाइरियकमेणं जं तं बोलेइ सद्दिट्ठि ।।२।।
मदिसुद णाण बलेण दु संच्छदं बोलए जिणुत्तमिदि।
जो सो होई कुदिट्ठी ण होइ जिण मग्गलग्गरवो।।३।।

पूर्व में जिस प्रकार सर्वज्ञ जिनेन्द्र ने कथन किया तथा गणधर देव ने जिसका द्वादशांग रूप से विस्तार किया, उस पूर्वाचार्य परम्परा से आगत कथन के अनुसार जो बोलता है, वह सम्यग्दृष्टि है। जो मतिज्ञान, श्रुतज्ञान के अहंकारवश जिनवाणी की उपेक्षाकर स्वच्छंद जैसा मन में आया वैसा बोलता है, वह जिनमार्ग में संलग्न रहते हुए भी मिथ्यादृष्टि हो जाता है। इस कथन द्वारा कुंदकुद स्वामी आचार्य परंपरा से आगत समस्त ऋषिप्रणीत आगम को (समन्तभद्र, अकलंक, जिनसेन आदि की वाणी) जो ज्ञान के अहंकार से युक्त हो न मानकर स्वच्छंद प्रलाप करता है, वह मिथ्या दृष्टि है। कानजी मत में समस्त जिनागम का अनादर कर केवल समयसार अथवा कुन्दकुन्द वाणी को ही मानने की प्रणाली है। वह मिथ्यावादी मार्ग है ऐसा महर्षि कुन्दकुन्द ने पूर्वोक्त गाथा युगल में स्पष्ट किया है। उपवास आदि अनावश्यक है; दान पूजादि के कारण मोक्ष नहीं मिलता, इत्यादि एकान्त कथन कुंदकुद वाणी के द्वारा भी खण्डित होता है।

मार्मिक देशना—

वे कहते हैं, जो गृहस्थ गृहस्थी के जंजाल में रहकर आरम्भ परिग्रह में फंसने से पाप का अर्जन करता है, तथा उस दोष के प्रक्षालन हेतु दया, दानादि कार्य नहीं करता है, वह संसार में परिभ्रमण करता है। दया दानादि सत्प्रवृत्तियों में लगने वाला सम्यग्ज्ञानी जीव मोक्ष जाता है। ऐसा अभिप्राय द्वादशानुप्रेक्षा में कुन्दकुन्द स्वामी ने व्यक्त किया—

पुत्तकलत्त णिमित्तं अत्थं अज्जयदि पाबुद्धीए।

परिहरदि दया—दाणं सो जीवो भमदि संसारे।।३०।।

जो पापभाव युक्त हो (आर्तरौद्र ध्यान को धारणकर) दया तथा दान का परित्याग कर पुत्र स्त्री के लिये धन का संचय करता है, वह जीव संसार में भ्रमण करता है। अर्थात् दया दान न करने वाला गृहस्थ मोक्ष नहीं पाता, ऐसा अभिप्राय स्पष्ट है। इस कथन से दया, दान के विरुद्ध कांजी पन्थी एकांतवादी प्ररुपणा खण्डित हो जाती है। जो एकांतवादी पापत्याग के मार्ग को अस्वीकार करके ऊँची—ऊँची बातें शुक्ल ध्यान, शुद्धोपयोग, निश्चयनय आदि की किया करते हैं, उनकी क्या गति होगी.यह कुन्दकुन्द महर्षि की मंगलवाणी बताती है—

जत्तेण कुणइ पाव विसयणिमित्तं च अहणिसं जीवो।

मोहंधयार सहिओ तेण दु परिपड़दि संसारे।।३४।।

जो मोहान्धकार युक्त गृहस्थ विषयों की पूर्ति हेतु बुद्धिपूर्वक प्रयत्न करता हुआ निरन्तर पाप कार्यों को करता है, अर्थात् पापत्याग रूप पुण्य कार्यों से दूर भागता है वह निंद्य कार्यों के फलस्वरूप संसार में पतित दशा को पाता है। पंचमकाल में धर्मध्यान रूप शुभोपयोग बड़े प्रयत्न द्वारा प्राप्त होता है। इस काल में शुक्लध्यानरूप शुद्धोपयोग नहीं होता, यह बात मोक्ष पाहुड में कही गयी है—

भरहे दुस्समकाले धम्मज्झाणं हवेइ साहुस्स।

तं अप्प सहावठिदे णहु मण्णइ सो वि अण्णाणि।।७६।।

आत्मस्वरूप में लीन साधु के इस पंचमकाल में भरतक्षेत्र में धर्मध्यान होता है, यह बात जो नहीं मानता वह अज्ञानी ( मिथ्यात्वी ) है। धर्मध्यान को भावपाहुड की ‘सुहधम्मं)’— गाथा ७६ में शुभभाव कहा है। एकांतवादी अशुभभाव के विषय में मौन धारण कर शुभभाव धर्मध्यान, जो इस काल में सम्भव है की अभद्र शब्दों में निंदा करता है, उसे कुन्दकुन्द स्वामी कथित लोकानुप्रेक्षा का वर्णन ध्यान में लाना चाहिये। वे कहते हैं—

असुहेण णिरय तिरियं सुह उवजोगेण दिविज णर—सोक्खं।

सुद्धेण लहइ सिद्धि एवं लोयं विचिंतिज्जो।।

आर्तध्यान,रौद्रध्यान रूप अशुभभाव से नारकी तथा पशु की पर्याय, धर्मध्यान रूप शुभभाव से देव तथा नर पर्याय के सुख मिलते हैं। शुक्लध्यान रूप शुद्धभाव (जो पंचमकाल में नहीं हो सकता) से मोक्ष मिलता है, ऐसा लोक का चिंतवन करे। इस कथन द्वारा कुन्दकुन्द स्वामी यह सूचित करते हैं, कि इस काल में मोक्ष नहीं है, अतएव अशुभभाव द्वारा पशु नारकी बनने के स्थान में शुभभाव को स्वीकार करके देव, मानवपर्याय के सुखों को प्राप्त करना उपयुक्त होगा। ‘शून्य की अपेक्षा अल्प उपलब्धि ठीक है। इतना ही नहीं, हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील, परिग्रह की तीव्र लालसा कृष्णादि लेश्याओं के अधीन हो कुत्सित आचरण और क्रूर कर्मों द्वारा कुगति की अपार विपत्ति की अपेक्षा सम्यक्त्व सत देवादि की भी अवस्था बहुत अच्छी है, जहाँ से चयकर सम्यक्त्वी जीव नर पर्याय धारण कर तपश्चर्या करते हुए कर्म क्षय करता है। आगम की आज्ञानुसार दिगम्बर मुद्रा धारण करना,शीत, उष्ण आदि २२ परीषहों को सहन करना, उपवास करना आदि को एकांतवादी जड़ शरीर की क्रिया कहते हुए इन्द्रियों और विषयों की गुलामी द्वारा मोक्ष रूपी आत्मास्वातन्त्र्य को पाने का स्पप्न देखता है। उसे जगाते हुए कुन्दकुन्द स्वामी मे मोक्ष पाहुड़ ने कहा—

णग्गंथ मोहमुक्का बावीस परीसहा जियकसाया।

पावांर भविमुक्का ते गहिया मोक्खमग्गमि।।८०।।

जो परिग्रह रहित निर्ग्रन्थ हैं, बाह्य जगत के प्रति मोहमुक्त हैं, शीत, उष्णादि कठोर बाईस परीषह सहनकर तप द्वारा कर्मों की निर्जरा करते हैं। तथा हिंसा, असत्य, चोरी, मैथुन एवं परिग्रह रूप पाप के कारणों का त्याग करते हैं अर्थात् जिनके जीवन में सत्य, अहिंसा, अचौर्य , ब्रह्मचर्य तथा अपरिग्रह की समाराधना प्रतिष्ठित है, वे मोक्ष मार्ग में संलग्न माने गये हैं। आचार्य श्री यह भी कहते हैं, देव तथा गुरु की भक्ति युक्त आत्मध्यानी सच्चरित्र व्यक्ति मोक्षमार्ग में प्रवृत्त है। एकांतवादी पूजा आदि को रागभाव कहकर निंदनीय कहा करते हैं। सर्वज्ञ परम्परा से प्राप्त मोक्ष पाहुड के कथन पर श्रद्धा न करने वाला व्यक्ति मोक्षमार्गी होता है—

देवगुुरुणं भत्ता णिव्वेय परंपरा विचिंचिंता।

झाणरया सुचरित्ता ते गहिया मोक्ख मग्गमि।।८२।।

जो वीतराग अरहंत भगवान, दिगम्बर गुरु के भक्त हैं संसार शरीर तथा भोगों से विरक्त हैं, ध्यान करने में निरन्तर प्रयत्नशील रहते हैं और जिनका आचरण निर्मल है, वे मोक्षमार्ग में स्थित हैं।

प्रमादी की दृष्टि—

लोक में ऐसे लोग मिला करते हैं, जो दूसरे का द्रव्य देने की बात भी नहीं सुनते, किन्तु अपनी रकम वसूल करने में जघन्य उपायों का भी उपयोग करते है; इसी प्रकार की परम्परा एकांतवादी वर्ग में देखी जाती हैं।साधु के जीवन में क्या ऋुटि है इसे ही वे ढूंढकर तथा उसे बड़ा रूप देकर दुनियाँ में ढोल पीटते हैं और स्वयं के पतित जीवन के बारे में कहते हैं कि संयम पर्याय हम में अपने आप आ जायेगी, पुरुषार्थ की जरूरत नहीं है। जो जो देखी वीतराग ने सो सो होसी वीरा रे।’ ये लोग लेन—देन, व्यापार, विषयसेवन में बुद्धिपूर्वक प्रयत्न करते हैं तथा वहाँ भगवान के ज्ञान का बहाना नहीं बनाते। उन्हें अपने मन में यह सोचना उचित होगा—

क्या क्या देखी वीतराग ने तू क्या जाने वीरा रे।

वीतराग की वाणी द्वारा, दूर करो भव पीरा रे।।

अध्यात्म वाणी का अभिप्राय था, कि जीव रक्षा करो, इसीलिए तो मुनिराज पिच्छी रखते हैं, नहीं तो क्या वह शोभा के लिये है? भावों में भी प्रमादपने को न आने दो, क्योंकि मलिन विचारों के द्वारा जीव कर्मों के बन्धन में बद्ध होता है। उसका रहस्य न समझकर अध्यात्मवादी कहते है; शरीर आत्मा से भिन्न है। शरीर घात करने से पाप नहीं होता उनको समयसार शास्त्र के रचनाकार भाव पाहुड ग्रन्थ में अपना मंतव्य इस प्रकार स्पष्ट करते हुए सचेत करते हैं।—

पणिवहेहि महाजस चउरासी—लक्ख—जोणिहि मज्झम्मि।

उपज्जत मरतो पत्तोषि णिरंतर दुक्खं।।१३३।।

हे महायशस्वी साधु! जीव वध महापाप है, उसको करने वाला ८४ लाख योनियों में जन्म मरण पाता हुआ निरन्तर दु:ख भोगता है। यहाँ जीव वध को बुरा कहा है।

चेतावती—

जो कानजी पन्थी समुदाय तीस वर्षों से भी अधिक काल, अध्यात्म शास्त्र का ही मनन, प्रचार करते हुये कहता है, हमारा मन त्याग की ओर नहीं जाता हे, उसको आध्यात्मिक प्रहरी के रूप में कुन्दकुन्द स्वामी भाव पाहुड में इस प्रकार सचेत करते हैं—

उत्थरइ जा ण जरओ रोयग्गी जा ण डहइ देहउडिं।

इन्द्रिय बलं ण वियलइ ताव तुमं कुणहि अप्पहियं।।१३०।।

जब तक बुढ़ापे का आक्रमण नहीं होता, रोग—रूपी अग्नि देह—रूपी झोंपड़ी को भस्म नहीं करती तथा इन्द्रियों की शक्ति क्षय को नहीं प्राप्त होती है, तब तक आत्मा का हित करो। (असमर्थ होने पर क्या करोगे?)

प्रश्न — इस प्रसंग में यह प्रश्न उठता है। आत्मधर्म हम पढ़ते हैं, आत्मा की ही अपने शिविरों में कक्षाओं में चर्चा करते हैं, अब हमें और धर्म करना चाहिये?

उत्तर — सम्यग्दर्शन की प्राप्ति तो मोक्ष रूपी परम विज्ञान मन्दिर की प्रवेशिका शाला सदृश है। आगे विशारद की शिक्षार्थ श्रावक की एकादश प्रतिमायें हैं, तथा अंतिम कक्षा का कोर्स दशधर्मों का पूर्ण पालन है। कुंद—कुंद स्वामी ने श्रावकों की प्रतिमाओं को तथा मुनियों के उत्तम क्षमादि को धर्म संज्ञा प्रदान की है; इससे यह स्पष्ट होता है कि अणुव्रत पालना या महाव्रत पालना धर्म से जीवन को समलंकृत करना है। धर्मानुप्रेक्षा में कुन्दकुन्द स्वामी कहते हैं— प्रमादी एकांतवादी को महर्षि कुन्दकुन्द चेतावनी देते हुए कहते हैं—

सामिंग्गदिय रूवं आरोग्गं बलं तेजं।

सोहण्णं लावण्णं सुर धणुमिव सस्सयं ण हवे।।४।।

सम्पूर्ण इन्द्रियों की परिपूर्णता नीरोगता यौवन, बल, तेज, सौभाग्य तथा लावण्य इंद्रधनुष के समान देर तक टिकने वाले नहीं हैं। आचार्य कुन्द कुन्द ने यह कहा है— कालाईलद्धीए अप्पा परमप्पओ हवदि।।२४।। (मोक्षपाहुड) काल लब्धि आदि के प्राप्त होने पर आत्मा परम आत्मा होता है। चक्रवर्ती भरत के पुत्र होते हुए श्रेष्ठ आध्यात्मिक वातावरण में रहने वाले मरीचिकुमार को सम्यक्त्व की ज्योति नहीं मिली । किंचिंत् न्यून कोड़ा—कोडी सागर काल बीतने पर सर्व प्रकार की विपरीत सामग्री होते हुए यम सदृश क्रूरसिंह की पर्याय में चारण मुनि युगल की वाणी सुनकर उसे अधिगमज सम्यक्त्व का लाभ हुआ तथा दशमें भव में उस जीव ने महावीर भगवान होकर मोक्ष प्राप्त किया। अत: यह स्पष्ट है कि अध्यात्मवादी कहने से तथा आत्मा संबंधी ग्रंथ को सदा साथ में रखने मात्र से सम्यक्त्व की प्राप्ति काल लब्धि के अभाव में असम्भव है। काल लब्धि आदि कब आई, यह पता नहीं चलता। ऐसी स्थिति में क्या कर्त्तव्य रह जाता है? दो रास्ते हैं, मोक्ष तो मिलता नहीं। विषय—भोग की गुलामी का पथ पकड़ा, तो दु:खपूर्ण पशु तथा नारकी की पर्याय मिलेगी। यदि सम्यक्त्व रहित होते हुए भी चोरी, व्यभिचार, बेईमानी आदि विश्व विनिन्दित कुकृत्यों को छोड़कर सज्जन पुरुषोचित सदाचार का रास्ता लिया तो स्वर्ग में उत्पत्ति होगी, तथा विदेह जाकर तीर्थंकर के साक्षात् दर्शन, दिव्यध्वनि सुनने का सौभाग्य तथा नन्दीश्वर वंदना आदि अनेक सुयोग प्राप्त होंगें। चरम शरीरी न होने से मरण तो अवश्य होगा। यदि कुन्द—कुन्द मुनीन्द्र की कथनी के अनुसार पापाचार का त्याग तथा सदाचार का पालन किया, तो विपत्ति से बचा जा सकेगा। यदि इंद्रियों की गुलामी और घृणित शरीर की सेवा करते—करते प्राणों का त्याग हुआ, तो कुगति में पतन को कौन टाल सकता है? भगवान महावीर का साक्षात् सान्निध्य यदि श्रेणिक महाराज के नरक पतन को न रोक सका, तब अन्य लोगों की तो बात ही क्या है?

शंका — समयसार में कहा है, शास्त्र अचेतन है, वह ज्ञान रूप नहीं है। ‘सत्थं णाणं ण हवई जहा सत्थं ण जाण्ए किं चिं’।।३९०।। गाथा।। समयसार गाथा ३७२ में कहा है, एक द्रव्य अन्य द्रव्यों में गुणोत्पादक नहीं होता है, ‘‘अण्णदबिएण अण्णदवियस्स ण कीरए गुणुप्पाओ।‘‘ इस कारण कानजी कहते हैं शास्त्र को परस्त्री तुल्य त्याज्य समझना चाहिए।

समाधान — शास्त्र के पठन, स्वाध्याय तथा उपदेश से जीव सुपथ में लगते हैं, यह प्रत्यक्ष अनुभव गोचर बात है। कानजी पंथ अपने प्रचार के लिए अपने ढंग का साहित्य छपाता है, वितरण करता है। यह कार्य स्पष्ट सूचित करता है कि एक द्रव्य के द्वारा दूसरे का कुछ भी नहीं होता, यह कथन एकांत रूप नहीं हैं। समयसार में कुन्दकुन्द स्वामी ने एक दृष्टि से कथन किया है, उसके सिवाय उन्होंने दूसरी दृष्टि को भी ध्यान में रखकर रयणसार में लिखा है—

इदि सज्जण पुज्जे रयणसार गंथं णिरालसो णिच्चं।

जो पढ़ई सुणइ भावइ सो सासयं ठाणं।।१६७।।

इस प्रकार सत्पुरुषों के द्वारा वंदनीय इस रत्नसार ग्रंथ को जो आलस्य छोड़कर पढ़ता है, सुनता है भावना करता है, वह अविनाशी पद को पाता है। यही बात भाव पाहुड में अन्त में उन्होंने लिखी है—

इय भाव पाहुड मिणं सव्वं बुद्धेसिं सम्मं।

जो पढई सुणइ भावइ पावइ सौ अविचंल ठाणं।।१६३।।
मोक्ष पाहुड के अन्त की गाथा भी उपयोगी है—
एवं जिणपण्णत्तं मोक्खस्सय पाहुडं सुभत्तीए।
जो पढइ सुणइ, भावइ सो पावइ सासयं सोक्खं।।१०६।।

कुन्दकुन्द स्वामी स्वयं कहते है कि उनके द्वारा रचित उपरोक्त ग्रंथ को जो पढ़ता है, सुनता है, तथा भावना करता है, वह मोक्ष प्राप्त करता है।.... अत: जिनवाणी को परस्त्री कहकर हेय मानना, एक द्रव्य से दूसरे का सर्वथा हित अहित नहीं होता, यदि कथन कुन्दकुन्द स्वामी के कथन द्वारा वाधित होता है। विवेकी व्यक्ति एकांत पक्ष को पक्ष नहीं पकड़ता। एकांत पक्ष का आग्रह सम्यवत्वी नहीं करता है। यह बात विचारणीय है कि कुन्दकुन्द स्वामी का सीमंधर भगवान की दिव्य ध्वनि रूप पुदगल द्रव्य से स्वहित न होता,तो वे महर्षि विदेह क्यों जाते? अत: कथंचित् एक द्रव्य दूसरे का उपकारी होता है, कथंचित् नहीं होता; ऐसा स्याद्वाद पक्ष उचित तथा उपकारी है।

शंका — पुण्य के विषय में यह बात गले नहीं उतरती, कि वह आत्मा का शत्रु रूप कर्म है, वह मोक्षार्थी के लिए कैसे उपकारी हो सकेगा ?

उत्तर — अनेकांत के प्रकाश में समाधान खोजना चाहिए। पुण्योदय से प्राप्त सामग्री का उपयोग चतुर व्यक्ति स्व परहित के साधनों में करता है। क्रूर तथा दुष्ट व्यक्ति उस साधन सामग्री का उपयोग विषय कषायों के पोषण में करता है। इस प्रसंग में यह पद्य उपयोगी है—

विद्या विवादाय धनं मदाय शक्ति; परेषां परपीडनाय।

खलस्य साधो: विपरीत मेतज्ज्ञाना दानाय च रक्षणाय।।

दुर्जन विद्या का उपयोग विवाद में धन का अहंकार पोषण में तथा शक्ति का उपयोग दूसरों को कष्ट प्रदान करने में करता हैं; सत्पुरुष विद्या का ज्ञान कार्य में, धन का पात्र दान में शक्ति का असमर्थों के रक्षण कार्य में उपयोग करता है। मिथ्यादृष्टि पुण्योदय से प्राप्त सामग्री को पापानुबन्धी क्रियाओं में लगाता है। जैसे किसी के बहुत धन सम्पत्ति हो गई, और उसने कसाईखाना खोल दिया, मांस विक्रय, मद्य विक्रयादि का कार्य बड़े रूप में शुरू कर दिया, हीन प्रवृत्तियों को प्रोत्साहन हेतु सम्पत्ति का उपयोग किया। उसके फलस्वरूप वह अपने संचित पुण्य का क्षयकर पाप के सागर में डूबता है। यदि वह धन वैभव आदि सम्यग्दृष्टि विवेकी सत्पुरुष को प्राप्त हुआ, तो वह उसके द्वारा रत्नत्रय के अंगरूप कार्यों का संरक्षण, संवर्धन, जीव हितादि का कार्य सम्पन्न करता है। इससे वह घातिया कर्मरूप पाप का क्षय करता हुआ अन्त में उस वैभव मात्र का त्यागकर भगवान शांतिनाथ के समान स्वदोष शान्ति द्वारा शाश्वतिक शांतिपूर्ण पद को पाता है। जिस व्यक्ति के पास धन मादकता पैदा करता है, उस व्यक्ति का हाल निन्दनीय कहा जाता है। इस कारण पुण्य के विषय में स्याद्वाद दृष्टि का उपयोग जरूरी है। श्रीषेण राजा ने सत्यपात्र दान दिया था, उससे अपार पुण्य वृद्धि होती गई, तथा उसने वैभव का सत्कार्यों में उपयोग किया। अन्त में वह आत्मा भगवान शांतिनाथ तीर्थंकर होकर मोक्षधाम में विराजमान हो गई। मार्मिक विचार— इस प्रसंग में एक बात ईमानदारी से हृदय पर हाथ रखकर विचारने की है। एकांतवादी वर्ग अपना सारा दिन ‘‘हाय धन, हाय पैसा’’ से प्रेरित हो पुण्य रूपी वृक्ष के फल को संग्रह करना चाहता है और कहता है, हमें पुण्य नहीं चाहिए। कोई आम के शौकीन सज्जन आम तो खाना चाहें और आम के वृक्ष से घृणा करें, तो उनकी यह चेष्टा समझदारों को मनोविनोदप्रद है। यदि आम का वृक्ष नहीं चाहिये, तो उसके फलों का भी त्याग करो, तब विवेक की बात समझी जाये। तीर्थंकर भगवान दीक्षा लेते समय पुण्योदय से प्राप्त फल रूप सामग्री का जीर्ण तिनके के समान त्याग करते हैं और अंतरंग बहिरंग रूप से अपरिग्रही बनते हैं, तब वे पाप का क्षय करते हुए पुण्य का भी नाश कर सिद्ध पदवी पाते हैं। अत: विवेक के प्रकाश में तत्त्व पर दृष्टि डालना समझदारी की बात है। एकांत पक्ष वालों का सच्चा हित स्याद्वाद चक्र की शरण ग्रहण करने में है। स्याद्वाद की शरण लेने वाला ही मोक्ष पाता है। बनारसीदास जी ने स्याद्वाद दृष्टि के विषय में नाटक समयसार में मार्मिक शब्द लिखे है:—

समुझे न ज्ञान कहे करम किए सों मोक्ष।

ऐसे जीव विकल मिथ्यात की गहल में।।
ज्ञान पक्ष गहे, कहे आतमा अबंध सदा मैं।
वरते सुछन्द, तेउ डूबे हैं चहल में।।१।।
जथायोग करम करें, पै ममता न धरे।
रहें सावधान, ध्यान की टहल में।।
तेई भवसागर के ऊपर ह्वै तरै जीव।
जिन्ह को निवास स्याद् वाद के महल में।।२।।

समन्वय पथ—

आत्महित साधना जिनका ध्येय है, वे शास्त्र का उपयुक्त और उपयोगी अंश ग्रहण कर जीवन शोधन के कार्य में प्रयत्नरत रहा करते हैं। समन्वय दृष्टि वाला साधक शास्त्र के अर्थ को उसके प्रसंग, प्रकरण आदि को ध्यान में रखकर वस्तुस्वरूप को मन में प्रतिष्ठित करता है। अध्यात्म दृष्टि और व्यवहार दृष्टि का समन्वय न होने पर शास्त्र जीवन को—उन्नत नहीं बनाता है। इस विषय को स्पष्ट करने के लिए कुछ उदाहरण यहां दिये जाते हैं।

अध्यात्म दृष्टि की मुख्यता से कहा जाता है, आत्मा अविनाशी है, आत्मा की मृत्यु नहीं होती। पूज्यपाद ऋषिराज ने इष्टोपदेश में कहा है ‘‘न में मृत्यु: कुतो भीति:’। इस दृष्टि वाले सत्पुरुष को यह आर्षवाणी भी स्मरण मेें रहनी चाहिए ‘‘समाहि मरणं होहु मज्झं’’ मेरे समाधिमरण हो। पंचमकाल में चरम शरीरी मानव का जन्म नहीं होता है। उसकी मृत्यु अवश्य होगी। न में मृत्यु: का पाठ पढ़ने पढ़ाने वाले महर्षि पूज्यपाद को समाधिमरण पर भी ध्यान देना आवश्यक पड़ा। उन्होंने भगवान से प्रार्थना की है, ‘‘प्राण प्रयाण क्षणे त्वन्नाम—प्रतिबद्ध वर्ण पठने कण्ठस्त्वकुण्ठो मम’’प्राण प्रयाण काल मेें जिनेश्वर के नाम स्मरण करते समय मेरा कण्ठ अवरूद्ध न हो। विवेकी साधक समाधिमरण को ध्यान में रखता है तथा मेरी आत्मा की मृत्यु नहीें है इस सत्य पर भी अपनी दृष्टि रखता है।

अध्यात्म दृष्टि कहती है आत्मा ही आत्मा का है, ‘‘आत्मैव गुरुरात्मन:’’ समाधि—शतक मे लिखा है:—

नयत्यात्मान मात्मैव जन्मनिर्वाण मेव वा।

गुरुरात्मात्मन स्तस्मान्नान्योस्ति परमार्थत:।।७५।।

आत्मा ही आत्मा को संसार में तथा निर्वाण में ले जाता है, इससे परमार्थ से आत्मा का गुरु आत्मा है, अन्य गुरु नहीं है। इस दृष्टि के साथ व्यवहार दृष्टि भी साधक को अपनानी चाहिए, ताकि वह उसके जीवन निर्माण करने में पथ प्रदर्शक आचार्यादि को अपनी श्रद्वा तथा विनय का केन्द्र बनावे। बोध पाहुड में कुन्दकुन्द स्वामी अपने गुरु द्वादशांग के वेत्ता भद्रबाहु श्रुतकेवली को इस प्रकार स्मरण करते है:—

बारस अंग वियाणं चउदस पुव्वं—ाqवउल वित्थरणं।

सुयणाणि भद्दवाहू गमय—गुरु भयवओ जयउ।।६२।।
द्वादशांग विज्ञान: चतुर्दश पूर्वांग विपुल विस्तार:।
श्रुताानी भद्रबाहु: गमकगुरु: भगवान् जयतु।।

चौदह पूर्वांगरूप विपुल विस्तार सहित द्वादशांग के ज्ञानी गमक गुरु श्रुतज्ञानी भगवान भद्रबाहु जयवंत हों। गुरु के द्वारा जीव का महान हित होता है, यह सत्य कृतज्ञ शिष्य के सदा ध्यान में रहना चाहिए। यह पद्य प्रसिद्ध है—

अज्ञान—तिमिरान्धानां ज्ञानांजन शलाकया।

चक्षु रुन्मीलितं येन तस्मै श्री गुरवे नम:।।

वे गुरु वंदनीय हैं जिन्होंने ज्ञानांजन युक्त सलाई के द्वारा अज्ञानांधकार से अंधे शिष्यों के नेत्रों को उन्मीलित किया—रोग विमुक्त बनाया। णमोकारमंत्र में आचार्य, उपाध्याय परमेष्ठी को स्मरण करते हुए गुरु की वंदना की जाती है। विवेकी व्यक्ति परमार्थ दृष्टि तथा व्यवहार दृष्टि युगल को हित साधक मानता है—

अध्यात्म दृष्टि तीर्थ वंदना, देवाराधना, गुरु वंदना का निषेध करती हुई, आत्मदेव की आराधना को हितकारी बताती है। परमात्म प्रकाश में लिखा है—

अष्णु जि तित्थु म जा हि जिय अण्णु जु गुरु उ म सेवि।

अण्णु जि देउ म चिंति तुहु अप्पा विमल मुएवि।।१—९५।।

हे जीव, अपनी आत्मा को छोड़कर किसी अन्य तीर्थ को मत जा किसी अन्य गुरु की सेवा मत कर तथा अन्य देव की आराधना मतकर।

इसको पढ़ने वाला एकान्तवादी भोगासक्त व्यक्ति अपने प्रमादी जीव को पुष्ट करना चाहता है। वह तीर्थ वन्दना, गुरु सेवा तथा मन्दिर जाना, पूजा करना आदि को अनुपयोगी मानता हुआ उपरोक्त शास्त्र की आज्ञा को समक्ष रखता है। वह पूज्यपाद स्वामी के इस कथन को अपने स्वेच्छाचरण का अवलंबन बनाता है—

य: परात्मा स एवाहे योहं स परमस्तत:।

अहमेव मयो पास्यो नान्य: कश्चिदिति स्थिति:।।३१।।

जो परमात्मा है, वह मैं हूँ, जो मैं हूँ वह परम आत्मा है, अत: मैं अपने द्वारा उपास्य हूँ, अन्य कोई आराधना योग्य नहीं है, ऐसी यथार्थ स्थिति है।

इस अभेद भक्ति रूप को श्रेष्ठ दिगम्बर श्रमण ही प्राप्त कर सकते हैं, उस स्थिति को साध्य बनाने वाला देव पूजा, गुरु भक्ति, तीर्थ यात्रा आदि साधनों का आश्रय ले अपने रागादि विकारों से अत्यन्त मलिन जीवन को स्वच्छ बनाता हुआ मोक्ष पथ में प्रगति करता है। आचार्य कुन्दकुन्द ने भाव पाहुड में कहा है—

जणवर चरणंबु रुहं णमंति जे परम भत्ति—राएण।

ते जम्मवेलि मूलं खणंति वर भाव सत्थेण।।१५१।

जिनेश्वर के चरण कमलों को जो उच्च भक्ति युक्त अनुराग भाव से प्रणाम करते हैं वे जन्म रूप वेलि के मूल को निर्मल परिणाम रूप शस्त्र से काट डालते हैं। देव, गुरु, तीर्थ आदि का सम्पर्क पाकर मोही मानव मानसिक मलिनता से छूटता है तथा ऐसे विशिष्ट आनन्द को प्राप्त करता है, जो भोगजन्य सुखों की अपेक्षा अत्यन्त उच्चकोटि का होता है। वीतराग की हृदय से भक्ति जनित आनन्द लोकोत्तर होता है। मोक्ष पुरुषार्थ की सिद्धि के लिए आत्मा को अपनी शक्ति का अपव्यय रोककर स्वयं में केन्द्रित होना आवश्यक हैं। इससे परोपकार में समय व्यतीत करने वाले श्रमण को इष्टोपदेश में आचार्य कहते हैं।

परोपकृति मुत्सृज्य स्वोपकार परो भव।

उपकुर्व न्परस्याज्ञ: दृश्यमानस्य लोकवत्।।३३।।

आत्मन्! अन्य का उपकार रूप कार्य त्याग करके आत्मा के उपकार कार्य में तत्पर हो। आत्मा से भिन्न शरीर आदि दृश्यमान वस्तुओं का हित संपादन कार्य में अपना काल व्यतीत करते हुए तुम अज्ञानी जगत का अनुकरण करते है।

इस कथन की ओट में कोई करूणामयी प्रवृत्तियों से विमुख होकर संकीर्ण दृष्टि को अपनावे, उसे आचार्य कहते हैं, प्रारम्भ में तुम्हारा जीवन अपने से हीन स्थिति में पड़े हुए व्यक्तियों को ऊँचा उठाने में व्यतीत होना चाहिए। असमर्थ की सेवा सत्कर्म है। विवेकशील गृहस्थ के लिए दान देकर परोपकारी रहना आवश्यक है। व्यवहार दृष्टि के प्रकाश में वे ही आचार्य पूज्यपाद कहते हैं।

ज्ञानवान् ज्ञानदानेन निर्भयोऽभयदानत:।

अन्नादानात्मुखी नित्यं निव्र्याधि र्भेषजाद्भवेत्।।

यह जीव दूसरों को ज्ञान का दान करने से ज्ञानवान् , अन्न दान से सदा सुखी रहता है तथा औषधि का दान करने से व्याधिरहित होता है। अत: सदा दान देना उचित है। इस तर्कसंगत व्यवहार दृष्टि का निरादर कर विषयासक्ति पूर्ण स्वार्थी जीवन व्यतीत कर अपने को महान अध्यात्मवादी मानना अविवेकी का कार्य है। परोपकारी बनना गृहस्थ जीवन के लिए आवश्यक है। तपोवनवासी श्रेष्ठ श्रमणों की अपेक्षा स्वोपकार की दृष्टि को मुख्य माना गया है।

तत्वग्राही निश्चय दृष्टि कहती है, एक ही खदान से निकले एक संगमरमर की चट्टान का एक अंश मूर्ति बनाकर भगवान शांतिनाथ कहा जाता है और उस पाषाण का दूसरा अंश मन्दिर की सीढ़ी माना जाता है। यह भेद हमें मान्य नहीं है। हमारी निश्चय दृष्टि में दोनों पाषाण समान हैं।

इस दृष्टि को एकान्त सत्य समन्वित स्वीकार करने पर गड़बड़ी हो जायगी। व्यवहारनय से प्रकाश प्राप्त स्याद्वादी कहेगा, खदान में उस पाषाण में भेद नहीं था, किन्तु जब मूर्तिकार ने पाषाण को तीर्थंकर की मूर्ति का आकार दिया, प्रतिष्ठा विधि द्वारा उसकी प्राण—प्रतिष्ठा हो गई, तब साधक की विवेकपूर्ण दृष्टि उस मूर्ति को भगवान मानकर विनय करने को प्रेरित करती है। उस दृष्टि से सीढ़ी के पाषाण से उनकी समानता का पक्ष अब उपयोगी नहीं रहेगा। अकेला अध्यात्मवाद चक्कर में डाल देगा, भगवान गोम्मटेश्वर की मूर्ति को वह पाषाण की मूर्ति मानेगा।, भगवान बाहुबली की नहीं। ऐसा मानने से जीवन शोधन हेतु कुछ भी तत्त्व हाथ न लगेगा। व्यवहार दृष्टि से बाहुबली साक्षात् मूर्तिमान हैं, ऐसा मानकर आराधना करने से स्वहित संपादन होगा। अत: समन्वय पथ श्रेयस्कर एवं शांति प्रदाता है।

शंका — स्याद्वाद पक्ष वाला निश्चय तथा व्यवहार दृष्टियों को उपभोगी, उपकारी, हितकारी तथा श्रेयोपथ मानता है। वह एकान्त से आध्यात्म पक्ष मानने वाले का क्यों विरोध करता है? ऐसा करना क्या सत्य तत्त्व का विरोध नहीं है?

समाधान — एकान्त पक्ष वाला जब सत्य विकृत, विकारी, हानिकारी रुप उपस्थित करता है तब सत्यग्राही दृष्टि वाले का आवश्यक कर्त्तव्य हो जाता है, कि सत्य पक्ष के रक्षण हेतु एकान्त दृष्टि से होने वाली नित्य पक्षयस को ध्यान में रखकर आक्रान्ता एकान्तवादी को न्याय का सही रास्ता बतावे। यही न्याय हानि पर प्रकाश डाले। जैनागम जब बौद्ध तत्त्वज्ञानी को एकान्त क्षणिक पक्ष का पोषण करते हुये पाता है, तब उसका कर्तव्य हो जाता है कि वह पद दलित किये जाने वाले निश्चयनय और व्यवहारनय पक्ष को विस्मरण करने वाले एकान्तवादी चिन्तक के विषय में लगाना चाहिए। एकान्तवादी सत्य को विकृत करता है। स्याद्वादवादी सत्य के सच्चे सौन्दर्य को प्रकाशित करता है। इसलिए समन्वय पथ ही न्याय मार्ग है। एकान्त पथ सत्य पद का विनाशक है; मिथ्यात्व है तथा संसार सागर में जीव को डुबाने वाला है। वह कालकूट विष से भी भयंकर है।