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स्वास्थ्य और समृद्धि में रत्नों का योगदान

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स्वास्थ्य और समृद्धि में रत्नों का योगदान

कोकलचन्द जैन
वरिष्ठ पत्रकार, १—ट—३५, जवाहर नगर, जयपुर—३०२ ००४
सारांश
प्रस्तुत आलेख में मानव की समृद्धि एवं स्वास्थ्य रक्षण में विभिन्न प्रकार के रत्नों की उपयोगिता को विस्तार से विवेचित किया गया है।
सम्पादक

मानव के लिये रत्न सुख—समृद्धि के उत्प्रेरक होते हैं। व्यक्ति विशेष के लिये समयानुकूल रत्नों का चयन एवं उपयोग हितावह रहता है। इसी के साथ स्वास्थ्य की दृष्टि से भी इनकी बड़ी उपयोगिता है। विभिन्न रोगों अथवा विकारों के निवारण में ये कारगर सिद्ध होते हैं। वैसे सामान्यतया रत्नों को सौन्दर्य—बोध के प्रतीक के रूप में माना जाता है। रत्नों को धारण करना बड़ा शुभ और मंगलकारी होता है। गौरव तथा सुख—समृद्धि के परिचायक अनुकूल रत्नों को धारण किया जाता है। रत्नों की एक अत्यधिक महत्वपूर्ण उपयोगिता यह है कि ये मानव के स्वास्थ्य के लिये अद्भुत रूप से लाभप्रद होते हैं।

ऐसी मान्यता है कि सृष्टि की रचना के साथ ही पृथ्वी में इन विशिष्ट पाषाणों की उत्पत्ति हुई। प्राणी मात्र को इनकी जानकारी होने पर इनका उपयोग किया जाने लगा। इस प्रकार हम देखते हैं कि रत्नों का प्रादुर्भाव अतीत काल से ही रहा है। इस सन्दर्भ में प्राचीन शास्त्रों में भी नवरत्नों का वर्णन मिलता है। ऐसे अनेकों महत्वपूर्ण ऐतिहासिक प्रासंगिक कथन मिलते हैं। जैन तीर्थंकरों के जन्म के पूर्व उनकी माता को जो सोलह स्वप्न आते हैं, उनमें रत्न राशि का भी उल्लेख है। आचार्य वराहमिहिर आदि हमारे प्रकाण्ड विद्वानों ने भी रत्नों का विशद् रूप से वर्णन किया है। पाश्चात्य विद्वानों के द्वारा भी रत्नों की प्राचीनता से ही उपयोगिता प्रतिपादित की गई है।

रत्नों के पारखी विशेषज्ञ लोग निज व्यावहारिक ज्ञान के धनी होते हैं। यह एक विशिष्ट उपलब्धि ही है कि किसी भी रत्न को सहज भाव से हाथ में लेकर हमारे रत्न पारखी, कुशल, जौहरी, केवल नेत्रों से ही देखकर उसके रंग, पानी अथवा गुण—दोष को ज्ञात कर लेते हैं। रत्नों की कठोरता, वजन, घनत्व, गुरुत्व आदि की भी जाँच सरलता के साथ की जाती है। रत्नों की सही परख और पहचान अनुभव और व्यवहारिक ज्ञान के आधार पर ही संभव होती है।

आजकल वैज्ञानिक प्रगति तथा बढ़ते हुए मशीनीकरण के युग में पाश्चात्य देशों में यंत्रों के द्वारा रत्नों की जांच व उन्हें तैयार करने की विधियाँ अपनाई जाने लगी है। इस प्रकार के उपकरणों का भले ही व्यावसायिक दृष्टि से अपना स्थान हो सकता है तथापि, हमारे सिद्धहस्त शिल्पियों और रत्न पारखियों के पारम्परिक ज्ञान, सूझबूझ और कौशल की विशिष्टता निश्चय ही श्रेयस्कर है। सधे हुए हाथों और नेत्रों के द्वारा परख के आधार पर रत्न परीक्षण और सृजन की महत्ता सर्वोत्कृष्ट सर्वोपरि है। रत्नों एवं रत्नाभूषणों के लिये जयपुर अपनी स्थापना के समय से ही विश्वविख्यात रहा है। जवाहरात व्यवसाय और शिल्प के लिये जयपुर प्रमुख मंडी है। कच्चा माल अर्थात् खरड का मुख्यत: विदेशों से आयात होता है। खरड को तराशने वाले हजारों कारीगर यहाँ पर हैं। इनके अलावा काफी संख्या में व्यवसायी, दलाल, निर्यातकर्ता आदि लोग हैं। इस प्रकार लाखों की संख्या में लोग किसी न किसी रूप में रत्नाभूषण के काम में लगे हुए हैं।

रत्नों में मौलिक रूप से ही प्रकृति—प्रदत्त विशेषता, होती हैं जिनकी वजह से ही वे विशिष्ट रूप से प्रभावकारी होते हैं। किसी भी पत्थर में प्राकृतिक रूप से ही कुछ रेशे, ऐब होते ही हैं। यह विशेषता एक तथ्य है। इसीलिये असली रत्नों में भी कुदरती तौर पर कुछ न कुछ ऐब होना स्वाभाविक बात है। जबकि नकली अथवा इमीटेशन में रेशे आदि मौलिक ऐब कभी नहीं आ सकते। अत: रत्नों के असली नकली होने की पहचान इस प्रकार सुगमतापूर्वक की जा सकती है।

विभिन्न प्रकार के रत्नों को सोने, चांदी अथवा अन्य धातुओं में जड़वाकर महिलाएँ व पुरुष सभी लोग धारण करते हैं। रत्नों के विषय में एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इनका उपयोग केवल दिखावे या सुन्दरता के लिये अथवा मन—बहलाव के लिये ही नहीं किया जाता, अपितु रत्नों का यथाविधि उपयोग सुख—समृद्धि प्रदान करने वाला तथा स्वास्थ्यवद्र्धक, व्याधि—निवारक भी होता है।

हमारी इस पृथ्वी से जिन नक्षत्रों का अति निकट सम्बन्ध है वे ही नक्षत्र पृथ्वी ग्रह के होते हैं। ज्योतिष विद्वानों के द्वारा ग्रह के रूप में सूर्य, चन्द्र आदि नव—ग्रह ही मान्य हैं। प्राणी मात्र पर इन नक्षत्रों की गति का अनुकूल अथवा प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। मनुष्य इनके प्रभाव का भोक्ता बना है तथा अपने अनुभव के द्वारा इसे जानता है। गहन अन्वेक्षण के आधार पर ऐसी मान्यता है कि रत्नों में उन ग्रहों की विशेष शक्ति विद्यमान रहती है जिससे कि अमुक रत्नादि के धारण करने अथवा उपयोग से स्पष्टतया सुख—दु:ख की अनुभूति होती है। उपरोक्त अवधारणा के अनुसार प्रधान नव—रत्नों में माणक, मुक्ता, विद्रुम, पन्ना, पुखराज, हीरा, नीलम, गोमेद तथा लहसुनियाँ होते हैं। इनकी उत्पत्ति क्रमश: सूर्य, चन्द्रमा, मंगल, बुध, वृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु और केतु इन प्रमुख नव—ग्रहों की पृथ्वी पर साक्षात् किरणों के प्रभाव से उक्त अमुक ग्रहों में विद्यमान विशेष तत्वों से होती है। रत्नों में पानी और ज्योति का ही महत्व होता है। इन्हीं तत्वों के आधार पर रत्नों का मूल्यांकन किया जाता है।

ज्योतिष शास्त्रानुसार विभिन्न व्यक्तियों की ग्रह—दशा के अनुसार विभिन्न प्रकार के रत्नों के वजन एवं धारण करने की विधि व तिथि प्रतिपादित किये गये हैं। किसी अमुक ग्रह दशा में अमुक रत्न को धारण करना उपयुक्त रहता है। रत्न का गुण ही आकर्षण उत्पन्न करता है। इस तरह रत्न विशेष को धारण करने से तदनुकूल प्रभाव अपेक्षित होता है।

ऐसी मान्यता है कि सामान्यतया बुध की दशा में पन्ना धारण किया जाता है। इसे सोने में जड़वाकर पहिनते हैं तथा बुधवार को प्रात:काल के समय धारण किया जाता है। माणक को सूर्य की दशा में पहिनते हैं, इसे रविवार को प्रात:काल धारण किया जाता है। वृहस्पति की दशा में पुखराज धारण करते हैं। इसे वृहस्पतिवार को व सूर्यास्त से एक घण्टा पूर्व पहिनना चाहिये। केतु की दशा में लहसुनियाँ धारण किया जाता है। इसे मध्य रात्रि के समय धारण करना श्रेष्ठ मानते हैं। हीरा शुक्र की दशा में शुक्रवार को सूर्यास्त के समय धारण करना उपयुक्त रहता है। शनि की दशा में नीलम सूर्यास्त के तीन घण्टे पूर्व धारण करना चाहिये। नीलम अत्यधिक प्रभावशाली रत्न होने से तात्कालिक परिणाम दर्शाता है। अत: इसे धारण करने से पूर्व कम से कम तीन दिन तक कपड़े में लपेटकर दाहिनी भुजा में बांधकर देख लेना चाहिये। अनुकूल होने पर इसे अँगूठी में अथवा अन्य प्रकार जड़वाकर पहिन सकते हैं। चन्द्रमा की दशा में मोती को चाँदी में जड़वाकर सोमवार को सायंकाल धारण करना चाहिये। मोती को बड़ा पावन रत्न माना जाता है। यह चित्त की शांति और प्रसन्नता प्रदान करता है। सभी रत्नों में हीरा अपेक्षाकृत कठोर होता है। हीरे का स्थान रत्नों में ऊँचा है। यह सबसे अधिक चमकदार होता है तथा लगातार पहिने रहने से भी इसकी आभा कम नहीं पड़ती। ऐसा कहते हैं कि तेरहवीं शताब्दी में भारतीय रत्न शिल्पियों द्वारा सर्वप्रथम हीरे के टुकड़े से हीरे को घिस कर नगीने बनाने की पद्धति का आविष्कार किया गया था।

धारण करने के अलावा रत्नों का हमारे लिये औषधि के रूप में भी बड़ा गुणकारी व कल्याणकारी उपयोग है। विभिन्न प्रकार के रत्नों का उनके गुणों के आधार पर आयुर्वेदिक औषधि के रूप में प्रयोग अत्यन्त महत्वपूर्ण बात है। रत्नों को गुण के आधार पर अनुपात के अनुसार कई प्रकार की व्याधियों के उपचार में चमत्कारी पाया गया है। भारत में प्राचीन पद्धति के अनुसार औषधि बनाने के लिये विभिन्न प्रकार के रत्नों को आँच में जलाकर उनकी भस्म बनाई जाती है। गोबर के छानों की आँच में इन्हें जलाया जाता है। अलग—अलग प्रकार के रत्नों की भस्म बनाने के लिये अलग—अलग एक निश्चित तापमान देना होता है।

कालान्तर में रत्नों को भस्म अथवा पिष्ठी के रूप में परिर्वितत करने की सुगम प्रक्रिया अपनाई जाने लगी। इस प्रक्रिया में रत्नों को पत्थर की खरल में कूट—पीट करके मूसल द्वारा धीरे—धीरे घिसाई की जाती है। बीच—बीच में कुछ अन्तराल के साथ उसमें केवड़ा जल अथवा गुलाब जल डालते रहते हैं। इस प्रकार से लगातार खूब घिसाई की जाती है जिससे कि अत्यन्त बारीक पावडर के रूप में भस्म अथवा पिष्ठी तैयार हो जाती है। इससे रत्नों की शुद्धता और गुणों की तासीर कायम रहती है।

विधिपूर्वक तैयार की गई रत्नों की भस्म अथवा पिष्ठी आश्चर्यजनक रूप से प्रभावकारी होती है। रोग निवारण एवं स्वास्थ्य के लिये मात्रा अनुपात के अनुसार इनका उपयोग किया जाता है। कई प्रकार की गम्भीर अथवा कष्टसाध्य व्याधियों की चिकित्सा में भी इनका प्रयोग अत्यधिक हितकारी सिद्ध हुआ है। मानव के लिये रत्नों का इसे बड़ा कल्याणकारी योगदान माना जा सकता है। इस प्रकार चिकित्सा जगत में रत्नों का महत्व सुप्रतिष्ठापित हुआ है।

उदाहरणार्थ

जवाहर—मोहरा पेट की बीमारियों, मोतीझरा, ज्वर तथा हृदय की बीमारी के लिये लाभप्रद रहता है। मोती की पिष्ठी का उपयोग शरीर में केल्सियम अथवा चूने की कमी की र्पूित करता है। महिलाओं की आम बीमारी प्रदर की चिकित्सा के लिये अम्बर रामबाण औषधि है। लहसुनिया तथा गोमेद्क कफ, ज्वर, वायुशूल, जोड़ों के दर्द, चर्म रोग, बवासीर, कृमि रोग, मुख गन्ध को दूर करते हैं। लाजवर्त (लेपिस—लेजुली) पीलिया, तपेदिक तथा मूत्ररोग के उपचार में लाभप्रद होती है। दाना फिरंग (किडनी स्टोन) को धारण करने से गुर्दे के दर्द में लाभ होता है। इसे गुलाब जल में घिसकर रोगी को पिलाने अथवा गुर्दे के दर्द में लाभ होता है। इसे गुलाब जल में घिसकर रोगी को पिलाने अथवा गुर्दे के ऊपर लेप करने से भी आराम मिलता है। माणक रक्तवर्धक होता है, वायुनाशक है तथा उदर रोगों में भी लाभ पहुँचाता है। इसकी भस्म व पिष्ठी दोनों ही खाने के काम आती है। नीलम दिमागी बीमारियों, हिचकी, विषम ज्वर, जोड़ों के दर्द आदि के उपचार में लाभप्रद होता है। नीले के बारीक चूर्ण को कपड़—छान करके गुलाबजल, केड़ा जल अथवा मुश्क के जल में घुटाई की जाती है। काजल के समान घुट जाने के पश्चात् इसे उपयोग में लिया जाता है।

मूंगा स्वास्थ्य वर्धक होता है। इसे गुलाब जल में खूब घिसाई करके छाया में सुखाने के उपरान्त उत्तम शहद के साथ सेवन करने से शरीर पुष्ट होता है। इसको पान के साथ खाने पर कफ—खाँसी में आराम मिलता है। मलाई के साथ सेवन से शरीर में उष्णता को तथा हृदय की छड़कन को ठीक करता है। पन्ना को गुलाब जल अथवा केवड़ा जल के साथ घोंटकर प्रयोग में लिया जाता है। पन्ना रक्त विकार, हृदय रोग एवं मूत्र रोग में लाभदायक होता है। इसी प्रकार पुखराज को भी गुलाब जल एवं केवड़ा जल में घोंटने के पश्चात् जब वह काजल की तरह घिस जावे तो उसे छाया में सुखा लेना चाहिये। यह नकसीर, आमवात कफ, खाँसी, पीलिया, श्वास आदि रोगों में लाभदायक सिद्ध होता है।

विविध रत्नों की शृंखला में अपने विशिष्ट गुणों के कारण हीरे की अपनी ही विशेषता होती है। आयुर्वेदिक औषधि के रूप में उपयोग की दृष्टि से शुद्ध विधिपूर्वक तैयार की हुई हीरे की भस्म का ही प्रयोग किया जाना चाहिये। यह अतिसार, पक्षाघात, उन्माद, मिर्गी, संग्रहणी आदि रोगों के उपचार में लाभप्रद रहती है। हीरे की भस्म का ही प्रयोग किया जाता है, पिष्ठी का नहीं। यदि असावधानी से कभी हीरे का कण पेट में चला जाये तो उस व्यक्ति को दूध में घी मिलाकर पिलाना चाहिये जिससे कि वमन होकर वह बाहर निकल जावे, अन्यथा आंतों के अन्दर जख्म हो जाता है।

गोदन्ती की भस्म दवा के रूप में काम में आती है। तुरमली का भी औषधियों में काफी प्रयोग होता है। यह कई तरह के रोगों के उपचार में लाभप्रद रहती है। पितोनियाँ अथवा ब्लड स्टोन की दवा के रूप में प्रयोग होता है। इसकी पिष्ठी का भी उपयोग किया जाता है। यह पित्ती को ठीक करता है। इसीलिये इसे पितोनियाँ कहते हैं। शरीर में पित्ती निकलने पर इसको रगड़ने से भी पित्ती शान्त हो जाती है। वैसे भी यह बड़ा सख्त पत्थर होता है। इसकी खरल भी बनती है जिनका उपयोग औषधियों को कूटने व घिसाई करने हेतु किया जाता है।

अस्तु यह एक प्रामाणिक तथ्य है कि रत्नों का हमारे साथ बहुत ही गहरा सम्बन्ध है। यह एक सुनिश्चित सर्वविदित बात है। अतएव रत्नों की उपयोगिता को अच्छी तरह समझने तथा विभिन्न प्रकार के रत्नों के बारे में शोध एवं जानकारी महत्वपूर्ण है। रत्नों के यथोचित उपयोग को प्रोत्साहन प्रदान किया जाना चाहिये। रत्नों के गुणकारी प्रभावों से लोग अधिकाधिक लाभान्वित हो सके, इस दिशा में कारगर प्रयास किये जाने की आवश्यकता है। रत्नों के बारे में जो सामान्य रूप से अवधारणा बनी हुई कि यह सौन्दर्य बोध और समृद्धि के प्रतीक होते हैं, इस मान्यता से भी आगे बढ़ते हुए रत्नों के लोक कल्याणकारी प्रभाव एवं उपयोगिता को समुचित रूप से प्रकाश में लाया जाना नितान्त आवश्यक है।

निश्चय ही इस प्रकार रत्नों की कल्याणकारी महत्ता और उपादेयता को समुन्नत आधार पर प्रतिष्ठापित किया जाना इस परिप्रेक्ष्य में एक अभूतपूर्व क्रांति का सूत्रपात होने के साथ ही साथ जन—जीवन के लिये लाभप्रद आयामों के सृजन की दिशा में सद् प्रयास सिद्ध होगा।


अर्हत् वचन जनवरी—मार्च २००५