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हमारे पूर्वज-सराक

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हमारे पूर्वज-सराक

जिस प्रकार ‘‘सरावगी शब्द श्रावक शब्द का बिगड़ा रूप है, उसी प्रकार सराक, सरावक आदि भी श्रावक शब्द का ही बिगड़ा रूप है। ‘श्रावक’ का अर्थ होता है, श्रद्धावान, विवेकवान एवं क्रियावान। अर्थात् सच्चेदेव, शास्त्र, गुरु की श्रद्धापूर्वक धर्मानुसार क्रिया करने वाले मनुष्य को श्रावक (सराक) कहते हैं। ‘श्रावक’ (सराक) के तीन लक्षण है— (१) जल छान कर पीना।

(२) रात्रि में भोजन नहीं करना एवं

(३) प्रभु का दर्शन करना या जिनेन्द्र देव की उपासना करना।

सराक जाति की निम्नलिखित विशेषतायें हैं :

(१) शुद्ध शाकाहारी हैं।

(२) प्याज, लहसून आदि अधिकांश व्यक्ति नहीं खाते हैं।

(३) अष्ट मूलगुणों का पालन करते हैं।

(४) शादी (विवाह) अपनी समाज में ही करते हैं।

(५) विधवा—विवाह एवं विजातीय—विवाह का निषेध हैं नियम तोड़ने वालों को जाति से अलग कर दिया जाता है।

(६) काटो, काटा, टुकड़े करो, आदि हिसावाचक शब्दों का प्रयोग भोजनशाला में नहीं करते हैं।

(७) सरल स्वभावी हैं, तथा अतिथि—सत्कार बड़े ही उत्साह से करते हैं।

(८) भोजन बिना स्नान किये नहीं बनाते हैं, और न ही बिना स्नान किये भोजन करते हैं।

(९) अपनी जाति के अलावा अन्य किसी को रसोई में प्रवेश नहीं करने देते हैं, एवं अपने घर के सदस्य भी अशुद्ध कपड़े पहने एवं बिना स्नान किये रसोई में प्रवेश नहीं करते हैं।

(१०) अपनी जाति के अलावा किसी को अपने बर्तनों में भोजन नहीं कराते हैं, एवं किसी को भोजन कराने पर उन बर्तनों का उपयोग भोजनशाला में नहीं करते हैं। प्राय: अन्य जातियों को भोजन कराने के लिय घर में अलग बर्तन रखे होते हैं।

(११) सराक बंधुओं के पूर्वज २२ अभक्ष्य के त्यागी थे।

(१२) शौच के कपड़ों से कोई भी वस्तु नहीं छूते हैं।

(१३) किसी दूसरों के हाथ से बनी दाल, भात, रोटी आज भी नहीं खाते हैं।

(१४) इनके पूर्वज होटलों में भोजन नहीं करते थे, अगर कोई होटल में या बाहर कहीं अन्य जाति के घर पर, दुकान या होटल में कर लेता था तो सराक पंचायत उसे दण्डित करती थी। दण्डित हुये बिना उसे समाज के किसी भी कार्य में नहीं बुलाया जाता था। प्रायश्चित होने पर ही उसकी शुद्धि होती थी।

(१५) सराक जाति के गोत्र चौबीस तीर्थंकरों के नाम पर हैं जैसे आदिदेव, शान्तिदेव, अनन्तदेव, गौतम, धर्मदेव, सांडिल्य आदि। (१६) टाईटिल—सराक, मांझी, मण्डल, आचार्य, चौधरी अधिकारी आदि।

सराक बंधुओं के पूर्वजों के कुलदेवता

सराक बंधुओं के पूर्वजों के कुलदेवता देवाधिदेव १००८ श्री पार्श्वनाथ भगवान एवं श्री महावीर भगवान थे। भगवान पार्श्वनाथ स्वामी की र्मूित पुरूलिया जिले के अनाईजामबाद ग्राम में अभी भी स्थित है। जिसकी ऊँचाई ५ फीट है जिसके आसपास सराक बंधु अभी भी है। उसी राज्य के बाँकुड़ा जिला के बाहुलाडा ग्राम में १२०० वर्ष प्राचीन भगवान पार्श्वनाथ स्वामी की प्रतिमा है, जो कि मनोज्ञ, मनोरम एवं सबको आर्किषत करने वाली है। कुछ सराक बंधुओं के घरों में अभी भी मूर्तियाँ हैं। एवं उस क्षेत्र में अभी भी छोटी—बड़ी एवं मनोज्ञ र्मूितयाँ काफी मात्रा में प्राप्त हो रही हैं।

इनके पूर्वजों ने धर्म एवं देश की रक्षा के लिये अपना सर्वस्व सर्मिपत कर दिया। कभी भी दूसरों के सामने हाथ नहीं पसारे। जब अन्य विधर्मी साम्राज्य का आगमन हुआ तो वे सराक बंधुओं को सत्पथ से विचलित कराकर हिसात्मक कार्यों में प्रवृत्ति कराने के लिए मजबूर कर रहे थे, यहाँ तक कि उनके जैनमंदिर, र्धािमक साहित्य को भी नष्ट भ्रष्ट करने में कटिबद्ध हो गये। राजा, महाराजा, सामन्त आदि अपने शासन काल में सराक बंधुओं के पूर्वजों से मद्य, मांस, मधु आदि सेवन के लिये, उनकी बेटियों से जबरदस्ती शादी करवाने के लिये अनेकों अत्याचार करने को आतुर हुये, उसी समय सभी अपने धर्म की रक्षा हेतु अपने—अपने स्थानों को छोड़कर अज्ञात रूप से जंगल में वास करने लगे।

इनके पूर्वजों की संकट कालीन स्थिति का जीता—जागता उदाहरण हमारी आँखों के सम्मुख पाकिस्तान में है वहाँ हिन्दुओं की, जैनों की क्या दुर्दशा हुई ? उन्हें तरह—तरह की यातनायें सहनी पड़ी। अस्थिर एवं चंचल अवस्था में वर्षो बिताया जिस कारण से जिनमंदिर, धार्मिक ग्रंथ आदि से विमुख हो गये तथा बाद में गुरुओं का समागम भी न मिल सका। सराक बंधुओं के पूर्वजों की पंचायत शासन व्यवस्था बहुत अच्छी थी। उन सभी का किसी भी कोर्ट (न्यायालय) में केस—मुकदता नहीं था। वे अपने झगड़ों को पंचायत में ही सुलझा लेते थे। सराक बंधुओं के पूर्वजों का इतना गौरव था कि कोर्ट में इनकी गवाही प्रमाणिक मानी जाती थी। उपरोक्त बातों से सिद्ध होता है, कि वे सत्यवादी एवं सच्चे के पुजारी थे।

इनके पूर्वजों का खान—पान शुद्ध एवं सात्विक था। भोजन, भोजनशाला के अंदर ही करते थे। एक अंग्रेज अधिकारी ने कहा था कि मुझे इस बात पर हैरानी है कि ये सराक जाति के लोग मांसाहारी लोगों के झुंड में रहकर कैसे शुद्ध शाकाहारी है ? इनके पूर्वज श्रद्धा पूर्वक जिनेन्द्र प्रभु की उपासना—पूजा आदि करते थे। उनके बताये हुये मार्ग पर चलते थे। इस प्रकार वे श्रावक के सभी नियमों का पालन करते थे, अर्थात्, श्रद्धावान, विवेकवान, एवं क्रियावान थे। आजकल ये लोग धर्म से विमुख हो जाने के कारण पूर्वजों के पूर्व संस्कारों को धीरे—धीरे भूलते जा रहे हैं। अभी प्राय: सभी सराक बंधु जानते हैं कि हमारे पूर्वजों ने विस्तृत रूप से जैन मंदिरों का निर्माण कराया था। धर्मरक्षा हेतु जब स्थान परिवर्तन करना पड़ता था तब विरुद्ध मतावलंबी मंदिरों एवं र्मूितयों को नष्ट—भ्रष्ट कर देते थे। धीरे—धीरे नये स्थानों पर बसने के लिये वहाँ के राजा या जमींदार का आश्रय लेना पड़ा। उन्हीं के कहे मुताबिक धर्म का पालन करना पड़ता था। परिणाम—स्वरूप सराक बंधु धर्म से विमुख होते गये। फिर भी अभी तक सराक जाति के लोग शाकाहारी एवं अिंहसक हैं। मद्य, मांस आदि का सेवन नहीं करते हैं। तथा अभी भी पानी छान कर पीते हैं, एवं कुछ लोग रात्रि—भोजन नहीं करते हैं। अधिकांश व्यक्ति णमोकार मंत्र जानते हैं।

राँची, सिहभूम जिले में सराक जाति जीन भागों में विभक्त थे

मूसराक, सिकरिया सराक एवं कड़ासी सराक। वर्तमान में मूल सराक एवं सिकरिया सराक दो भागों में ही विभाजित है। यहाँ आज भी सभी सराक जाति के लोग भगवान ऋषभदेव स्वामी के बताये हुये मार्ग ‘कृषि करो और ऋषि जीवन बिताओ’ का पालन करते हैं। और अपनी आजीविका चला रहे हैं। सराक जाति के लोग बिहार—बंगाल एवं उड़ीसा के कुछ स्थानों में निवास कर रहे हैं। जिसकी संख्या लगभग ६—७ लाख तक होगी। बिहार बंगाल एवं उड़ीसा प्रान्त में मेदनीपुर जिला को छोड़कर लगभग ५०० गाँव हैं। इसकी सही संख्या प्राप्त करने की रूप रेखा बन रही है।

‘सराक बंधुओं के प्रति स्वर्गीय परम पूज्य श्री गणेशवर्णी जी, श्री जिनेन्द्र वर्णी जी, श्री मनोहरलाल वर्णी जी, श्री ब्र. शीतल प्रसादजी, पंडित श्री बाबूलाल जी जमादार, श्री बैजनाथ जी सरावगी, साहू श्री शांतिप्रसाद जी, रायबहादुर श्री हरकचन्द जी पाण्डया राँची, श्री विमल प्रसाद, शिखरचन्द्र जी खरखरी वाले आदि सभी ने काफी प्रयत्न किया। उस समय अनेकों जिनमंदिर तथा छात्रों को पढ़ने के लिये कई जगह विद्यालय खोले गये। बहुत दिनों तक विद्यालय चले। उसी समय किसी सराक सम्मेलन में वक्ता के द्वारा निम्न पंक्तियाँ कही गई थी—

‘‘यदि वर्तमान जैन समाज विशाल वटवृक्ष है, तो सराक उसकी जड़ है, जिस पर यह वृक्ष पल्लवित होकर विस्तृत हुआ है। यदि वर्तमान जैन संघ जिनेश्वर की नूतन प्रतिमा है, तो सराक उसकी प्राचीन प्रतिमा का अवशेष हैं यदि जैन रूप पर्वत की खुदाई करेंगे तो सराक उस खुदाई की उपलब्धि होगी। इसके बाद सन् १९८३ में ईसरी (गिरडीह) में परम पूज्य १०८ श्री आचार्य विद्यासागर जी महाराज के सानिध्य में सराक सम्मेलन हुआ था।

तदनंतर परम पूज्य उपाध्याय १०८ श्री ज्ञानसागरजी महाराज जी का बिहार प्रांत में प्रवस होने से हजारी बाग पंचकल्याणक प्रतिष्ठा में सन् १९९२ दि. २ मई को तथा रांची में भी सराक सम्मेलन हुआ। उसके बाद जब महाराज श्री उदयगिरि—खंडगिरि से लौटते समय सराक बंधुओं के ग्रामों में जिनमंदिर के दर्शन करते हुये बुण्डु (रांची) गाँव पधारे तब वहाँ पर महाराजश्री के सार्वजनिक प्रवचन का प्रभाव जनजन के हृदय पर पड़ा। साथ ही साथ सराक बंधु भी महाराज श्री के प्रति आर्किषत हुये। सभी की भावनाओं को देखते हुये वहां एक विशाल रूप से ‘सराक सम्मेलन’ का आयोजन ९.२.९३ से १७.२.९३ तक किया गया। जिसमें सराक बंधुओं की कई हजारों की उपस्थिति रही तथा र्धािमक शिक्षण भी २५-३० गाँवों के लोगों ने प्राप्त किया। सभी सराक बंधुओं में प्राचीन संस्कृति के प्रति जागृति आयी है।

सराक बंधुओं के विकास हेतु पांगुरा (रांची) में कुछ ग्रामों के सराक युवकों को प्रशिक्षित किया गया, जिनके द्वारा नौढ़ी, तमाड़, हुरूण्डीह, तड़ाई, नावाडीह, देवलटाड़, अगसिया, चींपड़ी, चोकाहातु, मांझीडीड, पारमडीह, हराडीह, बेड़ाहीड, पाण्डाडीह रड़गाँव, रूगड़ी ग्रामों में र्धािमक शिक्षण शिविर चल रहा है। सभी लोगों में अपूर्व जागृति आ रही है। अत: हम सब लोगों को इन सराक बंधुओं के विकास एवं उत्थान हेतु विचार करना चाहिये। सराक बंधुओं को भी समाज की रीतिरिवाजों का पालन करते हुये अपने कुलदेवता श्री पार्श्वनाथ भगवान तथा भगवान महावीर के पद चिन्हों पर चलकर अपने जीवन को महान बनाना चाहिये।

वर्तमान में बिहार, बंगाल एवं उड़ीसा के मूल सराकों की कुल जनसंख्या अनुमानत: ६—७ लाख होगी। जो निम्न ग्रामों में निवास करती हैं बिहार प्रान्त के राँची जिला में ४८ गाँव िंसहभूम जिला में ५ गाँव धनबाद जिला में १३ गाँव संथाल परगना (दुमका) जिला में ३० गाँव पं. बंगाल के वर्धमान जिला में २७ गाँव मेदिनीपुर जिला में ४५ गाँव बाँकुडा जिला में ३१ गाँव बोकारो जिला में १० गाँव वीर भूम जिला में ३ गाँव पुरुलिया जिला में ८८ गाँव कटक जिला में ४९ गाँव नोमागढ़ जिला में २५ गाँव गंजाम जिला में २२ गाँव पुरी जिला में २९ गाँव खुर्दा जिला में २६ गाँव गुंजाम जिला में ८४ गाँव इन सभी सराक बन्धुओं को धर्म की मुख्य धारा में जोड़ने से संस्कृति की महती सेवा होगी।


श्री कैलाशचन्द्र संजीवकुमार जैन
८०३, छत्तरी कटरा,
नई सड़क दिल्ली—६


ब्र. अतुल
रीडर एवं अध्यक्ष—हिन्दी विभाग, एस. आर. एस. कालेज, नागपुर। न्यू एक्सटेंशन एरिया, सदर, नागपुर
अर्हत् वचन अप्रैल ९६—पेज १७-२४