हम आए हैं निगोद से, आशाएँ संजो के

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हम आए हैं निगोद से


तर्ज—हम लाए हैं तूफान से......

हम आए हैं निगोद से, आशाएँ संजोके।
मानुष जनम को पाके, फिर निगोद न लौटें।। टेक.।।

केवल जनम मरण में ही, पर्याय बिताई।
कुछ पुण्य का संयोग, त्रस पर्याय अब पाई।।
शक्ती मिले चिन्तन करें, आतम मगन होके।
मानुष जनम को पाके, फिर निगोद न लौटें।।१।।

स्वर्गों के सुख भोगे, पशू की योनि भी पाई।
नरकों में रो-रोकर, वहाँ की आयु बिताई।।
नर तन प्रभो सार्थक करूँ, अब शांत मन होके।
मानुष जनम को पाके, फिर निगोद न लौटें।।२।।

सम्यक्त्व की महिमा से, आतम शुद्ध बनाऊँ।
शुभ देव शास्त्र गुरु के प्रति कत्र्तव्य निभाऊँ।।
फिर ‘चंदनामति’ क्रम से स्वर्ग मोक्ष भी होते।
मानुष जनम को पाके फिर निगोद न लौटें।।३।।

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