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ह्रीं प्रतिमा की आरती

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ह्रीं प्रतिमा की आरती

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तर्ज—साजन मेरा उस पार है..............


ह्रीं को मेरा नमस्कार है,
चौबिस जिनवर से जो साकार है।हो ओ.....
आरति करूँ मैं बारम्बार है,
चौबिस जिनवर को नमस्कार है।।टेक.।।
पद्मप्रभ वासुपूज्य राजते, कला में दोनों ही विराजते।।
लाल वरण शुभकार है, दोनों प्रभू को नमस्कार है।।ह्रीं.।।१।।
पारस सुपारस हरित वर्ण के, सर्प व स्वस्तिक जिनके चिन्ह हैं।
इनसे सुशोभित ईकार है, जिनवर युगल को नमस्कार है।।ह्रीं.।।२।।
चन्द्रप्रभ पुष्पदन्त नाम है, चन्द्रमा में विराजमान हैं।
श्वेत धवल आकार है, जिनवर की आरति सुखकार है।।ह्रीं.।।३।।
मुनिसुव्रत नेमीप्रभु श्याम हैं, जिनका बिन्दु में स्थान है।
दीपक ले आए प्रभु के द्वार हैं, आरति उतारूं बारम्बार है।।ह्रीं.।।४।।
ऋषभाजित संभव अभिनंदनं, सुमति शीतल श्रेयो जिनवरम्।
विमल अनंत धर्म सार हैं, शांति, कुंथु ,अर करते पार हैं।।ह्रीं.।।५।।
मल्लिप्रभु नमिनाथ राजते, सबके ही संग में विराजते।
वीरा की महिमा अपरम्पार है, आरति उतारूं बारम्बार है।।ह्रीं.।।६।।
सोलह तीर्थंकर ह्रीं में शोभते, केशरिया वर्ण से सुशोभते।
स्वर्ण छवि सुखकार है, आरति उतारूं बारम्बार है।।ह्रीं.।।७।।
‘‘चंदनामती’’ करे वंदना, ध्यान करो तो दु:ख रंच ना।

पंचवर्ण सुखकार है, आरति से होता बेड़ा पार है।।ह्रीं.।।८।।