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०१७.कैलाशपर्वत पर भरत चक्रवर्ती ने जिनमंदिर बनवाये थे

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कैलाशपर्वत पर भरत चक्रवर्ती ने जिनमंदिर बनवाये थे

(पद्मपुराण से)

अथानन्तर एक बार दशानन नित्यालोक नगर में राजा नित्यालोक की श्रीदेवी से समुत्पन्न रत्नावली नाम की पुत्री को विवाह कर बड़े हर्ष के साथ आकाशमार्ग से अपनी नगरी की ओर आ रहा था। उस समय उसके मुकुट में जो रत्न लगे थे उनकी किरणों से आकाश सुशोभित हो रहा था।।१०२-१०३।। जिस प्रकार बड़ा भारी वायुमण्डल मेरु के तट को पाकर सहसा रुक जाता है उसी प्रकार मन के समान चंचल पुष्पक विमान सहसा रुक गया।।१०४।। जब पुष्पक विमान की गति रुक गयी और घण्टा आदि से उत्पन्न होने वाला शब्द भंग हो गया तब ऐसा जान पड़ता था मानो तेजहीन होने से लज्जा के कारण उसने मौन ही ले रखा था।।१०५।।विमान को रुका देख दशानन ने क्रोध से दमकते हुए कहा कि अरे यहाँ कौन है ? कौन है ?।।१०६।। तब सर्व वृत्तान्त को जानने वाले मारीचि ने कहा कि हे देव! सुनो, यहाँ कैलाश पर्वत पर एक मुनिराज प्रतिमा योग से विराजमान हैं।।१०७।।ये सूर्य के सम्मुख विद्यमान हैं और अपनी किरणों से सूर्य की किरणों को इधर-उधर प्रक्षिप्त कर रहे हैं। समान शिलातल पर ये रत्नों के स्तम्भ के समान अवस्थित हैं।।१०८।। घोर तपश्चरण को धारण करने वाले ये कोई महान् वीर पुरुष हैं और शीघ्र ही मोक्ष प्राप्त करना चाहते हैं। इन्हीं से वह वृत्तान्त हुआ है।।१०९।। इन मुनिराज के प्रभाव से जब तक विमान खण्ड-खण्ड नहीं हो जाता है, तब तक शीघ्र ही इस स्थान से विमान को लौटा लेता हूँ।।११०।। अथानन्तर मारीचि के वचन सुनकर अपने पराक्रम के गर्व से गर्वित दशानन ने कैलाश पर्वत की ओर देखा।।१११।। दशानन ने उस पर्वत पर उतरकर उन महामुनि के दर्शन किये। वे महामुनि ध्यानरूपी समुद्र में निमग्न थे और तेज के द्वारा चारों ओर मण्डल बाँध रहे थे।।१२६।। दिग्गजों के शुण्डादण्ड के समान उनकी दोनों भुजाएँ नीचे की ओर लटक रही थीं और उनसे वे ऐसे जान पड़ते थे मानो सर्पों से आवेष्टित चन्दन का बड़ा वृक्ष ही हो।।१२७।। वे आतापन योग में शिलापीठ के ऊपर निश्चल बैठे थे और प्राणियों के प्रति ऐसा संशय उत्पन्न कर रहे थे कि ये जीवित हैं भी या नहीं।।१२८।। तदनन्तर ‘यह बालि है’ ऐसा जानकर दशानन पिछले वैर का स्मरण करता हुआ क्रोधाग्नि से प्रज्वलित हो उठा।।१२९।। जो ओंठ चबा रहा था, जिसकी आवाज अत्यन्त कर्वâश थी और जो अत्यन्त देदीप्यमान आकार का धारक था ऐसा दशानन भ्रकुटी बाँधकर बड़ी निर्भयता के साथ मुनिराज से कहने लगा।।१३०।। कि अहो! तुमने यह बड़ा अच्छा तप करना प्रारम्भ किया है कि अब भी अभिमान से मेरा विमान रोका जा रहा है।।१३१।। धर्म कहाँ और क्रोध कहाँ ? अरे दुर्बुद्धि ! तू व्यर्थ ही श्रम कर रहा है और अमृत तथा विष को एक करना चाहता है।।१३२।। इसलिए मैं तेरे इस उद्धत अहंकार को आज ही नष्ट किये देता हूँ। तू जिस कैलाश पर्वत पर बैठा है उसे उखाड़कर तेरे ही साथ अभी समुद्र में फैकता हूँ।।१३३।।

तदनन्तर उसने समस्त विद्याओं का ध्यान किया जिससे आकर उन्होंने उसे घेर लिया। अब दशानन ने इन्द्र के समान महाभयंकर रूप बनाया और महाबाहुरूपी वन से सब ओर सघन अन्धकार फैलाता हुआ वह पृथिवी को भेदकर पाताल में प्रविष्ट हुआ। पाप करने में वह उद्यत था ही।।१३४-१३५।। तदनन्तर क्रोध के कारण जिसके नेत्र अत्यन्त लाल हो रहे थे और जिसका मुख क्रोध से मुखरित था ऐसे प्रबल पराक्रमी दशानन ने अपनी भुजाओं से कैलाश पर्वत को उठाना प्रारम्भ किया।।१३६।। आखिर, पृथिवी को अत्यन्त चंचल करता हुआ कैलाश पर्वत स्वस्थान से चलित हो गया।।१३७।। तदनन्तर जब समस्त संसार संवर्तक नामक वायु से ही मानो आकुलित हो गया था तब भगवान् बाली मुनिराज ने अवधिज्ञान से दशानन नामक राक्षस को जान लिया।।१४५।। यद्यपि उन्हें स्वयं कुछ भी पीड़ा नहीं हुई थी और पहले की तरह उनका समस्त शरीर निश्चलरूप से अवस्थित था तथापि वे धीर, वीर और क्रोध से रहित हो अपने चित्त में इस प्रकार विचार करने लगे कि।।१४६।।

कारितं भरतेनेदं जिनायतनमुत्तमम्। सर्वरत्नमयं तुङ्गं बहुरूपविराजितम्।।१४७।।

प्रत्यहं भक्तिसंयुत्तै कृतपूजं सुरासरैः। भा विनाशि चलत्थस्मिन् पर्वते भिन्नपर्वणि।।१४८।।
 ध्यात्वेति चरणाङ्गुष्टपीडितं गिरिमस्तकम्। चकार शोभनध्यानाददूरीकृतचेतनः।।१४९।।

चक्रवर्ती भरत ने ये नाना प्रकार के सर्वरत्नमयी उँचे-उँचे जिनमन्दिर बनवाये हैं। भक्ति से भरे सुर और असुर प्रतिदिन इनकी पूजा करते हैं सो इस पर्वत के विचलित हो जाने पर कहीं ये जिनमन्दिर नष्ट न हो जावें।।१४७।। ऐसा विचारकर शुभ ध्यान के निकट ही जिनकी चेतना थी ऐसे मुनिराज बाली ने पर्वत के मस्तक को अपने पैर के अँगूठे से दबा दिया।।१४८-१४९।। तदनन्तर जिसकी भुजाओं का वन (बल) बहुत भारी बोझ से आक्रान्त होने के कारण अत्यधिक टूट रहा था, जो दुख से आकुल था, जिसकी लाल-लाल मनोहर आँखें चंचल हो रही थीं ऐसा दशानन अत्यन्त व्याकुल हो गया। उसके सिर का मुकुट टूटकर नीचे गिर गया और उस नंगे सिर पर पर्वत का भार आ पड़ा। नीचे धँसती हुई पृथिवी पर उसने घुटने टेक दिये। स्थूल होने के कारण उसकी जंघाएँ मांसपेशियों में निमग्न हो गयीं।।१५०-१५१।। उसके शरीर से शीघ्र ही पसीने की धारा बह निकली और उससे उसने रसातल को धो दिया। उसका सारा शरीर कछुए के समान संकुचित हो गया।।१५२।। उस समय चूँकि उसने सर्व प्रयत्न से चिल्लाकर समस्त संसार को शब्दायमान कर दिया था इसलिए वह पीछे चलकर सर्वत्र प्रचलित ‘रावण’ इस नाम को प्राप्त हुआ।।१५३।। रावण की स्त्रियों का समूह अपने स्वामी के उस अश्रुतपूर्ण दीन-हीन शब्द को सुनकर व्याकुल हो विलाप करने लगी।।१५४।। मन्त्री लोग किंकर्तव्यविमूढ़ हो गये। वे युद्ध के लिए तैयार हो व्यर्थ ही इधर-उधर फिरने लगे। उनके वचन बार-बार बीच में ही स्खलित हो जाते थे और हथियार उनके हाथ से छूट जाते थे।।१५५।। मुनिराज के वीर्य के प्रभाव से देवों के दुन्दुभि बजने लगे और भ्रमर सहित पूâलों की वृष्टि आकाश को आच्छादित कर पड़ने लगी।।१५६।।

क्रीड़ा करना जिनका स्वभाव था ऐसे देवकुमार आकाश में नृत्य करने लगे और देवियों की संगीतध्वनि वंशी की मधुर ध्वनि के साथ सर्वत्र उठने लगी।।१५७।। तदनन्तर मन्दोदरी ने दीन होकर मुनिराज को प्रणाम कर याचना की—कि हे अद्भुत पराक्रम के धारी! मेरे लिए पतिभिक्षा दीजिए।१५८।। तब महामुनि ने दयावश पैर का अँगूठा ढीला कर लिया और रावण भी पर्वत को जहां का तहां छोड़ क्लेशरूपी अटवी से बाहर निकला।।१५९।।तदनन्तर जिसने तप का बल जान लिया था ऐसे रावण ने जाकर मुनिराज को प्रणाम कर बार-बार क्षमा माँगी और इस प्रकार स्तुति करना प्रारम्भ किया।।१६०।। कि हे पूज्य! आपने जो प्रतिज्ञा की थी कि मैं जिनेन्द्रदेव के चरणों को छोड़कर अन्य के लिए नमस्कार नहीं करूँगा यह उसी की सामथ्र्य का फल है।।१६१।। हे भगवन्! आपके तप का महाफल निश्चय से सम्पन्न है इसीलिए तो आप तीन लोक को अन्यथा करने में समर्थ हैं।।१६२।। तप से समृद्ध मुनियों की थोड़े ही प्रयत्न से उत्पन्न जैसी सामथ्र्य देखी जाती है। हे नाथ! वैसी सामथ्र्य इन्द्रों की भी नहीं देखी जाती है।।१६३।। इस प्रकार स्तुति कर उसने मुनिराज को प्रणाम कर तीन प्रदक्षिणाएँ दीं, अपने आपकी बहुत निन्दा की और दुःखवश मुँह से सू-सू शब्द कर रुदन किया।।१७३।। मुनिराज के समीप जो जिनमन्दिर था लज्जा से युक्त और विषयों से विरक्त रावण उसी के अन्दर चला गया।।१७४।। वहाँ उसने चन्द्रहास नामक खड्ग को अनादर से पृथिवी पर पेंâक दिया और अपनी स्त्रियों से युक्त होकर जिनेन्द्रदेव की पूजा की।।१७५।। उसके भाव भक्ति में इतने लीन हो गये थे कि उसने अपनी भुजा की नाड़ीरूपी तन्त्री को खींचकर वीणा बजायी और सैकड़ों स्तुतियों के द्वारा जिनराज का गुणगान किया।।१७६।।

ऋषभाय नमो नित्यमजिताय नमो नमः। संभवाय नमोऽजस्रमभिनन्दनरूढये।।१८५।।

नमः सुमतये पद्मप्रभाय सततं नमः। सुपाश्र्वाय नमः शश्वन्नमश्चन्द्रसमत्विषे।।१८६।।
नमोऽस्तु पुष्पदन्ताय शीतलाय नमो नमः। श्रेयसे वासुपूज्याय नमो लब्धात्मतेजसे।।१८७।।
विमलाय नमस्त्रेधा नमोऽनन्ताय संततम्। नमो धर्माय सौख्यानां नमो मूलाय शान्तये।।१८८।।
नमः कुन्थुजिनेन्द्राय नमोऽरस्वामिने सदा। नमो मल्लिमहेशाय नमः सुव्रतदायिने।।१८९।।
अन्येभ्यश्च भविष्यद्भयो भूतेभ्यश्च सुभावतः। नमोऽस्तु जिननाथेभ्यः श्रमणेभ्यश्च सर्वदा।।१९०।।
नमः सम्यक्त्वयुक्ताय ज्ञानायैकान्तनाशिने। दर्शनाय नमोऽजस्रं सिद्धेभ्योऽनारतं नमः।।१९१।।

ऋषभ, अजित, सम्भव, अभिनन्दन, सुमति, पद्मप्रभ, सुपाश्र्व, चन्द्रप्रभ, पुष्पदन्त, शीतल, श्रेयोनाथ, वासुपूज्य, विमल, अनन्त, धर्म, सौख्यों के मूल कारण शान्तिनाथ, कुन्थु जिनेन्द्र, अरनाथ, मल्लि महाराज और मुनिसुव्रत भगवान् इन वर्तमान तीर्थंकरों को मन-वचन-काय से नमस्कार हो। इनके सिवाय जो अन्य भूत और भविष्यत्काल सम्बन्धी तीर्थंकर हैं उन्हें नमस्कार हो। साधुओं के लिए सदा नमस्कार हो। सम्यक्त्वसहित ज्ञान और एकान्तवाद को नष्ट करने वाले दर्शन के लिए निरन्तर नमस्कार हो तथा सिद्ध परमेश्वर के लिए सदा नमस्कार हो।।१८५-१९१।।

(पद्मपुराण,भाग-१,पर्व ९,पृ॰२१४ से २२१)