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०१-गतिमार्गणाधिकार

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गतिमार्गणाधिकार

अथ अल्पबहुत्वानुगमो नामैकादशो महाधिकार:

मंगलाचरणम्
द्वादशाङ्गधरैर्युक्त:, द्वादशगणवेष्टित:।
द्वादशाङ्गान्विता देवी, चाप्यवतार्यते हृदि।।१।।
द्वादशांगधारिभि: गणधरै: सहित: द्वादशसभासु द्वादशगणै: परिवेष्टित: तीर्थकर: श्रीऋषभदेव भगवान् मम हृदि विराजतां, तस्य मुखोद्गता द्वादशांगान्विता सरस्वतीदेवी च मया हृदयाम्बुजेऽवतार्यते।
अथ चतुर्दशभिरधिकारै: षडुत्तरद्विशतसूत्रैरल्पबहुत्वानुगमोनामैकादशो महाधिकार: प्रारभ्यते। तत्र तावत् प्रथमे गतिमार्गणाधिकारे अल्पबहुत्वानुगमकथनत्वेन ‘‘अप्पाबहुगाणुगमेण’’ इत्यादिना पंचदश सूत्राणि। तदनु इंद्रियमार्गणायां अल्पबहुत्वनिरूपणत्वेन ‘‘इंदियाणुवादेण’’ इत्यादिना द्वाविंशतिसूत्राणि। तत: परं कायमार्गणायां अल्पबहुत्वकथनत्वेन ‘‘कायाणुवादेण’’ इत्यादिना एकोनसप्ततिसूत्राणि। तदनंतरं योगमार्गणायां अल्पबहुत्वनिरूपणत्वेन ‘‘जोगाणुवादेण’’ इत्यादिना त्रयोविंशतिसूत्राणि। तत्पश्चात् वेदमार्गणायामल्प-बहुत्व-निरूपणत्वेन ‘‘वेदाणुवादेण’’ इत्यादि सूत्रपंचदशकं। तदनु कषायमार्गणायामल्पबहुत्वकथनपरत्वेन ‘‘कसायाणु-’’ इत्यादिसूत्रपंचकं। तत्पश्चात् ज्ञानमार्गणायामल्पबहुत्व कथनत्वेन ‘‘णाणाणु’’ इत्यादिसूत्रषट्कं। तत: परं संयममार्गणायामल्पबहुत्वकथनत्वेन ‘‘संजमाणु-’’ इत्यादिना एकोनविंशतिसूत्राणि। तदनंतरं दर्शनमार्गणायामल्पबहुत्वनिरूपणपरत्वेन ‘‘दंसणा’’ इत्यादिसूत्रचतुष्टयं। तत्पश्चात् दशमे लेश्यामार्गणाधिकारे अल्पबहुत्वप्रतिपादनत्वेन ‘‘लेस्साणु-’’ इत्यादिसूत्रसप्तकं। तदनु एकादशे भव्यमार्गणाधिकारेऽल्पबहुत्व-निरूपणत्वेन ‘‘भवियाणु-’’ इत्यादिसूत्रत्रयं। तत्पश्चात् द्वादशे सम्यक्त्वमार्गणाधिकारेऽल्पबहुत्वनिरूपणत्वेन ‘‘सम्मत्ताणु-’’ इत्यादिना द्वादश सूत्राणि। तत्पश्चात् त्रयोदशे संज्ञिमार्गणानाम्नि अल्पबहुत्वप्ररूपणत्वेन ‘‘सण्णिया-’’ इत्यादिसूत्रत्रयं। तत: पुन: चतुर्दशे आहारमार्गणाधिकारेऽल्पबहुत्वप्रतिपादनत्वेन ‘‘आहाराणु-’’ इत्यादिसूत्रत्रयमिति समुदायपातनिका सूचिता भवति।

अथ अल्पबहुत्वानुगम नामक ग्यारहवाँ महाधिकार प्रारंभ

मंगलाचरण

श्लोकार्थ-द्वादशांग को धारण करने वाले गणधर देवों से सहित, द्वादश गणों से परिवेष्टित तीर्थंकर भगवान् एवं उनके मुख से प्रगट हुई द्वादशांगमयी सरस्वती माता को मैं अपने हृदय में अवतीर्ण करता हूँ।।१।।

द्वादश-बारह अंगों का ज्ञान धारण करने वाले जो गणधर देव मुनिराज हैं, उनसे जो सहित हैं, समवसरण में बारह सभाओं से परिवेष्टित हैं, ऐसे श्री तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव मेरे हृदय में विराजमान होवें और उनके मुख से समुद्भूत-उत्पन्न हुई द्वादशांगरूप सरस्वती-जिनवाणी माता मेरे द्वारा हृदयकमल में अवतीर्ण की जाती है। अर्थात् उन जिनवाणी माता को मैं हृदय में धारण करता हूँ।

अब चौदह अधिकारों में दो सौ छह सूत्रों के द्वारा अल्पबहुत्वानुगम नाम का ग्यारहवाँ महाधिकार प्रारंभ हो रहा है। उनमें से प्रथम गतिमार्गणा अधिकार में अल्पबहुत्वानुगम का कथन करने वाले ‘‘अप्पाबहुगाणुगमेण’’ इत्यादि पन्द्रह (१५) सूत्र हैं। पुन: इन्द्रियमार्गणा में अल्पबहुत्वानुगम का निरूपण करने हेतु ‘‘इंदियाणुवादेण’’ इत्यादि बाइस (२२) सूत्र हैं। आगे कायमार्गणा में अल्पबहुत्वानुगम बतलाने वाले ‘‘कायाणुवादेण’’ इत्यादि उनहत्तर (६९) सूत्र हैं। तदनंतर योगमार्गणा में अल्पबहुत्व का निरूपण करने हेतु ‘‘जोगाणुवादेण’’ इत्यादि तेइस (२३) सूत्र हैं। तत्पश्चात् वेदमार्गणा में अल्पबहुत्व को बतलाने वाले ‘‘वेदाणुवादेण’’ इत्यादि पन्द्रह (१५) सूत्र हैं। उसके बाद कषायमार्गणा में अल्पबहुत्व के कथन की मुख्यता वाले ‘‘कसायाणु’’ इत्यादि पाँच सूत्र हैं। उसके पश्चात् ज्ञानमार्गणा में अल्पबहुत्व का कथन करने हेतु ‘‘णाणाणु’’ इत्यादि छह सूत्र हैं। पुन: संयममार्गणा में अल्पबहुत्व को बतलाने वाले ‘‘संजमाणु’’ इत्यादि उन्नीस सूत्र हैं। तदनंतर दर्शनमार्गणा में अल्पबहुत्व का निरूपण करने हेतु ‘‘दंसणा’’ इत्यादि चार सूत्र हैं। तत्पश्चात् लेश्यामार्गणा में अल्पबहुत्व को निरूपित करने वाले ‘‘लेस्साणु’’ इत्यादि सात सूत्र हैं। पुन: ग्यारहवें भव्यमार्गणा अधिकार में अल्पबहुत्व का कथन करने वाले ‘‘भवियाणु’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। तत्पश्चात् बारहवें सम्यक्त्वमार्गणा अधिकार में अल्पबहुत्व का निरूपण करने वाले ‘‘सम्मत्ताणु’’ इत्यादि बारह सूत्र हैंं। उसके बाद तेरहवें संज्ञीमार्गणा अधिकार में अल्पबहुत्व का प्ररूपण करने हेतु ‘‘सण्णिया’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। उससे आगे पुन: चौदहवें आहारमार्गणा अधिकार में अल्पबहुत्वानुगम का प्रतिपादन करने वाले ‘‘आहाराणु’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। इस प्रकार सूत्रों की समुदायपातनिका सूचित की गई है।


अथ गतिमार्गणाधिकार:

तत्रापि गतिमार्गणायां अल्पबहुत्वप्रतिपादनार्थं पंचदशसूत्राण्यवतार्यन्ते-

अप्पाबहुगाणुगमेण गदियाणुवादेण पंचगदीओ समासेण।।१।।
सव्वत्थोवा मणुसा।।२।।
णेरइया असंखेज्जगुणा।।३।।
देवा असंखेज्जगुणा।।४।।
सिद्धा अणंतगुणा।।५।।
तिरिक्खा अणंतगुणा।।६।।
अट्ठ गदीओ समासेण।।७।।
सव्वत्थोवा मणुस्सिणीओ।।८।।
मणुस्सा असंखेज्जगुणा।।९।।
णेरइया असंखेज्जगुणा।।१०।।
पंचिंदियतिरिक्खजोणिणीओ असंखेज्जगुणाओ।।११।।
देवा संखेज्जगुणा।।१२।।
देवीओ संखेज्जगुणाओ।।१३।।
सिद्धा अणंतगुणा।।१४।।
तिरिक्खा अणंतगुणा।।१५।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-गति: सामान्येन एकविधा। सा एव सिद्धगति: असिद्धगतिश्चेति द्विविधा। अथवा देवगतिरदेवगति: सिद्धगतिश्चेति त्रिविधा। अथवा नरकगति: तिर्यग्गति: मनुष्यगति: देवगतिश्चेति चतुर्विधा। अथवा सिद्धगत्या सह पंचविधा। एवं गतिसमासोऽनेकभेदभिन्न:। तत्र समासेन पंचगतयो यास्तत्रैवाल्पबहुत्वं भण्यते अत्र ग्रन्थे।
अत्र सूत्रे सर्वशब्द: अर्पितपंचगतिजीवापेक्षस्तेषु पंचगतिजीवेषु मनुष्या एव स्तोका इति भणितं भवति, सूच्यंगुलप्रथमवर्गमूलेन तस्यैव तृतीयवर्गमूलगुणितेन छिन्नजगच्छ्रेणिमात्रप्रमाणत्वात्।
एतदपेक्षया नारका: असंख्यातगुणा:, एभ्यो देवा: असंख्यातगुणा:। देवापेक्षया सिद्धा: अनन्तगुणा: सन्ति, देवै: सिद्धराशेरपवर्तिते अनंतशलाकोपलंभात्। एभ्य: सिद्धेभ्य: तिर्यञ्चोऽनन्तगुणा: सन्ति, सिद्धै: अपवर्तिततिर्यक्षु जीववर्गमूलात् सिद्धेभ्यश्चानन्तगुणितशलाकोपलंभात्। एता: पुन: लब्धगुणकारशलाका: भव्यसिद्धिकामनन्तभाग:।
कुत: ?
तिर्यक्षु जगत्प्रतरस्यासंख्यातभागमात्रजीवप्रक्षेपे कृते भव्यसिद्धिकराशिप्रमाणोत्पत्ते:।
संक्षेपेण ताश्चैव गतयोष्टौ सन्ति-मनुष्यिन्य: मनुष्या: नारका: तिर्यञ्च: पंचेन्द्रियतिर्यग्योनिमत्य: देवा: देव्य: सिद्धाश्चेति। तासामल्पबहुत्वं भण्यते-
अष्टानां गतीनां मध्ये सर्वस्तोका: मनुष्यिन्य:, संख्यातप्रमाणत्वात्। मानुष्यापेक्षया मनुष्या: असंख्यातगुणा:, अत्र गुणकार: जगत्श्रेण्या: असंख्यातभागप्रमाण: जगच्छ्रेण्या: प्रथमवर्गमूलप्रमाण:, मनुष्यावहारकालगुणितमनुष्यिनीभि: अपवर्तितजगच्छ्रेणिप्रमाणत्वात्।
अत्र मनुष्यिन्यपेक्षया मनुष्या ये असंख्यातगुणा अधिका: कथितास्तत्र लब्ध्यपर्याप्तमनुष्यापेक्षया ज्ञातव्या भवन्ति, किञ्च-पर्याप्तमनुष्या: संख्याता एव सन्ति।
अग्रे सूत्राणि सुगमानि, देवापेक्षया देव्य: संख्यातगुणा:, अत्र गुणकार: द्वात्रिंशद्रूपाणि संख्यात-रूपाणि वा।
देव्यपेक्षया सिद्धा: अनन्तगुणा: सन्ति, देवीभि: अपवर्तितसिद्धेभ्योऽनन्तरूपोपलंभात्। एभ्य: तिर्यञ्चोऽनन्तगुणा:। अभव्यसिद्धिवैâ: सिद्धै: जीववर्गमूलात् चानन्तगुणरूपाणां सिद्धै: भाजिततिर्यक्षूपलंभात्।
एवं प्रथमस्थले गतिमार्गणायामल्पबहुत्वप्रतिपादनत्वेन पंचदश सूत्राणि गतानि।
इति श्रीषट्खण्डागमस्य क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखण्डे अल्पबहुत्वानुगमे महाधिकारे गणिनीज्ञानमती-कृत-सिद्धान्तचिंतामणिटीकायां गतिमार्गणानाम प्रथमोऽधिकार: समाप्त:।


गतिमार्गणा अधिकार

उनमें से अब गतिमार्गणा में अल्पबहुत्व का प्रतिपादन करने हेतु पन्द्रह सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

अल्पबहुत्वानुगम से गतिमार्गणा के अनुसार संक्षेप में पाँच गतियाँ हैं।।१।।

उनमें सबसे थोड़े मनुष्य हैं।।२।।

नारकी जीव मनुष्यों में असंख्यातगुणे हैं।।३।।

नारकियों से देव असंख्यातगुणे हैं।।४।।

देवों से सिद्ध अनंतगुणे हैं।।५।।

सिद्धों से तिर्यंच अनन्तगुणे हैं।।६।।

संक्षेप से गतियाँ आठ हैं।।७।।

मनुष्यिनी सबसे स्तोक हैं।।८।।

मनुष्यिनियों से मनुष्य असंख्यातगुणे हैं।।९।।

मनुष्यों से नारकी असंख्यातगुणे हैं।।१०।।

नारकियों से पंचेन्द्रिय योनिमती तिर्यंच असंख्यातगुणे हैं।।११।।

योनिमती तिर्यंचों से देव संख्यातगुणे हैं।।१२।।

देवों से देवियाँ संख्यातगुणी हैं।।१३।।

देवियों से सिद्ध अनन्तगुणे हैं।।१४।।

सिद्धों से तिर्यंच अनन्तगुणे हैं।।१५।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-गति सामान्य से एक प्रकार की है। वही गति सिद्धगति और असिद्धगति इस तरह दो प्रकार की है। अथवा देवगति, अदेवगति और सिद्धगति इस तरह तीन प्रकार की हैं। अथवा नरकगति, तिर्यग्गति, मनुष्यगति और देवगति इस तरह चार प्रकार की हैं। अथवा सिद्धगति के साथ पाँच प्रकार की हैं। इस प्रकार से गतियाँ संक्षेप से अनेक प्रकार की हैं। उसमें संक्षेप से जो पाँच गतियाँ हैं, उनका ही अल्पबहुत्व इस ग्रंथ में कहते हैं।

यहाँ सूत्र में सर्व शब्द विवक्षित पाँच गतियों के जीवों की अपेक्षा करता है। उन पाँच गतियों के जीवों में मनुष्य ही सबसे स्तोक हैं यह कहा गया है, क्योंकि वे सूच्यंगुल के तृतीय वर्गमूल से गुणित उसके ही प्रथम वर्गमूल से खण्डित जगत्श्रेणी प्रमाण हैं।

इस अपेक्षा से नारकी जीव असंख्यातगुणे हैं, नारकियों से देव असंख्यातगुणे हैं। देवों की अपेक्षा सिद्ध अनन्तगुणे हैं, क्योंकि देवों से सिद्धराशि के अपवर्तित करने पर अनन्तशलाकाएँ उपलब्ध होती हैं। इन सिद्धों से तिर्यंच अनन्तगुणे हैं, क्योंकि सिद्धों से तिर्यंचों के अपवर्तित करने पर जीवराशि के वर्गमूल और सिद्धों से भी अनन्तगुणी शलाकाएँ उपलब्ध होती हैं पुन: ये लब्ध गुणकार शलाकाएं भव्यसिद्धिकों के अनन्तवें भाग प्रमाण होती हैं।

प्रश्न-कैसे ?

उत्तर-क्योंकि तिर्यंचों में जगत्प्रतर के असंख्यातवें भागप्रमाण जीवों का प्रक्षेप करने पर भव्यसिद्धिकराशि का प्रमाण उत्पन्न होता है।

संक्षेप से वे ही गतियाँ आठ भी होती हैं-१. मनुष्यिनी, २. मनुष्य ३. नारक ४. तिर्यंच ५. पंचेन्द्रिय तिर्यंचयोनिमती ६. देव, ७. देवियाँ और ८. सिद्ध। इन सभी का अल्पबहुत्व कहते हैं-

आठों गतियों के मध्य मनुष्यिनियाँ सबसे कम हैं, क्योंकि उनका प्रमाण संख्यात है। मनुष्यिनियों की अपेक्षा मनुष्य असंख्यातगुणे हैं। यहाँ गुणकार जगत्श्रेणी के असंख्यातवें भागप्रमाण जगत्श्रेणी के प्रथमवर्गमूल प्रमाण हैं, क्योंकि यह मनुष्यों के अवहार काल के मनुष्यिनियों के गुणित करने पर जो लब्ध आवे और उसका जगश्रेणी में भाग देने पर जो लब्ध आवे, उसी प्रमाण हैं।

यहाँ जो मनुष्यिनियों की अपेक्षा मनुष्य असंख्यातगुणे कहे गये हैं, वे लब्ध्यपर्याप्त मनुष्यों की अपेक्षा ही हैं, क्योंकि पर्याप्त मनुष्य संख्यात ही होते हैं।

आगे सूत्र सुगम हैं। देव की अपेक्षा देवियाँ संख्यातगुणी हैं, यहाँ गुणकार बत्तीसरूप अथवा संख्यातरूप है।

देवियों की अपेक्षा सिद्ध अनन्तगुणे हैं, क्योंकि देवियों से सिद्धों की राशि अपवर्तित करने पर वे अनन्तरूप उपलब्ध होते हैं। इनसे-सिद्धों से तिर्यंच अनन्तगुणे हैं, क्योंकि अभव्यसिद्धिक जीवों से, सिद्धों से और जीवराशि के वर्गमूल से अनन्तगुणरूप सिद्धों की राशि से भाजित करने पर तिर्यंचों की राशि उपलब्ध होती है।

इस प्रकार से प्रथम स्थल में गतिमार्गणा में अल्पबहुत्व का प्रतिपादन करने वाले पन्द्रह सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम में क्षुद्रकबंध नाम के द्वितीय खण्ड में अल्पबहुत्वानुगम नाम के महाधिकार में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणि-टीका में गतिमार्गणा नाम का प्रथम अधिकार समाप्त हुआ।