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०१.गतिमार्गणाधिकार

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विषय सूची

गतिमार्गणाधिकार

अथ गतिमार्गणाधिकार:

तत्र प्रथमत: गतिमार्गणायां चतुर्भि:स्थलै: अष्टचत्वारिंशत्सूत्रै: स्पर्शनानुगमे गतिमार्गणानाम प्रथमोऽधिकार: कथ्यते। अस्यां नरकगतौ प्रथमस्थले नारकाणां स्पर्शनकथनत्वेन ‘‘फोसणाणुगमेण’’ इत्यादिना एकादश सूत्राणि। तदनु द्वितीयस्थले तिर्यग्गतौ तिरश्चां स्पर्शननिरूपणत्वेन ‘‘तिरिक्खगदीए’’ इत्यादिषट्सूत्राणि। तत: परं तृतीयस्थले मनुष्यगतौ स्पर्शनप्रतिपादनपरत्वेन ‘‘मणुस’’ इत्यादिसूत्रसप्तकं। तत्पश्चात् चतुर्थस्थले देवानां स्पर्शनप्ररूपणत्वेन ‘‘देवगदीए’’ इत्यादिना चतुर्विंशतिसूत्राणि इति पातनिका कथिता।
इदानीं नरकगतौ नारकाणां स्पर्शनप्रतिपादनाय सूत्रैकादशकमवतार्यते-
फोसणाणुगमेण गदियाणुवादेण णिरयगदीए णेरइएहि सत्थाणेहि केवडि-खेत्तं फोसिदं ?।।१।।
लोगस्स असंखेज्जदिभागो।।२।।
समुग्घादेण उववादेण केवडियं खेत्तं फोसिदं ?।।३।।
लोगस्स असंखेज्जदिभागे।।४।।
छच्चोद्दसभागा वा देसूणा।।५।।
'पढमाए पुढवीए णेरइया सत्थाण-समुग्घाद-उववादपदेहि केवडियं खेत्तं फोसिदं ?।।६।।'
लोगस्स असंखेज्जदिभागो।।७।।
विदियाए जाव सत्तमाए पुढवीए णेरइया सत्थाणेहि केवडियं खेत्तं फोसिदं ?।।८।।
लोगस्स असंखेज्जदिभागो।।९।।
समुदग्घाद-उववादेहि य केवडियं खेत्तं फोसिदं ?।।१०।।
लोगस्स असंखेज्जदिभागो एग-बे-तिण्णि-चत्तारि-पंच-छ-चोद्दसभागा वा देसूणा।।११।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्राणामर्थ: सुगमोऽस्ति। षट्पृथिवीनां नारकाणां वेदनाकषाय-वैक्रियिकपदपरिणतानां अतीतकालापेक्षया लोकस्यासंख्यातभाग: स्पृष्ट:। किन्तु वर्तमानकालापेक्षया एषामेव नारकाणां वेदना-कषाय-वैक्रियिक-मारणान्तिक-उपपादपदै: परिणतानां चतुर्णां लोकानामसंख्यातभाग: सार्धद्वयद्वीपादसंख्यातगुणश्च क्षेत्रं स्पृष्टं। अतीतकालापेक्षया मारणान्तिक-उपपादपदाभ्यां यथाक्रमेण चतुर्दशभागेषु एक-द्वि-त्रि-चतु:-पंच-षट्भागा: स्पृष्टा: भवन्ति द्वितीयादिपृथिवीगतनारकाणामिति। किंच-तिरश्चां नारकाणां चातीतकाले सर्वदिशाभ्य: आगमनगमनसंभवात्१।
एवं प्रथमस्थले नारकाणां स्पर्शनकथनमुख्यत्वेन एकादश सूत्राणि गतानि।
इदानीं तिर्यग्गतौ तिरश्चां स्पर्शनप्रतिपादनार्थं सूत्रषट्कमवतार्यते-
तिरिक्खगदीए तिरिक्खा सत्थाण-समुग्घाद-उववादेहि केवडियं खेत्तं फोसिदं ?।।१२।।
सव्वलोगो।।१३।।
पंचिंदियतिरिक्ख-पंचिंदियतिरिक्खपज्जत्त-पंचिंदियतिरिक्खजोणिणि-पंचिंदियतिरिक्खअपज्जत्ता सत्थाणेण केवडियं खेत्तं फोसिदं ?।।१४।।
लोगस्स असंखेज्जदि भागो।।१५।।
समुग्घाद-उववादेहि केवडियं खेत्तं फोसिदं ?।।१६।।
लोगस्स असंखेज्जदिभागो सव्वलोगो वा।।१७।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सामान्येन एकेन्द्रियादिपंचेन्द्रियपर्यन्तानां सर्वेषां तिरश्चां सर्वलोक: क्षेत्रं स्पृष्टं भवति।
कश्चिदाह-लवणसमुद्र-कालोदसमुद्र-स्वयंभूरमणसमुद्रविरहितासंख्यातसमुद्रेषु अविहरमाणानां त्रसानामस्तित्वं कथं भवति ?
आचार्य: प्राह-नैतद् वक्तव्यं, तत्र पूर्ववैरिणां देवानां प्रयोगेन त्रसानां तिरश्चां विहारे-आगमने विरोधाभावात्।
भोगभूमिप्रतिभागरूपद्वीपानामन्तराले स्थितेषु असंख्यातसमुद्रेषु स्वस्थानपदस्थिता: तिर्यञ्चो न सन्ति।
विहारवत्स्वस्थान-वेदना-कषाय-वैक्रियिकपदपरिणतै: त्रिविधपंचेन्द्रियतिर्यग्भि: त्रिलोकानाम-संख्यातभागक्षेत्रं, तिर्यग्लोकस्य संख्यातभागक्षेत्रं सार्धद्वयद्वीपादसंख्यातगुणक्षेत्रं च स्पृष्टं, मित्रामित्रदेवानां वशेन एतेषां सर्वद्वीपसमुद्रेषु संचरणं प्रति विरोधाभावात्२।
मारणान्तिक-उपपादपदाभ्यां इमे तिर्यञ्चस्त्रिविधा: अतीतकाले सर्वलोकं स्पृशन्ति।
कश्चिदाशंकते-लोकनाल्या: बहि: त्रसकायिकानां सर्वकालसंभवाभावात् सर्वलोक: स्पृष्ट:। इति वचनं न युज्यते ?
आचार्यदेव: प्राह-नैष दोष:, मारणान्तिक-उपपादपरिणतत्रसजीवान् मुक्त्वा शेषत्रसानां बहि: अस्तित्वप्रतिषेधात्।
स्वस्थानस्वस्थान-वेदना-कषायपदपरिणतै: पंचेन्द्रियतिर्यगपर्याप्तजीवै: त्रयाणां लोकानामसंख्यातभाग:, तिर्यग्लोकस्य संख्यातभाग:, सार्धद्वयद्वीपादसंख्यातगुणश्च क्षेत्रं स्पृष्टं।
कुत: ?
कर्मभूमिप्रतिभागे स्वयंप्रभपर्वतपरभागे सार्धद्वयद्वीप-समुद्रेषु चातीतकाले तत्र सर्वत्र संभवात्। तेन तै: स्पृष्टक्षेत्रं तिर्यग्लोकस्य संख्यातभाग: कथित:।
कश्चिदाह-अंगुलस्यासंख्यातभागमात्रावगाहनानां अपर्याप्ततिरश्चां संख्यातांगुलप्रमाणोत्सेध: कथं लभ्यते ?
नैतद् वक्तव्यं, मृतपंचेन्द्रियादित्रसकायिकानां कलेवरेषु अंगुलस्य संख्यातभागमादिं कृत्वा यावत् संख्यातयोजना इति क्रमवृद्ध्या स्थितेषु उत्पद्यमानानामपर्याप्तानां संख्यातांगुलोत्सेधोपलंभात्। अथवा सर्वेषु द्वीपसमुद्रेषु पंचेन्द्रियतिर्यगपर्याप्ता: भवन्ति, पूर्ववैरिदेवसंबंधेन कर्मभूमिप्रतिभागोत्पन्नपंचेन्द्रियतिरश्चां एकबंधनबद्धषड्जीवनिकायावगाढौदारिकदेहानां सर्वद्वीपसमुद्रेषु अवस्थानदर्शनात्।
मारणान्तिकोपपादै: पुन: सर्वलोक: स्पृष्ट:, एतेषां सर्वलोके प्रतिषेधाभावात्।एवं द्वितीयस्थले तिरश्चां स्पर्शनकथनत्वेन सूत्रषट्कं गतम्।


अथ गतिमार्गणा अधिकार

यहाँ सर्वप्रथम गतिमार्गणा में चार स्थलों में अड़तालिस सूत्रों के द्वारा स्पर्शनानुगम में गतिमार्गणा नाम का प्रथम अधिकार कहा जा रहा है। इसमें नरकगति में प्रथम स्थल में नारकियों का स्पर्शन कहने वाले ‘‘फोसणाणुगमेण’’ इत्यादि ग्यारह सूत्र हैं। पुन: द्वितीय स्थल में तिर्यञ्चगति में तिर्यञ्चों का स्पर्शन निरूपण करने हेतु ‘‘तिरिक्खगदीए’’ इत्यादि छह सूत्र हैं। उसके पश्चात् तृतीय स्थल में मनुष्यगति में स्पर्शन का प्रतिपादन करने वाले ‘‘मणुस’’ इत्यादि सात सूत्र हैं। तत्पश्चात् चतुर्थस्थल में देवों का स्पर्शन प्ररूपित करने वाले ‘‘देवगदीए’’ इत्यादि चौबीस सूत्र हैं। यह सूत्रों की समुदायपातनिका हुई है।

अब नरकगति में नारकियों का स्पर्शन प्रतिपादन करने हेतु ग्यारह सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

स्पर्शनानुगम से गतिमार्गणानुसार नरकगति में नारकी जीव स्वस्थान पदों से कितना क्षेत्र स्पर्श करते हैं ?।।१।।

नारकियों द्वारा स्वस्थान पदों से लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पृष्ट है।।२।।

नारकियों के द्वारा समुुद्घात व उपपाद पदों से कितना क्षेत्र स्पृष्ट है ?।।३।।

नारकियों के द्वारा उक्त पदों से लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पृष्ट हैं।।४।।

अथवा उक्त नारकियों द्वारा कुछ कम छह बटे चौदह भागप्रमाण क्षेत्र स्पृष्ट है।।५।।

प्रथम पृथिवी में नारकी जीवों के द्वारा स्वस्थान समुद्घात और उपपाद पदों की अपेक्षा कितना क्षेत्र स्पृष्ट है ?।।६।।

प्रथम पृथिवी के नारकियों के द्वारा लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पृष्ट है।।७।।

द्वितीय से लेकर सप्तम पृथिवी तक के नारकियों के द्वारा स्वस्थान पदों से कितना क्षेत्र स्पृष्ट हैं ?।।८।।

उपर्युक्त नारकियों द्वारा स्वस्थान पदों से लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पृष्ट है।।९।।

उक्त नारकियों के द्वारा समुद्घात व उपपाद पदों से कितना क्षेत्र स्पृष्ट है ?।।१०।।

उक्त नारकियों के द्वारा लोक का असंख्यातवाँ भाग अथवा चौदह भागों में से कुछ कम क्रमश: एक, दो, तीन, चार पाँच और छह भाग स्पृष्ट है।।११।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-उपर्युक्त सभी सूत्रों का अर्थ सरल है। छह पृथिवी के नारकियों द्वारा वेदनासमुद्घात, कषायसमुद्घात और वैक्रियिकसमुद्घात पदों से परिणत उक्त नारकियों के द्वारा अतीतकाल की अपेक्षा लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पृष्ट है। किन्तु वर्तमान काल की अपेक्षा छह पृथिवियों के नारकियों के द्वारा वेदनासमुद्घात, कषायसमुद्घात, वैक्रियिकसमुद्घात, मारणान्तिकसमुद्घात और उपपाद पदों से परिणत होकर चार लोकों का असंख्यातवाँ भाग और ढाईद्वीप से असंख्यातगुणा क्षेत्र स्पृष्ट है। अतीतकाल की अपेक्षा मारणान्तिकसमुद्घात व उपपाद पदों से द्वितीयादि छह पृथिवियों के नारकियों के द्वारा यथाक्रम से कुछ कम चौदह भागों में से एक, दो, तीन, चार, पाँच और छह भाग स्पृष्ट हैं, क्योंकि तिर्यंच व नारकियों का अतीतकाल में सब दिशाओं से आगमन और गमन संभव है।

इस प्रकार से प्रथम स्थल में नारकियों का स्पर्शन बतलाने वाले ग्यारह सूत्र पूर्ण हुए।

अब तिर्यंचगति में तिर्यंचों का स्पर्शन प्रतिपादित करने हेतु छह सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

तिर्यंचगति में तिर्यंच जीव स्वस्थान, समुद्घात और उपपाद पदों से कितना क्षेत्र स्पर्श करते हैं ?।।१२।।

तिर्यंच जीव उक्त पदों से सर्व लोक स्पर्श करते हैं।।१३।।

पंचेन्द्रिय तिर्यंच, पंचेद्रिय तिर्यंच पर्याप्त, पंचेन्द्रिय तिर्यंच योनिमती और पंचेन्द्रिय तिर्यंच अपर्याप्त जीवों के द्वारा स्वस्थान से कितना क्षेत्र स्पृष्ट है ?।।१४।।

उपर्युक्त चार प्रकार से तिर्यंचों के द्वारा लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पृष्ट है।।१५।।

उक्त तीन प्रकार के पंचेन्द्रिय तिर्यंचों के द्वारा समुद्घात व उपपाद पदों की अपेक्षा कितना क्षेत्र स्पृष्ट है ?।।१६।।

उपर्युक्त तिर्यंचों के द्वारा उक्त पदों से लोक का असंख्यातवाँ भाग अथवा सर्व लोक स्पृष्ट है।।१७।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सामान्य से एकेन्द्रिय जीवों से लेकर पंचेन्द्रियपर्यन्त सभी तिर्यंचों द्वारा सर्वलोक क्षेत्र स्पृष्ट होता है।

यहाँ कोई शंका करता है-लवणसमुद्र, कालोदधि, स्वयंभूरमण समुद्र से रहित असंख्यात समुद्रों में विहार नहीं करने वाले त्रस जीवों का अस्तित्व वहाँ वैâसे पाया जाता है ?

आचार्यदेव इस शंका का समाधान करते हैं-ऐसा नहीं कहना चाहिए, क्योंकि वहाँ पूर्व जन्म के वैरी देवों के प्रयोग से त्रस तिर्यंचों के विहार में-आगमन में कोई विरोध नहीं है।

भोगभूमि प्रतिभागरूप द्वीपों के अन्तराल में स्थित असंख्यात समुद्रों में स्वस्थानपद में स्थित तिर्यंच नहीं हैं।

विहारवत्स्वस्थान, वेदनासमुद्घात, कषायसमुद्घात और वैक्रियिकसमुद्घात, इन चार पदों से परिणत तीन प्रकार के पंचेन्द्रिय तिर्यंचों द्वारा तीन लोकों का असंख्यातवाँ भाग, तिर्यग्लोक का संख्यातवाँ भाग और ढाई द्वीप से असंख्यातगुणा क्षेत्र स्पृष्ट है, क्योंकि मित्र व शत्रुरूप देवों के वश से इनके सर्वद्वीप समुद्रों में संचार करने में कोई विरोध नहीं आता है।

मारणान्तिकसमुद्घात व उपपाद पदों से परिणत इन तीन पंचेन्द्रिय तिर्यंचों द्वारा अतीतकाल में सर्वलोक स्पृष्ट होता है।

यहाँ कोई शंका करता है कि-लोकनाली के बाहर सर्वदाकाल में त्रसकायिक जीवों की सर्वदा संभावना न होने से ‘सर्व लोक स्पृष्ट है’ यह कहना योग्य नहीं है ? आचार्यदेव समाधान करते हैं-यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि मारणान्तिकसमुद्घात व उपपाद पदों से परिणत त्रस जीवों को छोड़कर शेष त्रस जीवों के अस्तित्व का लोकनाली के बाहर प्रतिषेध है।

स्वस्थानस्वस्थान, वेदनासमुद्घात और कषायसमुद्घात पदों से परिणत पंचेन्द्रिय तिर्यंच अपर्याप्तों द्वारा तीन लोकों का असंख्यातवाँ भाग, तिर्यग्लोक का संख्यातवाँ भाग और ढाईद्वीप से असंख्यातगुणा क्षेत्र स्पृष्ट है।

प्रश्न-कैसे ?

उत्तर-क्योंकि कर्मभूमि प्रतिभाग में स्वयंप्रभ पर्वत के परभाग में और ढाईद्वीप-समुद्रों में अतीतकाल की अपेक्षा वहाँ उनकी सर्वत्र संभावना पाई जाती है। इसीलिए उनके द्वारा स्पृष्ट क्षेत्र तिर्यग्लोक के संख्यातवें भाग प्रमाण होता है।

यहाँ कोई शंका करता है-अंगुल के असंख्यातवें भागमात्र अवगाहना वाले अपर्याप्त जीवों का संख्यात अंगुल प्रमाण उत्सेध कैसे पाया जाता है ?

आचार्य देव इसका समाधान करते हैं-ऐसा नहीं कहना चाहिए, क्योंकि अंगुल के संख्यातवें भाग को आदि लेकर संख्यात योजन तक क्रम वृद्धि से स्थित मृत पंचेन्द्रियादि त्रसकायिक जीवों के शरीर में उत्पन्न होने वाले अपर्याप्तों का संख्यात अंगुलप्रमाण उत्सेध पाया जाता है। अथवा सभी द्वीप- समुद्रों में पंचेन्द्रिय तिर्यंच अपर्याप्त जीव होते हैं, क्योंकि पूर्व के बैरी देवों के संबंध से एक बंधन से बद्ध षट्जीव निकायों से व्याप्त औदारिक शरीर को धारण करने वाले कर्मभूमि प्रतिभाग में उत्पन्न हुए पंचेन्द्रिय तिर्यंचों का सर्व समुद्रों में अवस्थान देखा जाता है। मारणान्तिक समुद्घात व उपपाद पदों की अपेक्षा सर्वलोक स्पृष्ट है, क्योंकि मारणान्तिक समुद्घात व उपपाद पदों से परिणत उक्त जीवों का सर्वलोक में प्रतिषेध नहीं है। इस प्रकार से द्वितीय स्थल में तिर्यंचों का स्पर्शन बतलाने वाले छह सूत्र पूर्ण हुए।


अधुना मनुष्यगतौ मनुष्याणां स्पर्शनप्रतिपादनाय सूत्रसप्तकमवतार्यते-

मणुसगदीए मणुसा मणुसपज्जत्ता मणुसिणीओ सत्थाणेहि केवडियं खेत्तं फोसिदं ?।।१८।।

लोगस्स असंखेज्जदिभागो।।१९।।
समुग्घादेण केवडियं खेत्तं फोसिदं ?।।२०।।
लोगस्स असंखेज्जदिभागो असंखेज्जा वा भागा सव्वलोगो वा।।२१।।
उववादेहि केवडियं खेत्तं फोसिदं ?।।२२।।
लोगस्स असंखेज्जदिभागो सव्वलोगो वा।।२३।।
मणुसअपज्जत्ताणं पंचिंदियतिरिक्खअपज्जत्ताणं भंगो।।२४।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सामान्येन मनुष्या: मनुष्यपर्याप्ता: मानुष्य: स्वस्थानस्वस्थान-विहारवत्स्व-स्थानाभ्यां चतुर्णां लोकानामसंख्यातभाग: स्पृष्ट:, अतीतकाले पूर्ववैरिसंबंधेनापि मानुषोत्तरशैलात् परत: मनुष्याणां गमनाभावात्। मानुषक्षेत्रस्य पुन: संख्यातभाग: स्पृष्ट:, उपरिगमनाभावात्। अथवा विहारेण मानुषलोक: देशोन: स्पृष्ट: इति केचिद् भणन्ति, पूर्ववैरिदेवसंबंधेन ऊध्र्वं देशोनयोजनलक्षोत्पादनसंभवात्।
मारणान्तिकसमुद्घातेन इमे त्रिविधा: अपि मनुष्या: सर्वलोवंâ स्पृशन्ति, अतीते काले सर्वस्मिन् लोकक्षेत्रे मनुष्याणां मारणान्तिकेन गमनोपलंभात्। दण्ड-कपाट-प्रतर-लोकपूरणप्ररूपणा प्रागेव प्ररूपिता अस्ति।
उपपादै: एते मनुष्या: लोकस्यासंख्यातभागं स्पृशन्ति वर्तमानाकालापेक्षया। अतीते घनसर्वलोक: स्पृष्ट:, मनुष्येषु उत्पद्यमानै: सर्वलोकावस्थितसूक्ष्मजीवै: आपूर्र्यमाणलोकदर्शनात्।
कश्चिदाह-पंचचत्वारिंशल्लक्षयोजनबाहल्यतिर्यक्प्रतरमात्राकाशप्रदेशस्थितमनुष्यै: सर्वलोक: कथमापूर्यते ?
आचार्य: प्राह-नैतद् वक्तव्यं, मनुष्यगतिप्रायोग्यानुपूर्विविपाकयोग्याकाशप्रदेशै: सर्वलोकपर्यन्तेषु मध्ये च समयाविरोधेनावस्थितै: निर्गत्य संख्यातासंख्यात-योजनायामेन मनुष्यगतिमुपगतै: सर्वातीतकाले सर्वलोकापूर्णं प्रति विरोधाभावात्।
लब्ध्यपर्याप्तमनुष्या: स्वस्थानस्वस्थान-वेदना-कषायसमुद्घातै: चतुर्णां लोकानामसंख्यातभाग:, मानुषक्षेत्रस्य संख्यातभागोऽतीते काले स्पृष्ट:, मारणान्तिकोपपादाभ्यां सर्वलोक: स्पृष्ट:।
एवं तृतीयस्थले मनुष्याणां स्पर्शननिरूपणत्वेन सूत्रसप्तकं गतम्।
इदानीं देवगतौ सामान्यदेवानां स्पर्शनप्रतिपादनाय सूत्रषट्कमवतार्यते-
देवगदीए देवा सत्थाणेहि केवडियं खेत्तं फोसिदं ?।।२५।।
लोगस्स असंखेज्जदिभागो अट्ठचोद्दसभागा वा देसूणा।।२६।।
समुग्घादेण केवडियं खेत्तं फोसिदं ?।।२७।।
लोगस्स असंखेज्जदिभागो अट्ठ-णव-चोद्दस भागा वा देसूणा।।२८।।
उववादेहि केवडियं खेत्तं फोसिदं ?।।२९।।
लोगस्स असंखेज्जदि भागो छच्चोद्दसभागा वा देसूणा।।३०।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सामान्येन देवा: स्वस्थानेन त्रयाणां लोकानामसंख्यातभागं, तिर्यग्लोकस्य संख्यातभागं सार्धद्वयद्वीपादसंख्यातगुणितक्षेत्रं च स्पृशन्ति।
तिर्यग्लोकस्य संख्यातभागत्वं कथं ?
नैष दोष:, चन्द्र-सूर्य-बुध-बृहस्पति-शनि-शुक्र-अंगारक-नक्षत्र-तारागण-अष्टविधव्यन्तरविमानैश्च रुद्धक्षेत्राणां तिर्यग्लोकस्य संख्यातभागमात्राणामुपलंभात्। विहारापेक्षया अष्ट चतुर्दशभागा देशोना: स्पृष्टा:। मेरुमूलादुपरि षड्रज्जुमात्रोऽध: द्विरज्जुमात्रो विहार:, तेनाष्ट चतुर्दशभाग इति उक्त:।
ते केनोना: ?
तृतीयपृथिव्याः अधस्तनयोजनसहस्रेणोना: इति ज्ञातव्या:।
समुद्घातापेक्षया असंख्यातभाग: स्पृष्ट: देवगतीनां देवै:। तेन वर्तमानक्षेत्रापेक्षया क्षेत्रप्ररूपणावत् प्ररूपणा ज्ञातव्या।
संप्रति अतीतकालापेक्षया क्षेत्रं निरूप्यते-वेदना-कषाय-वैक्रियिकपदै: चतुर्दशरज्जूनां अष्टभागा: स्पृष्टा:।
कुत: ?
विहरमाणानां देवानां स्वकविहारक्षेत्रस्यान्तरे वेदना-कषाय-विक्रियाणामुपलंभात्। मारणान्तिक-समुद्घातेन नव चतुर्दशभागा: स्पृष्टा:। मेरुमूलादुपरि सप्त अधो द्विरज्जुमात्रक्षेत्राभ्यन्तरेऽतीते काले सर्वत्र कृतमारणान्तिकदेवानामुपलंभात्।
उपपादै: इमे देवा: वर्तमानक्षेत्रापेक्षया लोकस्यासंख्यातभागं स्पृशन्ति। अतीतक्षेत्रापेक्षया षट् चतुर्दशभागं देशोनं स्पृशन्ति।
कुत: एतत् क्षेत्रं स्पृशन्ति ?
आरण-अच्युतकल्पपर्यंतं तिर्यग्मनुष्यासंयतसम्यग्दृष्टीनां संयतासंयतानां चोपपादोपलंभात्।
एवं सामान्यदेवानां क्षेत्रस्य स्पर्शनं निरूपितं। अधुना चतुर्विधदेवानां स्पर्शनं कथ्यते।



अब मनुष्यगति में मनुष्यों का स्पर्शन प्रतिपादित करने हेतु सात सूत्र अवतरित किये जा रहे हैं-

सूत्रार्थ-

मनुष्यगति में मनुष्य, मनुष्य पर्याप्त व मनुष्यिनियों द्वारा स्वस्थान पदों से कितना क्षेत्र स्पृष्ट है ?।।१८।।

उक्त तीन प्रकार के मनुष्यों द्वारा स्वस्थान से लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पृष्ट है।।१९।।

उपर्युक्त मनुष्यों के द्वारा समुद्घात की अपेक्षा कितना क्षेत्र स्पृष्ट है ?।।२०।।

उपर्युक्त मनुष्यों के द्वारा समुद्घात की अपेक्षा लोक का असंख्यातवाँ भाग, असंख्यात बहुभाग अथवा सर्वलोक स्पृष्ट है।।२१।।

उपर्युक्त मनुष्यों के द्वारा उपपाद पद की अपेक्षा कितना क्षेत्र स्पृष्ट है ?।।२२।।

उपर्युक्त मनुष्यों के द्वारा उपपाद पद की अपेक्षा लोक का असंख्यातवाँ भाग अथवा सर्वलोक स्पृष्ट है।।२३।।

अपर्याप्त मनुष्यों के स्पर्शन का निरूपण पंचेन्द्रिय तिर्यंच अपर्याप्तों के समान है।।२४।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सामान्य से मनुष्य, पर्याप्त मनुष्य और योनिमती-स्त्रीवेदी मनुष्यिनियों द्वारा स्वस्थानस्वस्थान व विहारवत्स्वस्थान से चार लोकों का असंख्यातवाँ भाग स्पृष्ट है, क्योंकि अतीतकाल में पूर्व के बैरी देवों के संबंध से भी मानुषोत्तर पर्वत के आगे मनुष्यों के गमन का अभाव है। परन्तु मानुषक्षेत्र का संख्यातवाँ भाग स्पृष्ट है, क्योंकि मानुषक्षेत्र के ऊपर उक्त मनुष्यों का गमन नहीं है। अथवा विहार की अपेक्षा कुछ कम मानुषलोक स्पृष्ट है, ऐसा कोई आचार्य कहते हैं, क्योंकि पूर्वबैरी देवों के संबंध से ऊपर कुछ कम एक लाख योजन तक उत्पादन की संभावना है।

मारणान्तिक समुद्घात की अपेक्षा उक्त तीन प्रकार के मनुष्यों के द्वारा सर्वलोक स्पृष्ट है, क्योंकि अतीतकाल की अपेक्षा सम्पूर्ण लोक क्षेत्र में मारणान्तिकसमुद्घात से मनुष्यों का गमन पाया जाता है। दण्ड, कपाट, प्रतर व लोकपूरण समुद्घात पदों की प्ररूपणा पहले ही की जा चुकी है, अर्थात् यह समुद्घात केवली भगवन्तों के ही होता है।

उपपाद पदों के द्वारा ये तीनों प्रकार के मनुष्य वर्तमानकाल की अपेक्षा लोक के असंख्यातवें भाग का स्पर्श करते हैं। अतीतकाल की अपेक्षा सर्व घनलोक स्पृष्ट है, क्योंकि मनुष्यों में आकर उत्पन्न होने वाले सर्वलोक में स्थित सूक्ष्म जीवों से परिपूर्ण लोक देखा जाता है।

यहाँ कोई शंका करता है कि-पैंतालीस लाख योजन बाहल्य वाले तिर्यक् प्रतर मात्र आकाश प्रदेशों में स्थित मनुष्यों के द्वारा सर्वलोक कैसे पूर्ण किया जाता है ? आचार्य देव इसका समाधान देते हैं-ऐसा नहीं कहना चाहिए, क्योंकि लोक के पर्यन्त भागों में व मध्य में भी समय-आगम से अविरोधरूप से स्थित ऐसे मनुष्यगतिप्रायोग्यानुपूर्वी के विपाक योग्य आकाश प्रदेशों से निकलकर संख्यात एवं असंख्यात योजन आयामरूप से मनुष्यगति को प्राप्त हुए मनुष्यों द्वारा सर्व अतीतकाल में सर्वलोक के पूर्ण करने में कोई विरोध नहीं है। लब्ध्यपर्याप्तक मनुष्यों द्वारा स्वस्थानस्वस्थान, वेदनासमुद्घात और कषायसमुद्घात पदों की अपेक्षा चार लोकों का असंख्यातवाँ भाग व मानुषक्षेत्र का संख्यातवाँ भाग अतीतकाल में स्पृष्ट है। मारणान्तिक समुद्घात व उपपाद पदों से सर्वलोक स्पृष्ट है। इस प्रकार से तृतीय स्थल में मनुष्यों का स्पर्शन बतलाने वाले सात सूत्र पूर्ण हुए।

अब देवगति में सामान्य देवों का स्पर्शन बतलाने हेतु छह सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

देवगति में देव स्वस्थान पदों से कितना क्षेत्र स्पर्श करते हैं ?।।२५।।

देव स्वस्थान पदों से लोक का असंख्यातवाँ भाग अथवा कुछ कम आठ बटे चौदह भाग स्पर्श करते हैं।।२६।।

देवों द्वारा समुद्घात की अपेक्षा कितना क्षेत्र स्पृष्ट है ?।।२७।।

समुद्घात की अपेक्षा लोक का असंख्यातवाँ भाग अथवा कुछ कम आठ बटे चौदह व नौ बटे चौदह भाग स्पृष्ट है।।२८।।

उपपाद की अपेक्षा देवों द्वारा कितना क्षेत्र स्पृष्ट है ?।।२९।।

उपपाद की अपेक्षा देवों द्वारा लोक का असंख्यातवाँ भाग अथवा कुछ कम छह बटे चौदह भाग स्पृष्ट है।।३०।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सामान्य से देव स्वस्थान की अपेक्षा तीनलोक का असंख्यातवाँ भाग, तिर्यग्लोक का संख्यातवाँ भाग और ढाईद्वीप से असंख्यातगुणा क्षेत्र को स्पर्श करते हैं।

शंका-तिर्यग्लोक का संख्यातवाँ भाग कैसे घटित होता है ?

समाधान-यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि चन्द्र, सूर्य, बुद्ध, बृहस्पति, शनि, शुक्र, अंगारक (मंगल), नक्षत्र, तारागण और आठ प्रकार के व्यंतर विमानों से रुद्ध क्षेत्र तिर्यग्लोक के संख्यातवें भाग प्रमाण पाये जाते हैं। विहार की अपेक्षा इनके द्वारा कुछ कम आठ बटे चौदह भाग स्पृष्ट हैं। मेरुमूल से ऊपर छह राजुमात्र और नीचे दो राजुमात्र क्षेत्र में देवों का विहार है, इसलिए ‘आठ बटे चौदह भाग’ ऐसा कहा है।

शंका-वे आठ बटे चौदह भाग किससे कम हैं ?

समाधान-तृतीय पृथिवी के नीचे एक सहस्र योजन से कम हैं ऐसा जानना चाहिए।

समुद्घात की अपेक्षा देवगति के देवों द्वारा लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पृष्ट है। इसलिए वर्तमान की अपेक्षा क्षेत्रप्ररूपणा के समान यह प्ररूपणा जानना चाहिए। अब अतीतकाल संबंधी क्षेत्रप्ररूपणा कही जा रही है-वेदनासमुद्घात, कषायसमुद्घात और वैक्रियिकसमुद्घात पदों की अपेक्षा राजू के आठ बटे चौदह भाग स्पृष्ट हैं। प्रश्न-ऐसा क्यों है ?

उत्तर-क्योंकि विहार करने वाले देवों के अपने विहार क्षेत्र के भीतर वेदनासमुद्घात, कषायसमुद्घात और वैक्रियिकसमुद्घात पद पाये जाते हैं। मारणान्तिक समुद्घात की अपेक्षा नौ बटे चौदह भाग स्पृष्ट हैं, क्योंकि मेरुमूल से ऊपर सात और नीचे दो राजुमात्र क्षेत्र के भीतर सर्वत्र अतीतकाल में मारणान्तिक समुद्घात को प्राप्त देव पाये जाते हैं।

उपपाद की अपेक्षा ये देव वर्तमान क्षेत्र की अपेक्षा लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पर्श करते हैं। अतीत क्षेत्र की अपेक्षा कुछ कम छह बटे चौदह (६/१४) भाग स्पर्श करते हैं।

प्रश्न-इतना क्षेत्र कैसे स्पर्श करते हैं ?

'उत्तर-क्योंकि आरण-अच्युत कल्प तक तिर्यंच व मनुष्य असंयतसम्यग्दृष्टियों और संयतासंयतों का उपपाद पाया जाता है।

इस प्रकार सामान्य देवों के क्षेत्र का स्पर्शन निरूपित किया गया है। अब चारों प्रकार के देवों का स्पर्शन कहा जा रहा है।


इदानीं भवनत्रिकदेवानां स्पर्शनप्रतिपादनाय सूत्रषट्कमवतार्यते-

भवणवासिय-वाणवेंतर-जोइसियदेवा सत्थाणेहि केवडियं खेत्तं फोसिदं ?।।३१।।

लोगस्स असंखेज्जदिभागो अद्धुट्ठा वा अट्ठचोद्दसभागा वा देसूणा।।३२।।
समुग्घादेण केवडियं खेत्तं फोसिदं ?।।३३।।
लोगस्स असंखेज्जदिभागो अद्धुट्ठा वा अट्ठ-णव-चोद्दस भागा वा देसूणा।।३४।।
उववादेहि केवडियं खेत्तं फोसिदं ?।।३५।।
लोगस्स असंखेज्जदिभागो।।३६।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-इमे त्रिविधा अपि देवा: वर्तमानक्षेत्रप्ररूपणापेक्षया लोकस्यासंख्यातभागं स्पृशन्ति। अतीतकालं प्रतीत्य स्वस्थानेन वानव्यन्तरज्योतिष्कदेवाभ्यां त्रयाणां लोकानामसंख्यातभाग:, तिर्यग्लोकस्य संख्यातभाग:, सार्धद्वयद्वीपादसंख्यातगुणश्च स्पृष्ट:।
कुत: ?
वर्तमानकालेऽपि तिर्यग्लोकस्य संख्यातभागं व्याप्यावस्थानात्।
भवनवासिदेवै: स्वस्थानेन चतुर्णां लोकानामसंख्यातभाग:, सार्धद्वयद्वीपादसंख्यातगुणश्च स्पृष्ट:। विहारवत्स्वस्थानेन चतुर्दशभागेषु सार्धत्रयभागा: स्पृष्टा:।
कुत: ?
भवनवासि-वानव्यन्तर-ज्योतिष्कदेवानां मेरुमूलादधो द्वे रज्जू, उपरि सौधर्मविमानशिखरध्वजदण्डपर्यंतं इति सार्धैकरज्जुमात्रस्वकनिमित्तविहार: उपलभ्यते। परप्रत्ययेन पुन: देवैरानीतै: देवा: चतुर्दशभागेषु अष्टभागा: स्पृष्टा: देशोना:। उपरिमदेवै: नीयमाना देवा सार्धचतु:रज्जुप्रमाणं स्वप्रत्ययेन च सार्धत्रयरज्जुप्रमाणं क्षेत्रं गच्छन्ति इति देवानां अष्ट चतुर्दशभागस्पर्शनं भवति।
समुद्घातेन वर्तमानक्षेत्रापेक्षया लोकस्यासंख्यातभाग: स्पृष्ट:।
संप्रति वेदना-कषाय-वैक्रियिकपदै: चतुर्दशभागेषु सार्धत्रयभागा: अष्टभागा वा स्पृष्टा:, स्वक-परप्रत्ययाभ्यां परिभ्राम्यतां भवनवासि-वानव्यन्तर-ज्योतिष्कदेवानां वेदना-कषाय-वैक्रियिकपदै: सह परिणतानां एतावत्प्रमाणं क्षेत्रं उपलभ्यते।
मारणान्तिकसमुद्घातेन चतुर्दशभागेषु नव भागा देशोना: स्पृष्टा:, मेरुमूलादध: द्विरज्जुमात्रं मार्गं गत्वा स्थितदेवानां भवनवास्यादीनां घनोदधिस्थिताप्कायिकजीवेषु मारणान्तिकसमुद्घातपरिणतानां नव चतुर्दशभागमात्रस्पर्शनं उपलभ्यते।
उपपादै: लोकस्यासंख्यातभाग: स्पृष्ट:। अतीतकालेन उपपादपरिणतै: भवनत्रिकदेवै: त्रयाणां लोकानामसंख्यातभाग:, तिर्यग्लोकस्य संख्यातभाग:, सार्धद्वयद्वीपादसंख्यातगुणश्च स्पृष्ट:। ज्योतिष्काणां नवशतयोजनबाहल्यं तिर्यक् प्रतरं स्थापयित्वा ऊध्र्वमेकोनपंचाशत्खण्डानि कृत्वा प्रतराकारेण स्थापिते तिर्यग्लोकस्य संख्यातभागमात्रं उपपादक्षेत्रं भवति। वानव्यन्तराणां योजनलक्षबाहल्यं तिर्यक्प्रतरं स्थापयित्वा ऊध्र्वमेकोनपंचाशत्खण्डानि कृत्वा प्रतराकारेण स्थापिते तिर्यग्लोकस्य संख्यातभागमात्रमुपपादक्षेत्रं भवति। भवनवासिदेवानां लक्षयोजनबाहल्यं रज्जुप्रतरं स्थापयित्वा पूर्वमिव खण्डानि प्रतराकारेण स्थापिते तिर्यग्लोकस्य संख्यातभागमात्रमुपपादक्षेत्रं भवति।
इदानीं सौधर्मादिसहस्रारकल्पपर्यन्तकल्पवासिदेवानां स्पर्शनप्रतिपादनाय सूत्रषट्कमवतार्यते-
सोहम्मीसाणकप्पवासियदेवा सत्थाण-समुग्घादं देवभंगो।।३७।।
उववादेहि केवडियं खेत्तं फोसिदं ? लोगस्स असंखेज्जदिभागो दिवड्ढचोद्दसभागा वा देसूणा।।३८।।
सणक्कुमार जाव सदर-सहस्सारकप्पवासियदेवा सत्थाण-समुग्घादेहि केवडियं खेत्तं फोसिदं ?।३९।।
लोगस्स असंखेज्जदिभागो अट्ठचोद्दसभागा वा देसूणा।।४०।।
उववादेहि केवडियं खेत्तं फोसिदं ?।।४१।।
लोगस्स असंखेज्जदिभागो तिण्णि-अद्धुट्ठ-चत्तारि-अद्धवंचम-पंचचोद्दसभागा वा देसूणा।।४२।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-वर्तमानप्ररूपणा क्षेत्रप्ररूपणावत् ज्ञातव्या। अतीतकालमाश्रित्य प्ररूपणायां अपि द्रव्यार्थिकनयावलम्बनेन देवगतिवत् भंगो भवति, न च पर्यायार्थिकनयावलम्बनेन।
कुत: ?
स्वस्थानेन सौधर्मेशानदेवै: चतुर्णां लोकानामसंख्यातभाग:, सार्धद्वयद्वीपादसंख्यातगुण: स्पृष्ट:। विहारवत्स्वस्थान-वेदना-कषाय-वैक्रियिक-मारणान्तिकपरिणतै: अष्ट-नव-चतुर्दशभागा देशोना: स्पृष्टा: इति निर्दिष्टत्वात्।
उपपादपदेन वर्तमानापेक्षया लोकस्यासंख्यातभाग:, अतीतकालापेक्षया चतुर्दशभागेषु सार्धैकभागप्रमाणं क्षेत्रं स्पृष्टं।
कुत: ?
तिर्यग्मनुष्ययोरतीते काले प्रभाप्रस्तरे उत्पद्यमानानां देवानां सार्धैकरज्जुबाहल्येन युक्तरज्जुप्रतरमात्र-स्पर्शनोपलंभात्।
सनत्कुमारादिसहस्रारस्वर्गपर्यन्तस्थितदेवानां वर्तमानापेक्षया लोकस्य असंख्यातभागस्पर्शनक्षेत्रं। अतीतकाले स्वस्थानेन लोकस्यासंख्यातभाग:, विमानरुद्धक्षेत्रस्य चतुर्णां लोकानामसंख्यातभाग-मात्रप्रमाणत्वात्। विहार-वेदना-कषाय-वैक्रियिक-मारणान्तिकपदपरिणतै: चतुर्दशभागेषु अष्टभागा: देशोना: स्पृष्टा:, त्रसजीवान् मुक्त्वा एतेषां देवानां उत्पत्तेरभावात्।
उत्पादेनापि अतीतकाले यथाक्रमेण त्रि-सार्धत्रि-चतु:-सार्धचतु:-पंचभागा: चतुर्दशभागेषु स्पृष्टा:। तद्यथा-मेरुमूलात् रज्जुत्रयं उपरि चटित्वा सनत्कुमारमाहेन्द्रकल्पयो: परिसमाप्ति:, तत उपरि अद्र्धरज्जुं गत्वा ब्रह्म-ब्रह्मोत्तरकल्पयो: परिसमाप्ति:, तत उपरि अद्र्धरज्जुं गत्वा लांतव-कापिष्ठस्वर्गयो: परिसमाप्ति:, एतस्मादुपरि अद्र्धरज्जुं गत्वा शुक्र-महाशुक्रकल्पयो: अवसानं, तत्तोऽद्र्धरज्जुं गत्वा शतार-सहस्रारकल्पयो: परिसमाप्तिर्भवतीति ज्ञातव्यं।
अधुना आनतादिचतु:स्वर्गवासिनां देवानां स्पर्शनकथनाय सूत्रचतुष्टयमवतार्यते-
आणद जाव अच्चुदकप्पवासियदेवा सत्थाण-समुग्घादेहि केवडियं खेत्तं फोसिदं ?।।४३।।
लोगस्स असंखेज्जदिभागो छचोद्दसभागा वा देसूणा।।४४।।
उववादेहि केवडियं खेत्तं फोसिदं ?।।४५।।
लोगस्स असंखेज्जदिभागो अद्धछट्ठ-छचोद्दसभागा वा देसूणा।।४६।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-वर्तमानप्ररूपणा क्षेत्रवत् भवति। अतीतकालापेक्षया स्वस्थानपरिणतदेवै: लोकस्यासंख्यातभाग: स्पृष्ट:। विहारवत्स्वस्थान-वेदना-कषाय-वैक्रियिक-मारणान्तिकपदपरिणतै: चतुर्दशसु षड्भागा: स्पृष्टा:, मेरुमूलादधस्तेषां गमनाभावेन तत्र विक्रियासमुद्घातादीनामभावात्।
उपपादापेक्षया एतेषां देवानां स्पर्शनं-आनत-प्राणतकल्पयो: चतुर्दशभागेषु सार्धपंचभागा:, आरणाच्युत-कल्पवासिनां देवानां चतुर्दशभागेषु षड्भागा: ज्ञातव्या:।
तात्पर्यमत्र-देवा: सम्यग्दर्शनं संप्राप्य मध्यलोके जिनदेव पंचकल्याणावसरेषु आगत्य तीर्थंकरस्य जन्माभिषेकं समवसरणं चावलोक्य जिनभक्तिप्रभावेन महत्पुण्यं संपादयन्ति। तीर्थकरदिव्यध्वनिं श्रुत्वा संसारपरिभ्रमणस्यान्तं कर्तुं इच्छन्ति। मनुष्यपर्यायमपि प्राप्तुं समीहन्ते। वयं मनुष्या: मनुष्यभवसारं सम्यक्त्वं संयमं च देशसंयमं वा संप्राप्य स्वजन्म सफलीकुर्वाणा: अपि निरन्तरं स्वात्मतत्त्वभावना भावयितव्याऽस्माभिरिति।
अधुना नवग्रैवेयकप्रभृति-सर्वार्थसिद्धिपर्यन्तविमानवासिनामहमिन्द्राणां स्पर्शनप्रतिपादनाय सूत्रद्वयम-वतार्यते-
णवगेवज्ज जाव सव्वट्ठसिद्धिविमाणवासियदेवा सत्थाण-समुग्घाद-उववादेहि केवडियं खेत्तं फोसिदं ?।।४७।।
लोगस्स असंखेज्जदिभागो।।४८।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-स्वस्थानस्वस्थान-विहारवत्स्वस्थान-वेदना-कषाय-वैक्रियिक-मारणान्तिक-उपपादपदै: अतीतवर्तमानाभ्यां चतुर्णां लोकानामसंख्यातभाग: सार्धद्वयद्वीपादसंख्यातगुणश्च स्पृष्ट:। विशेषेण तु-सर्वार्थसिद्धौ मारणान्तिक-उपपादविरहितशेषपदै: मानुषक्षेत्रस्य संख्यातभाग: स्पृष्ट: इति वक्तव्यं।
तात्पर्यमत्र-एतत्सर्वं ज्ञात्वा भेदाभेदरत्नत्रयभावनां भावयद्भि: अस्माभि: संसारसमुद्रोत्तरणोपायो विधातव्य:।
इति श्रीषट्खण्डागमस्य क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखण्डे स्पर्शनानुगमे महाधिकारे गणिनी-ज्ञानमतीकृत-सिद्धान्तचिंतामणिटीकायां गतिमार्गणानाम प्रथमोऽधिकार: समाप्त:।


अब भवनत्रिक देवों का स्पर्शन प्रतिपादित करने हेतु छह सूत्र अवतरित किये जा रहे हैं-

सूत्रार्थ-

भवनवासी, वानव्यन्तर और ज्योतिषी देव स्वस्थान पदों से कितना क्षेत्र स्पर्श करते हैं ?।।३१।।

पूर्वोक्त देव स्वस्थान पदों से लोक का असंख्यातवाँ भाग साढ़े तीन राजु अथवा कुछ कम आठ बटे चौदह भाग स्पर्श करते हैं।।३२।।

समुद्घात की अपेक्षा उपर्युक्त देवों द्वारा कितना क्षेत्र स्पृष्ट है ?।।३३।।

समुद्घात की अपेक्षा उपर्युक्त देवों द्वारा लोक का असंख्यातवाँ भाग अथवा चौदह भागों में से कुछ कम साढ़े तीन भाग अथवा कुछ कम आठ व नौ भाग स्पृष्ट हैं ?।।३४।।

उपपाद पद की अपेक्षा उक्त देवों द्वारा कितना क्षेत्र स्पृष्ट है ?।।३५।।

उपपाद पद की अपेक्षा लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पृष्ट है।।३६।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-ये तीनों प्रकार के देव वर्तमान क्षेत्रप्ररूपणा की अपेक्षा लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पर्श करते हैं। अतीतकाल की अपेक्षा-स्वस्थान पद से वानव्यन्तर और ज्योतिषी देवों द्वारा तीन लोकों का असंख्यातवाँ भाग, तिर्यग्लोक का संख्यातवाँ भाग और ढाईद्वीप से असंख्यातगुणा क्षेत्र स्पृष्ट पाया जाता है।

प्रश्न-ऐसा क्यों हैं ?

उत्तर-क्योंकि वर्तमान काल में तिर्यग्लोक के संख्यातवें भाग को व्याप्त कर उनका अवस्थान पाया जाता है।

भवनवासी देवों द्वारा स्वस्थान की अपेक्षा चार लोकों का असंख्यातवाँ भाग और ढाईद्वीप से असंख्यातगुणा क्षेत्र स्पृष्ट है। विहारवत्स्वस्थान की अपेक्षा चौदह भागों में से साढ़े तीन भाग स्पृष्ट हैं।

प्रश्न-क्यों ?

उत्तर-क्योंकि भवनवासी, वानव्यन्तर और ज्योतिषी देवों का मेरुमूल से नीचे दो राजु और ऊपर सौधर्म विमान के शिखर पर स्थित ध्वजादण्ड तक डेढ़ राजुमात्र स्वनिमित्तक विहार पाया जाता है। परन्तु परनिमित्तक विहार की अपेक्षा उक्त देवों द्वारा कुछ कम आठ बटे चौदह भाग स्पृष्ट हैं, क्योंकि उपरिम देवों से ले जाये गये देव साढ़े चार राजु और स्वनिमित्त से साढ़े तीन राजु प्रमाण तक गमन कर सकते हैं, इसलिए देवों का स्पर्शन आठ बटे चौदह भाग प्रमाण होता है।

समुद्घात के द्वारा वर्तमान क्षेत्र की अपेक्षा लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पृष्ट है।

अब वेदनासमुद्घात, कषायसमुद्घात और वैक्रियिकसमुद्घात पदों की अपेक्षा चौदह भागों में साढ़े तीन अथवा आठ भाग स्पृष्ट हैं, क्योंकि स्व्निमित्त से या परनिमित्त से विहार करने वाले भवनवासी, वानव्यन्तर और ज्योतिषी देवों का वेदनासमुद्घात, कषायसमुद्घात एवं वैक्रियिक समुद्घात पदों के साथ परिणत होने पर इतने प्रमाण क्षेत्र पाया जाता है।

मारणान्तिक समुद्घात की अपेक्षा कुछ कम नौ बटे चौदह भाग स्पृष्ट हैं, क्योंकि मेरुमूल से नीचे दो राजुमात्र मार्ग में जाकर स्थित भवनवासी आदि देवों का घनोदधि वातवलय में स्थित जलकायिक जीवों में मारणान्तिक समुद्घात करते समय नौ बटे चौदह भागमात्र स्पर्शन पाया जाता है।

उपपाद पदों की अपेक्षा लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पृष्ट है। अतीतकाल की अपेक्षा उपपाद पद से परिणत भवनत्रिक अर्थात् भवनवासी, वानव्यंतर और ज्योतिषी देवों द्वारा तीन लोकों का असंख्यातवाँ भाग, तिर्यग्लोक का संख्यातवाँ भाग और ढाईद्वीप से असंख्यातगुणा क्षेत्र स्पृष्ट है। ज्योतिषी देवों के नौ सौ योजन बाहल्यरूप तिर्यग्प्रतर को स्थापित कर ऊपर में उनके उनचास खण्ड करके प्रतराकार से स्थापित करने पर तिर्यग्लोक का संख्यातवाँ भाग मात्र उपपाद क्षेत्र होता है। वानव्यन्तर देवों के एक लाख योजन बाहल्यरूप तिर्यक्प्रतर को स्थापित कर व ऊपर से उनचास खण्ड करके प्रतराकार से स्थापित करने पर तिर्यग्लोक का संख्यातवाँ भाग मात्र उपपाद क्षेत्र होता है। भवनवासियों के भी एक लाख योजन बाहल्यरूप राजु प्रतर को स्थापित कर व उनके पूर्व के समान ही खण्ड करके प्रतराकार से स्थापित करने पर तिर्यग्लोक का संख्यातवाँ भाग मात्र उपपाद क्षेत्र होता है।

अब सौधर्म स्वर्ग से लेकर सहस्रारकल्प तक के निवासी देवों का स्पर्शन प्रतिपादित करने हेतु छह सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

सौधर्म-ईशान कल्पवासी देवों के स्पर्शन का निरूपण स्वस्थान और समुद्घात की अपेक्षा सामान्य देवों के समान है।।३७।।

उपपाद पद की अपेक्षा उक्त देवों द्वारा कितना क्षेत्र स्पृष्ट है ? उपपाद पद की अपेक्षा उक्त देवों द्वारा लोक का असंख्यातवाँ भाग अथवा चौदह भागों में कुछ कम डेढ़ भागप्रमाण क्षेत्र स्पृष्ट है।।३८।।

सनत्कुमार से लेकर शतार-सहस्रार कल्प तक के देव स्वस्थान और समुद्घात की अपेक्षा कितना क्षेत्र स्पर्श करते हैं ?।।३९।।

उपर्युक्त देव स्वस्थान व समुद्घात की अपेक्षा लोक का असंख्यातवाँ भाग अथवा कुछ कम आठ बटे चौदह भाग स्पर्श करते हैं।।४०।।

उक्त देवों द्वारा उपपाद की अपेक्षा कितना क्षेत्र स्पृष्ट है ?।।४१।।

उक्त देवों द्वारा उपपाद पद की अपेक्षा लोक का असंख्यातवाँ भाग अथवा चौदह भागों में कुछ कम तीन, साढ़े तीन, चार, साढ़े चार और पाँच भाग स्पृष्ट है।।४२।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-वर्तमानप्ररूपणा को क्षेत्रप्ररूपणा के समान जानना चाहिए। अतीतकाल की अपेक्षा प्ररूपणा करने पर भी द्रव्यार्थिक नय के अवलम्बन से देवगति के समान भंग होता है, पर्यायार्थिक नय के अवलम्बन से ऐसा नहीं है।

प्रश्न-ऐसा क्यों है ?

उत्तर-स्वस्थान से सौधर्म, ईशान कल्पवासी देवों द्वारा चारों लोकों का असंख्यातवाँ भाग और ढाई द्वीप से असंख्यातगुणा क्षेत्र स्पृष्ट है तथा विहारवत्स्वस्थान, वेदनासमुद्घात, कषायसमुद्घात, वैक्रियिक और मारणान्तिकसमुद्घात पदों से परिणत देवों द्वारा कुछ कम आठ बटे चौदह और नौ बटे चौदह भाग स्पृष्ट हैं, ऐसा निर्दिष्ट किया गया है।

उपपाद पद से वर्तमान काल की अपेक्षा लोक का असंख्यातवाँ भाग और अतीतकाल की अपेक्षा कुछ कम चौदह भागों में डेढ़ भाग प्रमाण क्षेत्र स्पृष्ट है।

प्रश्न-ऐसा क्यों हैं ?

उत्तर-क्योंकि अतीतकाल की अपेक्षा प्रभा पटल में उत्पन्न होने वाले तिर्यंच व मनुष्यों का डेढ़ राजु बाहल्य से युक्त राजुप्रतर मात्र स्पर्शन पाया जाता है।

सनत्कुमार स्वर्ग से लेकर सहस्रार स्वर्ग पर्यन्त देवों के वर्तमान काल की अपेक्षा लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पर्शन क्षेत्र है। अतीतकाल में स्वस्थान की अपेक्षा लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पृष्ट है, क्योंकि विमानरुद्ध क्षेत्र का प्रमाण चारों लोकों के असंख्यातवें भाग मात्र है। विहार, वेदनासमुद्घात, कषायसमुद्घात, वैक्रियिकसमुद्घात और मारणान्तिकसमुद्घात पदों से परिणत उक्त देवों द्वारा कुछ कम आठ बटे चौदह भाग स्पृष्ट हैं, क्योंकि त्रस जीवों को छोड़ अन्यत्र उनकी उत्पत्ति का अभाव पाया जाता है।

उत्पाद की अपेक्षा से भी अतीतकाल में यथाक्रम से चौदह भागों में तीन, साढ़े तीन, चार, साढ़े चार और पाँच भाग स्पृष्ट हैं, क्योंकि मेरुमूल से तीन राजु ऊपर चढ़कर सनत्कुमार-माहेन्द्र कल्पों की समाप्ति हो जाती है, इससे ऊपर अर्ध राजु जाकर ब्रह्म-ब्रह्मोत्तर कल्पों की समाप्ति है, उससे ऊपर अर्ध राजु जाकर लान्तव-कापिष्ठ कल्पों की समाप्ति है उससे ऊपर अर्ध राजु जाकर शुक्र-महाशुक्र कल्पों का अन्त है तथा उससे अर्ध राजु ऊपर जाकर शतार-सहस्रार कल्पों की समाप्ति होती है, ऐसा जानना चाहिए।

अब आनत स्वर्ग आदि चार स्वर्गों के निवासी देवों का स्पर्शन बतलाने हेतु चार सूत्र अवतरित किये जा रहे हैं-

सूत्रार्थ-

आनत से लेकर अच्युत कल्प तक के देवों द्वारा स्वस्थान व समुद्घात पदों की अपेक्षा कितना क्षेत्र स्पृष्ट है ?।।४३।।

उपर्युक्त देवों द्वारा स्वस्थान व समुद्घात पदों की अपेक्षा लोक का असंख्यातवाँ भाग अथवा कुछ कम छह बटे चौदह भाग स्पृष्ट है।।४४।।

उपपाद की अपेक्षा उक्त देवों द्वारा कितना क्षेत्र स्पृष्ट है ?।।४५।।

उपपाद की अपेक्षा उक्त देवों के द्वारा लोक का असंख्यातवाँ भाग अथवा चौदह भागों में से कुछ कम साढ़े पाँच या छह भाग स्पृष्ट हैं।।४६।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-यहाँ वर्तमान प्ररूपणा क्षेत्रप्ररूपणा के समान होती है। अतीतकाल की अपेक्षा स्वस्थान पद से परिणत उक्त देवों द्वारा लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पृष्ट है। विहारवत्स्वस्थान, वेदनासमुद्घात, कषायसमुद्घात, वैक्रियिकसमुद्घात और मारणान्तिक समुद्घात पदों से परिणत उक्त देवों द्वारा छह बटे चौदह भाग स्पृष्ट हैं, क्योंकि मेरुमूल से नीचे उसका गमन न होने के कारण वहाँ वैक्रियिक समुद्घातादिकों का अभाव है।

उपपाद की अपेक्षा उन देवों का स्पर्शन आनत-प्राणत कल्प में चौदह भागों में साढ़े पाँच भाग और आरण-अच्युत कल्प में छह भाग प्रमाण जानना चाहिए।

तात्पर्य यह है कि-देवगण सम्यग्दर्शन को प्राप्त करके मध्यलोक में जिनेन्द्र भगवन्तों के पंचकल्याणक अवसरों पर आकर तीर्थंकर का जन्माभिषेक और समवसरण का अवलोकन करके जिनभक्ति के प्रभाव से महान् पुण्य का सम्पादन करते हैं। वे तीर्थंकर भगवान की दिव्यध्वनि को सुनकर अपने संसार परिभ्रमण का अन्त करने की इच्छा करते हैं और मनुष्यपर्याय को भी प्राप्त करना चाहते हैं। हम लोग मनुष्य हैं अत: मनुष्य भव का सार सम्यक्त्व और संयम अथवा देशसंयम को प्राप्त करके अपना जन्म सफल करते हुए निरन्तर स्वात्मतत्त्व भावना को हमें सदैव भाते रहना चाहिए।

अब नव ग्रैवेयक से सर्वार्थसिद्धि पर्यन्त सभी अहमिन्द्रों का स्पर्शन प्रतिपादित करने हेतु दो सूत्र अवतरित हो रहे हैं-

सूत्रार्थ-

नौ ग्रैवेयकों से लेकर सर्वार्थसिद्धिविमान तक के देव स्वस्थान, समुद्घात और उपपाद पदों से कितना क्षेत्र स्पर्श करते हैं ?।।४७।।

उपर्युक्त देव उक्त पदों से लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पर्श करते हैं।।४८।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-स्वस्थानस्वस्थान, विहारवत्स्वस्थान, वेदनासमुद्घात, कषायसमुद्घात, वैक्रियिकसमुद्घात, मारणान्तिक समुद्घात और उपपाद पदों की अपेक्षा अतीत व वर्तमानकाल से चार लोकों का असंख्यातवाँ भाग और ढाईद्वीप से असंख्यातगुणा क्षेत्र स्पृष्ट है। विशेष इतना है कि-सर्वार्थसिद्धि में मारणान्तिक व उपपाद पदों को छोड़कर शेष पदों की अपेक्षा मानुष क्षेत्र का संख्यातवाँ भाग स्पृष्ट है, ऐसा कहना चाहिए।

यहाँ तात्पर्य यह है कि-हम सभी को यह सब जानकर भेदाभेद रत्नत्रय की भावना भाते हुए संसार समुद्र से पार होने का उपाय करना चाहिए। इस प्रकार श्री षट्खण्डागम ग्रंथ में क्षुद्रकबंध नाम के द्वितीय खण्ड में स्पर्शनानुगम नामके महाधिकार में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणिटीका में गतिमार्गणा नाम का प्रथम अधिकार समाप्त हुआ।