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०१.गतिमार्गणा अधिकार

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विषय सूची

गतिमार्गणा अधिकार

अथ गतिमार्गणाधिकार:

अथ स्थलचतुष्टयेन षट्पंचाशत्सूत्रैः द्रव्यप्रमाणनुगमे गतिमार्गणानाम प्रथमोऽधिकारः प्रारभ्यते। तत्र तावत् प्रथमस्थले नरकगतौ नारकाणां संख्यानिरूपणत्वेन ‘‘दव्वपमाणाणुगमेण’’ इत्यादिना त्रयोदशसूत्राणि। तदनु द्वितीयस्थले तिरश्चां द्रव्यप्रमाणकथनत्वेन ‘‘तिरिक्खगदीए’’ इत्यादिसूत्राष्टकं। ततः परं तृतीयस्थले मनुष्याणां संख्याप्रतिपादनत्वेन ‘‘मणुसगदीए’’ इत्यादिसूत्राष्टकं। तदनंतरं चतुर्थस्थले देवगतौ देवानां संख्याप्रतिपादनपरत्वेन ‘‘देवगदीए’’ इत्यादिसप्तविंशतिसूत्राणि इति समुदायपातनिका भवति।
इदानीं नरकगतौ सामान्यनारकाणां संख्यानिरूपणार्थं सूत्रषट्कमवतार्यते-
दव्वपमाणाणुगमणेण गदियाणुवादेण णिरयगदीए णेरइया दव्वपमाणेण केवडिया ?।।१।।
असंखेज्जा।।२।।
असंखेज्जासंखेज्जाहि ओसप्पिणि-उस्सप्पिणीहि अवहिरंति कालेण।।३।।
खेत्तेण असंखेज्जाओ सेडीओ।।४।।
पदरस्स असंखेज्जदिभागो।।५।।
तासिं सेडीणं विक्खंभसूची अंगुलवग्गमूलं विदियवग्गमूलगुणिदेण।।६।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-एता मार्गणाः सर्वकालं संति, एताश्च सर्वकालं न संति इति नानाजीवभंगविचयानुगमेन ज्ञापयित्वा संप्रति तासु मार्गणासु स्थितजीवानां प्रमाणप्ररूपणार्थं द्र्रव्यानियोगद्वारं आगतं। तत्र चतुर्गतिजीवेषु अपि अत्र सूत्रे ‘णेरइया’ इति वचनेन नरकगतिसंबद्धनारकजीवेभ्यो व्यतिरिक्तद्रव्यादीनां प्रतिषेधः कृतः।
‘केवडिया’ इति पदेन आशंका कृता श्रीआचार्यदेवेन। अस्या एव उत्तरं अग्रिमसूत्रे संख्यातानन्तयोः प्रतिषेधार्थमसंख्यातवचनं। इदमपि असंख्यातं त्रिविधं तेषु कतम-मसंख्यातमिति ज्ञापनार्थं-कालापेक्षया असंख्यातासंख्याताभिः अवसर्पिण्युत्सर्पिणीभिः अपहृता भवन्ति नारकाः। क्षेत्रापेक्षया असंख्यातजगत्श्रेणीप्रमाणाः नारका जीवाः संति। पुनश्च उक्तनारकाः जगत्प्रतरस्या-संख्यातभागप्रमाणा असंख्यातजगच्छ्रेणीप्रमाणाः संति। एतेन सूत्रेण उत्कृष्टासंख्यातासंख्यातस्य प्रतिषेधः कृतः। तासां श्रेणीनां विष्कंभसूची सूच्यंगुलस्य द्वितीयवर्गमूलेन गुणितं तस्यैव प्रथमवर्गमूलप्रमाणं। अत्र विष्कंभसूची-अवहारकाल-द्रव्याणां खंडित-भाजित-विरलित-अपहृत-प्रमाण-कारण-निरुक्ति-विकल्पैः प्ररूपणा कर्तव्या।
अधुना प्रथमादिसप्तपृथिवीषु नारकाणां द्रव्यप्रमाणप्रतिपादनाय सूत्रसप्तकमवतार्यते-
एवं पढमाए पुढवीए णेरइया।।७।।
विदियाए जाव सत्तमाए पुढवीए णेरइया दव्वपमाणेण केवडिया ?।।८।।
असंखेज्जा।।९।।
असंखेज्जासंखेज्जाहि ओसप्पिणि-उस्सप्पिणीहि अवहिरंति कालेण।।१०।।
खेत्तेण सेडीए असंखेज्जदिभागो।।११।।
तिस्से सेडीए आयामो असंखेज्जाओ जोयणकोडीओ।।१२।।
पढमादियाणं सेडिवग्गमूलाणं संखेज्जाणमण्णोण्णब्भासो।।१३।।
सिद्धांतिंचतामणिटीका-सूत्राणामर्थः द्रव्यप्रमाणानुगमनाम प्रकरणे प्राक्कथितोऽस्ति। सामान्यतया यत्संख्या नारकाणां कथिता, पृथिव्यां प्रथमायां सैव ज्ञातव्या । द्वितीयादिषु पृथिवीषु असंख्यातासंख्यातसंख्या ज्ञातव्या।
एवं प्रथमस्थले नारकाणां संख्याकथनत्वेन त्रयोदश सूत्राणि गतानि।
अधुना सामान्यतिरश्चां संख्याप्रतिपादनाय सूत्रचतुष्टयं अवतार्यते-
तिरिक्खगदीए तिरिक्खा दव्वपमाणेण केवडिया ?।।१४।।
अणंता।।१५।।
अणंताणंताहि ओसप्पिणि-उस्सप्पिणीहि ण अवहिरंति कालेण।।१६।।
खेत्तेण अणंताणंता लोगा।।१७।।
सद्धांतचिंतामणिटीका-सूत्राणामर्थः सुगमोऽस्ति। अत्र कालापेक्षया अनन्तानन्ताभिः अवसर्पिण्युत्सर्पिणी-भिरपि तिर्यञ्चोऽपहृताः न भवन्ति। अतीतकालग्रहणात्।
अपहृते सति को दोषः ?
न, सर्वेषां भव्यजीवानां व्युच्छेदप्रसंगात्। अत्र परीतानंत-युक्तानंतयोः प्रतिषेधः कृतः, अतः अनंता-नन्तभेदो गृहीतव्यः। क्षेत्रापेक्षयापि जघन्योत्कृष्टानन्तयोः प्रतिषेधो ज्ञातव्यः। अनन्तानन्तस्य त्रिभेदोऽत्र ज्ञातव्यः, जघन्योत्कृष्ट-तद्वयतिरिक्तभेदात्। अतः सूत्रे ‘‘लोगा’’ इति पदेन तद्व्यतिरिक्तानन्तानन्तभेदो गृहीतव्यः । सामान्येन तिरश्चां संख्याकथनेनात्र एकेन्द्रियादिपंचेन्द्रियपर्यंताः सर्वेऽपि तिर्यञ्चो गृहीतव्याः।
इदानीं चतुर्विधतिरश्चां संख्यानिरूपणाय सूत्रचतुष्टयमवतार्यते-
पंचिंदियतिरिक्ख-पंचिंदियतिरिक्खपज्जत्त-पंचिंदियतिरिक्खजोणिणी-पंचिंदियतिरिक्खअपज्जत्ता दव्वपमाणेण केवडिया ?।।१८।।
असंखेज्जा।।१९।।
असंखेज्जासंखेज्जाहि ओसप्पिणि-उस्सप्पिणीहि अवहिरंति कालेण।।२०।।
खेत्तेण पंचिंदियतिरिक्ख-पंचिंदियतिरिक्खपज्जत्त-पंचिंदियतिरिक्ख-जोणिणि-पंचिंदियतिरिक्खअपज्जत्तएहि पदरमवहिरदि देवअवहारकालादोअसंखेज्जगुणहीणेण कालेण संखेज्जगुणहीणेण कालेण संखेज्जगुणेण कालेण असंखेज्जगुणहीणेण कालेण।।२१।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-पंचेन्द्रियाः तिर्यंचः असंख्याताः भवन्ति। असंख्यातोऽपि त्रिविधः। परीतासंख्यात-युक्तासंख्यात-असंख्यातासंख्याताः इति। अत्र असंख्यातासंख्यातो भेदः गृहीतव्यः।
श्रीगौतमस्वामिगणधरदेवेन प्रोक्तं प्रतिक्रमणदण्डकसूत्रेषु-
‘‘तत्थ पढमे महव्वदे पाणादिवादादो वेरमणं, से पुढविकाइया जीवा असंखेज्जासंखेज्जा, आउकाइया जीवा असंखेज्जासंखेज्जा, तेउकाइया जीवा असंखेज्जासंखेज्जा, वाउकाइया जीवा असंखेज्जासंखेज्जा, वणप्फदिकाइया जीवा अणंताणंता’’ इत्यादयः। तथैव बेइंदिया जीवा असंखेज्जासंखेज्जा, इत्यादयः। एवमेव पंचिंदिया जीवा असंखेज्जासंखेज्जा अंडाइया पोदाइया जराइया रसाइया संसेदिमा सम्मुच्छिमा उब्भेदिमा उववादिमा’’ इत्यादयः।
एतेषु दण्डकसूत्रेषु पृथिव्यादिचतुष्कजीवाः असंख्यातासंख्याताः प्रोक्ताः, द्वीन्द्रियादयो विकलत्रयाः असंख्यातासंख्याताः प्रत्येकमिमे भवन्ति। पंचेन्द्रिया जीवाश्च तिर्यंचो मनुष्याः देवा नारकाश्च सर्वे मिलित्वापि असंख्यातासंख्याता एव, केवलं वनस्पतिकायिका एव अनन्तानन्ताः भवन्ति।
एवं द्वितीयस्थले तिर्यग्गतौ तिरश्चां द्रव्यप्रमाणकथनपरत्वेन सूत्राष्टकं गतम्।


अथ गतिमार्गणा अधिकार

अब चार स्थलों में छप्पन सूत्रों के द्वारा द्रव्यप्रमाणानुगम में गतिमार्गणा नाम का प्रथम अधिकार प्रारंभ होता है। उनमें से प्रथम स्थल में नरकगति के नारकी जीवों की संख्या का निरूपण करने वाले ‘‘दव्वपमाणाणुवादेण’’ इत्यादि तेरह सूत्र हैं। उसके बाद द्वितीय स्थल में तिर्यंच जीवों का द्रव्यप्रमाण कथन करने वाले ‘‘तिरिक्खगदीए’’ इत्यादि आठ सूत्र हैं। पुन: तृतीय स्थल में मनुष्यों की संख्या का प्रतिपादन करने हेतु ‘‘मणुसगदीए’’ इत्यादि आठ सूत्र हैं तदनंतर चतुर्थ स्थल में देवगति में देवों की संख्या का प्रतिपादन करने हेतु ‘‘देवगदीए’’ इत्यादि सत्ताईस सूत्र हैं। अधिकार के प्रारंभ में सूत्रों की यह समुदायपातनिका सूचित की गई है।

अब नरकगति में सामान्य नारकियों की संख्या का निरूपण करने हेतु छह सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

द्रव्यप्रमाणानुगम से गतिमार्गणानुसार नरकगति की अपेक्षा नारकी जीव द्रव्यप्रमाण से कितने हैं ?।।१।।

नारकी जीव द्रव्यप्रमाण से असंख्यात हैं।।२।।

काल की अपेक्षा नारकी जीव असंख्यातासंख्यात अवसर्पिणी और उत्सर्पिणी के द्वारा अपहृत होते हैं।।३।।

क्षेत्र की अपेक्षा नारकी जीव असंख्यात जगत्श्रेणी प्रमाण हैं।।४।।

उक्त नारकी जीव जगत्प्रतर के असंख्यातवें भाग प्रमाण असंख्यात जगत्श्रेणी प्रमाण हैं।।५।।

उन जगत्श्रेणियों की विष्कम्भसूची, सूच्यंगुल के द्वितीय वर्गमूल से गुणित उसी के प्रथम वर्गमूल प्रमाण है।।६।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-ये मार्गणाएं सर्वकाल हैं और ये मार्गणाएं सर्वकाल नहीं है, इस प्रकार नाना जीवों की अपेक्षा भंगविचयानुगम से ज्ञान कराकर अब उन मार्गणाओं में स्थित जीवों के प्रमाण के निरूपणार्थ द्रव्यानुयोग द्वार आया है। उनमें चतुर्गति के जीवों में भी इस वचन से शेष गतियों का प्रतिषेध किया है। ‘नारकी’ इस वचन से नरकगति से संबद्ध नारकियों के अतिरिक्त अन्य द्रव्यादिकों का प्रतिषेध किया है।

कितने हैं ? इस पद से आचार्य देव ने आशंका की है। इसी का उत्तर अग्रिम सूत्र में दिया है कि संख्यात व अनन्त का प्रतिषेध करने के लिए ‘असंख्यात’ वचन आया है। यह असंख्यात भी तीन प्रकार का है। उनमें से यह कौन सा असंख्यात है ? यह बतलाने के लिए-काल की अपेक्षा असंख्यातासंख्यात अवसर्पिणी और उत्सर्पिणियों के द्वारा नारकी जीव अपहृत होते हैं। क्षेत्र की अपेक्षा असंख्यातजगत् श्रेणी प्रमाण नारकी जीव हैं। पुनश्च उक्त नारकी जीव जगत्प्रतर के असंख्यातवें भागप्रमाण असंख्यात जगत्श्रेणीप्रमाण हैं। इस सूत्र से उत्कृष्ट असंख्यातासंख्यात का प्रतिषेध किया गया है। उन श्रेणियों की विष्कंभसूची सूच्यंगुल के द्वितीय वर्गमूल से गुणित करने पर उसी का प्रथम वर्गमूलप्रमाण होता है। यहाँ विष्कंभसूची-अवहारकाल द्रव्यों की खण्डित, भाजित, विरलित, अपहृत, प्रमाण, कारण और निरुक्ति के भेदों से प्ररूपणा करना चाहिए।

अब प्रथम पृथ्वी से लेकर सातवीं पृथ्वी तक में नारकियों का द्रव्यप्रमाण प्रतिपादित करने हेतु सात सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

सामान्य नारकियों के समान ही प्रथम पृथिवी के नारकियों का द्रव्यप्रमाण है।।७।।

द्वितीय पृथिवी से लेकर सातवीं पृथिवी तक प्रत्येक पृथिवी के नारकी द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा कितने हैं ?।।८।।

द्वितीयादि छह पृथिवियों के नारकी द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा असंख्यात हैं।।९।।

द्वितीय पृथिवी से लेकर सातवीं पृथिवी तक प्रत्येक पृथिवी के नारकी काल की अपेक्षा असंख्यातासंख्यात अवसर्पिणी और उत्सर्पिणियों से अपहृत होते हैं।।१०।।

क्षेत्र की अपेक्षा द्वितीय पृथिवी से लेकर सातवीं पृथिवी तक प्रत्येक पृथिवी के नारकी जगश्रेणी के असंख्यातवें भाग प्रमाण हैं।।११।।

जगत्श्रेणी के असंख्यातवें भागप्रमाण उस श्रेणी का आयाम (लम्बाई) असंख्यात योजनकोटि है।।१२।।

पूर्वोक्त असंख्यात कोटि योजनों का प्रमाण प्रथमादिक संख्यात जगत्श्रेणीवर्ग मूलों के परस्पर गुणनफलरूप है।।१३।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-इन सभी सूत्रों का अर्थ द्रव्यप्रमाणानुगम नाम के प्रकरण में पहले कहा जा चुका है। सामान्यतया जो संख्या नारकियों की कही गई है, प्रथम पृथिवी में भी वही जानना चाहिए। द्वितीय आदि पृथिवियों में असंख्यातासंख्यात की संख्या जाननी चाहिए।

इस प्रकार प्रथम स्थल में नारकियों की संख्या बतलाने वाले तेरह सूत्र पूर्ण हुए।

अब सामान्य तिर्यंचों की संख्या प्रतिपादन करने हेतु चार सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

तिर्यंचगति में तिर्यंच जीव द्रव्यप्रमाण से कितने हैं ?।।१४।।

तिर्यंचगति में तिर्यंचजीव द्रव्यप्रमाण से अनन्त हैं।।१५।।

तिर्यंच जीव काल की अपेक्षा अनन्तानन्त अवसर्पिणी और उत्सर्पिणियों से अपहृत नहीं होते हैं।।१६।।

तिर्यंच जीव क्षेत्र की अपेक्षा अनन्तानन्त लोकप्रमाण हैं।।१७।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-उपर्युक्त सभी सूत्रों का अर्थ सुगम है। यहाँ काल की अपेक्षा अनन्तानन्त अवसर्पिणी और उत्सर्पिणी कालों से भी तिर्यंच जीव अपहृत नहीं होते हैं, क्योंकि यहाँ अतीत काल का ग्रहण किया गया है।

शंका-अनंतानंत अवसर्पिणी और उत्सर्पिणियों से इनके अपहृत होने पर कौन सा दोष आता है ?

समाधान-नहीं, क्योंकि ऐसा होने पर सब भव्य जीवों के व्युच्छेद का प्रसंग आ जावेगा। इस सूत्र के द्वारा परीतानन्त और मुक्तानन्त का प्रतिषेध किया गया है। अत: अनन्तानन्त भेद ग्रहण करना चाहिए। क्षेत्र की अपेक्षा भी जघन्य और उत्कृष्ट अनन्त का प्रतिषेध जानना चाहिए। यहाँ अनन्त के भी जघन्य, उत्कृष्ट और तद्व्यतिरिक्त के भेद से तीन भेद होते हैं। अत: सूत्र में ‘‘लोगा’’ इस पद से तद्व्यतिरिक्त नाम का अनन्तानन्त का भेद यहाँ ग्रहण करना चाहिए। सामान्य से तिर्यंचों की संख्या के कथन से यहाँ एकेन्द्रिय जीव से पंचेन्द्रिय पर्यन्त सभी तिर्यंचों को ग्रहण करना चाहिए।

अब चारों प्रकार के तिर्यंचों की संख्या निरूपण करने हेतु चार सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

पंचेन्द्रिय तिर्यंच, पंचेन्द्रिय तिर्यंच पर्याप्त, पंचेन्द्रिय तिर्यंच योनिमती और पंचेन्द्रिय तिर्यंच अपर्याप्त जीव द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा कितने हैं ?।।१८।।

उक्त तिर्यंच द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा असंख्यात हैं।।१९।।

उक्त चारों तिर्यंचजीव काल की अपेक्षा असंख्यातासंख्यात अवसर्पिणी और उत्सर्पिणियों के द्वारा अपहृत होते हैं।।२०।।

क्षेत्र की अपेक्षा पंचेन्द्रिय तिर्यंच, पंचेन्द्रिय तिर्यंच पर्याप्त, पंचेन्द्रिय तिर्यंच योनिमती और पंचेन्द्रिय तिर्यंच अपर्याप्त जीवों के द्वारा क्रमश: देव अवहारकाल से असंख्यातगुणे हीन काल से, संख्यातगुणे हीन काल से, संख्यातगुणे काल से और असंख्यातगुणे हीन काल से जगत्प्रतर अपहृत होता है।।२१।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-पंचेन्द्रिय तिर्यंच असंख्यात होते हैं। असंख्यात के भी तीन भेद होते हैं-परीतासंख्यात, युक्तासंख्यात और असंख्यातासंख्यात। इनमें से यहाँ असंख्यातासंख्यात भेद ग्रहण करना चाहिए। श्री गौतम गणधर स्वामी ने भी प्रतिक्रमणदण्डक सूत्रों में कहा है- उस प्रतिक्रमण दण्डक का पद्यानुवाद प्रस्तुत है-

इनमें हिंसा का त्याग महाव्रत, प्रथम कहा है जिनवर ने।

भूकायिक जीव असंख्याता-संख्यात व जलकायिक इतने।।
अग्नीकायिक भि असंख्यातासंख्यात पवनकायिक इतने।
जो वनस्पतिकायिक प्राणी, वे सभी अनन्तानन्त भणें।।

इत्यादिरूप से एकेन्द्रिय जीवों की हिंसा के त्यागरूप अहिंसा महाव्रत बताया है। इसी प्रकार से दो इंद्रिय जीव असंख्यातासंख्यात हैं उनका त्याग अहिंसा महाव्रत है। ऐसे ही तीन इंद्रिय, चार इंद्रिय वाले जीवों के प्रति अहिंसा का भाव होता है तथा इसी प्रकार से अंडज, पोतज, जरायुज, रसज, पसीनज, सम्मूच्र्छनज, उद्भेदिम और उपपादज के भेदों से पंचेन्द्रिय जीव असंख्यातासंख्यात होते हैं।

इन दण्डक सूत्रों में पृथिवीकायिक आदि चतुष्क-पृथिवीकायिक, जलकायिक, अग्निकायिक और वायुकायिक जीव असंख्यातासंख्यात कहे गये हैं। दो इन्द्रिय आदि विकलत्रय सभी जीवों की संख्यागणना असंख्यातासंख्यात है और पंचेन्द्रिय जीवों में तिर्यंच, मनुष्य, देव और नारकी सब मिलकर भी असंख्यातासंख्यात ही हैं, केवल वनस्पतिकायिक जीव ही अनन्तानन्त होते हैं।

इस प्रकार द्वितीय स्थल में तिर्यंचगति के तिर्यंचों का द्रव्यप्रमाण कथन करने वाले आठ सूत्र पूर्ण हुए।

संप्रति सामान्यमनुष्य-लब्ध्यपर्याप्तमनुष्ययोः संख्यानिरूपणाय सूत्रषट्कमवतार्यते-

मणुसगदीए मणुस्स मणुसअपज्जत्ता दव्वपमाणेण केवडिया ?।। २२।।

असंखेज्जा।।२३।।
असंखेज्जासंखेज्जाहि ओसप्पिणि-उस्सप्पिणीहि अवहिरंति कालेण।।२४।।
खेत्तेण सेडीए असंखेज्जदिभागो।।२५।।
तिस्से सेडीए आयामो असंखेज्जाओ जोयणकोडीओ।।२६।।
मणुस-मणुसअपज्जत्तएहि रूवं रूवापक्खित्तएहि सेडी अवहिरदि अंगुलवग्गमूलं तदियवग्गमूलगुणिदेण।।२७।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-मनुष्यगतौ सामान्यमनुष्ये त्रिविधाः अपि मनुष्याः गर्भिता भवन्ति। मनुष्यापर्याप्ताः- लब्ध्यपर्याप्तकाः मनुष्याः स्त्रीणां कक्षकुक्षिस्थानेषु उद्भवन्ति ।
संप्रति पर्याप्तमनुष्य-योनिमतीमनुष्यभेदयोः द्रव्यप्रमाणप्रतिपादनाय सूत्रद्वयमवतार्यते-
मणुस्सपज्जत्ता मणुसिणीओ दव्वपमाणेण केवडिया ?।।२८।।
कोडाकोडाकोडीए उविंर कोडाकोडाकोडाकोडीए हेट्ठदो छण्हं वग्गाणमुवरि सत्तण्हं वग्गाणं हेट्ठदो।।२९।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-एवं सामान्येन यद्यपि सूत्रे उक्तं तहर्यपि आचार्यपरंपरागतेन गुरूपदेशेनाविरुद्धेण पंचमवर्गस्य घनमात्रो मनुष्यपर्याप्तराशिर्भवतीति गृहीतव्यः। तस्य प्रमाणमिदं-
७९२२८१६२५१४२६४३३७५९३५४३९५०३३६।
अत्र गाथा उच्यते- तललीनमधुगविमलं, धूमसिलागाविचोरभयमेरू।
तटहरिखझसा होंति हु, माणुसपज्जत्तसंखंका।।
केनाक्षरेण कस्यांकस्य बोधो भवति इति चेत् ?
अस्य परिज्ञानार्थं एका गाथा वर्तते-
कटपयपुरस्थवर्णैर्नवनवपंचाष्टकल्पितैः क्रमशः ।
स्वरञनशून्यं संख्या, मात्रोपरिमाक्षरं त्याज्यम्।।
अनया गाथया उपर्युक्तप्राकृतगाथायाः अर्थबोधो भवति तयैव गाथया पर्याप्तमनुष्याणां संख्या परिज्ञायते।
कश्चिदाह-एष उपदेशः ‘कोडाकोडाकोडाकोडीए हेट्ठदो’ इति सूत्रवाक्येन कथं न विरुध्यते ?
आचार्यः प्राह-न विरुध्यते, एककोटाकोटाकोटाकोटिमादिं कृत्वा यावत् रूपोनदशकोटाकोटा- कोटाकोटिपर्यंतं इदं सर्वमपि कोटाकोटाकोटाकोटिपदेन ग्रहणात्। न च एतस्य स्थानस्योत्कृष्टं उल्लंघ्य मनुष्यपर्याप्तराशिः स्थिता, अष्टानां कोटाकोटाकोटाकोटीनां अधः तस्यावस्थानदर्शनात्।
पर्याप्तमनुष्यराशिचतुःभागेषु त्रिभागप्रमाणाः मनुष्यिन्यः, एकश्चतुर्भागः पुरुषनपुंसकराशिर्भवति।
एवं तृतीयस्थले मनुष्याणां द्रव्यप्रमाणकथनत्वेन अष्टौ सूत्राणि गतानि।
देवगतौ देवानां संख्यानिरूपणार्थं सूत्रचतुष्टयमवतार्यते-
देवगदीए देवा दव्वपमाणेण केवडिया ?।।३०।।
असंखेज्जा।।३१।।
असंखेज्जासंखेज्जाहि ओसप्पिणि-उस्सप्पिणीहि अवहिरंति कालेण।।३२।।
खेत्तेण पदरस्स बेछप्पण्णंगुलसदवग्गपडिभाएण।।३३।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-‘असंख्याताः’ इतिवचनेन संख्यातानंतयोः प्रतिषेधः कृतः।
उक्तं च- निरस्यन्ती परस्यार्थं, स्वार्थं कथयति श्रुतिः।
तमो विधुन्वती भास्यं, यथा भासयति प्रभा।।
यथा प्रभान्धकारं नाशयति प्रकाशनीयं परपदार्थं प्रकाशयति, तथैव श्रुतिः-शास्त्रं परस्याभीष्टं निराकृत्य स्वस्याभीष्टं अर्थं कथयति।
कालापेक्षया असंख्यातासंख्यातावसर्पिणी-उत्सर्पिणीभिः देवाः अपहृताः भवन्ति। क्षेत्रापेक्षया कथ्यते-द्विशत-षट्पंचाशदंगुलानां वर्ग:-पंचषष्टिसहस्र-पंचशत-षट्त्रिंशत्प्रतरांगुलप्रमाणं भवति। एतेन जगत्प्रतरे भागे कृते यल्लब्धं तद् देवराशिप्रमाणं भवति।
संप्रति भवनत्रिकदेवानां संख्याप्रतिपादनाय एकादशसूत्राण्यवतार्यन्त्ते-
भवणवासियदेवा दव्वपमाणेण केवडिया ?।।३४।।
असंखेज्जा।।३५।।
असंखेज्जासंखेज्जाहि ओसप्पिणि-उस्सप्पिणीहि अवहिरंति कालेण।।३६।।
खेत्तेण असंखेज्जाओ सेडीओ।।३७।।
पदरस्स असंखेज्जदिभागो।।३८।।
तासिं सेडीणं विक्खंभसूची अंगुलं अंगुलवग्गमूलगुणिदेण।।३९।।
वाणवेंतरदेवा दव्वपमाणेण केवडिया ?।।४०।।
असंखेज्जा।।४१।।
असंखेज्जासंखेज्जाहि ओसप्पिणि-उस्सप्पिणीहि अवहिरंति कालेण।।४२।।
खेत्तेण पदरस्स संखेज्जजोयणसदवग्गपडिभाएण।।४३।।
जोदिसिया देवा देवगदिभंगो।।४४।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-सूत्राणामर्र्थः शब्दार्थापेक्षया सुगमोऽस्ति। भवनवासिदेवाः क्षेत्रापेक्षया असंख्यातजगत्श्रेणीप्रमाणा: संति, तथा च जगत्प्रतरस्यासंख्यातभागः। तासां असंख्यातजगच्छ्रेणीनां विष्कंभसूची कथ्यते-
सूच्यंगुलं तस्यैव प्रथमवर्गमूलेन गुणिते तासां असंख्यातजगच्छे्रणीनां विष्कंभसूची भवति।
वानव्यन्तरदेवानां संख्या द्रव्यप्रमाणेन असंख्याता भवति, कालापेक्षया असंख्यातासंख्यातावसर्पिणी-उत्सर्पिणीभिः अपहृता भवन्ति इमे देवाः। क्षेत्रापेक्षया तत्प्रायोग्यसंख्यातयोजनशतानां वर्गं कृत्वा तेन जगत्प्रतरे अपवर्तिते वानव्यन्तरदेवानां प्रमाणं भवति। ज्योतिष्कदेवानां प्रमाणं सामान्येन सामान्यदेवगतिभंग-सदृशमेव।
संप्रति सौधर्मैशानादिसहस्रारपर्यंतदेवानां संख्याकथनाय सूत्रसप्तकमवतार्यते-
सोहम्मीसाणकप्पवासियदेवा दव्वपमाणेण केवडिया ?।।४५।।
असंखेज्जा।।४६।।
असंखेज्जासंखेज्जाहि ओसप्पिणि-उस्सप्पिणीहि अवहिरंति कालेण।।४७।।
खेत्तेण असंखेज्जाओ सेडीओ।।४८।।
पदरस्स असंखेज्जदिभागो।।४९।।
तासिं सेडीणं विक्खंभसूची अंगुलवग्गमूलं बिदियं तदियवग्ग-मूलगुणिदेण।।५०।।
सणक्कुमार जाव सदार-सहस्सारकप्पवासियदेवा सत्तमपुढवीभंगो।।५१।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-घनांगुलस्य तृतीयवर्गमूलमात्रजगच्छे्रणीप्रमाणाः सौधर्मैशानकल्पेषु देवाः संति।
सनत्कुमारमाहेन्द्रकल्पयोः ब्रह्म-ब्र्रह्मोत्तरयोः लान्तवकापिष्ठयोः शुक्रमहाशुक्रयोः शतारसहस्रारयोश्च क्रमशः जगच्छे्रण्याः एकादश-नवम-सप्तम-पंचम-चतुर्थवर्गमूलानां जगच्छे्रण्याः भागहाररूपेणोपलब्धिर्भवति।
एते भागहाराः अत्र भवन्तीति कथं ज्ञायते ?
आचार्यपरंपरागताविरुद्धोपदेशात्।
आनतादि-सर्वार्थसिद्धिपर्यन्तदेवानां द्रव्यप्रमाणकथनाय सूत्रपंचकमवतार्यते-
आणद जाव अवराइदविमाणवासियदेवा दव्वपमाणेण केवडिया ?।।५२।।
पलिदोवमस्स असंखेज्जदिभागो।।५३।।
एदेहि पलिदोवममवहिरदि अंतोमुहुत्तेण।।५४।।
सव्वट्ठसिद्धिविमाणवासिय देवा दव्वपमाणेण केवडिया ?।।५५।।
संखेज्जा।।५६।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-आनताद्यपराजितविमानवासिदेवेभ्यः अंतर्मुहूर्तेण पल्योपममपहृतं भवति। अत्र आवलिकायाः असंख्यातभागः संख्यातावलिका वान्तर्मुहूर्तं नास्ति, किंतु असंख्यातावलिकाः अन्तर्मुहूर्तमिति गृहीतव्यं ।
असंख्यातावलिकानां अंतर्मुहूर्तत्वं कथं ?
न, कार्ये कारणोपचारेण तासां तदविरोधात्।
सर्वार्थसिद्धिविमानवासिनोऽहमिन्द्राः संख्याता एव भवन्तीति ।
एवं चतुर्थस्थले देवगतौ देवानां संख्यानिरूपणत्वेन सप्तविंशतिसूत्राणि गतानि।इति श्रीषट्खण्डागमस्य क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखण्डे द्रव्यप्रमाणानुगमे गणिनीज्ञानमतीकृत-सिद्धांतचिंतामणिटीकायां गतिमार्गणानाम प्रथमोऽधिकारः समाप्तः।


अब सामान्यमनुष्य और लब्ध्यपर्याप्त मनुष्यों की संख्या निरूपण करने हेतु छह सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

मनुष्यगति में मनुष्य और मनुष्य अपर्याप्त द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा कितने हैं ?।।२२।।

मनुष्य और मनुष्य अपर्याप्त द्रव्यप्रमाण से असंख्यात है।।२३।।

मनुष्य और मनुष्यअपर्याप्तक काल की अपेक्षा असंख्यातासंख्यात अवसर्पिणी उत्सर्पिणियों से अपहृत होते हैं।।२४।।

क्षेत्र की अपेक्षा मनुष्य व मनुष्यअपर्याप्त जगत्श्रेणी के असंख्यातवें भाग प्रमाण हैं।।२५।।

उस जगत्श्रेणी के असंख्यातवें भागरूप श्रेणी अर्थात् पंक्ति का आयाम असंख्यात योजनकोटि है।।२६।।

सूच्यंगुल के प्रथम वर्गमूल को उसके ही तृतीय वर्गमूल से गुणित करने पर जो लब्ध आवे उसे शलाकारूप से स्थापित कर रूपाधिक मनुष्यों और रूपाधिक मनुष्य अपर्याप्तों द्वारा जगश्रेणी अपहृत होती है।।२७।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-मनुष्यगति में सामान्य मनुष्य में तीनों प्रकार के मनुष्य गर्भित हो जाते हैं। अपर्याप्त मनुष्य अर्थात् लब्ध्यपर्याप्तक मनुष्य, मनुष्यिनी स्त्रियों की कांख-कुक्षि स्थानों में उत्पन्न होते हैं।

अब पर्याप्तमनुष्य एवं योनिमती मनुष्यों का द्रव्यप्रमाण प्रतिपादन करने हेतु दो सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

पर्याप्त मनुष्य और मनुष्यिनियाँ द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा कितनी हैं ?।।२८।।

कोड़ाकोड़ाकोड़ी के ऊपर और कोड़ाकोड़ाकोड़ाकोड़ी के नीचे अर्थात् छह वर्गों के ऊपर तथा सात वर्गों के नीचे अर्थात् छठे और सातवें वर्ग के बीच की संख्याप्रमाण मनुष्य पर्याप्त व मनुष्यिनियाँ हैं।।२९।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-इस प्रकार यद्यपि सामान्य से सूत्र में कहा है, तथापि आचार्य परम्परा से आये हुए गुरु के अविरुद्ध उपदेश से पंचम वर्ग से घनप्रमाण मनुष्य पर्याप्त राशि है, इस प्रकार ग्रहण करना चाहिए। उसका प्रमाण यह है-७९२२८१६२५१४२६४३३७५९३५४३९५०३३६। यहाँ गाथासूत्र प्रस्तुत है- गाथार्थ-तकारादि अक्षरों से सूचित क्रमश: छह, तीन, तीन, शून्य, पाँच, नौ, तीन, चार, पाँच, तीन, नौ, पाँच, सात, तीन, तीन, चार, छह, दो, चार, एक, पाँच, दो, छह, एक, आठ, दो, दो, नौ और सात ये मनुष्यपर्याप्तराशि की संख्या के अंक हैं।।

किस अंक का बोध किस अक्षर से होता है ? इसका परिज्ञान कराने के लिए एक गाथा है- गाथार्थ-क-ख इत्यादि नौ अक्षरों से क्रमश: एक, दो आदि नौ संख्या तक ग्रहण करना चाहिए। जैसे-क ख ग घ ङ। च छ ज झ ञ। इसी प्रकार ट-ठ इत्यादि से भी एक-दो-दो क्रम से नौ तक, प से म तक पाँच और य से ह तक आठ अक्षरों से क्रमश: एक-दो आदि आठ तक अंकों का ग्रहण करना चाहिए। स्वर, ञ और न शून्य के सूचक हैं। मात्रा और उपरिम अक्षर को छोड़ देना चाहिए, अर्थात् उससे किसी अंक का बोध नहीं होता है।।

इस गाथा से उपर्युक्त प्राकृत गाथा का अर्थ बोध होता है। उसी प्राकृत गाथा के अनुसार पर्याप्त मनुष्यों की संख्या का ज्ञान होता है।

यहाँ कोई शंका करता है कि-यह उपदेश कोड़ाकोड़ाकोड़ाकोड़ी से नीचे इस सूत्र से कैसे विरोध को प्राप्त नहीं होता है ?

तब आचार्य समाधान देते हैं कि-इसमें कोई विरोध नहीं है, क्योंकि एक कोड़ाकोड़ाकोड़ाकोड़ी से लेकर एक कम दस कोड़ाकोड़ाकोड़ाकोड़ी तक इन सबको भी कोड़ाकोड़ाकोड़ाकोड़ी पद से ग्रहण किया गया है और इस स्थान के उत्कृष्ट का उल्लंघन कर मनुष्यपर्याप्तराशि स्थित नहीं है, क्योंकि उसका अवस्थान आठ कोड़ाकोड़ाकोड़ाकोड़ी के नीचे देखा जाता है।

पर्याप्तमनुष्यराशि के चार भागों में से तीन भाग प्रमाण मनुष्यिनियाँ हैं और एक चतुर्थांश पुरुष व नपुंसक राशि है।

इस प्रकार तृतीय स्थल में मनुष्यों का द्रव्यप्रमाण कथन करने वाले आठ सूत्र पूर्ण हुए।

अब देवगति में देवों की संख्या निरूपण करने हेतु चार सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

देवगति में देव द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा कितने हैं ?।।३०।।

देवगति में देव द्रव्यप्रमाण से असंख्यात हैं।।३१।।

देव काल की अपेक्षा असंख्यातासंख्यात अवसर्पिणी-उत्सर्पिणियों से अपहृत होते हैं।।३२।।

क्षेत्र की अपेक्षा देवों का प्रमाण जगत्प्रतर के दो सौ छप्पन अंगुलों के वर्गरूप प्रतिभाग से प्राप्त होता है।।३३।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-‘‘असंख्यात’’ इस शब्द के द्वारा संख्यात व अनन्त का प्रतिषेध किया गया है। कहा भी है- श्लोकार्थ-श्रुति पर के अभीष्ट का निराकरण करती है और अपने अभीष्ट अर्थ को कहती है। जिस प्रकार प्रभा अंधकार को नष्ट करती हुई प्रकाशनीय पदार्थ का प्रकाशन करती है।।

अर्थात् जैसे प्रभा-सूर्य की रश्मियाँ अंधकार को नष्ट कर देती हैं और प्रकाशनीय-प्रकाशित होने योग्य पर पदार्थ को प्रकाशित कर देती हैं, वैसे ही श्रुति-शास्त्र पर-दूसरों के अभीष्ट-इच्छित अर्थ का निराकरण करके अपने अभीष्ट अर्थ का कथन करता है।

काल की अपेक्षा असंख्यातासंख्यात अवसर्पिणी और उत्सर्पिणी कालों के द्वारा देव अपहृत होते हैं। अब क्षेत्र की अपेक्षा कथन किया जा रहा है-दो सौ छप्पन अंगुलों का वर्ग पैंसठ हजार पाँच सौ छत्तिस प्रतरांगुल प्रमाण होता है। इसके द्वारा जगत्प्रतर में भाग देने पर जो लब्ध आता है, वह देवराशि का प्रमाण होता है।

अब भवनत्रिक देवों की संख्या का प्रतिपादन करने हेतु ग्यारह सूत्रों को अवतरित किया जा रहा है-

सूत्रार्थ-

भवनवासी देव द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा कितने हैं ?।।३४।।

भवनवासी देव द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा असंख्यात हैं।।३५।।

काल की अपेक्षा भवनवासी देव असंख्यातासंख्यात अवसर्पिणी-उत्सर्पिणियों से अपहृत होते हैं।।३६।।

क्षेत्र की अपेक्षा भवनवासी देव असंख्यात जगत्श्रेणी प्रमाण हैं।।३७।।

उक्त असंख्यात जगत्श्रेणियाँ जगप्रतर के असंख्यातवें भाग प्रमाण हैं।।३८।।

उन असंख्यात जगत्श्रेणियों की विष्कम्भसूची सूच्यंगुल को सूच्यंगुल के वर्गमूल से गुणित करने पर जो लब्ध हो, उतनी है।।३९।।

वानव्यन्तर देव द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा कितने हैं ?।।४०।।

वानव्यन्तर देव द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा असंख्यात हैं।।४१।।

काल की अपेक्षा वानव्यन्तर देव असंख्यातासंख्यात अवसर्पिणी-उत्सर्पिणियों से अपहृत होते हैं।।४२।।

क्षेत्र की अपेक्षा वानव्यन्तर देवों का प्रमाण जगत्प्रतर के संख्यात सौ योजनों के वर्गरूप प्रतिभाग से प्राप्त होता है।।४३।।

ज्योतिषी देवों का प्रमाण देवगति के समान है।।४४।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-शब्दार्थ की अपेक्षा सूत्रों का अर्थ सुगम है। भवनवासी देव क्षेत्र की अपेक्षा असंख्यात जगत् श्रेणी प्रमाण हैं और जगत्प्रतर के असंख्यातवें भागप्रमाण हैं। उन जगत् श्रेणियों की विष्कंभसूची कहते हैं- सूच्यंगुल को उसी के प्रथम वर्गमूल से गुणित करने पर उन असंख्यात जगच्छ्रेणियों की विष्कंभसूची होती है।

वानव्यन्तर देवों की संख्या द्रव्यप्रमाण से संख्यात होती है। काल की अपेक्षा ये देव असंख्यातासंख्यात अवसर्पिणी और उत्सर्पिणी कालों के द्वारा अपहृत होते हैं। क्षेत्र की अपेक्षा तत्प्रायोग्य संख्यात सौ योजनों का वर्ग करके उससे जगत्प्रतर के अपवर्तित करने पर वानव्यन्तर देवों का प्रमाण होता है। सामान्य से ज्योतिषी देवों का प्रमाण सामान्य देवगति के भंगों के समान होता है।

अब सौधर्म-ईशान स्वर्ग से लेकर सहस्रार स्वर्ग पर्यन्त के देवों की संख्या कथन हेतु सात सूत्र अवतरित किये जा रहे हैं-

सूत्रार्थ-

सौधर्म एवं ईशान कल्पवासी देव द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा कितने हैं ?।।४५।।

सौधर्म व ईशान कल्पवासी देव द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा असंख्यात हैं।।४६।।

सौधर्म-ईशान कल्पवासी देव काल की अपेक्षा असंख्यातासंख्यात अवसर्पिणी उत्सर्पिणियों से अपहृत होते हैं।।४७।।

पूर्वोक्त देव क्षेत्र की अपेक्षा असंख्यात जगत्श्रेणी प्रमाण हैं।।४८।।

ये असंख्यात जगत्श्रेणियाँ जगत्प्रतर के असंख्यात भागप्रमाण हैं।।४९।।

उन असंख्यात जगत्श्रेणियों की विष्कंभसूची सूच्यंगुल के तृतीय वर्गमूल से गुणित सूच्यंगुल के द्वितीय वर्गमूलप्रमाण है।।५०।।

सनत्कुमार से लेकर शतार-सहस्रार कल्प तक के कल्पवासी देवों का प्रमाण सप्तम पृथिवी की संख्या के समान है।।५१।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-घनांगुल के तृतीय वर्गमूल मात्र जगत्श्रेणी प्रमाण सौधर्म और ईशान कल्पों में देव होते हैं। सनत्कुमार और माहेन्द्र कल्प में, ब्रह्म-ब्रह्मोत्तर में, लांतव-कापिष्ठ में, शुक्र-महाशुक्र में तथा शतार-सहस्रार स्वर्ग में क्रमश: जगत् श्रेणी के ग्यारहवें, नौवें, सातवें, पांचवें एवं चौथे वर्गमूलों की जगत्श्रेणी के भागहाररूप से उपलब्ध होते हैं।

प्रश्न-ये भागहार यहाँ होते हैं ऐसा कैसे जाना जाता है ?

उत्तर-आचार्य परम्परा से आये हुए विरोधरहित उपदेश से ऐसा जाना जाता है।

अब आनत स्वर्ग से लेकर सर्वार्थसिद्धि विमान पर्यन्त देवों का द्रव्यप्रमाण बतलाने हेतु पाँच सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

आनत विमान से लेकर अपराजित विमान तक के विमानवासी देव द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा कितने हैं ?।।५२।।

उक्त देव द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा पल्योपम के असंख्यातवें भागप्रमाण हैं।।५३।।

इन देवों के द्वारा अन्तर्मुहूर्त से पल्योपम अपहृत होता है।।५४।।

सर्वार्थसिद्धिविमानवासी देव द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा कितने हैं ?।।५५।।

सर्वार्थसिद्धिविमानवासी देव द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा संख्यात हैं।।५६।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-आनत स्वर्ग से लेकर अपराजित विमानवासी तक के देवों से अन्तर्मुहूर्त के द्वारा पल्योपम अपहृत होता है। यहाँ आवली का असंख्यातवाँ भाग अथवा संख्यात आवलियाँ अन्तर्मुहूर्त नहीं है, किन्तु यहाँ असंख्यात आवलियाँ अन्तर्मुहूर्त हैं, ऐसा ग्रहण करना चाहिए।

शंका-असंख्यात आवलियों को अन्तर्मुहूर्तपना कैसे बन सकता है ?

समाधान-कार्य में कारण का उपचार करने से असंख्यात आवलियों के अन्तर्मुहूर्तपना बनने में कोई विरोध नहीं आता है।

सर्वार्थसिद्धिविमानवासी अहमिन्द्र देव संख्यात ही होते हैं।

इस तरह से चतुर्थ स्थल में देवगति में देवों की संख्या निरूपण करने वाले सत्ताईस सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम ग्रंथ में क्षुद्रकबंध नाम के द्वितीय खण्ड में द्रव्यप्रमाणानुगम में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणिटीका में गतिमार्गणा नाम का प्रथम अधिकार समाप्त हुआ।