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०१.गति मार्गणा अधिकार

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गति मार्गणा अधिकार

अथ गतिमार्गणाधिकार:

अथ तावत्प्रथमतः चतुर्भि:स्थलैः सप्तदशसूत्रैः गतिमार्गणानाम प्रथमोऽधिकारः प्रारभ्यते। तत्र प्रथमस्थले नरकगतौ क्षेत्रनिरूपणत्वेन ‘‘खेत्ताणुगमेण’’ इत्यादिसूत्रत्रयं। तदनु द्वितीयस्थले तिर्यग्गतौ क्षेत्रस्थान-कथनपरत्वेन ‘‘तिरिक्खगदीए’’ इत्यादिना चत्वारि सूत्राणि। ततः परं तृतीयस्थले मनुष्यगतौ क्षेत्रवर्णनपरत्वेन ‘‘मणुसगदीए’’ इत्यादि सूत्रसप्तकं। तदनंतरं चतुर्थस्थले देवगतौ क्षेत्रनिरूपणत्वेन ‘‘देवगदीए’’ इत्यादि सूत्रत्रयं इति पातनिका कथितास्ति ।
इदानीं गतिमार्गणायां नरकगतौ नारकाणां क्षेत्रनिरूपणाय सूत्रत्रयमवतार्यते-
खेत्ताणुगमेण गदियाणुवादेण णिरयगदीए णेरइया सत्थाणेण समुग्घादेण उववादेण केवडिखेत्ते ?।।१।।
लोगस्स असंखेज्जदिभागे।।२।।
एवं सत्तसु पुढवीसु णेरइया।।३।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-आगमे स्वस्थानं द्विविधं-स्वस्थानस्वस्थानं विहारवत्स्वस्थानमिति। वेदनाकषाय-वैक्रियिक-मारणान्तिक-तैजस-आहारक-केवलिसमुद्घातभेदैः समुद्घातः सप्तधा। उपपादो द्विविधः-ऋजुगतिपूर्वको विग्रहगतिपूर्वकश्चेति ।
अत्र नरकगतौ नारकाणां स्वस्थानं द्विविधमपि वर्तते। वेदना-कषाय-वैक्रियिक-मारणान्तिकभेदेन समुद्घातश्चतुर्विधोऽस्ति। विंâच-नारकेषु आहारकसमुद्घातो नास्ति महद्र्धिप्राप्तानां ऋषीणामभावात्। केवलिसमुद्घातोऽपि नास्ति, तत्र सम्यक्त्वं मुक्त्वा व्रतगन्धस्यापि अभावो वर्तते। तैजससमुद्घातोऽपि तत्र न युज्यते, विना महाव्रतैस्तदभावोऽस्ति।
तत्र वेदनावशेन स्वशरीरात् बाह्यमेकप्रदेशमादिं कृत्वा यावदुत्कृष्टेन स्वशरीरत्रिगुणविस्फूर्जनं वेदनासमुद्घातो नाम। कषायतीव्रतया स्वशरीरात् जीवप्रदेशानां त्रिगुणविस्फूर्जनं कषायसमुद्घातो नाम। विविधद्र्धिमाहात्म्येन संख्यातासंख्यातयोजनानि शरीरेण व्याप्य जीवप्रदेशानामवस्थानं वैक्रियिकसमुद्घातो नाम। आत्मात्मनः स्थितप्रदेशात् यावदुत्पद्यमानक्षेत्रं इति आयामेन एकप्रदेशमादिं कृत्वा यावदुत्कर्षेण शरीरत्रिगुणबाहल्येन कांडैकस्तंभस्थित-तोरण-हल-गोमूत्राकारेण अंतर्मुहूर्तावस्थानं मारणान्तिकसमुद्घातो नाम।
उपपादो द्विविधः-ऋजुगतिपूर्वको विग्रहगतिपूर्वकश्च। तत्र एकैकोऽपि द्विविधः-मारणान्तिकसमुद्घात-पूर्वकस्तद्विपरीतकश्चेति।
तैजसशरीरं द्विविधं-प्रशस्तमप्रशस्तं च । अनुकंपानिमित्तात् दक्षिणांसविनिर्गतं राष्ट्रविप्लव-मारि-रोगादिप्रशमक्षमतः स्वपरहितं श्वेतवर्णं नव-द्वादशयोजनरुन्द्रायामं प्रशस्तं नाम, तद्विपरीतमितरदप्रशस्तं।
 आहारसमुद्घातो नाम-हस्तप्रमाणेन सर्वांगसुंदरेण समचतुरस्रसंस्थानेन हंसधवलेन रस-रुधिर-मांस-मेदास्थि-मज्जा-शुक्रसप्तधातुवर्जितेन विषाग्नि-शस्त्रादिसकलबाधामुत्तेन वङ्का-शिला-स्तंभ-पर्वत-गमनदक्षेण स्वशीर्षादुद्गतेन देहेन तीर्थकरपादमूलगमनं।
दण्डकपाटप्रतरलोकपूरणानि केवलिसमुद्घातो नाम।
आत्मात्मनः उत्पन्नग्रामादीनां सीम्नोऽन्तः परिभ्रमणं स्वस्थानस्वस्थानं नाम। तस्मात् बाह्यप्रदेशे हिंडनं विहारवत्स्वस्थानं नाम।
तत्र ‘नारकाः आत्मनः पदैः कियत्क्षेत्रे भवन्ति’ इति आशंकासूत्रं।
एवमाशंक्य आचार्यवर्येण श्रीभूतबलि-देवेन उत्तरसूत्रं भणितं-
इमे नारकाः स्वस्थानेन समुद्घातेन उपपादेन लोकस्यासंख्यातभागे क्षेत्रे निवसंति।
अत्र लोकः पंचविधः-ऊध्र्वलोकः अधोलोकः तिर्यग्लोकः मनुष्यलोकः सामान्यलोकश्चेति। सूत्रे लोकग्रहणेन एतेषां पंचानां अपि लोकानां ग्रहणं कर्तव्यं।
कुतः ?
देशामर्शकत्वात्। इमे नारकाः सर्वपदैः चतुर्णां लोकानामसंख्यातभागे भवन्ति, मनुष्यलोकादसंख्यातगुणे च । तद्यथा-स्वस्थानस्वस्थानराशिः मूलराशेः संख्यातबहुभागाः, विहारवत्स्वस्थान-वेदना-कषाय-वैक्रियिक-समुद्घातराशयः मूलराशेः संख्यातभागप्रमाणाः।
अत्र विशेषः-वेदना-कषाय-वैक्रियिकसमुद्घातेषु अवगाहना नवगुणी गृहीतव्या। अन्यच्च-तत्रासंख्यातभागप्रमाणजीवाः मारणान्तिकसमुद्घातं विनैव कालं कुर्वन्ति, तथा तत्र बहुपुण्यशालिनां प्राणिनां अभावात् असंख्यातबहुभागप्रमाणजीवाः मारणान्तिकसमुद्घातं कुर्वन्ति१। एवं सप्तसु पृथिवीषु नारकाणां क्षेत्रप्ररूपणा ज्ञातव्या।
एवं प्रथमस्थले नारकाणां क्षेत्रप्ररूपणानिरूपणत्वेन सूत्रत्रयं गतम् ।
संप्रति तिर्यग्गतौ तिरश्चां क्षेत्रनिरूपणाय सूत्रचतुष्टयमवतार्यते-
तिरिक्खगदीए तिरिक्खा सत्थाणेण समुग्घादेण उववादेण केवडिखेत्ते ?।।४।।
सव्वलोए।।५।।
पंचिंदियतिरिक्ख-पंचिंदियतिरिक्खपज्जत्ता पंचिंदियतिरिक्खजोणिणी पंचिंदियतिरिक्खअपज्जत्ता सत्थाणेण समुग्घादेण उववादेण केवडिखेत्ते ?।।६।।
लोगस्स असंखेज्जदिभागे।।७।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-स्वस्थानस्वस्थान-विहारवत्स्वस्थान-वेदना-कषाय-वैक्रियिक-मारणान्तिक-उपपादपदानि तिर्यक्षु सन्ति, अवशेषाणि न संति।

अथ गतिमार्गणा अधिकार प्रारंभ

अब उनमें से सर्वप्रथम चार स्थलों में सत्रह सूत्रों के द्वारा गतिमार्गणा नाम का प्रथम अधिकार प्रारंभ हो रहा है। उनमें से प्रथम स्थल में नरक गति में क्षेत्र निरूपण की मुख्यता वाले ‘‘खेत्ताणुवादेण’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। पुन: द्वितीय स्थल में तिर्यंच गति में क्षेत्रस्थान का कथन करने वाले ‘‘तिरिक्खगदीए’’ इत्यादि चार सूत्र हैं। आगे तृतीय स्थल में मनुष्यगति में क्षेत्र का वर्णन करने वाले ‘‘मणुसगदीए’’ इत्यादि सात सूत्र हैं। तदनन्तर चतुर्थ स्थल में देवगति में क्षेत्र का निरूपण करने वाले ‘‘देवगदीए’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। यह सूत्रों की समुदायपातनिका कही गई है।

अब गतिमार्गणा में नरकगति में नारकियों का क्षेत्र निरूपण करने हेतु तीन सूत्र अवतरित किये जाते हैं-

सूत्रार्थ-

क्षेत्रानुगम में गतिमार्गणा के अनुसार नरकगति में नारकी जीव स्वस्थान, समुद्घात और उपपाद की अपेक्षा कितने क्षेत्र में रहते हैं ?।।१।।

नारकी जीव उक्त तीन पदों से लोक के असंख्यातवें भाग में रहते हैं।।२।।

इसी प्रकार सात पृथिवियों में नारकी जीव पूर्वोक्त पदों की अपेक्षा लोक के असंख्यातवें भाग में रहते हैं।।३।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-आगम में स्वस्थान दो प्रकार का बताया गया है-१. स्वस्थानस्वस्थान २. विहारवत्स्वस्थान। वेदना, कषाय, वैक्रियिक, मारणान्तिक, तैजस, आहारक और केवली समुद्घात के भेद से समुद्घात सात प्रकार का होता है। उपपाद के दो भेद हैं-ऋजुगतिपूर्वक और विग्रहगतिपूर्वक।

यहाँ नरकगति में नारकियों का स्वस्थान दोनो प्रकार का भी होता है। वेदना, कषाय, वैक्रियिक और मारणांतिक के भेद से समुद्घात चार प्रकार का है। यहाँ नारकियों में आहारक समुद्घात नहीं है, क्योंकि महद्र्धिप्राप्त ऋषियों का वहाँ अभाव है। केवलिसमुद्घात भी नहीं है, क्योंकि वहाँ सम्यक्त्व को छोड़कर व्रत की गंध भी नहीं है। तैजस समुद्घात भी वहाँ नहीं है, क्योंकि महाव्रतों के ग्रहण किये बिना तैजससमुद्घात नहीं होता है। इनमें वेदना के वश से अपने शरीर से बाहर एक प्रदेश से लेकर उत्कृष्ट से अपने शरीर से तीन गुने आत्मप्रदेशों के पैâलने का नाम वेदनासमुद्घात है। कषाय की तीव्रता से जीव प्रदेशों का अपने शरीर से तिगुणे प्रमाण पैâलने को कषायसमुद्घात कहते हैं। विविध ऋद्धियों के माहात्म्य से संख्यात व असंख्यात योजनों को शरीर से व्याप्त करके जीवप्रदेशों के अवस्थान को वैक्रियिकसमुद्घात कहते हैं। आयाम की अपेक्षा अपने-अपने रहने के प्रदेश से लेकर उत्पन्न के क्षेत्र तक तथा बाहल्य से एक प्रदेश से लेकर उत्कृष्ट से शरीर से तिगुणे बाहल्यरूप (जीवप्रदेशों के) काण्ड, एक खम्भस्थित तोरण, हल व गोमूत्र के आकार से अन्तर्मुहूर्त तक रहने को मारणान्तिक समुद्घात कहते हैं।

उपपाद दो प्रकार का है-ऋजुगतिपूर्वक और विग्रहगतिपूर्वक। इनमें दोनों भेद भी मारणान्तिक समुद्घातपूर्वक और तद्विपरीत-मारणान्तिक समुद्घातरहित के भेद से दो-दो प्रकार के होते हैं।

तैजस शरीर प्रशस्त और अप्रशस्त के भेद से दो-दो प्रकार के होते है। उनमें अनुकम्पा से प्रेरित होकर दाहिनी वंâधे से निकले हुए राष्ट्रविप्लव, मारी रोग आदि विशेष के शांत करनेरूप से अपना और दूसरे का हितकारक श्वेतवर्ण तथा नौ योजन विस्तृत एवं बारह योजन दीर्घ समुद्घात को प्रशस्त और इससे विपरीत को अप्रशस्त तैजस समुद्घात कहते हैं।

हस्तप्रमाण, सर्वांगसुन्दर, समचतुरस्रसंस्थान संयुक्त हंस के समान धवल, रस, रुधिर, मांस, मेदा, अस्थि, मज्जा और शुक्र, इन सात धातुओं से रहित विष, अग्नि एवं शस्त्रादि समस्त बाधाओं से मुक्त वङ्का, शिला, स्तंभ, जल व पर्वत में से गमन करने में दक्ष तथा अपने मस्तक से उत्पन्न हुए शरीर से तीर्थंकर के पादमूल में जाने का नाम आहारकसमुद्घात है।

दण्ड, कपाट, प्रतर और लोकपूरणरूप जीव प्रदेशों की अवस्था को केवलिसमुद्घात कहते हैं। अपने-अपने उत्पन्न होने के ग्रामादिकों की सीमा के भीतर परिभ्रमण करने को स्वस्थानस्वस्थान और इससे बाह्य प्रदेश में घूमने को विहारवत्स्वस्थान कहते हैं।

उनमें ‘नारकी जीव अपने पदों से कितने क्षेत्र में रहते हैं’ यह आशंकासूत्र है- इस प्रकार आशंका करके आचार्यवर्य श्री भूतबली देव ने उत्तर सूत्र कहा है।

ये नारकी जीव स्वस्थानरूप समुद्घात से उपपाद से लोक के असंख्यातवें भाग में रहते हैं।

यहाँ लोक पाँच प्रकार का है-ऊध्र्वलोक, अधोलोक, तिर्यग्लोक, मनुष्यलोक और सामान्यलोक। यहाँ सूत्र में लोक के ग्रहण से इन पाँचों ही लोकों का ग्रहण करना चाहिए।

ऐसा क्यों ?

क्योंकि यह सूत्र देशामर्शक है। नारकी जीव सर्वपदों से चार लोकों के असंख्यातवें भाग में और मनुष्यलोक से असंख्यातगुणे क्षेत्र में रहते हैं, वह इस प्रकार है-स्वस्थानस्वस्थानराशि मूलराशि के संख्यात बहुभाग है तथा विहारवत्स्वस्थानराशि, वेदनासमुद्घातराशि, कषायसमुद्घातराशि एवं वैक्रियिकसमुद्घात- राशि, ये राशियाँ मूलराशि के संख्यातवें भाग प्रमाण होती हैं।

यहाँ विशेषता यह है कि-वेदनासमुद्घात, कषायसमुद्घात और वैक्रियिक समुद्घात में आत्मप्रदेशों की अवगाहना शरीर से नौ गुणी जानना चाहिए और दूसरी बात यह है कि वहाँ असंख्यात भागप्रमाणजीव मारणांतिक समुद्घात के बिना ही काल-मरण करते हैं तथा वहाँ बहुत पुण्यवान प्राणियों का अभाव होने से असंख्यातवें भागमात्र ऋजुगति से मारणान्तिक समुद्घात करते हैं। इस प्रकार सातों पृथिवियों में नारकियों की क्षेत्रप्ररूपणा जानना चाहिए।

इस प्रकार प्रथम स्थल में नारकियों की क्षेत्रप्ररूपणा का निरूपण करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

अब तिर्यंचगति में तिर्यंचों का क्षेत्रनिरूपण करने हेतु चार सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

तिर्यंचगति में तिर्यंच स्वस्थान, समुद्घात और उपपादपद की अपेक्षा कितने क्षेत्र में रहते हैं ?।।४।।

तिर्यंच जीव उक्त पदों की अपेक्षा सर्वलोक में रहते हैं।।५।।

पंचेन्द्रिय तिर्यंच, पंचेन्द्रिय तिर्यंच पर्याप्त, पंचेन्द्रिय तिर्यंच योनिमती और पंचेन्द्रिय तिर्यंच अपर्याप्त जीव स्वस्थान समुद्घात और उपपादपद की अपेक्षा कितने क्षेत्र में रहते हैं ?।।६।।

उक्त चार प्रकार के तिर्यंच जीव उक्त पदों से लोक के असंख्यातवें भाग प्रमाण क्षेत्र में रहते हैं।।७।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-स्वस्थानस्वस्थान, विहारवत्स्वस्थान, वेदनासमुद्घात, कषायसमुद्घात, वैक्रियिकसमुद्घात, मारणान्तिकसमुद्घात और उपपाद ये पद तिर्यंचों में होते हैं, शेष पद उनके नहीं होते हैं। इन पदों की अपेक्षा तिर्यंच जीव कितने क्षेत्र में रहते हैं इस प्रकार आशंका करके उसका परिहार करते हैं- वे सर्वलोक में रहते हैं।

कैसे ?

क्योंकि, वे अनन्त है। अनन्त होने से वे लोक में नहीं समाते हैं ऐसी आशंका नहीं करनी चाहिए, क्योंकि लोकाकाश में अनन्त अवगाहनशक्ति संभव है। यह सामान्य तिर्यंचों का कथन जानना चाहिए।

शेष चार प्रकार के पंचेन्द्रिय तिर्यंचों का क्षेत्र लोक के असंख्यातवें भाग प्रमाण जानना चाहिए।

इस प्रकार द्वितीय स्थल में तिर्यंचों का क्षेत्र निरूपण करने वाले चार सूत्र पूर्ण हुए।


अधुना मनुष्यगतौ मनुष्याणां क्षेत्रप्रतिपादनाय सूत्रसप्तकमवतार्यते-

मणुसगदीए मणुसा मणुसपज्जत्ता मणुसिणी सत्थाणेण उववादेण केवडिखेत्ते ?।।८।।

लोगस्स असंखेज्जदिभागे।।९।।
समुग्घादेण केवडिखेत्ते ?।।१०।।
लोगस्स असंखेज्जदिभागे।।११।।
असंखेज्जेसु वा भाएसु सव्वलोगे वा।।१२।।
मणुसअपज्जत्ता सत्थाणेण समुग्घादेण उववादेण केवडिखेत्ते ?।।१३।।
लोगस्स असंखेज्जदिभागे।।१४।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-मनुष्यगतौ मनुष्याः त्रिविधाः-सामान्यमनुष्याः पर्याप्तमनुष्याः स्त्रीवेदिमनुष्याश्च मानुषक्षेत्रस्य संख्यातभागे तिष्ठन्ति, एषां संख्यातजीवानां क्षेत्रग्रहणात्। इमे त्रिविधाः मनुष्याः उपपादगताः त्रयाणां लोकानामसंख्यातभागे नरतिर्यग्लोकाभ्यामसंख्यातगुणे क्षेत्रे तिष्ठन्ति, प्रधानीकृतमनुष्यापर्याप्तोपपाद-क्षेत्रात्। विशेषेण तु-मनुष्यपर्याप्त-मानुषीणामुपपादक्षेत्रं चतुर्णां लोकानामसंख्यातभागः सार्धद्वयद्वीपाद-संख्येयगुणं।
समुद्घातेन-वेदना-कषाय-वैक्रियिक-मारणान्तिक-तैजस-आहार-दण्ड-कपाट-प्रतर-लोकपूरण-समुद्घाताः संति।
अत्र मानुषीणां भाववेदानामपि तैजसाहारौ समुद्घातौ न स्तः। प्रतरलोकपूरणसमुद्घातापेक्षया लोकस्यासंख्यातभागे सर्वलोके च तिष्ठन्ति, जीवप्रदेशविरहितलोकाकाशप्रदेशाभावात्।
एवं तृतीयस्थले मनुष्याणां क्षेत्रकथनत्वेन सप्त सूत्राणि गतानि।
अधुना देवगतौ देवानां क्षेत्रप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-
देवगदीए देवा सत्थाणेण समुग्घादेण उववादेण केवडिखेत्ते ?।।१५।।
लोगस्स असंखेज्जदिभागे।।१६।।
भवणवासियप्पहुडि जाव सव्वट्ठसिद्धिविमाणवासियदेवा देवगदिभंगो।।१७।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-अत्र देवगतौ तैजसाहारकेवलिसमुद्घाताः न संति देवेषु तेषामस्तित्वविरोधात्।
सर्वार्थसिद्धिविमानवासिनो देवाः स्वस्थानस्वस्थान-वेदना-कषाय-वैक्रियिकपदपरिणताः मानुषक्षेत्रस्य संख्यातभागे तिष्ठन्ति, तत्र सर्वार्थसिद्धौ वेदना-कषाय समुद्घातानां तेभ्यः समुत्पद्यमानस्तोकविसर्पणं प्रतीत्य तथोपदेशात् कारणे कार्योपचारात् वा।
एवं चतुर्थस्थले देवानां क्षेत्रनिरूपणत्वेन त्रीणि सूत्राणि गतानि।
इति श्रीषट्खण्डागमस्य क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखंडे क्षेत्रानुगमनामषष्ठे महाधिकारे गणिनी-ज्ञानमतीकृत-सिद्धांतचिंतामणिटीकायां गतिमार्गणानाम प्रथमोऽधिकारः समाप्तः ।


अब मनुष्यगति में मनुष्यों का क्षेत्र प्रतिपादन करने हेतु सात सूत्र अवतरित किये जाते हैं-

सूत्रार्थ-

मनुष्यगति में मनुष्य, मनुष्यपर्याप्त और मनुष्यिनी स्वस्थान व उपपाद पद की अपेक्षा कितने क्षेत्र में रहते हैं ?।।८।।

उक्त तीनों प्रकार के मनुष्य स्वस्थान व उपपाद पदों की अपेक्षा लोक के असंख्यातवें भाग क्षेत्र में रहते हैं।।९।।

उक्त तीनों प्रकार के मनुष्य समुद्घात से कितने क्षेत्र में रहते हैं ?।।१०।।

उक्त तीनों प्रकार के मनुष्य समुद्घात की अपेक्षा लोक के असंख्यातवें भाग में रहते हैं।।११।।

समुद्घात की अपेक्षा उक्त तीनों प्रकार के मनुष्य लोक के असंख्यात बहुभागों में अथवा सर्वलोक में रहते हैं।। १२।।

मनुष्य अपर्याप्त स्वस्थान, समुद्घात और उपपाद की अपेक्षा कितने क्षेत्र में रहते हैं ?।।१३।।

मनुष्य अपर्याप्त पूर्वोक्त तीनों पदों की अपेक्षा लोक के असंख्यातवें भाग क्षेत्र में रहते हैं।।१४।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-मनुष्यगति में मनुष्य तीन प्रकार के होते हैं-सामान्यमनुष्य, पर्याप्त मनुष्य और स्त्रीवेदी मनुष्य। ये सभी मानुषक्षेत्र के संख्यातवें भाग में रहते हैं, क्योंकि यहाँ पर इन संख्यात जीवों के क्षेत्र का ग्रहण है। उपपाद पद को प्राप्त ये तीनों प्रकार के मनुष्य तीनों लोकों के असंख्यातवें भाग में तथा मनुष्यलोक व तिर्यग्लोक से असंख्यातगुणे क्षेत्र में रहते हैं, क्योंकि यहाँ मनुष्य अपर्याप्तों के उपपाद क्षेत्र की प्रधानता है। विशेषता यह है कि-मनुष्य पर्याप्त और मनुष्यिनियों का उपपादक्षेत्र चार लोकों के असंख्यातवें भाग तथा ढाई द्वीप से असंख्यातगुणा क्षेत्र में है।

समुद्घात पद से वेदना, कषाय, वैक्रियिक, मारणान्तिक, तैजस, आहार, दण्ड, कपाट, प्रतर और लोकपूरण, इन सब समुद्घातों का संग्रह किया गया है।

यहाँ भाववेदी मनुष्यिनियों के भी तैजस और आहारकशरीर नहीं होते हैं। प्रतर और लोकपूरण समुद्घात की अपेक्षा लोक के असंख्यातवें भाग में तथा सम्पूर्ण लोक में वे भाववेदी मनुष्य रहते हैं, क्योंकि जीव प्रदेशों से विरहित लोकाकाश प्रदेशों का अभाव पाया जाता है अर्थात् इस अवस्था में जीवप्रदेशों से रहित लोकाकाश के प्रदेशों का अभाव है।

इस प्रकार तृतीय स्थल में मनुष्यों का क्षेत्र कथन करने वाले सात सूत्र पूर्ण हुए।

अब देवगति में देवों का क्षेत्र निरूपण करने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

देवगति में देव स्वस्थान, समुद्घात और उपपाद से कितने क्षेत्र में रहते हैं ?।।१५।।

देव उपर्युक्त पदों से लोक के असंख्यातवें भाग में रहते हैं।।१६।।

भवनवासियों से लेकर सर्वार्थसिद्धिविमानवासी देवों तक का क्षेत्र देवगति के समान है।।१७।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-यहाँ देवगति में तैजससमुद्घात, आहारकसमुद्घात और केवलिसमुद्घात नहीं है, क्योंकि देवों में इनके अस्तित्व का विरोध पाया जाता है।

सर्वार्थसिद्धिविमानवासी देव स्वस्थानस्वस्थान, वेदनासमुद्घात, कषायसमुद्घात और वैक्रियिकसमुद्घात इन पदों से परिणत होकर मानुषक्षेत्र के संख्यातवें भाग में रहते हैं, क्योंकि सर्वार्थसिद्धि विमान में वेदनासमुद्घात और कषायसमुद्घातों को प्राप्त उनमें उत्पन्न होने वाले देवों के स्तोक विसर्पण की अपेक्षा करके उस प्रकार का उपदेश दिया जाता है अथवा कारण में कार्य का उपचार करने से वैसा उपदेश किया गया है।

इस प्रकार से चतुर्थ स्थल में देवों का क्षेत्र निरूपण करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार श्रीषट्खण्डागम ग्रंथ में क्षुद्रकबंध नाम के द्वितीय खण्ड में क्षेत्रानुगम नामक छठे महाधिकार में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणिटीका में गतिमार्गणा नाम का प्रथम अधिकार समाप्त हुआ।