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०१.षट्खण्डागम- प्रथम ग्रन्थ टीका की प्रशस्ति

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षट्खण्डागमप्रथमग्रंथस्य प्रशस्ति:

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जंबूद्वीपेऽथ प्राग्द्वीपे, भरतेऽप्यार्यखण्डके।

यावन्ति जिनबिम्बानि, स्तूयन्ते तानि भक्तित:।।१।।

पाश्र्वनाथं जिनं नत्वा, केवलज्ञानभूषितम्।
शारदां हृदि संस्थाप्य, वंदे सर्वान् गणीश्वरान्।।२।।

शासनं वीरनाथस्य, वर्तते भुवि सांप्रतम्।
गौतमादिमहर्षीणा - मनुवीचिपरंपरा।।३।।

षट्खण्डागम प्रथम ग्रंथ की प्रशस्ति का हिन्दी अनुवाद

श्लोकार्थ - मध्यलोक के प्रथम द्वीप जम्बूद्वीप में जो भरतक्षेत्र है उसके आर्यखण्ड में जितने भी जिनबिम्ब विराजमान हैं, उन सबकी मेरे द्वारा स्तुति की जाती है।।१।।

केवलज्ञान लक्ष्मी से विभूषित श्री पाश्र्वनाथ जिनेन्द्र को नमस्कार करके शारदा-सरस्वती माता को अपने हृदय में स्थापित करके मैं सभी गणधर देवों की वंदना करती हूँ।।२।।

वर्तमान में इस पृथिवीतल पर भगवान महावीर स्वामी का शासन चल रहा है और इन्द्रभूति गौतमगणधरस्वामी आदि महर्षियों की अनुवीचि-अविच्छिन्न क्रम परम्परा भी चल रही है।।३।।

संस्कृत
तस्यां च मूलसंघेऽस्मिन्, कुन्दकुन्ददान्वयो महान्।

बलात्कारगण: ख्यात:, शारदागच्छ इत्यपि।।४।।

एतस्यां मणिमालायां, प्रथमाचार्यविश्रुत:।
श्रीशान्तिसागराख्योऽसौ, चारित्रचक्रभृद् महान्।।५।।

तस्य पट्टाधिपोऽप्याद्य:, गुरु: श्रीवीरसागर:।
यस्माज्ज्ञानमती जाता, ह्यल्पज्ञाहं किलार्यिका।।६।।

श्री देशभूषण: सूरि-र्ममाद्यो विश्रुतो गुरु:।
यत्प्रसादात् गृहं त्यक्त्वा, लब्धं प्राक् क्षुल्लिकाव्रतम्।।७।।

गुरुभक्त्या सरस्वत्या:, प्रसादाच्च मया मनाक्।
शास्त्रमधीत्य शिष्याणा-मध्यापनरताभवम्।।८।।

मुनयोऽप्यार्यिकाश्चापि, ह्यनेके ब्रह्मचारिण:।
विद्यां शिक्षां गृहीत्वा मत्, कुर्वन्तीह प्रभावनाम्।।९।।

षट्खण्डागमग्रन्थस्य, प्राक्खण्डे सत्प्ररूपणा।
सूरिणा पुष्पदन्तेन, तत्सूत्राणि कृतानि वै।।१०।।

हिन्दी

उसी गुरुपरम्परा के मूलसंघ में इस समय आचार्य श्रीकुन्दकुन्द की आम्नाय में महान् बलात्कारगण एवं शारदा गच्छ भी विख्यात हैं।।४।।

इस परम्परारूपी मणिमाला में इस युग (बीसवीं शताब्दी) के प्रथम आचार्य के रूप में श्रीशांतिसागर नाम के महान् चारित्रचक्रवर्ती दिगम्बर मुनिराज हुए हैं।।५।।

उनके प्रथम पट्टशिष्य आचार्य श्रीवीरसागर जी गुरुदेव हुए हैं जिनसे मैं अल्पज्ञ आर्यिका दीक्षा ग्रहण कर ‘‘ज्ञानमती’’ रूप में प्रगट हुई अर्थात् ज्ञानमती नाम प्राप्त किया।।६।।

जिनकी कृपाप्रसाद से सर्वप्रथम गृहत्याग करके क्षुल्लिकादीक्षा धारण की थी, वे श्रीदेशभूषण नाम के आचार्यप्रवर मेरे आद्यगुरु हैं।।७।।

गुरुभक्ति एवं सरस्वती माता के प्रसाद से मैंने कुछ शास्त्रों का अध्ययन करके संघस्थ अनेक शिष्यों को उनका अध्यापन भी कराया है।।८।।

अनेक मुनि, आर्यिका एवं ब्रह्मचारी-ब्रह्मचारिणी मुझसे विद्या और शिक्षा को ग्रहण करके अद्यावधि खूब धर्मप्रभावना कर रहे हैं।।९।।

षट्खण्डागम ग्रंथ के प्रथम खण्ड में सत्प्ररूपणा नाम का जो प्रकरण है श्री पुष्पदन्त आचार्य ने उन सूत्रों की रचना की है अर्थात् उसके आगे के सूत्रों की रचना श्री भूतबली आचार्य ने की है।।१०।।

संस्कृत
राजस्थाने पिडावाख्ये, ग्रामे भक्तजनाश्रिते।

द्विद्विपंचद्विवीराब्दे, सप्तम्यां फाल्गुने सिते।।११।।

तस्य सदनुयोगस्य, सिद्धान्तज्ञानलब्धये।
टीका चिन्तामणिर्नाम्ना, सिद्धान्तादिरपूर्यत।।१२।।

तत्रस्थभाक्तिवैर्भक्त्या, श्रीपाश्र्वसमवसृते:।
अस्मद्मंगलसानिध्ये, शिलान्यासोऽथ कारित:।।१३।।

यावज्जैनेन्द्रधर्मोऽयं, नंद्याच्च भुवि शांतिकृत्।
तावच्चिन्तामणिर्नाम्ना, जीयाज्ज्ञानमतीकृति:।।१४।।

अर्हन्तो मंगलं कुर्यु:, पाश्र्वनाथश्च मंगलम्।
चतुर्विंशतितीर्थेशा, नित्यं कुर्वन्तु मंगलम्।।१५।।

शारदा गुरवश्चापि, कुर्युर्जगति मंगलम्।
जैनेन्द्रशासनं नित्यं, कुर्यात्सर्वस्य मंगलम्।।१६।।
।।इति शं भूयात्।।

हिन्दी

राजस्थान प्रान्त में पिड़ावा नाम का एक ग्राम है जहाँ भगवान् की भक्ति में अनुरक्त श्रावकगण निवास करते हैं, उस ग्राम में वीर निर्वाण संवत् पच्चीस सौ बाईस (२५२२) की फाल्गुन शुक्ला सप्तमी तिथि को (२५ फरवरी १९९६ को) मैं संघ सहित पहुँची।।११।।

उसी दिन पिड़ावा में इस सत्प्ररूपणा ग्रंथ की ‘‘सिद्धान्तचिंतामणि’’ नाम की टीका को मैंने लिखकर पूर्ण किया, यह टीका मेरे सैद्धान्तिकज्ञान को पूर्ण करने में निमित्त बने, यही भावना है।।१२।।

उसी फाल्गुन शुक्ला सप्तमी के दिन पिड़ावा के श्रद्धालु भक्तों ने मेरे ससंघ मंगल सानिध्य में श्रीपाश्र्वनाथ समवसरण रचना का शिलान्यास भी किया था।।१३।।

जब तक इस धरती पर जिनेन्द्र भगवान् का जैनधर्म सभी को शांति को प्रदान करता हुआ वृद्धि को प्राप्त होता रहे तब तक मुझ गणिनी ज्ञानमती द्वारा रचित यह ‘‘सिद्धान्तचिंतामणि’’ नाम की टीका भी पृथ्वी पर जयशील होती रहे, यही मेरी अभिलाषा है।।१४।।

अरिहंत परमेष्ठी हम सबके लिए मंगलकारी होवें एवं पाश्र्वनाथ तीर्थंकर भगवान् सबका मंगल करें तथा चौबीसो तीर्थंकर भगवान् नित्य ही मंगलप्रद होवें।।१५।।

सरस्वती माता एवं साधुपरमेष्ठी गुरुजन इस जगत् में मंगल करें तथा जिनेन्द्र भगवान् का जैनशासन नित्य ही सबका मंगल करे, यही मंगलभावना है।।१६।।

भावार्थ - षट्खण्डागम ग्रंथ के प्रथमखण्ड की टीका का समापन करते हुए पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने उपर्युक्त प्रशस्ति में अपनी गुरुपरम्परा का किनचित् परिचय प्रदान किया है तथा ग्रंथ समापन की मंगलबेला में अपनी हार्दिक प्रसन्नता भी व्यक्त की है जो प्रत्येक ग्रंथरचयिता की मनोभावना का परिचायक है।

।। इति शुभं।।