Whatsappicon.jpg
Whatsappicon.jpg
ज्ञानमती नेटवर्क से जुड़ने के लिये ADD ME < मोबाइल नं.> लिखकर +91 7599002108 पर व्हाट्सएप पर मेसेज करें|


दिव्यशक्ति ब्राह्मी-सुंदरी स्वरूपा गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ससंघ का मंगल चातुर्मास अवध की धरती जन्मभूमि टिकैतनगर में 15-7-19 से प्रारंभ हुआ |

पारस चैनल पर प्रातः ६ से ७ बजे तक देखें जिनाभिषेक एवं शांतिधारा पुन: ज्ञानमती माताजी - चंदनामती माताजी के प्रवचन ।

०१. आचार्य उपाध्याय साधु

ENCYCLOPEDIA से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

१. आचार्य उपाध्याय साधु

दिगम्बर मुनियों में मुख्यरूप से आचार्य, उपाध्याय और साधु ये तीन भेद होते हैं। इन तीनों का संक्षिप्त लक्षण देखिये।

आचार्य-‘‘जो पाँच प्रकार के आचारों का स्वयं आचरण कहते हैं और दूसरे साधुओं से आचरण कराते हैं वे ‘आचार्य' कहलाते हैं। जो चौदह विद्याओं के पारंगत, ग्यारह अंग के धारी अथवा आचारांगमात्र के धारी हैं अथवा तत्कालीन स्वसमय और परसमय में पारंगत हैं, मेरू के समान निश्चल, पृथ्वी के समान सहनशील, समुद्र के समान दोषों को बाहर फैक देने वाले और सात प्रकार के भय से रहित हैं, देश, कुल और जाति से शुद्ध हैं, जो शिष्यों के संग्रह और उन पर अनुग्रह करने में कुशल हैं, सूत्र के अर्थ में विशारद हैं, यशस्वी हैं, तथा सारण-आचरण, वारण-निषेध और शोधन-व्रतों की शुद्धि करने वाली क्रियाओं में उद्युक्त (उद्यमशील) हैं वे ही आचार्य परमेष्ठी कहलाते हैं।

संघ के आचार्य जब सल्लेखना ग्रहण के सम्मुख होते हैं तब वे अपने योग्य शिष्य को विधिवत् चतुर्विधसंघ के समक्ष आचार्यपद देकर नूतन पिच्छिका समर्पित कर देते हैं और ऐसा कहते हैं कि ‘‘आज से प्रायश्चित्त शास्त्र का अध्ययन करके शिष्यों को दीक्षा, प्रायश्चित्त आदि आचार्य का कार्य तुम्हें करना है। उस समय गुरू उस आचार्य को छत्तीस गुणों के पालन का उपदेश देते हैं।

आचार्य के छत्तीण गुण-आचारवत्त्व आदि ८, १२ तप, १० स्थितिकल्प और ६ आवश्यक ये छत्तीस गुण होते हैं।

आचारवत्त्व आदि ८ गुण-आचारवत्त्व, आधारवत्त्व, व्यवहारपटुता, प्रकारकत्व, आयापायदर्शिता, उत्पीलन, अपरिस्रवण और सुखावहन।

आचारवत्त्व-आचार के पांच भेद हैं-दर्शनाचार, ज्ञानाचार, चारित्राचार, तपाचार और वीर्याचार।

दर्शनाचार-जीवादि पदार्थों का श्रद्धान करना अथवा सम्यक्त्व को पचीस मलदोष रहित-निर्दोष करना यह दर्शनाचार है। दर्शनशुद्धि के आठ भेद हैं-

नि:शंकित-तत्त्वों में शंका नहीं करना।

नि:कांक्षित-उभयलोक संबंधी भोगों की आकांक्षा नहीं करना।

निर्विचिकित्सा-अस्नानव्रत, नग्नता आदि में अरूचि नहीं करना।

अमूढ़दृष्टि-मूढ़ता या मिथ्या परिणामों से रहित होना।

उपगूहन-चतुर्विध संघ के दोषों का आच्छादन करना।

स्थितिकरण-रत्नत्रय से च्युत होने वाले को उपदेशादि द्वारा स्थिर करना।

वात्सल्य-साधर्मियों में अकृत्रिम स्नेह रखना।

प्रभावना-‘‘दान, पूजन, व्याख्यान, वाद, मंत्र, तंत्र, आदि से मिथ्यामतों का निरसन कर अर्हंत के शासन को प्रकाशित करना१।

‘‘ये नि:शंकित आदि आठ गुण हैं इन्हें दर्शनशुद्धि कहते हैं। इनके विपरीत इतने ही अतिचार हो जाते हैं।

ज्ञानाचार-जिससे आत्मा का यथार्थ स्वरूप जाना जाता है, जिससे मनोव्यापार रोका जाता है और जिससे आत्मा कर्ममल से रहित होती है वही सम्यग्ज्ञान है। उसको आठ भेद सहित पालन करना ज्ञानाचार है।

ये भेदज्ञान की आठ शुद्धिरूप है।

काल शुद्धि -स्वाध्याय की बेला में पठन, सच्चे शास्त्रों को पुन: पुन: पढ़ना-अभ्यास करना, व्याख्यान आदि करना कालशुद्धि है।

विनय शुद्धि - मन, वचन, काय की शुद्धिपूर्वक अत्यर्थ विनय से श्रुत का पठन पाठन करना।

उपधान शुद्धि - कुछ नियम लेकर अर्थात् ‘जब तक यह ग्रन्थ पूरा न हो तब तक मेरा दूध का त्याग है' इत्यादि नियम लेकर पढ़ना।

बहुमान शुद्धि पूजा - सत्कारपूर्वक पठन आदि करना।

अनिन्हव शुद्धि - जिस गुरू से शास्त्र पढ़ा है उसका नाम प्रकाशित करना अथवा जिस ग्रन्थ से ज्ञान हुआ है उसको नहीं छिपाना।

व्यंजन शुद्धि - वर्ण, पद, वाक्यों को शुद्ध पढ़ना।

अर्थशुद्धि पदों - का अनेकांत रूप अर्थ करना।

तदुभय शुद्धि - शब्द और अर्थ को शुद्धिपूर्वक पढ़ना।


इस प्रकार कालादि शुद्धि के भेद से ज्ञानाचार के भी आठ भेद होते हैं।

चारित्राचार पाप क्रिया से निवृत्ति चारित्र है। उसके पांच भेद हैं-प्राणिवध, असत्य, चोरी, अब्रह्म और परिग्रह इन पांच पापों का सर्वथा त्याग कर देना ये पाँच चारित्राचार हैं।

‘‘पाँच महाव्रतों की रक्षा के लिये रात्रिभोजन का भी त्याग किया जाता है। इसे छठा अणुव्रत भी कहते हैं।१ अन्यत्र-साधुओं के प्रतिक्रमण में भी कहा है-‘रात्रिभोजन से विरक्त होना छठा अणुव्रत है।

अथवा पांच समिति और तीन गुप्तिरूप आठ प्रकार का चारित्राचार है।

‘‘चंपापुरी, पावापुरी, गिरनार आदि तीर्थयात्रा हेतु, साधुओं के संन्यास निमित्त, देव, धर्म आदि के हेतु अथवा शास्त्रों को सुनने-सुनाने के लिये अथवा प्रतिक्रमण आदि सुनने-सुनाने के लिये अपररात्रिक स्वाध्याय, प्रतिक्रमण और देववंदना करके सूर्योदय हो जाने पर प्रासुकमार्ग में चार हाथ आगे जमीन देखते हुए गमन करना ईर्यासमिति है। क्योंकि साधु किसी भी लौकिक कार्य के लिए या व्यर्थ गमन नहीं करते हैं ऐसे ही शास्त्रानुकूल बोलना, आहार करना, कुछ वस्तु रखना, उठाना और प्रासुक स्थान में मलमूत्रादि विसर्जन करना ये पांच समितियाँ हैं।

अशुभ मन, वचन और काय का गोपन करना अर्थात् मन, वचन, काय की अशुभ प्रवृत्ति का त्याग करना गुप्ति है। अथवा स्वाध्याय और ध्यान में तत्पर हुए मुनि के जो मन, वचन, काय का संवरण होता है उसी का नाम गुप्ति है। इसके मन, वचन, काय की अपेक्षा तीन भेद हो जाते हैं।

इन्हें ‘‘अष्टप्रवचनमातृका' भी कहते हैं क्योंकि ये मुनियों के रत्नत्रय की रक्षा करती हैं जैसे कि माता अपने पुत्र की रक्षा करती है।

पाँच महाव्रत, पाँच समिति और तीन गुप्तिरूप तेरह प्रकार का चारित्र भी माना है, इनका पालन करना-कराना ही चारित्राचार है।

‘‘पांच महाव्रतों की रक्षा के लिए रात्रिभोजननिवृत्तिरूप छठा अणुव्रत, आठ प्रवचन मातृकाएं और पच्चीस भावनाएँ मानी गयी हैं।

उसमें से सभी का लक्षण स्पष्ट है। अब पाँच व्रतों की पच्चीस भावनाओं को कहते हैं-

भावना - व्रतों की पूर्णता हेतु या स्थिरता हेतु जो पुन: पुन: भावित की जाती हं, पाली जाती हैं वे भावनाएँ हैं। पाँच व्रतों में प्रत्येक की पाँच-पाँच भावनाएँ होेने से पच्चीस भावनाएँ हो जाती हैं।

अहिंसा व्रत की ५ भावना - एषणासमिति, आदाननिक्षेपणसमिति, ईर्यासमिति, मनोगुप्ति और आलोकितपानभोजन ये पाँच भावनाएँ हैं। इनको भाने वाला साधु जीवदया का प्रतिपालन करता है अर्थात् प्रथम महाव्रत परिपूर्ण करता है। इसलिए अिंहसा महाव्रत की साधनरूप ये भावनाएं हैं ऐसा समझो। इसमें से चार का लक्षण आ चुका है। आलोकितपानभोजन में सूर्य के प्रकाश में चक्षु इंद्रिय से देखकर आगम के ज्ञानपूर्वक भोजनपान करना चाहिए।

सत्यव्रत की ५ भावना - क्रोध, लोभ, भय और हास्य का त्याग करना तथा अनुवीचि-सूत्र के अनुकूल वचन बोलना ये पांच भावनायें सत्यव्रत की पूर्णता हेतु हैं।

अचौर्यव्रत की ५ भावना - किसी की वस्तु, पुस्तक आदि को उनसे मांग कर लेना ‘याचना' है, किसी की वस्तु उनकी अनुमति से ग्रहण करना और परोक्ष में लेने पर उन्हें वापस कर देना, ‘‘समनुज्ञापना है, ग्रहण की हुई परवस्तु में आत्मभाव नहीं करना ‘‘अनन्यभाव है, त्यक्त प्रतिसेवा और सहधर्मी साधुओं के उपकरण-पुस्तक, पिच्छी और सूत्रानुकूल सेवन करना इस प्रकार यांचा, समनुज्ञापना, अनन्यभाव, त्यक्त प्रतिसेवी और साधर्मी के उपकरण का अनुवीचि सेवन ये पांच भावनायें अचौर्यव्रत को पूर्ण करने वाली हैं।

'ब्रह्मचर्यव्रत की ५ भावना ' - महिलाओं को कामविकार से नहीं देखना, पूर्व में भोगे हुए भोगों का स्मरण नहीं करना, रागभाव के कारण भूत पदार्थों से संसक्त वसतिका में नहीं रहना अथवा असंयमी लोगों के साथ नहीं रहना, श्रृंगारिक कथा विकथा आदि नहीं करना, बल और दर्प उत्पन्न करने वाले रसों का सेवन नहीं करना ये पाँच भावनायें ब्रह्मचर्य व्रत को पूर्ण करने वाली हैं।

परिग्रहत्याग की ५ भावना - पंच इन्द्रियों के प्रिय और अप्रिय विषय जो कि शब्द, रस, स्पर्श, और गंध में परिग्रह रहित मुनि रागद्वेष नहीं करते हैं इसलिये इन पांच भावनाओं से परिग्रहमहाव्रत पूर्ण होता है। ‘इन पच्चीस भावनाओं की भावना करने वाला साधु सोता हुआ भी अथवा मूर्छा को प्राप्त हुआ भी अपने सभी व्रतों में किंचित् मात्र भी पीड़ा विराधना को नहीं करता है पुन: सावधान रहते हुए जाग्रत रहते हुए की तो बात ही क्या है? वह साधु स्वप्न में भी इन भावनाओं को ही देखता है किंतु व्रतों की विराधना को नहीं देखता है।

तप आचार -‘‘जो शरीर और इन्द्रियों को तपाता है दहन करता है, वह तप है। यह कर्मों को दहन करने में समर्थ है। इसके दो भेद हैं बाह्य और अभ्यंतर। इन दोनों के भी छह-छह भेद होने से बारह भेद हो जाते हैं। इन बारह प्रकार के तपों का अनुष्ठान करना तप आचार है। इसका विस्तृत वर्णन आगे मुनियों के उत्तरगुणों में किया जावेगा।

'वीर्याचार ' - अपने बल और वीर्य को न छिपा कर जो साधु यथोक्त आचरण में अर्थात् प्राणिसंयम-इन्द्रियसंयम के पालन और तपश्चरण में अपने आपको लगाते हैं, कायरता प्रगट न करके हमेशा चारित्र के आचरण में और तप में उत्साहित रहते हैं। यही वीर्याचार है।

इन पांच आचारों का पालन करना-कराना ही आचारवत्त्व है।

२. आधारवत्त्व - जिस श्रुतज्ञानरूपी संपत्ति की कोई तुलना नहीं कर सकता उसको, अथवा नौ पूर्व, दशपूर्व या चौदह पूर्व तक के श्रुतज्ञान को अथवा कल्पव्यवहार के धारण करने को आधारवत्त्व कहते हैं।

३. व्यवहारपटुता - व्यवहार नाम प्रायश्चित्त का है, वह पांच प्रकार का है। इसकी कुशलता ही व्यवहारपटुता है। जिन्होंने अनेक बार प्रायश्चित्त देते हुए देखा है, स्वयं ग्रहण कया है, दूसरों को दिलवाया है वे ही व्यवहारपटु हैं।

व्यवहार-प्रायश्चित्त के ५ भेद आगम, श्रुत, आज्ञा, धारणा और जीत।

ग्यारह अंगशास्त्रों में प्रायश्चित्त वर्णित है अथवा उनके आधार से जो प्रायश्चित्त दिया जाता है उसको आगम कहते हैं।

चौदहपूर्व में बताये हुए या तदनुसार दिये हुए प्रायश्चित्त को श्रुत कहते हैं। कोई आचार्य समाद्दिमरण के लिये उद्युक्त हैं, उनकी जंघा का बल घट गया वे दूर तक विहार नहीं कर सकते, वे आचार्य किसी योग्य आचार्य के पास अपने योग्य ज्येष्ठ शिष्य को भेजकर उसके द्वारा ही अपने दोषों की आलोचना कराकर प्रायश्चित्त मंगाकर ग्रहण करते हैं उसको आज्ञा कहते हैं।

कोई आचार्य उपर्युक्त स्थिति में हैं और उनके पास शिष्यादि भी नहीं हैं तो वे स्वयं अपने दोषों की आलोचना कर पहले के अवधारित (जाने हुए) प्रायश्चित्त को ग्रहण करते हैं वह धारणा प्रायश्चित्त है।

बहत्तर पुरूषों की अपेक्षा जो प्रायश्चित्त बताया जाता है उसको जीत कहते हैं। इनमें निष्णात आचार्य व्यवहारपटु कहलाते हैं।

४. प्रकारकत्व - जो समाधिमरण कराने में या उसकी वैयावृत्य करने में कुशल हैं उन्हें परिचारी अथवा प्रकारी कहते हैं यह गुण प्रकारकत्व कहलाता है।

५. आयापायदर्शिता - आलोचना करने के लिये उद्यत हुए क्षपक (समाधिमरण करने वाले साधु) के गुण और दोषों के प्रकाशित करने को आयापायदर्शिता अथवा गुणदोषप्रवक्तृता कहते हैं।

६. उत्पीलन - कोई साधु या क्षपक यदि दोषों को पूर्णतया नहीं निकालता है तो उसके दोषों को युक्ति और बल से बाहर निकाल लेना उत्पीलन गुण है।

७. अपरिस्रवण - शिष्य के गोप्य दोष को सुनकर जो प्रकट नहीं करते हैं उनके अपरिस्रवण गुण होता है।

८. सुखावहन - क्षुधादि से पीड़ित साधु को जो उत्तम कथा आदि के द्वारा शांत करके सुखी करते हैं वे सुखावह गुण के धारी हैं। इस प्रकार इन आठ गुण के धारी आचार्य आचारी, आधारी, व्यवहारी, प्रकारक, आयापायदिक्, उत्पीडक, अपरिस्रावी और सुखावह होते हैं।

स्थितिकल्प के दश भेद

आचेलक्य, औद्देशिकपिंडत्याग, शय्याधरिंपडत्याग, राजकीयिंपडत्याग, कृतिकर्म, व्रतारोपण योग्यता, ज्येष्ठता, प्रतिक्रमण, मासैकवासिता और योग, इस प्रकार स्थितिकल्पगुण दश हैं।

१. आचेलक्य - वस्त्रादि संपूर्ण परिग्रह के अभाव को अथवा नग्नता को आचेलक्य कहते हैं। नग्न दिगंबर साधु लंगोटीमात्र को भी नहीं रखते हैं चूंकि उसे धोना, सुखाना, संभालना, फटने पर याचना करना आदि अनेक आकुलताएँ होती हैं जिससे ध्यान-अध्ययन की पूर्णतया सिद्धि असंभव है तथा तीर्थंकरों के आचरण का अनुसरण भी नग्नता से ही होता है।

२. औद्देशिकपिंड त्याग - जो मुनियों के उद्देश्य से तैयार किया गया है ऐसे भोजन पान आदि द्रव्य को ग्रहण नहीं करना औद्देशिक पिंड आहार का त्याग गुण होता है।

३. शय्याधरपिंड त्याग - वसतिका बनवाने वाला, उसका संस्कार करने वाला और वहाँ पर व्यवस्था आदि करने वाला ये तीनों ही शय्याधर शब्द से कहे जाते हैं। इनके आहार, उपकरण आदि न लेने को शय्याधरपिंड त्याग कहते हैं। अभिप्राय यह है कि किसी ने वसतिका दान किया, साधु वहां ठहरे पुन: ‘‘यदि मैं आहार नहीं दूँगा तो लोग क्या कहेंगे कि इसने साधु को ठहरा तो लिया किंतु उन्हें आहार नहीं दिया इत्यादि भावना से संविलष्ट परिणाम करके आहार देने से दोषास्पद है। यदि कोई गृहस्थ मान कषाय या भय, संकोच आदि रहित होकर मात्र पात्रदान की भावना से वसतिका दान देकर आहारदान भी देता है तो उसमें कोई दोष नहीं है।

कोई आचार्य इसको शय्यागृहपिंडत्याग कहकर इसका ऐसा अर्थ करते हैं कि विहार करते हुए मार्ग में रात्रि को जिस गृह या वसति में ठहरें या शयन आदि करें वहां दूसरे दिन आहार नहीं लेना अथवा वसतिका संबंधी द्रव्य के निमित्त से जो भोजन तैयार किया गया हो उसको नहीं लेना यह शय्यागृहपिंडोज्झा गुण है।

४. राजकीय पिड त्याग - इक्ष्वाकु कुल आदि में जन्मे अथवा अन्य राजाओं के यहाँ आहार नहीं लेना राजकीयपिंडत्याग गुण है। अभिप्राय यह है कि ऐसे घरों में भयंकर कुत्ते आदि जन्तु घात कर सकते हैं या पशु-गाय, भैंस आदि या गर्विष्ठ नौकर चाकर आदि अपमान कर सकते हैं इत्यादि बाधक कारणों के प्रसंग से राजाओं के यहाँ का आहार नहीं लेना चाहिये। उपर्युक्त दोषों से रहित यदि होवे तो लेने में कोई दोष नहीं है। भरतसम्राट् आदि महाराजाओं के यहाँ तो आहार होते ही थे।

५. कृतिकर्म - विधिवत् आवश्यकों का पालन करना अथवा गुरूजनों का विनयकर्म करना कृतिकर्म है।

६. व्रतारोपणयोग्यता - शिष्यों में व्रतों के आरोपण करने की योग्यता होना यह छठा गुण है।

७. ज्येष्ठता - जो जाति, कुल, वैभव, प्रताप और कीर्ति की अपेक्षा गृहस्थों में महान् रहे हैं, जो ज्ञान और चर्या आदि में उपाध्याय और आर्यिका आदि से भी महान् हैं, क्रियाकर्म के अनुष्ठान में भी श्रेष्ठ हैं उनके यह सातवाँ गुण होता है।

८. प्रतिक्रमण - प्रतिक्रमण के नाना भेदों को समझने वाले और विधिवत् करने कराने वाले आचार्य इस गुण के धारी होते हैं।

९. मासैकवासिता - जिनके तीन दिन-तीन रात्रि तक एक ही स्थान में या ग्राम में रहने का व्रत हो उनके यह मासैकवासिता गुण होता है। चूंकि अधिक दिन एक जगह रहने से उद्गम आदि क्षेत्र में ममता, गौरव में कमी, आलस, शरीर में सुकुमारता, भावना का अभाव, ज्ञातभिक्षा का ग्रहण आदि दोष होने लगते हैं।

मूलाराधना में इसका ऐसा अर्थ किया है कि ‘‘ चातुर्मास के एक महीने पहले और पीछे उसी ग्राम में रहना।

१०. योग - वर्षाकाल में चार महीने एक जगह रहना। चूंकि वृष्टि के निमित्त से त्रस-स्थावर जीवों की बहुलता हो जाती है, इससे विहार में असंयम होगा, वृाqष्ट से ठंडी हवा चलने से आत्मविराधना शरीर में कष्ट, व्याधि, मरण आदि आ जावेंगे। जल, कीचड़ आदि के निमित्त से गिर जाना आदि संभव है। इत्यादि कारणों से चातुर्मास में एक सौ बीस दिन तक एक ग्राम में रहना यह उत्सर्ग (उत्कृष्ट) मार्ग है। अपवाद मार्ग की अपेक्षा विशेष कारण उपस्थित होने पर अधिक अथवा कम दिन भी निवास किया जा सकता है। आqद्दक में आषाढ़ शुक्ला दशमी से कार्तिकशुक्ला पूर्णिमा के ऊपर तीस दिन तक निवास किया जा सकता है। अत्यधिक जलवृाष्ट, श्रुत का विशेष लाभ, शक्ति का अभाव और किसी की वैयावृत्ति आदि के विशेष प्रसंग आ जाने पर, इन प्रयोजनों के उद्देश्य से एक स्थान में अधिक दिन निवास किया जा सकता है। यह उत्कृष्ट काल का प्रमाण है।

इस प्रकार से आचार्य के ये स्थितिकल्प नाम के दश गुण बताये हैं।

छह आवश्यकों का वर्णन हो चुका है। इस प्रकार आचारवत्त्वादि ८ ± तपश्चरण १२±, स्थितिकल्प १० ± और आवश्यक ६·३६ गुणों का पालन करने वाले आचार्य परमेष्ठी होते हैं।

अन्यत्र अन्य प्रकार से भी बताये हैं। यथा ‘‘१२ तप, १० धर्म, ५ आचार, ६ आवश्यक और ३ गुप्ति ये आचार्य के ३६ गुण होते हैं१। १२ तप आदि का वर्णन किया जा चुका है।

दशधर्म का वर्णन

उत्तम क्षमा - आहार के लिए अथवा विहार के लिए साधु भ्रमण करते हैं, उस समय कोई दुष्टजन अपशब्द, उपहास अथवा तिरस्कार कर देते हैं या मारपीट देते हैं तो भी मन में कलुषता का न होना उत्तम क्षमा है।

उत्तम मार्दव - जाति, कुल, विद्या आदि का घमंड नहीं करना उत्तम मार्दव है।

उत्तम आर्जव - मन, वचन और काय को सरल रखना आर्जव है।

उत्तम शौच - प्रकर्षप्राप्त लोभ का त्याग करना उत्तम शौच है।

उत्तम सत्य - अच्छे पुरुषों के साथ साधु वचन बोलना।

उत्तम संयम - प्राणियों की हिंसा और इन्द्रियों के विषयों का परिहार करना।

उत्तम तप - कर्मक्षय हेतु बारह प्रकार का तपश्चरण करना।

उत्तम त्याग - संयत के योग्य ज्ञान आदि का दान करना।

उत्तम आकिंचन्य - जो शरीर आदि हैं उनमें भी संस्कार को दूर करने के लिए ‘यह मेरा है’ इस प्रकार के अभिप्राय का त्याग करना।

उत्तम ब्रह्मचर्य - स्त्रीमात्र का त्याग करना ‘‘अथवा स्वतंत्रवृत्ति का त्याग करने के लिए गुरुकुल में निवास करना ब्रह्मचर्य है।’’

ख्याति, पूजा आदि की अपेक्षा बिना आत्मविशुद्धि हेतु इन धर्मों को पालने के लिए इनमें उत्तम विशेषण लगाया गया है। यहाँ तक आचार्य के ३६ गुणों का वर्णन दो प्रकार से हो चुका है।

उपाध्याय परमेष्ठी

‘‘चौदह विद्यास्थान-चौदह पूर्व के व्याख्यान करने वाले उपाध्याय होते हैं, अथवा तत्कालीन परमागम के व्याख्यान करने वाले उपाध्याय होते हैं। वे संग्रह और अनुग्रह आदि गुणों को छोड़कर मेरु के समान निश्चित्ता आदि रूप आचार्य के गुणों से समन्वित होते हैं।’’

अर्थात् उपाध्याय परमेष्ठी केवल पठन-पाठन में ही लगे रहते हैं। बाकी शिष्यों का संग्रह करना, उन्हें दीक्षा देना, प्रायश्चित्त देना, उनका संरक्षण करना, संघ की व्यवस्था संभालना आदि कार्य आचार्य के हैं, सो ये नहीं करते हैं

अन्यत्र उपाध्याय के मुख्य पचीस गुण माने हैं-

‘‘ग्यारह अंग और चौदह पूर्व को आप पढ़ते हैं और अन्य को पढ़ाते हैं। ये पचीस गुण उपाध्याय परमेष्ठी के होते हैं।’’

ग्यारह अंग

  1. आचारांग
  2. सूत्रकृतांग
  3. स्थानांग
  4. समवायांग
  5. व्याख्याप्रज्ञप्ति
  6. ज्ञातृकथांग
  7. उपासकाध्ययनांग
  8. अंत:कृद्दशांग
  9. अनुत्तरोत्पाददशांग
  10. प्रश्नव्याकरणांग
  11. विपाकसूत्रांग।

चौदह पूर्व

  1. उत्पादपूर्व
  2. अग्रायणीयपूर्व
  3. वीर्यानुवादपूर्व
  4. अस्तिनास्तिप्रवादपूर्व
  5. ज्ञानप्रवादपूर्व
  6. कर्मप्रवादपूर्व
  7. सत्यप्रवादपूर्व
  8. आत्मप्रवादपूर्व
  9. प्रत्याख्यानपूर्व
  10. विद्यानुवादपूर्व
  11. कल्याणवादपूर्व
  12. प्राणावायपूर्व
  13. क्रियाविशालपूर्वं
  14. लोकबिन्दुसारपूर्व।

आज इन अंगपूर्वों का ज्ञान न रहते हुए भी उनके कुछ अंश रूप षट्खंडागम कसायपाहुड़ आदि ग्रंथ तथा उन्हीं की परम्परा से आगत समयसार, मूलाचार आदि अन्य ग्रंथ विद्यमान हैं। तत्कालीन सभी ग्रंथों के पढ़ने-पढ़ाने वाले भी उपाध्याय परमेष्ठी हो सकते हैं। ‘धवला’ में ‘‘तात्कालिकप्रवचनव्याख्यातारो वा’’ इस पद से स्पष्ट किया है।

साधु परमेष्ठी

‘‘जो अनंतज्ञानादिरूप शुद्ध आत्मा के स्वरूप की साधना करते हैं उन्हें साधु कहते हैं। जो पाँच महाव्रतों को धारण करते हैं-तीन गुप्तियों से सुरक्षित हैं, अठारह हजार शील के भेदों को धारण करते हैं और चौरासी लाख उत्तरगुणों का पालन करते हैं, वे साधु परमेष्ठी कहलाते हैं।’’

प्रारंभ में जो अट्ठाईस मूलगुणों का वर्णन किया गया है, वे ही इनके मूलगुण हैं। यथा-५ महाव्रत, ५ समिति, ५ इंद्रियनिरोध, १ केशलोंच, ६ आवश्यक, आचेलक्य, अस्नान, क्षितिशयन, अदंतधावन, स्थितिभोजन और एक भक्त, ये उनके नाम हैं। आचार्य उपाध्याय और साधु तीनों ही प्रकार के दिगम्बर गुरुओं में ये मूलगुण अवश्य ही रहते हैं। पुन: आचार्य अपने दिगम्बर शिष्य को ही आचार्य पद देते हैं। पठन-पाठन में कुशल योग्य साधु को उपाध्याय पद देते हैं। आचार्यपद और उपाध्यायपद देने की विधि क्रियाकलाप में है। उस विधि से आचार्य दीक्षा या उपाध्याय दीक्षा होने पर ही प्रमाणता आती है। धवला में इन तीनों गुरुओं की पूज्यता के विषय में बहुत ही सुन्दर समाधान है। यथा-

आचार्य आदि को नमस्कार करना क्या ?

शंका - जिन्होंने आत्मस्वरूप को प्राप्त कर लिया है, ऐसे अरिहंत और सिद्ध को नमस्कार करना योग्य है, किन्तु आचार्यादि तीन परमेष्ठियों को नमस्कार करना योग्य नहीं है, चूँकि उन्होंने अभी आत्मस्वरूप को प्राप्त नहीं किया है इसलिए उनमें देवपने का अभाव है ?

समाधान - ऐसा नहीं कहना, क्योंकि तीन रत्न ही देव हैं, जो कि अपने-अपने भेदों से अनंत भेद रूप है और उन रत्नत्रय से विशिष्ट जीव भी देव हैं, अन्यथा-यदि ऐसा नहीं मानोगे, तो अशेष जीवों को भी देवपना प्राप्त होने की आपत्ति आ जायेगी। इसलिए यह सिद्ध हुआ कि आचार्य आदि भी रत्नत्रय के यथायोग्य धारक होने से देव हैं, क्योंकि अरिहंतादि से आचार्यादि में रत्नत्रय के सद्भाव की अपेक्षा कोई अन्तर नहीं है। अर्थात् जिस तरह अरिहंत और सिद्धों में रत्नत्रय पाया जाता है, उसी तरह आचार्यादि में भी रत्नत्रय का सद्भाव पाया जाता है।

आचार्यादि परमेष्ठियों में स्थित तीन रत्नों का सिद्ध परमेष्ठी में स्थित रत्नो से भी भेद नहीं है। यदि दोनों के रत्नत्रय में भेद मानोगे, तो आचार्यादिक में स्थित रत्नों के अभाव का प्रसंग आ जावेगा। अर्थात् जब आचार्यादिक के रत्नत्रय सिद्ध परमात्मा के रत्नत्रय से भिन्न सिद्ध हो जावेंगे, तो आचार्यादि के रत्न ही नहीं कहलावेंगे।

शंका - सम्पूर्ण रत्न अर्थात् पूर्णता को प्राप्त रत्नत्रय ही देव हैं, रत्नों का एकदेश देव नहीं हो सकता।

समाधान - ऐसा कहना भी उचित नहीं है, क्योंकि रत्नों के एकदेश में देवपना के होने पर रत्नों की समग्रता में भी देवपना नहीं बन सकता है। अर्थात् जो कार्य जिसके एकदेश में नहीं देखा जाता है, वह उसकी समग्रता में कहाँ से आज सकता है ?

शंका - आचार्यादि में स्थित रत्नत्रय समस्त कर्मों के क्षय करने में समर्थ नहीं हो सकते हैं, क्योंकि उनके रत्न एकदेश है।

समाधान - यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि जिस प्रकार पलालराशि का दाहरूप अग्नि समूह का कार्य अग्नि के एक कण से भी देखा जाता है, उसी प्रकार यहाँ पर समझना चाहिए। इसलिए आचार्य आदि भी देव हैं, यह बात निश्चित हो जाती है।’’

इस प्रकार से यह स्पष्ट हो जाता है कि महामंत्र णमोकार के अन्तर्गत अरिहंत, सिद्ध के अनन्तर ये आचार्य उपाध्याय और साधु परमेष्ठी माने गये हैं, वे भी देव हैं अत: पूज्य हैं।

यहाँ तक संक्षेप से आचार्य, उपाध्याय और साधुओं के मूलगुणों का वर्णन हुआ है।

विशेष-इस प्रकार से ये तीनों तरह के साधु दिगम्बर मुनि ही होते हैं किन्तु आचार्य, उपाध्याय और साधु के गुणों की अपेक्षा से इनके तीन भेद हो जाते हैं।