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०१. गतिमार्गणा के अन्तर्गत चारों गतियों में अल्पबहुत्व का वर्णन

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विषय सूची

गतिमार्गणा के अन्तर्गत चारों गतियों में अल्पबहुत्व का वर्णन

अथ षष्ठो महाधिकार:

अद्य कार्तिकशुक्लापंचम्यां मंगलविहारदिवसे अस्मात् सिद्धक्षेत्रात् मांगीतुंगीनामधेयात् यै: महापुरुषै: सिद्धिपदं संप्राप्तं, तान् सिद्धान् अत्र विराजमानानि सर्वजिनबिंबानि च पुन: पुन: प्रणम्य भाविकाले यस्य अष्टोत्तरशतफुटउत्तुंगविशालकायप्रतिमाया: निमार्णं संकल्पितं, तस्मै आदिब्रह्मणे श्रीऋषभदेवाय अनन्तश: नमोऽस्तु नमोऽस्तु नमोऽस्तु।
अथ षट्खण्डागमस्य प्रथमखण्डे पंचमग्रंथे अल्पबहुत्वानुगमे षष्ठो महाधिकार: प्रारभ्यते। अस्मिन् चर्तुदशाधिकारा: सन्ति। तत्र तावत् गतिमार्गणायां सप्तसप्ततिसूत्राणि वक्ष्यन्ते। द्वितीये इन्द्रियमार्गणाधिकारे एकं सूत्रं। तृतीये कायमार्गणाधिकारे एकं सूत्रं। चतुर्थे योगमार्गणायां एकोनचत्वािंरशत्सूत्राणि। पंचमे वेदेऽधिकारे त्रिपञ्चाशत् सूत्राणि। षष्ठेऽधिकारे कषायमार्गणायां एकोनविंशतिसूत्राणि। सप्तमज्ञानमार्गणायां अष्टाविंशतिसूत्राणि। अष्टमसंयममार्गणायां द्विचत्वािंरशत्सूत्राणि। नवमे दर्शनाधिकारे चत्वारि सूत्राणि। दशमे लेश्यामार्गणाधिकारे अष्टत्रिंशत्सूत्राणि। एकादशेऽधिकारे भव्यमार्गणानाम्नि द्वे सूत्रे। द्वादशेऽधिकारे सम्यक्त्वमार्गणानाम्नि पंचविंशतिसूत्राणि। त्रयोदशे संज्ञिमार्गणाधिकारे त्रीणि सूत्राणि। चतुर्दशाधिकारे आहारमार्गणायां पंचविंशतिसूत्राणि कथयिष्यन्ते, इति षष्ठे महाधिकारे चतुर्दशाधिकारै: समुदायपातनिका सूचिता भवति।
तत्र तावत् गतिमार्गणायां नरकगतौ स्थलद्वयेन चतुर्दशसूत्राणि कथ्यन्ते। तस्मिन् प्रथमस्थले सामान्येन सप्तस्वपि पृथिवीषु गुणस्थानापेक्षया अल्पबहुत्वप्रतिपादनत्वेन ‘‘आदेसेण’’ इत्यादिसूत्रसप्तकं। तदनु द्वितीयस्थले पृथकपृथग्नरकापेक्षया गुणस्थानमाश्रित्य अल्पबहुत्वकथनमुख्यत्वेन नारकाणां ‘‘एवं पढमाए’’ इत्यादिसूत्रसप्तकं इति पातनिका अस्ति।
संप्रति नरकगतौ चतुर्गुणस्थानवर्तिनां नारकाणां अल्पबहुत्वप्रतिपादनाय सूत्रचतुष्टयमवतार्यते-आदेसेण गदियाणुवादेण णिरयगदीए णेरइएसु सव्वत्थोवा सासण-सम्मादिट्ठी।।२७।।
सम्मामिच्छादिट्ठी संखेज्जगुणा।।२८।।
असंजदसम्मादिट्ठी असंखेज्जगुणा।।२९।।
मिच्छादिट्ठी असंखेज्जगुणा।।३०।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-अस्मिन् सूत्रे ओघप्रतिषेधफलं। शेषमार्गणादिप्रतिषेधार्थं गत्यानुवादवचनं। शेषगतिप्रतिषेधनार्थ: नरकगतिनिर्देश:। शेषगुणस्थानप्रतिषेधार्थ: सासादननिर्देश:। उपरि उच्यमानगुणस्थान-द्रव्यप्रमाणेभ्य: सासादना: द्रव्यप्रमाणेन स्तोका: अल्पा: इति उक्तं भवति।
सासादनोपक्रमणकालात् सम्यग्मिथ्यादृष्टि-उपक्रमणकालस्य संख्यातगुणस्य उपलंभात् सम्यग्मिथ्यादृष्टय: सासादनापेक्षया संख्यातगुणा: सन्ति।
सम्यग्मिथ्यादृष्टि-उपक्रमणकालात् असंयतसम्यग्दृष्टि-उपक्रमणकालस्य असंख्यातगुणस्य संभवोपलंभात्, सम्यग्मिथ्यात्वं प्रतिपद्यमानजीवेभ्य: सम्यक्त्वं प्रतिपद्यमानजीवानां असंख्यातगुणत्वात् वा।
अत्र को गुणकार:?
आवलिकाया: असंख्यातभाग:। अधस्तनराशिना उपरिमराशिमपवत्र्य गुणकार: साधयितव्य:।
मिथ्यादृष्टयोऽसंख्यातगुणा:। अत्र को गुणकार:? असंख्याता: जगच्छ्रेणय: गुणकार:, सोऽपि जगत्प्रतरस्य असंख्यातभाग-प्रमाणं। तासां जगत्श्रेणीनां विष्कंभसूची अंगुलस्य असंख्यातभागप्रमाणा, असंख्यातानि अंगुलवर्गमूलानि द्वितीयवर्गमूलस्य असंख्यातभागमात्राणि। तद्यथा-असंयतसम्यग्दृष्टिप्रमाणै सूच्यंगुल द्वितीयवर्गमूलं गुणयित्वा तेन सूच्यंगुले भागे हृते लब्धमंगुलस्य असंख्यातभाग:।
नारकाणामसंयतसम्यग्दृष्टिगुणस्थाने सम्यक्त्वस्याल्पबहुत्वकथनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-असंजदसम्माइट्ठिट्ठाणे सव्वत्थोवा उवसमसम्मादिट्ठी।।३१।।
खइयसम्मादिट्ठी असंखेज्जगुणा।।३२।।
वेदगसम्मादिट्ठी असंखेज्जगुणा।।३३।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-अंतर्मुहूर्तमात्रोपशमसम्यक्त्वकाले उपक्रमणकालेन आवलिकाया: असंख्यातभागेन संचितत्वात् उच्यमानसर्वसम्यग्दृष्टिराशिभ्य: उपशमसम्यग्दृष्टय: स्तोका: भवन्ति।
स्वभावतश्चैव उपशमसम्यग्दृष्टिभ्य: असंख्यातगुणस्वरूपेण क्षायिकसम्यग्दृष्टीनां अनादिनिधनं अवस्थानात् संख्यातपल्योपमाभ्यन्तरे पल्योपमस्य असंख्यातभागमात्रोपक्रमणकालेन संचितत्वादसंख्यातगुणा: इति कथितं भवति। अत्रतनक्षायिकसम्यग्दृष्टीनां भागहार: असंख्यातावलिका: भवन्ति। विंâच-ओघासंयतसम्यग्दृष्टिभ्य: असंख्यातगुणहीनौघक्षायिकसम्यग्दृष्टीनां असंख्यातभागत्वात्। न वर्षपृथक्त्वान्तर-प्रतिपादकसूत्रेण सह विरोध:, सौधर्मैशानकल्पं मुक्त्वा अन्यत्र स्थितक्षायिकसम्यग्दृष्टीनां वर्षपृथक्त्वस्य वैपुल्यवाचिनो ग्रहणात्।
अत्र पृथक्त्वस्यार्थो वैपुल्यवाची इति कुतो ज्ञायते ?
‘ओघोपशमसम्यग्दृष्टिभ्य: ओघक्षायिकसम्यग्दृष्टयोऽसंख्यातगुणा:’’ इति अल्पबहुत्वसूत्रादेव ज्ञायते।
क्षायिकसम्यक्त्वात् क्षायोपशमिकस्य वेदकसम्यक्त्वस्य सुलभत्वोपलंभात् तेभ्यस्तेऽसंख्यातगुणा: इति।
अत्र को गुणकार: ?
आवलिकाया: असंख्यातभाग:।
कथमेतद् ज्ञायते ?
‘‘आइरियपरंपरागदुवदेसादो।’’
एवं प्रथमस्थले सामान्यनारकाणां गुणस्थानापेक्षया अल्पबहुत्वकथनमुख्यत्वेन सप्त सूत्राणि गतानि।

अब छठा महाधिकार प्रारंभ होता है

आज कार्तिक शुक्ला पंचमी (वीर नि. सं. २५२३) को मंगल विहार के दिन मांगीतुंगी नाम के सिद्धक्षेत्र से जिन महापुरुषों ने सिद्धि पद को प्राप्त किया है, उन सभी सिद्धों को तथा यहाँ विराजमान समस्त जिनबिम्बों को पुन:-पुन: नमस्कार करके भविष्य में यहाँ मांगीतुंगी पर्वत पर जिस एक सौ आठ फुट उत्तुंग विशालकाय प्रतिमा निर्माण कराने का मैंने संकल्प किया है, उन आदिब्रह्मा श्री ऋषभदेव तीर्थंकर को मेरा अनंतबार नमस्कार होवे , नमस्कार होव, नमस्कार होवे।

अब षट्खण्डागम ग्रंथ के प्रथम खण्ड में पंचमग्रंथ के अल्पबहुत्वानुगम प्रकरण में छठा महाधिकार प्रारंभ होता है। इसमें चौदह अधिकार हैं, उनमें से प्रथम गतिमार्गणा अधिकार में सतत्तर सूत्र कहेंगे। द्वितीय इन्द्रियमार्गणा अधिकार में एक सूत्र है। तृतीय कायमार्गणा अधिकार में एक सूत्र है। चतुर्थ योगमार्गणा में उनतालीस सूत्र हैं। पंचम वेद मार्गणा में त्रेपन सूत्र हैं। छठे कषायमार्गणा अधिकार में उन्नीस सूत्र हैं। सातवीं ज्ञानमार्गणा में अट्ठाईस सूत्र हैं। आठवीं संयममार्गणा में बयालीस सूत्र हैं। नवमीं दर्शनमार्गणा में चार सूत्र हैं। दशवें लेश्या मार्गणा अधिकार में अड़तीस सूत्र हैं। ग्यारहवें भव्यमार्गणा अधिकार में दो सूत्र हैं। बारहवें सम्यक्त्वमार्गणा नामक अधिकार में पच्चीस सूत्र हैं। तेरहवें संज्ञी मार्गणा अधिकार में तीन सूत्र हैं। चौदहवें आहारमार्गणा अधिकार में पच्चीस सूत्र कहेेंगे। इस प्रकार ग्रंथ के छठे महाधिकार में चौदह अधिकारों के सूत्रों की समुदायपातनिका कही गई है।

अब उनमें सर्वप्रथम गतिमार्गणा के अन्तर्गत नरकगति में दो स्थलों में चौदह सूत्र कहे जा रहे हैं। उसमें से प्रथम स्थल में सामान्य से सातों नरक पृथिवियों के नारकियों के गुणस्थान की अपेक्षा अल्पबहुत्व को बतलाने वाले ‘‘आदेसेण’’ इत्यादि सात सूत्र हैं। पुन: द्वितीय स्थल में अलग-अलग नरक की अपेक्षा गुणस्थान का आश्रय लेकर अल्पबहुत्व का कथन करने हेतु ‘‘एवं पढमाए’’ इत्यादि सात सूत्र हैं। यह गतिमार्गणा के सूत्रों की समुदायपातनिका हुई है।

भावार्थ-षट्खण्डागम के इस प्रकरण को लिखते हुए पूज्य गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी ने जिस मांगीतुंगी सिद्धक्षेत्र का नाम स्मरण किया है। वहाँ सन् १९९६ में चातुर्मास करके उन्होंने षट्खण्डागम के ३-४ गं्रथों की टीका लिखी है पुनश्च इस ग्रंथ के लेखन के मध्य कार्तिक शुक्ला पंचमी, १५ नवम्बर १९९६ को वहाँ से दिल्ली की ओर मंगल विहार करते समय उपर्युक्त भावना व्यक्त की है, इससे स्पष्ट होता है कि उन्होंने प्रवास एवं विहार के सभी क्षणों में संस्कृत टीका लेखन जैसे दुरूह कार्य को सम्पन्न करते हुए अपने नाम को पूर्ण सार्थक किया है।

अब नरकगति में चारों गुणस्थानवर्ती नारकियों का अल्पबहुत्व बतलाने हेतु चार सूत्रों का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

आदेश की अपेक्षा गतिमार्गणा के अनुवाद से नरकगति में नारकियों में सासादनसम्यग्दृष्टि जीव सबसे कम हैं।।२७।।

नारकियों में सासादनसम्यग्दृष्टियों से सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीव संख्यातगुणित हैं।।२८।।

नारकियों में सम्यग्मिथ्यादृष्टियों से असंयतसम्यग्दृष्टि जीव असंख्यातगुणित हैं।।२९।।

नारकियों में असंयतसम्यग्दृष्टियों से मिथ्यादृष्टि जीव असंख्यातगुणित हैं।।३०।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-इस सूत्र में ‘आदेश’ यह वचन ओघ का प्रतिषेध करने के लिए है। शेष मार्गणा आदि के प्रतिषेध करने के लिए ‘गतिमार्गणा के अनुवाद से’ यह वचन कहा है। शेष गतियों के प्रतिषेध के लिए ‘नरकगति’ इस पद का निर्देश किया है। शेष गुणस्थानों के प्रतिषेधार्थ ‘सासादन’ इस पद का निर्देश किया है। ऊपर कहे जाने वाले शेष गुणस्थानों के द्रव्यप्रमाणों की अपेक्षा सासादनसम्यग्दृष्टि जीव द्रव्यप्रमाण से स्तोक अर्थात् अल्प होते हैं, यह अर्थ कहा गया है।

सासादनसम्यग्दृष्टियों के उपक्रमण काल से सम्यग्मिथ्यादृष्टियों का उपक्रमणकाल संख्यातगुणा पाया जाता है, क्योंकि सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीव सासादन की अपेक्षा संख्यातगुणे हैं।

सम्यग्मिथ्यादृष्टियों के उपक्रमणकाल से असंयतसम्यग्दृष्टियों का उपक्रमणकाल असंख्यातगुणा पाया जाता है। अथवा, सम्यग्मिथ्यात्व को प्राप्त होने वाले जीवों से सम्यक्त्व को प्राप्त होने वाले जीव असंख्यातगुणित होते हैं। यहाँ गुणकार क्या है ?

आवली का असंख्यातवाँ भाग गुणकार है। अधस्तन राशि से उपरिमराशि को अपवर्तित करके गुणकार सिद्ध कर लेना चाहिए।

मिथ्यादृष्टि असंख्यातगुणे हैं। यहाँ गुणकार क्या है ? असंख्यात जगश्रेणियाँ गुणकार हैं, जो जगत्प्रतर के असंख्यातवें भागप्रमाण हैं। जगत्श्रेणियों की विष्कंभसूची अंगुल के असंख्यातवें भाग प्रमाण है। जिसका प्रमाण अंगुल के द्वितीय वर्गमूल के असंख्यातवें भागमात्र असंख्यात प्रथम वर्गमूल है, वह इस प्रकार है-असंयतसम्यग्दृष्टियों के प्रमाण से सूच्यंगुल के द्वितीय वर्गमूल को गुणित करके जो लब्ध आवे, उससे सूच्यंगुल में भाग देने पर अंगुल का असंख्यातवाँ भाग लब्ध आता है।

अब नारकियों के असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थान में सम्यक्त्व का अल्पबहुत्व बतलाने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-'

सूत्रार्थ-

नारकियों में असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थान में उपशमसम्यग्दृष्टि सबसे कम हैं।।३१।।

नारकियों में असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थान में उपशमसम्यग्दृष्टियों से क्षायिकसम्यग्दृष्टि असंख्यातगुणित हैं।।३२।।

नारकियों में असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थान में क्षायिकसम्यग्दृष्टियों से वेदकसम्यग्दृष्टि असंख्यातगुणित हैं।।३३।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-अन्तर्मुहूर्तमात्र उपशमसम्यक्त्व के काल में आवली के असंख्यातवें भागप्रमाण उपक्रमणकाल द्वारा संचित होने के कारण आगे कहे जाने वाले सर्व प्रकार के सम्यग्दृष्टियों की राशियों से उपशमसम्यग्दृष्टि जीव थोड़े होते हैं, क्योंकि स्वभाव से ही उपशमसम्यग्दृष्टियों की अपेक्षा क्षायिकसम्यग्दृष्टियों का असंख्यातगुणितरूप से अनादिनिधन अवस्थान है, जिसका तात्पर्य यह है कि संख्यात पल्योपम के भीतर पल्योपम के असंख्यातवें भागमात्र उपक्रमणकाल द्वारा संचित होने से क्षायिकसम्यग्दृष्टि जीव उपशमसम्यग्दृष्टियों से असंख्यातगुणित हैं। यहाँ नारकियों में जो क्षायिकसम्यग्दृष्टि हैं, उनके प्रमाण के लाने के लिए भागहार का प्रमाण असंख्यात आवली प्रमाणकाल है, क्योंकि ओघ असंयतसम्यग्दृष्टियों से असंख्यातगुणित हीन ओघ क्षायिकसम्यग्दृष्टि जीव असंख्यातवें भाग ही होते हैं। इस कथन का वर्षपृथक्त्व अन्तर बताने वाले सूत्र के साथ विरोध भी नहीं आता है, क्योंकि सौधर्म और ऐशानकल्प को छोड़कर अन्यत्र स्थित क्षायिकसम्यग्दृष्टियों के अन्तर में कहे गये वर्ष पृथक्त्व के ‘पृथक्त्व’ शब्द को वैपुल्यवाची ग्रहण किया गया है।

शंका-यहाँ पर पृथक्त्व का अर्थ वैपुल्यवाची ग्रहण किया गया है, यह कैसे जाना जाता है ?

समाधान-‘ओघ उपशमसम्यग्दृष्टियों से ओघ क्षायिकसम्यग्दृष्टि जीव असंख्यातगुणित हैं। इस अल्पबहुत्व के प्रतिपादक सूत्र से जाना जाता है। क्षायिकसम्यक्त्व की अपेक्षा क्षायोपशमिक वेदकसम्यक्त्व की प्राप्ति सुलभ होने से उनसे वे असंख्यातगुणा होते हैं।

यहाँ गुणकार क्या है ?

आवली का असंख्यातवाँ भाग गुणकार है।

शंका-यह कैसे जाना जाता है ?

समाधान-आचार्य-परम्परा से आये हुए उपदेश के द्वारा जाना जाता है।

इस प्रकार प्रथमस्थल में सामान्य नारकियों का गुणस्थान की अपेक्षा अल्पबहुत्व कथन करने वाले सात सूत्र पूर्ण हुए।


संप्रति प्रथमादिपृथिवीनां नारकाणां गुणस्थानमाश्रित्याल्पबहुत्वप्रतिपादनाय सूत्रपंचकमवतार्यते-एवं पढमाए पुढवीए णेरइया।।३४।।

विदियाए जाव सत्तमाए पुढवीए णेरइएसु सव्वत्थोवा सासणसम्मादिट्ठी।।३५।।

सम्मामिच्छादिट्ठी संखेज्जगुणा।।३६।।
असंजदसम्मादिट्ठी असंखेज्जगुणा।।३७।।
मिच्छादिट्ठी असंखेज्जगुणा।।३८।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-यथा सामान्यनारकाणामल्पबहुत्वं प्ररूपितं, तथा प्रथमपृथिवीगतनारकाणामल्प-बहुत्वं प्ररूपयितव्यं, ओघनारकाल्पबहुत्वालापात् प्रथमपृथिवीगतनारकाणामल्पबहुत्वालापस्य भेदाभावात्। पर्यायार्थिकनये पुन: अवलम्ब्यमाने अस्ति विशेष:, असौ ज्ञात्वा वक्तव्य:।
द्वितीयादिषण्णां पृथिवीनां सासादनसम्यग्दृष्टय: बुद्ध्या पृथक्-पृथक् स्थापयित्वा सर्वस्तोका: सन्ति इति उत्तंâ, षण्णामल्पबहुत्वानामेकत्वविरोधात्।
द्वितीयपृथिव्यादिसप्तमपृथिवीपर्यंतसासादनानामुपरि पृथक्-पृथक् षट्पृथिवीसम्यग्मिथ्यादृष्टय: संख्यातगुणा:, सासादनसम्यग्दृष्टि-उपक्रमणकालात् सम्यग्मिथ्यादृष्टि-उपक्रमणकालस्य युक्त्या संख्यातगुणत्वोपलंभात्। अत्र गुणकार: संख्याता: समया:।
एतेभ्य: असंयतसम्यग्दृष्टय: असंख्यातगुणा:। षट्पृथिवीगतसम्यग्मिथ्यादृष्टि-उपक्रमणकालेभ्य: षट्पृथिवीगतासंयतसम्यग्दृष्टि-उपक्रमणकालानामसंख्यातगुणत्वदर्शनात्, एकसमयेन सम्यग्मिथ्यात्वं प्रतिपद्यमानजीवेभ्य: एकसमयेन वेदकसम्यक्त्वं प्रतिपद्यमानजीवानामसंख्यातगुणत्वाद्वा। अत्र आवलिकाया: असंख्यातभागो गुणकार: ज्ञातव्य:।
षण्णां पृथिवीनामसंयतसम्यग्दृष्टिभ्य: जगत्श्रेण्या: द्वादश-दशम-अष्टम-षष्ठ-तृतीय-द्वितीयवर्गमूल-भाजितजगत्श्रेणीमात्रषट्पृथिवीमिथ्यादृष्टय: असंख्यातगुणा भवन्ति। अत्र श्रेण्या: असंख्यातभागो गुणकार:, तत्तु असंख्यातानि जगत्श्रेणिप्रथमवर्गमूलानि।
अत्र क: प्रतिभाग:?
असंख्यातानि जगच्छ्रेण्या: द्वादश-दशम-अष्टम-षष्ठ-तृतीय-द्वितीयवर्गमूलानि। किंच-असंयत-सम्यग्दृष्टि-राशिना गुणितत्वात्।
संप्रति षट्पृथिवीषु चतुर्थगुणस्थाने सम्यक्त्वाल्पबहुत्वप्रतिपादनाय सूत्रद्वयमवतार्यते-असंजदसम्मादिट्ठिट्ठाणे सव्वत्थोवा उवसमसम्मादिट्ठी।।३९।।
वेदगसम्मादिट्ठी असंखेज्जगुणा।।४०।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सर्वेभ्य: उच्यमानस्थानेभ्य: स्तोका: इति सर्वस्तोका:, आवलिकाया: असंख्यातभागमात्रोपक्रमणकालेन संचितत्वात्।
षट्पृथिवीषु क्षायिकसम्यग्दृष्टय: न प्ररूपिता:, तत्र तेषामुत्पादाभावात्, मनुष्यगतिं मुक्त्वान्यत्र दर्शनमोहनीयक्षपणाभावाच्च।
एवं द्वितीयस्थले प्रथमादिनरकेषु अल्पबहुत्वनिरूपणत्वेन सूत्रसप्तकं गतम्।
इति नरकगत्यन्तराधिकार:।

अब प्रथम आदि पृथिवी के नारकियों का गुणस्थान के आश्रित अल्पबहुत्व बतलाने हेतु पाँच सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

इसी प्रकार प्रथम पृथिवी में नारकियों का अल्पबहुत्व जाना जाता है।।३४।।

नारकियों में दूसरी से लेकर सातवीं पृथिवी तक सासादनसम्यग्दृष्टि जीव सबसे कम हैं।।३५।।

नारकियों में दूसरी से लेकर सातवीं पृथिवी तक सासादनसम्यग्दृष्टियों से सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीव संख्यातगुणित हैं।।३६।।

नारकियों में दूसरी से सातवीं पृथिवी तक सम्यग्मिथ्यादृष्टियों से असंयतसम्यग्दृष्टि जीव असंख्यातगुणित हैं।।३७।।

नारकियोें में दूसरी से सातवीं पृथिवी तक असंयतसम्यग्दृष्टियों से मिथ्यादृष्टि जीव असंख्यातगुणित हैं।।३८।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-जिस प्रकार सामान्य नारकियों का अल्पबहुत्व कहा है, उसी प्रकार पहली पृथिवी के नारकियों का अल्पबहुत्व कहना चाहिए, क्योंकि सामान्य नारकियों के अल्पबहुत्व के कथन से पहली पृथिवी के नारकियों के अल्पबहुत्व के कथन में कोई भेद नहीं है। किन्तु पर्यायार्थिकनय का अवलम्बन करने पर कुछ विशेषता है, सो जानकर कहना चाहिए।

दूसरी से लेकर छहों पृथिवियों के सासादनसम्यग्दृष्टियों को बुद्धि के द्वारा पृथक्-पृथक् स्थापित करके आगे-आगे सबसे कम हैं ऐसा अर्थ कहा गया है, क्योंकि छहों अल्पबहुत्वों को एक मानने में विरोध आता है।

दूसरी पृथिवी से लेकर सातवीं पृथिवी तक सासादनसम्यग्दृष्टियों के ऊपर पृथक्-पृथक् छह-छह पृथिवियों के सम्यग्मिथ्यादृष्टि नारकी संख्यातगुणित हैं, क्योंकि सासादनसम्यग्दृष्टियों के उपक्रमणकाल से सम्यग्मिथ्यादृष्टियों का उपक्रमणकाल युक्ति से संख्यातगुणा पाया जाता है। यहाँ संख्यात समय गुणकार है।

इनसे असंयतसम्यग्दृष्टि असंख्यातगुणे हैं। छह पृथिवियों संबंधी सम्यग्मिथ्यादृष्टियों के उपक्रमणकालों से छह पृथिवीगत असंयतसम्यग्दृष्टियों का उपक्रमणकाल असंख्यातगुणा देखा जाता है। अथवा, एक समय के द्वारा सम्यग्मिथ्यात्व को प्राप्त होने वाले जीवों की अपेक्षा एक समय के द्वारा वेदकसम्यक्त्व को प्राप्त होने वाले जीव असंख्यातगुणित होते हैं। यहाँ आवली का असंख्यातवाँ भाग गुणकार जानना चाहिए।

छहों पृथिवियों के असंयतसम्यग्दृष्टियों से जगत्श्रेणी के बारहवें, दशवें, आठवें, छठवें, तीसरे और दूसरे वर्गमूल से भाजित जगत्श्रेणी प्रमाण छह पृथिवियों के मिथ्यादृष्टि नारकी असंख्यातगुणित होते हैं। यहाँ जगत्श्रेणी का असंख्यातवाँ भाग गुणकार है, जो जगत्श्रेणी के असंख्यात प्रथम वर्गमूल प्रमाण है।

प्रतिभाग क्या है ?

उत्तर-जगत्श्रेणी के बारहवें, दशवें, आठवें, छठवें, तीसरे और दूसरे असंख्यात वर्गमूल प्रमाण प्रतिभाग है, क्योंकि ये सब असंयतसम्यग्दृष्टि राशि से गुणित हैं।

अब छह पृथिवियों में चतुर्थ गुणस्थान में सम्यक्त्व का अल्पबहुत्व बतलाने हेतु दो सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

नारकियों में द्वितीयादि छह पृथिवियों के असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थान में उपशमसम्यग्दृष्टि जीव सबसे कम हैं।।३९।।

नारकियों में द्वितीयादि छह पृथिवियों के असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थान में उपशमसम्यग्दृष्टियों से वेदकसम्यग्दृष्टि जीव असंख्यातगुणित हैं।।४०।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-आगे कहे जाने वाले स्थानों से उपशमसम्यग्दृष्टि जीव थोड़े होते हैं, इसलिए वे सर्वस्तोक-सबसे कम कहलाते हैं, क्योंकि आवली के असंख्यातवें भाग मात्र उपक्रमणकाल के द्वारा उनका संचय होता है।

छहों पृथिवियों में क्षायिकसम्यग्दृष्टियों का प्ररूपण नहीं किया है, क्योंकि नीचे की छह पृथिवियों में क्षायिकसम्यग्दृष्टियों की उत्पत्ति नहीं होती है और मनुष्यगति को छोड़कर अन्य गतियों में दर्शनमोहनीय की क्षपणा नहीं होती है।

इस प्रकार द्वितीय स्थल में प्रथम आदि नरकों में नारकियों का अल्पबहुत्व निरूपण करने वाले सात सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार नरकगति अन्तराधिकार समाप्त हुआ।

अथ तिर्यग्गत्यन्तराधिकार:

अत्र स्थलत्रयेण द्वादशसूत्रै: अल्पबहुत्वानुगमे तिर्यग्गतिनाम अन्तराधिकार: कथ्यते। तत्र तावत् प्रथमस्थले चतुर्विधतिरश्चां गुणस्थानापेक्षया अल्पबहुत्वकथनमुख्यत्वेन ‘‘तिरिक्खगदीए’’ इत्यादिसूत्रपंचवंâ। तदनु द्वितीयस्थले असंयतसम्यग्दृष्टि-संयतासंयतयो: अल्पबहुत्वनिरूपणत्वेन ‘‘असंजद’’ इत्यादिना पंच सूत्राणि। तत्पश्चात् तृतीयस्थले पंचेन्द्रियतिरश्चीनां चतुर्थपंचमगुणस्थानयो: अल्पबहुत्वप्रतिपादनत्वेन ‘‘णवरि विसेसो’’ इत्यादिसूत्रद्वयं इति समुदायपातनिका।

अधुना चतुर्विधतिरश्चां अल्पबहुत्वप्रतिपादनाय सूत्रपंचकमवतार्यते-तिरिक्खगदीए तिरिक्ख-पंचिंदियतिरिक्ख-पंचिंदियतिरिक्खपज्जत्तपंचिंदिय-तिरिक्खजोणिणीसु सव्वत्थोवा संजदासंजदा।।४१।।
सासणसम्मादिट्ठी असंखेज्जगुणा।।४२।।
सम्मामिच्छादिट्ठिणो संखेज्जगुणा।।४३।।
असंजदसम्मादिट्ठी असंखेज्जगुणा।।४४।।
मिच्छादिट्ठी अणंतगुणा, मिच्छादिट्ठी असंखेज्जगुणा।।४५।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-प्रकृतचर्तुिवधतिर्यक्षु ये देशव्रतिन: ते स्वात्मनां एव शेषगुणस्थानवर्तिजीवेभ्य: स्तोका: सन्ति।
किमर्थं देशव्रतिन: स्तोका:?
संयमासंयमलब्धे: सुदुर्लभत्वात्।
चतुर्विधतिरश्चां ये सासादनसम्यग्दृष्टय: ते स्वक-स्वकसंयतासंयतेभ्य: असंख्यातगुणा:, संयमासंयमोपलंभात् सासादनगुणस्थानस्य सुलभोपलब्धे:।
अत्र को गुणकार: ?
आवलिकाया: असंख्यातभाग:।
तदपि कथं ज्ञायते ?
अंतर्मुहूर्तसूत्रात्, आचार्यपरंपरागतोपदेशात् वा।
चतुर्विधतिर्यक्सासादनसम्यग्दृष्टिभ्य: स्वक-स्वकसम्यग्मिथ्यादृष्टय: संख्यातगुणा:, सासादनोप-क्रमणकालात् सम्यग्मिथ्यादृष्टीनां उपक्रमणकालस्य तंत्रयुक्तिभ्यां संख्यातगुणत्वोपलंभात्। अत्र गुणकार: संख्यातसमया:।
चतुर्विधतिर्यक्सम्यग्मिथ्यादृष्टिभ्य: तेषां चैव असंयतसम्यग्दृष्ट्य: असंख्यातगुणा:, सम्यग्मिथ्यात्वं प्रतिपद्यमानजीवेभ्य: सम्यक्त्वं प्रतिपद्यमानजीवानामसंख्यातगुणत्वात्। अत्र गुणकार: आवलिकाया: असंख्यातभाग:।
एतत् कुतो ज्ञायते ?
‘‘पलिदोवममवहिरदि अंतोमुहुत्तेण’’ इति सूत्रात्, आचार्य परंपरागतोपदेशाद्वा ज्ञायते।
चतुर्णां तिरश्चां असंयतसम्यग्दृष्टिभ्यस्तेषां चैव मिथ्यादृष्टयोऽनंतगुणा: असंख्यातगुणाश्च। अनयो: स्पष्टीकरणं क्रियते-तिर्यग्मिथ्यादृष्टय: कियन्तोऽपि अनंता: सामान्यतिर्यगपेक्षया एकेन्द्रियापेक्षया च, शेषत्रिविधतिर्यग्मिथ्यादृष्टय: असंख्याता: इति ज्ञातव्या:।
अत्र गुणकार: अभव्यसिद्धेभ्योऽनंतगुण: सिद्धराशिभ्योऽपि अनंतगुण:, यश्च सर्वजीवराशे: अनंतप्रथमवर्गमूलप्रमाणमिति। प्रतिभागश्च तिर्यगसंयतसम्यग्दृष्टिराशि:। शेषतिर्यक्त्रिकमिथ्यादृष्टीनां गुणकार: जगत्प्रतरस्य असंख्यातभाग:, यश्च जगत्श्रेणि-असंख्यातप्रथमवर्गमूलप्रमितासंख्यातजगत्श्रेणिप्रमाणमस्ति। प्रतिभागश्च घनांगुलस्यासंख्यातभाग:। अथवा स्वक-स्वकद्रव्याणामसंख्यातभाग: गुणकार:, प्रतिभागश्च स्वक-स्वकासंयतसम्यग्दृष्टिजीवानां प्रमाणमिति।
एवं प्रथमस्थले गुणस्थानापेक्षया तिरश्चां अल्पबहुत्वकथनत्वेन पंच सूत्राणि गतानि।


अथ तिर्यंचगति अन्तराधिकार प्रारंभ

अब तीन स्थलों में बारह सूत्रों के द्वारा अल्पबहुत्वानुगम में तिर्यंचगति नामका अंतराधिकार कहा जा रहा है। उनमें से प्रथम स्थल में चार प्रकार के तिर्यंचों का गुणस्थान की अपेक्षा अल्पबहुत्व बतलाने वाले ‘‘तिरिक्खगदीए’’ इत्यादि पाँच सूत्र हैं। पुन: द्वितीय स्थल में असंयतसम्यग्दृष्टि और संयतासंयत तिर्यंचों का अल्पबहुत्व निरूपण करने वाले ‘‘असंजद’’ इत्यादि पाँच सूत्र हैं। तत्पश्चात् तृतीय स्थल में पंचेन्द्रिययोनिमती तिर्यंचों में चतुर्थ और पंचम गुणस्थानवर्तियों का अल्पबहुत्व प्रतिपादन करने वाले ‘‘णवरि विसेसो’’ इत्यादि दो सूत्र हैं। यह सूत्रों की समुदायपातनिका हुई।

अब चार प्रकार के तिर्यंचोें का अल्पबहुत्व प्रतिपादन करने हेतु पाँच सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

तिर्यंचगति में तिर्यंच, पंचेन्द्रिय तिर्यंच, पंचेन्द्रियतिर्यंचपर्याप्त और पंचेन्द्रियतिर्यंच-योनिमती जीवों में संयतासंयत सबसे कम हैं।।४१।।

उक्त चारों प्रकार के तिर्यंचों में संयतासंयतों से सासादनसम्यग्दृष्टि जीव असंख्यातगुणित हैं।।४२।।

उक्त चारों प्रकार के तिर्यंचों में सासादनसम्यग्दृष्टियों से सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीव संख्यातगुणित हैं।।४३।।

उक्त चारों प्रकार के तिर्यंचों में सम्यग्मिथ्यादृष्टियों से असंयतसम्यग्दृष्टि जीव असंख्यातगुणित हैं।।४४।।

उक्त चारों प्रकार के तिर्यंचों में असंयतसम्यग्दृष्टियों से मिथ्यादृष्टि जीव अनन्तगुणित हैं और मिथ्यादृष्टि जीव असंख्यातगुणित हैं।।४५।।'

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-प्रकृत चारों प्रकार के तिर्यंचों में जो तिर्यंच देशव्रती हैं, वे अपने ही शेष गुणस्थानवर्ती जीवों से थोड़े हैं।

शंका-देशव्रती अल्प क्यों होते हैं ?

समाधान-क्योंकि, संयमासंयम की प्राप्ति अतिदुर्लभ है। चारों प्रकार के तिर्यंचों में जो सासादनसम्यग्दृष्टि जीव हैं, वे अपने-अपने संयतासंयतों से असंख्यात- गुणित हैं, क्योंकि संयमासंयम गुणस्थान की प्राप्ति की अपेक्षा सासादनगुणस्थान की प्राप्ति सुलभ है।

प्रश्न-यहाँ गुणकार क्या है ?

उत्तर-आवली का असंख्यातवाँ भाग गुणकार है।

प्रश्न-यह कैसे जाना जाता है ?

उत्तर-अन्तर्मुहूर्त अवहारकाल के प्रतिपादक सूत्र से और आचार्य-परम्परा से आये हुए उपदेश से यह जाना जाता है।

चारों प्रकार के सासादनसम्यग्दृष्टि तिर्यंचों में से अपने-अपने सम्यग्मिथ्यादृष्टि तिर्यंच संख्यातगुणित हैं, क्योंकि सासादनसम्यग्दृष्टियों के उपक्रमणकाल (उसमें होने की अपेक्षा) से सम्यग्मिथ्यादृष्टियों का उपक्रमणकाल आगम और युक्ति से संख्यातगुणा पाया जाता है। यहाँ संख्यात समय गुणकार है। चारों प्रकार के सम्यग्मिथ्यादृष्टि तिर्यंचों से उनके ही असंयतसम्यग्दृष्टि जीव असंख्यातगुणित हैं, क्योंकि सम्यग्मिथ्यात्व को प्राप्त होने वाले जीवों से सम्यक्त्व को प्राप्त होने वाले जीव असंख्यातगुणित होते हैं। यहाँ आवली का असंख्यातवाँ भाग गुणकार है।

शंका-यह कैसे जाना जाता है ?

समाधान-इन जीव राशियों के प्रमाण द्वारा अन्तर्मुहूर्तकाल से पल्योपम अपहृत होता है। इस द्रव्यानुयोगद्वार के सूत्र से और आचार्य-परम्परा से आए हुए उपदेश से यह जाना जाता है।

चारों प्रकार के असंयतसम्यग्दृष्टि तिर्यंचों से उनके ही मिथ्यादृष्टि तिर्यंच अनन्तगुणित हैं और असंयतगुणित भी हैं।

उसका स्पष्टीकरण करते हैं-मिथ्यादृष्टि सामान्य तिर्यंच कई प्रकार के होते हुए भी सामान्य तिर्यंच की अपेक्षा और एकेन्द्रिय की अपेक्षा अनन्त हैं, शेष तीन प्रकार के मिथ्यादृष्टि तिर्यंच असंख्यात हैं, ऐसा जानना चाहिए।

यहाँ पर अभव्यसिद्धों से अनन्तगुणा और सिद्धों से भी अनन्तगुणा तिर्यंच मिथ्यादृष्टियों का गुणकार है, जो संपूर्ण जीवराशि के अनन्त प्रथम वर्गमूलप्रमाण है और प्रतिभाग असंयतसम्यग्दृष्टि तिर्यंचराशि प्रमाण है। शेष तीन प्रकार के तिर्यंच मिथ्यादृष्टियों का गुणकार जगत्प्रतर का असंख्यातवाँ भाग है, जो जगत्श्रेणी के असंख्यात प्रथम वर्गमूल प्रमित असंख्यात जगत्श्रेणी प्रमाण है। घनांगुल का असंख्यातवाँ भाग प्रतिभाग है। अथवा अपने-अपने द्रव्य का असंख्यातवाँ भाग गुणकार है। अपने-अपने असंयतसम्यग्दृष्टि जीवों का प्रमाण प्रतिभाग है।

इस प्रकार प्रथम स्थल में गुणस्थान की अपेक्षा तिर्यंचों का अल्पबहुत्व बतलाने वाले पाँच सूत्र पूर्ण हुए।

संप्रति असंयतसम्यग्दृष्टि-संयतासंयतगुणस्थानयो: सम्यक्त्वापेक्षयाल्पबहुत्वनिरूपणाय सूत्रपंचकमवतार्यते-असंजदसम्मादिट्ठिट्ठाणे सव्वत्थोवा उवसमसम्मादिट्ठी।।४६।।

खइयसम्मादिट्ठी असंखेज्जगुणा।।४७।।

वेदगसम्मादिट्ठी असंखेज्जगुणा।।४८।।
संजदासंजदट्ठाणे सव्वत्थोवा उवसमसम्माइट्ठी।।४९।।
वेदगसम्मादिट्ठी असंखेज्जगुणा।।५०।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-चतुर्विधेषु तिर्यक्षु भणिष्यमाणसर्वसम्यग्दृष्टिद्रव्यात् उपशमसम्यग्दृष्टय: सर्वस्तोका:, आवलिकाया: असंख्यातभागमात्रोपक्रमणकालाभ्यन्तरे संचितत्वात्।
क्षायिकसम्यग्दृष्ट्य: असंख्यातगुणा:, असंख्यातवर्षायुष्केषु पल्योपमस्यासंख्यातभागमात्रकालेन संचितत्वात्, अनादिनिधनस्वरूपेण उपशमसम्यग्दृष्टिभ्य: क्षायिकसम्यग्दृष्टीनां आवलिकाया: असंख्यातभाग-गुणत्वेन अवस्थानात् वा।
आवलिकाया: असंख्यातभागो गुणकार: कथं ज्ञायते ?
आचार्यपरंपरागतोपदेशात्।
दर्शनमोहनीयक्षयेणोत्पन्नक्षायिकसम्यक्त्वानां सम्यक्त्वोत्पत्ते: पूर्वमेव बद्धतिर्यगायुष्काणां प्रचुरं संभवाभावात्। न च लोके सारद्रव्याणां दुर्लभत्वमप्रसिद्धं, अश्वहस्तिपाषाणादिषु साराणां लोके दुर्लभत्वोपलंभात्।
देशव्रतानुविद्धोपशमसम्यक्त्वस्य दुर्लभत्वात् पंचमगुणस्थाने उपशमसम्यग्दृष्टय: सर्वस्तोका: सन्ति, एभ्य: वेदकसम्यग्दृष्टयोऽसंख्यातगुणा:। अत्र गुणकार: आवलिकाया: असंख्यातभाग:। एतस्मात् गुणकारात् ज्ञायते समयं प्रति तदुपचयात् असंख्यातगुणत्वेनोपचिता: इति असंख्यातगुणत्वं।
अत्र क्षायिकदृष्टीनामल्पबहुत्वं किन्न प्ररूपितं ?
नैतत् वक्तव्यं, तिर्यक्षु असंख्यातवर्षायुष्केषु एव क्षायिकसम्यग्दृष्टीनां उपपादोपलंभात्, तत्र संयतासंयतगुणस्थानमेव नास्तीति ज्ञातव्यं।
एवं द्वितीयस्थले चतुर्थपंचमगुणस्थानवर्तिनो: अल्पबहुत्वप्रतिपादनत्वेन सूत्रपंचकं गतम्।
पंचेन्द्रियतिर्यग्योनिनीषु सम्यक्त्वयो: अल्पबहुत्वप्रतिपादनाय सूत्रद्वयमवतार्यते-णवरि विसेसो, पंचिंदियतिरिक्खजोणिणीसु असंजदसम्मादिट्ठि-संजदासंजदट्ठाणे सव्वत्थोवा उवसमसम्मादिट्ठी।।५१।।
वेदगसम्मादिट्ठी असंखेज्जगुणा।।५२।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-द्वयो: सूत्रयोरर्थ: सुगमोऽस्ति। अत्र क्षायिकसम्यग्दृष्टीनामल्पबहुत्वं न कथितं, सर्वस्त्रीषु सम्यग्दृष्टीनामुत्पादाभावात् मनुष्यगतिव्यतिरिक्तान्यगतिषु दर्शनमोहनीयक्षपणाभावाच्च।
तात्पर्यमेतत्-संप्रति कर्मभूमिजमनुष्याणामपि केवलिश्रुतकेवलिनोरभावे क्षायिकसम्यग्दर्शनं नोत्पद्यते। अतएव क्षायिकसम्यक्त्वं कदा मे भवेदिति भावना सदैव भावयितव्या भवद्भि: इति।
एवं तृतीयस्थले तिरश्चीनां सम्यक्त्व-देशसंयतयो: अल्पबहुत्वप्रतिपादनत्वेन द्वे सूत्रे गते।
एवं तिर्यग्गति-अन्तराधिकार: समाप्त:।

अब असंयतसम्यग्दृष्टि और संयतासंयत गुणस्थानों में सम्यक्त्व की अपेक्षा अल्पबहुत्व का निरूपण करने हेतु पाँच सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

तिर्यंचों में असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थान में उपशमसम्यग्दृष्टि जीव सबसे कम हैं।।४६।।

तिर्यंचों में असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थान में उपशमसम्यग्दृष्टियों से क्षायिकसम्यग्दृष्टि जीव असंख्यातगुणित हैं।।४७।।

तिर्यंचों में असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थान में क्षायिकसम्यग्दृष्टियों से वेदकसम्यग्दृष्टि जीव असंख्यातगुणित हैं।।४८।।

तिर्यंयों में संयतासंयत गुणस्थान में उपशमसम्यग्दृष्टि जीव सबसे कम हैं।।४९।।

तिर्यंचों में संयतासंयत गुणस्थान में उपशमसम्यग्दृष्टियों से वेदकसम्यग्दृष्टि जीव असंख्यातगुणित हैं।।५०।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-चारों प्रकार के तिर्यंचों में आगे कहे जाने वाले सर्व सम्यग्दृष्टियों के द्रव्यप्रमाण से उपशमसम्यग्दृष्टि जीव सबसे कम हैं, क्योंकि आवली के असंख्यातवें भाग मात्र उपक्रमणकाल के भीतर उनका संचय होता है। क्षायिकसम्यग्दृष्टि असंख्यातगुणे हैं, क्योंकि असंख्यातवर्ष की आयु वाले जीवों में पल्योपम के असंख्यातवें भागमात्र काल के द्वारा संचित होने से अथवा अनादिनिधन स्वरूप से उपशमसम्यग्दृष्टियों की अपेक्षा क्षायिकसम्यग्दृष्टि जीवों का आवली के असंख्यातवें भाग गुणितप्रमाण से अवस्थान पाया जाता है।

शंका-यहाँ आवली का असंख्यातवाँ भाग गुणकार है, यह कैसे जाना जाता है ?

समाधान-आचार्य परम्परा से आए हुए उपदेश से जाना जाता है। क्योंकि जिन्होंने सम्यक्त्व की उत्पत्ति से पूर्व ही तिर्यंच आयु का बंध कर लिया है, ऐसे दर्शनमोहनीय के क्षय से उत्पन्न हुए क्षायिकसम्यग्दृष्टि प्रचुरता से होना संभव नहीं है और लोक में सार पदार्थों की दुर्लभता अप्रसिद्ध भी नहीं है, क्योंकि अश्व, हस्ती और पाषाणादिकों में सार पदार्थों की सर्वत्र दुर्लभता पाई जाती है।

पंचमगुणस्थान में उपशमसम्यग्दृष्टि तिर्यंच सबसे कम होते हैं, क्योंकि देशव्रत सहित उपशम सम्यक्त्व का होना दुर्लभ है। उनसे वेदकसम्यग्दृष्टि असंख्यातगुणे हैं। यहाँ आवली का असंख्यातवाँ भाग गुणकार है। इस गुणकार से यह जाना जाता है कि प्रतिसमय उनका उपचय होने से वे असंख्यातगुणित संचित हो जाते हैं, इसलिए उनके प्रमाण में असंख्यातगुणितपना बन जाता है।

शंका-यहाँ संयतासंयत गुणस्थान में क्षायिक सम्यग्दृष्टि तिर्यंचों का अल्पबहुत्व क्यों नहीं कहा ?

समाधान-ऐसा नहीं कहना चाहिए, क्योंकि असंख्यात वर्ष की आयु वाले तिर्यंचों में ही क्षायिकसम्यग्दृष्टि जीवों का उपपाद-जन्म पाया जाता है। वहाँ भोगभूमि में संयतासंयत गुणस्थान ही नहीं है, ऐसा जानना चाहिए।

इस प्रकार द्वितीय स्थल में चतुर्थ-पंचम गुणस्थानवर्ती तिर्यंचों का अल्पबहुत्व बतलाने वाले पाँच सूत्र पूर्ण हुए।

अब पंचेन्द्रिय स्त्रीवेदी तिर्यंचों में दोनों प्रकार के सम्यग्दृष्टियों का अल्पबहुत्व बतलाने हेतु दो सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

विशेषता यह है कि पंचेन्द्रिय तिर्यंच योनिमतियों में असंयतसम्यग्दृष्टि और संयतासंयत गुणस्थान में उपशमसम्यग्दृष्टि जीव सबसे कम हैं।।५१।।

पंचेन्द्रियतिर्यंच योनिमतियों में असंयतसम्यग्दृष्टि और संयतासंयत गुणस्थान में उपशमसम्यग्दृष्टियों से वेदकसम्यग्दृष्टि जीव असंख्यातगुणित हैं।।५२।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-दोनों सूत्रों का अर्थ सुगम है। यहाँ पंचेन्द्रिय तिर्यंच योनिमतियों में क्षायिकसम्यग्दृष्टि जीवों का अल्पबहुत्व नहीं कहा है, क्योंकि सर्वप्रकार की स्त्रियों में सम्यग्दृष्टि जीवों का उत्पाद नहीं होता है तथा मनुष्यगति को छोड़कर अन्य गतियोें में दर्शनमोहनीय कर्म की क्षपणा का भी अभाव है।

तात्पर्य यह है कि आज कर्मभूमियों में उत्पन्न मनुष्यों के भी केवली-श्रुतकेवली के अभाव में क्षायिकसम्यग्दर्शन नहीं उत्पन्न होता है। अतएव मुझे क्षायिकसम्यक्त्व कब प्राप्त हो, ऐसी भावना हम सभी को अवश्य भाते रहना चाहिए।

इस प्रकार से तृतीय स्थल में स्त्रीवेदी तिर्यंचों में सम्यक्त्व और देशसंयत जीवों का अल्पबहुत्व प्रतिपादन करने वाले दो सूत्र पूर्ण हुए। इस प्रकार तिर्यंचगति अन्तराधिकार समाप्त हुआ।


अथ मनुष्यगत्यन्तराधिकार:

अथ चतुर्भि:स्थलै: अष्टाविंशतिसूत्रै: मनुष्यगतिनाम अन्तराधिकार: अल्पबहुत्वानुगमे प्रारभ्यते। तत्र तावत् प्रथमस्थले त्रिविधमनुष्येषु उपशामक-क्षपक-सयोग्ययोगिनां अल्पबहुत्वप्रतिपादनत्वेन ‘‘मणुसगदीए’’ इत्यादिसूत्रषट्कं। तदनु द्वितीयस्थले एषामेव अप्रमत्तादि-मिथ्यादृष्टिपर्यंतानां अल्पबहुत्वकथनत्वेन ‘‘अप्पमत्त’’ इत्यादिना सप्त सूत्राणि। तत: परं तृतीयस्थले असंयतसम्यग्दृष्टि-संयतासंयतगुणस्थानयो: अल्पबहुत्वप्रतिपादनाय ‘‘असंजद’’ इत्यादिना नव सूत्राणि। तत्पश्चात् चतुर्थस्थले स्त्रीभाववेदिनां मनुष्याणां विशेषप्रतिपादनाय ‘‘णवरि विसेसो’’ इत्यादिना षट्सूत्राणि कथ्यन्ते इति समुदायपातनिका।

संप्रति त्रिविधमनुष्याणां उपशामक-क्षपक-सयोगी-अयोगिनां अल्पबहुत्वप्रतिपादनाय सूत्रषट्कमवतार्यते-मणुसगदीए मणुस-मणुसपज्जत्त-मणुसिणीसु तिसु अद्धासु उवसमा पवेसणेण तुल्ला थोवा।।५३।।
उवसंतकसायवीदरागछदुमत्था तत्तिया चेव।।५४।।
खवा संखेज्जगुणा।।५५।।
खीणकसायवीदरागछदुमत्था तत्तिया चेव।।५६।।
सजोगिकेवली अजोगिकेवली पवेसणेण दो वि तुल्ला तत्तिया चेव।।५७।।
सजोगिकेवली अद्धं पडुच्च संखेज्जगुणा।।५८।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-त्रिष्वपि मनुष्येषु त्रयोऽपि उपशामका: प्रवेशेन अन्योऽन्यमपेक्ष्य तुल्या: सदृशा:, चतु:पंचाशत्मात्रत्वात्। ते चैव स्तोका: उपरिमगुणस्थानजीवापेक्षया। उपशान्तकषायसाधवोऽपि प्रवेशेन पूर्वोक्तप्रमाणा: एव। अधस्तनगुणस्थाने प्रतिपन्नजीवानां चैव उपशान्तकषायवीतरागछद्मस्थपर्यायेण परिणामोपलंभात्। क्षपका: अष्टोत्तरशतमात्रत्वात्, क्षीणकषायसाधवोऽपि तावन्तश्चैव।
सयोगिकेवलिन: अयोगिकेवलिनश्च प्रवेशेन तुल्या: तावंतश्चैव। क्षीणकषायपर्यायेण परिणतानां च उत्तरगुणस्थानोपक्रमोपलंभात्।
सामान्यमनुष्य-पर्याप्तमनुष्ययो: ओघसयोगिराशिं स्थापयित्वा अधस्तनराशिना अपवत्र्य गुणकार: उत्पादयितव्य:। मनुष्यिनीषु पुन: तत्प्रायोग्यसंख्यातसयोगिजीवान् स्थापयित्वा अष्टोत्तरशतानि मुक्त्वा तत्प्रायोग्यसंख्यातक्षीणकषायेभ्य: अपवत्र्य गुणकार: उत्पादयितव्य:।
एवं प्रथमस्थले उपशामकादीनां अयोग्यन्तानां अल्पबहुत्वनिरूपणत्वेन सूत्राणि षट् गतानि।
संप्रति अप्रमत्तादीनां अधस्तनगुणवर्तिनां अल्पबहुत्वप्रतिपादनाय सूत्रसप्तकमवतार्यते-अप्पमत्तसंजदा अक्खवा अणुवसमा संखेज्जगुणा।।५९।।
पमत्तसंजदा संखेज्जगुणा।।६०।।
संजदासंजदा संखेज्जगुणा।।६१।।
सासणसम्मादिट्ठी संखेज्जगुणा।।६२।।
सम्मामिच्छादिट्ठी संखेज्जगुणा।।६३।।
असंजदसम्मादिट्ठी संखेज्जगुणा।।६४।।
मिच्छादिट्ठी असंखेज्जगुणा, मिच्छादिट्ठी संखेज्जगुणा।।६५।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सामान्यमनुष्य-पर्याप्तमनुष्ययो: ओघे उक्ताप्रमत्तराशिश्चैव भवति। मानुषीषु पुन: तत्प्रायोग्यसंख्यातमात्रो भवति। मनुष्यमनुष्यपर्याप्तयो: संयतासंयता: संख्यातकोटिमात्रा:। मानुषीषु पुन: तत्प्रायोग्यसंख्यातरूपमात्रा इति गृहीतव्या:, वर्तमानकाले इमे इयन्त: इति उपदेशाभावात्।
इमे सासादना: संयतासंयतेभ्य: संख्यातगुणितकोटिमात्रत्वात् संख्यातगुणा:। मानुषीषु तत: संख्यातगुणा: संति। ततोऽपि संख्यातगुणा: सम्यग्मिथ्यादृष्टय:। एभ्योऽपि संख्यातगुणा: असंयतसम्यग्दृष्टय:, सप्तशतकोटिमात्रत्वात्।
मिथ्यादृष्टयोऽसंख्यातगुणा: संख्यातगुणाश्च। एतत् स्पष्टीक्रियते-सामान्यमनुष्या: मिथ्यादृष्टय: असंख्यातगुणा:, जगत् श्रेण्या: असंख्यातभागपरिमाणत्वात् एषु एव लब्ध्यपर्याप्तमनुष्या: गर्भिता: सन्ति। पर्याप्तमनुष्या: मानुष्य: भाववेदिन: मिथ्यादृष्टय: संख्यातगुणा: संख्यातरूपपरिमाणत्वात्।
एवं द्वितीयस्थले त्रिविधमनुष्याणां चर्तुिवधानां वा अल्पबहुत्वकथनमुख्यत्वेन सप्त सूत्राणि गतानि।

अथ मनुष्यगति अन्तराधिकार प्रारंभ

अब चार स्थलों में अट्ठाईस सूत्रों के द्वारा अल्पबहुत्वानुगम में मनुष्यगति नामका अन्तराधिकार प्रारंभ हो रहा है। उनमें से प्रथम स्थल में तीन प्रकार के मनुष्यों में उपशामक, क्षपक, सयोगी और अयोगीकेवली भगवन्तों का अल्पबहुत्व बतलाने वाले ‘‘मणुसगदीए’’ इत्यादि छह सूत्र हैं। पुन: द्वितीय स्थल में उन्हीं अप्रमत्त से लेकर नीचे मिथ्यादृष्टि जीवों तक का अल्पबहुत्व बतलाने हेतु ‘‘अप्पमत्त’’ इत्यादि सात सूत्र हैं। उसके बाद तृतीय स्थल में असंयतसम्यग्दृष्टि और संयतासंयत गुणस्थानवर्तियों का अल्पबहुत्व प्रतिपादित करने हेतु ‘‘असंजद’’ इत्यादि नौ सूत्र हैं। तत्पश्चात् चतुर्थ स्थल में भावस्त्रीवेदी मनुष्यों का विशेष कथन करने वाले ‘‘णवरि विसेसो’’ इत्यादि छह सूत्र कहेंगे। सूत्रों की यह समुदायपातनिका हुई।

अब तीन प्रकार के मनुष्यों में उपशामक-क्षपक-सयोगिकेवली और अयोगिकेवलियों का अल्पबहुत्व बतलाने हेतु छह सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

मनुष्यगति में मनुष्य, मनुष्यपर्याप्त और मनुष्यिनियों में अपूर्वकरण आदि तीन गुणस्थानों में उपशामक जीव प्रवेश की अपेक्षा तुल्य होकर अल्प हैं।।५३।।

उपशान्तकषायवीतरागछद्मस्थ जीव प्रवेश से पूर्वोक्त प्रमाण ही हैं।।५४।।

तीनों प्रकार के मनुष्यों में उपशान्तकषाय वीतरागछद्मस्थों से क्षपक जीव संख्यातगुणित है।।५५।।

तीनों प्रकार के मनुष्यों में क्षीणकषायवीतरागछद्मस्थ जीव पूर्वोक्त प्रमाण ही हैं।।५६।।

तीनों प्रकार के मनुष्यों में सयोगिकेवली और अयोगिकेवली ये दोनों भी प्रवेश की अपेक्षा से तुल्य और पूर्वोक्त प्रमाण ही है।।५७।।

तीनों प्रकार के मनुष्यों में सयोगिकेवली संचयकाल की अपेक्षा संख्यातगुणित हैं।।५८।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-तीनों ही प्रकार के मनुष्यों में अपूर्वकरण आदि तीनों प्रकार के उपशामक जीव प्रवेश से परस्पर की अपेक्षा तुल्य अर्थात् सदृश है, क्योंकि एक समय में अधिक से अधिक चौवन जीवों का प्रवेश पाया जाता है तथा ये ही जीव उपरिम गुणस्थानों के जीवों की अपेक्षा अल्प हैं। उपशान्तकषाय गुणस्थानवर्ती साधु भी प्रवेश की अपेक्षा पूर्वोक्त प्रमाण है, क्योंकि अधस्तन गुणस्थानों को प्राप्त हुए जीवों का ही उपशान्त कषायवीतरागछद्मस्थरूप पर्याय से परिणमन पाया जाता है। क्षपक साधु एक सौ आठ मात्र ही हैं, क्योंकि क्षपकसंबंधी एक गुणस्थान में एक साथ प्रवेश करने वाले जीवों का प्रमाण उतना ही-एक सौ आठ है और क्षीणकषाय साधु भी उतने ही हैं।

सयोगिकेवली और अयोगिकेवली जीव प्रवेश की अपेक्षा उतने ही हैं। क्योंकि क्षीणकषायरूप पर्याय से परिणत जीवों का ही आगे के गुणस्थानों में उपक्रमण (गमन) पाया जाता है। सामान्य मनुष्य और पर्याप्त मनुष्यों में से ओघ सयोगिकेवली राशि को स्थापित करके और उसे अधस्तनराशि से भाजित करके गुणकार उत्पन्न करना चाहिए। किन्तु मनुष्यिनियों में उनके योग्य संख्यात सयोगिकेवली जीवों को स्थापित करके एक सौ आठ संख्यात को छोड़कर उनके योग्य संख्यात क्षीणकषायवीतरागछद्मस्थों के प्रमाण से भाजित करके गुणकार उत्पन्न करना चाहिए।

इस प्रकार प्रथम स्थल में उपशामक गुणस्थानों से लेकर अयोगीपर्यन्त भगवन्तों का अल्पबहुत्व बतलाने वाले छह सूत्र पूर्ण हुए।

अब अप्रमत्तादि से लेकर अधस्तन गुणस्थानवर्तियों का अल्पबहुत्व बतलाने हेतु सात सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

तीनोें प्रकार के मनुष्यों में सयोगिकेवली से अक्षपक और अनुपशामक अप्रमत्तसंयत संख्यातगुणित हैं।।५९।।

तीनों प्रकार के मनुष्यों में अप्रमत्तसंयतों से प्रमत्तसंयत संख्यातगुणित हैं।।६०।।

तीनों प्रकार के मनुष्यों में प्रमत्तसंयतों से संयतासंयत संख्यातगुणित हैं।।६१।।

तीनों प्रकार के मनुष्यों में संयतासंयतों से सासादनसम्यग्दृष्टि संख्यातगुणित हैं।।६२।।

तीनों प्रकार के मनुष्यों में सासादनसम्यग्दृष्टियों से सम्यग्मिथ्यादृष्टि संख्यातगुणित हैं।।६३।।

तीनों प्रकार के मनुष्यों में सम्यग्मिथ्यादृष्टियों से असंयतसम्यग्दृष्टि संख्यातगुणित हैं।।६४।।

तीनों प्रकार के मनुष्यों में असंयतसम्यग्दृष्टियों से मिथ्यादृष्टि असंख्यातगुणित हैं और मिथ्यादृष्टि संख्यातगुणित हैं।।६५।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-ओघ प्ररूपणा में कही हुई अप्रमत्तसंयतों की राशि ही मनुष्य सामान्य और मनुष्य पर्याप्तक अप्रमत्तसंयतों का प्रमाण है। किन्तु मनुष्यिनियों में उनके योग्य संख्यात भागमात्र राशि होती है।

मनुष्य सामान्य और मनुष्य पर्याप्तकों में संयतासंयत जीव संख्यात कोटिप्रमाण होते हैं। किन्तु मनुष्यिनियों में उनके योग्य संख्यातरूपमात्र होते हैं, ऐसा अर्थ ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि वे इतने ही होते हैं, इस प्रकार का वर्तमान काल में उपदेश नहीं पाया जाता।

वे सासादन संयतासंयतों के प्रमाण से संख्यातगुणित कोटिमात्र होते हैं। मनुष्यिनियों में सासादनसम्यग्दृष्टि जीव मनुष्य-पर्याप्तक सासादनसम्यग्दृष्टियों से संख्यातगुणित होते हैं, उनसे भी संख्यातगुणे सम्यग्मिथ्यादृष्टि हैं और उनसे भी संख्यातगुणे असंयतसम्यग्दृष्टि हैं। क्योंकि, असंयतसम्यग्दृष्टि मनुष्यों का प्रमाण सात सौ कोटिमात्र है।

मिथ्यादृष्टि असंख्यातगुणित और संख्यातगुणित जीवों का स्पष्टीकरण किया जाता है-असंयतसम्यग्दृष्टि सामान्य मनुष्यों से मिथ्यादृष्टि सामान्य मनुष्य असंख्यातगुणित होते हैं, क्योंकि उनका प्रमाण जगत्श्रेणी के असंख्यातवें भाग है इनमें ही लब्ध्यपर्याप्त मनुष्य गर्भित हैं तथा मनुष्य-पर्याप्त और भाववेद मिथ्यादृष्टि मनुष्यिनी संख्यातगुणित हैं, क्योंकि उनका प्रमाण संख्यातरूपमात्र ही पाया जाता है।

इस प्रकार द्वितीय स्थल में तीन प्रकार के अथवा चारों प्रकार के मनुष्यों का अल्पबहुत्व कथन करने वाले सात सूत्र पूर्ण हुए।


संप्रति असंयतसम्यग्दृष्टि-संयतासंयत-प्रमत्त-अप्रमत्तसंयतगुणस्थानेषु अल्पबहुत्वप्रतिपादनाय सूत्रनवकमवतार्यते-असंजदसम्मादिट्ठिट्ठाणे सव्वत्थोवा उवसमसम्मादिट्ठी।।६६।।

खइयसम्मादिट्ठी संखेज्जगुणा।।६७।।

वेदगसम्मादिट्ठी संखेज्जगुणा।।६८।।
संजदासंजदट्ठाणे सव्वत्थोवा खइयसम्मादिट्ठी।।६९।।
उवसमसम्मादिट्ठी संखेज्जगुणा।।७०।।
वेदगसम्मादिट्ठी संखेज्जगुणा।।७१।।
पमत्त-अप्पमत्तसंजदट्ठाणे सव्वत्थोवा उवसमसम्मादिट्ठी।।७२।।
खइयसम्मादिट्ठी संखेज्जगुणा।।७३।।
वेदगसम्मादिट्ठी संखेज्जगुणा।।७४।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-असंयतसम्यग्दृष्टीनां सम्यक्त्वापेक्षया त्रीणि सूत्राणि सुगमानि सन्ति। संयतासंयतस्थाने सर्वस्तोका: क्षायिकसम्यग्दृष्टय:, क्षीणदर्शनमोहनीयानां देशसंयमे वर्तमानानां बहूनामभावात्। क्षीणदर्शनमोहनीया: प्रायेण असंयता भूत्वा तिष्ठन्ति। ते संयमं प्रतिपद्यमाना: प्रायेण महाव्रतानि चैव प्रतिपद्यन्ते, न देशव्रतानीति प्रोक्तं भवति। क्षायिकसम्यग्दृष्टिसंयतासंयतेभ्य: उपशमसम्यग्दृष्टय: संयतासंयता: बहव: उपलभन्ते। एभ्य: उपशमसम्यग्दृष्टिसंयतासंयतेभ्य: वेदकसम्यग्दृष्टिसंयतासंयता: संख्यातगुणा: भवन्ति, बह्वायतत्वात्, संचयकालस्य बहुत्वाद्वा, उपशमसम्यक्त्वं अपेक्ष्य वेदकसम्यक्त्वस्य सुलभत्वाद्वा।
प्रमत्ताप्रमत्तयो: सर्वाल्पा: उपशमसम्यग्दृष्टय: स्तोककालसंचयत्वात्, एभ्य: क्षायिका: संख्यातगुणा:, बहुकालसंचयत्वात्, एभ्य: वेदकसम्यग्दृष्टय: संख्यातगुणा:, क्षायिकसम्यक्त्वेन संयमं प्रतिपद्यमानजीवेभ्य: वेदकसम्यक्त्वेन संयमं प्रतिपद्यमानजीवानां बहुत्वोपलंभात्।
एवं तृतीयस्थले गुणस्थानापेक्षया अल्पबहुत्वनिरूपणत्वेन नव सूत्राणि गतानि।
संप्रति मानुषीगतविशेषप्रतिपादनार्थं सूत्रषट्कमवतार्यते-णवरि विसेसो, मणुसिणीसु असंजद-संजदासंजद-पमत्तापमत्त-संजदट्ठाणे सव्वत्थोवा खइयसम्मादिट्ठी।।७५।।
उवसमसम्मादिट्ठी संखेज्जगुणा।।७६।।
वेदगसम्मादिट्ठी संखेज्जगुणा।।७७।।
एवं तिसु अद्धासु।।७८।।
सव्वत्थोवा उवसमा।।७९।।
खवा संखेज्जगुणा।।८०।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-अप्रशस्तवेदोदयेन दर्शनमोहनीयं क्षपयन्तो बहवो जीवा: न उपलभन्ते। एभ्य: जीवेभ्य: अप्रशस्तवेदोदयेन चैव दर्शनमोहनीयं उपशमयन्तो जीवा: मनुष्येषु संख्यातगुणा: उपलभन्ते। एभ्य: वेदकसम्यग्दृष्टयोऽपिसंख्यातगुणा: एव।
मनुष्यसामान्य-मनुष्यपर्याप्तयो: निरुद्धयो: भाववेदमानुषीषु मनुष्येषु पूर्वकरणादि-उपशमश्रेण्यारोहकेषु त्रिषु गुणस्थानेषु उपशमसम्यग्दृष्टय: स्तोका:, स्तोककारणत्वात्। क्षायिकसम्यग्दृष्टय: संख्यातगुणा:, बहुकारणात्। मानुषीषु पुन: क्षायिकसम्यग्दृष्टय: स्तोका: उपशमसम्यग्दृष्टय: संख्यातगुणा:। अत्र पूर्वोक्तमेव कारणं।
स्तोकप्रवेशात् सर्वस्तोका: उपशामका:। बहुप्रवेशात् क्षपका: संख्यातगुणा: इति ज्ञातव्यमल्पबहुत्वं मनुष्यगतौ स्त्रीवेदिमनुष्याणां।
एवं चतुर्थस्थले भावस्त्रीवेदिपुरुषाणां अल्पबहुत्वविशेषसूचकत्वेन षट्सूत्राणिगतानि।
इति मनुष्यगत्यन्तराधिकार:


अब असंयतसम्यग्दृष्टि, संयतासंयत, प्रमत्तसंयत और अप्रमत्तसंयत गुणस्थानों में अल्पबहुत्व का कथन करने हेतु नौ सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

तीनों प्रकार के मनुष्यों में असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थान में उपशमसम्यग्दृष्टि सबसे कम हैं।।६६।।

उपशमसम्यग्दृष्टियों से क्षायिकसम्यग्दृष्टि संख्यातगुणित हैं।।६७।।

क्षायिकसम्यग्दृष्टियों से वेदकसम्यग्दृष्टि संख्यातगुणित हैं।।६८।।

तीनों प्रकार के मनुष्यों में संयतासंयत गुणस्थान में क्षायिकसम्यग्दृष्टि सबसे कम हैं।।६९।।

तीनों प्रकार के मनुष्यों में संयतासंयत गुणस्थान में क्षायिकसम्यग्दृष्टियों से उपशमसम्यग्दृष्टि संख्यातगुणित हैं।।७०।।

तीनों प्रकार के मनुष्यों में संयतासंयत गुणस्थान में उपशमसम्यग्दृष्टियों से वेदकसम्यग्दृष्टि संख्यातगुणित हैं।।७१।।

तीनों प्रकार के मनुष्यों में प्रमत्तसंयत और अप्रमत्तसंयत गुणस्थान में उपशमसम्यग्दृष्टि सबसे कम हैं।।७२।।

तीनों प्रकार के मनुष्यों में प्रमत्तसंयत और अप्रमत्तसंयत गुणस्थान में उपशमसम्यग्दृष्टियों से क्षायिकसम्यग्दृष्टि संख्यातगुणित हैं।।७३।।

तीनों प्रकार के मनुष्यों में प्रमत्तसंयत और अप्रमत्तसंयत गुणस्थान में क्षायिकसम्यग्दृष्टियों से वेदकसम्यग्दृष्टि संख्यातगुणित हैं।।७४।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सम्यक्त्व की अपेक्षा असंयतसम्यग्दृष्टि जीवों का अल्पबहुत्व बतलाने वाले उपर्युक्त तीन सूत्रों का अर्थ सुगम है। संयतासंयत गुणस्थान में क्षायिकसम्यग्दृष्टि सबसे कम हैं, क्योंकि दर्शनमोहनीय कर्म का क्षय करने वाले और देशसंयम में रहने वाले बहुत जीवों का अभाव है। दर्शनमोहनीय का क्षय करने वाले मनुष्य प्राय: असंयमी होकर रहते हैं। वे संयम को प्राप्त होते हुए प्राय: महाव्रतों को ही धारण करते हैं, अणुव्रतों को नहीं, यह अर्थ कहा गया है। क्षायिकसम्यग्दृष्टि संयतासंयतों से उपशमसम्यग्दृष्टि संयतासंयत मनुष्य बहुत पाये जाते हैं, उपशम-सम्यग्दृष्टि संयतासंयतों से वेदक सम्यग्दृष्टि संयतासंयत संख्यातगुणे हैं। क्योंकि उपशमसम्यग्दृष्टियों की अपेक्षा वेदकसम्यग्दृष्टियों की आय अधिक है अथवा संचयकाल बहुत है अथवा उपशमसम्यक्त्व को देखते हुए अर्थात् उसकी अपेक्षा वेदकसम्यक्त्व पाना सुलभ है।

प्रमत्त और अप्रमत्त गुणस्थान में सबसे कम उपशमसम्यग्दृष्टि होते हैं, क्योंकि उनका संचयकाल सबसे कम होता है। इनसे क्षायिकसम्यग्दृष्टि संख्यातगुणे हैं, ये बहुत काल तक संचित होते हैं। इनसे वेदक सम्यग्दृष्टि संख्यातगुणे हैं, क्योंकि क्षायिकसम्यक्त्व के साथ संयम को प्राप्त होने वाले जीवों की अपेक्षा वेदकसम्यक्त्व के साथ संयम को प्राप्त होने वाले जीवों की अधिकता पाई जाती है।

इस प्रकार से तृतीय स्थल में गुणस्थान की अपेक्षा अल्पबहुत्व निरूपण करने वाले नौ सूत्र पूर्ण हुए।

अब मनुष्यिनियों में प्राप्त होने वाली विशेषताओं का प्रतिपादन करने हेतु छह सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

केवल विशेषता यह है कि मनुष्यिनियों में असंयतसम्यग्दृष्टि, संयतासंयत, प्रमत्तसंयत और अप्रमत्तसंयत गुणस्थान में क्षायिकसम्यग्दृष्टि जीव सबसे कम हैं।।७५।।

असंयतसम्यग्दृष्टि आदि चार गुणस्थानवर्ती मनुष्यिनियों में क्षायिकसम्यग्दृष्टियों से उपशमसम्यग्दृष्टि संख्यातगुणित हैं।।७६।।

असंयतसम्यग्दृष्टि आदि चार गुणस्थानवर्ती मनुष्यिनियों में उपशमसम्यग्दृष्टियों से वेदकसम्यग्दृष्टि संख्यातगुणित हैं।।७७।।

इसी प्रकार तीनों प्रकार के मनुष्यों में अपूर्वकरण आदि तीन उपशामक गुणस्थानों में सम्यक्त्वसंंबंधी अल्पबहुत्व है।।७८।।

तीनों प्रकार के मनुष्यों में उपशामक जीव सबसे कम हैं।।७९।।

तीनों प्रकार के मनुष्यों में उपशामकों से क्षपक जीव संख्यातगुणित हैं।।८०।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-अप्रशस्त वेद के उदय के साथ दर्शनमोहनीय को क्षपण करने वाले जीव बहुत नहीं पाये जाते हैं। अप्रशस्तवेद के उदय के साथ दर्शनमोहनीय का क्षपण करने वाले जीवों से अप्रशस्त वेद के उदय के साथ ही दर्शनमोहनीय का उपशम करने वाले जीव मनुष्यों में संख्यातगुणित पाये जाते हैं। इनकी अपेक्षा वेदक सम्यग्दृष्टि भी संख्यातगुणे ही हैं।

मनुष्य-सामान्य और मनुष्य-पर्याप्तकों से निरुद्ध भावस्त्रीवेदी मनुष्यों में अपूर्वकरण आदि तीन उपशामक गुणस्थानों में उपशमसम्यग्दृष्टि जीव अल्प होते हैं, क्योंकि उनके अल्प होने का कारण पाया जाता है। उनसे क्षायिकसम्यग्दृष्टि जीव संख्यातगुणित होते हैं, क्योंकि उनके बहुत होने का कारण पाया जाता है। किन्तु भावस्त्रीवेदी मनुष्यों में क्षायिकसम्यग्दृष्टि जीव अल्प हैं और उनसे उपशमसम्यग्दृष्टि जीव संख्यातगुणित हैं। यहाँ संख्यातगुणित होने का कारण पूर्वोक्त ही है।

उपशमश्रेणी में प्रवेश की अपेक्षा संख्या सबसे कम होने के कारण उपशामक जीव सबसे कम होते हैं। क्षपक श्रेणी में अधिक संख्या में प्रवेश के कारण क्षपक जीव उपशामकों से संख्यातगुणे होते हैं ऐसा मनुष्यगति में भाव स्त्रीवेदी मनुष्यों का अल्पबहुत्व जानना चाहिए।

इस प्रकार चतुर्थस्थल में भावस्त्रीवेदी पुरुषों का अल्पबहुत्व बतलाने वाले छह सूत्र पूर्ण हुए।

यह मनुष्यगति नामका अन्तराधिकार समाप्त हुआ।


अथ देवगत्यन्तराधिकार:

अथ चतु:स्थलै: द्वाविंशतिसूत्रै: देवगतिनामान्तराधिकार: प्रारभ्यते। तत्र तावत् प्रथमस्थले सामान्यदेवानां गुणस्थानापेक्षया अल्पबहुत्वनिरूपणाय ‘‘देवगदीए’’ इत्यादिसप्तसूत्राणि। तदनु द्वितीयस्थले भवनत्रिकदेवानां सौधर्मैशानपर्यंतदेवीनां चाल्पबहुत्वप्रतिपादनाय ‘‘भवण’’ इत्यादिसूत्रमेकं। तत: परं तृतीयस्थले सौधर्मैशानादिनवग्रैवेयकपर्यंतानां अल्पबहुत्वकथनाय ‘‘सोहम्मीसाण’’ इत्यादिसूत्राष्टकं। तत्पश्चात् चतुर्थस्थले अनुदिशादि सर्वार्थसिद्धिपर्यंतदेवानां अल्पबहुत्वकथनाय ‘‘अणुदिसादि’’ इत्यादिसूत्रषट्कं इति समुदायपातनिका।

संप्रति देवगतौ देवानां अल्पबहुत्वप्रतिपादनाय सूत्रसप्तकमवतार्यते-देवगदीए देवेसु सव्वत्थोवा सासणसम्मादिट्ठी।।८१।।
सम्मामिच्छादिट्ठी संखेज्जगुणा।।८२।।
असंजदसम्मादिट्ठी असंखेज्जगुणा।।८३।।
मिच्छादिट्ठी असंखेज्जगुणा।।८४।।
असंजदसम्मादिट्ठिट्ठाणे सव्वत्थोवा उवसमसम्मादिट्ठी।।८५।।
खइयसम्मादिट्ठी असंखेज्जगुणा।।८६।।
वेदगसम्मादिट्ठी असंखेज्जगुणा।।८७।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्राणामर्थ: सुगमोऽस्ति। तत्र देवगतौ असंयतसम्यग्दृष्टिअपेक्षया मिथ्यादृष्टयोऽसंख्यातगुणा: सन्ति, अत्र गुणकार: जगत्प्रतरस्य असंख्यातभागो वर्तते। उपशमसम्यग्दृष्टिभ्य: क्षायिकसम्यग्दृष्टय: असंख्यातगुणा:, अत्र गुणकार: आवलिकाया: असंख्यातभाग: ज्ञातव्य:।
एवं प्रथमस्थले देवगतौ देवानां अल्पबहुत्वकथनमुख्यत्वेन गुणस्थानमाश्रित्य सप्तसूत्राणि गतानि।
संप्रति भवनत्रिकदेवदेवीनां सौधर्मैशानदेवीनां चाल्पबहुत्वप्रतिपादनाय सूत्रमवतरति-भवणवासिय-वाणवेंतर-जोदिसियदेवा देवीओ सोधम्मीसाणकप्प-वासियदेवीओ च सत्तमाए पुढवीए भंगो।।८८।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-अग्रे वक्ष्यमाणराश्यपेक्षया भवनवासिसासादनसम्यग्दृष्टय: सर्वत: स्तोका:। तत: सम्यग्मिथ्यादृष्टय: संख्यातगुणा:, तत: असंयतसम्यग्दृष्टय: असंख्यातगुणा:, अत्र आवलिकाया: असंख्यातभाग: गुणकारोऽस्ति, एभ्य: भवनवासिनो मिथ्यादृष्टयोऽसंख्यातगुणा:, अत्र गुणकार: जगत्प्रतरस्य असंख्यातभाग: यस्तु असंख्यातजगत्श्रेणिप्रमाणमस्ति।
वानव्यन्तरसासादनसम्यग्दृष्टय: सर्वस्तोका:। सम्यग्मिथ्यादृष्टय: संख्यातगुणा:। असंयतसम्यग्दृष्टय: असंख्यातगुणा:। अत्र गुणकार: आवलिकाया: असंख्यातभाग:। मिथ्यादृष्टयोऽसंख्यातगुणा:, अत्र गुणकार: जगत्प्रतरस्य असंख्यातभाग: ज्ञातव्य:।
एवं ज्योतिष्काणामपि वक्तव्यं। स्वक-स्वकदेवीनां स्वक-स्वकौघवत् ज्ञातव्यं अल्पबहुत्वमिति।
एवं द्वितीयस्थले भवनवासि-वानव्यंतर-ज्योतिष्कदेवानां सर्वदेवीनां चाल्पबहुत्वनिरूपणत्वेन एकं सूत्रं गतम्।
अधुना सौधर्मैशानादि-नवग्रैवेयकपर्यंतानां गुणस्थानापेक्षयाल्पबहुत्वप्रतिपादनाय सूत्राष्टकमवतार्यते-सोहम्मीसाण जाव सदर-सहस्सारकप्पवासियदेवेसु जहा देवगइभंगो।।८९।।
आणद जाव णवगेवज्जविमाणवासियदेवेसु सव्वत्थोवा सासण-सम्मादिट्ठी।।९०।।
सम्मामिच्छादिट्ठी संखेज्जगुणा।।९१।।
मिच्छादिट्ठी असंखेज्जगुणा।।९२।।
असंजदसम्मादिट्ठी संखेज्जगुणा।।९३।।
असंजदसम्मादिट्ठिट्ठाणे सव्वत्थोवा उवसमसम्मादिट्ठी।।९४।।
खइयसम्मादिट्ठी असंखेज्जगुणा।।९५।।
वेदगसम्मादिट्ठी संखेज्जगुणा।।९६।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-यथा देवसामान्ये अल्पबहुत्वं उक्तं, तथा एतेषामपि अल्पबहुत्वं वक्तव्यं। तद्यथा-स्वक-स्वककल्पस्था: सासादना: सर्वस्तोका:। स्वक-स्वककल्पसम्यग्मिथ्यादृष्टय: संख्यातगुणा:। स्वक-स्वककल्पासंयतसम्यग्दृष्टय: असंख्यातगुणा:। स्वक-स्वकमिथ्यादृष्टयोऽसंख्यातगुणा:। अत्र गुणकार: ज्ञात्वा वक्तव्य:, एकस्वरूपत्वाभावात्। अनंतरोक्तकल्पेषु असंयतसम्यग्दृष्टिस्थाने सर्वस्तोका: उपशम-सम्यग्दृष्टय:। क्षायिकसम्यग्दृष्टयोऽसंख्यातगुणा:। वेदकसम्यग्दृष्टयोऽसंख्यातगुणा:। अत्र गुणकार: सर्वत्र आवलिकाया: असंख्यातभाग: इति ज्ञातव्य:।
आनतादिनवग्रैवेयकवासिनां सासादनादीनामल्पबहुत्वसूत्राणि सुगमानि। मनुष्येभ्य: आनतादिषु उत्पद्यमानमिथ्यादृष्टीन् अपेक्ष्य तत्रोत्पद्यमानसम्यग्दृष्टीनां संख्यातगुणत्वात्।
कश्चिदाह-देवलोके सम्यग्मिथ्यात्वं प्रतिपद्यमानजीवानां किन्न प्रधानत्वं ?
न, तेषां मूलराशे: असंख्यातभागत्वात्। अत्र गुणकार: संख्यातसमया:। चतुर्थगुणस्थाने उपशम-सम्यग्दृष्टय: सर्वस्तोका:, अंतर्मुहूर्तकालसंचितत्वात्।
तेभ्य: क्षायिकसम्यग्दृष्टयोऽसंख्यातगुणा:, संख्यातसागरोपमकालेन संचितत्वात्। तत्रोत्पद्यमानक्षायिक-सम्यग्दृष्टिभ्य: वेदकसम्यग्दृष्टय: संख्यातगुणा:, संख्यातगुणितवेदकसम्यग्दृष्टीनां तत्रोत्पत्तिदर्शनात्।
एवं तृतीयस्थले सौधर्मादिनवग्रैवेयकवासिनामल्पबहुत्वनिरूपणत्वेन अष्टौ सूत्राणि गतानि।


अथ देवगति अन्तराधिकार प्रारंभ

अब चार स्थलों में बाईस सूत्रों के द्वारा देवगति नामका अन्तराधिकार प्रारंभ होता है। उनमें से प्रथम स्थल में सामान्य देवों का गुणस्थान की अपेक्षा अल्पबहुत्व निरूपण करने हेतु ‘‘देवगदीए’’ इत्यादि सात सूत्र हैं। उसके पश्चात् द्वितीय स्थल में भवनत्रिक देवों का एवं सौधर्म-ईशान स्वर्ग पर्यन्त उत्पन्न होने वाली देवियों का अल्पबहुत्व बतलाने हेतु ‘‘भवण’’ इत्यादि एक सूत्र है। पुन: तृतीयस्थल में सौधर्म-ईशान स्वर्ग से लेकर नव ग्रैवेयक पर्यन्त उत्पन्न होने वाले देवोें का अल्पबहुत्व बतलाने हेतु ‘‘सोहम्मीसाण’’ इत्यादि आठ सूत्र हैं। तत्पश्चात् चतुर्थ स्थल में अनुदिश से लेकर सर्वार्थसिद्धि विमान पर्यन्त के देवों का अल्पबहुत्व बतलाने हेतु ‘‘अणुदिसादि’’ इत्यादि छह सूत्र हैं। यह सूत्रों की समुदायपातनिका हुई।

अब देवगति में देवों के अल्पबहुत्व का प्रतिपादन करने वाले सात सूत्रों का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

देवगति में देवों में सासादनसम्यग्दृष्टि सबसे कम हैं।।८१।।

सासादनसम्यग्दृष्टियों से सम्यग्मिथ्यादृष्टि देव संख्यातगुणित हैं।।८२।।

सम्यग्मिथ्यादृष्टियों से असंयतसम्यग्दृष्टि देव असंख्यातगुणित हैं।।८३।।

देवों में असंयतसम्यग्दृष्टियों से मिथ्यादृष्टि असंख्यातगुणित हैं।।८४।।

देवों में असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थान में उपशमसम्यग्दृष्टि सबसे कम हैं।।८५।।

देवों में असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थान में उपशमसम्यग्दृष्टियों से क्षायिकसम्यग्दृष्टि असंख्यातगुणित हैं।।८६।।

देवों में क्षायिकसम्यग्दृष्टियों से वेदकसम्यग्दृष्टि असंख्यातगुणित हैं।।८७।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्रों का अर्थ सुगम है। उसमें देवगति में असंयतसम्यग्दृष्टियों की अपेक्षा मिथ्यादृष्टि जीव असंख्यातगुणे हैं। यहाँ गुणकार जगत्प्रतर का असंख्यातवाँ भाग होता है। उपशमसम्यग्दृष्टियों से क्षायिकसम्यग्दृष्टि असंख्यातगुणे हैं, यहाँ गुणकार आवली का असंख्यातवाँ भाग जानना चाहिए।

इस प्रकार प्रथम स्थल में देवगति में देवों का गुणस्थान की अपेक्षा अल्पबहुत्व बतलाने वाले सात सूत्र पूर्ण हुए।

अब भवनत्रिक देव-देवियों का तथा सौधर्म-ईशान स्वर्ग की देवियों का अल्पबहुत्व बतलाने हेतु सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

देवों में भवनवासी, वानव्यन्तर, ज्योतिष्क देव और देवियाँ तथा सौधर्म-ईशान कल्पवासिनी देवियाँ, इनका अल्पबहुत्व सातवीं पृथिवी के अल्पबहुत्व के समान है।।८८।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-आगे कही जाने वाली राशि की अपेक्षा भवनवासी सासादनसम्यग्दृष्टि देव सबसे कम हैं। उनसे सम्यग्मिथ्यादृष्टि देव संख्यातगुणित हैं। उनसे असंयतसम्यग्दृष्टि देव असंख्यातगुणित हैं। यहाँ आवली का असंख्यातवाँ भाग गुणकार है। उन असंयत देवों से मिथ्यादृष्टि देव असंख्यातगुणे हैं। यहाँ गुणकार जगत्प्रतर का असंख्यातवाँ भाग है जो कि असंख्यात जगत्श्रेणी प्रमाण है।

वानव्यंतर सासादनसम्यग्दृष्टि देव सबसे कम हैं। सम्यग्मिथ्यादृष्टि देव उनसे संख्यातगुणे हैं। असंयतसम्यग्दृष्टि देव उनसे असंख्यातगुणे हैं। यहाँ आवली का असंख्यातवाँ भाग गुणकार है। उन असंयतसम्यग्दृष्टि देवों से मिथ्यादृष्टि देव असंख्यातगुणे हैं। यहाँ गुणकार जगत्प्रतर का असंख्यातवाँ भाग जानना चाहिए।

इसी प्रकार ज्योतिषी देवों का भी अल्पबहुत्व कहना चाहिए। अपने-अपने गुणस्थानों में रहने वाली देवियों का सम्पूर्ण अल्पबहुत्व गुणस्थान के समान जानना चाहिए।

इस तरह से द्वितीय स्थल में भवनवासी-वानव्यंतर एवं ज्योतिषी देवों तथा देवियों का अल्पबहुत्व बतलाने वाला एक सूत्र पूर्ण हुआ।

अब सौधर्म-ईशान स्वर्ग से लेकर नवग्रैवेयक तक के देवों का गुणस्थान की अपेक्षा अल्पबहुत्व बतलाने हेतु आठ सूत्र अवतरित हो रहे हैं-

सूत्रार्थ-

सौधर्म-ईशान कल्प से लेकर शतार-सहस्रार कल्प तक कल्पवासी देवों में अल्पबहुत्व देवगति सामान्य के अल्पबहुत्व के समान है।।८९।।

आनत-प्राणत कल्प से लेकर नवग्रैवेयक विमानों तक विमानवासी देवों में सासादनसम्यग्दृष्टि सबसे कम हैं।।९०।।

उक्त विमानों में सासादनसम्यग्दृष्टियों से सम्यग्मिथ्यादृष्टि देव संख्यातगुणित हैं।।९१।।

उक्त विमानों में सम्यग्मिथ्यादृष्टियों से मिथ्यादृष्टि देव असंख्यातगुणित हैं।।९२।।

उक्त विमानों में मिथ्यादृष्टियों से असंयत-सम्यग्दृष्टि देव संख्यातगुणित हैं।।९३।।

आनत-प्राणत कल्प से लेकर नवग्रैवेयक तक असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थान में उपशमसम्यग्दृष्टि देव सबसे कम हैं।।९४।।

उक्त विमानों में उपशमसम्यग्दृष्टियों से क्षायिक सम्यग्दृष्टि देव असंख्यातगुणित हैं।।९५।।

उक्त विमानों में क्षायिकसम्यग्दृष्टियों से वेदकसम्यग्दृष्टि देव संख्यातगुणित हैं।।९६।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-जिस प्रकार से सामान्य देवों में अल्पबहुत्व का कथन किया गया है, उसी प्रकार इन देवों का अल्पबहुत्व भी जानना चाहिए। उसका कथन इस प्रकार है-

अपने-अपने कल्प में रहने वाले सासादनसम्यग्दृष्टि देव सबसे कम हैं। इनसे अपने-अपने कल्प के सम्यग्मिथ्यादृष्टि देव संख्यातगुणित हैं। इनसे अपने-अपने कल्प के असंयतसम्यग्दृष्टि देव असंख्यातगुणित हैं। इनसे अपने-अपने कल्प के मिथ्यादृष्टि देव असंख्यातगुणित हैं। यहाँ पर गुणकार जानकर कहना चाहिए, क्योंकि इन देवों में गुणकार की एकरूपता का अभाव है। अभी इन पीछे कहे गये कल्पों में असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थान में उपशमसम्यग्दृष्टि देव सबसे कम हैं। इनसे क्षायिकसम्यग्दृष्टि देव असंख्यातगुणित हैं। इनसे वेदकसम्यग्दृष्टि देव असंख्यातगुणित हैं। यहाँ आवली का असंख्यातवाँ भाग गुणकार है, ऐसा जानना चाहिए।

आनत स्वर्ग से लेकर नवग्रैवेयक तक के देवों का सासादन आदि गुणस्थानों का अल्पबहुत्व बतलाने वाले सूत्र सुगम हैं, क्योंकि मनुष्यों से आनत आदि विमानों में उत्पन्न होने वाले मिथ्यादृष्टियों की अपेक्षा वहाँ पर उत्पन्न होने वाले सम्यग्दृष्टि जीव संख्यातगुणित होते हैं

शंका-देवलोक में सम्यग्मिथ्यात्व को प्राप्त होने वाले जीवों की प्रधानता क्यों नहीं है ?

समाधान-नहीं, क्योंकि सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीव मूलराशि के असंख्यातवें भाग मात्र होते हैं। यहाँ संख्यातसमय गुणकार है। चतुर्थ गुणस्थान में उपशमसम्यग्दृष्टि सबसे कम हैं, क्योंकि वे केवल अन्तर्मुहूर्त काल के द्वारा संचित होते हैं।

उनसे क्षायिकसम्यग्दृष्टि देव असंख्यातगुणित हैं, क्योंकि वे संख्यातसागर प्रमाण काल के द्वारा संचित होते हैं। वहाँ उत्पन्न होने वाले क्षायिकसम्यग्दृष्टियों से वेदकसम्यग्दृष्टि देव संख्यातगुणे हैं, क्योंकि वहाँ संख्यातगुणित वेदक सम्यग्दृष्टियों की उत्पत्ति देखी जाती है।

इस प्रकार तृतीय स्थल में सौधर्म स्वर्ग से लेकर नवग्रैवेयक विमानों तक के देवों का अल्पबहुत्व बतलाने वाले आठ सूत्र पूर्ण हुए।

अनुदिशादि-सर्वार्थसिद्धिपर्यंतदेवानां अल्पबहुत्वप्रतिपादनाय सम्यक्त्वापेक्षया सूत्रषट्कमवतार्यते-अणुदिसादि जाव अवराइदविमाणवासियदेवेसु असंजदसम्मादिट्ठिट्ठाणे सव्वत्थोवा उवसमसम्मादिट्ठी।।९७।।

खइयसम्मादिट्ठी असंखेज्जगुणा।।९८।।

वेदगसम्मादिट्ठी संखेज्जगुणा।।९९।।
सव्वट्ठसिद्धिविमाणवासियदेवेसु असंजदसम्मादिट्ठिट्ठाणे सव्वत्थोवा उवसमसम्मादिट्ठी।।१००।।
खइयसम्मादिट्ठी संखेज्जगुणा।।१०१।।
वेदगसम्मादिट्ठी संखेज्जगुणा।।१०२।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-उपशमश्रेणिचटनावतरणक्रियाव्यावृतोपशमसम्यक्त्वसहित संख्यातसंयतानां अत्रोत्पन्नानां अंतर्मुहूर्तसंचितानामुपलंभात् ते उपशमसम्यग्दृष्टय: सर्वस्तोका: तत्र अनुदिशादि-अपराजित-वासिदेवेषु। एभ्य: क्षायिकसम्यग्दृष्टयोऽसंख्यातगुणा:। तेभ्य: वेदकसम्यग्दृष्टय: संख्यातगुणा:, क्षायिक-सम्यक्त्वेनोत्पद्यमानसंयतेभ्य: वेदकसम्यक्त्वेनोत्पद्यमानसंयता: संख्यातगुणा:।
एतत्कथं ज्ञायते ?
कारणानुसारिकार्यदर्शनात् मनुष्येषु क्षायिकसम्यग्दृष्टय: संयता: स्तोका:, वेदकसम्यग्दृष्टिसंयता: संख्यातगुणा:, तेन तेभ्य: देवेषूत्पद्यमानसंयता: अपि तत्प्रतिभागिताश्चैवेति गृहीतव्यं। अत्र सम्यक्त्वाल्पबहुत्वं चैव, शेषगुणस्थानाभावात्।
कथमेतज् ज्ञायते ?
एतस्मात् एव सूत्रात् ज्ञायते।
सर्वार्थसिद्धौ त्रयस्त्रिंशदायुस्थितौ असंख्यातजीवराशय: किं न भवन्ति ?
न भवन्ति, तत्र पल्योपमस्य संख्यातभागमात्रान्तरे तदसंभवात्। अत्र सर्वार्थसिद्धौ सर्वे देवा: अहमिन्द्रा: एव सम्यग्दृष्टयश्चैव ततश्च्युत्वा नियमेन सिद्धिमवास्यन्ति अत: एकभवावतारिण: एव इति ज्ञात्वा सम्यग्दर्शनदृढीकरणार्थमेव पुरुषार्थो विधेय:।
एवं चतुर्थस्थले अनुदिशादि-अहमिंद्राणामल्पबहुत्वनिरूपणत्वेन सूत्रषट्कं गतम्।
इति षट्खंडागमस्य प्रथमखंडे पंचमग्रंथे अल्पबहुत्वानुगमे गणिनीज्ञानमतीकृत-सिद्धान्तचिंतामणिटीकायां गतिमार्गणानाम प्रथमोऽधिकार: समाप्त:।

अब अनुदिश विमानों से लेकर सर्वार्थसिद्धि विमान तक के देवों का सम्यक्त्व की अपेक्षा अल्पबहुत्व बताने हेतु छह सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

अनुदिशों को आदि लेकर अपराजित नामक अनुत्तरविमान तक विमानवासी देवों में असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थान में उपशमसम्यग्दृष्टि सबसे कम हैं।।९७।।

उक्त विमानों में उपशमसम्यग्दृष्टियों से क्षायिकसम्यग्दृष्टि देव असंख्यातगुणित हैं।।९८।।

उक्त विमानों में क्षायिकसम्यग्दृष्टियों से वेदकसम्यग्दृष्टि देव संख्यातगुणित हैं।।९९।।

सर्वार्थसिद्धि विमानवासी देवों में असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थान में उपशमसग्यग्दृष्टि सबसे कम हैं।।१००।।

उपशमसम्यग्दृष्टियों से क्षायिकसम्यग्दृष्टि देव संख्यातगुणित हैं।।१०१।।

क्षायिकसम्यग्दृष्टियों से वेदकसम्यग्दृष्टि देव संख्यातगुणित हैं।।१०२।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-उपशमश्रेणी पर आरोहण और अवतरणरूप क्रिया में लगे हुए अर्थात् चढ़ते और उतरते हुए मरकर उपशमसम्यक्त्व सहित यहाँ उत्पन्न हुए और अन्तर्मुहूर्त काल के द्वारा संचित हुए संख्यात उपशमसम्यग्दृष्टि संयत पाये जाते हैं। इसलिए वे अनुदिश आदि से लेकर अपराजित विमान तक उत्पन्न होने वाले उपशमसम्यग्दृष्टि देव सबसे कम होते हैं। इनसे क्षायिक सम्यग्दृष्टि असंख्यातगुणे हैं। इनसे वेदक सम्यग्दृष्टि संख्यातगुणे हैं, क्योंकि क्षायिकसम्यक्त्व के साथ मरण कर यहाँ उत्पन्न होने वाले संयतों की अपेक्षा वेदकसम्यक्त्व के साथ मरण कर यहाँ उत्पन्न होने वाले संयत संख्यातगुणित होते हैं।

शंका-यह कैसे जाना जाता है ?

समाधानक्योंकि, कारण के अनुसार कार्य देखा जाता है, इस न्याय के अनुसार मनुष्यों में क्षायिकसम्यग्दृष्टि संयत अल्प होते हैं, उनसे वेदकसम्यग्दृष्टि संयत संख्यातगुणित होते हैं। इसलिए उनसे देवों में उत्पन्न होने वाले संयत भी तत्प्रतिभागी ही होते हैं, यह अर्थ ग्रहण करना चाहिए। इन कल्पोें में यही सम्यक्त्वसंबंधी अल्पबहुत्व है, क्योंकि वहाँ शेष गुणस्थानों का अभाव है।

शंका-यह कैसे जाना जाता है ?

समाधान-इस सूत्र से ही जाना जाता है।

शंका-तेंतीस सागरोपम की आयु स्थिति वाले सर्वार्थसिद्धिविमान में असंख्यात जीवराशि क्यों नहीं होती है ?

समाधान-नहीं, क्योंकि वहाँ पर पल्योपम के संख्यातवें भागप्रमाण काल का अन्तर है इसलिए वहाँ असंख्यात जीवराशि का होना असंभव है। यहाँ सर्वार्थसिद्धि विमान में सभी देव अहमिन्द्र ही होते हैं और सम्यग्दृष्टि ही रहते हैं तथा वहाँ से च्युत होकर नियम से सिद्धपद को ही प्राप्त करते हैं अत: वे एक भवावतारी ही हैं ऐसा जानकर हम सभी को अपना सम्यग्दर्शन दृढ़ करने का ही पुरुषार्थ करना चाहिए।

इस तरह से चतुर्थ स्थल में अनुदिश आदि सभी अहमिन्द्र देवों का अल्पबहुत्व निरूपण करने वाले छह सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार षट्खण्डागम के प्रथम खण्ड में पंचम ग्रंथ के अल्पबहुत्व नामक प्रकरण मेंगणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणि टीका में गतिमार्गणा नामका प्रथम अधिकार समाप्त हुआ।