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०१. द्वितीय महाधिकार-गतिमार्गणा

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विषय सूची

द्वितीय महाधिकार - गतिमार्गणा

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अथ द्वितीयो महाधिकार:

मंगलाचरणं
ॐ नमः मंगलं कुर्यात्, ह्रीं नमश्चापि मंगलम्।
मोक्षबीजं महामंत्रं, अर्हं नमः सुमंगलम्।।१।।
नवमनारायणश्रीकृष्णस्य यस्मिन् तुंगीगिरौ अन्त्यसंस्कारो जातः। यश्च भाविकाले अत्र भरतक्षेत्रे अयोध्यायां ‘श्रीनिर्मलभगवान्’ नाम्ना षोडशतीर्थंकरो भविता। यस्य भ्रातान्तिमबलभद्रोऽपि तपश्चरणप्रभावेन स्वर्गो जगाम, अग्रे च तीर्थंकरो भूत्वा मोक्षं लप्स्यते, तं भाविनं षोडशतीर्थंकरं बलभद्रचरं भावितीर्थंकरं च वयं वन्दामहे।
अथ चतुभिरन्तराधिकारैः षट्चत्वारिंशत् सूत्रैः तावत् स्पर्शनानुगमे द्वितीयमहाधिकारे मार्गणासु गतिमार्गणानाम प्रथमोऽधिकारः प्रारभ्यते। तत्र तावत् नरकगतौ स्थलत्रयेण द्वादशसूत्रै नरकगति नामान्तराधिकारस्य व्याख्यानं क्रियते। तत्रापि प्रथमस्थले नरकगतौ नारकाणां सामान्यतया स्पर्शनप्ररूपणाय ‘‘आदेसेण’’ इत्यादिसूत्रपंचकं। तदनु द्वितीयस्थले प्रथमादिषट्पृथिवीषु नारकस्पर्शनप्रतिपादनत्वेन ‘‘पढमाए’’ इत्यादिसूत्रचतुष्टयं। ततः परं तृतीयस्थले सप्तमपृथिवीनारकाणां स्पर्शनकथनेन ‘‘सत्तमाए’’ इत्यादिसूत्रत्रयं इति समुदायपातनिका।
अधुना नरकगतौ मिथ्यादृष्टिस्पर्शनप्रतिपादनाय सूत्रमवतरति-
आदेसेण गदियाणुवादेण णिरयगदीए णेरइएसु मिच्छादिट्ठीहि केवडियं खेत्तं फोसिदं? लोगस्स असंखेज्जदिभागो।।११।।
सूत्रं सुगमं। वर्तमानकालापेक्षया क्षेत्रवद्भंगो भवति।
एतदेव स्पर्शनप्रतिपादनाय सूत्रमवतरति-
छ चोद्दसभागा वा देसूणा।।१२।।
सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-सूत्रं सुगमं।
स्वस्थानस्वस्थान-विहारवत्स्वस्थान-वेदना-कषाय-वैक्रियिकसमुद्घातगतैः नारवकै मिथ्यादृष्टिभिः अतीतकाले चतुर्लोकानामसंख्यातभागः, मानुषक्षेत्रस्यासंख्यातगुणः स्पृष्टः।
विहारवत्स्वस्थान-वेदना-कषाय-वैक्रियिकक्षेत्राणि अतीतकाले तिर्यग्लोकस्य संख्यातभागमात्राणि किं न भवन्ति इति चेत्?
न भवन्ति, इन्द्रक-श्रेणीबद्ध-प्रकीर्णकैर्बिलैः रुद्धसर्वक्षेत्रस्य तिर्यग्लोकस्य असंख्यातभागमात्रत्वात्।
इन्द्रक-श्रेणीबद्ध-प्रकीर्णकेषु संचरद्भिः नारकमिथ्यादृष्टिभिः तिर्यग्लोकस्य संख्यातभागः किं न स्पृश्यते?
न स्पृश्यते, नारकाणां परक्षेत्रगमनाभावात्।
तर्हि, परक्षेत्रगमनाभावे विहारवत्स्वस्थानपदस्य अभावः प्रसृज्यते इति चेत्? न प्रसृज्यते, एकस्मिन् इंद्रके श्रेणीबद्धे प्रकीर्णके च संस्थितग्रामागार-बहुविध-बिलगमनसंभवात् एतत् विहारवत्स्वस्थानं भवति। अन्यच्च-असंख्यातयोजनायाम-श्रेणीबद्ध-प्रकीर्णकनारकबिलान्यपि तिर्यग्लोकस्य असंख्यातभागमात्राण्येव भवन्ति।
मारणान्तिक-उपपादगतनारकमिथ्यादृष्टिभिः अतीतकाले किंचित् न्यूनः षट् चतुर्दशभागः स्पृष्टः। अत्र किञ्चि न्यूनस्य प्रमाणं देशोनत्रिसहस्रयोजनमस्ति।

अथ द्वितीय महाधिकार प्रारंभ

मंगलाचरण

‘ॐ नम:’ नाम का मंत्र सभी का मंगल करे, ‘‘ह्रीं नम:’’ मंत्र भी जगत का मंगल करे तथा मोक्ष प्राप्ति का बीजभूत ‘‘अर्हं नम:’’ महामंत्र विश्व के लिए मंगलकारी है।।१।।

जैनागम में वर्णित नवमें नारायण श्रीकृष्ण का जिस तुंंगीगिरि पर्वत पर अंतिम संस्कार हुआ है। जो भविष्यत्काल में यहाँ जम्बूद्वीप में भरतक्षेत्र की अयोध्या नगरी में ‘‘श्री निर्मलनाथ’ नामक के सोलहवें तीर्थंकर के रूप में जन्म लेंगे। जिनके भाई अंतिम बलभद्र ने भी तपश्चरण के प्रभाव से स्वर्ग प्राप्त किया और आगे तीर्थंकर होकर मोक्ष प्राप्त करेंगे। उन भावी सोलहवें तीर्थंकर एवं बलभद्रचर भावी तीर्थंकर की हम वंदना करते हैं। अब यहाँ चार अन्तराधिकारों में छ्यिालीस सूत्रों के द्वारा स्पर्शनानुगम नामक इस द्वितीय महाधिकार में मार्गणाओं में गतिमार्गणा नाम का प्रथम अधिकार प्रारंभ होता है। उनमें से सर्वप्रथम नरकगति में तीन स्थलों के द्वारा बारह सूत्रों में नरकगति नाम के अन्तराधिकार का व्याख्यान किया जा रहा है। उसमें भी प्रथम स्थल में नरकगति के नारकियों की सामान्यरूप से स्पर्शन प्ररूपणा करने हेतु ‘‘आदेसेण’’ इत्यादि पाँच सूत्र हैैं। उसके पश्चात् द्वितीय स्थल में प्रथम आदि छह पृथिवियों में नारकियों का स्पर्शनक्षेत्र बताने हेतु ‘‘पढमाए’’ इत्यारि चार सूत्र हैं। पुन: तृतीयस्थल में सातवीं पृथिवी के नारकियों का स्पर्श करने वाले ‘‘सत्तमाए’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। यह सूत्रों की समुदायपातनिका हुई है।

अब नरकगति में मिथ्यादृष्टि जीवों का स्पर्शन बतलाने हेतु सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

आदेश से गतिमार्गणा के अनुवाद से नरकगति में नारकियोें में मिथ्यादृष्टि जीवों ने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है? लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पर्श किया है।।११।।

हिन्दी टीका-सूत्र का अर्थ सुगम है। वर्तमानकाल की अपेक्षा स्पर्शन का कथन भी क्षेत्र के समान भंगवाला होता है।

अब इन्हीं मिथ्यादृष्टि नारकियों का स्पर्श बतलाने हेतु सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

नारकी मिथ्यादृष्टि जीवों ने अतीतकाल की अपेक्षा कुछ कम छह बटे चौदह भाग स्पर्श किए हैं।।१२।।

हिन्दी टीका-सूत्र का अर्थ सुगम है।

स्वस्थान स्वस्थान, विहारवत्स्वस्थान, वेदनासमुद्घात, कषायसमुद्घात और वैक्रियिक समुद्घातगत मिथ्यादृष्टि नारकी जीवों ने अतीतकाल में सामान्यलोक आदि चार लोकों का असंख्यातवाँ भाग और मनुष्यक्षेत्र से असंख्यातगुणा क्षेत्र स्पर्श किया है।

शंका-अतीतकाल की अपेक्षा नारकी मिथ्यादृष्टियों के विहारवत्स्वस्थान, वेदना समुद्घात, कषायसमुद्घात और वैक्रियिकसमुद्घातसंबंधी क्षेत्र तिर्यग्लोक के संख्यातवें भाग मात्र क्यों नहीं होते हैं?

समाधान-नहीं होते हैं, क्योंकि इन्द्रक, श्रेणीबद्ध और प्रकीर्णक नरकबिलों से रुद्ध सर्वक्षेत्र तिर्यग्लोक का असंख्यातवाँ भागमात्र ही होता है।

शंका-इन्द्रक, श्रेणीबद्ध और प्रकीर्णक नरकों में संचार करने वाले नारकी मिथ्यादृष्टियों ने तिर्यग्लोक का संख्यातवाँ भाग क्यों नहीं स्पर्श किया है?

समाधान-नहीं स्पर्श किया है, क्योंकि नारकियों का स्वक्षेत्र को छोड़कर परक्षेत्र में गमन नहीं होता है।

शंका-तब तो नारकियों का परक्षेत्र में गमन का अभाव मानने पर विहारवत्स्वस्थान का अभाव प्राप्त होता है?

समाधान-ऐसा नहीं समझना क्योंकि एक ही इन्द्रक श्रेणीबद्ध या प्रकीर्णक नरक में विद्यमान ग्रामों के आकार वाले बहुत प्रकार के बिलों में गमन संभव होने से विहारवत्स्वस्थानपद बन जाता है।

दूसरी बात यह है कि असंख्यात योजन आयाम वाले श्रेणीबद्ध और प्रकीर्णक नरक भी तिर्यग्लोक के असंख्यातवें भाग मात्र वाले ही होते हैं। मारणान्तिक समुद्घात और उपपादपदवाले नारकी मिथ्यादृष्टियों ने अतीतकाल में कुछ कम छह बटे चौदह (६/१४) भाग स्पर्श किये हैं। सो यहाँ पर कुछ कम का प्रमाण देशोन तीन हजार योजन समझना चाहिए।

अधुना सासादनानां स्पर्शनकथनाय सूत्रद्वयमवतार्यते-

सासणसम्मादिट्ठीहि केवडियं खेत्तं फोसिदं? लोगस्स असंखेज्जदिभागो।।१३।।

पंच चोद्दसभागा वा देसूणा।।१४।।
सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-सूत्रे सुगमे स्तः।
स्वस्थानस्वस्थान-विहारवत्स्वस्थान-वेदना-कषाय-वैक्रियिकसमुद्घातगतैः सासादनसम्यग्दृष्टिनारकै चतुर्लोकानामसंख्यातभागः, सार्धद्वयद्वीपादसंख्यातगुणः स्पृष्टः। तद्यथा-नारकाणां बिलानि संख्यातयोजनविस्तृतान्यपि सन्ति, असंख्यातयोजनविस्तृतान्यपि च। तत्र यद्यपि चतुरशीतिलक्षनारकावासा असंख्यातयोजनविस्तृता भवन्ति, तर्हि अपि सर्वक्षेत्रसमासः तिर्यग्लोकस्य असंख्यातभागश्चैव यथा भवति, तथा कथयिष्यामो नारकावासाः केऽपि परिमंडलाकाराः, केऽपि चतुरस्राः केऽपि तिस्रा, केऽपि पंचस्रा, केऽपि षट्कोणा। एते सर्वेऽपि समीकरणे कृते चतुष्कोणाः आवासाः असंख्यातलोकविस्तृताः भवन्ति। सकलनारकराशिना घनांगुलस्य संख्यातभागे गुणिते वर्तमानकाले नारकै रुद्धक्षेत्रं भवति। वर्तमाने नारकरुद्धनरकबिलभागात् अरुद्धभागः संख्यातगुणः इति संख्यातरूपैः गुणिते नारकाणां अतीतस्वस्थानक्षेत्रं भवति। तेन तिर्यग्लोकस्य असंख्यातभागत्वं न विरुध्यते।
एवं ‘वा’ शब्दसूचितस्य अर्थस्य प्ररूपणा कृता भवति।
सासादनस्य नरकगतौ नास्ति उपपादः, सूत्रप्रतिषिद्धत्वात्। मारणान्तिकगतैः देशोना पंच चतुर्दशभागा स्पृष्टाः।
कुतः एतत्?
सप्तमपृथिवीतः सासादनानां मारणान्तिककरणाभावात्।
एतत्कुतो ज्ञायते?
एतस्माच्चैव सूत्राद् ज्ञायते।
संप्रति सम्यङ्मिथ्यादृष्टि-असंयतसम्यग्दृष्टिभ्यां कियत् क्षेत्रं स्पृष्टं इति प्रश्ने सति उच्यते आचार्यदेवेन-
सम्मामिच्छादिट्ठि-असंजदसम्मादिट्ठीहि केवडियं खेत्तं फोसिदं? लोगस्स असंखेज्जदिभागो।।१५।।
सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-सूत्रं सुगमं।
स्वस्थानस्वस्थान-विहारवत्स्वस्थान-वेदना-कषाय-वैक्रियिकगतैः सम्यग्मिथ्यादृष्टि-असंयतसम्यग्दृष्टिभ्यां वर्तमानकाले चतुर्लोकानामसंख्यातभागः, मानुषक्षेत्रादसंख्यातगुणश्च स्पृष्टः। कारणं क्षेत्रानुगमे सिद्धं। अतीतकालेऽपि एताभ्यां द्विगुणस्थानवर्तिभ्यां एतैः पदैः चतुर्लोकानामसंख्यातभागश्चैव स्पृष्टः। ‘‘असंखेज्जजोयणवित्थडा णेरइयसव्वावासा’’ इति मनसा संकल्प्य एकावासक्षेत्रफलं चतुरशीतिलक्षरूपैः गुणिते तिर्यग्लोकस्य असंख्यातभागमात्रक्षेत्रफलोपलंभात्। सम्यग्मिथ्यादृष्टीनां मारणान्तिक-उपपादपदौ न स्तः।
असंयतसम्यग्दृष्टिभिः मारणान्तिकोपपादगतैः चतुर्लोकानामसंख्यातभागः मानुषक्षेत्रादसंख्यातगुणश्च स्पृष्टः वर्तमानेऽतीतकाले च।
कुतः?
सर्वजीवानां अपक्रमषट्कनियमदर्शनात्। ऊध्र्वं गच्छतां जीवानां अपि आत्मनः उत्पत्तिक्षेत्रं अप्राप्य अंतरकाले चैव दिग्विदिशानां गमनाभावात्। न च उत्पत्तिक्षेत्रसमान-क्षेत्रान्तरस्थितानां अपि जीवानां अनियतगमनमस्ति, एकदिशि नियतगमनात्। तिर्यग् गच्छतामपि जीवानामात्मनः उत्पद्यमानदिशं मुक्त्वा अन्यदिशां गमनाभावात्, उत्पद्यमानदिशं गच्छतामपि जीवानामात्मनः उत्पद्यमानक्षेत्रसमानस्थानमप्राप्य सर्वत्र अंतराले ऊध्र्ववलनाभावात्। ततः सर्वनरकावासेभ्यः मानुषक्षेत्रमागच्छतां सम्यग्दृष्टीनां नरकावासप्रतिष्ठितनियतस्थानं स्पृष्टं चतुर्लोकानामसंख्यातभागश्चैव। एवमेव उपपादस्यापि वक्तव्यं।
एवं नरकगतौ चतुर्गुणस्थानवर्तिनारकाणां स्पर्शनप्रतिपादनत्वेन पंच सूत्राणि गतानि।
संप्रति प्रथमपृथिव्यां नारकाणां स्पर्शनप्ररूपणाय सूत्रमवतरति-
पढमाए पुढवीए णेरइएसु मिच्छाइट्ठिप्पहुडि जाव असंजदसम्मादिट्ठीहि केवडियं खेत्तं फोसिदं? लोगस्स असंखेज्जदिभागो।।१६।।
सूत्रं सुगमं।


अब सासादन सम्यग्दृष्टि जीवों का स्पर्शन कहने के लिए दो सूत्रों का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

सासादन सम्यग्दृष्टि नारकियों ने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है? लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पर्श किया है।।१३।।

उन्हीं सासादनसम्यग्दृष्टि नारकियों ने अतीतकाल की अपेक्षा कुछ कम पाँच बटे चौदह भाग स्पर्श किए हैं।।१४।।

हिन्दी टीका-दोनों सूत्रों का अर्थ सरल है। इनमें विशेष यह है कि स्वस्थान स्वस्थान, विहारवत्-स्वस्थान, वेदनासमुद्घात, कषाय समुद्घात और वैक्रियिक समुद्घात सासादन सम्यग्दृष्टि नारकियों ने सामान्यलोक आदि चारों लोकों का असंख्यातवाँ भाग और अढ़ाईद्वीप से असंख्यातगुणा क्षेत्र स्पर्श किया है। वह इस प्रकार से है-नारकियों के बिल संख्यात योजन विस्तृत भी हैं और असंख्यात योजन विस्तृत भी हैं। उनमें यद्यपि नारकियों के चौरासी लाख आवास यदि असंख्यात योजन विस्तृत भी होते हैं, तो भी उन समस्त नारकआवासों के क्षेत्र का योग तिर्यग्लोक का असंख्यातवाँ भाग जिस प्रकार से होता है, उस प्रकार से कहते हैं-

नारकियों के आवास कितने ही तो गोल आकार वाले होते हैं, कितने ही चतुष्कोण, कितने ही त्रिकोण, कितने ही पंचकोण और कितने ही नारकावास षट्कोण होते हैं। इन सभी आकारों वाले नारकावासों के समीकरण करने पर वे चतुरस्र और असंख्यातयोजन विस्तृत हो जाते हैं। उसमें से सम्पूर्ण नारकराशि से घनांगुल के संख्यातवें भाग को गुणित करने पर प्राप्त हुआ क्षेत्र वर्तमानकाल में नारकियों से रुद्ध क्षेत्र होता है तथा वर्तमानकाल में नारकों द्वारा रोके हुए नरकों के बिल भाग से अरुद्ध भाग-नहीं रोका हुआ भाग संख्यातगुणा होता है, इसलिए नारकियों द्वारा रुद्ध क्षेत्र को संख्यातरूपों से गुणा करने पर नारकों का अतीतकाल संबंधी स्वस्थान क्षेत्र का प्रमाण हो जाता है। अत: तिर्यग्लोक का असंख्यातवाँ भाग विरोध को नहीं प्राप्त होता है। इस प्रकार ‘वा’ शब्द से सूचित अर्थ की प्ररूपणा की गई है।

सासादन सम्यग्दृष्टि जीव का नरकगति में उपपाद नहीं होता है, क्योंकि उसका सूत्र में प्रतिषेध किया गया है। मारणान्तिक समुद्घात को प्राप्त सासादन सम्यग्दृष्टियों ने कुछ कम पाँच बटे चौदह (५/१४) भाग स्पर्श किए हैं।

प्रश्न-यह कैसे?

उत्तर-क्योंकि, सातवीं पृथिवी के नारक सासादनसम्यग्दृष्टियों का मारणान्तिक समुद्घात करना संभव नहीं है।

शंका-यह कैसे जाना जाता है?

समाधान-इसी ही सूत्र से जाना जाता है कि सातवीं पृथिवी के सासादनसम्यग्दृष्टि नारकी मारणान्तिक समुद्घात नहीं करते हैं।

अब सम्यग्मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि जीव ने कितने क्षेत्र का स्पर्श किया है? ऐसा प्रश्न होने पर आचार्यदेव सूत्र के द्वारा कहते हैं-

सूत्रार्थ-

सम्यग्मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि नारकी जीवों ने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है? लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पर्श किया है।।१५।।

हिन्दी टीका-सूत्र का अर्थ सुगम है। विशेष बात यह है कि स्वस्थान स्वस्थान, विहारवत्स्वस्थान, वेदनासमुद्घात, कषायसमुद्घात और वैक्रियिक समुद्घात को प्राप्त सम्यग्मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि नारकी जीवों ने वर्तमानकाल में सामान्यलोक आदि चार लोकों का असंख्यातवाँ भाग और मनुष्यक्षेत्र से असंख्यातगुणा क्षेत्र स्पर्श किया है। इसका कारण क्षेत्रानुगम से सिद्ध है। अतीतकाल में भी इन दोनों ही गुणस्थानवर्ती नारकी जीवों ने इन्हीं पदों की अपेक्षा सामान्यलोक आदि चार लोकों का असंख्यातवाँ भाग ही स्पर्श किया है, क्योंकि नारकियों के आवास असंख्यात योजन विस्तृत होते हैं। इस प्रकार मन से संकल्प करके एक नारकावास के क्षेत्रफल को चौरासी लाख रूपों से गुणित करने पर तिर्यग्लोक का असंख्यातवाँ भाग मात्र क्षेत्रफल पाया जाता है। सम्यग्मिथ्यादृष्टि नारकियों के मारणान्तिक समुद्घात और उपपाद, ये दो पद नहीं होते हैं। मारणान्तिकसमुद्घात और उपपादगत असंयतसम्यग्दृष्टि नारकों ने सामान्यलोक आदि चार लोकों का असंख्यातवाँ भाग और मनुष्यलोक से असंख्यातगुणा क्षेत्र वर्तमानकाल में और अतीतकाल में स्पर्श किया है।

प्रश्न-कैसे स्पर्श किया है?
उत्तर-क्योंकि उन सभी जीवों के अपक्रम षट्क का नियम देखा जाता है। ऊपर जाने वाले जीवों के भी अपने उत्पत्ति-क्षेत्र को नहीं प्राप्त करके अंतरालकाल में ही दिशा को छोड़कर अन्य दिशा या विदिशा में गमन करने का अभाव है और न उत्पत्ति क्षेत्र के समान अन्य क्षेत्र पर स्थित जीवों के भी अनियत गमन होता है, क्योंकि उसका गमन एक दिशा में ही, अर्थात् उत्पत्तिक्षेत्र की ओर ही नियत हो चुका है। तिरछे गमन करने वाले भी जीवों के अपनी उत्पन्न होने वाली दिशा को छोड़कर अन्य दिशा को गमन नहीं होता है। उत्पन्न होने की दिशा को जाते हुए भी जीवों के अपने उत्पन्न होने के क्षेत्र के समान अन्य स्थान को नहीं प्राप्त करके अन्तराल में सर्वत्र ऊपर की ओर गमन का अभाव है। इसलिए सभी नारकावासों से मनुष्य क्षेत्र को आने वाले और नारकावास में प्रतिष्ठित होते हुए नियत क्षेत्र की ओर प्रवर्तमान सम्यग्दृष्टि जीवों का स्पर्शन सामान्यलोक आदि चार लोकों का असंख्यातवाँ भाग ही है।

इसी प्रकार इन दोनों गुणस्थानवर्ती नारकियों के उपपाद क्षेत्र का कथन भी करना चाहिए।

इस प्रकार नरकगति में चारों गुणस्थानवर्ती नारकी जीवों का स्पर्शन बतलाने वाले पाँच सूत्र पूर्ण हुए।

अब प्रथम नरक पृथिवी के नारकियों की स्पर्शन प्ररूपणा बतलाने के लिए सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

प्रथम पृथिवी में नारकियों में मिथ्यादृष्टि गुणस्थान से लेकर असंयतसम्यग्दृष्टि जीवों ने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है? लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पर्श किया है।।१६।।

सूत्र का अर्थ सुगम है।

द्वितीयादिषष्ठीपृथिवीगतनारकाणां स्पर्शनकथनाय सूत्रद्वयमवतरति-

विदियादि जाव छट्ठीए पुढवीए णेरइएसु मिच्छादिट्ठि-सासणसम्मादिट्ठीहि केवडियं खेत्तं फोसिदं? लोगस्स असंखेज्जदिभागो।।१७।।

एग वे तिण्णि चत्तारि पंच चोद्दसभागा वा देसूणा।।१८।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-सूत्रे सुगमे स्तः।
विशेषेण तु द्वितीयपृथिव्यां उपपादगतमिथ्यादृष्टिनारकै अतीतकाले चतुर्दशभागेषु एक भागः स्पृष्टः। तृतीयपृथिव्यां द्वौ चतुर्दशभागाः स्पृष्टौ। चतुर्थपृथिव्यां त्रयो भागाः स्पृष्टाः। पंचमपृथिवीगतैः चत्वारः चतुर्दशभागाः स्पृष्टाः। षष्ठपृथिवीगतैः पंच चतुर्दशभागाः वा स्पृष्टाः। अत्र सर्वत्र नरकाणां क्षेत्रं अगम्यक्षेत्रापेक्षया देशोनं वक्तव्यं। एवमेव सासादनानां क्षेत्रं, विशेषः तु तेषां उपपादपदं नास्ति।
भोगभूमिरचनासंस्थिताः असंख्यातद्वीपसमुद्राः नारकै कथं स्पृश्यन्ते?
न, तत्रापि नारकाणां निर्गमनप्रवेशौ प्रति विरोधाभावात्१। अस्यायमर्थः-मारणान्तिकसमुद्घातापेक्षया नारकाणां भोगभूम्यादिक्षेत्रे प्रवेशो निर्गमनं च संभवति।
द्वितीयादिषष्ठपृथिवीगतसम्यग्मिथ्यादृष्टि-असंयतसम्यग्दृष्टिनारकाणां स्पर्शनकथनाय सूत्रमवतरति-
सम्मामिच्छादिट्ठि-असंजदसम्मादिट्ठीहि केवडियं खेत्तं फोसिदं? लोगस्स असंखेज्जदिभागो।।१९।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-सूत्रं सुगममेतत्।
एताभ्यां द्वयोः गुणस्थानयोः वर्तमानकाले स्वस्थानादिपंचपदस्थितानां मारणान्तिकपदस्थित-असंयतसम्यग्दृष्टीनां च प्ररूपणायां क्षेत्रवत्स्पर्शनं ज्ञातव्यं। द्वितीयादिषट्पृथिवीपर्यंतनरकेषु असंयत-सम्यग्दृष्टीनामुपपादो नास्ति।
एवं द्वितीयस्थले प्रथमादिषट्पृथिवीषु नारकाणां स्पर्शननिरूपणत्वेन सूत्रचतुष्टयं गतम्।
सप्तमपृथिवीगतनारकाणां मिथ्यादृष्टीनां स्पर्शनकथनाय सूत्रद्वयं कथ्यते-
सत्तमाए पुढवीए णेरइएसु मिच्छादिट्ठीहि केवडियं खेत्तं फोसिदं? लोगस्स असंखेज्जदिभागो।।२०।।
छ चोद्दसभागा वा देसूणा।।२१।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-सूत्रे सुगमे स्तः। स्वस्थानस्वस्थान-विहारवत्स्वस्थान-वेदना-कषाय-वैक्रियिकगतैः मिथ्यादृष्टिभिः अतीतानागतकालयोः चतुर्लोकानामसंख्यातभागः, सार्धद्वयद्वीपादसंख्यातगुणश्च स्पृष्टः। मारणान्तिकोपपादगताभ्यां अतीतानागतकालयोः षट् चतुर्दशभागाः, चित्रापृथिव्याः सहस्रयोजनन्यून-सप्तमपृथिव्याः अधः चतुःसहस्रयोजनानि सन्ति, तैः न्यूनाः स्पृष्टाः। न केवलं अधस्तनयोजनैः चैव न्यूना, किन्तु अन्यदपि क्षेत्रं लोकनाल्याः अभ्यन्तरे नारकैरस्पृष्टोऽस्ति।
सप्तमपृथिव्यां सासादनादिनारकाणां स्पर्शननिरूपणाय सूत्रमवतरति-
सासणसम्मादिट्ठि-सम्मामिच्छादिट्ठि-असंजदसम्मादिट्ठीहि केवडियं खेत्तं फोसिदं? लोगस्स-असंखेज्जदिभागो।।२२।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-सप्तमपृथिव्यां त्रयाणामपि गुणस्थानानां मारणान्तिकोपपादपदे न स्तः। शेषपंचपदस्थितैः एतैः अतीतानागतवर्तमानकालेषु चतुर्लोकानामसंख्यातभागः, मानुषक्षेत्रादसंख्यातगुणश्च स्पृष्टः। कारणं पूर्ववत् वक्तव्यं।
एवं तृतीयस्थले सप्तमपृथिवीगतनारकाणां गुणस्थानापेक्षया स्पर्शनप्रतिपादनत्वेन सूत्राणि त्रीणि गतानि। एवं नरकगतिप्रतिपादनपरः प्रथमान्तराधिकारः समाप्तः।
अथ तिर्यग्गतौ स्थलद्वयेन एकादशसूत्रैः द्वितीयान्तराधिकारः कथ्यते। तत्र प्रथमस्थले सामान्यतिरश्चां गुणस्थानापेक्षया स्पर्शनकथनेन षट् सूत्राणि। तदनु द्वितीयस्थले पंचेन्द्रियतिरश्चां स्पर्शनप्रतिपादनत्वेन पंच सूत्राणि कथ्यन्ते।
तिर्यग्गतौ मिथ्यादृष्टिस्पर्शननिरूपणाय सूत्रावतारो भवति-
तिरिक्खगदीए तिरिक्खेसु मिच्छादिट्ठीहि केवडियं खेत्तं फोसिदं? ओघं।।२३।।
सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-सूत्रं सुगमं।
त्रसजीवविरहितेषु असंख्यातेषु समुद्रेषु विहारवत्स्वस्थानपरिणततिरश्चां कथं संभवः?
नैतद् वक्तव्यं, तत्र पूर्ववैरिदेवानां प्रयोगतः विहारविरोधाभावात्।
अतीतकाले विहरमाणतिर्यग्भि: स्पृष्टक्षेत्रानयनविधानं उच्यते-पूर्ववैरिदेवप्रयोगात् उपरि लक्षयोजन-प्रमाणमेरु-कुलाचल-कुंडल-रुचक-मानुषोत्तर-नागेन्द्रवर-पर्वतादिरुद्धक्षेत्रं मुक्त्वा सर्वं स्पृश्यते इति। अतः लक्षयोजनबाहल्यं रज्जुप्रतरं स्थापयित्वा ऊध्र्वं एकोनपंचाशत्खण्डानि कृत्वा प्रतराकारेण स्थापिते तिर्यग्लोकस्य संख्यातभागमात्रक्षेत्रं भवति।
वैक्रियिकसमुद्घातगतानां वर्तमानकाले क्षेत्रभंगसदृशं स्पर्शनं ज्ञातव्यं। अतीतानागतकालयोः त्रिलोकानाम् संख्यातभागः तिर्यग्मनुष्यलोकयोः असंख्यातगुणश्च स्पृष्टः। कारणं, वायुकायिकजीवाः, पल्योपमस्य असंख्यातभागमात्राः विक्रियमाणक्षमाः वर्तमानकाले भवन्ति, ते च पंचरज्जुबाहल्यं रज्जुप्रतरं अतीतकाले स्पृश्यते इति।
सासादनतिरश्चां क्षेत्रस्पर्शनाय सूत्रमवतरति-
सासण सम्मादिट्ठीहि केवडियं खेत्तं फोसिदं? लोगस्स असंखेज्जदिभागो।।२४।।
सूत्रं सुगमं।


अब द्वितीय नरक पृथिवी से लेकर छठी पृथिवी तक के नारकियों का स्पर्शन बतलाने हेतु दो सूत्र अवतरित हो रहे हैं-

सूत्रार्थ-

द्वितीय पृथिवी से लेकर छठी पृथिवी तक प्रत्येक पृथिवी के नारकियों में मिथ्यादृष्टि और सासादनसम्यग्दृष्टि जीवों ने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है? लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पर्श किया है।।१७।।

उक्त जीवों ने अतीतकाल की अपेक्षा चौदह भागों में से कुछ कम एक, दो, तीन, चार और पाँच भाग स्पर्श किए हैं।।१८।।

हिन्दी टीका-दोनों सूत्रों का अर्थ सुगम है। दूसरी पृथिवी में उपपादगत मिथ्यादृष्टि नारकी जीवों ने अतीतकाल में एक बटे चौदह (१/१४) भाग स्पर्श किया है। तीसरी पृथिवी के नारकी जीवों ने दो बटे चौदह (२/१४) भाग स्पर्श किया है, चौथी पृथिवी के नारकियों ने तीन बटे चौदह (३/१४) भाग स्पर्श किया है, पाँचवी पृथिवी के नारकियों ने चार बटे चौदह (४/१४) भाग और छठी पृथिवी के नारकियों ने पांच बटे चौदह (५/१४) भाग प्रमाणक्षेत्र स्पर्श किया है। इन सभी पृथिवियों के नारकियों का यह क्षेत्र अगम्य क्षेत्र की अपेक्षा देशोन कहना चाहिए। इसी प्रकार से सासादनसम्यग्दृष्टि जीवों का भी स्पर्शनक्षेत्र कहना चाहिए। विशेष बात यह है कि उनके उपपादपद नहीं होता है।

शंका-भोगभूमि की रचना से संस्थित असंख्यात द्वीप-समुद्र नारकियों के द्वाराकैसे स्पर्श किये जाते हैं?

समाधान-नहीं, क्योंकि वहाँ पर भी नारकियों का निर्गमन और प्रवेश होने में कोई विरोध नहीं है। अर्थात् मारणान्तिक समुद्घात की अपेक्षा नारकी जीवों का उक्त क्षेत्र में प्रवेश और निर्गमन बन जाता है।

अब द्वितीय पृथिवी से लेकर छठी पृथिवी को प्राप्त सम्यग्मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि नारकियों का स्पर्शन बतलाने हेतु सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

द्वितीय पृथिवी से लेकर छठी पृथिवी तक प्रत्येक पृथिवी के सम्यग्मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि नारकी जीवों ने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है? लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पर्श किया है।।१९।।

हिन्दी टीका-सूत्र का अर्थ सुगम है।

सम्यग्मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि इन दोनों गुणस्थानों के स्वस्थान स्वस्थान, विहारवत्स्वस्थान, वेदना, कषाय और वैक्रियिक समुद्घात इन पाँच पदों में स्थित नारकी जीवों की तथा मारणान्तिकपद में स्थित असंयतसम्यग्दृष्टि जीवों की वर्तमानकाल में स्पर्शन की प्ररूपणा क्षेत्र प्ररूपणा के समान है।

द्वितीयादि छह पृथिवियों में असंयतसम्यग्दृष्टि जीवों का उपपाद नहीं होता है। अर्थात् चतुर्थ गुणस्थानवर्ती सम्यग्दृष्टि जीव प्रथम नरक से नीचे नहीं जाता है।

इस प्रकार द्वितीय स्थल में प्रथम आदि छह पृथिवियों में नारकियोें का स्पर्शन निरूपण करने वाले चार सूत्र पूर्ण हुए।

अब सातवीं नरकपृथिवी के मिथ्यादृष्टि नारकियों का स्पर्शन बतलाने हेतु दो सूत्र कहे जाते हैं-

सूत्रार्थ-

सातवीं पृथिवी में नारकियों में मिथ्यादृष्टि जीवों ने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है? लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पर्श किया है।।२०।।

सातवीं पृथिवी के मिथ्यादृष्टि नारकियों ने अतीतकाल की अपेक्षा कुछ कम छह बटे चौदह भाग स्पर्श किए हैं।।२१।।

हिन्दी टीका-दोनों सूत्रों का अर्थ सुगम है। स्वस्थान स्वस्थान, विहारवत्स्वस्थान, वेदना, कषाय और वैक्रियिकसमुद्घात को प्राप्त मिथ्यादृष्टि नारकी जीवों ने अतीत और अनागत काल में सामान्यलोक आदि चारों लोकों का असंख्यातवाँ भाग और अढाईद्वीप से असंख्यातगुणा क्षेत्र स्पर्श किया है।

मारणान्तिक समुद्घात और उपपादपद को प्राप्त मिथ्यादृष्टि नारकी जीवों ने अतीत और अनागत काल में चित्रा पृथिवी के एक हजार योजन से कम जो सातवीं पृथिवी के नीचे के चार हजार योजन हैं उनसे कम छह बटे चौदह (६/१४) भाग प्रमाण क्षेत्र का स्पर्श किया है।

उन नारकियों में न केवल अधस्तन योजनों से न्यूनता है, किन्तु यहाँ पर लोकनाली के भीतर अन्य भी क्षेत्र नारकियों से अछूता है।

सातवीं नरकपृथिवी में सासादनसम्यग्दृष्टि आदि नारकियों का क्षेत्र स्पर्शन कहने के लिए सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

सातवीं पृथिवी के सासादनसम्यग्दृष्टि, सम्यग्मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि नारकियों ने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है? लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पर्श किया है।।२२।।

हिन्दी टीका-सातवीं पृथिवी में इन तीनों ही गुणस्थानवर्ती जीवों के मारणान्तिक और उपपाद ये दो पद नहीं होते हैं। शेष स्वस्थानादि पांच पदों पर विद्यमान उक्त तीन गुणस्थान जीवों ने अतीत अनागत और वर्तमान इन तीनों कालों में सामान्यलोक आदि चार लोकों का असंख्यातवां भाग और मनुष्यलोक से असंख्यातगुणा क्षेत्र स्पर्श किया है। इसका कारण पूर्व के समान ही जानना चाहिए।

इस प्रकार तृतीय स्थल में सप्तम पृथिवी के नारकियों का गुणस्थान की अपेक्षा स्पर्शन प्रतिपादन करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

इस तरह से नरकगति के प्रतिपादन की मुख्यता वाला प्रथम अन्तराधिकार समाप्त हुआ।

अब तिर्यंचगति में दो स्थलों के द्वारा ग्यारह सूत्रों में द्वितीय अन्तराधिकार कहा जाता है। उसमें से प्रथम स्थल मेें सामान्य तिर्यंचों का गुणस्थान की अपेक्षा स्पर्शन का कथन करने वाले छह सूत्र कहेंगे। पुन: द्वितीय स्थल में पंचेन्द्रिय तिर्यंचों का स्पर्शन बतलाने हेतु पाँच सूत्र कहेंगे।

अब तिर्यंच गति में मिथ्यादृष्टि जीवों का स्पर्शन कहने के लिए सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

तिर्यंचगति में तिर्यंचों में मिथ्यादृष्टि जीवों ने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है? ओघ के समान अर्थात् सर्वलोक का स्पर्श किया है।।२३।।

हिन्दी टीका-सूत्र का अर्थ सुगम है। विशेष कथन शंका-समाधान द्वारा स्पष्ट किया जा रहा है।

शंका-त्रस जीवों से विरहित असंख्यात समुद्रों में विहारवत्स्वस्थान से परिणत हुए तिर्यंचोें का अस्तित्वकैसे संभव है?

समाधान-ऐसा नहीं कहना चाहिए, क्योंकि पूर्वभव के बैरी देवों के प्रयोग से विहार होने में कोई विरोध नहीं है।

अतीतकाल में विहार करने वाले तिर्यंचों से स्पर्श किए गये क्षेत्र के निकालने के विधान को कहते हैं-पूर्वभव के वैरी देवों के प्रयोग से तिर्यंच ऊपर एक लाख योजन प्रमाण मेरु पर्यन्त, कुलाचल, कुंडलगिरि, रुचकगिरि, मानुषोत्तर और नगेन्द्रवर पर्वतादिकों से रुद्ध क्षेत्र को छोड़कर सर्वद्वीप और समुद्रों का स्पर्श करते हैं। इसलिए एक लाख योजन बाहल्यवाले राजुप्रतर को स्थापन कर ऊपर की ओर से उनंचास खंड करके प्रतराकार से स्थापित करने पर तिर्यग्लोक के संख्यातवें भाग प्रमाण क्षेत्र हो जाता है। वैक्रियिक समुद्घातगत तिर्यंचों का स्पर्शन वर्तमान काल में क्षेत्रप्ररूपणा के समान जानना चाहिए। अतीत और अनागतकाल में सामान्यलोक आदि तीन लोकों का संख्यातवाँ भाग और तिर्यग्लोक तथा मनुष्यलोक, इन दोनों लोकों से असंख्यातगुणा क्षेत्र स्पर्श किया है। इसका कारण यह है कि पल्योपम के असंख्यातवें भाग मात्र वायुकायिक जीव वर्तमानकाल में विक्रिया करने में समर्थ होते हैं और वे पांच राजु बाहल्यवाले एक राजुप्रतर प्रमाण क्षेत्र को अतीतकाल में स्पर्श करते हैं।

अब सासादन गुणस्थानवर्ती तिर्यंचों का क्षेत्र स्पर्शन बतलाने हेतु सूत्र अवतरित होता है-

'सूत्रार्थ-

सासादनसम्यग्दृष्टि तिर्यंच जीवों ने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है? लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पर्श किया है।।२४।।

सूत्र का अर्थ सुगम है।

अस्यैव स्पष्टीकरणार्थं सूत्रमवतरति-

सत्त चोद्दसभागा वा देसूणा।।२५।।

सिद्धांतचिंतामणिटीका-सूत्रं सुगमं।
विशेषेण तु स्वस्थानस्वस्थानगतसासादनसम्यग्दृष्टयः तिर्यञ्चः सर्वद्वीपान् लवणोद-कालोद-स्वयंभूरमण-समुद्रांश्च अतीतकाले स्पृशन्ति।
अत्र किंचित् द्वीपसमुद्राणां क्षेत्रफलं कथ्यते-जंबूद्वीपस्य क्षेत्रफलप्रमाणं लवणसमुद्रे चतुर्विंशतिखण्डानि भवन्ति। लवणसमुद्रात् धातकीखण्डप्रमाणं षड्गुणितं भवति। कालोदसमुद्रः अष्टाविंशतिगुणा, पुष्करद्वीपः विंशत्यधिकशतगुणितः, पुष्करवरसमुद्रः षण्णवत्यधिकचतुःशतगुणितः इत्यादयः१।
विहारवत्स्वस्थानआदिशेषपदगतैः सासादनैः तिर्यग्भिः सर्वेऽपि द्वीपसमुद्राः पूर्ववैरिदेवसंबंधेन स्पृश्यन्ते, इति कृत्वा लक्षयोजनबाहल्यं तत्प्रायोग्यबाहल्यं वा रज्जुप्रतरं ऊध्र्वं एकोनपंचाशत्खण्डानि कृत्वा प्रतराकारेण स्थापिते तिर्यग्लोकस्य संख्यातभागो भवति। इति सूत्रे प्रोक्तं ‘वाशब्दस्य’ अर्थो भवति।
मारणान्तिकगतैः तैः सप्त चतुर्दशभागाः देशोना स्पृष्टाः।
तिर्यक्सासादनाः मेरुमूलादधः मारणान्तिकं किं न कुर्वंति?
स्वभावादेव न कुर्वन्ति। ते नारकेष्वपि न उत्पद्यन्ते, स्वभावादेव एतदपि कथनं ज्ञातव्यं।
उपपादगतैः सासादनैः एकादश चतुर्दशभागाः स्पृष्टाः। अस्यायमर्थः-तिर्यक्सासादनाः एकेन्द्रियेषु नोत्पद्यन्ते, किंतु तत्र मारणान्तिकं कुर्वन्ति, सासादनगुणस्थानाल्प कालत्वात् अतो एतत्स्पर्शनकालं घटते।
सम्यग्मिथ्यादृष्टितिरश्चां स्पर्शननिरूपणाय सूत्रमवतरति-
सम्मामिच्छादिट्ठीहि केवडियं खेत्तं फोसिदं? लोगस्स असंखेज्जदिभागो।।२६।।
सूत्रं सुगमं। पर्यायार्थिकनयापेक्षया सासादनवदेषां स्पर्शनं ज्ञातव्यं।
असंयतसम्यग्दृष्टि-संयतासंयतयोः स्पर्शनप्रतिपादनाय सूत्रावतारो भवति-
असंजदसम्मादिट्ठि-संजदासंजदेहि केवडियं खेत्तं फोसिदं? लोगस्स असंखेज्जदिभागो।।२७।।
सूत्रं सुगमं।
अनयोः एव विशेषेण स्पर्शनकथनाय सूत्रमवतरति-
छ चोद्दसभागा वा देसूणा।।२८।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-सूत्रं सुगमं।
असंयतसम्यग्दृष्टितिर्यञ्चः स्वस्थानपदे सर्वद्वीपेषु भवन्ति, लवणोद-कालोद-स्वयंभूरमणसमुद्रेषु च, तस्मात् शेषसमुद्रेभ्यः न्यूनं रज्जुप्रतरक्षेत्रं अत्र स्वस्थानक्षेत्रं भवति। विहार-वेदना-कषाय-वैक्रियिकपदेषु वर्तमानाः अतीतकाले त्रिलोकानामसंख्यातभागं, तिर्यग्लोकस्य संख्यातभागं, सार्धद्वयद्वीपादसंख्यातगुणं च स्पृशन्ति।
कुतः?
पूर्ववैरिदेवप्रयोगात् लक्षयोजनबाहल्यं संख्यातयोजनबाहल्यं वा रज्जुप्रतरं सर्वमतीतकाले स्पृशन्ति।
मारणान्तिकपदे स्थितैः षट् चतुर्दशभागाः स्पृष्टाः देशोनाः।
कुतः?
अच्युतकल्पादुपरि तेषामुत्पत्तेरभावात् तत्र गमनाभावोऽस्ति। न च उत्पत्तिक्षेत्रमुल्लंघ्य गमनं संभवति, अति प्रसंगात्।
नवग्रैवेयकेषु मिथ्यादृष्टयो यदि उत्पद्यन्ते, तर्हि असंयतसम्यग्दृष्टीनां संयतासंयतानां चोत्पत्तिः किमिति न भवेत्? मिथ्यादृष्टयो दिगम्बरमुनिवेषेण द्रव्यलिंगेन उत्पद्यन्ते इति चेत्? तर्हि एतेऽपि द्रव्यलिंगेन चैव उत्पद्यन्तां, न कोऽपि दोषः। यदि ते द्रव्यलिंगिनः नवग्रैवेयकेषु उत्पद्यन्ते तर्हि पुनः तेषां स्पर्शनक्षेत्रं देशोनाः सप्त चतुर्दशभागाः भवेयुः?
नैष दोषः, ते यद्यपि द्रव्यलिंगेन दिगंबरवेषेण नवग्रैवेयकेषु मिथ्यादृष्टयः, असंयतसम्यग्दृष्टयः संयतासंयताश्चोत्पद्यन्ते तर्हि अपि सप्त चतुर्दशभागाः स्पर्शनक्षेत्रं न भवति। मानुषक्षेत्रादेव तत्रोत्पत्तेः१, न च तिर्यग्लोकात्। तथा च मनुष्याः एव द्रव्यलिंगिनः उत्पद्यन्ते तत्र, न च तिर्यञ्चः इति ज्ञातव्याः भवद्भिः।
उपपादगतैः अतीतकाले त्रिलोकानामसंख्यातभागः, तिर्यग्लोकस्य संख्यातभागः, सार्धद्वयद्वीपाद-संख्यातगुणः स्पृष्टः। तद्यथा-तिर्यक्षु तिर्यग्देवनारकसम्यग्दृष्टयः न उत्पद्यन्ते।
कुतः?
स्वभावात्। तिर्यक्षु मनुष्यक्षायिकसम्यग्दृष्टयः चैव उत्पद्यन्ते। पूर्वं मिथ्यात्वसहितपरिणामैः बद्धतिर्यगायुष्कत्वात्। तेऽपि भोगभूमिषु चैवोत्पद्यन्ते, तेषां दानादिसकलदशधर्मे विद्यमानानुमोदान्। तेन स्वयंप्रभपर्वतस्योपरिम भागः सर्वश्चैव उपपादपरिणतसम्यग्दृष्टिभिः स्पृश्यते इति।
विशेषेण तु मारणान्तिकगतसंयतासंयतैः देशोनाः षट् चतुर्दशभागाः स्पृष्टाः, तिर्यक्संयतासंयतानां अच्युतकल्पपर्यंतमेव मारणान्तिकेन गमनसंभवात्। एवं तिरश्चां सामान्येन स्पर्शनकथनत्वेन षट्सूत्राणि गतानि।
अधुना त्रिविधानां तिरश्चां गुणस्थानापेक्षया स्पर्शनकथनाय सूत्रमवतरति-
पंचिदियतिरिक्ख-पंचिंदियतिरिक्खपज्जत्त-पंचिंदियतिरिक्खजोणि-णीसु मिच्छादिट्ठीहि केवडियं खेत्तं फोसिदं? लोगस्स असंखेज्जदिभागो।।२९।।
एतत्सूत्रं वर्तमानकालसंबंधि वर्तते। अतः क्षेत्रवत् स्पर्शनं ज्ञातव्यं।
पुनश्च एषां त्रिविधानां स्पर्शनकथनाय सूत्रमवतार्यते-
सव्वलोगो वा।।३०।।
सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-परिशेषात् एतत्सूत्रमतीतानागतसंबंधि अस्ति। विशेषेण तु असंख्यातेषु समुद्रेषु भोगभूमिप्रतिभागद्वीपानामन्तरेषु स्थितेषु स्वस्थानपदस्थितत्रिविधाः तिर्यञ्चाः न सन्ति, तिर्यग्लोकस्य संख्यातभागमात्रं पंचेन्द्रियतिर्यक्त्रिकमिथ्यादृष्टिस्वस्थानक्षेत्रं भवति। पुनश्च मित्रामित्रदेववशेन सर्वद्वीपसमुद्रेषु संचरणं प्रति विरोधाभावात्। शेषं पूर्ववत्।
विशेषतः-मारणान्तिकोपपादगतपंचेन्द्रियतिर्यग्भिः त्रिविधैः मिथ्यादृष्टिभिः सर्वलोकः स्पृष्टः।
कश्चिदाह-लोकनाल्याः बहिः त्रसकायिकानामसंभवात् ‘सर्वलोकः’ इति वचनं कथं घटते?
उच्यते-नैष दोषः, मारणान्तिकोपपादस्थितत्रसजीवान् मुक्त्वा शेषत्रसानां बहिः त्रसनाल्याः अस्तित्वप्रतिषेधात्।
शेषतिरश्चां स्पर्शनप्रतिपादनाय सूत्रमवतरति-
सेसाणं तिरिक्खगदीणं भंगो।।३१।।
सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-अत्र शेषपदेन सासादन-सम्यग्मिथ्यादृष्टि-असंयतसम्यग्दृष्टि-संयतासंयताः गृहीतव्याः, अन्येषामसंभवात्। एतेषां प्ररूपणा तिर्यग्गतिस्पर्शनमिव ज्ञातव्या। विशेषेण तु तिरश्चीषु योनिनीषु असंयतसम्यग्दृष्टीनां उपपादो नास्ति इति निश्चेतव्यं।
अधुना अपर्याप्ततिर्यक्पंचेन्द्रियाणां स्पर्शननिरूपणाय सूत्रावतारः क्रियते-
पंचिंदियतिरिक्ख-अपज्जत्तएहि केवडियं खेत्तं फोसिदं? लोगस्स असंखेज्ज-दिभागो।।३२।।
वर्तमानकालापेक्षया एतत्सूत्रं ज्ञातव्यं।


अब उसी का स्पष्टीकरण करने हेतु सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

सासादनसम्यग्दृष्टि तिर्यंचों ने भूतकाल की अपेक्षा कुछ कम सात बटे चौदह भाग स्पर्श किए हैं।।२५।।

हिन्दी टीका-सूत्र सुगम है। विशेष बात यह है कि स्वस्थानस्वस्थानपद को प्राप्त सासादनसम्यग्दृष्टि तिर्यंच जीवों ने सभी द्वीपों और लवणसमुद्र, कालोदधि और स्वयंभूरमण समुद्र को अतीत काल में स्पर्श किये हैं। यहाँ उन द्वीप-समुद्रों का किंचित् क्षेत्रफल कहते हैं-

जम्बूद्वीप का क्षेत्रफल प्रमाण लवणसमुद्र में चौबीस खण्ड होते हैं। लवणसमुद्र से धातकीखण्ड का प्रमाण छह गुणा होता है। धातकीखण्ड से कालोदधि समुद्र अट्ठाईसगुणा होता है, कालोदसमुद्र से पुष्करद्वीप एक सौ बीस गुणा अधिक है, पुष्करवर समुद्र चार सौ छियानवे गुणा है.....इत्यादि। विहारवत्स्वस्थानादि शेष पद स्थित तिर्यंच सासादनसम्यग्दृष्टियों के द्वारा समस्त द्वीप और समुद्र पूर्वभव के वैरी देवों के संबंध से स्पर्श किये जाते हैं, इसलिए एक लाख योजन बाहल्य वाले अथवा तत्प्रायोग्य बाहल्य वाले राजुप्रतर के ऊपर की ओर से उनंचास खण्ड करके प्रतराकार से स्थापित करने पर तिर्यग्लोक का संख्यातवां भाग हो जाता है। इस प्रकार से यह सूत्र में कथित ‘वा’ शब्द का अर्थ हुआ। मारणान्तिक समुद्घात को प्राप्त तिर्यंच सासादनसम्यग्दृष्टियों ने कुछ कम सात बटे चौदह (७/१४) भाग स्पर्श किये हैं।

शंका-तिर्यंच सासादनसम्यग्दृष्टि जीव सुमेरुपर्वत के मूलभाग से नीचे मारणान्तिक समुद्घात क्यों नहीं करते हैं?

समाधान-वे नारकियों में भी उत्पन्न नहीं होते हैं। स्वभाव से ही यह कथन भी जानना चाहिए। उपपाद पद को प्राप्त तिर्यंच सासादनसम्यग्दृष्टियों ने ग्यारह बटे चौदह (११/१४) भाग स्पर्श किये हैं। इसका अर्थ यह है कि सासादनसम्यग्दृष्टि तिर्यंच जीव एकेन्द्रियों में उत्पन्न नहीं होते हैं, किन्तु वहाँ वे मारणान्तिक समुद्घात करते हैं, क्योंकि सासादनगुणस्थान का काल अल्प है इसलिए उसका इतना ही स्पर्शनकाल घटित होता है।

अब सम्यग्मिथ्यादृष्टि तिर्यंचों का स्पर्शन निरूपण करने हेतु सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

सम्यग्मिथ्यादृष्टि तिर्यंचों ने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है? लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पर्श किया है।।२६।।

सूत्र का अर्थ सुगम है। विशेष बात यह है कि पर्यायार्थिकनय की अपेक्षा सासादनगुणस्थानवर्ती जीवों के समान ही इनका स्पर्शनक्षेत्र जानना चाहिए।

अब असंयत सम्यग्दृष्टि और संयतासंयत जीवों के स्पर्शन का प्रतिपादन करने हेतु सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

असंयतसम्यग्दृष्टि और संयतासंयत गुणस्थानवर्ती तिर्यंचों ने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है? लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पर्श किया है।।२७।।

सूत्र सुगम है।

अब उपर्युक्त दोनों गुणस्थानवर्ती जीवों का ही विशेषरूप से स्पर्शन कहने के लिए सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

उक्त दोनों गुणस्थानवर्ती तिर्यंच जीवों ने अतीत और अनागत काल की अपेक्षा कुछ कम छह बटे चौदह भाग स्पर्श किए हैं।।२८।।

हिन्दी टीका-सूत्र का अर्थ सुगम है।

असंयतसम्यग्दृष्टि तिर्यंच स्वस्थानस्वस्थान पद पर सर्व द्वीपों में होते हैं तथा लवण समुद्र, कालोदधि समुद्र और स्वयंभूरमणसमुद्र में भी होेते हें। इसलिए शेष समुद्रों के क्षेत्र से हीन राजुप्रतर यहाँ पर स्वस्थानक्षेत्र होता है। विहार, वेदना, कषाय और वैक्रियिकसमुद्घात, इन पदों पर वर्तमान जीव अतीतकाल में सामान्यलोक आदि तीन लोकों का असंख्यातवाँ भाग, तिर्यग्लोक का संख्यातवाँ भाग और अढ़ाईद्वीप से असंख्यातगुणा क्षेत्र स्पर्श करते हैं।

ऐसा क्यों? क्योंकि पूर्वभव के वैरी देवों के प्रयोग से एक लाख योजन बाहल्यवाला अथवा संख्यात योजन बाहल्य वाला राजुप्रतररूप सर्वक्षेत्र अतीतकाल में स्पर्श करते हैं। मारणान्तिकसमुद्घातपद पर वर्तमान जीवों ने कुछ कम छह बटे चौदह भाग (६/१४) स्पर्श किये हैं। कैसे? क्योंकि अच्युतकल्प से ऊपर उनकी उत्पत्ति का अभाव होने से वहाँ पर गमन का अभाव है और उत्पत्तिक्षेत्र को उल्लंघन करके गमन संभव नहीं है, अन्यथा अतिप्रसंग दोष प्राप्त हो जायेगा।

शंका-यदि नवग्रैवेयकों में मिथ्यादृष्टि मनुष्य उत्पन्न होते हैं, तो असंयतसम्यग्दृष्टि और संयतासंयत तिर्यंचों की उत्पत्ति क्यों नहीं होनी चाहिए? यदि कहा जाये कि मिथ्यादृष्टि मनुष्य द्रव्यलिंग दिगम्बर मुनिवेष से उत्पन्न होते हैं, तो ये भी द्रव्यलिंग से ही उत्पन्न होवे, इसमें कोई दोष नहीं है। यदि कहा जाये कि वे द्रव्यलिंगी मुनि नवग्रैवेयकों में उत्पन्न होवें, सो ऐसा भी नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि फिर स्पर्शनक्षेत्र के देशोन सात बटे चौदह (७/१४) भाग प्रमाण होने का प्रसंग प्राप्त हो जाएगा?

समाधान-यह कोई दोष नहीं है। क्योंकि, यद्यपि नवग्रैवेयकों में द्रव्यलिंगी दिगम्बर वेष से मिथ्यादृष्टि, असंयतसम्यग्दृष्टि और संयतासंयत जीव उत्पन्न होते हैं, तो भी सात बटे चौदह (७/१४) भाग प्रमाण स्पर्शन क्षेत्र नहीं प्राप्त होता है, क्योंकि उन नवग्रैवेयकों में मनुष्य क्षेत्र से ही उत्पत्ति होती है। अर्थात् उनमें द्रव्यलिंगी मुनि ही उत्पन्न होते हैं, तिर्यंच नहीं, ऐसा जानना चाहिए। उपपादपद को प्राप्त जीवों ने अतीतकाल में सामान्यलोक आदि तीन लोकों का असंख्यातवाँ भाग, तिर्यग्लोक का संख्यातवाँ भाग और अढ़ाईद्वीप से असंख्यातगुणा क्षेत्र स्पर्श किया है। वह इस प्रकार से है-तिर्यंचों में सम्यग्दृष्टि तिर्यंच, सम्यग्दृष्टि देव अथवा सम्यग्दृष्टि नारकी जीव नहीं उत्पन्न होते हैं, क्यों? क्योंकि, ऐसा स्वभाव ही है। केवल क्षायिकसम्यग्दृष्टि मनुष्य ही तिर्यंचों में उत्पन्न होते हैं, क्योंकि, उन्होंने पूर्व में मिथ्यात्व से सहित परिणामों के द्वारा तिर्यंच आयु को बांध लिया था। सो वे भी जीव भोगभूमि के तिर्यंचों में ही उत्पन्न होते हैं, क्योंकि सम्यग्दृष्टियों की दान आदि समस्त दश धर्मों में अनुमोदना विद्यमान रहती ही है। इसलिए स्वयंप्रभ पर्वत का उपरिम सर्वभाग उपपादपरिणत असंयत सम्यग्दृष्टि तिर्यंच जीवों के द्वारा स्पर्श किया गया है।

विशेष बात यह है कि मारणान्तिक समुद्घात को प्राप्त तिर्यंच संयतासंयत जीवों के द्वारा कुछ कम छह बटे चौदह (६/१४) भाग स्पर्श किये गये हैं, क्योंकि संयतासंयत गुणस्थानवर्ती तिर्यंचों का अच्युत कल्प तक मारणान्तिक समुद्घात से गमन संभव है।

इस प्रकार तिर्यंच जीवों का सामान्य से स्पर्शन कथन करने वाले छह सूत्र पूर्ण हुए।

अब तीन प्रकार के तिर्यंचों का गुणस्थान की अपेक्षा कथन करने हेतु सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

पंचेन्द्रिय तिर्यंच, पंचेन्द्रियतिर्यंच पर्याप्त और पंचेन्द्रियतिर्यंच योनिनियों में रहने वाले मिथ्यादृष्टि जीवों ने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है? लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पर्श किया है।।२९।।

यह सूत्र वर्तमानकाल संंबंधी है, इसलिए इसका स्पर्शन क्षेत्रप्ररूपणा के समान जानना चाहिए।

पुनश्च इन तीनों प्रकार के जीवों का स्पर्शन कथन करने के लिए सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

उक्त तीनों प्रकार के तिर्यंच जीवों ने अतीत और अनागत काल में सर्वलोक स्पर्श किया है।।३०।।

हिन्दी टीका-परिशेष न्याय से यह सूत्र भूत एवं भविष्यत्काल संबंधी है। विशेषरूप से असंख्यात समुद्रों में और भोगभूमि के प्रतिभागरूप द्वीपों के अन्तरालों में स्थित क्षेत्रों में स्वस्थानपदस्थित तीनों प्रकार के तिर्यंच नहीं है, तिर्यग्लोक के संख्यातवें भागप्रमाण पंचेन्द्रिय तिर्यंचत्रिक् (पंचेन्द्रिय, पंचेन्द्रियपर्याप्त और योनिमती तिर्यंच) इन तीन प्रकार के मिथ्यादृष्टि तिर्यंचों का स्वस्थान क्षेत्र होता है। पुन: पूर्वभव के मित्र या शत्रुरूप देवों के वश से सर्वद्वीप और समुद्रों में संसार (विहार) करने के प्रति कोई विरोध नहीं है। शेष कथन पूर्ववत् है।

विशेषरूप से मारणांतिक समुद्घात और उपपादपद को प्राप्त पंचेन्द्रिय तिर्यंच आदि तीन प्रकार के मिथ्यादृष्टि तिर्यंच जीवों ने सर्वलोक स्पर्श किया है।

शंका-लोकनाली के बाहर त्रसकायिक जीवों के असंभव होने से ‘सर्वलोक स्पर्श किया है’ यह वचन कैसे घटित होता है?

समाधान-यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि मारणान्तिक समुद्घात और उपपादपद में स्थित त्रसजीवों को छोड़कर शेष त्रस जीवों का त्रसनाली के बाहर अस्तित्व का प्रतिषेध किया गया है।

अब शेष तिर्यंचों का स्पर्शन बतलाने हेतु सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

शेष तिर्यंचगति के जीवों का स्पर्शन क्षेत्र ओघ के समान है।।३१।।

हिन्दी टीका-यहाँ शेष पद से सासादन सम्यग्दृष्टि, सम्यक्मिथ्यादृष्टि असंयतसम्यग्दृष्टि और संयतासंयत तिर्यंचों को ग्रहण करना चाहिए क्योंकि इनके अतिरिक्त अन्य तिर्यंचों का ग्रहण करना असंभव है। इन चार गुणस्थानवर्ती तिर्यंचोंं की प्ररूपणा तिर्यंचगति की ओघ स्पर्शन प्ररूपणा के समान जानना चाहिए। विशेष बात यह है कि योनिमती तिर्यंचों में असंयतसम्यग्दृष्टि जीवों का उपपाद नहीं है ऐसा निश्चय करना चाहिए।

अब अपर्याप्त पंचेन्द्रिय तिर्यंचों के स्पर्शन का निरूपण करने के लिए सूत्र का अवतार किया जा रहा है-

सूत्रार्थ-

पंचेन्द्रिय तिर्यंच लब्ध्यपर्याप्त जीवों ने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है? लोक का असंख्यातवां भाग स्पर्श किया है।।३२।।

वर्तमानकाल की अपेक्षा यह सूत्र जानना चाहिए।

अगे्र पुनश्चैषां स्पर्शनकथनाय सूत्रमवतरति-

सव्वलोगो वा।।३३।।

सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-‘वा’ शब्देन अत्र स्वस्थानस्वस्थान-वेदना-कषायपदगतैः पंचेन्द्रियतिर्यगपर्याप्तै: त्रिलोकानामसंख्यातभागः, तिर्यग्लोस्य संख्यातभागः, सार्धद्वयद्वीपादसंख्यातगुणः स्पृष्टः।
कुतः?
सार्धद्वयद्वीपसमुद्रेषु कर्मभूमिप्रतिभागे स्वयंप्रभपर्वतपरभागे च तेषां संभवात्। अतीतकाले स्वयंप्रभपर्वतपरभागं सर्वं ते स्पृशन्ति इति तिर्यग्लोकस्य संख्यातभागमात्रं क्षेत्रं भवति।
अंगुलासंख्यातभागावगाहनानां अपर्याप्तानां संख्यातांगुलोत्सेधः कथं घटते? न, मृतपंचेन्द्रियादित्र-सकलेवरेषु अंगुलस्य संख्यातभागं आदिंं कृत्वा यावत् संख्यातयोजनानि इति क्रमवृद्ध्या स्थितशरीरेषु उत्पद्यमानानां अपर्याप्तानां संख्यातांगुलोत्सेधं प्रति विरोधाभावात्।
अथवा सर्वेषु द्वीपसमुद्रेषु पंचेन्द्रियतिर्यगपर्याप्ता: सन्ति, पूर्ववैरिदेवसंबंधेन एकबन्धनबद्धषड्जीवनिकायाः अवगाढकर्मभूमिप्रतिभागोत्पन्नौदारिकदेहमहामत्स्यादीनां सर्वद्वीपसमुद्रेषु संभवोपलम्भात्।
महामत्स्यावगाहनायां एकबन्धनबद्धषड्जीवनिकायानां अस्तित्वं कथं ज्ञायते?
वर्गणाखण्डे कथिताल्पबहुत्वानियोगद्वारात् ज्ञायते। तद्यथा-सर्वस्तोकाः महामत्स्य शरीरे जगत्प्रतरस्य असंख्यातभागमात्राः त्रसकायिकजीवाः। तेजस्कायिका जीवा असंख्यातगुणाः। पृृथिवीकायिका जीवा विशेषाधिकाः। अप्कायिका जीवा विशेषाधिकाः। वायुकायिका जीवा विशेषाधिकाः। वनस्पतिकायिका जीवा अनंतगुणा इति। न च ते सर्वे पर्याप्ताः एव, त्रसापर्याप्तानामपि तेजस्कायिकानां च संभवात् तत्र महामत्स्यशरीरे।
तथा च मृतशरीरे एव पंचेन्द्रियापर्याप्तानां संभवोऽस्ति इति वक्तं न युक्तं, तस्य विधायकसूत्राभावात्। किन्तु महामत्स्यादिदेहे तेषामपर्याप्तानामस्तित्वसूचकं पुनः इदं अल्पबहुत्वसूत्रं भवति।
त्रसपर्याप्तराशिभ्यः त्रसापर्याप्तराशिः असंख्यातगुणोऽस्ति। तेन यत्र त्रसजीवानां संभवो भवति, तत्र सर्वत्रापि पर्याप्तेभ्यः अपर्याप्ताः असंख्यातगुणा भवन्ति। तस्मात् संख्यातांगुलबाहल्यं तिर्यक्प्रतरं एकोनपंचाशत्-खण्डानि कृत्वा प्रतराकारेण स्थापिते तिर्यग्लोकस्य संख्यातभागमात्रं पंचेन्द्रियतिर्यग-पर्याप्तस्वस्थान-वेदना-कषाय क्षेत्रं भवति। ‘वा’ शब्दस्यार्थो गतः। मारणान्तिकोपपादगतैः सर्वलोकः स्पृष्टः, सर्वत्र गमनागमनं प्रति विरोधाभावात्।
तात्पर्यमेतत्-इमे महामत्स्यादयः उत्कृष्टावगाहनासहिता जीवाः तिर्यञ्चः, तेषां शरीरेषु स्थिताः, वायुकायिक-तेजस्कायिकादिपर्याप्ता अपर्याप्ताश्च तिर्यञ्चःअत्र संक्षेपेण वर्णिताः सन्ति। अपर्याप्तजीवैः सर्वलोकोऽपि स्पृष्टः। तदेतत् किमपि न कार्यकारि, यदि इमे महामत्स्यादयः कदाचित् जातिस्मरणनिमित्तेन कदाचित् देवानां संबोधनेन सम्यग्दर्शनमुत्मादयन्ति कदाचित्संयतासंयत गुणस्थानेषु गत्वा अणुव्रतानि गृण्हन्ति त एव स्वर्गलोके गच्छन्ति अतएव संसारे सम्यग्दर्शनं अणुव्रतं महाव्रतमेव सारभूतं वर्तते। ततः सम्यग्दर्शनसहितमणुव्रतं महाव्रतं वा गृहीत्वा मनुष्यपर्यायं सफलीकर्तव्यम्। तथैव च एवं भावनीयं यत् कदाचिदपि मम तिर्यग्गतौ जन्म न भवेदिति एतद्ग्रन्थपठनस्य सारमिति।
एवं तिर्यग्गतिषु पंचेन्द्रिय भेदानां स्पर्शनकथनत्वेन पंचसूत्राणि गतानि।
इति तिर्यग्गतिनामद्वितीयान्तराधिकारः समाप्तः।
अथ मनुष्यगतिनामान्तराधिकारे त्रिभिरन्तरस्थलैः अष्टसूत्रैः व्याख्यानं स्पर्शनानुगमस्य क्रियते-तत्र प्रथमस्थले त्रिविधमनुष्याणां स्पर्शनप्रतिपादनत्वेन सूत्रपंचकं। तदनु द्वितीयस्थले सयोगिकेवलिनां स्पर्शनकथनपरत्वेन एकं सूत्रं। ततःपरं तृतीयस्थले अपर्याप्तमनुष्याणां स्पर्शननिरूपणत्वेन द्वे सूत्रे इति समुदायपातनिका।
अधुना त्रिविधमनुष्याणां मिथ्यादृष्टिगुणस्थानापेक्षया स्पर्शनप्रतिपादनाय सूत्रमवतरति-
मणुसगदीए मणुस-मणुसपज्जत्त-मणुसिणी मिच्छादिट्ठीहि केवडियं खेत्तं फोसिदं? लोगस्स-असंखेज्जदिभागो।।३४।।
सूत्रस्यार्थः क्षेत्रवत् कथयितव्यः।
एषामेव विशेषस्पर्शननिरूपणाय सूत्रमवतरति-
सव्वलोगो वा ।।३५।।
सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-सूत्रं सुगमं। स्वस्थानस्वस्थान-विहारवत्स्वस्थान-वेदना-कषाय-वैक्रियिकपरिणतैः त्रिविधमनुष्यैः मिथ्यादृष्टिभिः-चतुर्लोकानामसंख्यातभागः स्पृष्टः। अतीतानागतकालेषु वैरिदेवसंबंधेनापि मानुषोत्तरशैलात् परतः गमनाभावात्। मानुषक्षेत्रस्य पुनः संख्यातभागः स्पृष्टः, मिथ्यादृष्टीनां आकाशगमनादि-विशेषशक्तिविरहितानां लक्षयोजनबाहल्येन स्पर्शाभावात्। अथवा सर्वपदैः मानुषलोकः देशोनः स्पर्शितः पूर्ववैरिदेवसंबंधेन ऊध्र्वं देशोनयोजनलक्षोत्पादनसंभवात्। मारणान्तिकोपपादगताभ्यां सर्वलोकः स्पृष्ट:, सर्वलोके गमनागमनयोः विरोधाभावात्।
अत्र ‘मणुसिणी’ पदेन भावस्त्रीवेदिनः मुख्यरूपेण गृहीतव्याः।
सासादनां स्पर्शननिरूपणाय सूत्रमवतरति-
सासणसम्मादिट्ठीहि केवडियं खेत्तं फोसिदं? लोगस्स असंखेज्ज-दिभागो।।३६।।
एतस्य सूत्रस्यार्थः पूर्वं प्ररूपितः।

आगे इन्हीं तिर्यंचों का स्पर्शन कथन करने हेतु सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

पंचेन्द्रिय तिर्यंच लब्ध्यपर्याप्त जीवों ने अतीत और अनागत काल की अपेक्षा सर्वलोक स्पर्श किया है।।३३।।

हिन्दी टीका-‘वा’ शब्द से यहाँ स्वस्थान स्वस्थान, वेदना और कषायसमुद्घात, इन पदों को प्राप्त पंचेन्द्रिय तिर्यंच अपर्याप्त जीवों ने सामान्यलोक आदि तीन लोकों का असंख्यातवाँ भाग, तिर्यग्लोक का संख्यातवाँ भाग और अढ़ाई द्वीप से असंख्यातगुणा क्षेत्र स्पर्श किया है, क्योंकि अढ़ाईद्वीप और दो समुद्रों में तथा कर्मभूमि के प्रतिभाग वाले स्वयंप्रभ पर्वत के परभाग में पंचेन्द्रिय तिर्यंच लब्ध्यपर्याप्तक जीवों का होना संभव है। अतीतकाल में स्वयंप्रभ पर्वत के सम्पूर्ण परभाग को वे जीव स्पर्श करते हैं इसलिए वह क्षेत्र तिर्यग्लोक का संख्यातवाँ भाग मात्र होता है।

शंका-अंगुल के असंख्यातवें भाग मात्र अवगाहना वाले लब्ध्यपर्याप्तक जीवों के संख्यात अंगुल प्रमाण उत्सेध कैसे पाया जा सकता है?

समाधान-नहीं, क्योंकि, मृत पंचेन्द्रियादि त्रस जीवों के कलेवर में अंगुुल के संख्यातवें भाग को आदि करके संख्यात योजनों तक क्रमवृद्धि से स्थित शरीरों में उत्पन्न होने वाले लब्ध्यपर्याप्त जीवों के संख्यात अंगुल उत्सेध के प्रति कोई विरोध नहीं है।

अथवा सभी द्वीप और समुद्रों में पंचेन्द्रिय तिर्यंच लब्ध्यपर्याप्त जीव होते हैं, क्योंकि पूर्वभव के वैरी देवों के संबंध से एक बंधन में बद्ध षट्कायिक जीवों के समूह से व्याप्त और कर्मभूमि के प्रतिभाग में उत्पन्न हुए औदारिक देह वाले महामच्छादिकों की सर्वद्वीप और समुद्रों में संभावना पाई जाती है।

शंका-महामच्छ की अवगाहना में एक बंधन से बद्ध षट्कायिक जीवों का अस्तित्व कैसे जाना जाता है?

समाधान-वर्गणाखंड में कहे गये अल्पबहुत्वानुयोगद्वार से जाना जाता है। वह इस प्रकार है-‘महामत्स्य के शरीर में सबसे कम जगत् प्रतर के असंख्यातवें भागमात्र त्रसकायिक जीव होते हैं। उन त्रसकायिक जीवों के तेजस्कायिक जीव असंख्यातगुणे होते हैं। तेजस्कायिक जीवों से पृथिवीकायिक जीव विशेष अधिक होते हैं। इसी प्रकार से पृथिवीकायिक जीवों से अप्कायिक जीव विशेष अधिक होते हैं। अप्कायिक जीवों से वायुकायिक जीव विशेष अधिक होते हैं और वायुकायिक जीवों से वनस्पतिकायिक जीव अनन्तगुणे होते हैं। वे सभी पर्याप्त ही हों, ऐसा नहीं है। क्योंकि उस महामत्स्य के शरीर में त्रस अपर्याप्तक और तेजस्कायिक जीव संभव है। मृत शरीर में ही पंचेन्द्रिय लब्ध्यपर्याप्त जीव संभव है ऐसा भी कहना युक्त नहीं है, क्योंकि इस बात के विधायक सूत्र का अभाव है। किन्तु महामच्छादि के देह में उन अपर्याप्त जीवों के अस्तित्व का सूचक यही उक्त अल्पबहुत्व सूत्र है। त्रसपर्याप्तराशि से त्रसअपर्याप्तराशि असंख्यातगुणी होती है, इसलिए जहाँ पर त्रस जीवों की संभावना होती है वहाँ पर सर्वत्र पर्याप्त जीवों से अपर्याप्त जीव असंख्यातगुणे होते हैं ऐसा जानना चाहिए। अतएव संख्यात अंगुल बाहल्य वाले तिर्यक्प्रतर के उनंचास खण्ड करके प्रतराकार से स्थापित करने पर तिर्यग्लोक के संख्यातवां भागमात्र पंचेन्द्रिय तिर्यंच लब्ध्यपर्याप्त जीवों का स्वस्थान, वेदना और कषायसमुद्घातगत क्षेत्र होता है। इस प्रकार से ‘वा’ शब्द का अर्थ समाप्त हुआ।

मारणान्तिकसमुद्घात और उपपादपद को प्राप्त पंचेन्द्रियतिर्यंच लब्ध्यपर्याप्त जीवों ने सर्वलोक स्पर्श किया है, क्योंकि उनके सर्वलोक में गमनागमन के प्रति विरोध का अभाव है।

तात्पर्य यह है कि ये महामत्स्य आदि उत्कृष्ट अवगाहना से सहित जीव तिर्यंच होते हैं, उनके शरीरों में स्थित वायुकायिक, तेजस्कायिक आदि पर्याप्त और अपर्याप्त तिर्यंचों का यहाँ संक्षेप में वर्णन किया गया है। अपर्याप्त जीवों के द्वारा सम्पूर्ण लोक का भी स्पर्श किया गया है। किन्तु उनका वह स्पर्श किंचित् भी कार्यकारी नहीं है। यदि ये महामत्स्य आदि कदाचित् जातिस्मरण के निमित्त से, कदाचित् देवों के सम्बोधन से सम्यग्दर्शन को उत्पन्न कर लेते हैं अथवा कदाचित् संयतासंयत गुणस्थान में जाकर अणुव्रत ग्रहण कर लेते हैं, तब वे स्वर्गलोक में जाते हैं। इसलिए संसार में सम्यग्दर्शन, अणुव्रत और महाव्रत का पालन ही सारभूत है, ऐसा समझकर हम सभी को सम्यग्दर्शन सहित अणुव्रत अथवा महाव्रत ग्रहण करके मनुष्यपर्याय को सफल करना चाहिए तथा यह भावना भी करनी चाहिए कि मुझे कभी भी तिर्यंचगति में जन्म न लेना पड़े, यही इस ग्रंथ के पठन का सार है।

इस प्रकार तिर्यंचगति में पंचेन्द्रिय तिर्यंचों के भेदों में स्पर्शन का कथन करने वाले पाँच सूत्र पूर्ण हुए।

यह तिर्यंचगति नाम का द्वितीय अंतराधिकार समाप्त हुआ।

अब मनुष्यगति नाम के अन्तराधिकार में तीन अन्तसर््थलों में आठ सूत्रों द्वारा स्पर्शनानुगम का व्याख्यान किया जा रहा है। उनमें से प्रथम स्थल में तीन प्रकार के मनुष्यों का स्पर्शन प्रतिपादन करने वाले पाँच सूत्र कहेंगे। उसके पश्चात् द्वितीय स्थल में सयोगकेवलियों का स्पर्शन कहने हेतु एक सूत्र है। पुन: आगे तृतीय स्थल में अपर्याप्त मनुष्यों का स्पर्शन बतलाने के लिए दो सूत्र हैं। इस प्रकार अधिकार के प्रारंभ में सूत्रों की यह समुदायपातनिका हुई।

अब तीन प्रकार के मनुष्यों का मिथ्यादृष्टि गुणस्थान की अपेक्षा स्पर्शन कथन करने के लिए सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

मनुष्यगति में मनुष्य, मनुष्यपर्याप्त और मनुष्यिनियों में मिथ्यादृष्टि जीवों ने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है? लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पर्श किया है।।३४।।

इस सूत्र का अर्थ क्षेत्रप्ररूपणा के समान समझना चाहिए।

अब इन्हीं जीवों के विशेष स्पर्शन निरूपण करने हेतु सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

मिथ्यादृष्टि मनुष्य, मनुष्यपर्याप्त और मनुष्यिनियों ने अतीत और अनागतकाल की अपेक्षा सर्वलोक स्पर्श किया है।।३५।।

हिन्दी टीका-सूत्र का अर्थ सुगम है। उसमें जो विशेषता है उसे कहते हैं- स्वस्थानस्वस्थान, विहारवत्स्वस्थान, वेदना, कषाय और वैक्रियिक समुद्घात से परिणत उपर्युक्त तीन प्रकार के मिथ्यादृष्टि मनुष्यों ने सामान्यलोक आदि चारों लोकों का असंख्यातवाँ भाग स्पर्श किया है क्योंकि अतीत और अनागतकाल में वैरी देवों के संबंध से भी मानुषोत्तर पर्वत से परे मनुष्यों के गमन का अभाव है। किन्तु मनुष्य क्षेत्र का संख्यातवाँ भाग स्पर्श किया है, क्योंकि आकाशगमनादिरूप विशेष शक्ति से विरहित मिथ्यादृष्टि जीवों के एक लाख योजन के बाहल्य से सर्वत्र स्पर्श का अभाव है। अथवा, सर्व पदों की अपेक्षा मिथ्यादृष्टि मनुष्यों ने देशोन मनुष्यलोक का स्पर्श किया है, क्योंकि पूर्वभव के वैरी देवों के संबंध से ऊपर कुछ कम एक लाख योजन तक उनका जाना-आना संभव है।

मारणान्तिकसमुद्घात और उपपादपद को प्राप्त उक्त तीनों प्रकार के मनुष्य मिथ्यादृष्टि जीवों ने सर्वलोक का स्पर्श किया है, क्योंकि इन दोनों पदों की अपेक्षा सर्वलोक के भीतर जाने-आने में कोई विरोध नहीं है।

यहाँ ‘‘मणुसिणी’’ पद से मुख्यरूप से भावस्त्रीवेदी मनुष्यों को ग्रहण करना चाहिए।

अब सासादन गुणस्थानवर्ती मनुष्यों का स्पर्शन निरूपण करने हेतु सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

मनुष्य, मनुष्यपर्याप्त और मनुष्यनी सासादनसम्यग्दृष्टि जीवों ने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है? लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पर्श किया है।।३६।।

इस सूत्र का अर्थ पूर्व में कहा जा चुका है, इसलिए यहाँ विशेष व्याख्यान नहीं किया जा रहा है।


एषामेव विशेषेण स्पर्शनकथनाय सूत्रावतारो भवति-

सत्त चोद्दसभागा वा देसूणा।।३७।।

सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-सूत्रं सुगमं। स्वस्थानस्वस्थान-विहारवत्स्वस्थान-वेदना-कषाय-वैक्रियिकगतैः सासादनैः चतुर्लोकानामसंख्यातभागः मानुषक्षेत्रस्य संख्यातभागः स्पृष्टः। अथवा विहारादिउपरिमपदैः मानुषक्षेत्रं देशोनं स्पृष्टं।
केन न्यूनं?
चित्रापृथिवी-कुलपर्वत-मेरुपर्वत-ज्योतिष्कावासादिना हीनं ज्ञातव्यं।
मानुषैः अगम्यप्रदेशस्य कथं मानुषक्षेत्रव्यपदेशः?
नैतत्, लब्धिसंपन्नमुनीनामगम्यप्रदेशाभावात्।
मारणान्तिकगतैः सप्त चतुर्दशभागाः देशोनाः स्पृष्टाः। एतस्य कारणं एतत्- सासादनानां मारणान्तिकेन भवनवासिलोकात् अधः गमनाभावात् उपरि सर्वत्र मारणान्तिकेन गमनसंभवात्। उपपादगतैः त्रिविधैः मनुष्यैः त्रिलोकानामसंख्यातभागः स्पृृष्टः, तिर्यग्लोकस्य संख्यातभागः स्पृष्टः।
सम्यग्मिथ्यादृष्ट्यादिमनुष्याणां स्पर्शननिरूपणाय सूत्रमवतरति-
सम्मामिच्छाइट्ठिप्पहुडि जाव अजोगिकेवलीहि केवडियं खेत्तं फोसिदं? लोगस्स असंखेज्जदिभागो।।३८।।
सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-सम्यग्मिथ्यादृष्टीनां वर्तमानकाले स्वकसर्वपदैः क्षेत्रवत्स्पर्शनं। अतीतानागत-वर्तमानकालेषु मनुष्यासंयतसम्यग्दृष्टीनां मनुष्यसम्यग्मिथ्यादृष्टिवत् स्पर्शनं।
मारणान्तिकसमुद्घातगतैः असंयतसम्यग्दृष्टिभिः तिर्यग्लोकस्य संख्यातभागः कथं स्पृष्टः?
सम्यग्दृष्टिमनुष्याः देवेषु मारणान्तिकं कुर्वन्तः संख्यातमार्गवत्संख्यातविमानेषु चैव मारणान्तिकं कुर्वन्ति, वानव्यन्तर-ज्योतिष्कयोः तेषामुत्पत्तेः अभावात्। मनुष्याः पूर्वं तिर्यक्षु बद्धायुष्काः पश्चात् सम्यक्त्वं गृहीत्वा तिर्यक्षु उत्पद्यन्ते, इदं क्षेत्रमत्र प्रधानं। विशेषेण ते भोगभूमिष्वेवोत्पद्यन्ते।
प्रमत्तसंयतादि-अयोगिकेवलिनां स्पर्शनं क्षेत्रवत् ज्ञातव्यं।
एवं त्रिविधमनुष्याणां स्पर्शनप्रतिपादनपरत्वेन सूत्रपंचकं गतम्।
सयोगिकेवलिनां स्पर्शनकथनाय सूत्रमवतरति-
सजोगिकेवलीहि केवडियं खेत्तं फोसिदं? लोगस्स-असंखेज्जदिभागो, असंखेज्जा वा भागा, सव्वलोगो वा।।३९।।
सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-एतस्य सूत्रास्यार्थ पूर्वं उक्तः। सामान्यमनुष्याणां क्षेत्रवत्स्पर्शनं। एवं पर्याप्तमनुष्याणां मानुषीणां च। विशेषेण तु-मानुषीषु असंयतसम्यग्दृष्टीनामुपपादो नास्ति। प्रमत्तगुणस्थाने तैजसाहारौ न स्तः। अत्र द्रव्यपुरुषाणां भावस्त्री वेदिनामेव ग्रहणं ज्ञातव्यं।
एवं सयोगिकेवलिनां स्पर्शननिरूपणत्वेन एकं सूत्रं गतम्।
अपर्याप्तमनुष्यस्पर्शनकथनाय सूत्रमवतरति-
मणुसअपज्जत्तेहि केवडियं खेत्तं फोसिदं? लोगस्स असंखेज्जदिभागो।।४०।।
सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-सूत्रं सुगमं। लब्ध्यपर्याप्तमनुष्यैः स्वस्थान-वेदना-कषायसमुद्घातगतैः चतुर्लोकानामसंख्यातभागः, मानुषक्षेत्रस्य संख्यातभागः स्पृष्टः। मारणांन्तिकउपपादगताभ्यां त्रिलोकानामसंख्यातभागः, द्वाभ्यां लोकाभ्यां असंख्यातगुणः स्पृष्टः।
विशेषेण एषामेव स्पर्शनप्रतिपादनाय सूत्रमवतरति-
सव्वलोगो वा।।४१।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-स्वस्थान-वेदना-कषायसमुद्घातगतैः चतुर्लोकानामसंख्यातभागः, मानुषक्षेत्रस्य संख्यातभागः, संख्यातबहुभागा वा अतीतकाले स्पृष्टाः। मारणांतिकोपपादगताभ्यां सर्वलोकः स्पृष्टः, सर्वत्र गमनागमयोः विरोधाभावात्।
तात्पर्यमेतत्-अहो आश्चर्यं? मनुष्यगतिनामकर्मोदये सत्यपि एषां लब्ध्यपर्याप्तमनुष्याणां जन्मानि तु पर्याप्ततिरश्चामपेक्षयापि निम्नानि एव। एषां क्षुद्रभवग्रहणे किं प्रयोजनं? न किमपि इति, एतज्ज्ञात्वा पर्याप्तमनुष्यपर्यायं संप्राप्य निष्प्रमादीभूय रत्नत्रयमेव आराधनीयं अस्माभिः विवेकिभिः इति।
एवं लब्ध्यपर्याप्तमनुष्याणां स्पर्शनकथनत्वेन द्वे सूत्रे गते।
इति मनुष्यगतिस्पर्शनानुगमः तृतीयान्तराधिकारः समाप्तः।
अथ चतुःस्थलै पंचदशसूत्रैः देवगतिनामान्तराधिकारः कथ्यते-तत्र प्रथमस्थले सामान्यदेवानां गुणस्थानापेक्षया ‘‘देवगदीए’’ इत्यादिसूत्रचतुष्टयं। तदनु द्वितीयस्थले भवनत्रिकदेवानां स्पर्शनकथनत्वेन ‘‘भवण’’’ इत्यादिसूत्रचतुष्टयं। ततः परं तृतीयस्थले सौधर्मादिदेवानां नवग्रैवेयकपर्यंतानां गुणस्थानापेक्षया स्पर्शनकथनत्वेन ‘‘सोधम्मी’’ इत्यादिसूत्रपंकं। तत्पश्चात् चतुर्थस्थले अनुदिशादिदेवानां सम्यग्दृष्टीनां स्पर्शनप्रतिपादनत्वेन सूत्रमेकं इति समुदायपातनिका।
अधुना देवानां द्विगुणस्थानवर्तिनां स्पर्शननिरूपणाय सूत्रद्वयं कथ्यते-
देवगदीए देवेसु मिच्छादिट्ठि-सासणसम्मादिट्ठीहि केवडियं खेत्तं फोसिदं? लोगस्स असंखेज्जदिभागो।।४२।।
अट्ठ णव चोद्दसभागा वा देसूणा।।४३।।
सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-सूत्रयोः अर्थः सुगमः। अतीतानागतप्ररूपणार्थं उच्यते-विहारवत्स्वस्थान-वेदना-कषाय-वैक्रियिकपरिणतैः मिथ्यादृष्टिदेवैः सासादनदेवैश्च अतीतकाले अष्ट चतुर्दशभागा देशोना स्पृष्टाः।
केन ऊना?
तृतीयपृथिवी-अधस्तनतलसंबंधि-एकसहस्रयोजनेभ्यः अन्येभ्योऽपि देवानामगम्यप्रदेशेभ्यः ऊना ज्ञातव्याः।
मारणान्तिकमिथ्यादृष्टि-सासादनाभ्यां नव चतुर्दशभागा देशोना स्पृष्टाः, अधोभागे द्वौ रज्जू, उपरि सप्त रज्जवः इति। उपपादगताभ्यां आभ्यां पंच चतुर्दशभागाः देशोनाः स्पृष्टाः सहस्रारकल्पादुपरि एताभ्यां उपपादाभावात्।
षट्कायक्रमनियमे सति पंचचतुर्दशभागस्पर्शनं न युज्यते इति चेत् ? नैतत् शंकनीयं, चतस¸णां दिशां अधस्तनोपरिमदिशोः च गच्छद्भिः सासादनैः तत्-पंच चतुर्दशभागस्पर्शनं प्रति विरोधाभावात्।
का दिक् नाम?
स्वकस्थानात् वाणवत् ऋजुक्षेत्रं दिक् उच्यते। ता: षडेव, अन्यासामसंभवात्।
का विदिक् नाम?
स्वकस्थानात् कर्ण रेखायाः आकारेण स्थितक्षेत्रं विदिक् नाम उच्यते। मारणान्तिक-उपपादगतजीवाभ्यां षट्सु दिक्षु गमनागमननियमो भवति, किञ्च आभ्यां विदिक्षु गमनासंभवात्।
उक्तं च-‘‘जेण सव्वे जीवा कण्णायारेण ण जांति तेण छक्कापक्कमणियमो जुज्जदे१।’’
भवनवासिषु उत्पद्यमानतिरश्चां उपपादक्षेत्रे गृहीते पंच रज्जवः सातिरेकाः किन्न भवन्ति?
न भवन्ति, अधिकक्षेत्रात् ऊनक्षेत्रस्य बहुत्वोपदेशात्। अधस्तने दण्डाकारेण अवतीर्य विग्रहं कृत्वा भवनवासिषु उत्पन्नानां प्रथमद्वितीयदण्डाभ्यां अतीतकाले रुद्धक्षेत्रात् सहस्रारकल्पस्योपपादशय्यायाः उपरिमभागस्य संख्यातगुणत्वात्। अतो ज्ञायते अधस्तनाधिकक्षेत्रापेक्षया उपरिमहीनक्षेत्रं अत्र प्रधानतया विवक्षितमस्ति। देवानां विमानशिखरमुत्सेधयोजनप्रमाणं इति न स्तोकः उपरिमभागः, सहस्रारोपरिमपर्यवसानस्य लक्षप्रमाणयोजनेभ्यः बहुत्वात्।
तत्कुतः ज्ञायते?
देशोनपंच-चतुर्दशभागस्पर्शनस्य अन्यथानुपपत्तेः इति नियमात् ज्ञायते।


इन्हीं मनुष्यों का विशेषरूप से स्पर्शन कथन करने हेतु सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

मनुष्य, मनुष्यपर्याप्त और मनुष्यनी सासादनसम्यग्दृष्टि जीवों ने अतीत और अनागतकाल की अपेक्षा कुछ कम सात बटे चौदह भाग स्पर्श किये हैं।।३७।।

हिन्दी टीका-सूत्र का अर्थ सरल है। इसमें जो कुछ विशेष बात है उसका व्याख्यान किया जा रहा है-स्वस्थानस्वस्थान, विहारवत्स्वस्थान, वेदना, कषाय और वैक्रियिक समुद्घात को प्राप्त सासादन-सम्यग्दृष्टि मनुष्यों ने सामान्यलोक आदि चारों लोकों का असंख्यातवाँ भाग स्पर्श किया है तथा मनुष्य क्षेत्र का संख्यातवाँ भाग स्पर्श किया है। अथवा विहारवत्स्वस्थानादि ऊपर के पदों की अपेक्षा देशोन मनुष्यक्षेत्र को स्पर्श किया है।

शंका-यहाँ देशोन पद से किससे कम क्षेत्र लेना चाहिए?

समाधान-चित्रापृथिवी, कुलाचल, मेरुपर्वत और ज्योतिष्क आवास आदि से हीन की अपेक्षा देशोन शब्द है।

शंका-मनुष्यों से अगम्य प्रदेश वाले इस कुलाचल आदि के क्षेत्र को ‘मनुष्यक्षेत्र’ यह संज्ञा कैसे प्राप्त है?

समाधान-नहीं, क्योंकि लब्धिसम्पन्न मुनियों के लिए (मनुष्यलोक के भीतर) अगम्य प्रदेश का अभाव है।

मारणान्तिक समुद्घात को प्राप्त सासादनसम्यग्दृष्टि मनुष्यों ने कुछ कम सात बटे चौदह (७/१४) भाग स्पर्श किये हैं। इसका कारण यह है कि सासादनसम्यग्दृष्टियों का मारणान्तिकसमुद्घात के द्वारा भवनवासियों के निवासलोक-खरभाग और पंक भाग से नीचे गमन नहीं होता है। किन्तु ऊपर सर्वत्र मारणान्तिकसमुद्घात के द्वारा गमन संभव है। उपपादगत उक्त तीनों प्रकार के सासादनसम्यग्दृष्टि मनुष्यों ने सामान्य लोक आदि तीनों लोेकों का असंख्यातवाँ भाग स्पर्श किया है और तिर्यग्लोक का संख्यातवां भाग स्पर्श किया है।

अब सम्यग्मिथ्यादृष्टि आदि मनुष्यों का स्पर्शन बतलाने हेतु सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

मनुष्यों में सम्यग्मिथ्यादृष्टि गुणस्थान से लेकर अयोगिकेवली गुणस्थान तक प्रत्येक गुणस्थानवर्ती जीवों ने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है? लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पर्श किया है।।३८।।

हिन्दी टीका-सम्यग्मिथ्यादृष्टि मनुष्यों का वर्तमानकाल में स्पर्शनक्षेत्र अपने सर्वपदों की अपेक्षा क्षेत्र प्ररूपणा के समान है। अतीत, अनागत और वर्तमान इन तीनों कालों में असंयतसम्यग्दृष्टि मनुष्यों की स्पर्शनप्ररूपणा सम्यग्मिथ्यादृष्टि मनुष्यों के समान है।

शंका-मारणान्तिकसमुद्घात को प्राप्त असंयतसम्यग्दृष्टि मनुष्यों ने तिर्यग्लोक का संख्यातवाँ भाग कैसे स्पर्श किया है?

समाधान-देवों में मारणान्तिकसमुद्घात करने वाले सम्यग्दृष्टि मनुष्य संख्यात मार्ग वाले संख्यात विमानों में ही मारणान्तिकसमुद्घात करते हैं, क्योंकि उनकी वानव्यन्तर और ज्योतिष्क देवों में उत्पत्ति नहीं होती है। जिन्होंने पहले तिर्यंचों की आयु बांध ली है ऐसे मनुष्य बाद में सम्यक्त्व को ग्रहण करके तिर्यंचों में उत्पन्न होते हैं, यह क्षेत्र यहाँ पर प्रधान है। वे भोगभूमि के तिर्यंच होते हैं यह विशेष ध्यान रखने की बात है।

प्रमत्तसंयत गुणस्थानवर्ती मुनियों से लेकर अयोगिकेवली भगवन्तों तक का स्पर्शन क्षेत्रप्ररूपणा के समान समझना चाहिए।

इस प्रकार तीन प्रकार के मनुष्यों के स्पर्शन का प्रतिपादन करने वाले पाँच सूत्र पूर्ण हुए।

अब सयोगिकेवलियों का स्पर्शन बतलाने हेतु सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

सयोगिकेवली जिनों ने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है? लोक का असंख्यातवाँ भाग, असंख्यात बहुभाग और सर्वलोक का स्पर्श किया है।।३९।।

हिन्दी टीका-इस सूत्र का अर्थ पूर्व में कह चुके हैं। सामान्य मनुष्यों की स्पर्शनप्ररूपणा को क्षेत्र प्ररूपणा के समान ही समझना चाहिए। इसी प्रकार से पर्याप्त मनुष्य और मनुष्यिनियों का स्पर्शन क्षेत्र जानना चाहिए। विशेष बात यह है कि मनुष्यिनियों में असंयतसम्यग्दृष्टि जीवों का उपपाद नहीं होता है और उनमें भावस्त्री वेदी प्रमत्तसंयत गुणस्थान में तैजस एवं आहारक समुद्घात नहीं होते हैं। यहाँ द्रव्य पुरुषवेदी जीवों में भावस्त्रीवेद अवस्था को ही ग्रहण करना चाहिए।

इस प्रकार सयोगिकेवलियों के स्पर्शनक्षेत्र का निरूपण करने वाला एक सूत्र पूर्ण हुआ। अब अपर्याप्त मनुष्यों का स्पर्शन बतलाने हेतु सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

लब्ध्यपर्याप्त मनुष्यों ने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है? लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पर्श किया है।।४०।।

हिन्दी टीका-सूत्र का अर्थ सरल है। लब्ध्यपर्याप्त मनुष्यों के द्वारा स्वस्थान स्वस्थान, वेदना और कषायसमुद्घात को प्राप्त करके चारों लोकों का असंख्यातवाँ भाग और मनुष्यक्षेत्र का संख्यातवाँ भाग स्पर्श किया गया है। मारणान्तिक और उपपाद पद को प्राप्त उन्हीं लब्ध्यपर्याप्त मनुष्यों ने तीनों लोकों का असंख्यातवाँ भाग और दोनों लोक-मनुष्यलोक और तिर्यग्लोक से असंख्यातगुणा क्षेत्र स्पर्श किया है।

अब इन्हीं लब्ध्यपर्याप्त मनुष्य का विशेषरूपसे स्पर्शन बताने हेतु सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

लब्ध्यपर्याप्त मनुष्यों ने अतीत और अनागतकाल की अपेक्षा सर्वलोक का स्पर्श किया है।।४१।।

हिन्दी टीका-स्वस्थानस्वस्थान, वेदना और कषायसमुद्घातगत लब्ध्यपर्याप्त मनुष्यों ने सामान्यलोक आदि चार लोकों का असंख्यातवाँ भाग, मनुष्यक्षेत्र का संख्यातवाँ भाग अथवा संख्यात बहुभाग अतीतकाल में स्पर्श किया है। मारणान्तिकसमुद्घात और उपपादगत मनुष्यों ने सर्वलोक का स्पर्श किया है क्योंकि उनके सर्वत्र गमनागमन में कोई विरोध नहीं है।

तात्पर्य यह है कि-अहो! आश्चर्य की बात है कि मनुष्यगति नामकर्म का उदय होने पर भी इन लब्ध्यपर्याप्तक मनुष्यों का जन्म तो पर्याप्त तिर्यंचों की अपेक्षा भी निम्नकोटि का ही होता है। इनके क्षुद्रभव ग्रहण करने का क्या प्रयोजन है? कोई भी प्रयोजन नहीं है, ऐसा जानकर पर्याप्त मनुष्य पर्याय को प्राप्त करके अब हम सभी विवेकीजनों को निष्प्रमादी होकर रत्नत्रय की ही आराधना करना चाहिए। अर्थात् रत्नत्रय धारण करके अपने मनुष्य जन्म को सार्थक करना चाहिए।

इस प्रकार लब्ध्यपर्याप्तक मनुष्यों का स्पर्शन कथन करने वाले दो सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार मनुष्यगति स्पर्शनानुगम नाम का तृतीय अंतराधिकार समाप्त हुआ।

अब चार स्थलों में पन्द्रह सूत्रों के द्वारा देवगति नाम का अन्तराधिकार कहा जाता है-उसमें से प्रथम स्थल में सामान्यदेवों का गुणस्थानों की अपेक्षा कथन करने हेतु ‘‘देवगदीए’’ इत्यादि चार सूत्र हैं। उसके बाद द्वितीय स्थल में भवनत्रिक देवों का स्पर्शन कथन करने वाले ‘भवण’ इत्यादि चार सूत्र हैं। उसके आगे तृतीय स्थल में सौधर्म आदि देवों से लेकर नवग्रैवेयक पर्यन्त के देवों का गुणस्थान की अपेक्षा स्पर्शन कहने हेतु ‘‘सोहम्मी’’ इत्यादि पाँच सूत्रों का वर्णन है। तत्पश्चात् चतुर्थस्थल में अनुदिश विमानों के सम्यग्दृष्टि देवों का स्पर्शन प्रतिपादन करने वाला एक सूत्र है। इस प्रकार यह सूत्रों की समुदायपातनिका हुई।

अब दो गुणस्थानवर्ती देवों के स्पर्शन क्षेत्र का निरूपण करने हेतु दो सूत्रों का कथन करते हैं-

सूत्रार्थ-

देवगति में देवों में मिथ्यादृष्टि और सासादनसम्यग्दृष्टि जीवों ने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है? लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पर्श किया है।।४२।।

मिथ्यादृष्टि और सासादनसम्यग्दृष्टि देवों ने अतीत और अनागतकाल की अपेक्षा कुछ कम आठ बटे चौदह भाग और कुछ कम नौ बटे चौदह भाग स्पर्श किए हैं।।४३।।

हिन्दी टीका-दोनों सूत्रों का अर्थ सुगम है। यहाँ विशेषरूप से अतीत और अनागतकाल संबंधी स्पर्शन प्ररूपणा कथन हेतु व्याख्यान किया जा रहा है-

विहारवत्स्वस्थान, वेदना, कषाय और वैक्रियिक समुद्घात इन पदों से परिणत मिथ्यादृष्टि और सासादनसम्यग्दृष्टि इन दो गुणस्थानवर्ती देवों ने अतीतकाल में कुछ कम आठ बटे चौदह (८/१४) भाग स्पर्श किए हैं।

शंका-यहाँ आठ बटे चौदह भाग किस क्षेत्र से कम हैं?

समाधान-तृतीय पृथिवी के अधस्तन तलसंबंधी एक हजार योजनों से तथा अन्य भी देवों के अगम्य प्रदेशों से कम हैं, ऐसा जानना चाहिए।

मारणान्तिक-समुद्घात को प्राप्त मिथ्यादृष्टि और सासादनसम्यग्दृष्टि देवों ने मंदराचल से नीचे दो राजु और ऊपर सात राजु, इस प्रकार कुछ कम नौ बटे चौदह (९/१४) भाग स्पर्श किए हैं। उपपादपद को प्राप्त मिथ्यादृष्टि और सासादनसम्यग्दृष्टि देवों ने कुछ कम पाँच बटे चौदह (५/१४) भाग स्पर्श किए हैं क्योंकि सहस्रारकल्प से ऊपर इन दोनों गुणस्थानवर्ती जीवों का उपपाद नहीं होता है।

शंका-षट्कअपक्रम-छहों दिशाओं में आने-जाने का नियम होने पर सासादनगुणस्थानवर्ती देवों का स्पर्शनक्षेत्र पाँच बटे चौदह भाग प्रमाण नहीं बनता है?

समाधान-ऐसी आशंका नहीं करनी चाहिए, क्योंकि चारों दिशाओं को और ऊपर तथा नीचे की दिशाओं को गमन करने वाले सासादनसम्यग्दृष्टि देवों के पाँच बटे चौदह भाग प्रमाण क्षेत्र स्पर्श करने के प्रति कोई विरोध नहीं है।

शंकादिशा किसे कहते हैं?

समाधान-अपने स्थान से बाण की तरह ऋजुक्षेत्र-सीधे क्षेत्र को दिशा कहते हैं। वे दिशाएँ छह ही होती हैं क्योंकि अन्य दिशाओं का होना असंभव है।

शंका-विदिशा किसे कहते हैं?

समाधान-अपने स्थान से कर्ण रेखा के आकार से स्थित क्षेत्र को विदिशा कहते हैं। मारणान्तिक समुद्घात और उपपादपद को प्राप्त जीवों का छहों दिशाओं में गमनागमन का नियम होता है, क्योंकि इनके विदिशाओं में गमन की संभावना नहीं पाई जाती है। कहा भी है-चूँकि ये सभी जीव कर्ण रेखा के आकार से अर्थात् तिरछे मार्ग से नहीं जाते हैं इसलिए छह दिशाओं के अपक्रम अर्थात् गमनागमन का नियम बन जाता है।

शंका-भवनवासियों में उत्पन्न होने वाले तिर्यंचों के उपपाद क्षेत्र को ग्रहण करने पर पाँच राजु से अधिक स्पर्शन क्षेत्र क्यों नहीं होता है?

समाधान-नहीं होता है क्योंकि अधिक क्षेत्र की अपेक्षा कम क्षेत्र बहुत है ऐसा उपदेश पाया जाता है। नीचे दंडाकार आत्मप्रदेशों से उतरकर और विग्रह करके भवनवासियों में उत्पन्न होने वाले जीवों के प्रथम और द्वितीय दण्डों के द्वारा अतीतकाल में रुद्धक्षेत्र से सहस्रारकल्प की उपपादशय्या का उपरिमभाग संख्यातगुणा है, इसलिए जाना जाता है कि नीचे के अधिक क्षेत्र की अपेक्षा ऊपर का हीन क्षेत्र प्रधानतया विवक्षित है। देवों के विमानों का शिखर सहित माप उत्सेधयोजन के प्रमाण से है इसलिए उपपादशय्या से ऊपरी भाग अर्थात् विमानशिखर से लेकर उसी कल्प के अन्त तक का क्षेत्र स्तोक अर्थात् अल्प नहीं है क्योंकि मेरुतल से नीचे के एक लाख प्रमाणयोजनों की अपेक्षा सहस्रारकल्प के विमान शिखर से ऊपरी पर्यंत भाग का प्रमाण बहुत है।

शंका-यह कैसे जाना जाता है?

समाधान-अन्यथा सासादनसम्यग्दृष्टि देवों का देशोन पाँच बटे चौदह (५/१४) भाग स्पर्शनक्षेत्र बन नहीं सकता है इस अन्यथानुपपत्ति नियम से जाना जाता है।


सम्मामिच्छादिट्ठि-असंजदसम्मादिट्ठीहि केवडियं खेत्तं फोसिदं? लोगस्स असंखेज्जदिभागो।।४४।।

अट्ठ चोद्दसभागा वा।।४५।।

सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-सूत्रे सुगमे। विहारवत्स्वस्थान-वेदना-कषाय-वैक्रियिक-मारणान्तिकगतैः असंयतसम्यग्दृष्टिभिः अष्ट चतुर्दशभागा देशोनाः स्पृष्टाः। उपपादगतैः षट्चतुर्दशभागाः स्पृष्टाः, अच्युतकल्पादुपरि मनुष्यव्यतिरिक्तानामुपपादाभावात्। एवं सम्यग्मिथ्यादृष्टीनामपि। केवलं-अस्मिन् गुणस्थाने मारणान्तिकोपपादगतौ न स्तः।
एवं प्रथमस्थले सामान्यदेवानां गुणस्थानापेक्षया स्पर्शनकथनत्वेन सूत्रचतुष्टयं गतं।
अधुना भवनत्रिकदेवानां द्विगुणस्थानापेक्षया द्वे सूत्रे अवतार्येते-
भवणवासिय-वाणवेंतर-जोदिसियदेवेसु मिच्छादिट्ठि-सासणसम्मादिट्ठी केवडियं खेत्तं फोसिदं? लोगस्स असंखेज्जदिभागो।।४६।।
अद्धुट्ठा वा, अट्ठ णव चोद्दसभागा वा देसूणा।।४७।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-सूत्रे सुगमे स्तः। विहारवत्स्वस्थान-वेदना-कषाय-वैक्रियिकगतैः भवनवासिभिः देवैः मिथ्यादृष्टिभिः देशोनाः सार्धत्रयः चतुर्दशभागाः अथवा अष्ट चतुर्दशभागाः देशोनाः। ते भवनवासिनः सार्धत्रयरज्जुप्रमाणक्षेत्रं स्वयमेव विहरन्ति।
सार्धत्रयरज्जव: कथं जाता:?
मंदराचलतलात् अध: तृतीयपृथिवीपर्र्यंतं द्वौ रज्जू, उपरि यावत् सौधर्मकल्पविमानशिखरध्वजदण्ड: इति सार्धैकरज्जु: इति सार्धत्रयरज्जव: कथिताः। एभिरेव आरणाच्युतकल्पवासिदेवप्रयोगात् विहारवत्स्वस्थानपदैः अष्ट चतुर्दशभागाः स्पृष्टा:। मारणान्तिकै नव चतुर्दशभागाः स्पृष्टाः, मंदराचलात् उपरि लोकान्तपर्यंतं सप्तरज्जवः अधस्तृतीयपृथिवीपर्यंतं द्वौरज्जू इति।
भवनवासिनां सासादनानां स्वस्थानादिपदानि मिथ्यादृष्टिदेववत् ज्ञातव्यानि।
मिथ्यादृष्टि-सासादनवानव्यन्तरदेवैः स्वस्थानाद्यपेक्षया त्रिलोकानामसंख्यातभागः, तिर्यग्लोकस्य संख्यातभागः, सार्धद्वयद्वीपादसंख्यातगुणश्चेति स्पृष्टः।
व्यंतरेषु देवाः नारकाः एकेन्द्रियविकलेन्द्रियाश्च नोत्पद्यन्ते, तत्र केवलं संज्ञिनोऽसंज्ञिनः पंचेन्द्रियतिर्यंञ्चः मनुष्याश्चैवोत्पद्यन्ते। तिर्यग्लोकस्य बाह्ये स्थितसौधर्मादिकल्पेषु व्यन्तराणामावासाः न सन्ति, तथाविधो-पदेशाभावात्। लक्षयोजनबाहल्यतिर्यक्प्रतरेऽपि सर्वत्र न तेषामावासाः, अन्यथा सूर्यादिज्योतिष्क-देवानामावासानां पन्नगबेलंधरादि भवनवासिनामावासानां चाभावप्रसंगात। भूमौ एव व्यन्तरावासानां नियमोऽपि नास्ति, आकाशप्रतिष्ठितव्यन्तराणामपि संभवात्। तिर्यग्लोके एव तेषामावासानां अपि नियमो न, किंच् रत्नप्रभापृथिव्याः पंकबहुलभागेऽपि भूत-राक्षसानां आवासानामुपलम्भात्। अतः एषां स्पर्शनक्षेत्रं तिर्यग्लोकस्य संख्यातभागप्रमाणबाहल्यं जगत्प्रतरं भवति।
एवमेव ज्योतिष्कदेवानामपि आगमाविरोधेन वक्तव्यं।
संप्रति भवनत्रिक-सम्यग्मिथ्यादृष्टि-असंयतसम्यग्दृष्टिस्पर्शननिरूपणाय सूत्रे द्वे अवतरतः-
सम्मामिच्छादिट्ठि-असंजदसम्मादिट्ठीहि केवडियं खेत्तं फोसिदं? लोगस्स असंखेज्जदिभागो।।४८।।
अद्धुट्ठा वा अट्ठ चोदसभागा वा देसूणा।।४९।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-सूत्रे सुगमे स्तः।
स्वस्थानस्वस्थान भवनवासि-व्यंतर-ज्योतिष्कसम्यग्मिथ्यादृष्टि-असंयतसम्यग्दृष्टिभिः त्रिलोकानाम-संख्यातभागः, तिर्यग्लोकस्य संख्यातभागः, सार्धद्वयद्वीपादसंख्यातगुणश्च स्पृष्टः। विशेषतः-भावनदेवैः चतुर्लोकानामसंख्यातभागः स्पृष्टः, इति वक्तव्यं। विहारवत्स्वस्थान-वेदना-कषाय-वैक्रियिक-मारणान्तिक-पदपरिणतैः अनयोर्गुणस्थानयोः सार्धत्रयः चतुर्दश भागा देशोनाः स्वकप्रत्ययेन, परप्रत्ययेन तु अष्ट चतुर्दशभागा देशोनाः स्पृष्टाः। केवलं सम्यङ्मिथ्यादृष्टीनां मारणान्तिकपदं नास्ति।
एवं द्वितीयस्थले भवनत्रिकदेवानां चतुर्गुणस्थानापेक्षया स्पर्शनप्रतिपादनपराणि चत्वारि सूत्राणि गतानि।
अधुना सौधर्मैशानदेवानां गुणस्थानापेक्षया स्पर्शनप्रतिपादनाय सूत्रमवतार्यते-
सोधम्मीसाणकप्पवासियदेवेसु मिच्छादिट्ठिप्पहुडि जाव असंजदसम्मादिट्ठि त्ति देवोघं।।५०।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-सूत्रं सुगमं। विशेषेण तु-सर्वे इन्द्रकाः संख्यातयोजनविस्तृताः, श्रेणिबद्धाः असंख्यातयोजनविस्तृताः प्रकीर्णकाश्च मिश्राः। अत्र यद्यपि सर्वविमानानि संख्यातयोजनविस्तृतानि इति गृह्यन्ते, तथापि सर्वविमानक्षेत्रफलसमासः तिर्यग्लोकस्य असंख्यातभागश्चैव भवति।
अत्रसर्वकल्पानां विमानसंख्याः क्रमेण निरूप्यन्ते-
बत्तीसं सोहम्मे, अट्ठावीसं तहेव ईसाणे।
वारह सणक्कुमारे, अट्ठेव य होंति माहिंदे।।१।।
बम्हे कप्पे बम्होत्तरे य चत्तारि सयसहस्साइं।
छसु कप्पेसु य एवं चउरासीदी सयसहस्सा।।२।।
पण्णासं तु सहस्सा लंतव-काविट्ठएसु कप्पेसु।
सुक्क-महासुक्केसु य चत्तालीसं सहस्साइं।।३।।
छच्चेव सहस्साइं सयारकप्पे तहा सहस्सारे।
सत्तेव विमाणसया आरणकप्पच्चुदे चेय।।४।।
एक्कारसयं तिसु हेट्ठिमेसु तिसु मज्झिमेसु सत्तहियं।
एक्काणउदिविमाणा तिसु गेवज्जेसु वरिमेसु।।५।।
गेवज्जाणुवरिमया णव चेव अणुद्दिसा विमाणा ते।
तह य अणुत्तरणामा पंचेव हवंति संखाए१।।६।।
यानि यावन्ति विमानानि, तेषु सर्वत्र जिनालयास्तावन्त एव ज्ञातव्या:।
एभिः सौधर्मैशानदेवैः विहार-वेदना-कषाय-वैक्रियिकपदैः अष्ट चतुर्दशभागाः देशोनाः स्पृष्टाः। मारणान्तिकमिथ्यादृष्टिसासादनैः नव चतुर्दशभागाः। उपपादगतैः सार्धैकः चतुर्दशभागः। सौधर्मकल्पः धरणीतलात् सार्धैकरज्जुः उपरि स्थितः इति।
सम्यग्मिथ्यादृष्टिभिः विहारवत्स्वस्थानादिभिः अष्ट चतुर्दशभागाः देशोनाः स्पृष्टाः। एवं असंयत-सम्यग्दृष्टीनामपि। येनेवं देवौघात् सौधर्मकल्पे न विशेषोऽस्ति तेन देवौघमिति सूत्रवचनं सुष्ठु सुघटमिति।
सानत्कुमारादिदेवानां स्पर्शनप्रतिपादनाय सूत्रद्वयमवतरति-
साणक्कुमारप्पहुडि जाव सदारसहस्सारकप्पवासियदेवेसु मिच्छादिट्ठिप्पहुडि जाव असंजदसम्मादिट्ठीहि केवडियं खेत्तं फोसिदं? लोगस्स असंखेज्ज-दिभागो।।५१।।
अट्ठ चोद्दसभागा वा देसूणा।।५२।।
सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-अनयोः सूत्रयोरर्थः सुगमः।
पंचकल्पवासिचतुर्गुणस्थानवर्तिजीवैः स्वस्थानस्वस्थानपदपरिणतैः अतीतकाले चतुर्लोकानाम-संख्यातभागः, सार्धद्वयद्वीपादसंख्यातगुणः स्पृष्टः। विहारवत्स्वस्थानवेदना-कषाय-वैक्रियिक-मारणान्तिकपदपरिणतैः अष्ट चतुर्दशभागाः देशोनाः स्पृष्टाः। उपपादपरिणतैः सानत्कुमारमाहेन्द्रदेवैः त्रयः चतुर्दशभागाः देशोनाः स्पृष्टाः। ब्रह्मब्रह्मोत्तर-कल्पवासिदेवैः सार्धत्रयः चतुर्दशभागाः देशोनाः स्पृष्टाः। लांतवकापिष्ठदेवैः चत्वारः चतुर्दशभागाः देशोनाः, शुक्रमहाशुक्रदेवैः सार्धचत्वारः चतुर्दशभागाः देशोनाः, शतारसहस्रारदेवैः पंच चतुर्दशभागाः देशोनाः स्पृष्टाः। विशेषेण तु सम्यग्मिथ्यादृष्टीनां मारणान्तिकोपपादपदे न स्तः।


देवों में सम्यग्मिथ्यादृष्टि और असंयत सम्यग्दृष्टियों का स्पर्शन बतलाने हेतु दो सूत्र कहे जा रहे हैं-

सूत्रार्थ-

सम्यग्मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि देवों ने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है? लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पर्श किया है।।४४।।

सासादनसम्यग्दृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि देवों ने अतीत और अनागतकाल में कुछ कम आठ बटे चौदह भाग स्पर्श किए हैं।।४५।।

हिन्दी टीका-इन दोनों सूत्रों का अर्थ सुगम है। विहारवत्स्वस्थान, वेदना, कषाय, वैक्रियिक और मारणान्तिकसमुद्घातगत असंयतसम्यग्दृष्टि देवों ने कुछ कम आठ बटे चौदह (८/१४) भाग स्पर्श किए हैं। उपपादगत असंयतसम्यग्दृष्टि देवों ने छह बटे चौदह (६/१४) भाग स्पर्श किए हैं, क्योंकि अच्युतकल्प से ऊपर मनुष्यों को छोड़कर अन्य जीवों के उत्पन्न होने का अभाव है। इसी प्रकार सम्यग्मिथ्यादृष्टि देवों का भी स्पर्शन जानना चाहिए, केवल इस गुणस्थान में मारणान्तिकसमुद्घात और उपपाद, ये दो पद नहीं होते हैं।

इस प्रकार प्रथम स्थल में सामान्य देवों का गुणस्थान की अपेक्षा स्पर्शन कथन करने वाले चार सूत्र पूर्ण हुए।

अब भवनत्रिक देवों का दो गुणस्थानों की अपेक्षा स्पर्शन बताने हेतु दो सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

भवनवासी, वानव्यन्तर और ज्योतिष्क देवों में मिथ्यादृष्टि और सासादनसम्यग्दृष्टि जीवों ने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है? लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पर्श किया है।।४६।।

मिथ्यादृष्टि और सासादनसम्यग्दृष्टि भवनत्रिक देवों ने अतीत और अनागतकाल की अपेक्षा लोकनाली के चौदह भागों में से कुछ कम साढ़े तीन भाग, आठ भाग और नौ भाग स्पर्श किए हैं।।४७।।

हिन्दी टीका-विहारवत्स्वस्थान, वेदना, कषाय और वैक्रियिकसमुद्घातगतपदवाले उक्त देवों ने चौदह भागों में से देशोन साढ़े तीन भाग (७/१८) अथवा कुछ कम आठ भाग (८/१४) प्रमाण क्षेत्र स्पर्श किया है। भवनवासी देव साढ़े तीन राजु प्रमाण क्षेत्र पर्यन्त स्वयं ही विहार करते हैं।

शंका-साढ़े तीन राजु कैसे हुए?

समाधान-मंदराचल के तलभाग से नीचे तीसरी पृथिवी तक दो राजु और ऊपर सौधर्मकल्प के विमान के शिखर पर स्थित ध्वजादंड तक डेढ़ राजु इस प्रकार मिलाकर साढ़े तीन राजु कहा है।

आरण और अच्युत कल्पवासी देवों के प्रयोग से विहारवत्स्वस्थानपद को प्राप्त जीवों के द्वारा आठ बटे चौदह (८/१४) भाग स्पर्श किया गया है। मारणान्तिक समुद्घातगत उन्हीं भवनवासी मिथ्यादृष्टि देवों ने नौ बटे चौदह (९/१४) भाग स्पर्श किए हैं। मंदराचल से ऊपर लोक के अन्त तक सात राजु और नीचे तीसरी पृथिवी तक दो राजु इस प्रकार नौ राजु होते हैं।

भवनवासी सासादनसम्यग्दृष्टि देवों के स्वस्थानादि सभी पदों का स्पर्शनक्षेत्र भवनवासी मिथ्यादृष्टि देवों के समान है। मिथ्यादृष्टि और सासादनसम्यग्दृष्टि वानव्यन्तर देवों ने स्वस्थानस्वस्थान की अपेक्षा सामान्यलोक आदि तीन लोकों का असंख्यातवाँ भाग, तिर्यग्लोक का संख्यातवाँ भाग और अढ़ाईद्वीप से असंख्यातगुणा क्षेत्र स्पर्श किया है।

व्यंतरों में न तो देव अथवा नारकी जीव उत्पन्न होते हैं और न एकेन्द्रिय, न विकलेन्द्रिय जीव ही उत्पन्न होते हैं, वहाँ केवल संज्ञी व असंज्ञी पंचेन्द्रियतिर्यंच और संज्ञी मनुष्य ही उत्पन्न होते हैं तथा तिर्यग्लोक से बाहर स्थित सौधर्मादि कल्पों में भी व्यंतर देवों के आवास नहीं होते हैं, क्योंकि उस प्रकार के उपदेश का अभाव है। और एक लाख योजन बाहल्यवाले तिर्यक्प्रतर में भी सर्वत्र व्यंतर देवों के आवास नहीं होते हैं, अन्यथा चन्द्रसूर्यादि ज्योतिष्क देवों के आवासों का और पन्नग, वेलंधर आदि भवनवासी देवों के आवासों के अभाव का प्रसंग प्राप्त हो जायेगा तथा भूमि में ही व्यंतर देवों के आवास होते हैं, ऐसा भी नियम नहीं है, क्योेंकि आकाश में प्रतिष्ठित व्यंतरों के आवास संभव है और तिर्यग्लोक में ही व्यन्तर देवों के आवासों के अस्तित्व का नियम भी नहीं है, क्योंकि नीचे रत्नप्रभा पृथिवी के पंकबहुल भाग में भी भूत और राक्षस नाम के व्यन्तर देवों के आवास पाये जाते हैं।

इसलिए इन जीवों का स्पर्शनक्षेत्र तिर्यग्लोक के संख्यातवें भाग प्रमाण बाहल्यवाला जगत्प्रतर हो जाता है।

इसी प्रकार ज्योतिषी देवों का स्पर्शनक्षेत्र भी आगम के अविरोधपूर्वक जानना चाहिए।

अब भवनत्रिक सम्यग्मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि देवों का स्पर्शनक्षेत्र निरूपण करने हेतु दो सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

सम्यग्मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि भवनत्रिक देवों ने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है? लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पर्श किया है।।४८।।

सम्यग्मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि भवनत्रिक देवों ने अतीत और अनागतकाल की अपेक्षा कुछ कम साढ़े तीन बटे चौदह भाग और कुछ कम आठ बटे चौदह भाग स्पर्श किए हैं।।४९।।

हिन्दी टीका-ये दोनों सूत्र सुगम हैं। विशेष बात इनमें यह समझना चाहिए कि स्वस्थानस्वस्थान पद वाले भवनवासी, वानव्यंतर और ज्योतिष्क सम्यग्मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि देवों ने सामान्य लोक आदि तीन लोकों का असंख्यातवाँ भाग, तिर्यग्लोक का संख्यातवाँ भाग और अढ़ाईद्वीप से असंख्यातगुणा क्षेत्र स्पर्श किया है। विशेष बात यह है कि भवनवासियों ने सामान्यलोक आदि चार लोकों का असंख्यातवाँ भाग स्पर्श किया है, ऐसा कहना चाहिए। विहारवत्स्वस्थान, वेदना, कषाय, वैक्रियिक और मारणान्तिक समुद्घात, इन पदों से परिणत सम्यग्मिथ्यादृष्टि और असंयत भवनत्रिक देवों ने स्वप्रत्यय से कुछ कम साढ़े तीन बटे चौदह (७/२८) भाग स्पर्श किए हैं तथा परप्रत्यय से कुछ कम आठ बटे चौदह (८/१४) भाग स्पर्श किए हैं। विशेष बात यह है कि सम्यग्मिथ्यादृष्टि देवों के मारणान्तिकपद नहीं होता है। इस प्रकार द्वितीय स्थल में भवनत्रिक देवों का चार गुणस्थानों में स्पर्शनक्षेत्र बतलाने वाले चार सूत्र पूर्ण हुए।

अब सौधर्म और ईशान स्वर्ग के देवों का गुणस्थान की अपेक्षा स्पर्शन कथन करने हेतु सूत्र का अवतार किया जाता है-

सूत्रार्थ-

सौधर्म और ईशान कल्पवासी देवों में मिथ्यादृष्टि गुणस्थान से लेकर असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थान तक प्रत्येक गुणस्थानवर्ती देवों का स्पर्शनक्षेत्र देवों के ओघस्पर्शन के समान है।।५०।।

हिन्दी टीका-सूत्र का अर्थ सुगम है। विशेषता यह है कि सभी इन्द्रक विमान संख्यात योजन विस्तार वाले होते हैं, श्रेणीबद्ध विमान असंख्यात योजन विस्तृत और प्रकीर्णक विमान मिश्र अर्थात् संख्यात और असंख्यात योजन विस्तार वाले होते हैं। यहाँ पर यद्यपि सभी विमान संख्यात योजन विस्तार वाले ही ग्रहण किये गये हैं, फिर भी सभी विमानों के क्षेत्रफल का योग तिर्यग्लोक के असंख्यातवें भागप्रमाण ही होता है।

यहाँ पर सभी कल्पों के विमानों की संख्या क्रम से कहते हैं-

गाथार्थ-सौधर्मकल्प में बत्तीस लाख विमान हैं, उसी प्रकार से ईशानकल्प में अट्ठाईस लाख विमान, सनत्कुमार कल्प में बारह लाख तथा माहेन्द्रकल्प में आठ लाख विमान होते हैं। ब्रह्म और ब्रह्मोत्तर कल्प में दोनों कल्पों के मिलाकर चार लाख विमान हैं। इस प्रकार इन पूर्व में बताए गए छह कल्पों में विमानों की संख्या चौरासी लाख होती है। शतार और सहस्रार कल्प में छह हजार विमान होते हैं। आनत, प्राणत, आरण और अच्युत, इन चार कल्प में मिलाकर सात सौ विमान होते हैं।

अधस्तन तीन ग्रैवेयकों में एक सौ ग्यारह विमान, मध्यम तीन ग्रैवेयकों में एक सौ सात विमान और उपरिम तीन ग्रैवेयकों में इक्यानवे विमान होते हैं। नव ग्रैवेयकों के ऊपर अनुदिश संज्ञा वाले नौ विमान होते हैं। उनके ऊपर अनुत्तर संज्ञा वाले पाँच विमान होते हैं। ये कुल मिलाकर जितने विमान हैं, सबमें जिनमंदिर माने गये हैं।

विहारवत्स्वस्थान, वेदना, कषाय और वैक्रियिक समुद्घात इन पदों को प्राप्त सौधर्म-ईशान कल्प के देवों ने कुछ कम आठ बटे चौदह (८/१४) भाग स्पर्श किये हैं। मारणान्तिक पद से परिणत मिथ्यादृष्टि और सासादनसम्यग्दृष्टि देवों ने नौ बटे चौदह (९/१४) भाग स्पर्श किये हैं, उपपादपरिणत उन्हीं जीवों ने डेढ़ बटे चौदह (३/२८) भाग स्पर्श किये हैं, क्योंकि सौधर्मकल्प पृथ्वीतल से डेढ़ राजु ऊपर जाकर स्थित है।

विहारवत्स्वस्थान आदि पदों से सहित इन सम्यग्मिथ्यादृष्टि देवों के द्वारा कुछ कम आठ बटे चौदह (८/१४) भाग स्पर्श किये गये हैं। इसी प्रकार से असंयतसम्यग्दृष्टि देवों का भी स्पर्शन क्षेत्र जानना चाहिए। चूँंकि देवों के ओघस्पर्शन से सौधर्मकल्प में कोई विशेषता नहींं है, इसलिए ‘देवोघ’ यह सूत्र वचन भलीप्रकार सुघटित होता है।

अब सानत्कुमार आदि देवों का स्पर्शन क्षेत्र बतलाने हेतु दो सूत्रों का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

सानत्कुमारकल्प से लेकर शतार सहस्रारकल्प तक के देवों में मिथ्यादृष्टि गुणस्थान से लेकर असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थान तक प्रत्येक गुणस्थानवर्ती देवों ने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है? लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पर्श किया है।।५१।।

सानत्कुमारकल्प से लेकर सहस्रारकल्प तक के मिथ्यादृष्टि आदि चारों गुणस्थानवर्ती देवों ने अतीत और अनागतकाल में कुछ कम आठ बटे चौदह भाग स्पर्श किए हैं।।५२।।

हिन्दी टीका-इन दोनों सूत्रों का अर्थ सुगम है। जो विशेषता है उनका व्याख्यान किया जा रहा है। सानत्कुमार आदि पाँच कल्पों के चारों गुुणस्थानवर्ती स्वस्थानस्वस्थानपद से परिणत देवों ने अतीतकाल में सामान्यलोक आदि चारों लोकों का असंख्यातवाँ भाग और अढ़ाईद्वीप से असंख्यातगुणा क्षेत्र स्पर्श किया है। विहारवत्स्वस्थान, वेदना, कषाय, वैक्रियिक और मारणान्तिकसमुद्घात इन पदों से परिणत उक्त देवों ने कुछ कम आठ बटे चौदह (८/१४) भाग स्पर्श किये हैंं। उपपादपद से परिणत सानत्कुमार और माहेन्द्र कल्पवासी देवों ने कुछ कम तीन बटे चौदह (३/१४) भाग स्पर्श किये हैं। ब्रह्म और ब्रह्मोत्तर कल्पवासी देवों ने कुछ कम साढ़े तीन बटे चौदह (७/२८) भाग स्पर्श किये हें। लान्तव और कापिष्ठ कल्पवासी देवों ने कुछ कम चार बटे चौदह (४/१४) भाग स्पर्श किये हैं। शुक्र और महाशुक्र कल्पवासी देवों ने कुछ कम साढ़े चार बटे चौदह (९/२८) भाग स्पर्श किये हैं। शतार और सहस्रार कल्पवासी देवों ने कुछ कम पांच बटे चौदह (५/१४) भाग स्पर्श किये हैं। विशेष बात यह है कि सम्यग्मिथ्यादृष्टि देवों के मारणान्तिक समुद्घात और उपपाद, ये दो पद नहीं होते हैं।


संप्रति आनतादिषोडशस्वर्गपर्यंतदेवानां स्पर्शननिरूपणाय सूत्रद्वयमवतरति-

आणद जाव आरणच्युदकप्पवासियदेवेसु मिच्छाइट्ठिप्पहुडि जाव असंजदसम्मादिट्ठीहि केवडियं खेत्तं फोसिदं? लोगस्स असंखेज्जदिभागो।।५३।।

छ चोद्दसभागा वा देसूणा फोसिदा।।५४।।
सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-अनयोः सूत्रयोरर्थः सुगमः। विशेषेण-विहारवत्स्वस्थान-वेदना-कषाय-वैक्रियिक-मारणान्तिक-परिणतैःषट् चतुर्दशभागाः देशोनाः स्पृष्टाः, चित्रापृथिव्याः उपरितलात् अधः तेषां गमनाभावात्। मिथ्यादृष्टि-सासादनानां उपपादः चतुर्लोकानामसंख्यातभागः, मानुषक्षेत्रादसंख्यातगुणः।
कुतः?
पंचचत्वारिंशल्लक्षयोजनविष्कंभ-संख्यातरज्जु-आयतमुपपादक्षेत्रं तिर्यग्लोकस्य असंख्यातभागं न प्राप्नोति इति। अतः मिथ्यादृष्टि-सासादन-सम्यग्मिथ्यादृष्टि-असंयतसम्यग्दृष्टिभिः स्वस्थानस्वस्थानपरिणतैः चतुर्लोकानामसंख्यातभागः, सार्धद्वयद्वीपादसंख्यातगुणश्च स्पृष्टः।
असंयतसम्यग्दृष्टिभिः उपपादपदैः सार्धपंच चतुर्दशभागा देशोनाः स्पृष्टाः। आरणाच्युतकल्पदेवैः षट् चतुर्दशभागाः स्पृष्टा देशोनाश्च।
किं कारणं?
तिरश्चोः असंयतसम्यग्दृष्टि-संयतासंयतयोः वैरिदेवसंबंधेन सर्वद्वीपसागरेषु स्थितयोः तत्रोपपादोपलंभात्।
नवग्रैवेयकदेवानां स्पर्शननिरूपणाय सूत्रमवतरति-
णवगेवज्जविमाणवासियदेवेसु मिच्छादिट्ठिप्पहुडि जाव असंजदसम्मादिट्ठीहि केवडियं खेत्तं फोसिदं? लोगस्स असंखेज्जदिभागो।।५५।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-एतस्य सूत्रस्य वर्तमानातीतप्ररूपणासु स्पर्शनं क्षेत्रवत्। अत्र सर्वेऽपि देवा अहमिन्द्रा एव। विशेषेण तु-सुदर्शनामोघसुप्रबुद्ध-यशोधरसुभद्रविशाल-सुमन सौमनसप्रीतिंकराख्याः नवग्रैवेयकाः सन्ति, एष्वपि त्रयोऽधोग्रैवेयकाः, त्रयोमध्यमग्रैवेयकाः त्रयश्चोपरिमग्रैवेयकाः भवन्ति। एतेषु मिथ्यात्वादिचतुर्गुणस्थानानि विद्यन्ते। अत्र द्रव्यवेषेण दिगंबरमुनय एव, भावेन कदाचित् मिथ्यादृष्टयः केचित्, सासादनाः, सम्यङ्मिथ्यादृष्टयः, असंयतसम्यग्दृष्टयोऽपि संयतासंयताः वा तत्र गंतुं शक्नुवन्ति। केचित् च द्रव्येण मुनयो भावेनापि षष्ठसप्तमादिगुणस्थानवर्तिनः तत्र उत्पद्यन्ते किन्तु तत्र देवगतौ चत्वार्येव गुणस्थानानि भवन्ति।
एवं तृतीयस्थले सौधर्मादिनवग्रैवेयकपर्यन्तानां देवानां स्पर्शननिरूपणत्वेन पंचसूत्राणि गतानि।
अधुना अनुदिशादिसम्यग्दृष्टिदेवानां स्पर्शननिरूपणाय सूत्रमवतरति-
अणुद्दिस जाव सव्वट्ठसिद्धिविमाणवासियदेवेसु असंजदसम्मादिट्ठीहि केवडियं खेत्तं फोसिदं? लोगस्स असंखेज्जदिभागो।।५६।।
सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-सूत्रं सुगमं। अर्चि-अर्चिमालि-वैर-वैरोचन-सोम-सोमप्रभ-अंक-स्फटिक-आदित्याख्या इमे नव अनुदिशाः सन्ति। पुनश्च विजय-वैजयंत-जयंत-अपराजित-सर्वार्थसिद्धि नामधेयाः पंच अनुत्तराः सन्ति। एषु चतुर्दशसु विमानेषु स्थिताः सर्वे अहमिन्द्राः सम्यग्दृष्टय एव, तत्र मिथ्यादृष्टीनामभावात्। अत एतेषु स्थितासंयतसम्यग्दृष्टिभिः स्वस्थानस्वस्थान-विहारवत्स्वस्थान-वेदना-कषाय-वैक्रियिक-मारणान्तिक-उपपादपरिणतैः चतुर्णां लोकानामसंख्यातभागः, मानुषक्षेत्रादसंख्यातगुणश्च स्पृष्टः। नवग्रैवेयकादि-उपरिमदेवानां तिर्यक्षु च्यवनोपपादाभावात्। विशेषतः-पंचपदपरिणतैः सर्वार्थसिद्धिदेवैः मानुषलोकस्य संख्यातभागः स्पृष्टः।
तात्पर्यमेतत्-अद्यत्वे पंचमकाले नवग्रैवेयकादिषु उत्पत्तेरभावोऽस्ति, तत्रस्थानां देवानामपि मध्यलोके असंख्यातद्वीपसमुद्रादिषु नंदीश्वरद्वीपे मेर्वादिषु अपि आगमनाभावात् सदाकालं। इमे अहमिन्द्रा: तत्रत्यात् एव जिनेन्द्राणां पंचकल्याणकादिषु नमस्कुर्वन्ति। तथा च ‘‘विजयादिषु द्विचरमाः’’ इति सूत्रात् विजयादिचतुर्विमानस्थिताः द्विभवावतारिणः, सर्वार्थसिद्धिस्थिताः सर्वे एकभवावतारिणः एव भवन्ति। इति ज्ञात्वा सम्यग्दर्शनबलेन स्वभवं एकभवावतारिणं कर्तुं प्रयत्नो विधेयः भवद्भिरिति।
एवं चतुर्थस्थले सम्यग्दृष्टि-अनुदिशादिस्थितदेवानां स्पर्शनकथनेन एकं सूत्रं गतं।
इति षट्खंडागमस्य प्रथमखंडे चतुर्थग्रन्थे स्पर्शनानुगमे गणिनीज्ञानमतीकृत-सिद्धान्तचिन्तामणिटीकायां गतिमार्गणानाम प्रथमोऽधिकारः समाप्तः।

अब आनत आदि सोलहों स्वर्ग तक के देवों का स्पर्शन निरूपण करने हेतु दो सूत्रों का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

आनतकल्प से लेकर आरण-अच्युत तक कल्पवासी देवों में मिथ्यादृष्टि गुणस्थान से लेकर असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थान तक प्रत्येक गुणस्थानवर्ती देवों ने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है? लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पर्श किया है।।५३।।

चारों गुणस्थानवर्ती आनतादि चार कल्पवासी देवों ने अतीत और अनागत काल की अपेक्षा कुछ कम छह बटे चौदह भाग स्पर्श किये हैं।।५४।।

हिन्दी टीका-इन दोनों सूत्रों का अर्थ सुगम है। इनमें जो विशेषता है उसका व्याख्यान कर रहे हैं- विहारवत्स्वस्थान, वेदना, कषाय, वैक्रियिक और मारणान्तिक समुद्घात से परिणत जीवों ने कुछ कम छह बटे चौदह (६/१४) भाग स्पर्श किये हैं, क्योंकि चित्रा पृथिवी के उपरिम तल से नीचे इसके गमन का अभाव है, उक्त मिथ्यादृष्टि और सासादनसम्यग्दृष्टि देवों का उपपाद की अपेक्षा स्पर्शनक्षेत्र सामान्यलोक आदि चारों लोकों का असंख्यातवाँ भाग और मनुष्यक्षेत्र से असंख्यातगुणा है वैâसे? क्योंकि पैंतालीस लाख योजन विष्कम्भवाला और संख्यात राजुप्रमाण आयत उक्त देवों का उपपाद क्षेत्र भी तिर्यग्लोक के असंख्यातवें भाग को नहीं प्राप्त होता है।

अत: स्वस्थानस्वस्थानपद से सहित मिथ्यादृष्टि, सासादन सम्यग्दृष्टि, सम्यग्मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि जीवों ने चारों लोकों का असंख्यातवाँ भाग और ढाईद्वीप से असंख्यातगुणा क्षेत्र स्पर्श किया है।

उपपादपद से परिणत असंयतसम्यग्दृष्टि देवों ने कुछ कम साढ़े पाँच बटे चौदह (११/२८) भाग स्पर्श किये हैं। आरण और अच्युतकल्प में उक्त पदपरिणत जीवों ने कुछ कम छह बटे चौदह (६/१४) भाग स्पर्श किये हैं।

प्रश्न-इसका क्या कारण है?
उत्तर-इसका कारण यह है कि वैरी देवों के संबंध से सर्वद्वीप और सागरों में विद्यमान तिर्यंच असंयतसम्यग्दृष्टि और संयतासंयतों का आरण-अच्युतकल्प में उपपाद पाया जाता है।

अब नवग्रैवेयक विमानों में रहने वाले देवों का स्पर्शन क्षेत्र बताने हेतु सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

नवग्रैवेयक विमानवासी देवों में मिथ्यादृष्टि गुणस्थान से लेकर असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थान तक प्रत्येक विमान के गुणस्थानवर्ती देवों ने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है? लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पर्श किया है।।५५।।

हिन्दी टीका-इस सूत्र की वर्तमानकालीन और अतीतकालीन प्ररूपणाओं में स्पर्शन को क्षेत्रप्ररूपणा के समान जानना चाहिए। इन नवग्रैवेयकों में सभी देव अहमिन्द्र ही होते हैं। विशेष बात यह है कि सोलह स्वर्गों के ऊपर सुदर्शन, अमोघ, सुप्रबुद्ध, यशोधर, समुद्र, विशाल, सुमन, सौमनस और प्रीतिंकर नाम वाले नवग्रैवेयक विमान होते हैं। उनमें तीन अधोग्रैवेयक हैं, तीन मध्यम ग्रैवेयक हैं और तीन उपरिम ग्रैवेयक हैं। इन सभी विमानों में रहने वाले देवों के मिथ्यात्व, सासादन, मिश्र और असंयतसम्यग्दृष्टि ये चार गुणस्थान पाये जाते हैं। द्रव्यवेष से दिगम्बर मुनि ही वहाँ जन्म लेते हैं, भाव से कदाचित् मिथ्यादृष्टि जीव भी वहाँ जन्म ले लेते है और भाव की अपेक्षा ही सासादनसम्यग्दृष्टि, सम्यग्मिथ्यादृष्टि, असंयतसम्यग्दृष्टि अथवा संयतासंयत गुणस्थानवर्ती मनुष्य भी वहाँ जन्म ले सकते हैं तथा कोई दिगम्बर भावलिंगी मुनि भी जो भाव से छठे-सातवें गुणस्थानवर्ती हैं वे भी वहाँ उत्पन्न हो सकते हैं किन्तु वहाँ पर देवगति होने के कारण सभी के आदि के चार गुणस्थान ही होते हैं। इस प्रकार तृतीय स्थल में सौधर्म स्वर्ग से लेकर नवग्रैवेयक पर्यन्त रहने वाले देवों का स्पर्शन निरूपण करने वाले पाँच सूत्र पूर्ण हुए।

अब अनुदिश आदि विमानों में रहने वाले सम्यग्दृष्टि देवों का स्पर्शन बतलाने हेतु सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

नव अनुदिश विमानों से लेकर सर्वार्थसिद्धि तक विमानवासी देवों में असंयत-सम्यग्दृष्टि जीवों ने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है? लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पर्श किया है।।५६।।

हिन्दी टीका-सूत्र का अर्थ सरल है। इसमें जो विशेषता है उसका व्याख्यान किया जा रहा है-नवग्रैवेयकों के ऊपर अर्चि, अर्चिमालि, वैर, वैरोचन, सोम, सोमप्रभ, अंक, स्फटिक और आदित्य इन नामों वाले नौ अनुदिश विमान होते हैं पुन: उनके ऊपर विजय, वैजयन्त, जयन्त, अपराजित और सर्वार्थसिद्धि नाम के पाँच अनुत्तर विमान हैं।

इन चौदह विमानों में रहने वाले सभी अहमिन्द्र सम्यग्दृष्टि ही होते हैं, क्योंकि वहाँ मिथ्यादृष्टियों का अभाव है। अर्थात् नवग्रैवेयक विमानों तक तो चारों गुणस्थान होते हैं किन्तु नौ अनुदिश और पाँच अनुत्तर विमान के देवों में केवल एक चतुर्थ गुणस्थान ही पाया जाता है। अत: इन नव अनुदिश और पाँच अनुत्तर विमानों में रहने वाले स्वस्थानस्वस्थान, विहारवत्स्वस्थान, वेदना, कषाय, वैक्रियिक, मारणान्तिकसमुद्घात और उपपाद पद से परिणत असंयतसम्यग्दृष्टि देवों ने सामान्यलोक आदि चारों लोकों का असंख्यातवाँ भाग और मानुषक्षेत्र से असंख्यातगुणा क्षेत्र स्पर्श किया है, क्योंकि नवग्रैवेयकादि उपरिम कल्पवासी देवों का च्यवन होकर तिर्यंचों में उपपाद होने का अभाव है। विशेष बात यह है कि यह स्वस्थानादि पाँच पदों से परिणत सर्वार्थसिद्धि के देवों ने मनुष्यलोक का संख्यातवाँ भाग स्पर्श किया है।

तात्पर्य यह है कि आज इस पंचमकाल में नवग्रैवेयक आदि में उत्पत्ति का अभाव है, अर्थात् इस भरतक्षेत्र का कोई मनुष्य वर्तमान में मरण करके सोलह स्वर्गों तक ही जा सकता है उससे ऊपर जाने की आज योग्यता नहीं है। उन नवग्रैवेयक आदि देवों का भी मध्यलोक के असंख्यात द्वीप-समुद्रों में, नंदीश्वरद्वीप में एवं मेरु पर्वत आदि में आगमन का सदा काल अभाव है। अर्थात् वे कभी भी कहीं नहीं जाते हैं, सदाकाल अपने-अपने विमानों में ही रहते हुए तत्त्वचर्चा आदि में निमग्न रहते हैं। ये अहमिन्द्र देव वहीं से-अपने विमान से ही जिनेन्द्र भगवन्तों के पंचकल्याणक आदि के समय नमस्कार करते हैं तथा ‘‘विजयादिषु द्विचरमा:’’ सूत्र के अनुसार पाँच अनुत्तरोें में से विजय, वैजयन्त, जयंत और अपराजित इन चार विमानों में रहने वाले देव दो भवावतारी होते हैं-मनुष्य के दो भव लेकर मोक्ष चले जाते हैं एवं अंतिम अनुत्तर- सर्वार्थसिद्धि विमान में रहने वाले सभी देव एक भवावतारी ही होते हैं। वहाँ से चयकर मनुष्य पर्याय में जन्म लेकर नियम से संयम ग्रहण करके मोक्षपद प्राप्त कर लेते हैं। इन विशेषताओं को जानकर आप सभी को सम्यग्दर्शन के बल से अपने इस जन्म को आगे एक भवावतारी वाला जन्म बनाने का पुरुषार्थ करना चाहिए। अर्थात् इस मनुष्य पर्याय में निर्दोष चारित्र एवं अखण्ड ब्रह्मचर्य का पालन करके सौधर्म इन्द्र अथवा लौकांतिक देव का पद प्राप्त करके मात्र एक भव मनुष्य का लेकर शीघ्र मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है, उसी संभावित शक्ति को प्रगट करने की प्रेरणा यहाँ प्रदान की गई है।

इस प्रकार चतुर्थस्थल में सम्यग्दृष्टि अनुदिश आदि विमानों में स्थित देवों का स्पर्शनक्षेत्र बतलाने वाला एक सूत्र पूर्ण हुआ।

इस प्रकार षट्खण्डागम के प्रथम खण्ड में चतुर्थ ग्रंथ में स्पर्शनानुगम नामक प्रकरण में गणिनी ज्ञानमती कृत सिद्धान्तचिंतामणि टीका में गतिमार्गणा नामक प्रथम अधिकार समाप्त हुआ।

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