Whatsappicon.jpg
Whatsappicon.jpg
ज्ञानमती नेटवर्क से जुड़ने के लिये ADD ME < मोबाइल नं.> लिखकर +91 7599002108 पर व्हाट्सएप पर मेसेज करें|


दिव्यशक्ति ब्राह्मी-सुंदरी स्वरूपा गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ससंघ का मंगल चातुर्मास अवध की धरती जन्मभूमि टिकैतनगर में 15-7-19 से प्रारंभ हुआ |

पारस चैनल पर प्रातः ६ से ७ बजे तक देखें जिनाभिषेक एवं शांतिधारा पुन: ज्ञानमती माताजी - चंदनामती माताजी के प्रवचन ।

०१. मंगलाचरण से लेकर सयोगिकेवली भगवन्तों तक की स्पर्शनप्ररूपणा

ENCYCLOPEDIA से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

विषय सूची

मंगलाचरण से लेकर सयोगिकेवली भगवन्तों तक की स्पर्शनप्ररूपणा

EiMdL6nin.jpeg.jpg


अथ स्पर्शनानुगम:

मंगलाचरण
शुक्लध्यानाग्निा दग्ध्वा, कर्मेन्धनानि संयताः।
सिद्धिं प्रापुर्नमस्तेभ्यः, शुक्लध्यानस्य सिद्धये।।१।।
अष्टोत्तरसहस्राणि, जिनबिम्बानि भान्त्विह।
यानि स्थास्यन्ति पद्मस्य, दलेषु नवमन्दिरे।।२।।
पादपद्मरजःस्पर्शात्, कर्मरेणुर्विधूयते।
येषां तेषां नुमः पाद-पद्मानि भक्तितो वयम्।।३।।

मांगीतुंगीसिद्धक्षेत्रे वर्तमाने द्विद्विपंचद्व्यंके वीरनिर्वाणसंवत्सरे ज्येष्ठशुक्लाषष्ठ्यां अष्टोत्तरसहस्र-जिनप्रतिमानां पंचकल्याणकप्रतिष्ठा संजाता। अग्रे आश्विनशुक्लात्रयोदश्यां यासां विराजमानकरणार्थमधुना गोलाकारमन्दिरस्याभ्यन्तरे अष्टोत्तरशतदलसहितस्य अभूतपूर्वकमलस्य च निर्माणं द्रुतगत्या भवदस्ति। ताः इह विभासमानाः जिनप्रतिमा: सदा स्थेयासुः जगति मंगलं च कुर्वन्तु।

तत्र षट्खण्डागमग्रन्थराजस्य प्रथमखण्डे चतुर्थग्रन्थे चतुर्थस्पर्शनानुगम-नामानुयोगद्वारं ग्रन्थः प्रारभ्यते। तत्र तावद् द्वौ महाधिकारौ स्तः। तस्मिन् महाधिकारे प्रथमे दशसूत्राणि। द्वितीये महाधिकारे पंचसप्तत्यधिक-शतसूत्राणि सन्ति। एषु द्वितीयमहाधिकारेषु चतुर्दशाधिकाराः वर्तन्ते। तत्रापि प्रथमाधिकारे गतिमार्गणायां षट्चत्वारिश्ांत् सूत्राणि। द्वितीयाधिकारे इंद्रियमार्गणायां नवसूत्राणि। तृतीयाधिकारे कायमार्गणायां अष्टसूत्राणि। चतुर्थे योगाधिकारे अष्टाविंशतिसूत्राणि। पंचमे वेदमार्गणायां अष्टादश सूत्राणि। षष्ठेऽधिकारे कषायमार्गणायां त्रीणि सूत्राणि। सप्तमे ज्ञानमार्गणायां नव सूत्राणि। अष्टमाधिकारे संयममार्गणायां अष्टौ सूत्राणि। दर्शनाधिकारे नवमे षट् सूत्राणि। दशमे लेश्याधिकारे एकोनविंशतिसूत्राणि। एकादशे भव्यमार्गणायां द्वे सूत्रे। द्वादशेऽधिकारे सम्यक्त्वमार्गणायां दश सूत्राणि। त्रयोदशे संज्ञिमार्गणायां चत्वारि सूत्राणि। चतुर्दशेऽधिकारे आहारमार्गणायां पंच सूत्राणि। इति पंचाशीत्यधिकशतसूत्रैरयं स्पर्शनानुगमो ग्रंथः।

तस्मिन्नपि प्रथममहाधिकारे अधिकारशुद्धिपूर्वकत्वेन पातनिकासहितं व्याख्यानं क्रियते। तत्र सप्तान्तरस्थलानि सन्ति। तस्मिन् प्रथमस्थले गुणस्थानमार्गणयोः स्पर्शनकथनार्थं ‘‘फोसणाणुगमेण’’ इत्यादिना प्रतिज्ञारूपेण एकं सूत्रं वक्ष्यते। ततः परं द्वितीयस्थले मिथ्यादृष्टिजीवानां स्पर्शनप्रतिपादनत्वेन ‘‘ओघेण मिच्छा’’ इत्यादिसूत्रमेकं। तदनु तृतीयस्थले सासादनजीवानां स्पर्शनकथनत्वेन ‘‘सासण’’ इत्यादिसूत्रद्वयं। तदनंतरं चतुर्थस्थले सम्यग्मिथ्यादृष्टि-असंयतसम्यग्दृष्टिस्पर्शनप्ररूपणत्वेन ‘‘सम्मामिच्छाइट्ठि’’ इत्यादि सूत्रद्वयं। तत्पश्चात् पंचमस्थले संयतासंयतानां स्पर्शनप्रतिपादनत्वेन ‘‘संजदासंजदेहि’’ इत्यादिसूत्रद्वयं। पुनः षष्ठस्थले प्रमत्तसंयतादि-अयोगिकेवलिपर्यंतानां स्पर्शनप्ररूपणत्वेन ‘‘पमत्तसंजद’’ इत्यादिसूत्रमेकं। ततः परं सप्तमस्थले सयोगिकेवलिनां स्पर्शनप्रतिपादनत्वेन ‘‘सजोगिकेवलीहि’’ इत्यादिना सूत्रमेकं इति समुदायपातनिका भवति।

अथ स्पर्शनानुगम प्रारम्भ

मंगलाचरण

श्लोकार्थ-शुक्लध्यान की अग्नि के द्वारा जिन संयतों ने कर्मरूपी र्इंधन को जलाकर भस्म कर दिया है, उन सभी संयतों को शुक्लध्यान की सिाqद्ध के लिए मेरा नमस्कार है ।।१।।

यहाँ एक हजार आठ जिनप्रतिमाएँ शोभायमान होती रहें जो कि नूतन मंदिर के कमल पत्रों पर विराजमान होंगी।।२।।

जिन प्रतिमाओं के चरणकमलों की धूलि के स्पर्श मात्र से कर्मरूपी धूलि नष्ट हो जाती है, उनके चरण कमलों को हम भक्तिपूर्वक नमस्कार करते हैं।।३।।

मांगीतुंगी सिद्धक्षेत्र में वर्तमान में वीर निर्वाण संवत् २५२२ में ज्येष्ठ शुक्ला षष्ठी के दिन एक हजार आठ प्रतिमाओं की पंचकल्याणक प्रतिष्ठा सम्पन्न हो चुकी है। आगे आश्विन शुक्ला त्रयोदशी के दिन इन्हें जिस मंदिर में विराजमान करना है उस गोलाकार कमलमंदिर का तथा उसके अंदर एक सौ आठ दल वाले अभूतपूर्व कमल का निर्माण द्रुतगति से चल रहा है। ये सभी प्रतिमाएँ जिनमंदिर में विराजमान होकर सदैव जगत का मंगल करें, यही मंगल कामना है।

भावार्थ-षट्खण्डागम की इस चतुर्थ पुस्तक के लेखन में पूज्य गणिनीप्रमुख आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी ने मांगीतुंगी सिद्धक्षेत्र का स्मरण किया है, क्योंकि उस समय वे हस्तिनापुर से इसी पंचकल्याणक के निमित्त अपने संघ सहित मांगीतुंगी गई थीं। उस पंचकल्याणक के पश्चात् आसपास मालेगांव आदि नगरों में विहार के अनन्तर पुन: मांगीतुंगी में ही संघ का वर्षायोग स्थापना हुआ। वर्षायोग के मध्य पूज्य माताजी की पावन प्रेरणा से वहाँ तीर्थ परिसर में सहस्रकूट कमलमंदिर का निर्माण हुआ, पुन: आश्विन शुक्ला त्रयोदशी के दिन उस कमलमंदिर में निर्मित एक सौ आठ दल की कमल वेदियों पर एक हजार आठ प्रतिमाएँ विराजमान हुर्इं।

वर्तमान में वह सुन्दर कमल मंदिर भव्यात्माओं के पुण्य की अभिवृद्धि करता हुआ तीर्थयात्रियों के लिए आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है। ये जिनमंदिर और जिनप्रतिमाएँ अनादि जैनसंस्कृति को जीवन्त रखते हुए हम सबके कल्याण का माध्यम बनें, यही मंगल भावना भाई गई है।

श्रीमान् भगवन् धरसेनाचार्य के मुखकमल से विनिर्गत उनके शिष्य श्री पुष्पदंत और भूतबली आचार्य द्वारा लिखित षट्खंडागम गंथ के जीवस्थान नाम के प्रथम खंड में चतुर्थ गंथ में स्पर्शनानुगम और कालानुगम नाम के दो अनुयोगद्वार कहे जा रहे हैं क्योंकि सत्प्ररूपणा, द्रव्यप्रमाणानुगम, क्षेत्रानुगम, स्पर्शनानुगम, कालानुगम, अन्तरानुगम, भावानुगम और अल्पबहुत्वानुगम नाम के आठ अनुयोगद्वार बताये गये हैं। उनमें से प्रथम खंड में सत्प्ररूपणा का वर्णन है। द्वितीय गंथ में सत्प्ररूपणा के अन्तर्गत आलाप कहे गये हैं। तृतीय ग्रंथ में द्रव्यप्रमाणानुगम और क्षेत्रानुगम इन दो अनुयोगद्वारों का प्ररूपण है।

इस चतुर्थ ग्रंथ में स्पर्शनानुगम और कालानुगम इन दो अनुयोगद्वारों का वर्णन कर रहे हैं। इस चतुर्थ ग्रंथ मेें चार महाधिकार हैं। स्पर्शनानुयोगद्वार में दो महाधिकार वर्णित हैं, पुनः कालानुयोगद्वार में भी दो महाधिकार कहेंगे।

अब इस षट्खंडागम गंथराज के प्रथम खंड की चतुर्थ पुस्तक में चौथा स्पर्शनानुगम नाम का अनुयोगद्वार प्रारंभ हो रहा है। इसमें मुख्यरूप से दो महाधिकार हैं। उनमें से प्रथम महाधिकार में दश सूत्र हैं। द्वितीय महाधिकार में एक सौ पचहत्तर सूत्र हैं। इस द्वितीय महाधिकार में चौदह अधिकार हैं। उसमें भी प्रथम गतिमार्गणा में छियालीस सूत्र हैं। द्वितीय अधिकार में इन्द्रियमार्गणाा में नौ सूत्र हैं। तृतीय कायमार्गणा अधिकार में आठ सूत्र हैं। चतुर्थ योगमार्गणा अधिकार में अट्ठाईस सूत्र हैं। पंचम वेदमार्गणा अधिकार में अट्ठारह सूत्र हैं। छठे कषायमार्गणा अधिकार में तीन सूत्र हैं। सप्तम ज्ञानमार्गणा अधिकार में नौ सूत्र हैं। आठवें संयममार्गणा अधिकार में आठ सूत्र हैं। नवमें दर्शनमार्गणा अधिकार में छह सूत्र हैं। दशवें लेश्यामार्गणा अधिकार में उन्नीस सूत्र हैं। ग्यारहवें भव्यमार्गणा अधिकार में दो सूत्र हैं। बारहवें सम्यक्त्वमार्गणा अधिकार में दश सूत्र हैं। तेरहवें संज्ञीमार्गणा अधिकार में चार सूत्र हैं। चौदहवें आहारमार्गणा अधिकार में पाँच सूत्र हैं।

इस प्रकार एक सौ पिच्चासी (१८५) सूत्रों के द्वारा यह स्पर्शनानुगम ग्रंथ कहा जा रहा है।

उसमें भी प्रथम महाधिकार में अधिकारशुद्धिपूर्वक पातनिका सहित व्याख्यान किया जा रहा है। उसमें सात अन्तस्र्थल हैं। उसमें से प्रथम स्थल में गुणस्थान और मार्गणाओं में स्पर्शन का कथन करने हेतु ‘‘फोसणाणुगमेण’’ इत्यादि प्रतिज्ञारूप से एक सूत्र कहेंगे। उसके आगे द्वितीयस्थल में मिथ्यादृष्टि जीवों का स्पर्शन बतलाने हेतु ‘‘ओघेण मिच्छा’’ इत्यादि एक सूत्र है। उसके पश्चात् तृतीय स्थल में सासादनसम्यग्दृष्टि जीवों का स्पर्शन कथन करने हेतु ‘‘सासण’’ इत्यादि दो सूत्र हैं। तदनंतर चतुर्थस्थल में सम्यग्मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि जीवोें का स्पर्शन प्ररूपण करने वाले ‘‘ सम्मामिच्छाइट्ठि’’ इत्यादि दो सूत्र हैं। तत्पश्चात् पंचमस्थल में संयतासंयत जीवों का स्पर्शन कहने हेतु ‘‘संजदासंजदेहि’’ इत्यादि दो सूत्र हैं। पुनः छठे स्थल में प्रमत्तसंयत गुणस्थान से लेकर अयोगकेवलीगुणस्थानपर्यन्त सभी मुनियों एवं भगवन्तों का स्पर्शन बताने हेतु ‘‘पमत्तसंजद’’ इत्यादि एक सूत्र है। उससे आगे सातवें स्थल में सयोगकेवली अरिहंतों का स्पर्शन कहने हेतु ‘‘सजोगिकेवलीहि’’ इत्यादि एक सूत्र है। इस प्रकार अधिकार के प्रारंभ में सूत्रों की समुदायपातनिका हुई।

अधुना स्पर्शनानुगमप्रतिज्ञापनार्थं सूत्रमवतार्यते श्रीभूतबलिसूरिवर्येण-

फोसणाणुगमेण दुविहो णिद्देसो, ओघेण आदेसेण य।।१।।

सिद्धांतचिंतामणिटीका-स्पर्शनानुगमेन जीवानां स्पर्शनकथनापेक्षया द्विविधः निर्देशः वर्तते। ओघेण-गुणस्थानापेक्षया, आदेसेण य-आदेशेन-मार्गणापेक्षया च। स्पर्शनस्य षड्विधा निक्षेपाः सन्ति-नामस्पर्शनं, स्थापनास्पर्शनं, द्रव्यस्पर्शनं, क्षेत्रस्पर्शनं, कालस्पर्शनं, भावस्पर्शनं चेति। तत्र स्पर्शनशब्दः नाम स्पर्शनं निक्षेपः, अयं द्रव्यार्थिकनयस्य विषयः। सोऽयं इति बुद्ध्या अन्यद्रव्येण सह अन्यद्रव्यस्य एकत्वकरणं स्थापनास्पर्शनं यथा पाषाणप्रतिमादिषु अयं ऋषभोऽजितः संभवोऽभिनंदनः इति। एषोऽपि द्रव्यार्थिकनयस्य विषय:। द्रव्यस्पर्शननिक्षेपो द्विविधः-आगमनोआगमभेदात्। स्पर्शनविषयकशास्त्रज्ञायकः किन्तु वर्तमानकालेऽनुपयुक्तः क्षयोपशमसहितश्च जीवः आगमद्रव्यस्पर्शननिक्षेपोऽस्ति। नोआगमद्रव्यस्पर्शन-निक्षेपस्त्रिविधः-ज्ञायकशरीर-भव्य-तद्व्यतिरिक्तभेदात्। तत्र ज्ञायकशरीरमपि त्रिविधं भाविवर्तमानत्यक्त-भेदात्। स्पर्शनप्राभृतसाहचर्यात् उक्तं त्रिविधशरीरमपि स्पर्शनसंज्ञां लभते।
भविष्यत्काले स्पर्शनविषयशास्त्रज्ञायकः भव्यद्रव्यस्पर्शनं भवति।

तद्व्यतिरिक्तनोआगमद्रव्यस्पर्शनं सचित्ताचित्तमिश्रभेदात् त्रिविधं भवति। सचित्तद्रव्याणां संयोगः सचित्तद्रव्यस्पर्शनं, अचित्तद्रव्याणां अन्योन्येन संयोगः अचित्तद्रव्यस्पर्शनं, चेतनाचेतनस्वरूपषड्द्रव्याणां संयोगेन मिश्रद्रव्यस्पर्शनं इदं एकोनषष्टिभेदरूपं। अत्र षड्द्रव्याणां संयोगेन भंगानां संख्या उच्यते-षड्द्रव्यसंयोगेन द्विसंयोगिनो भंगाः पंचदश, त्रिसंयोगिनः भंगाः विंशतिः, चतुःसंयोगिनो भंगाः पंचदश, पंचसंयोगिनः षट्, षट्संयोगी एकश्चेति एतेषु सप्तपंचाशत्भंगेषु जीवद्रव्येण सह जीवद्रव्यस्य, पुद्गलद्रव्येण सह पुद्गलद्रव्यस्य भंगौ मेलयित्वा इमे एकोनषष्टिभंगाः भवन्ति।
एवं द्रव्यस्पर्शनं कथितं भवति।

शेषद्रव्याणां आकाशेन सह संयोगः क्षेत्रस्पर्शनम्।

अमूर्तेनाकाशेन सह शेषद्रव्याणां मूर्ताणाममूर्ताणां वा कथं स्पर्शः?

नैष दोषः, अवगाह्य-अवगाहकभावस्यैव उपचारेण स्पर्शव्यपदेशात्। अथवा सत्त्वप्रमेयत्वादिना मूर्तद्रव्येण सह अमूर्तद्रव्याणां परस्परं समानत्वात् स्पर्शव्यपदेशो घटते।

कालद्रव्यस्य अन्यद्रव्यैः सह यः संयोगः स कालस्पर्शनं। अत्र अमूर्तेन कालद्रव्येण यद्यपि शेषद्रव्याणां स्पर्शो नास्ति, तथापि परिणाम्यमानानि शेषद्रव्याणि परिणामत्वेन कालेन स्पर्शितानि इति उपचारेण कालस्पर्शनं कथ्यते।

भावस्पर्शनं द्विविधं-आगम-नोआगमभेदेन। स्पर्शनप्राभृतज्ञायकः उपयुक्तश्च आगमभावस्पर्शनं। स्पर्शगुणपरिणतपुद्गलद्रव्यं नोआगमभावस्पर्शनम्।
एतेषु षड्विधेषु स्पर्शनेषु अत्र जीवक्षेत्रस्पर्शनेन प्रयोजनम्। अस्पर्शि स्पृश्यते इति स्पर्शनम्-अस्यायमर्थः। यद्भूतकाले अस्पर्शि, वर्तमानकाले च स्पृश्यते तत्स्पर्शनम्। स्पर्शनस्य अनुगमः स्पर्शनानुगमः तेन स्पर्शनानुगमेन। निर्देशः कथनं व्याख्यानमिति एकार्थः। सः द्विविधः, यथा प्रकृतिः। ओघेन पिंडेन अभेदनेति एकार्थः। आदेशेन भेदेन विशेषेणेति समानार्थः। एवं ओघादेशाभ्यां द्विविधो निर्देशः भवति, द्रव्यार्थिक-पर्यायार्थिकनयौ अनालम्ब्य कथनोपायाभावात्।

यदि एवं तर्हि प्रमाणवाक्यस्य अभावो प्रसज्यते इति चेत्?
भवतु नाम अभावः, गौणप्रधानभावमन्तरेण कथनोपायाभावात्। अथवा प्रमाणेनोत्पादितं वचनं प्रमाणवाक्यमुपचारेण उच्यते१।
एवं प्रथमस्थले प्रतिज्ञा कथनत्वेन एकं सूत्रं गतं।


अब स्पर्शनानुगम को प्रतिज्ञापित करने के लिए श्रीभूतबली आचार्यप्रवर सूत्र का अवतार करते हैं-

सूत्रार्थ-

स्पर्शनानुगम की अपेक्षा निर्देश दो प्रकार का है-ओघनिर्देश और आदेशनिर्देश ।।१।।

हिन्दी टीका-स्पर्शनानुगम के द्वारा जीवों का स्पर्शन कथन की अपेक्षा दो प्रकार का निर्देश होता है। ओघेन-गुणस्थान की अपेक्षा और आदेसेण-मार्गणा की अपेक्षा। अर्थात् इन दोनों की अपेक्षा स्पर्शनानुगम का वर्णन करेंगे।

स्पर्शन का निक्षेप छह प्रकार का है-नामस्पर्शन, स्थापनास्पर्शन, द्रव्यस्पर्शन, क्षेत्रस्पर्शन, कालस्पर्शन और भावस्पर्शन। उनमें ‘‘स्पर्शन’’ यह शब्द नामस्पर्शन निक्षेप है, यह निक्षेप द्रव्यार्थिकनय का विषय है। ‘‘यह वही है’’ इस प्रकार की बुद्धि से अन्य द्रव्य के साथ अन्य द्रव्य का एकत्व स्थापित करना स्थापना निक्षेप है। जैसे-पाषाण प्रतिमा आदिक में ‘यह ऋषभ हैं, यह अजित हैं, यह संभव हैं, यह अभिनंदन हैं, इत्यादि। यह स्थापना निक्षेप भी द्रव्यार्थिकनय का विषय है। आगम और नोआगम के भेद से द्रव्यस्पर्शननिक्षेप दो प्रकार का है। उनमें स्पर्शनविषयक शास्त्र का ज्ञायक, किन्तु वर्तमान में अनुपयोगी और क्षयोपशमसहित जीव आगमद्रव्यस्पर्शन निक्षेप है। नोआगमद्रव्यस्पर्शन निक्षेप ज्ञायक शरीर, भव्य और तद्व्यतिरिक्त नोआगमद्रव्यस्पर्शन के भेद से तीन प्रकार का है। उसमें ज्ञायकशरीर भी तीन प्रकार का है-भावी, वर्तमान और त्यक्त। स्पर्शनप्राभृत के साहचर्य से उक्त तीन प्रकार के शरीर को भी स्पर्शन संज्ञा प्राप्त हो जाती है। भविष्यकाल में स्पर्शनविषयक शास्त्र का ज्ञायक भव्य द्रव्यस्पर्शन है। तद्व्यतिरिक्त नोआगमद्रव्यस्पर्शन सचित्त, अचित्त और मिश्र के भेद से तीन प्रकार का है। जो सचित्त द्रव्यों का संयोग होता है, वह सचित्तद्रव्यस्पर्शन कहलाता है। अचित्त द्रव्यों का जो परस्पर में संयोग होता है, वह अचित्तद्रव्यस्पर्शन कहलाता है। मिश्रद्रव्यस्पर्शन चेतन-अचेतनस्वरूप छहों द्रव्यों के संयोग से उनसठ भेद वाला है।

यहाँ छहों द्रव्यों के संयोग से भंगों की संख्या कहते हैं-

छह द्रव्यों के संयोग से द्विसंयोगी भंग पंद्रह (१५) होते हैं, त्रिसंयोगी भंग बीस (२०) हैं, चतुःसंयोगी भंग पंद्रह (१५) हैं, पंचसंयोगी भंग छह (६) हैं, षट्संयोगी भंग एक (१) है।

इन सत्तावन भंगों में दो भंग (एक जीव का एक जीव के साथ, पुद्गल का पुद्गल के साथ) मिलाने पर ये कुल उनसठ (५९) भंग होते हैं। इस प्रकार द्रव्यस्पर्शन का कथन हुआ है।

शेष द्रव्यों का आकाश के साथ संयोग क्षेत्रस्पर्शन कहलाता है।

शंका-अमूर्त आकाश के साथ शेष अमूर्त और मूर्त द्रव्यों का स्पर्श कैसे संभव है ?

समाधान-यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि अवगाह्य-अवगाहक भाव की ही उपचार से स्पर्श संज्ञा है अथवा सत्त्व, प्रमेयत्व आदि के द्वारा मूर्त द्रव्य के साथ अमूर्त द्रव्यों की परस्पर समानता होने से भी स्पर्श का व्यवहार बन जाता है।

कालद्रव्य का अन्य द्रव्यों के साथ जो संयोग है, उसका नाम कालस्पर्शन है। यहां यद्यपि अमूर्त कालद्रव्य के साथ शेष द्रव्यों का स्पर्शन नहीं है, तथापि परिणमित होने वाले शेष द्रव्य परिणामत्व की अपेक्षा काल से स्पर्शित हैं, इस प्रकार के उपचार से कालस्पर्शन कहा जाता है। भावस्पर्शन आगम और नोआगम के भेद से दो प्रकार का है। स्पर्शनविषयक शास्त्र के ज्ञायक और वर्तमान में उसमें उपयुक्त जीव को आगमभावस्पर्शन कहते हैं। स्पर्शगुण से परिणत पुद्गल द्रव्य को नोआगमभाव स्पर्शन कहते हैं।

इन उक्त छह प्रकार के स्पर्शनों में से यहाँ पर जीवद्रव्यसम्बन्धी क्षेत्रस्पर्शन से प्रयोजन है। जो स्पर्शित हुआ और जिसका स्पर्श किया जाता है वह स्पर्शन है इसका यह अर्थ है जो भूतकाल में स्पर्श किया गया और वर्तमान में स्पर्श किया जा रहा है, वह स्पर्शन कहलाता है। स्पर्शन के अनुगम को स्पर्शनानुगम कहते हैं, उससे अर्थात् स्पर्शनानुगम से। निर्देश, कथन और व्याख्यान, ये तीनों एकार्थक नाम हैं। वह निर्देश प्रकृति के निर्देश के समान दो प्रकार का होता है। ओघ, पिण्ड और अभेद ये सब एकार्थक नाम हैं। आदेश, भेद और विशेष ये सब समानार्थक नाम हैं। ओघनिर्देश और आदेशनिर्देश इस प्रकार से निर्देश दो ही प्रकार का होता है क्योंकि द्रव्यार्थिक और पर्यायार्थिकनयों के अवलम्बन किये बिना वस्तुस्वरूप के कथन करने के उपाय का अभाव है।

शंका-यदि ऐसा है तो प्रमाणवाक्य का अभाव प्राप्त होता है ?

समाधान-भले ही प्रमाणवाक्य का अभाव हो जावे क्योंकि गौणता और प्रधानता के बिना वस्तुस्वरूप के कथन करने के उपाय का भी अभाव है। अथवा, प्रमाण से उत्पादित वचन को उपचार से प्रमाणवाक्य कहते हैं।

इस प्रकार प्रथम स्थल में प्रतिज्ञा कथनरूप से एक सूत्र पूर्ण हुआ।


अधुना मिथ्यादृष्टिस्पर्शनप्ररूपणाय सूत्रमवतरति-

ओघेण मिच्छादिट्ठीहि केवडियं खेत्तं फोसिदं? सव्वलोगो।।२।।

सिद्धांतचिंतामणिटीका-‘यथा उद्देश्यः तथा निर्देश:’ इति न्या
यात् तावद् ओघेन भणामि इति ‘ओघेण’ वचनं। शेषगुणस्थान-प्रतिषेधार्थं ‘मिच्छादिट्ठीहिं’ इति वचनं। ‘केवडियं खेत्तं फोसिदं’ इति पृच्छासूत्रं शास्त्रस्य प्रमाणत्वप्रतिपादनफलं।
क्षेत्रानुयोगद्वारे सर्वमार्गणास्थानानि आश्रित्य सर्वगुणस्थानां वर्तमानकालविशिष्टं क्षेत्रं प्रतिपादितं, संप्रति स्पर्शनानुयोगद्वारेण किं प्ररूप्यते?
चतुर्दशमार्गणास्थानानि आश्रित्य सर्वगुणस्थानानां अतीतकालविशेषितक्षेत्रं स्पर्शनं उच्यते।
कश्चिदाह- अत्र वर्तमानक्षेत्रप्ररूपणमपि सूत्रनिबद्धमेव दृश्यते। ततो न स्पर्शनमतीतकालविशिष्ट-क्षेत्रप्रतिपादनं, किन्तु वर्तमानातीतकालविशेषितक्षेत्रप्रतिपादनं इति चेत्?
आचार्यः प्राह-अत्र न क्षेत्रप्ररूपणं, तत्तत् पूर्वं क्षेत्रानियोगद्वारप्ररूपित-वर्तमानक्षेत्रं स्मारयित्वा अतीतकालविशिष्टक्षेत्रप्रतिपादनार्थं तस्योपादानं। ततः स्पर्शनं अतीतकालविशेषितक्षेत्रप्रतिपादनमेवेति सिद्धं।
‘सव्वलोगो’ संपूर्णलोकः मिथ्यादृष्टिभिः स्पृष्टः इत्युक्तं भवति। अत्र लोकप्रमाणं पूर्वं आनेतव्यं-
तत्र गाथा-
मुहसहिदमूलमज्झं, छेत्तूणद्धेण सत्तवग्गेण।
हंतूणेगट्ठकदे, घणरज्जू होंति लोगम्हि१।।
मध्यलोकस्य द्वौ विभागौ कृत्वा द्वयोः विभागयोः पृथक्-पृथक्मुखसहितमूलविष्वंâभयोः अद्र्धं कृत्वा पुनः सप्तवर्गेण गुणयित्वा, लब्धौ उभौ राशी मेलयित्वा लोकसंबंधिघनरज्जवः त्रिचत्वािंरशदधिकत्रिशतप्रमाणाः भवन्ति।
अत्र पर्यायार्थिकनयप्ररूपणा उच्यते। स्वस्थानस्वस्थान-वेदना-कषाय-मारणान्तिक-उपपादगत-मिथ्यादृष्टिभिः अतीतेन वर्तमानेन च सर्वलोकः स्पृष्टः। विहारवत्स्वस्थान-वैक्रियिकसमुद्घातगतैः जीवैः वर्तमाने काले त्रिलोकानामसंख्यातभागः, तिर्यग्लोकस्य संख्यातभागः स्पृष्टः। सार्धद्वयद्वीपादसंख्यातगुणितमात्रं क्षेत्रं स्पृष्टं। अत्र अपवर्तना क्षेत्रप्ररूपणावत् ज्ञातव्या।
अतीतेन अष्ट चतुर्दशभागा देशोना। तद्यथा-लोकनालिं चतुर्दश खण्डानि कृत्वा मेरुमूलादधो द्वे खण्डे उपरिमषट्खण्डानि च एकत्रीकृते अष्ट चतुर्दशभागा भवंति। इमे अष्ट चतुर्दशभागाः तृतीयपृथिव्याः अधः एकसहस्रयोजनहीनाः अतः देशोनाः कथ्यन्ते।
अत्र रज्जुशब्दस्य व्याख्या उच्यते-‘‘असंख्यातयोजनकोट्याकाशप्रदेशपरिमाणा रज्जुस्तावदुच्यते। तल्लक्षणसमचतुरस्ररज्जु-त्रिचत्वारिंशदधिकशतत्रयपरिमाणो लोक उच्यते।१’’
एवं द्वितीयस्थले मिथ्यादृष्टिस्पर्शनप्रतिपादनत्वेन एकं सूत्रं गतम्।
सासादनसम्यग्दृष्टिस्पर्शननिरूपणाय सूत्रमवतरति-
सासणसम्मादिट्ठीहिं केवडियं खेत्तं फोसिदं? लोगस्स असंखेज्जदिभागे।।३।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-एतत्सूत्रं मंदबुद्धिशिष्यप्रतिबोधनार्थं क्षेत्रानुयोगद्वारे उक्तमेवात्र पुनरपि उत्तंâ।
अथवा अतीतानागतवर्तमानकालविशिष्टक्षेत्रेषु चतुर्दशगुणस्थानयुत्तेषु पृष्टेषु तत्शिष्यसंदेहविनाशनार्थं अतीतवर्तमानद्विकालविशिष्टक्षेत्रप्ररूपणं क्रियते। स्वस्थानस्वस्थान-विहारवत्स्वस्थान-वेदना-कषाय-वैक्रियिक-मारणान्तिक-उपपादगतैः चतुर्लोकानामसंख्यातभागः स्पृष्टः। मानुषक्षेत्रादसंख्यातगुणं क्षेत्रं स्पृष्टं। अत्र कारणं पूर्ववत् वक्तव्यं।
तत्रैव सीमाप्रतिपादनाय सूत्रमवतरति-
अट्ठ वारह चोद्दसभागा वा देसूणा।।४।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-सासादनसम्यग्दृष्टिभिः चतुर्दशरज्जुषु चतुर्दशभागेषु अष्टौ भागाः देशोनाः स्पृष्टाः, अथवा चतुर्दशभागेषु द्वादशभागाः स्पृष्टाः। स्वस्थानस्वस्थानगतैः सासादनैः त्रिलोकानामसंख्यातभागः, तिर्यग्लोकस्य संख्यातभागः स्पृष्टः। सार्धद्वयद्वीपादसंख्यातगुणितक्षेत्रं स्पृष्टं। अतीतस्वस्थानक्षेत्रस्यानयनविधानं उच्यते। तद्यथा-तत्र तावत् तिर्यक्सासादनानां स्वस्थानक्षेत्रं भणिष्यामः। त्रसजीवाः लोकनाल्याः अभ्यन्तरे चैव भवन्ति, न बहिः। ततः रज्जु प्रतरस्याभ्यन्तरे सर्वत्र सासादनाः संभवन्ति। त्रसजीवविरहितेषु असंख्यातेषु समुद्रेषु सासादनाः न सन्ति। वैरभावयुत्तैव्र्यन्तरदेवैः गृहीतानामस्ति संभवः, किन्तु ते स्वस्थानस्था न भवन्ति, विहारेण परिणतत्त्वात्। तत्क्षेत्रं तिर्यग्लोकप्रमाणेन क्रियमाणे एकं जगत्प्रतरं पुरतः भण्यमानप्रमाणैः संख्यातरूपैः खंडयित्वा यल्लब्धं तत् रज्जुप्रतरात् अपनीय संख्यातांगुलैः गुणिते तिर्यग्लोकस्य संख्यातभागं भूत्वा संख्यातांगुलबाहल्यं जगत्प्रतरं भवति।१
उक्तं चान्यत्र-‘‘तत्र स्वस्थानविहारापेक्षया सासादनसम्यग्दृष्टिभिर्लोकस्यासंख्येयभागः स्पृष्टः। एवमग्रेऽपि सर्वत्र स्वस्थानविहारापेक्षया लोकस्यासंख्येयभागो ज्ञातव्यः। परस्थानविहारापेक्षया तु सासादनदेवानां प्रथमपृथिवीत्रये विहारात् रज्जुद्वयं। अच्युतान्तोपरिविहारात् षड् रज्जव इत्यष्टौ द्वादश वा चतुर्दशभागा देशोनाः स्पृष्टाः।
द्वादश भागाः कथं स्पृष्टाः इति चेत्?
उच्यते-सप्तमपृथिव्यां परित्यक्तसासादनादिगुणस्थान एव मारणान्तिकं विदधाति इति नियमात् षष्ठीतो मध्यलोके पञ्चरज्जवः सासादनो मारणान्तिवंâ करोति। मध्यलोकाच्च लोकाग्रे बादरपृथिवीकायिक-बादराप्कायिक-बादरवनस्पतिकायिकेषु उत्पद्यते इति सप्त रज्जवः। एवं द्वादश रज्जवो भवन्ति। सासादनसम्यग्दृष्टिर्हि वायुकायिकेषु तेजःकायिकेषु नरकेषु सर्वसूक्ष्मकायिकेषु च चतुर्षु स्थानकेषु नोत्पद्यते इति नियमः।
‘‘देशोनाः इति कथं? केचित् प्रदेशाः सासादनसम्यग्दर्शनयोग्या न भवन्तीति देशोनाः। एवमुत्तरत्र सर्वत्रापि अस्पर्शनयोग्यापेक्षया देशोनत्वं वेदितव्यम्१।’’
संप्रति ज्योतिष्कसासादनसम्यग्दृष्टिस्वस्थानक्षेत्रं भणिष्यामः। तद्यथा-जंबूद्वीपे द्वौ चन्द्रौ, द्वौ सूर्यौ। लवणसमुद्रे चत्वार: चन्द्रा:, चत्वार: सूर्या:। धातकीखण्डे द्वादश चंद्रौ, द्वादश सूर्यौ। कालोदसमुद्रे द्विचत्वािंरशत् चन्द्राः, द्विचत्वािंरशत् सूर्याः। पुष्करार्धद्वीपे द्विसप्ततिः चन्द्राः, द्विसप्ततिः सूर्याः।
मानुषोत्तरशैलात् बाह्यभागे प्रथमवलये चतुश्चत्वािंरशदधिकएकशतचन्द्राः, एतावन्तः सूर्याः। ततः परतः अष्टमवलयपर्यन्ताः चतुश्चतुःसंख्याः वर्धयितव्याः। इमे सर्वे चन्द्राः एकसहस्र-द्विशत-चतुःषष्टिप्रमाणाः, एतावन्तः सूर्याः। पुष्करसमुद्रे द्वात्रिंशत् वलयाः, तेषु सर्वे मिलित्वा द्व्यशीतिसहस्र-अष्टशत-अशीतिचन्द्राः, एतावन्तः सूर्याः। एवं विधिना स्वयंभूरमणपर्यन्ताः चन्द्राः सूर्याश्च असंख्याताः भवन्ति।
मानुषोत्तरशैलादभ्यन्तरे इमे ज्योतिष्कदेवविमानानि प्रदक्षिणाक्रमेण भ्राम्यन्ति। ततो बहिः सर्वाणि ज्योतिष्कविमानानि यथास्थानं तिष्ठन्ति।
उक्तं च-मेरुप्रदक्षिणा नित्यगतयो नृलोके।।१३।। तत्कृतः कालविभागः।।१४।। बहिरवस्थिताः।।१५।।१
एकस्य चन्द्रस्य परिवारदेवाः- तत्र चन्द्रः इन्द्रः, सूर्यः प्रतीन्द्रः, अशीतिग्रहाः, अष्टाविंशतिनक्षत्राणि, षट्षष्टिसहस्र-नवशत-पंचसप्ततिकोटिकोट्यः तारागणाः,
उक्तं च- अडसीदट्ठावीसा, गहरिक्खा तार कोडिकोडीणं।
छावाqट्टसहस्राणि य, णवसय-पण्णत्तरिगि चंदे२।।३६२।।


अब मिथ्यादृष्टि जीवों का स्पर्शन बतलाने हेतु सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

ओघ से मिथ्यादृष्टि जीवों ने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है? सर्वलोक स्पर्श किया है।।२।।

हिन्दी टीका-‘‘जिस प्रकार से उद्देश्य होता है, उसी प्रकार से निर्देश किया जाता है।’’ इस न्याय के अनुसार सर्वप्रथम ओघ का कथन करता हूँ। इसीलिए सूत्र में पहले ‘ओघ से’ ऐसा वचन कहा। सासादनादि शेष गुणस्थानों के प्रतिषेध करने के लिए ‘मिथ्यादृष्टियों के द्वारा’ यह वचन कहा। ‘कितना क्षेत्र स्पर्श किया है? यह पृच्छासूत्र शास्त्र की प्रमाणता का प्रतिपादन करने के लिए कहा गया है।

शंका-क्षेत्रानुयोगद्वार में सर्वमार्गणा स्थानों का आश्रय लेकर सभी गुणस्थानों के वर्तमानकालविशिष्ट क्षेत्र का प्रतिपादन कर दिया गया है। अब पुनः इस स्पर्शनानुयोगद्वार से क्या प्ररूपण किया जाएगा?

समाधान-चौदह मार्गणास्थानों का आश्रय लेकर के सभी गुणस्थानों के अतीत (भूत) काल विशिष्ट जो क्षेत्र है, वह स्पर्शन कहलाता है।

यहाँ कोई शंका करता है कि यहाँ स्पर्शनानुयोगद्वार में वर्तमानकालसम्बन्धी क्षेत्र की प्ररूपणा भी सूत्रनिब द्ध ही देखी जाती है, इसलिए स्पर्शन अतीतकाल विशिष्ट क्षेत्र का प्रतिपादन करने वाला नहीं है किंतु वर्तमान और अतीतकाल से विशिष्ट क्षेत्र का प्रतिपादन करने वाला है?

आचार्यश्री इसका समाधान देते हैं कि यहां स्पर्शनानुयोगद्वार में वर्तमान क्षेत्र की प्ररूपणा नहीं है किंतु पहले क्षेत्रानुयोगद्वार में प्ररूपित उस-उस वर्तमान क्षेत्र को स्मरण कराकर अतीतकाल विशिष्ट क्षेत्र के प्रतिपादनार्थ उसका ग्रहण किया गया है अतएव स्पर्शनानुयोगद्वार अतीतकाल से विशिष्ट क्षेत्र का ही प्रतिपादन करने वाला है, यह सिद्ध हुआ ।

‘सर्वलोक’ इस पद से सम्पूर्ण लोक मिथ्यादृष्टि जीवों के द्वारा स्पर्श किया गया है, ऐसा कहा गया है। यहाँ पर लोक का प्रमाण पहले क्षेत्रप्ररूपणा में बताए गये नियम के अनुसार निकाल लेना चाहिए। उसके लिए गाथा कही गई है-

गाथार्थ-लोक के मध्य को छेदकर अर्थात् मध्यलोक के दो विभाग कर, दोनों विभागों के पृथक्- पृथक् मुख सहित मूल के विस्तार को आधा करके, पुनः सात के वर्ग से गुणा करके, उन दोनों राशियों को जोड़ देने पर, लोकसम्बन्धी घनराजु उत्पन्न होते हैं।

मध्यलोक के दो विभाग करके दोनों विभागों में पृथक्-पृथक् मुख सहित मूल विष्कंभ को आधा करके पुनः सात के वर्ग से गुणित करके जो लब्ध आवे, उन दोनों राशियों को मिलाकर लोकसम्बन्धी घनरज्जु तीन सौ तेंतालीस प्रमाण (३४३) होते हैं।

यहाँ पर्यायार्थिकनयसम्बन्धी प्ररूपणा कहते हैं-

स्वस्थानस्वस्थान, वेदनासमुद्घात, कषायसमुद्घात, मारणन्तिकसमुद्घात और उपपाद पदगत मिथ्यादृष्टि जीवों ने अतीतकाल और वर्तमानकाल की अपेक्षा सर्वलोक स्पर्श किया है। विहारवत्स्वस्थान और वैक्रियिकसमुद्घात मिथ्यादृष्टि जीवों ने वर्तमानकाल में सामान्य लोक आदि तीन लोेकों का असंख्यातवाँ भाग और तिर्यग्लोक का संख्यातवाँ भाग स्पर्श किया है तथा अढ़ाई द्वीप से असंख्यातगुणा क्षेत्र स्पर्श किया है। यहां पर अपवर्तना क्षेत्र प्ररूपणा के समान जानना चाहिए। विहारवत्स्वस्थान और वैक्रियिकसमुद्घातगत मिथ्यादृष्टि जीवों ने अतीतकाल की अपेक्षा देशोन क्षेत्र स्पर्श किया है, वह इस प्रकार से है-लोक नाली के चौदह खंड करके मेरूपर्वत के मूल भाग से नीचे के दो खंडों को और ऊपर के छह खंडों को एकत्रित करने पर आठ बटे चौदह (८/१४) भाग हो जाते हैं। ये आठ बटे चौदह राजु तीसरी पृथिवी के नीचे के एक हजार योजनों से हीनप्रमाण होते हैं, इसीलिए इन्हें ‘देशोन’ कहा है।

यहाँ रज्जु शब्द की व्याख्या कहते हैं-असंख्यात करोड़ योजन प्रमाण आकाश के प्रदेशों को एक राजु कहते हैं और तीन सौ तैंतालीस समचतुरस्र राजु प्रमाण लोक होता है।

इस प्रकार द्वितीय स्थल में मिथ्यादृष्टि जीवों का स्पर्शन बतलाने वाला एक सूत्र पूर्ण हुआ।

अब सासादनसम्यग्दृष्टि जीवों का स्पर्शन बतलाने हेतु सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

सासादनसम्यग्दृष्टि जीवोें ने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है ? लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पर्श किया है ।।३।।

हिन्दी टीका-यह सूत्र मंदबुद्धि शिष्यों के प्रतिबोध-ज्ञान हेतु क्षेत्रानुयोगद्वार में कहा जा चुका है, फिर भी यहाँ पर पुनः उसे कहा है।

अथवा, चौदह गुणस्थान से युक्त भूतकाल, भविष्यकाल और वर्तमानकाल विशिष्ट क्षेत्रों के पूछने पर उस शिष्य के संदेह विनाशनार्थ भूतकाल और वर्तमानकाल इन दो कालों से विशिष्ट क्षेत्र की प्ररूपणा की जा रही है। स्वस्थानस्वस्थान, विहारवत्स्वस्थान, वेदनासमुद्घात, कषायसमुद्घात, वैक्रियिकसमुद्घात, मारणान्तिकसमुद्घात और उपपाद, इन पदों को प्राप्त सासादनसम्यग्दृष्टि जीवों ने सामान्य लोक आदि चार लोकों का असंख्यातवाँ भाग स्पर्श किया है तथा मानुष क्षेत्र से असंख्यातगुणा क्षेत्र स्पर्श किया है। यहां पर कारण पूर्व के समान ही कहना चाहिए।

अब उसी सीमा का प्रतिपादन करने के लिए सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

सासादनसम्यग्दृष्टि जीवोें ने अतीतकाल की अपेक्षा कुछ कम आठ बटे चौदह भाग तथा कुछ कम बारह बटे चौदह भाग प्रमाण क्षेत्र स्पर्श किया है ।।४।।

हिन्दी टीका-सासादनसम्यग्दृष्टि जीवों ने चौदह राजु के चौदह भागों में आठ भाग देशोन अर्थात् कुछ कम (८/१४) भाग को स्पर्श किया है अथवा चौदह भागों में बारहवाँ भाग (१२/१४) स्पर्श किया है।

स्वस्थानस्वस्थान पद को प्राप्त सासादनसम्यग्दृष्टि जीवोें ने तीनों लोकों का असंख्यातवाँ भाग, तिर्यग्लोक का संख्यातवाँ भाग तथा ढाईद्वीप से असंख्यातगुणा क्षेत्र स्पर्श किया है।

अब अतीतकालसम्बन्धी स्वस्थानस्वस्थान क्षेत्र के निकालने का नियम बताते हैं। वह इस प्रकार है- उसमें से पहले तिर्यंच सासादनसम्यग्दृष्टियों के स्वस्थानस्वस्थान क्षेत्र को कहते हैं।

त्रसजीव लोकनाली के भीतर ही होते हैं, बाहर नहीं।

इसलिए राजू प्रतर के भीतर सर्वत्र सासादनसम्यग्दृृष्टि जीव संभव हैं। त्रस जीवों से विरहित असंख्यात समुद्रों में सासादनसम्यग्दृष्टि जीव नहीं होते हैं। यद्यपि वैरभाव रखने वाले व्यन्तर देवों के द्वारा हरण करके ले जाए गये जीवों की वहाँ संभावना है, विंâतु वे वहाँ पर स्वस्थान-स्वस्थान में स्थित नहीं कहलाते हैं क्योंकि उस समय वे विहाररूप से परिणत हो रहे हैं। इस क्षेत्र को तिर्यग्लोक के प्रमाण से करने पर, एक जगत्प्रतर को आगे कहे जाने वाले संख्यातरूप प्रमाण से खंडित करके जो लब्ध आवे, उसे राजुप्रतरों में से निकालकर पुनः संंख्यात अंगुलों से गुणा करने पर तिर्यग्लोक का संख्यातवां भाग होकर संख्यात अंगुल बाहल्य वाला जगत्प्रतर होता हैै।

अन्यत्र-तत्त्वार्थसूत्र की टीका तत्त्वार्थ वृत्ति में भी कहा है- स्वस्थानविहार की अपेक्षा सासादनसम्यग्दृष्टियों के द्वारा लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पर्श किया जाता है। इस प्रकार आगे भी सर्वत्र स्वस्थानविहारापेक्षा लोक का असंख्यातवाँ भाग जानना चाहिए। परस्थानविहार की अपेक्षा सासादन देवों द्वारा प्रथम नरक से तृतीय नरकपर्यन्त विहार होने से दो राजू स्पृष्ट है। अच्युत स्वर्ग के उपरिभागपर्यन्त विहार होने से ६ राजू क्षेत्र स्पृष्ट है। इस प्रकार लोक के ८, १२ या कुछ कम १४ भाग स्पृष्ट हैं।

प्रश्न-द्वादश भाग किस प्रकार स्पृष्ट होते हैं ?
उत्तर-‘‘सप्तम नरक में जिसने सासादन आदि गुणस्थानों को छोड़ दिया है, वही जीव मारणान्तिक समुद्घात करता है’’ इस नियम से षष्ठ नरक से मध्यलोकपर्यन्त सासादनसम्यग्दृष्टि जीव मारणान्तिक समुद्घात को करता है अतः पांच राजू और मध्यलोक से लोक के अग्रभागपर्यन्त बादरपृथ्वी, अप् और वनस्पतिकाय में उत्पन्न होता है अतः ७ राजू क्षेत्र यह हुआ। इस प्रकार १२ राजू क्षेत्र हो जाता है। यह नियम है कि सासादनसम्यग्दृष्टि जीव वायुकायिक, तेजकायिक, नरक और सर्वसूक्ष्मकायिकों में उत्पन्न नहीं होते हैं। कहा भी है-तेजकायिक, वायुकायिक, नरक और सर्वसूक्ष्मकायिक को छोड़कर बाकी के स्थानों में सासादन जीव उत्पन्न होता है।

प्रश्न-देशोनक्षेत्र कैसे होता है ?
उत्तर-कुछ प्रदेश सासादनसम्यग्दृष्टि के स्पर्शनयोग्य नहीं होते हैं इसलिए देशोनक्षेत्र हो जाता है। आगे भी देशोनता इसी प्रकार समझनी चाहिए। अर्थात् स्पर्श के अयोग्य क्षेत्र की अपेक्षा कम समझना चाहिए।

अब सासादनसम्यग्दृष्टि ज्योतिषी देवों के स्वस्थानस्वस्थान क्षेत्र को कहते हैं। वह इस प्रकार है- जम्बूद्वीप में दो चंद्र और दो सूर्य हैं। लवणसमुद्र में चार चंद्रमा और चार सूर्य हैं। धातकीखंड में बारह चंद्रमा और बारह सूर्य हैं। कालोदधि समुद्र में ब्यालीस चंद्र और ब्यालीस सूर्य हैं। पुष्करार्ध द्वीप में बहत्तर चंद्रमा और बहत्तर सूर्य हैं।

मानुषोत्तर शैल से बाह्य भाग के प्रथम वलय में एक सौ चवालीस चंद्रमा और इतने ही (१४४) सूर्य हैं। इससे आगे चार संख्या को प्रक्षेप करके, अर्थात् चार-चार बढ़ाते हुए आठवें वलय तक ले जाना चाहिए।

ये सभी चंद्रमा एक हजार दो सौ चौंसठ प्रमाण हैं, इतने ही अर्थात् एक हजार दो सौ चौंसठ सूर्य हैं। पुष्कर समुद्र में बत्तीस वलय हैं, उनमें सब मिलकर बयासी हजार आठ सौ अस्सी चन्द्रमा हैं और इतने ही सूर्य हैं। इस प्रकार स्वयंभूरमणसमुद्रपर्यन्त असंख्यात चंद्रमा और सूर्य होते हैं। मानुषोत्तर पर्वत के अभ्यंतर भाग में ये ज्योतिष्क देव के विमान प्रदक्षिणा क्रम से भ्रमण करते हैं। उसके बाहर सभी ज्योतिष्क देवों के विमान यथास्थान स्थिर रहते हैं अर्थात् उनका भ्रमण नहीं होता है। तत्त्वार्थ सूत्र में कहा भी है-

'मनुष्यलोक में ज्योतिषीदेव मेरू की प्रदक्षिणा देते हुए सदा गमन करते रहते हैं ।।१३।। उन गमन करने वाले ज्योतिषी देवों के द्वारा ही किया हुआ काल विभाग है ।।१४।। मनुष्यलोक के बाहर स्थित सर्व ज्योतिषीदेव स्थिर-निश्चल रहते हैं अर्थात् गमन नहीं करते हैं।।१५।।'

एक चंद्रमा के परिवार देव-

ज्योतिषी देवों में चंद्रमा इन्द्र कहलाता है और सूर्य को प्रतीन्द्र संज्ञा है।

अस्सी (८०) ग्रह हैं, अट्ठाईस (२८) नक्षत्र हैं, छ्यासठ हजार नौ सौ पिचहत्तर कोड़ाकोड़ी तारे हैंं।

कहा भी है-

गाथार्थ - एक चंद्रमा के परिवार में अट्ठासी ग्रह, अट्ठाईस नक्षत्र और छ्यासठ हजार नौ सौ पिचहत्तर कोड़ाकोड़ी तारे होते हैं ।।३६२।।

ज्योतिष्कदेवानां यावन्ति विमानानि, तेषु प्रत्येकं जिनमंदिराणि सन्ति। ते कियन्त? इत्याह-

‘‘वेसदछप्पण्णंगुल-कदिहिदपदरस्स संखभागमिदे।

जोइसजिणिंदगेहे, गणणातीदे णमंसामि१।।३०२।।
स्वयंभूरमणसमुद्रात् परतः ज्योतिष्कदेवविमानानि न सन्ति, किन्तु तत्समुद्रात् परे पृथिव्याः अस्तित्वं अस्ति। स्वयंभूरमणसमुद्रस्य परभागेऽपि असंख्यातद्वीपसमुद्राणां व्यासरुद्धयोजनेभ्यः संख्यातसहस्रगुणित-योजनानि अग्रे गत्वा तिर्यग्लोकस्य समाप्तिर्भवति, तत्रापि रज्जुअर्धच्छेदाः उपलब्धाः भवन्ति२।’’
ज्योतिष्कदेवानां सर्वविमानानि यावन्ति सन्ति, तानि संख्यातघनांगुलैः गुणिते स्वस्थानक्षेत्रं भवति। स्वस्थानक्षेत्रं संख्यातरूपैः गुणयित्वा संख्यातघनांगुलैः अपवर्तिते ज्योतिष्कराशिर्भवति। इमं राशिं ज्योतिष्कदेवस्य शरीरोत्सेधेन गुणितविमानाभ्यन्तरप्रतरांगुलैः गुणिते ज्योतिष्कस्वस्थानक्षेत्रं तिर्यग्लोकस्य संख्यातभागमात्रं भवति। विशेषेण तु देवोत्सेधगुणित विमानाभ्यंतरप्रतरांगुलानि उत्सेधांगुलानि प्रमाणांगुलानि कर्तव्यानि।
इमानि प्रतरांगुलानि उत्सेधांगुलानि इति कथं ज्ञायते?
यदि तानि प्रतरांगुलानि उत्सेधांगुलानि न मन्यन्ते तर्हि जंबूद्वीपस्य अभ्यन्तरे जंबूद्वीपस्थतारागणानां अवकाशोऽपि न लभेत।
अथवा इमानि प्रतरांगुलानि प्रमाणांगुलान्येव।
कथं पुनः इमे तारागणाः जंबूद्वीपे सम्मान्ति?
नैतत्, जंबूद्वीप-लवणसमुद्रौ आश्रित्य ज्योतिष्कविमानानां अवस्थानं वर्तते। अस्यायमर्थः-जंबूद्वीपसंंबंधि-ज्योतिष्कविमानानि उभौ आश्रित्य तिष्ठन्ति अतएवावकाशं लभन्ते इमानि ज्योतिष्कदेवविमानानि इति१।
सासादनसम्यग्दृष्टिव्यन्तरदेवानां स्वस्थानक्षेत्रमपि तिर्यग्लोकस्य संख्यातभागमात्रं भवति।
तत्कथं ज्ञायते?
व्यंतरदेवराशिं स्थापयित्वा एकैकस्मिन् व्यन्तरावासे संख्याताश्चैव व्यन्तरदेवा भवन्ति इति संख्यातरूपैः भागे कृते व्यन्तरावासा भवन्ति। नैष क्रमः भवनवासि-सौधर्मादीनां, तत्र संख्यातेषु भवनवासिविमानेषु असंख्यातयोजनायामेषु असंख्याता देवाः देव्यश्च भवन्ति।
कुतः? तेषां असंख्यातत्वान्यथानुपपत्तेः।
पुनः व्यन्तरावासे आत्मनः विमानाभ्यन्तर-संख्यातघनांगुलैः गुणिते व्यन्तरदेवसासादनसम्यग्दृष्टि-स्वस्थानक्षेत्रं भवति। एतानि त्रीण्यपि क्षेत्राणि मेलिते-सासादनसम्यग्दृष्टितिरश्चां, सासादनसम्यग्दृष्टि-ज्योतिष्कदेवानां, सासादनसम्यग्दृष्टिव्यन्तरदेवानां च त्रीण्यपि क्षेत्राणि मेलिते तिर्यग्लोकस्य संख्यातभागो भवति२।
वहारवत्स्वस्थान-वेदना-कषाय-वैक्रियिकसमुद्घातगतैः अष्ट चतुर्दशभागाः देशोनाः स्पृष्टाः।
कियन्मात्रेण ऊनाः इति चेत्?
तृतीयपृथिव्याः अधः एकसहस्रयोजनप्रमाणक्षेत्रेण न्यूनाः देशोनाः अत्राभीष्टाः।
मारणान्तिकसमुद्घातगतैः द्वादश चतुर्दशभागा देशोना स्पृष्टाः। तद्यथा-सुमेरुमूलादुपरि यावत् ईषत्प्राग्भारपृथिवी इति सप्त रज्जवः, अधस्तने यावत् षष्ठीपृथिवी इति पंच रज्जवः। एतेषां मेलिते सासादनमारणान्तिकक्षेत्रायामो भवति। विशेषेण अधस्तने सहस्रयोजनैः न्यूनो वक्तव्यः।
सासादनसम्यग्दृष्टयः एकेन्द्रियेषु नोत्पद्यन्ते अतो न तेषां द्वे गुणस्थाने स्तः। किन्तु ते सासादनाः मारणान्तिकसमुद्घातं एकेन्द्रियेषु कुर्वन्ति एष अस्माकं निश्चयः इति ज्ञातव्यः, किंच छिन्नायुःकाले तत्र सासादनगुणस्थानानुपलम्भात्। अस्ति विशेषः-सप्तमपृथिव्याः नारकाः सासादनेन सह देवानामिव मारणान्तिकं न कुर्वन्ति।
सासादना देवाः यदि एकेन्द्रियेषु मारणान्तिकं कुर्वन्ति तर्हि सर्वलोकवर्तिषु एकेन्द्रियेषु कथं न कुर्वन्ति?
नैतत्, तेषां सासादनगुणस्थानप्राधान्येन लोकनाल्याः बहिः उत्पत्तेः स्वभावाभावात्। लोकनाल्याः अभ्यंतरेऽपि मारणान्तिकं कुर्वन्तोऽपि भवनवासिलोकस्य मूलभागादुपरि देवास्तिर्यञ्चो वा सासादनाः मारणान्तिकं कुर्वन्ति नोधः, सासादनगुणस्थानप्राधान्यादेव।
राजुप्रतरमात्रपृथिवी उपरि नास्ति, देवा अपि सूक्ष्मैकेन्द्रियेषु नोत्पद्यन्ते। न च बादरैकेन्द्रियाः वायुकायिक-व्यतिरिक्ताः पृथिवीमन्तरेण अन्यत्र न तिष्ठन्ति। अंतो सासादनानां मारणान्तिकक्षेत्रं द्वादश चतुर्दशभागोपदेशो न घटते इति चेत्?
नैष दोषः, ईषत्प्राग्भारपृथिवीतः उपरि सासादनानां अप्कायिकेषु मारणान्तिकसंभवात्, तथा एकरज्जुप्रतराभ्यन्तरं सर्वमापूर्य स्थिताष्टमपृथिव्यां तेषां मारणान्तिककरणं प्रति विरोधाभावात् च।
वायुकायिकेषु सासादनाः मारणान्तिकं किं न कुर्वन्ति?
नैतत्, सकलसासादनानां देवानामिव तेजोवायुकायिकयोः मारणान्तिकाभावात्। पृथिवीपरिणामस्वरूप-विमान-तल-शिला-स्थूलतल-स्तंभ-शालभंजिका-भित्ति-तोरणादीनां तदुत्पत्तियोगानां दर्शनाच्च।
उपपादगतसासादनैः देशोना एकादश-चतुर्दशभागाः स्पृष्टाः। तद्यथा-मेरुतलादधः षष्ठीपृथिवीतः पंच रज्जवः, उपरि यावत् आरण-अच्युतकल्पौ इति षड्रज्जवः, आयामो विस्तारश्च एकरज्जुः। एवंप्रकारेणैव उपपादक्षेत्रप्रमाणं। केऽपि आचार्याः ‘‘देवाः नियमेन मूलशरीरं प्रविश्य म्रियन्ते’’ इति भणन्ति, तेषां अभिप्रायेण सासादनोपपादसंबंधिस्पर्शनक्षेत्रं दश चतुर्दशभागा देशोना। एवं व्याख्यानमत्रैव कार्मणशरीर-सासादनोपपादस्पर्शनस्य एकादश चतुर्दशभागा ‘इति प्ररूपकसूत्रेण विरुद्धमिति न गृहीतव्यं। ये पुनः ‘‘देवसासनाः एकेन्द्रियेषु उत्पद्यन्ते’’ इति भणन्ति, तेषामभिप्रायेण द्वादश चतुर्दशभागा देशोना उपपादस्पर्शनं भवति, इदमपि व्याख्यानं सत्प्ररूपणा-द्रव्यानुयोगद्वाराभ्यां सूत्राभ्यां विरुद्धं इति न गृहीतव्यम्१।’’
एवं तृतीयस्थले सासादनानां स्पर्शनकथनत्वेन द्वे सूत्रे गते।


ज्योतिष्क देवों के जितने विमान हैं, उन सभी में प्रत्येक में एक-एक जिनमंदिर हैं-

वे जिनमंदिर कितने हैं ? सो कहते हैं-

गाथार्थ - जगत्प्रतर को दो सौ छप्पन (२५६) अंगुलोें के वर्ग (२५६²२५६·६५५३६) का भाग देने पर ज्योतिषी देवों का प्रमाण प्राप्त होता है। ज्योतिषी देवों के संख्यातभागप्रमाण ज्योतिर्बिम्ब एवं चैत्यालय हैं, जो असंख्यात हैं। उन्हें मैं नमस्कार करता हूँ ।।३०२।

स्वयंभूरमणसमुद्र से आगे ज्योतिष्क देवों के विमान नहीं हैं, किंतु उस समुद्र से आगे पृथिवी का अस्तित्व है। स्वयम्भूरमण समुद्र के आगे भी असंख्यात द्वीप-समुद्रों के व्यास से रुद्ध योजनों से संख्यात हजार गुणे योजन आगे जाकर तिर्यग्लोक की समाप्ति होती है। वहाँ भी राजू के अर्धच्छेद उपलब्ध होते हैं।

ज्योतिष्क देवों के सभी विमान जितने भी हैं, उन सभी को संख्यातघनांगुलों से गुणित करने पर स्वस्थानक्षेत्र होता है। स्वस्थानक्षेत्र को संख्यातरूपों से गुणित करके संख्यात घनांगुलोें से अपवर्तित करने-घटाने पर ज्योतिष्क देवों की राशि प्राप्त होती है। इस देवराशि को ज्योतिष्क देव के शरीर की ऊँचाई से गुणित एवं विमान के अभ्यंतर प्रतरांगुलों से गुणित करने पर ज्योतिष्क स्वस्थानक्षेत्र तिर्यग्लोक का संख्यातवाँ भागमात्र होता है। विशेष रूप से देवों के उत्सेध से गुणित विमानों के अभ्यंतर प्रतरांगुल उत्सेधांगुल हैं, ऐसा समझकर उनके प्रमाणांगुल करना चाहिए।

प्रश्न-ये प्रतरांगुल उत्सेधांगुल हैं, यह कैसे जाना जाता है ?
उत्तर-यदि उन प्रतरांगुलों को उत्सेधांगुल नहीं माना जाएगा तो जम्बूद्वीप के भीतर जम्बूद्वीपस्थ तारागणों के रहने के लिए अवकाश ही नहीं मिल पाएगा। अथवा ये प्रतरांगुल प्रमाणांगुल ही हैं, ऐसा समझना चाहिए।

प्रश्न-फिर ये तारागण जम्बूद्वीप में कैसे समाते हैं ?
उत्तर-ऐसा नहीं कहना, क्योंकि जम्बूद्वीप और लवण समुद्र का आश्रय लेकर ये ज्योतिष्क विमान अवस्थित हैं। इसका अर्थ यह है कि जम्बूद्वीपसम्बन्धी ज्योतिष्कदेवों के विमान जम्बूद्वीप और लवणसमुद्र इन दोनों का आश्रय लेकर रहते हैं। इसलिए ये ज्योतिष्क विमान वहाँ अवकाश प्राप्त करते हैं, ऐसा जानना चाहिए।

सासादन सम्यग्दृष्टि गुणस्थानवर्ती व्यंतरदेवों का स्वस्थानक्षेत्र भी तिर्यग्लोक का संख्यातवां भागमात्र होता है।

प्रश्न-यह बात कैसे जानी जाती है ?
उत्तर-व्यंतरदेवों की राशि को स्थापित करके एक-एक व्यन्तर आवास में संख्यात ही व्यन्तर देव रहते हैं। इसलिए संंख्यातरूपों से व्यंतर देवों की राशि में भाग देने पर व्यंतर देवों के आवासों की संख्या हो जाती है किंतु यह क्रम भवनवासी और सौधर्मादि कल्पवासी देवों के नहीं है, क्योंकि उनमें असंख्यात योजन आयाम वाले संख्यात भवनों और विमानों में असंख्यात देव और देवियाँ रहते हैं।

प्रश्न-कैसे ?
उत्तर-क्योेंकि, ऐसा नहीं मानने से उनकी राशि के असंख्यातपना नहीं बन सकता है पुनः व्यंतरों के आवास क्षेत्र को अपने विमानों के भीतरी संख्यात घनांगुलों से गुणित करने पर सासादनसम्यग्दृष्टि व्यंतरदेवों का स्वस्थानक्षेत्र हो जाता है। उन तीनों ही क्षेत्रों को अर्थात् सासादनसम्यग्दृष्टि तिर्यंचों के स्वस्थान क्षेत्र को, सासादनसम्यग्दृष्टि ज्योतिषी देवों के स्वस्थानक्षेत्र को और सासादनसम्यग्दृष्टि व्यंतर देवों के स्वस्थान क्षेत्र को इकट्ठे मिलाने पर तिर्यग्लोक का संख्यातवाँ भाग होता है। विहारवत्स्वस्थान, वेदनासमुद्घात, कषायसमुद्घात और वैक्रियिकसमुद्घातगत सासादनसम्यग्दृष्टि जीवों ने लोकनाली के चौदह भागों में से देशोन आठ भागप्रमाण क्षेत्र को स्पर्श किया है।

शंका-यहाँ देशोन से तात्पर्य कितने प्रमाण क्षेत्र से न्यून है ?

समाधान-तीसरी पृथिवी के नीचे के एक हजार योजनप्रमाण क्षेत्र से न्यून क्षेत्र देशोन से अभीष्ट है। मारणान्तिकसमुद्घातगत, सासादनसम्यग्दृष्टियों ने लोकनाली के चौदह राजुओं में से देशोन बारह भागप्रमाण क्षेत्र को स्पर्श किया है। वह इस प्रकार से जानना चाहिए-सुमेरूपर्वत के मूलभाग से लेकर ऊपर ईषत्प्राग्भार पृथिवी तक सात राजू होते हैं और नीचे छठी पृथिवी तक पाँच राजु होते हैं। इन दोनों को मिला देने पर सासादनसम्यग्दृष्टि जीवों के मारणान्तिक क्षेत्र की लम्बाई हो जाती है। विशेष बात यह है कि छठी पृथिवी के नीचे के एक हजार योजन से न्यून क्षेत्र कहना चाहिए।

‘सासादनसम्यग्दृष्टि जीव एकेन्द्रियों में नहीं उत्पन्न होते हैं इसलिए उनके दो गुणस्थान नहीं होते हैं किन्तु वे सासादनसम्यग्दृष्टि मारणान्तिक समुद्घात को एकेन्द्रियों में करते हैं, यह हमारा निश्चय है, ऐसा जानना चाहिए क्योंकि छिन्न हुई आयु के काल में उनमें सासादन गुणस्थान नहीं जानना चाहिए।

यहाँ विशेष बात यह है कि सप्तम नरक पृथिवी के नारकी सासादन गुणस्थान के साथ देवों के समान मारणान्तिक समुद्घात नहीं करते हैं।

शंका-सासादनसम्यग्दृष्टि देव, जबकि एकेन्द्रियों मेें मारणान्तिकसमुद्घात करते हुए पाये जाते हैं, तो फिर सर्व लोकवर्ती एकेन्द्रियों में क्यों नहीं मारणान्तिक समुद्घात करते हैं?

समाधान-नहीं, क्योंकि उनके सासादनगुणस्थान की प्रधानता से लोक नाली के बाहर उत्पन्न होने के स्वभाव का अभाव है और लोकनाली के भीतर मारणान्तिक समुद्घात को करते हुए भी भवनवासी लोक के मूलभाग से ऊपर ही देव या तिर्यंच सासादनसम्यग्दृष्टि जीव मारणान्तिक समुद्घात को करते हैं, उससे नीचे नहीं, क्योंकि ऐसा वे सासादन गुणस्थान की प्रधानता से ही करते हैं।

शंका-राजुप्रतरप्रमाण पृथिवी ऊपर नहीं है, देव भी सूक्ष्म एकेन्द्रिय जीवों में नहीं उत्पन्न होते हैं और वायुकायिक जीवों को छोड़कर शेष बादर एकेन्द्रिय जीव पृथिवी के बिना अन्यत्र रहते नहीं हैं इसलिए सासादन- सम्यग्दृष्टि जीवों के मारणान्तिक क्षेत्र का बारह बटे चौदह (१२/१४) भाग का उपदेश घटित नहीं होता है?

समाधान-यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि ईषत्प्राग्भार पृथिवी से ऊपर सासादनसम्यग्दृष्टियों का अप्कायिक जीवों में मारणान्तिक समुद्घात संभव है तथा एक राजुप्रतर के भीतर सर्वक्षेत्र को व्याप्त करके स्थित आठवीं पृथिवी में उन जीवों के मारणान्तिक समुद्घात करने के प्रति कोई विरोध भी नहीं है।

शंका-वायुकायिक जीवों में सासादनसम्यग्दृष्टि जीव मारणान्तिक समुद्घात को क्यों नहीं करते हैं?

समाधान-नहीं, क्योंकि सकल सासादनसम्यग्दृष्टि जीवों का देवों के समान तैजसकायिक और वायुकायिक जीवों में मारणान्तिक समुद्घात का अभाव माना गया है और पृथिवी के परिणमनस्वरूप विमान, शय्या, शिला, स्तंभ, स्थूल, तलभाग तथा खड़ी हुई शालभंजिका, (पुतली) भित्ति और तोरणादिक उनकी उत्पत्ति का योग देखा जाता है। उपपादगत सासादन सम्यगदृष्टि जीवों ने लोक के कुछ कम ग्यारह बटे चौदह भाग (११/१४) स्पर्श किये हैं, वह इस प्रकार है-मेरुतल से नीचे छठी पृथिवी तक पाँच राजु होते हैं, ऊपर आरण-अच्युतकल्प तक छह राजु होते हैं तथा इसका आयाम और विस्तार एक राजु है, इस प्रकार कुछ कम ग्यारह राजु उपपाद क्षेत्र का प्रमाण है। कितने ही आचार्य ऐसा कहते हैं कि देव नियम से मूल शरीर में प्रवेश करके ही मरते हैं। उनके अभिप्राय से सासादनगुणस्थानवर्ती उपपादसंबंधी स्पर्शनक्षेत्र कुछ कम दस बटे चौदह भाग (१०/१४) प्रमाण होता है किन्तु यह व्याख्यान यहीं पर विग्रहगति को प्राप्त कार्मणशरीर वाले सासादनसम्यग्दृष्टि जीवों के उपपाद-स्पर्शन के ग्यारह बटे चौदह (११/१४) भाग के प्ररूपक सूत्र के साथ विरोध को प्राप्त होता है, इसलिए उसे नहीं ग्रहण करना चाहिए और जो ऐसा कहते हैं कि सासादनसम्यग्दृष्टि देव एकेन्द्रियों में उत्पन्न होते हैं, उनके अभिप्राय से कुछ कम बारह बटे चौदह (१२/१४) भाग उपपाद का स्पर्शन होता है किन्तु यह भी व्याख्यान सत्प्ररूपणा और द्रव्यानुयोगद्वार के सूत्रों के विरुद्ध पड़ता है, इसलिए उसे नहीं ग्रहण करना चाहिए।

इस प्रकार तृतीय स्थल में सासादनसम्यग्दृष्टि जीवों के स्पर्शन का कथन करने वाले दो सूत्र पूर्ण हुए।


संप्रति सम्यग्मिथ्यादृष्टि-असंयतसम्यग्दृष्टि-स्पर्शनप्ररूपणाय सूत्रमवतरति-

सम्मामिच्छाइट्ठि-असंजदसम्माइट्ठीहि केवडियं खेत्तं फोसिदं? लोगस्स असंखेज्जदिभागो।।५।।

सूत्रस्यार्थः सुगमः।
इदानीं अनयोरेव क्षेत्रस्य स्पर्शनप्ररूपणाय सूत्रमवतरति-
अट्ठ चोद्दसभागा वा देसूणा।।६।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-अर्थः सुगमः। सम्यग्मिथ्यादृष्टिजीवानां क्षेत्रवत्स्पर्शनं प्रायेण। असंयतसम्यग्दृष्टिभिः स्वस्थानेन त्रिलोकानामसंख्यातभागः, सार्धद्वयद्वीपादसंख्यातगुणः स्पृष्टः तिर्यग्लोकस्य संख्यातभागश्च। तिर्यग्लोकस्य संख्यातभागक्षेत्रोत्पादने सासादनभंगो ज्ञातव्यः। विहारवत्स्वस्थान-वेदना-कषाय-वैक्रियिक-मारणान्तिकसमुद्घातगतैः अष्ट चतुर्दशभागा देशोना स्पृष्टाः, उपरि षड्रज्जवः, अधो द्वौ रज्जू इति। उपपादगतैः षट् चतुर्दशभागा देशोनाः स्पृष्टाः, अधः असंयतसम्यग्दृष्टीनां उपपादक्षेत्रानुपलम्भात्।
तात्पर्यमेतत्-यथा सीताचरेण अच्युतस्वर्गस्य प्रतीन्द्रेण षोडशस्वर्गस्य षड्रज्जुभ्यः अधः आगत्य तृतीयनरके द्विरज्जुपर्यंतं गत्वा लक्ष्मणचर-रावणचरौ नारकौ संबोधितौ। एतद्विहारवत्स्वस्थानेन स्पर्शो भवति।
तथैव असंयतसम्यग्दृष्टीनां उपपादक्षेत्रस्पर्शनं चतुर्दशरज्जुभ्यः षडेव रज्जवः, प्रथमनरकस्योपरिभागं विहाय अधः उत्पादाभावात्, श्रेणिकराज्ञः इव।
एवं चतुर्थस्थले मिश्र-असंयतसम्यग्दृष्टिस्पर्शननिरूपणत्वेन सूत्रद्वयं गतम्।
संयतासंयतानां स्पर्शनप्रतिपादनाय सूत्रमवतरति-
संजदासंजदेहि केवडियं खेत्तं फोसिदं? लोगस्स असंखेज्जदिभागो।।७।।
सूत्रं सुगममेत्।
एषामेव रज्जुप्रमाणनिर्णयाय सूत्रावतारो भवति-
छ चोद्दसभागा वा देसूणा।।८।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-पूर्वं क्षेत्रप्ररूपणायां वर्तमानकालविशिष्टक्षेत्रं प्ररूपितं, इदानीं तु अतीतकालसंबंधीदं सूत्रमिति अवगम्यते। अनागतकालसंबंधि न भवति, तेन व्यवहाराभावात्। अथवा अतीतानागतकालविशिष्ट-क्षेत्राणां प्ररूपकानि प्राक्तनसर्वसूत्राणीति निश्चयः कर्तव्यः, उभयत्र विशेषाभावात्।
इदानीं संयतासंयतानां स्वस्थानस्वस्थानक्षेत्रस्य स्पर्शनं उच्यते-
स्वयंभूरमणसमुद्रविष्कम्भः द्वयोः पाश्र्वयोः सातिरेकमद्र्धरज्जुप्रमाणं भवति। स्वयंप्रभपर्वतपरभागक्षेत्रमपि द्वयोः पाश्र्वयोः एकरज्जु-अष्टमभागमात्रविष्कम्भो भवति। तौ द्वौ अपि परिमाणौ मेलिते एकरज्जोः अष्टभागेभ्यः पंचभागा भवन्ति। एते पंच भागाः रज्जुविष्कम्भेभ्यः अपनीते त्रयो अष्टभागा भवन्ति। एतस्मिन् त्रिषु अष्टभागे क्षेत्रे सूर्यमण्डलाकारेण संस्थिते भोगभूमिप्रतिभागे संयतासंयताः न सन्ति। किन्तु बाह्येषु पंचसु अष्टभागेषु, सार्धद्वयद्वीपेषु द्वयोः समुद्रयोः च सन्ति, कर्मभूमित्वात्। ‘‘व्यासार्धकृतित्रिकं समस्तफलमिति’’ एतेन करणसूत्रेण मध्यवर्ति-जघन्य-भोगभूमि-प्रतिबद्धक्षेत्रफलमानीते षोडश सप्तविंशतिभागाभ्यधिक-चतुःषष्ट्युत्तरचतुशतरूपैः जगत्प्रतरे भागे हृते एकभागः आगच्छति। तं रज्जुप्रतरात् अपनीय संख्यातांगुलैः गुणिते संयतासंयतस्वस्थानक्षेत्रं तिर्यग्लोकस्य संख्यातभागमात्रं भवति।
शेषपदानां क्षेत्रमानीयमाने एकं जगत्प्रतरं स्थापयित्वा संख्यातसूच्यंगुलैः संयतासंयतोत्सेधस्य एकोनपंचाशद्भागमात्रैः गुणिते तिर्यग्लोकस्य संख्यातभागमात्रक्षेत्रं भवति।
मानुषोत्तरपर्वतपरभागवर्तिषु स्वयंप्रभाचलपूर्वभागवर्तिषु च शेषद्वीपसमुद्रेषु संयतासंयतजीवानां कथं संभवः?
नैतत् वक्तव्यं, पूर्ववैरिदेवैः तत्र गृहीतानां तिर्यक्संयतासंयतानां संभवं प्रति विरोधाभावात्१।
एषोऽर्थः सूत्रेण अकथितः कथमवगम्यते?
नैष दोषः, सूत्रस्थितेन ‘वाशब्देन’ अनुक्तसमुच्चयार्थेन सूचितत्वात्।
मारणान्तिकसमुद्घातगतैः षट् चतुर्दशभागा देशोनाः स्पृष्टाः।
कुतः?
सर्वत्र लोकनाल्याः अभ्यन्तरे स्थित्वा मारणान्तिककरणं प्रति विरोधाभावात्।
केन ऊनाः षट् चतुर्दशभागाः?
चित्रा पृथिवीसंबंधि-अधः योजनसहस्रेण आरण-अच्युतविमानानामुपरिमभागेन च न्यूनाः इति ज्ञातव्याः।
एवं पंचमस्थले संयतासंयतानां स्पर्शनप्रतिपादनत्वेन सूत्रद्वयं गतम्।
इतो विस्तरः-
संप्रति मानुषक्षेत्रस्य तिर्यग्लोकस्य च किंचित् निरूपणं क्रियते-
मंदरपर्वतमूलादेकलक्षयोजनोपरिपर्यंत-एकरज्जुविष्कंभ-आयतक्षेत्रेषु मध्यलोकः तिर्यक्त्रसलोको वा कथ्यते। एषु तिर्यग्लोकेषु असंख्यातद्वीपसमुद्राः सन्ति। पंचविंशतिकोटिकोटि-उद्धारपल्यानां रोमप्रमाणाः द्वीपसमुद्राः, तेषु क्रमशः अर्धसंख्या द्वीपानां अर्धसमुद्राणां च। सर्वद्वीपाः समुद्राश्चासंख्याताः समवृत्ताः सन्ति। अत्र प्रथमो जंबूद्वीपः अंतिमः स्वयंभूरमणसमुद्रः मध्ये द्वीपसमुद्राश्च। चित्रापृथिव्याः उपरि बहुमध्यभागे एकरज्जुविष्कंभ-एकरज्जुआयतक्षेत्रस्याभ्यन्तरे एकैकं समंतात् वेष्टयित्वा द्वीपसमुद्राः स्थिताः। सर्वेऽपि समुद्राः चित्रापृथिवीं खण्डयित्वा वङ्काापृथिव्याः उपरि, सर्वे द्वीपाश्च चित्रापृथिव्या उपरि सन्ति।
सर्वद्वीपानामाद्ये जंबूद्वीपः, एकलक्षयोजनविस्तृतः। ततः परे आ समंतात् द्वीपं वेष्टयित्वा लवणसमुद्रः द्विलक्षयोजनविस्तृतः। ततः परे समुद्रं वेष्टयित्वा धातकीखण्डद्वीपः अस्य विष्कंभः चतुर्लक्षयोजनः। ततः परे कालोदधिनाम समुद्रः अष्टलक्षयोजनविस्तृतः। ततः परे पुष्करवरद्वीपः षोडशलक्षयोजनविष्कंभः। अस्य द्वीपस्य बहुमध्यभागे वलयाकारः मानुषोत्तरपर्वतो विद्यते, अतोऽस्य द्वीपस्य मानुषोत्तरपर्वतात् इत: अभ्यंतरे पुष्करार्ध संज्ञास्ति, एतन्मानुषोत्तरपर्वतपर्यंतं मानुषक्षेत्रमुच्यते। इदं पञ्चचत्वािंरशल्लक्षयोजनविस्तृतं अस्ति। तद्यथा-
जंबूद्वीप एकलक्षयोजनः, लवणसमुद्रः द्विलक्षयोजनः, सर्वतः जंबूद्वीपस्यास्ति अतः एतयोः द्वीपसमुद्रयोः बाह्यसूचीव्यासः पंचलक्षयोजनः। पुनः धातकीखण्डस्य उभयतः चतुर्लक्षयोजनयोः बाह्यसूचीव्यासः त्रयोदशलक्षयोजनः। ततः कालोदधिः अष्टलक्षप्रमाणं, उभयतः अस्य बाह्यसूचीव्यासः एकोनत्रिंशत्-लक्षयोजनप्रमाणं। ततः परे मानुषोत्तरपर्यंतं पुष्करार्धस्य अष्टाष्टलक्षाणि मिलित्वा बाह्यसूचीव्यासः पंचचत्वारिंशल्लक्ष-योजनप्रमाणमस्ति। इदं एव मानुषक्षेत्रं सार्धद्वयद्वीपःअस्ति। एषु मध्ये द्वौ समुद्रौ स्तः।
मानुषोत्तर पर्वताद्बहि: पुष्करार्धस्य परे पुष्करवरसमुद्रः। ततः परे वारुणीवरद्वीपः, ततः परे वारुणीवरसमुद्रः। एवमेव क्रमशः क्षीरवरद्वीपः, क्षीरवरसमुद्रः, घृतवरद्वीपः, घृतवरसमुद्रः, क्षौद्रवरद्वीपः, क्षौद्रवरसमुद्रः, नन्दीश्वरद्वीपः, नंदीश्वर समुद्रः। अस्मिन् अष्टमे नंदीश्वरद्वीपे द्वापञ्चाशदकृत्रिमजिनालयाः सन्ति। तेषां पूजनार्थं प्रत्येकं वर्षे त्रीणि वाराणि नंदीश्वरपर्वाणि आगच्छन्ति।
ततः परे अरुणवरद्वीपः, अरुणवरसमुद्रः, अरुणाभासद्वीपः, अरुणाभाससमुद्रः, कुण्डलवरद्वीपः, कुण्डलवरसमुद्रः, शंखवरद्वीपः, शंखवरसमुद्रः, रुचकवरद्वीपः, रुचकवरसमुद्रः। अनयोः एकादश-त्रयोदशद्वीपयोः बहुमध्यभागे कुंडलवर-रुचकवर नामपर्वते स्तः। द्वयोः उपरि चतुश्चतुर्जिनालयाः सन्ति। अस्मात् त्रयोदशद्वीपाद्बहिर्जिनालयाः न सन्ति।
पुनः भुजगवरद्वीपः, भुजगवरसमुद्रः, कुशवरद्वीपः, कुशवरसमुद्रः, क्रौंचवरद्वीपः, क्रौंचवरसमुद्रश्च। इमे जंबूद्वीपादिषोडशद्वीपाः, लवणसमुद्रादिषोडशसमुद्राः, एतानि द्वात्रिंशद्नामान्येव आगमे दृश्यन्ते१।


अब सम्यग्मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि जीवों का स्पर्शन बतलाने हेतु सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

सम्यग्मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि जीवों ने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है? लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पर्श किया है।।५।।

सूत्र का अर्थ सुगम है।

अब उपर्युक्त दोनों गुणस्थानवर्ती जीवों के क्षेत्र का स्पर्शन बताने हेतु सूत्र प्रगट होता है-'

सूत्रार्थ-

सम्यग्मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि जीवों ने अतीतकाल की अपेक्षा कुछ कम आठ बटे चौदह भाग स्पर्श किए हैं।।६।।

हिन्दी टीका-सूत्र का अर्थ सरल है। सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीवों का जितना क्षेत्र है, प्राय: उतना ही यहाँ स्पर्शन ग्रहण किया गया है। असंयतसम्यग्दृष्टि जीवों के द्वारा स्वस्थान की अपेक्षा तीनों लोकों का असंख्यातवाँ भाग, ढाई द्वीप से असंख्यातगुणा तथा तिर्यग्लोक का संख्यातवाँ भाग स्पर्श किया गया है। तिर्यग्लोक के संख्यातवें भागप्रमाण क्षेत्र के उत्पादन में सासादन के समान भंग जानना चाहिए। विहारवत्स्वस्थान, वेदनासमुद्घात, कषायसमुद्घात, वैक्रियिकसमुद्घात और मारणान्तिकसमुद्घात को प्राप्त जीवों ने देशोन-कुछ कम ८/१४ भाग का स्पर्श किया है अर्थात् ऊपर छह राजू और नीचे दो राजू का क्षेत्र स्पर्श किया है, ऐसा अभिप्राय है। उपपाद पद को प्राप्त जीवों ने कुछ कम ६/१४ भाग स्पर्श किये हैं, क्योंकि नीचे अर्थात् प्रथम नरक के ऊपरी भाग को छोड़कर नीचे असंयतसम्यग्दृष्टि जीवों का उपपादक्षेत्र नहीं पाया जाता है।

तात्पर्य यह है कि जैसे सीताचर जीव ने अच्युतस्वर्ग के प्रतीन्द्र की पर्याय में सोलहवें स्वर्ग से छह राजू नीचे आकर तीसरे नरक में दो राजूपर्यन्त जाकर अर्थात् कुल आठ राजू जाकर लक्ष्मणचर एवं रावणचर के नारकी जीवों को सम्बोधित किया। यह विहारवत्स्वस्थान के द्वारा स्पर्श करने का उदाहरण है।

इसी प्रकार असंयतसम्यग्दृष्टि जीवों का उपपादक्षेत्रस्पर्शन चौदह राजू से छह राजू ही प्रथम नरक के ऊपर के भाग को छोड़कर नीचे उत्पाद का अभाव है, श्रेणिक राजा के समान।

विशेषार्थ-जैसे राजा श्रेणिक ने पहले सप्तम नरक की तेंतीससागरप्रमाण आयु का बंध कर लिया था पुन: भगवान महावीर के समवसरण में परिणामों की विशेष शुद्धि करके क्षायिक सम्यक्त्व के साथ-साथ तीर्थंकर नामकर्म की प्रकृति का भी बंध कर लिया था अत: अविरतसम्यग्दृष्टि के रूप में उन्होंने सप्तम नरक की आयु को घटाकर प्रथम नरक की मध्यम आयु (८४ हजार वर्ष) में जन्म धारण कर लिया, क्योंकि सम्यग्दर्शन के साथ नरकायु का बंध करने वाला जीव प्रथम नरक से नीचे नहीं जा सकता है। ये राजा श्रेणिक अपनी नरक आयु को पूर्ण करके आगामी चतुर्थकाल में जम्बूद्वीप के भरतक्षेत्र के प्रथम तीर्थंकर ‘‘महापद्म’’ तीर्थंकर के रूप में जन्म धारण करेंगे।

यहाँ यह विशेष जानना है कि उपपाद की अपेक्षा जो छह बटे चौदह (६/१४) राजू का प्रमाण कहा है यह उसका उदाहरण है। आगे ८/१४ राजू के प्रमाण में सीता के जीव प्रतीन्द्र का उदाहरण दिया गया है।

अच्युत स्वर्ग के प्रतीन्द्र के रूप में सीता के जीव द्वारा तृतीय नरक में लक्ष्मण और रावण के जीव को सम्बोधित करने की बात स्पर्शन के प्रसंग में कही है कि सोलहवें स्वर्ग से छह राजू नीचे आकर तीसरे नरक में दो राजूपर्यंत क्षेत्र तक जाकर उसने स्पर्श किया। पद्मपुराण के एक सौ तेइसवें पर्व में यह वर्णन आया है-

अथ संस्मृत्य सीतेन्द्रो, लक्ष्मीधरगुणार्णवम्।

प्रतिबोधयितुं वाञ्छन्, प्रतस्थे बालुकाप्रभाम्।।१।।
मानुषोत्तर समुल्लंघ्य, गिरिं मत्र्यसुदुर्गमम्।
रत्नप्रभामतिक्रम्य, शर्करां चापि मेदिनीम्।।२।।

अर्थात् सीतेन्द्र, लक्ष्मण के गुणरूपी सागर का स्मरण कर उसे सम्बोधन करने की इच्छा से बालुकाप्रभा पृथिवी (तृतीयनरक) की ओर चला पुन: मनुष्यों के लिए अत्यन्त दुर्गम मानुषोत्तर पर्वत को लांघकर तथा क्रम से नीचे रत्नप्रभा और शर्वâराप्रभा की भूमि को भी उल्लंघन कर वह तीसरी बालुकाप्रभा भूमि में पहुँचा। वहाँ पहुँचकर उसने नारकियों की अत्यंत घृणित कष्ट की अधिकता से दु:सह एवं पाप कर्म से उत्पन्न अवस्था देखी। वहीं पर सीतेन्द्र ने भयंकर नेत्र वाले रावण के नारकी जीव को देखा, जिसे शम्बूक का जीव असुर- कुमार देव लक्ष्मण के विरुद्ध प्रेरणा दे रहा था। वहाँ सीतेन्द्र ने रावण और लक्ष्मण दोनों को सम्बोधन देकर सम्यक्त्व ग्रहण कराया। तत्त्वार्थवार्तिक ग्रंथ में स्पर्शन का वर्णन करते हुए आचार्य श्री अकलंकदेव ने लिखा है-

‘‘अवस्थाविशेषो विचित्र: त्र्यस्रचतुरस्रादि:, तस्य त्रिकालविषयमुपश्लेषणं स्पर्शनम्। कस्यचित्तत्क्षेत्र- मेव स्पर्शनम्, कस्यचिद् द्रव्यमेव, कस्यचिद् रज्जव: षडष्टौ वेति एकसर्वजीवसन्निधौ, तन्निश्चयार्थं तदुच्यते।’’

अर्थात् अवस्थाविशेष की विचित्रता होने से त्रिकालविषय के उपश्लेष (स्पर्श) का निर्णय करने के लिए स्पर्शन कहा है।................किसी मानव, देवादि का छह राजू, आठ राजू आदि स्पर्श है। एक जीव और सर्व जीवों की सन्निधि में उसका निश्चय करने के लिए कहा जाता है। जैसे-कोई जीव इस लोक में तप करके अच्युतकल्प में उत्पन्न हुआ, वहाँ से च्युत होकर पुन: इस लोक में उत्पन्न हुआ, उस जीव का गमनागमन छह राजू हुआ। सोलहवें स्वर्ग का जीव तीसरे नरक तक गमन करने गया, वह विहार की अपेक्षा स्पर्श आठ राजू हुआ। इसी बात को तत्त्वार्थवृत्ति की टीका में श्रीश्रुतसागर सूरि ने कहा है-

‘‘सम्यग्मिथ्यादृष्ट्यसंयतसम्यग्दृष्टिभिर्लोकस्यासंख्येयभाग: अष्टौ चतुर्दशभागा वा देशोना: स्पृष्टा:।’’

अर्थात् सम्यग्मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि देवों के द्वारा लोक के असंख्यातवें भाग क्षेत्र का तथा त्रसनाली के चौदह भागों में से कुछ कम आठ भाग का स्पर्श होता है। यह स्पर्श भी विहारवत्स्वस्थान, वेदना, कषाय, वैक्रियिक और मारणांतिक समुद्घात की अपेक्षा जानना चाहिए परन्तु तीसरे गुणस्थान में समुद्घात नहीं होता है।

यहाँ इन उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि सोलहवें स्वर्ग के इन्द्र या देवों का तृतीय नरक में जाकर नारकियों को सम्बोधित करना आगमसम्मत सिद्ध है।

इस प्रकार चतुर्थ स्थल में मिश्र गुणस्थानवर्ती एवं असंयतसम्यग्दृष्टि जीवों का स्पर्शन बताने वाले दो सूत्र पूर्ण हुए।

अब संयतासंयत जीवों के स्पर्शन का प्रतिपादन करने हेतु सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

संयतासंयत जीवों ने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है? लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पर्श किया है।।७।।

इस सूत्र का अर्थ सुगम है अर्थात् इन सभी की स्पर्शनप्ररूपणा पूर्वोक्त इन्हीं की क्षेत्रप्ररूपणा के सदृश ही है।

अब उपर्युक्त प्रकार के जीवों का ही रज्जूप्रमाण निर्णय करने हेतु सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

संयतासंयत जीवों ने अतीतकाल की अपेक्षा कुछ कम छह बटे चौदह भाग स्पर्श किए हैं।।८।।

हिन्दी टीका-पूर्व में क्षेत्रप्ररूपणा में वर्तमानकाल विशिष्ट क्षेत्र का प्ररूपण किया जा चुका है, इसलिए यह सूत्र अतीतकालसंबंधी है, यह बात जानी जाती है किन्तु यह अनागत (भविष्यत) कालसंबंधी नहीं है, क्योंकि उसके साथ व्यवहार का अभाव है। अथवा, पीछे के सभी सूत्र अतीत और अनागतकाल विशिष्ट क्षेत्रों की प्ररूपणा करने वाले हैं, ऐसा निश्चय करना चाहिए, क्योंकि भूतकाल और भविष्यकाल में स्पर्शन की अपेक्षा कोई विशेषता नहीं है।

अब संयतासंयत जीवों के स्वस्थानस्वस्थान क्षेत्र का स्पर्शन कहते हैं-स्वयम्भूरमणसमुद्र का विष्कम्भ दोनों ही पाश्र्वभागों की अपेक्षा कुछ अधिक आधा राजू प्रमाण है। स्वयंप्रभपर्वत का परभागवर्ती क्षेत्र भी दोनों ही पाश्र्वभागों की अपेक्षा एक राजु के अष्टम भागमात्र विष्कम्भ वाला है। ये दोनों ही विष्कम्भ मिला देने पर एक राजु के आठ भागों में से पाँच भाग प्रमाण (५/८) क्षेत्र हो जाता है। ये पाँच बटे आठ (५/८) भाग राजु के विष्कम्भ में से निकाल देने पर तीन बटे आठ (३/८) भाग अवशिष्ट रहते हैं। इस तीन बटे आठ (३/८) भाग वाले सूर्यमण्डल के आकार से संस्थित और भोगभूमि से प्रतिबद्ध क्षेत्र में संयतासंयत जीव नहीं होते हैंं किन्तु बाहरी पाँच बटे आठ (५/८) भागों में जम्बूद्वीप, धातकीखण्ड और पुष्करार्ध इन अढ़ाई द्वीपों में और लवणोदधि वा कालोदधि इन दो समुद्रों में संयतासंयत जीव रहते हैं, क्योंकि वहाँ पर कर्मभूमि है। ‘व्यास के आधे का वर्ग करके उसका तिगुना कर देने से विवक्षित क्षेत्र का समस्त क्षेत्रफल निकल आता है’ इस करण सूत्र से मध्यवर्ती अर्थात् जघन्य भोगभूमि प्रतिबद्ध क्षेत्र का क्षेत्रफल निकालने पर जो प्रमाण आता है, वह सोलह बटे सत्ताईस भाग से अधिक चार सौ चौंसठ रूपों से जगत् प्रतर में भाग देने पर उपलब्ध एक भाग के बराबर होता है।

इस एक भाग को राजु प्रतर में से निकालकर संख्यात अंगुलों से गुणा करने पर तिर्यग्लोक के संख्यातवें भाग प्रमाण संयतासंयतों का स्वस्थान क्षेत्र हो जाता है। विहारवत्स्वस्थानादि शेष पदों का क्षेत्र निकालने पर एक जगत्प्रतर को स्थापित करके संयतासंयत जीवों के शरीर की ऊँचाई के उनंचास भागमात्र संख्यात सूच्यंगुलों से गुणा करने पर तिर्यग्लोक के संख्यातवें भागमात्र क्षेत्र होता है।

शंका-मानुषोत्तर पर्वत से परभागवर्ती और स्वयंप्रभाचल से पूर्वभागवर्ती शेष द्वीप-समुद्रों में संयतासंयत जीवों की संभावना कैसे है?

समाधान-ऐसा नहीं कहना चाहिए, क्योंकि पूर्वभव के बैरी देवों के द्वारा वहाँ ले जाये गये तिर्यंच संयतासंयत जीवों की संभावना की अपेक्षा कोई विरोध नहीं है।

शंका-सूत्र में नहीं कहा गया यह अर्थ कैसे जाना जाता है?

समाधान-यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि सूत्र में स्थित और अनुक्त का अर्थात् नहीं कहे गये अर्थ का समुच्चय करने वाले ‘‘वा’’ शब्द से उक्त अकथित अर्थ सूचित किया गया है। मारणान्तिक समुद्घातगत संयतासंयत जीवों ने कुछ कम छह बटे चौदह (६/१४) भाग स्पर्श किये हैं।

क्यों? क्योंकि लोक नाली के भीतर सर्वत्र रहकर मारणान्तिकसमुद्घात करने के प्रति कोई विरोध नहीं है।

प्रश्न-छह बटे चौदह (६/१४) भाग में जो ‘‘ऊन’’ शब्द है वह किस क्षेत्र से कम है?
उत्तर-चित्रा पृथिवीसंबंधी नीचे के एक हजार योजन से और आरण-अच्युत विमानों के उपरिम भाग से न्यून-कम किया जाता है, ऐसा जानना चाहिए।

इस प्रकार पंचमस्थल में संयतासंयत जीवों का स्पर्शन बतलाने वाले दो सूत्र पूर्ण हुए।

यहाँ अब विस्तारपूर्वक कथन करते हैं-

अब यहाँ मनुष्यक्षेत्र एवं तिर्यग्लोक का किंचित् निरूपण किया जा रहा है-

मंदरपर्वत-सुमेरुपर्वत के मूल से एक लाख योजन ऊपर जाकर एक राजु लम्बे-चौड़े क्षेत्र में मध्यलोक अथवा तिर्यक् त्रसलोक स्थित है ऐसा कहा गया है। इस तिर्यग्लोक में असंख्यात द्वीप-समुद्र है। पच्चीस कोड़ाकोड़ी उद्धार पल्यों के रोमप्रमाण द्वीप और समुद्रों की संख्या है। इनमें आधी संख्या क्रमश: द्वीपों की और आधी संख्या समुद्रों की है। सभी द्वीप-समुद्र असंख्यात एवं समवृत्त-गोल हैं। उनमें प्रथम जम्बूद्वीप है, अंतिम स्वयंभूरमण समुद्र है और मध्य में द्वीप-समुद्र हैं। चित्रा पृथिवी के ऊपर बहुमध्य भाग में एक राजु विस्तृत और एक राजु लम्बे क्षेत्र के अभ्यन्तर में एक-एक को चारों ओर घेरे हुए द्वीप व समुद्र स्थित हैं। सभी समुद्र चित्रा पृथिवी को खण्डित करके वङ्काा पृथिवी के ऊपर और सब द्वीप चित्रा पृथिवी के ऊपर स्थित हैं।

उन सब द्वीपों के आदि में जम्बूद्वीप एक लाख योजन विस्तृत है, उससे आगे चारों ओर से द्वीप को वेष्टित करके लवणसमुद्र है जो कि दो लाख योजन विस्तार वाला है। उससे आगे लवण समुद्र को वेष्टित करके धातकीखंड द्वीप है, इसका विस्तार चार लाख योजन है। उसके आगे कालोदधि समुद्र आठ लाख योजन विस्तृत है। उसके बाद सोलह लाख योजन विस्तार वाला पुष्करवरद्वीप है। इस द्वीप के ठीक मध्यभाग में चूड़ी के आकार वाला गोल मानुषोत्तर पर्वत पाया जाता है, इसलिए इस द्वीप के मानुषोत्तर पर्वत के अभ्यन्तर का भाग पुष्करार्धद्वीप के नाम से जाना जाता है। इस मानुषोत्तर पर्वत तक मनुष्य क्षेत्र होता है, यह पैंतालीस लाख योजन वाला है। इसका विस्तृत कथन इस प्रकार है-

जम्बूद्वीप एक लाख योजन वाला है, लवण समुद्र दो लाख योजन है, जम्बूद्वीप का और समुद्र के दोनों तरफ का बाह्य सूची व्यास पाँच लाख योजन है। उसके आगे धातकीखण्ड का दोनों तरफ का ४-४ लाख योजन मिलाने से इनका बाह्यसूची व्यास तेरह लाख योजन है। उससे आगे कालोदधि समुद्र आठ लाख योजन है, इसका दोनों ओर से बाह्यसूचीव्यास उनतीस लाख योजनप्रमाण है। उससे आगे मानुषोत्तरपर्यन्त आठ-आठ लाख योजन मिलकर पुष्करार्ध द्वीप पर्यन्त बाह्यसूचीव्यास पैंतालीस लाख योजनप्रमाण है। यही मनुष्यक्षेत्र वाला ढाईद्वीप है। इन ढाईद्वीपों के मध्य में दो समुद्र होते हैं। मानुषोत्तर पर्वत के बाहर पुष्करार्ध द्वीप के आगे पुष्करवरसमुद्र है। उससे आगे चौथा वारुणीवर द्वीप है, पुन: उसे घेरकर वारुणीवर समुद्र है। इसी प्रकार आगे क्रम से पांचवाँ क्षीरवर द्वीप और क्षीरवर समुद्र है, छठा घृतवर द्वीप और घृतवर समुद्र है, सातवां क्षौद्रवर द्वीप और क्षौद्रवर समुद्र है, आठवां नंदीश्वर द्वीप और नंदीश्वर समुद्र है। इस आठवें नंदीश्वर द्वीप में बावन अकृत्रिम जिनमंदिर हैं, उनकी (उनमें विराजमान स्वयंसिद्ध जिनप्रतिमाओं की) पूजा करने के लिए प्रत्येक वर्ष में तीन बार-कार्तिक, फाल्गुन और आषाढ़मास में नंदीश्वर पर्व-आष्टान्हिक पर्व आते हैं। इस आठवें द्वीप-समुद्र के बाद नवमां अरुणवर द्वीप और अरुणवर समुद्र है, दशवाँ अरुणाभास द्वीप और अरुणाभास समुद्र है, ग्यारहवाँ कुण्डलवर द्वीप और कुण्डलवर समुद्र है, बारहवाँ शंखवर द्वीप और शंखवर समुद्र है, तेरहवाँ रुचकवर द्वीप और रुचकवर समुद्र है। इन ग्यारहवें और तेरहवें दोनों द्वीपों के बीचों बीच में वलयाकार अपने-अपने द्वीप वाले नाम के कुण्डलवर और रुचकवर पर्वत हैं। उन दोनों पर्वतों पर चारों दिशाओं में चार-चार जिनालय हैं। इस तेरहवें द्वीप से बाहर कोई जिनालय नहीं हैं।

पुन: इनके आगे भुजगवर द्वीप और भुजगवर समुद्र है, पुन: कुशवर द्वीप और कुशवर समुद्र है, उसके बाद क्रौंचवर द्वीप और क्रौंचवर समुद्र है। ये जम्बूद्वीप आदि सोलह द्वीप और लवणसमुद्र आदि सोलह समुद्र हैं। इस प्रकार आगम में ये बत्तीस (३२) नाम ही देखे जाते हैं।


ततः परे असंख्यातद्वीपसमुद्रेषु अतीतेषु बाह्यभागस्यापि द्वात्रिंशद्नामानि उच्यन्ते-

अंतिमसमुद्रादभ्यन्तरभागे स्वयंभूरमणसमुद्रः, स्वयंभूरमणद्वीपः,अहीन्द्रवरसमुद्रः, अहीन्द्रवरद्वीपः, देववरसमुद्रः, देववरद्वीपः, यक्षवरसमुद्रः, यक्षवरद्वीपः, भूतवरसमुद्रः, भूतवरद्वीपः, नागवरसमुद्रः, नागवरद्वीपः,वैडूर्यसमुद्रः, वैडूर्यद्वीपः, वङ्कावरसमुद्रः, वङ्कावरद्वीपः, कांचनसमुद्रः, कांचनद्वीपः, रूप्यवरसमुद्रः, रूप्यवरद्वीपः, हिंगुलसमुद्रः, हिंगुलद्वीपः, अंजनवरसमुद्रः, अंजनवरद्वीपः, श्यामसमुद्रः, श्यामद्वीपः, सिंदूरसमुद्र:, सिंदूरद्वीपः, हरितालसमुद्रः, हरितालद्वीपः, मनःशिलसमुद्रः, मनःशिलद्वीपश्च षोडशसमुद्राः, षोडशद्वीपाश्च कथिताः सन्ति।

प्रारम्भे वारुणीवर-लवणाब्धि-घृतवर-क्षीरवरनामधेयेषु चतुःसमुद्रेषु स्वनामसदृशरसवज्जलानि तथा कालोद-पुष्करवर-स्वयंभूरमणसमुद्रेषु उदकरससदृशजलानि। शेषासंख्यातसमुद्रेषु इक्षुरसस्वादजलानि सन्ति।
कर्मभूमिसंबद्ध-लवणोद-कालोद-अन्त्यस्वयंभूरमणसमुद्रेषु जलचरजीवाः सन्ति शेषसमुद्रेषु न सन्ति१।
जंबूद्वीप-लवणोदधिप्रभृतिद्वीपसमुद्रानां अधिपती द्वौ व्यन्तरदेवौ स्तः। यथा-जंबूद्वीपस्याधिपती आदरानादरदेवौ। लवणोदस्य प्रभासप्रियदर्शनौ द्वौ देवौ। धातकीखण्डस्य प्रिय-दर्शनौ द्वौ देवौ। कालोदधि-अधिपती कालमहाकालदेवौ। पुष्करवरद्वीपस्य पद्मपुण्डरीकौ देवौ स्तः। मानुषोत्तरपर्वतस्य चक्षु-सुचक्षुनामानौ द्वौ देवौः स्तः इत्यादयः२।
जंबूद्वीप:-एकलक्षयोजनविस्तृते जंबूद्वीपे दक्षिणादारभ्य भरतहैमवतहरिविदेहरम्यकहैरण्यवत-ऐरावतनामानि सप्तक्षेत्राणि सन्ति। हिमवन्महाहिमवन्निषधनीलरुक्मिशिखरिणो नाम्ना षट्कुलाचलाः सन्ति। जंबूद्वीपे नवत्यधिकशतेन भागे कृते यल्लब्धं तत् षड्विंशत्यधिपंचशतयोजनानि, षट्एकोनविंशतिभागाः प्रमाणं भरतक्षेत्रस्य विष्कंभः। ततो द्विगुणा द्विगुणाः विदेहक्षेत्रपर्यंतं पुनश्च ततोऽर्धार्धप्रमाणानि पर्वतक्षेत्राणि।
अस्य जंबूद्वीपस्य बहुमध्यभागे सुदर्शनमेरुपर्वतोऽस्ति। सुमेरोः पूर्वपश्चिमयोः भागयोः पूर्वपश्चिमविदेहाः, दक्षिणोत्तरयोः देवकुरु-उत्तरकुरु भोगभूमी स्तः। विदेहेषु षोडशवक्षाराः, द्वादशविभंगानद्यः, एषामासां च निमित्तेन विदेहस्य द्वात्रिंशद् भागाः संजाताः। एषु द्वात्रिंशद्विदेहेषु विजयार्धैः गंगासिंधुरक्तारक्तोदानदीभिश्च षट्खण्डाः भवन्ति प्रत्येकं क्षेत्रेषु। तत्रापि पंच पंच म्लेच्छखण्डाः एकैकः आर्यखण्डश्च। तत्र शाश्वतकर्मभूमयः सन्ति।
भरतक्षेत्रषट्खण्डाः-भरतक्षेत्रस्य मध्ये दक्षिणोत्तरायतः त्रिश्रेणिसहितो विजयार्धपर्वतोऽस्ति। हिमवत्पर्वतस्य पद्मसरोवरात् गंगा-सिंधू नद्यौ निर्गत्य नीचैः गंगा-सिंधुकुंडयोः पतित्वा विजयार्धस्य गुफायां प्रविश्य भरतक्षेत्रे वहन्त्यौ लवणसमुद्रे प्रविशतः। एवं विजयार्धपर्वतेन गंगासिंधुनदीभ्यां चास्य भरतक्षेत्रस्य षट्खण्डाः संजाताः। एवमेव ऐरावतक्षेत्रेऽपि ज्ञातव्यं।
अनयोद्र्वयोर्भरतैरावतक्षेत्रयोरार्यखण्डयोः षट्कालपरिवर्तनं वर्तते। उक्तं च तत्त्वार्थसूत्रमहाग्रन्थे-
‘‘भरतैरावतयोर्वृद्धिह्रासौ षट्समयाभ्यामुत्सर्पिण्यवसर्पिणीभ्याम्।।१ अतः एतयोद्र्वयोरार्यखण्डयो: त्रिषु कालेषु भोगभूमिव्यवस्था, त्रिषु कालेषु च कर्मभूमिव्यवस्था वर्तते। उभे अपि अशाश्वत्यौ एव।
विदेहक्षेत्राणां भरतैरावतयोश्च मिलित्वा कर्मभूमयश्चतुस्त्रिंशद् भवन्ति। संप्रति भरतक्षेत्रस्यार्यखण्डे पंचमकाले वयं निवसामः अस्मिन् जंबूद्वीपे।
चतुर्दशमहानद्यः-हिमवदादिषट्कुलपर्वतानामुपरि पद्म-महापद्म-तिगिञ्छ-केसरि-महापुण्डरीक-पुण्डरीकाख्याः षट् सरोवराः सन्ति। प्रथम-षष्ठसरोवराभ्यां तिस्रः तिस्रः नद्यः निर्गच्छन्ति, शेषचतुःसरोवरेभ्यः द्वे द्वे नद्यौ निर्गच्छतः। एवं चतुर्दशमहानद्यः जंबूद्वीपे। तासां नामानि-गंगासिंधु-रोहितरोहितास्या-हरित्हरिकान्ता-सीतासीतोदा-नारीनरकान्ता-सुवर्णकूलारूप्यकूला-रक्तारक्तोदाः सन्ति।
भरतादिसप्तक्षेत्रेषु आसु द्वे द्वे नद्यौ वहतः।
द्वयो द्र्वयोः पूर्वाः पूर्वगाः।।२१।। शेषास्त्वपरगाः।।२२।।
इति सूत्राभ्यां गंगा-रोहितादिनद्यः पूर्वभागे लवणसमुद्रे प्रविशन्ति, शेषाः सिन्धुरोहितास्यादयः पश्चिमसमुद्रे च।
भोगभूमयः-जंबूद्वीपे हैमवत-हैरण्यवत्-हरि-रम्यक-देवकुरुउत्तरकुरुक्षेत्रयोः क्रमशः द्वयोद्र्वयोः क्षेत्रयोः जघन्यमध्यमोत्तमाः भोगभूमयः सन्ति, इमाः शाश्वत्यः। जंबूवृक्ष:-जंबूद्वीपे मेरोरीशानभागे उत्तरकुरुक्षेत्रे जंबूवृक्षः। देवकुरु भोगभूमौ नैऋत्यकोणे शाल्मलीवृक्षः इमौ द्वौ अपि वृक्षौ पृथिवीकायिकरत्ननिर्मितौ स्तः।
विजयार्धपर्वताः-चतुस्त्रिंशत्कर्मभूमिषु एकैकविजयार्धपर्वताः अतः चतुस्त्रिंशद्विजयाद्र्धपर्वताः।
गजदन्ताः-मेरोर्विदिक्षु एकैकगजदन्ताः अतश्चत्वारः गजदन्ताः । एवमेव जंबूद्वीपे द्विशतकांचनगिरयः, सीतासीतोदानद्यो: उभयतटयो: सन्ति। चत्वारो यमकगिरय:, दशदिग्गजपर्वता:, चतुस्त्रिंशद् वृषभाचला:, चत्वारो नाभिगिरयश्च तथा एकः सुमेरुः, षट्कुलाचलाः, षोडश वक्षाराः, चतुस्त्रिंशद्विजयाद्र्धाश्च इमे सर्वे मिलित्वा एकादशाधिकत्रिशतपर्वताः सन्ति।
जंबूद्वीपस्याकृत्रिमजिनालयाः-अस्मिन् प्राग्द्वीपे-सुदर्शनमेरोः भद्रसालनंदनसौमनसपांडुकवनसंबंधिनः षोडश, जंबू-शाल्मलिवृक्षयोः द्वौ, गजदन्तानां चतुर्णां चत्वारः, षोडशवक्षारपर्वतानां षोडश, चतुस्त्रिंशद्विजयार्धानां चतुस्त्रिंशद्, षट्कुलाचलानां षट्, इमे सर्वे जिनालयाः अष्टसप्ततिः सन्ति।
धातकीखण्डे दक्षिणभागे-उत्तरभागे च द्वौ इष्वाकारगिरी स्तः। अनयोः निमित्तेन पूर्वधातकी-पश्चिमधातकीभागौ द्वौ भवतः।
अनयोः उभयधातकीखण्डद्वीपयोः जंबूद्वीपवत् सर्वरचनाः वर्तन्ते, विशेषेण तु मेरुपर्वतौ विजयाचलाख्यौ। धातकीवृक्षौ शाल्मलिवृक्षौ च। एतन्नाम्ना एवान्तरं न तु संख्यायाः। एवमेव पुष्करार्धद्वीपे द्वौ इष्वाकारौ स्तः। अतः धातकीपुष्करार्धयोः चत्वारः पर्वताः अधिकाः जाताः।
मानुषोत्तरपर्वतस्योपरि चत्वारो जिनालयाः।
सार्धद्वयद्वीपजिनालयसंख्या-जंबूद्वीपस्य अष्टसप्ततिः, धातकीखण्डस्य अष्टपंचाशदधिकएकशतं, पुष्करार्धस्य अष्टपंचाशदकिएकशतं, मानुषोत्तरस्य चत्वारश्चेति सर्वे मिलित्वा अष्टानवत्यधिकत्रिशतजिनालयाः सन्ति।
अस्मिन् सार्धद्वयद्वीपे सप्तत्यधिकशतकर्मभूमिषु यदि कदाचिद् अधिकतमाः तीर्थंकराः भवेयुः तर्हि सप्तत्यधिकशततीर्थंकराः भवितुमर्हन्ति।
सार्धद्वयद्वीपेषु मानवाः-
विजयार्धपर्वतानां सप्तत्यधिशतानां उभयश्रेण्योः विद्याधराः निवसन्ति। ते विद्याधराः मनुष्याः। भोगभूमिषु अपि भोगभूमिजाः मनुष्याः, सार्धद्वयद्वीपेषु त्रिंशद्भोगभूमयः। षण्णवतिकुभोगभूमिषु कुभोगभूमिजाः मानवाः, तथा च सप्तत्यधिशतकर्मभूमिषु कर्मभूमिजाः मनुष्याः। पंचाशदधिक-अष्टशतम्लेच्छखण्डेषु म्लेच्छा मनुष्याः। इमे सर्वे मानवाः मनुष्यजातिनामकर्मोदयत्वात् सदृशाः अपि विसदृशाः एव, तत्तद्भूमिनिमित्तत्वात्। एतेषां विस्तरः तिलोयपण्णत्तिग्रन्थाद् ज्ञातव्यः।
कुमानुषाः क्व सन्ति?
लवणसमुद्रस्य उभयतटयोः अभ्यन्तरभागे अष्टचत्वारिंशद् अंतद्र्वीपाः, कालोदधिउभयतटयोः अभ्यंतरभागे च अष्टचत्वारिंशद् अंतद्र्वीपाः सन्ति। एषु उत्पन्ना मनुष्याः केचिद् एकपादाः, केचित् पुच्छिणः, केचित् शृंगिणः, केचित् मूकाः, केचित्मत्स्यादिमुखाश्च। इमे युगलौ एव जायेते, युगलौ एव म्रियेते। तत्र केचित् मधुरमृत्तिकां भक्षयन्ति, केचित् वृक्षाणां फलादीनां भोजनं कुर्वन्ति। इमे कुत्सितपुण्यदानादिनिमित्तेन तत्र उत्पद्यन्ते।
लंकादिद्वीपाः क्व सन्ति?
लवणसमुद्रे गौतमद्वीपः हंसद्वीपः वानरद्वीपः, लंकाद्वीपश्चादय अनेके द्वीपाः सन्ति।
वर्तमानकालेऽत्र आर्यखंडे लंकादयः द्वीपाः, गंगासिंध्वादिनद्यः, हिमवदादिपर्वताः न सन्ति। अत्र केवलं नामधारिणः सन्ति न चाकृत्रिमाः।
कर्मभूमयः क्व क्व सन्ति?
सार्धद्वयद्वीपेषु सप्तत्यधिशतानि कर्मभूमयः। स्वयंप्रभपर्वताद्बहिः अर्धस्वयंभूरमणद्वीपे स्वयंभूरमणसमुद्रे च कर्मभूमिजाः सन्ति। विशेषेण तु सार्धद्वयद्वीपेषु मनुष्याः तिर्यञ्चश्च कर्मभूमिजाः, किन्तु स्वयंप्रभपर्वताद्बहिर्भागे कर्मभूमिजाः तिर्यञ्च एव न मनुष्याः। मनुष्यास्तु मानुषक्षेत्रे एव। सर्वे कर्मभूमिजतिर्यञ्चः संयतासंयताः अपि भवितुमर्हन्ति।
भोगभूमयः क्व क्व सन्ति?
सार्धद्वयद्वीपेषु त्रिंशद् भोगभूमयः। षण्णवतिकुभोगभूमयः। आसु भूमिषु मनुष्याः कुमनुष्याश्च भवन्ति। तथा च सार्धद्वयद्वीपाद् बहिः स्वयंप्रभपर्वताद् अभ्यंतरे च असंख्यातद्वीपेषु जघन्यभोगभूमयः उच्यन्ते। आसु युगलौ तिर्यञ्चौ जायेते सार्धमेव म्रियेते च। ते चापि भोगभूमिजाः उच्यन्ते। केषांचिदाचार्याणामभिप्रायेण इमे तिर्यञ्चः मृत्वा स्वर्गं लभन्ते। सर्वत्रापि भोगभूमिषु विकलत्रयाः न भवन्ति। मध्ये असंख्यातसमुद्रेषु जलचराः अपि नोत्पद्यन्ते।
सार्धद्वयद्वीपेषु अन्याः काः विशेषताः दृश्यन्ते?
सार्धद्वयद्वीपेषु सप्तत्यधिकशतकर्मभूमिषु अर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसाधवः पंचपरमेष्ठिनो भवन्ति। जिनधर्मजिनागमजिनचैत्यचैत्यालयाश्च भवन्ति। तीर्थंकराणां पंचकल्याणकभूमयः अन्येषां भरतादिमहापुरुषाणां तपःकैवल्यनिर्वाणभूमयः अतिशयक्षेत्राणि च। मुनि-आर्यिका-क्षुल्लक-क्षुल्लिका-श्रावक-श्राविकादयः चतुर्विधसंघाः च दृश्यन्ते।
अष्टपंचाशदधिचतुःशतजिनालयाः क्व पर्यन्ताः सन्ति?
मध्यलोकसंबंधिनः इमे जिनालयाः त्रयोदशद्वीपपर्यन्ताः सन्ति। यथा-मानुषक्षेत्रस्य अष्टनवत्यधिक-त्रिशतजिनालयाः, नंदीश्वरद्वीपस्य द्वापंचाशद्, कुंडलवरपर्वतस्य चत्वारः, रुचकवरपर्वतस्य चत्वारश्च इमे सर्वे मिलित्वा अष्टपंचाशदधिकचतुःशतजिनालयाः सन्ति।
खिष्टाब्दे षट्सप्तत्यधिकैकोनविंशतिशततमे, वीराब्दे द्व्यधिकपंचविंशतिशततमे ‘खतौली’ नामग्रामे वर्षायोगे मया इन्द्रध्वजविधानं मातृभाषायां रचितं, तस्मिन् विधाने एतेषां मध्यलोकसंबंधि-अष्टपंचाशदधिकचतुःशतजिनालयानां एकोनपंचाशत् अथवा सिद्धपूजासहित-पंचाशत्पूजाः सन्ति। एतत्पूजाविधानं भारतवर्षे सर्वत्र सर्वतोमुखीप्रभावनामवाप।


इससे आगे पहले कहे गये असंख्यात द्वीप- समुद्रों में बाह्यभाग के बत्तीस नाम भी कहते हैं-

अंतिम समुद्र से अभ्यन्तर भाग में अर्थात् अंत से प्रारंभ करने पर स्वयम्भूरमणसमुद्र-स्वयंभूरमणद्वीप, अहीन्द्रवरसमुद्र-अहीन्द्रवरद्वीप, देववरसमुद्र-देववरद्वीप, यक्षवरसमुद्र-यक्षवरद्वीप, भूतवरसमुद्र-भूतवरद्वीप, नागवरसमुद्र-नागवरद्वीप, वैडूर्यसमुद्र-वैडूर्यद्वीप, वङ्कावरसमुद्र-वङ्कावरद्वीप, कांचनसमुद्र-कांचनद्वीप, रूप्यवरसमुद्र-रूप्यवरद्वीप, हिंगुलसमुद्र-हिंगुलद्वीप, अंजनवरसमुद्र-अंजनवरद्वीप, श्यामसमुद्र-श्यामद्वीप, सिंदूरसमुद्र-सिंदूरद्वीप, हरितालसमुद्र-हरितालद्वीप, मन:शिलसमुद्र-मन:शिलद्वीप ये सोलह समुद्र और सोलह द्वीप कहे गये हैं।

प्रारंभ के वारुणीवर, लवणोदधि, घृतवर एवं क्षीरवर इन चार समुद्रों में अपने नाम के समान रस वाला जल भरा होता है तथा कालोदधि, पुष्करवर और स्वयंभूरमण समुद्रों में उदक रस (स्वाभाविक जल के स्वाद से सहित) के समान जल है। शेष असंख्यात समुद्रों में इक्षुरस के स्वाद के सदृश जल है।

कर्मभूमि से संबद्ध लवणसमुद्र, कालोदधि एवं अंतिम स्वयंभूरमण समुद्र में ही जलचर जीव पाये जाते हैं, शेष समुद्रों में नहीं। जम्बूद्वीप-लवणसमुद्र आदि द्वीप-समुद्रों के अधिपति दो व्यंतर देव हैं। जैसे-जम्बूद्वीप के आदर और अनादर ये दो अधिपति देव हैं। लवण समुद्र के प्रभास और प्रियदर्शन ये दो अधिपति देव हैं। धातकीखण्ड द्वीप के प्रिय और दर्शन ये दो अधिपति देव हैं। कालोदधि के अधिपति काल और महाकाल नाम के दो देव हैं। पुष्करवरद्वीप के पद्म और पुण्डरीक ये दो देव हैं। मानुषोत्तर पर्वत के चक्षु और सुचक्षु नाम के दो अधिपति देव हैं इत्यादि वर्णन आगम से समझना चाहिए।

अब जम्बूद्वीप का वर्णन करते हैं-एक लाख योजन विस्तृत जम्बूद्वीप में दक्षिण दिशा से प्रारंभ करके भरत, हैमवत, हरि, विदेह, रम्यक्, हैरण्यवत् और ऐरावत नाम के सात क्षेत्र हैंं। हिमवन्, महाहिमवन्, निषध, नील, रुक्मि, शिखरी नाम वाले छह कुलाचल (कुलपर्वत) हैं। जम्बूद्वीप के विस्तार में एक सौ नब्बे (१९०) का भाग देने पर जो लब्ध आवे, वह ५२६ (६/१९) योजनप्रमाण भरतक्षेत्र का विस्तार है। उससे दुगुना-दुगुना प्रमाण-विस्तार आगे के पर्वत और क्षेत्रों का (विदेहक्षेत्रपर्यन्त) है, पुनश्च विदेह क्षेत्र से आगे उत्तरदिशा के क्षेत्र और पर्वत आधे-आधे प्रमाण वाले हैं। उस जम्बूद्वीप के बहुमध्यभाग में सुदर्शनमेरु नामका पर्वत है। इसे सुमेरुपर्वत के नाम से भी जाना जाता है। इस सुमेरुपर्वत के पूर्व और पश्चिम भाग में पूर्व-पश्चिम विदेहक्षेत्र हैं, दक्षिण और उत्तर भाग में देवकुरु-उत्तरकुरु नाम की भोगभूमियाँ हैं। विदेहक्षेत्रों में सोलह वक्षार पर्वत हैं, बारह विभंगा नदियाँ हैं। उन पर्वत और नदियों के निमित्त से विदेह के बत्तीस भाग-भेद हो जाते हैं। उन बत्तीस विदेहक्षेत्रों में विजयार्ध पर्वतों से गंगा-सिंधु, रक्ता-रक्तोदा नदियों से प्रत्येक विदेहक्षेत्र में छह-छह खण्ड हो जाते हैं। वहाँ भी पाँच-पाँच म्लेच्छ खण्ड और एक-एक आर्यखण्ड होते हैं, वहाँ शाश्वत कर्मभूमियाँ रहती हैं।

भरतक्षेत्र के छह खण्डों का विवरण-

भरतक्षेत्र के मध्य में दक्षिण और उत्तर में लम्बे ऐसे तीन श्रेणियों से सहित एक विजयार्ध पर्वत है। हिमवन् पर्वत के पद्म सरोवर से गंगा-सिंधु ये दो नदियाँ निकलकर नीचे गंगा-सिंधु कुण्ड में गिरकर पुन: विजयार्ध पर्वत की गुफा में प्रवेश करके भरतक्षेत्र में बहती हुई लवणसमुद्र में प्रवेश करती हैं। इस प्रकार विजयार्ध पर्वत एवं गंगा-सिंधु नदियों के निमित्त से भरतक्षेत्र के छह खण्ड हो जाते हैं। इसी प्रकार की व्यवस्था ऐरावत क्षेत्र मेें भी जानना चाहिए।

इन दोनों भरत और ऐरावत क्षेत्र के आर्य खण्डों में षट्काल का परिवर्तन होता है।

तत्त्वार्थसूत्र महाग्रंथ में कहा है-

सूत्रार्थ-भरत और ऐरावत क्षेत्र में उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी के छह-छह कालों में मनुष्यों की आयु-काय-भोगोपभोग सम्पदा-वीर्य-बुद्धि आदि की वृद्धि और ह्रास होता है।

अत: इन दोनों आर्यखण्डों में प्रारंभिक तीन कालों में भोगभूमि की व्यवस्था रहती है तथा अन्त के तीन कालों में कर्मभूमि की व्यवस्था रहती है। दोनों जगह अशाश्वत व्यवस्था ही पाई जाती है अर्थात् न तो शाश्वत कर्मभूमि रहती है और न शाश्वत भोगभूमि पाई जाती है, प्रत्युत् परिवर्तन के साथ दोनों प्रकार की व्यवस्थाएँ देखी जाती हैं।

इस प्रकार बत्तीस विदेह क्षेत्रों की और भरत-ऐरावत क्षेत्रों की कुल मिलाकर ३४ कर्मभूमियाँ होती हैं। वर्तमान में हम सभी इस जम्बूद्वीप के भरतक्षेत्र के आर्यखण्ड में निवास कर रहे हैं, यहाँ इस समय पंचमकाल चल रहा है।

चौदह महानदियों का विवरण-हिमवन् आदि षट्कुलाचल पर्वतों के ऊपर पद्म, महापद्म, तिगिञ्छ, केसरि, महापुंडरीक और पुण्डरीक नाम के छह सरोवर हैं। उनमें से प्रथम और छठे सरोवर से तीन-तीन नदियाँ निकलती हैं तथा शेष चार सरोवरों से दो-दो नदियाँ निकलती हैं। इस प्रकार जंबूद्वीप में चौदह महानदियाँ हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं-गंगा-सिंधु, रोहित्-रोहितास्या, हरित्-हरिकान्ता, सीता-सीतोदा, नारी-नरकांता, सुवर्णवूâला-रूप्यकूला और रक्ता-रक्तोदा। भरत आदि क्षेत्रों में इनमें से दो-दो नदियाँ बहती हैं। तत्त्वार्थसूत्र में कहा भी है-

सूत्रार्थ-इन दो-दो नदियों में से पहली नदी पूर्व लवण समुद्र में प्रवेश करती है।।२१।।

दूसरी नदियाँ-युगल नामों में से बाद वाली नदी पश्चिम समुद्र में जाती हैं।।२२।।

इन दोनों सूत्रों के अनुसार उपर्युक्त चौदह महानदियों में से गंगा नदी, रोहित् नदी आदि पूर्व-पूर्व में कथित सात नदियाँ लवणसमुद्र के पूर्वभाग में प्रवेश करती हैं और इनसे अतिरिक्त शेष सिंधु नदी, रोहितास्या नदी आदि लवणसमुद्र के पश्चिम भाग में प्रवेश करती हैं।

भोगभूमियों का वर्णन-जम्बूद्वीप में हैमवत्, हैरण्यवत्, हरि, रम्यक् इन चार क्षेत्रों मेें तथा देवकुरु और उत्तरकुरु में क्रमश: दो-दो क्षेत्रों में जघन्य, मध्यम और उत्तम भोगभूमि की व्यवस्था रहती है अर्थात् हैमवत् और हैरण्यवत् क्षेत्र में जघन्य भोगभूमि, हरि और रम्यक क्षेत्र में मध्यम भोगभूमि और देवकुरु एवं उत्तरकुरु में उत्तम भोगभूमि हैं। ये सभी शाश्वत भोगभूमियाँ हैं, यहाँ कभी कर्मभूमि नहीं होती है।

जम्बूवृक्ष-जम्बूद्वीप में सुमेरुपर्वत के ईशान कोण (पूर्व और उत्तर दिशा के बीच की विदिशा) में उत्तरकुरु क्षेत्र में जम्बूवृक्ष है और देवकुरु भोगभूमि के नैऋत्य कोण (दक्षिण-पश्चिम का मध्यभाग) में शाल्मली वृक्ष है। ये दोनों वृक्ष पृथिवीकायिक रत्नों से निर्मित अनादिनिधन हैं।

विजयार्ध पर्वतों का विवरण-जम्बूद्वीप में चौंतीस कर्मभूमि क्षेत्रोंं में (भरत-ऐरावत क्षेत्र तथा बत्तीस विदेहक्षेत्रों में) सभी जगह एक-एक विजयार्ध पर्वत हैं, अत: कुल ३४ विजयार्ध पर्वत हैं।

गजदंत पर्वत-सुमेरु पर्वत की चार विदिशाओं में चार गजदंत पर्वत हैं।

इसी प्रकार जम्बूद्वीप में दो सौ कांचनगिरि नामक पर्वत हैं, ये सीता और सीतोदा नदी के दोनों तटों पर स्थित हैंं। चार यमकगिरि हैं, दश दिग्गज पर्वत हैं, चौंतीस वृषभाचल पर्वत हैं, चार नाभिगिरि हैं तथा एक सुमेरुपर्वत है, छह कुलाचल हैं, सोलह वक्षार पर्वत हैं, चौंतीस विजयार्ध पर्वत हैं। इस प्रकार जम्बूद्वीप में सब मिलकर कुल तीन सौ ग्यारह पर्वत हैं।

जम्बूद्वीप के अकृत्रिम चैत्यालय-जम्बूद्वीप नामके इस प्रथम द्वीप में सुदर्शन मेरु के भद्रशाल, नंदन, सौमनस और पाण्डुकवनों के चार-चार चैत्यालयसंबंधी सोलह (१६) चैत्यालय, जम्बू-शाल्मलि वृक्षसंबंधी दो (२) चैत्यालय, गजदंतों के चार (४) चैत्यालय, सोलह वक्षार पर्वतों के सोलह (१६) चैत्यालय, चौंतीस विजयार्ध पर्वतों के चौंतीस (३४) चैत्यालय और षट्कुलाचल पर्वतों के छह (६) चैत्यालय। ये सभी कुल मिलाकर १६±२±४±१६±३४±६·७८ अकृत्रिम जिनालय हैं।

द्वितीय धातकीखण्ड द्वीप के दक्षिण और उत्तर भाग में दो इष्वाकार पर्वत हैं। उनके निमित्त से धातकीखण्ड के दो भाग हो जाते हैं-पूर्व धातकीखण्ड और पश्चिम धातकीखण्ड। धातकीखण्ड द्वीप के इन दोनों भागों में जम्बूद्वीप के समान ही सम्पूर्ण रचना बनी हुई है, विशेषता यह है कि यहाँ पूर्वधातकीखण्ड में विजयमेरु तथा पश्चिमधातकीखण्ड में अचलमेरु, ये दो मेरु पर्वत इस द्वीप में पाये जाते हैं। इस द्वीप में धातकी और शाल्मली वृक्ष हैं। इनमें केवल नामका अन्तर है, संख्या का अंतर नहीं है। इसी प्रकार पुष्करार्ध द्वीप में, दो इष्वाकार पर्वत हैं। इसलिए धातकीखण्ड और पुष्करार्ध द्वीप में दो-दो इष्वाकारों के निमित्त से चार पर्वत अधिक हो जाते हैं पुन: आगे मानुषोत्तर पर्वत के ऊपर चार जिनालय हैं।

ढाईद्वीप के जिनालयों की संख्या-जम्बूद्वीप के अठत्तर (७८), धातकीखण्ड के एक सौ अट्ठावन (१५८), पुष्करार्ध द्वीप के एक सौ अट्ठावन (१५८) और मानुषोत्तर के चार (४) ये सभी मिलकर तीन सौ अट्ठानवे (३९८) चैत्यालय ढाईद्वीप में होते हैं।

इस ढाईद्वीप में एक सौ सत्तर (१७०) कर्मभूमियों में यदि कदाचित् अधिकतम तीर्थंकर होवें, तो एक सौ सत्तर तीर्थंकर हो सकते हैं।

ढाईद्वीपों में होने वाले मनुष्य-एक सौ सत्तर विजयार्ध पर्वतों की उत्तर-दक्षिण दोनों श्रेणियों में विद्याधर रहते हैं। वे विद्याधर मनुष्य होते हैं। भोगभूमियों में भी भोगभूमिज मनुष्य हैं, ढाईद्वीपों में तीस भोगभूमियाँ हैं। छियानवे कुभोगभूमियों में कुभोगभूमिज मनुष्य होते हैं तथा एक सौ सत्तर कर्मभूमियों में कर्मभूमिज मनुष्य होते हैं। आठ सौ पचास म्लेच्छ खण्डों में म्लेच्छ मनुष्य होते हैं। ये सभी मनुष्य मनुष्यजातिनामकर्म के उदय से सदृश होते हुए भी उन-उन भूमियों के निमित्त से विसदृश भी होते हैं। इन सभी का विस्तृत वर्णन तिलोयपण्णत्ति ग्रंथ से जानना चाहिए। कुमानुष कहाँ होते हैं?

लवणसमुद्र के दोनों तटों के अभ्यन्तर भाग में अड़तालीस (४८) अन्तद्र्वीप हैं, कालोदधि के दोनों तटों के अभ्यन्तर भाग में अड़तालीस (४८) अन्तद्र्वीप हैं। उनमें उत्पन्न होने वाले मनुष्य कोई एक पैर वाले, कोई पूंछ वाले, कोई सींग वाले, कोई मूक और कोई मछली आदि मुख वाले होते हैं। ये सभी मनुष्य युगलियारूप में ही जन्म लेते हैं और युगलिया ही मरते हैं। वहाँ कोई मीठी मिट्टी खाते हैं, कोई वृक्षों के फल आदि का भोजन करते हैं। ये मनुष्य पूर्व जन्म के कुत्सित पुण्य-कुत्सित दानादि के निमित्त से वहाँ जन्म लेते हैं। लंका आदि द्वीप कहाँ हैं?

लवण समुद्र में गौतमद्वीप, हंसद्वीप, वानरद्वीप और लंकाद्वीप आदि अनेक द्वीप हैं। वर्तमानकाल में यहाँ आर्यखण्ड में लंका आदि द्वीप, गंगा-सिंधु आदि नदियाँ और हिमवन् आदि पर्वत नहीं हैं। यहाँ केवल नामधारी जो पर्वत-नदी-द्वीप आदि हैं, वे अकृत्रिम नहीं हैं। कर्मभूमियाँ कहाँ-कहाँ हैं?

ढाईद्वीपों में एक सौ सत्तर कर्मभूमियाँ हैं। स्वयंप्रभ पर्वत से बाहर अर्धस्वयंभूरमण द्वीप में और स्वयंभूरमण समुद्र में कर्मभूमि हैं। विशेषरूप से ढाई द्वीपों में मनुष्य और तिर्यंच कर्मभूमिज हैं किन्तु स्वयंप्रभ पर्वत से बाहर कर्मभूमिज तिर्यंच ही रहते हैं, वहाँ मनुष्य नहीं होते हैं। मनुष्य तो केवल मानुषक्षेत्र में ही होते हैं। वे सभी कर्मभूमिज तिर्यंच संयतासंयत भी हो सकते हैं।

भोगभूमियाँ कहाँ-कहाँ हैं?

ढाई द्वीपों में तीस भोगभूमियाँ हैं। छियानवे कुभोगभूमियाँ हैं। इन भूमियों में मनुष्य और कुमानुष होते हैं तथा ढाई द्वीप से बाहर और स्वयंप्रभ पर्वत के अभ्यंतर भाग में असंख्यात द्वीपों में जघन्य भोगभूमियाँ कही गई हैं। इन जघन्य भोगभूमियों में युगलिया तिर्यंच उत्पन्न होते हैं, जो एक साथ ही मरण को भी प्राप्त करते हैं और वे भी भोगभूमिज ही कहलाते हैं। कुछ आचार्यों के अभिप्रायानुसार ये जीव मरकर स्वर्ग प्राप्त करते हैं। सर्वत्र इन भोगभूमियों में विकलत्रय जीव नहीं होते हैं। मध्यवर्ती असंख्यात समुद्रों में जलचर जीव नहीं उत्पन्न होते हैं।

ढाईद्वीपों में अन्य कौन सी विशेषताएँ देखी जाती हैं?

ढाई द्वीपों की एक सौ सत्तर कर्मभूमियों में अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और सर्वसाधु ये पंच- परमेष्ठी होते हैं। जिनधर्म, जिनागम, जिनचैत्य और जिनचैत्यालय होते हैं। तीर्थंकरों की पंचकल्याणक भूमियाँ, अन्य भरत आदि महापुरुषों की तप, केवलज्ञान एवं निर्वाणभूमियाँ और अतिशय क्षेत्र हैं। मुनि-आर्यिका, क्षुल्लक-क्षुल्लिका, श्रावक-श्राविका आदिरूप चतुर्विध संघ भी ढाई द्वीपों के अंदर ही विचरण करते हैं।

चार सौ अट्ठावन जिनालय कहाँ तक हैं?

मध्यलोकसंबंधी ये सभी चार सौ अट्ठावन जिनालय तेरहद्वीपों तक ही हैं। जैसे-मनुष्य क्षेत्र के तीन सौ अट्ठानवे (३९८) जिनालय, नंदीश्वर द्वीप के बावन (५२), कुण्डलवर पर्वत के चार (४) और रुचकवर पर्वत के चार (४) ये सभी मिलकर ३९८±५२±४±४·४५८ चार सौ अट्ठावन जिनालय हैं। ईसवी सन्-संवत्सर उन्नीस सौ छियत्तर (१९७६), वीर निर्वाण संवत् पच्चीस सौ दो (२५०२) में खतौली नामक ग्राम में (जिला-मुजफ्फरनगर, उ.प्र.) वर्षायोग के अन्तर्गत मैंने मातृभाषा-हिन्दी भाषा में ‘‘इन्द्रध्वज विधान’’ नामक एक पूजा का काव्य ग्रंथ लिखा, उस विधान में इन सभी मध्यलोकसंबंधी चार सौ अट्ठावन जिनालयों की ४९ पूजाएँ अथवा सिद्ध पूजा सहित पचास (५०) पूजाएँ हैं। इस इन्द्रध्वज पूजा-विधान के द्वारा सम्पूर्ण भारतवर्ष में सर्वत्र सर्वतोमुखी धर्मप्रभावना हुई और हो रही है।


जंबूद्वीपरचना-

शांतिकुन्थु-अरतीर्थंकरत्रयजन्मभूमि-हस्तिनापुरतीर्थक्षेत्रे मम प्रेरणया जंबूद्वीपरचना संजाता। वीराब्दे पंचविंशतिशततमे दिगम्बर जैन त्रिलोक शोध संस्थानस्य कार्यकर्तृभिः श्रावकै अस्य जंबूद्वीपस्य निर्माणमारभ्य एकादशाधिकपंचविंशतिशततमे वीराब्दे जंबूद्वीपजिनबिम्बप्रतिष्ठापनामहामहोत्सवेन सह महत्या प्रभावनया च पंचकल्याणकप्रतिष्ठामहोत्सवः कारितः। अस्मात् महोत्सवात् प्राक् जंबूद्वीपज्ञानज्योतिरथप्रवर्तनमपि पंचत्रिंशद्दिनन्यूनत्रिवर्षपर्यंतं भारतवर्षे बभूव।

संप्रति प्रतिदिनं दर्शनार्थिनः तत्र हस्तिनापुरक्षेत्रे आगत्य इमं जंबूद्वीपं विलोक्य हर्षातिरेकेण सहसा ब्रुवन्ति-‘‘अहो! वयं स्वर्गलोके एव आगतवन्तः, धन्या वयं’’ इत्यादि गद्गदवाणीं ब्रुवन्तः सन्तः जंबूद्वीपस्य दर्शनं कृत्वा सुमेरोः उपरि आरुह्य वंदनां कृत्वा च परमानन्दं लभन्ते, कथयन्ति च-एतादृशी सुंदरतमा रम्या रचना क्वापि नास्ति, इदं तीर्थं सर्वेषु तीर्थेषु सर्वोपरि श्रेष्ठं मनोहरं हृद्यं अतिशयकारि वर्तते।
तात्पर्यमेतत्-अस्मिन् ग्रन्थे पुनः पुनः तिर्यग्लोकस्य मानुषक्षेत्रस्य च कथनं आगच्छति अतः एतयोः ज्ञापनार्थं अत्र किंचित्प्रतिपादनं कृतं। विशेषजिज्ञासुभिः तिलोयपण्णत्ति-त्रिलोकसारादिग्रन्थानां स्वाध्यायः कर्तव्यः, इत्यलं विस्तरेणात्र।
अधुना प्रमत्तसंयतादि अयोगिकेवलिनां स्पर्शनप्रतिपादनाय सूत्रावतारो भवति-
पमत्तसंजदप्पहुडि जाव अजोगिकेवलीहि केवडियं खेत्तं फोसिदं? लोगस्स असंखेज्जदिभागो।।९।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्रं सुगमं। अत्र द्रव्यार्थिकनयमाश्रित्य भण्यमाने अतीत-वर्तमानकालेषु ‘लोकस्य असंख्यातभागः’ इति भवति। पुनः पर्यायार्थिकनयावलम्ब्यमाने अस्ति विशेषः। वर्तमानकालमाश्रित्य पर्यायार्थिकनयेन प्ररूपणायां क्षेत्रवत्स्पर्शनं भवति। संप्रति अतीतकालमाश्रित्य पर्यायार्थिकनयप्ररूपणा क्रियते। स्वस्थानस्वस्थान-विहारवत्स्वस्थान-वेदना-कषाय-वैक्रियिक-तैजस-आहारसमुद्घातगतैः चतुर्लोकानामसंख्यातभागः स्पृष्टः, मानुषक्षेत्रस्य संख्यातभागः। कश्चिदाह-विक्रियादिऋद्धिप्राप्तैः मानुषक्षेत्रस्याभ्यन्तरे अप्रतिहतगमनैः ऋषिभिः अतीतकाले सर्वमपि मानुषक्षेत्रं स्पृश्यते इति ‘मानुषक्षेत्रस्य संख्यातभागः।’ इति वचनं न घटते?
आचार्यः प्राह-नैष दोषः, उपरि योजनलक्षमात्रगमने संभवाभावात्।
मेरुमस्तकारोहणसमर्थानां ऋषीणां किमिति लक्षयोजनस्योपरि गमनं न संभवेत्? भवतु नाम मेरुपर्वतस्योध्र्वप्रदेशे ऋषीणां गमनस्य शक्तिः किन्तु सर्वत्र गमनस्य नास्ति, ‘मानुषक्षेत्रस्य संख्यातभागः’ इति आचार्यवचनस्यान्यथानुपपत्तेः। अथवा अतीतकाले लब्धिसंपन्नमुनिवरैः सर्वमपि मानुषक्षेत्रं स्पृश्यते, तस्य मानुषक्षेत्रव्यपदेशान्यथानुपपत्तेः।
स्वस्थाने पुनः मानुषक्षेत्रस्य संख्यातभागश्चैव स्पृष्टः।
यदि एवं, तर्हि पंचेन्द्रियतिरश्चां अपि पूर्ववैरिदेवानां प्रयोगात् योजनलक्षस्योपरि गमनं प्राप्नोति?
भवतु, न कोऽपि दोषः।
मारणान्तिकसमुद्घातगतैः प्रमत्तसंयतादिभिः चतुर्लोकानामसंख्यातभागः, मानुषक्षेत्रस्य असंख्यातगुणश्च स्पृष्टः।
कश्चिदाह-तैरेव संयतैः मारणान्तिकक्षेत्रं तिर्यग्लोकस्य संख्यातभागः, ततः संख्यातगुणं असंख्यातगुणं वा किं न स्पृष्टं?
आचार्यः प्राह-न स्पृश्यते, ऊध्र्ववृत्ते पंचचत्वारिंशल्लक्षयोजनविष्कंभे समपरिमंडलसंस्थिते सप्तरज्जुआयते सति तिर्यग्लोकस्य संख्यातभागो क्षेत्रं न भवति, संख्यातप्रतरांगुलमात्रश्रेणिप्रमाणत्वात्। न च पंचचत्वारिंशल्लक्षयोजनविष्कंभसंख्यातांगुलबाहल्यं संख्यातरज्ज्वायातकल्पवासिविमान-मात्रतिर्यग्रूपावस्थानं क्षेत्रमपि तिर्यग्लोकस्य संख्यातभागो भवति, एतस्य पूर्वक्षेत्रात् संख्यातगुणहीनस्य तिर्यग्लोकस्य संख्यातभागत्वविरोधात्।
विमानप्रतिष्ठित असंख्यातोपपादभवनसम्मुखप्रवर्तमानक्षेत्रेषु समुदितेषु किं न तद् भवति?
न भवति, श्रेण्याः असंख्यातभाग-असंख्यातयोजनविस्तृत क्षेत्रेषु गृहीतेषु अपि तदसंभवात्।
अस्मिन सूत्रे सयोगिकेवलिनां ग्रहणं न भवति, अग्रिमसूत्रे तेषां पृथक् ग्रहणत्वात्।
एवं षष्ठस्थले प्रमत्तादिमहामुनीनां स्पर्शनकथनत्वेन एकं सूत्रं गतम्।
अधुना सयोगिकेवलिनां स्पर्शननिरूपणाय सूत्रमवतरति-
सजोगिकेवलीहि केवडियं खेत्तं फोसिदं? लोगस्स असंखेज्जदिभागो, असंखेज्जा वा भागा, सव्वलोगो वा।।१०।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्रं सुगमं। वर्तमानकालं अतीतकालमपि आश्रित्य पर्यायार्थिकनयापेक्षया क्षेत्रमिव स्पर्शनं। विशेषेण तु कपाटगतस्य पंचचत्वारिंशल्लक्षयोजनबाहल्यं जगत्प्रतरमेकं कपाटक्षेत्रं भवति। इदं कायोत्सर्गस्थ-केवलिनोऽपेक्षया वर्तते। अपरं समुपविष्टकेवलिनोऽपेक्षया कपाटक्षेत्रं नवतिलक्षयोजनबाहल्यं जगत्प्रतरं भवति। एवं कपाटक्षेत्रे द्वे अपि मेलिते तिर्यग्लोकात् संख्यातगुणं क्षेत्रं भवति। लोकपूरणसमुद्घाते सर्वोऽपि लोकः स्पृष्टः भवति।
तात्पर्यमेतत्-निजशुद्धस्वसंवेदनज्ञानेन अध्यात्मध्यानेन वा निजशुद्धबुद्धपरमात्मानं स्पृष्ट्वा केवलज्ञानं संप्राप्य निजातीन्द्रिय-अनंतकेवलज्ञानबलेन निजज्ञानरश्मिभिर्वा सर्वोऽपि लोकाकाशोऽलोकाकाशश्च स्पर्शनीयः अस्माभिरिति भावनया गुणस्थानेषु स्पर्शनानुगमो अध्येतव्यः।
एवं सप्तमस्थले सयोगिकेवलि-स्पर्शनप्रतिपादनत्वेन एकं सूत्रं गतम्।इति श्रीमद्भगवत्पुष्पदन्तभूतबलिभट्टारकविरचितषट्खण्डागमस्य प्रथमखण्डे
चतुर्थग्रन्थे स्पर्शनानुगमनामचतुर्थप्रकरणे धवलाटीकाप्रमुख-अनेकग्रन्थाधारेणजंबूद्वीपरचनाप्रेरिका-गणिनीज्ञानमतीकृत-सिद्धान्तचिन्ता-
मणिटीकायां गुणस्थानेषु स्पर्शनानुगमप्ररूपको प्रथमो महाधिकारः समाप्तः।


जम्बूद्वीप रचना-

तीर्थंकर श्री शांतिनाथ, कुंथुनाथ और अरहनाथ भगवान की जन्मभूमि हस्तिनापुर तीर्थक्षेत्र में मेरी प्रेरणा से जम्बूद्वीप की रचना का निर्माण हुआ है। वीर निर्वाण संवत् पच्चीस सौ (२५००)-सन् १९७४ में दिगम्बर जैन त्रिलोक शोध संस्थान के कार्यकर्ता श्रावकों ने इस जम्बूद्वीप का निर्माण प्रारंभ करके वीर निर्वाण संवत् पच्चीस सौ ग्यारह (२५११)-सन् १९८५ मेें जम्बूद्वीप जिनबिंब प्रतिष्ठापना महामहोत्सव के साथ महती धर्मप्रभावनापूर्वक पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव सम्पन्न किया। इस महोत्सव से पूर्व जम्बूद्वीप ज्ञानज्योति रथ का प्रवर्तन (तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी द्वारा प्रवर्तित) भी पूरे भारतवर्ष में ३५ दिन कम तीन वर्ष तक (४ जून १९८२ से २८ अप्रैल १९८५ तक) हुआ। जिसके माध्यम से लाखों-लाख जनता ने अहिंसा, सदाचार, शाकाहार और व्यसनमुक्ति का संदेश प्राप्त किया।

अब उस हस्तिनापुर में प्रतिदिन हजारों दर्शनार्थी यात्री पहुँचकर जम्बूद्वीप रचना के दर्शन करके हर्षातिरेक से भावविभोर होकर सहसा कहने लगते हैं-अहो! हम तो स्वर्गलोक में आ गये हैं, हम तो धन्य हो गये.....इत्यादि अनेक प्रकार से गद्गद होकर प्रशंसा के वचन बोलते हुए जम्बूद्वीप का दर्शन करके सुमेरु पर्वत के ऊपर चढ़कर वंदना करके परमानंद का अनुभव करते हैं और कहते हैं कि ऐसी सुन्दर रचना कहीं भी नहीं है। यह हस्तिनापुर तीर्थ सब तीर्थों में सर्वोपरि, श्रेष्ठ और मनोहर है तथा अतिशयकारी है।

तात्पर्य यह है कि इस ग्रंथ में पुन: पुन: तिर्यग्लोक और मानुषक्षेत्र का कथन आया है अत: दोनों विषयों का ज्ञान कराने हेतु यहाँ किंचित् प्रतिपादन किया गया है। विशेष जिज्ञासुओं को तिलोयपण्णत्ती, त्रिलोकसार आदि ग्रंथों का स्वाध्याय करना चाहिए। इत्यलं विस्तरेण।

विशेषार्थ-

यहाँ षट्खण्डागम के प्रथम खंड की इस चतुर्थ पुस्तक में स्पर्शनानुगम नामक अधिकार के आठवें सूत्र में पूज्य गणिनीप्रमुख आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी ने स्वरचित सिद्धान्तचिंतामणि टीका में प्रसंगोपात्त जैन भूगोल का सुन्दर प्रकरण देकर विषय का स्पष्टीकरण किया है। उसी के अन्तर्गत हस्तिनापुर में निर्मित जम्बूद्वीप रचना का वर्णन भी किया है, इससे पाठकों को सहज ही ज्ञात हो जायेगा कि जम्बूद्वीप निर्माण की प्रेरणा प्रदान करने वाली, इन्द्रध्वज विधान की रचना करने वाली तथा इस ग्रंथ की संस्कृत टीका लिखने वाली ज्ञानमती माताजी एक ही हैं। उन्होंने ही सन् १९७४ में हस्तिनापुर तीर्थ पर जम्बूद्वीप रचना बनाने की प्रेरणा दी, सन् १९७६ में इन्द्रध्वज विधान की रचना करके जैनसमाज को जिनेन्द्रभक्ति करने हेतु एक बहुत सुन्दर उपहार प्रदान किया एवं उन्होंने ही सन् १९९५ से षट्खण्डागम सूत्रों पर सरल संस्कृत टीका लिखना प्रारंभ किया, उसी के मध्य १९९६ में मांगीतुंगी सिद्धक्षेत्र पर वर्षायोग के अन्तर्गत इस टीका में करणानुयोग का वर्णन किया है। इन्हीं की प्रेरणा से हस्तिनापुर में जम्बूद्वीप तीर्थ परिसर के अन्दर विशाल ६४²६४ फुट डायमीटर के गोल मंदिर में सन् २००७ में तेरहद्वीपों की रचना भी निर्मित हुई है। इस तेरहद्वीप रचना में मध्यलोक के ४५८ जिनमंदिर स्वर्णिम छवि को दर्शा रहे हैं। ‘‘तेरहद्वीप जिनालय’’ के नाम से यह जिनमंदिर सभी के लिए भूगोल ज्ञान में निमित्त बने तथा इसके दर्शन से भव्यात्मा सम्यग्दर्शन की प्राप्ति करें, यही मंगल भावना है।

अब प्रमत्तसंयत गुणस्थान से लेकर अयोगकेवली तक जिनों का स्पर्शन बतलाने हेतु सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

प्रमत्तसंयत गुणस्थान से लेकर अयोगिकेवली गुणस्थान तक प्रत्येक गुणस्थानवर्ती जीवों ने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है? लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पर्श किया है।।९।।

हिन्दी टीका-सूत्र का अर्थ सुगम है।

यहाँ द्रव्यार्थिक नय का आश्रय लेकर कथन करने पर अतीत और वर्तमानकाल में लोक के असंख्यातवें भागप्रमाण ही स्पर्शन का क्षेत्र होता है पुन: पर्यायार्थिकनय का अवलम्बन करने पर कुछ विशेषता है। उसमें से वर्तमानकाल का आश्रय करके पर्यायार्थिक नयसंबंधी स्पर्शनप्ररूपणा करने पर क्षेत्रप्ररूपणा के समान ही स्पर्शन का क्षेत्र है। अब अतीतकाल का आश्रय लेकर पर्यायार्थिकनयसंबंधी स्पर्शन की प्ररूपणा की जाती है-स्वस्थानस्वस्थान, विहारवत्स्वस्थान, वेदनासमुद्घात, कषायसमुद्घात, वैक्रियिकसमुद्घात, तैजसमुद्घात और आहारकसमुद्घातगत प्रमत्तसंयतादि गुणस्थानवर्ती जीवों ने सामान्यलोक आदि चारों लोकों का असंख्यातवाँ भाग स्पर्श किया है और मनुष्य क्षेत्र का संख्यातवाँ भाग स्पर्श किया है। यहाँ कोई शंका करता है कि मानुषक्षेत्र के भीतर अप्रतिहत गमनशील विक्रियादि ऋद्धिप्राप्त ऋषियों ने अतीतकाल में संपूर्ण मानुषक्षेत्र स्पर्श किया है, इसलिए मनुष्यक्षेत्र का संख्यातवाँ भाग किया है, यह वचन घटित नहीं होता है?

आचार्य इसका समाधान देते हैं कि यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि उतने ऊपर एक लाख योजनप्रमाण गमन करने की संभावना नहीं है।

शंका-सुमेरुपर्वत के मस्तक (शिखर) पर चढ़ने में समर्थ ऋषियों के एक लाख योजन ऊपर गमन करने की संभावना क्यों नहीं है?

समाधान-सुमेरुपर्वत के ऊध्र्वप्रदेश में ऋषियों के गमन करने की वह शक्ति भले ही होवे किन्तु मानुषक्षेत्र के भीतर एक लाख योजन ऊपर जाने की वह शक्ति सर्वत्र नहीं है, अन्यथा मनुष्यक्षेत्र के संख्यातवें भाग में, ऐसा आचार्यों का वचन नहीं बन सकता है। अथवा, अतीतकाल में विक्रियादि लब्धिसम्पन्न मुनिवरों ने सर्व ही मनुष्यक्षेत्र स्पर्श किया है अन्यथा उसका मनुष्यक्षेत्र यह नाम नहीं बन सकता है। स्वस्थानस्वस्थान की अपेक्षा उक्त प्रमत्तादि संयतों ने मनुष्यक्षेत्र का संख्यातवाँ भाग ही स्पर्श किया है।

शंका-यदि ऐसा है, तो पंचेन्द्रिय तिर्यंचों का भी पूर्वभव के वैरी देवों के प्रयोग से एक लाख योजन ऊपर तक जाना प्राप्त होता है?

समाधान-यदि तिर्यंचों का ऊपर एक लाख योजन तक जाना प्राप्त होता है, तो होवे, उसमें भी कोई दोष नहीं है। मारणान्तिक समुद्घातगत उन्हीं प्रमत्तसंयतादिकों ने सामान्यलोक आदि चार लोकों का असंख्यातवाँ भाग और मनुष्य क्षेत्र से असंख्यातगुणा क्षेत्र स्पर्श किया है।

शंका-मारणान्तिक समुद्घात को प्राप्त प्रमत्तसंयतादि गुणस्थानवर्ती मुनियों का मारणान्तिक क्षेत्र तिर्यग्लोक का संख्यातवाँ भाग, तिर्यग्लोक से संख्यातगुणा अथवा असंख्यातगुणा क्यों नहीं होता है?

समाधान-नहीं होता है, क्योंकि उसके ऊध्र्ववृत्त पैंतालीस लाख योजन विष्कम्भ वाले, समपरिमंडल आकार से संस्थित और सात राजु आयत होने पर वह क्षेत्र तिर्यग्लोक का संख्यातवाँ भाग नहीं होता है, क्योंकि वह क्षेत्र संख्यात प्रतरांगुलमात्र जगत्श्रेणी प्रमाण है और न संख्यात राजु आयत तथा कल्पवासी विमानों के प्रमाण तिर्यग्रूप से प्रवर्तमान उक्त जीवों का पैंतालीस लाख योजन विस्तार और संख्यात अंगुल बाहल्य वाला मारणान्तिक क्षेत्र भी तिर्यग्लोक का संख्यातवाँ भाग होता है, क्योंकि पूर्र्वोक्त क्षेत्र से संख्यातगुणे हीन इस क्षेत्र को तिर्यग्लोक का संख्यातवाँ भाग मानने में विरोध आता है।

शंका-विमानों में प्रतिष्ठित असंख्यात उपपादशय्या वाले भवनों के सम्मुख प्रवर्तमान उक्त जीवों के समस्त मारणान्तिक क्षेत्र संयुक्त करने पर तिर्यग्लोक का संख्यातवाँ भाग क्यों नहीं हो जाता है?

समाधान-नहीं, क्योंकि श्रेणी के असंख्यातवें भाग तथा असंख्यात योजन विस्तृत क्षेत्रों के ग्रहण करने पर भी तिर्यग्लोक का संख्यातवाँ भाग प्राप्त होना असंभव है।

इस सूत्र में सयोगकेवलियों का ग्रहण नहीं होता है क्योंकि अगले सूत्र में उनका पृथक कथन किया जा रहा है।

इस प्रकार छठे स्थल में प्रमत्तादि महामुनियों के स्पर्शन का कथन करने वाला एक सूत्र पूर्ण हुआ । अब सयोगकेवली भगवन्तों का स्पर्शन बताने के लिए सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

सयोगिकेवली भगवन्तों ने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है? लोक का असंख्यातवाँ भाग, असंख्यात बहुभाग और सर्वलोक स्पर्श किया है।।१०।।

हिन्दी टीका-सूत्र का अर्थ सुगम है। वर्तमानकाल और अतीतकाल का भी आश्रय करके पर्यायार्थिकनय की अपेक्षा स्पर्श की प्ररूपणा भी क्षेत्र के समान है। विशेष बात यह है कि कपाट समुद्घातगत स्पर्शनक्षेत्र पैंतालीस लाख योजन बाहल्यवाला एक जगत्प्रतरप्रमाण कपाटक्षेत्र होता है। यह कायोत्सर्गस्थ केवली की अपेक्षा जानना और दूसरा अर्थात् समुपविष्ट केवली के कपाट समुद्घात का क्षेत्र नब्बे लाख योजन बाहल्य वाले जगत् प्रतरप्रमाण कपाट समुद्घातसंबंधी स्पर्शन क्षेत्र होता है। इस प्रकार दोनों कपाट क्षेत्रों को मिला देने पर तिर्यग्लोक से संख्यात गुणा क्षेत्र हो जाता है।

लोकपूरण समुद्घात में सम्पूर्ण लोक का स्पर्श हो जाता है।

तात्पर्य यह है कि निजशुद्धस्वसंवेदनज्ञान से अथवा अध्यात्म ध्यान के द्वारा निज शुद्ध-बुद्ध परमात्मा का स्पर्श करके केवलज्ञान को प्राप्त करके पुन: अपने अतीन्द्रिय-अनंत केवलज्ञान के बल से अथवा आत्मा से उत्पन्न ज्ञान की किरणों के द्वारा हम सभी को लोकाकाश तथा अलोकाकाश दोनों को स्पर्श करना चाहिए, ऐसी भावना से गुणस्थानों में स्पर्शनानुगम का अध्ययन करना चाहिए।

इस प्रकार सप्तमस्थल में सयोगकेवली के स्पर्शन को प्रतिपादित करने वाला एक सूत्र पूर्ण हुआ।

इस प्रकार श्रीमान् भगवान् पुष्पदन्त-भूतबली भट्टारक द्वारा विरचित षट्खण्डागम के प्रथम खंड में चतुर्थग्रंथ में स्पर्शनानुगम नामक प्रकरण में धवला टीका को प्रमुख करके तथा अन्य अनेक ग्रंथों के आधार से जम्बूद्वीप रचना की प्रेरिका गणिनी ज्ञानमती कृत सिद्धान्तचिंतामणि टीका में गुणस्थानों में स्पर्शनानुगम का प्ररूपण करने वाला प्रथम महाधिकार पूर्ण हुआ।


EiMdL6nin.jpeg.jpg