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०१. मङ्गलाचरण

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उँâ नमः सिद्धेभ्यः
श्री गौतम गणधर वाणी
भगवान महावीरस्वामी के प्रथम गणधर
श्रीगौतमस्वामी विरचित
(संकलन एवं अमृतर्विषणी टीका—गणिनी ज्ञानमती माताजी)
(अध्याय १)
श्रीगौतमस्वामी उवाच—
मंगलाचरण
श्रीमते वर्धमानाय, नमो नमितविद्विषे।
यज्ज्ञानान्तर्गतं भूत्वा, त्रैलोक्यं गोष्पदायते।।१।।
—पद्यानुवाद—चौबोल छंद—
श्रीमन् वर्धमान को प्रणमूँ, जिनने अरि को नमित किया।
जिनके पूर्णज्ञान में त्रिभुवन, गौखुर सम दिखलाई दिया।।
ऐसे अंतिम तीर्थंकर श्री—महावीर को नित्य नमूं।
वीर महति महावीर सन्मती—प्रभु को कोटि कोटि प्रणमूं।।१।।
अर्थ—श्री वर्धमान स्वामी को नमस्कार होवे, जिन्होंने उपसर्ग करने वाले संगमदेव आदि विद्विष—शत्रुओं को भी नमित किया है एवं जिनके केवलज्ञान में ये तीनों लोक गोष्पद—गाय के पैर के गड्ढे के समान लघु प्रतीत होते हैं। ऐसे अंतिम तीर्थंकर महावीरस्वामी को नमस्कार होवे।।१।।

अमृतर्विषणी टीका—
दिगम्बर जैन ग्रंथों के अनुसार आज कोई भी द्वादशांग या अंगबाह्य के ग्रंथ नहीं हैं, क्योंकि इनको लिपिबद्ध नहीं किया जा सकता था। परम्परागत आचार्यों ने जो कुछ मौखिक श्रुतज्ञान गुरुओं से प्राप्त किया, कालांतर में श्रीधरसेनाचार्य के शिष्य पुष्पदंत—भूतबलि नाम के दो आचार्यों ने षट्खंडागम ग्रंथ को लिपिबद्ध करके रचना की है। ऐसा इन्द्रनंदि आचार्य आदि ने श्रुतावतार आदि ग्रंथों में लिखा है।
इसी प्रकार श्री गौतमस्वामी के मुखकमल से विनिर्गत चार महान रचनायें आज वर्तमान में भी उपलब्ध हैं। १. चैत्यभक्ति, २. दैवसिक प्रतिक्रमणदण्डकसूत्र, ३. पाक्षिक प्रतिक्रमणदण्डकसूत्र, ४. श्रावक प्रतिक्रमण। ये चारों ग्रंथ मौखिकरूप से आचार्यों को प्राप्त होते रहे हैं, पुन: किन्हीं महान आचार्यों ने इन्हें लिपिबद्ध करके हमें और आप सभी भव्यात्माओं के लिये सुरक्षित रखा है।
टीकाकारों के वचनों से ही हम इन रचनाओं को ‘श्रीगौतमस्वामी प्रणीत’ मानते हैं यथा—
‘‘श्री गौतमस्वामीमुनीनां दुष्षमकाले दुष्परिणामादिभि: प्रतिदिनमुर्पािजतस्य कर्मणो विशुद्ध्यर्थं प्रतिक्रमणलक्षणमुपायं विदधानस्तदादौ मंगलार्थमिष्टदेवताविशेषं नमस्करोति—
श्रीमते वर्धमानाय, नमो नमितविद्विषे।
यज्ज्ञानान्तर्गतं भूत्वा, त्रैलोक्यं गोष्पदायते।।१।।
टीका—नमो नमस्कारोऽस्तु। कस्मै ? वर्धमानाय अन्तिमतीर्थंकरदेवाय।
कथम्भूताय ? श्रीमते। श्रीरन्तरङ्गबहिरङ्गलक्षणाऽनन्तज्ञानदर्शनसमवसरणादिस्वरूपा विभूतिर्विद्यते यस्याऽसौ श्रीमान्। तस्मै श्रीमते। पुनरपि िंक विशिष्टाय ? नमितविद्विषे नमिता: नामिता: प्रणामं कारिता: विद्विष: उपसर्गकारिण: सङ्गमदेवादय: शत्रव: येन तस्मै (नम:) यस्य भगवतो ज्ञाने त्रिभुवनमीदृशं भवतीत्याह—‘यज्ज्ञानान्तर्गतं भूत्वा त्रैलोक्यं गोष्पदायते।’ यस्य ज्ञाने सकलविमलस्वरूपेन्तर्गतं भूत्वा ग्राह्ययाऽन्त: प्रविष्य त्रैलोक्यं गोष्पदायते गोष्पदमिवात्मानमाचरति१।।’’
अर्थ—नमस्कार होवे। किनको ? अन्तिम तीर्थंकर भगवान श्री वर्धमान स्वामी को। वे वैâसे हैं ? श्रीमान् हैं—अन्तरंग अनंतज्ञान, दर्शन व बहिरंग समवसरण आदि स्वरूप लक्ष्मी है जिनके पास, ऐसे वे वर्धमान स्वामी श्रीमान् हैं। पुन: वे वैâसे हैं ? नमस्कार करा लिया है—प्रणाम करा लिया है उपसर्गकारी संगमदेव आदि शत्रुओं को जिन्होंने ऐसे वे नमित विद्विष हैं, उनको यहाँ नमस्कार किया है।
उन भगवान के ज्ञान में यह त्रैलोक्य गोष्पद—गौखुर के समान दिखता है—जिनके सकल, विमल, केवलज्ञान में यह सारा तीनलोक ग्राह्यरूप होने से—ज्ञान के अंतर्गत झलकने से गाय के पैर के नीचे बने हुये छोटे से गड्ढे के समान झलकता है। ऐसे श्रीमान् वर्धमान स्वामी को नमस्कार होवे।
यहाँ ऐसे महावीरस्वामी को नमस्कार करके श्रीगौतमस्वामी ने प्रतिक्रमणदण्डक सूत्रों को कहा है। जिनका हम सभी दिगम्बर जैन मुनि, आचार्य, गणिनी र्आियकायें आदि प्रतिदिन पाठ करते हैं। अर्थात् दैवसिक—रात्रिक प्रतिक्रमण पढ़ते हैं।
ऐसे ही पाक्षिक प्रतिक्रमण में एक स्थल पर स्वयं श्री गौतमस्वामी ने अपने नाम को संबोधित किया है। यथा—
‘‘जो सारो सव्वसारेसु, सो सारो एस गोदम।
सारं झाणं त्ति णामेण, सव्वबुद्धेिंह देसिदं।।
हे गौतम ! सर्वसारों में भी जो सार है वह सार ‘ध्यान’ इस नाम से कहा गया है ऐसा सभी सर्वज्ञ भगवंतों ने कहा है।
इस उद्धरण भी ये रचनायें श्री गौतमस्वामी के मुखकमल से विनिर्गत हैं। ऐसा स्पष्ट हो जाता है।
श्री वीरसेनाचार्य ने ‘कसाय पाहुड’ ग्रंथ की ‘जयधवला टीका’ के मंगलाचरण में छठी गाथा में कहा है, कि—
जेणिह कसायपाहुड—मणेयणयमुज्जलं अणंतत्थं।
गाहाहि विवरियं तं गुणहरभडारयं वंदे१।।६।।
अर्थ—जिन्होंने इस आर्यावर्त में अनेक नयों से युक्त, उज्ज्वल और अनन्त पदार्थों से व्याप्त कषायप्राभृत का गाथाओं द्वारा व्याख्यान किया, उन गुणधर भट्टारक को मैं वीरसेन आचार्य नमस्कार करता हूँ।।६।।
इस कथन से स्पष्ट है कि श्री वीरसेनाचार्य श्री गुणधर आचार्य की गाथाओं को अनन्त अर्थ—अनन्त पदार्थों के अर्थ से व्याप्त—र्गिभत माना है। पुन: श्री गौतमस्वामी जो कि साक्षात् भगवान महावीर स्वामी के समवसरण में ही रहे हैं और जिन्होंने अन्तर्मुहूर्त में द्वादशांग की रचना की है तथा जिस दिन र्काितक कृष्णा अमावस्या को भगवान को मोक्ष प्राप्त हुआ, उसी दिन सायंकाल में श्री गौतमस्वामी को केवलज्ञान प्राप्त हो गया अत: श्री गौतमस्वामी भगवान महावीर प्रभु को छोड़कर एक दिन क्या एक क्षण भी अलग नहीं रहे हैं, उनकी वाणी—उनके द्वारा कहे गये श्लोक व मंत्र व प्रतिक्रमण दण्डकसूत्रादि के एक—एक पद अनन्त अर्थ—अनंत पदार्थों के अर्थ को लिये हुये हों, इसमें कोई आश्चर्य नहीं है।
वर्तमान में दिगम्बर जैन परम्परा में द्वादशांग शास्त्र नहीं हैं क्योंकि वे लिपिबद्ध नहीं हो सकते हैं, अत: वर्तमान में जितने भी जैन वाङ्मय—शास्त्र उपलब्ध हैं, वे सभी चार अनुयोगों में विभक्त हैं—
१. प्रथमानुयोग, २. करणानुयोग, ३. चरणानुयोग और ४. द्रव्यानुयोग।
१. प्रथमानुयोग में तीर्थंकर आदि महापुरुषों के जीवनचरित्र का वर्णन किया गया है।
२. करणानुयोग में तीनलोक, चतुर्गति, युगपरिवर्तन आदि का कथन है।
३. चरणानुयोग में मुनि एवं श्रावक धर्म का वर्णन है।
४. द्रव्यानुयोग में जीव, अजीव आदि तत्त्व बंध, मोक्ष आदि का कथन है।
श्री गौतमस्वामी के मुखकमल से विनिर्गत इस मंगलाचरण में भी चारों अनुयोग समाविष्ट हैं। यथा—
‘श्रीमते वर्धमानाय नम:’, इस चरण में प्रथमानुयोग समाविष्ट है। भगवान महावीर अंतिम तीर्थंकर हैं। उनका नाम लेने से—इस पद से चौबीसों तीर्थंकरों को भी लिया जाता है तथा चौबीसों तीर्थंकरों के अंतराल में होने वाले १२ चक्रवर्ती, ९ बलभद्र, ९ नारायण, ९ प्रतिनारायण इन त्रेसठ शलाका पुरुषों के जीवनवृत्त भी इसी से जाने जायेंगे।
एवं इनके अंतराल में होने वाले सभी कामदेव आदि पदधारी तथा सामान्य केवली आदि महापुरुष भी लिये जायेंगे। इस प्रकार इस एक पद में संपूर्ण प्रथमानुयोग आ जायेगा।
इन सभी का जीवन परिचय महापुराण व उसके अन्तर्गत उत्तरपुराण तथा अन्य—अन्य कथा ग्रंथों से पढ़ना चाहिये—जानना चाहिये।
चौबीस तीर्थंकरों के नाम—
१. श्री वृषभदेव, २. श्री अजितनाथ, ३. श्री संभवनाथ, ४. श्री अभिनन्दननाथ, ५. श्री सुमतिनाथ, ६. श्री पद्मप्रभ, ७. श्री सुपाश्र्वनाथ, ८. श्री चन्द्रप्रभ, ९. श्री पुष्पदंतनाथ, १०. श्री शीतलनाथ, ११. श्री श्रेयांसनाथ, १२. श्री वासुपूज्यनाथ, १३. श्री विमलनाथ, १४. श्री अनंतनाथ, १५. श्री धर्मनाथ, १६. श्री शांतिनाथ, १७. श्री वुंâथुनाथ, १८. श्री अरनाथ, १९. श्री मल्लिनाथ, २०. श्री मुनिसुव्रतनाथ, २१. श्री नमिनाथ, २२. श्री नेमिनाथ, २३. श्री पाश्र्वनाथ, २४. श्री महावीरस्वामी।
बारह चक्रवर्ती के नाम—
१. भरत, २. सगर, ३. मघवा, ४. सनत्कुमार, ५. शान्ति, ६. वुंâथु, ७. अर, ८. सुभौम, ९. पद्म, १०. हरिषेण, ११. जयसेन, १२. ब्रह्मदत्त।
नव बलभद्र के नाम—
१. विजय, २. अचल, ३. धर्म, ४. सुप्रभ, ५. सुदर्शन, ६. नन्दी, ७. नन्दिमित्र, ८. श्रीराम, ९. पद्म—बलदेव।
नव नारायण के नाम—
१. त्रिपृष्ठ, २. द्विपृष्ठ, ३. स्वयंभु, ४. पुरुषोत्तम, ५. पुरुषिंसह, ६. पुरुष पुण्डरीक, ७. दत्त, ८. लक्ष्मण, ९. श्रीकृष्ण।
२. नव प्रतिनारायण के नाम—
३. १. अश्वग्रीव, २. तारक, ३. मेरक, ४. मधुवैâटभ, ५. निशुम्भ, ६. बलि, ७. प्रहरण, ८. रावण, ९. जरासंध।
४. ‘नमो नमित विद्विषे’ इस चरण में चरणानुयोग समाविष्ट है। बहिरंग शत्रुओं को एवं अंतरंग शत्रुओं को—राग, द्वेष, मोह आदि को आचरण—अणुव्रत, महाव्रत, ध्यान आदि के द्वारा ही झुकाया जाता है—जीता जाता है।
५. ‘‘यज्ज्ञानान्तर्गतं भूत्वा’’ इस चरण में द्रव्यानुयोग र्गिभत है। ज्ञान के पाँच भेदों में—मति, श्रुत, अवधि, मन:पर्यय एवं केवलज्ञान में से अंतिम पांचवें केवलज्ञान में ही तीनों लोक गाय के पैर के गड्ढे के समान लघु दिखता है अर्थात् तीनों लोकों के समान अनंत—अनंत तीनलोक भी यदि हो जायें तो भी यह ज्ञान—केवलज्ञान विशाल—महान—बड़ा ही रहेगा, वह ज्ञान असीमित—अनंतानंत प्रमाण है। पुनश्च—
६. ‘‘त्रैलोक्यं गोष्पदायते’’ इस अंतिम चरण में संपूर्ण करणानुयोग र्गिभत है क्योंकि तीनों लोकों का कथन करने से चारों गतियों के समस्त जीव तथा तीनलोक के अग्रभाग पर विराजमान सिद्ध भगवान भी आ जाते हैं।
७. इस प्रकार से इस मंगलाचरण में प्रथमानुयोग के महापुराण—आदिपुराण, उत्तरपुराण, पद्मपुराण, जंबूस्वामी चरित ग्रंथ समाविष्ट हैं।
८. करणानुयोग में तिलोयपण्णत्ति, जंबूद्वीपपण्णत्ति, त्रिलोकसार, त्रिलोकभास्कर, जैन ज्योतिर्लोक आदि ग्रंथ समाविष्ट हैं।
९. चरणानुयोग में मूलाचार, आचारसार, अनगारधर्मामृत, उमास्वामीश्रावकाचार, वसुनंदिश्रावकाचार, रत्नकरण्डश्रावकाचार आदि ग्रंथ आते हैं।
१०. द्रव्यानुयोग में षट्खण्डागम, गोम्मटसार जीवकांड, गोम्मटसार कर्मकांड, तत्त्वार्थसूत्र, सर्वार्थसिद्धि आदि ग्रंथ र्गिभत हैं।