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०१. मूलगुणाधिकार

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मूलगुणाधिकार

अध्याय १

प्रश्न १— समवसरण के बारह कोठों में सर्वप्रथम कोठे में कौन विराजमान रहते हैं ?

उत्तर—समवसरण के प्रथम कोठे में मुनिगण रहते हैं उनकी प्रमुखता करके भगवान की दिव्यध्वनि में से प्रथम अंग गणधर देव आचारांग नाम से रचते हैं।

प्रश्न २— आचारांग पद की संख्या प्रमाण कितनी है ?

उत्तर—आचारांग की पद संख्या अठारह हजार प्रमाण है।

प्रश्न ३— मुनियों के आचार की प्ररूपणा करने वाला कौन—सा ग्रंथ हैं ?

उत्तर—मुनियों के आचार की प्ररूपणा करने वाला ‘मूलाचार ग्रंथ’ सर्वप्रथम है।

प्रश्न ४— मूलाचार ग्रंथ के आधार पर कौन—कौन से ग्रंथ रचे गये हैं ?

उत्तर—मूलाचार ग्रंथ के आधार पर आचारसार, भगवती आराधना, मूलाचार प्रदीप, अनगार धर्मामृत आदि ग्रंथ रचे गए हैं।

प्रश्न ५— मूलाचार ग्रंथ के मूलग्रंथ कर्ता कौन हैं ?

उत्तर—मूलाचार ग्रंथ के मूल ग्रंथकर्ता श्रीमत् कुन्दकुन्दाचार्य एवं श्रीमत् वट्टकेराचार्य हैं।

प्रश्न ६— मूलाचार ग्रंथ के टीकाकार कौन—कौन हैं ?

उत्तर—मूलाचार ग्रंथ के टीकाकार दो आचार्य हैं—श्री वसुनन्दि सिद्धान्त चक्रवर्ती आचार्य और श्री मेघचन्द्राचार्य।

प्रश्न ७— दोनों आचार्यों ने कौन सी टीका रची है ?

उत्तर—श्री वसुनन्दि आचार्य श्री ने संस्कृत में ‘आचारवृत्ति’ नाम से इस मूलाचार पर टीका रची है और श्री मेघचन्द्राचार्य ने ‘मुनिजनिंचतामणि’ नाम से कन्नड़ भाषा में टीका रची है।

श्री वसुनन्दि आचार्य ने ग्रंथकर्ता का नाम प्रारम्भ में श्री वट्टकेराचार्य दिया है जबकि मेघचन्द्राचार्य ने‘श्री कुन्दकुन्दाचार्य’ कहा है। आद्योपान्त दोनों ग्रंथ पढ़ लेने से यह स्पष्ट है कि यह मूलाचार एक ही है। एक ही आचार्य की कृति है दोनों में गाथाएँ सभी ज्यों की त्यों हैं।अत: वट्टकेराचार्य और श्री वुंâदवुंâदाचार्य ये दो आचार्य नहीं हैं। श्री कुन्दकुन्दाचार्य को ही टीकाकार‘वट्टकेराचार्य’ कहते होंगे। श्री कुंदकुंदाचार्य ने ‘परिकर्म’ नाम की जो षट्खण्डागम के त्रिखण्डों पर वृत्ति लिखी है उससे उनका नाम वृत्तिकार ‘वट्टकेर’ इस रूप से भी प्रसिद्ध हुआ होगा और वसुनन्दि आचार्य ने आचारवृत्ति के प्रारम्भ में वट्टकेर नाम का उपयोग किया होगा अन्यथा उस ही वृत्ति के अन्त्य में ‘‘कुन्दकुन्दाचार्य प्रणीत मूलाचारख्यविवृत्ति:।’’ ऐसा उल्लेख कदापि नहीं करते। अत: जो केवली भगवान ही जानते हैं हम तो क्षयोपशम अज्ञानी ही है।


प्रश्न ८— श्रीमद् कुन्दकुन्दाचार्य कृत मूलाचार में (मेघचन्द्राचार्य की टीका) गाथाओं की संख्या कितनी है ?

उत्तर-श्रीमद् कुन्दकुन्दाचार्य कृत मूलाचार में (मेघचन्द्राचार्य की टीका) गाथाओं की संख्या चौदह सौ तीन(१४०३) है।

प्रश्न ९— श्रीमद् वट्टकेराचार्य कृत मूलाचार में (वसुनन्दि आचार्य की टीका) गाथाओं की संख्या कितनी है ?

उत्तर—श्रीमद् वट्टकेराचार्य कृत मूलाचार में (वसुनन्दि आचार्य की टीका) गाथाओं की संख्या बारह सौ बावन (१२५२) है।

प्रश्न १०— मूलाचार ग्रंथ कितने अधिकारों में विभाजित है ?

उत्तर—मूलाचार ग्रंथ बारह अधिकारों में विभाजित है। श्री वट्टकेर आचार्य ने उन अधिकारों के नाम इस क्रम से दिये हैं—

(१) मूलगुण,

(२) बृहत्प्रत्याख्यानसंस्तरस्तव

(३) संक्षेप—प्रत्याख्यान,

(४) समाचार,

(५) पंचाचार

(६) पिण्डशुद्धि,

(७) षटवश्यक,

(८) द्वादशानुप्रेक्षा,

(९) अनगारभावना,

(१०) समयसार,

(११) शीलगुण और

(१२) पर्याप्ति।

प्रथम अधिकार में कुल ३६ गाथा हैं। आगे क्रम से ७१, १४, ७६, २२२, ८३, १९३, ७६, १२४, १२५, २६, और २०६ हैं। इस तरह कुल गाथायें १२५२ हैं। श्री मेघचन्द्राचार्य ने भी ये ही १२ अधिकार माने हैं। अन्तर इतना ही है कि उसमें आठवां अधिकार अनगार भावना है और नवम द्वादशानुप्रेक्षा। ऐसे ही ११वाँ अधिकार पर्याप्ति है। पुन: १२ वें में शीलगुण को लिया है। इसमें गाथाओं की संख्या क्रम से ४५, १०२, १३, ७७, २५१, ७८, २१८, १२८, ७५, १६०, २३७, और २७ है।

प्रश्न ११—मूलाचार ग्रंथ के हिन्दी अनुवाद कर्ता कौन—कौन हैं ?

उत्तर—(१) मूलाचार ग्रंथ के प्रथम हिन्दी अनुवादकर्ता पण्डित श्री जिनदास जी फडकुले, सोलापुर महाराष्ट्र के हैं। हिन्दी भाषा में अनुदित कुन्दकुन्दाचार्य विरचित मूलाचार ग्रंथ चारित्र चक्रवर्ती आचार्य शांतिसागर महाराज श्री की प्रेरणा से ही आचार्य शान्तिसागर जिनवाणी जीर्णोद्धारक संस्था, फलटण (महाराष्ट्र) से वीर संवत् २४८४ में प्रकाशित हुआ है।

वीर संवत् २४७१ (सन् १९४४) में जब चारित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री शान्तिसागर जी ने पं. जिनदास जीफडकुले को मूलाचार की एक प्रति हस्तलिखित दी थी, जिसमें कन्नड़ टीका थी। हिन्दी के लिए प्रेरणा दी थी।

मूलाचार ग्रंथ के द्वितीय हिन्दी अनुवाद कर्ता पं. पूज्य गणिनी र्आियकारत्न श्री १०५ ज्ञानमति माताजी हैं। पूज्य माताजी ने श्री वसुनन्दी सिद्धान्त चक्रवर्ती द्वारा विरचित आचारवृत्ति संस्कृत टीका की हिन्दी अनुवाद किया है। वैशाख वदी २, वीर संवत् २५०३ में अनुवाद प्रारम्भ किया था। वैशाख शुक्ल ३, अक्षय तृतीया वीर संवत् २५०४ दिनांक १०-५-१९७८ दिन बुधवार को हस्तिनापुर तीर्थक्षेत्र पर ही इस अनुवाद को पूर्ण किया था।

प्रश्न १२— मूलाचार ग्रंथ के बारह अधिकार में किन—किन विषयों का कथन है ?

उत्तर—(१) मूलगुणाधिकार : इस अधिकार में अट्ठाईस मूलगुणों के नाम बतलाकर पुन: प्रत्येक का लक्षण अलग—अलग गाथाओं में बतलाया गया है। अनन्तर इन मूलगुणों को पालन करने से क्या फल प्राप्त होता है यह र्नििदष्ट है।

(२)वृहत्प्रत्याख्यान संस्तरस्तवाधिकार : यह दूसरा अधिकार है। इसमें क्षपक को सर्व पापों का त्याग करके मरणसमय के दर्शनाराधनादि चार आराधनाओं में स्थिर रहने के लिए उपदेश किया है। क्षुधादि परीषहों को जीतकर निष्कषाय होकर क्षपक शरीर त्याग करे ऐसा उपदेश है।

(३) संक्षेपप्रत्याख्यानाधिकार : इस अधिकार में िंसह, व्याघ्रादिकों से आकस्मिक—मरण उपस्थित होने पर सर्व पापों का, आथ्र कषायाहारादिकों का त्याग कर, समताभाव में स्थिर होकर प्राण त्याग करना चाहिए ऐसा विवेचन है।

(४) समाचाराधिकार : औधिक और पदविभागिक इच्छाकारादि दश प्रकार के आचारों का वर्णन है। स्वछंद आचार से जिनधर्म का नाश होता है और समाचार से जगन्मान्यता र्कीित, सुख और मोक्ष प्राप्त होता है।

(५)पंचाचाराधिकार : इसमें दर्शनाचार ज्ञानाचारादि पाँच आचारों का और उनके भेदों का सविस्तार वर्णन करके जीवाणि सप्त तत्त्वों का विवेचन किया है।

(६) पिण्डशुद्धयाधिकार : मुनियों के ४६ आहारादि दोषों का सविस्तार वर्णन है। इसमें आहार कब लेना चाहिए, क्यों लेना चाहिए इत्यादि बातों का सविस्तार विवेचन है। आहारशुद्धि से रत्नत्रय शुद्धि होती है अत: शुद्ध आहार लेना चाहिए ऐसा आहार शुद्धि का फल प्रतिपादन किया है।

(७) षडावश्यकाधिकार : इसमें सामायिकादि छह आवश्यकों के नामादिक निक्षेपों के द्वारा वर्णन किया है। कृतिकर्म के बत्तीस दोषों का और कायोत्सर्ग के दोषों का वर्णन किया है। आसिका और निषिद्यका के विवेचन के अनन्तर षडावश्यक के पालने से सर्व कर्मों का नाश होता है।

(८) अनगारभावनाधिकार : इस अधिकार में िंलग, व्रत, वसति, विहार, शिक्षा, ज्ञान, शरीर, संस्कारत्याग, वाक्य, तप और ध्यान संबंधी दश शुद्धियों का तथा मुनियों की चर्या का यथार्थ विवेचन है।

(९)द्वादशानुप्रेक्षाधिकार : अ्िनात्यादि अनुप्रेक्षाओं का वर्णन किया है तथा इनकी भावना से परिणाम शुद्धि होती है और कर्मक्षय होता है।

(१०) समयासाराधिकार : इसमें चारित्रशुद्धि के हेतुओं का कथन है। चार प्रकार के िंलग का और दश प्रकार के स्थितिकल्प का भी अच्छा विवेचन है। ये हैं—

१. अचेलकत्व २. अनौद्देशिक३.शय्यागृहत्याग ४. राजिंपडत्याग ५. कृतिकर्म ६. व्रत ७. ज्येष्ठता ८. प्रतिक्रमण ९. मासस्थितिकल्प और १०. पर्यवस्थितिकल्प है।

(११) शीलगुणाधिकार : इसमें १८ हजार शील के भेदों का विस्तार है। तथा ८४ लाख उत्तरगुणों का भी कथन है।

(१२) पर्याप्त्यधिकार : ङ्काीव की छह पर्याप्तियों को बताकर संसारी जीव के अनेक भेद प्रभेदों का कथन किया है। क्योंकि जीवों के नाना भेदों को जानकर ही उनकी रक्षा की जा सकती है। अनन्तर कर्म प्रकृतियों के क्षय का विधान है। क्योंकि मूलाचार ग्रंथ के पढ़ने का फल मूलगुणों को ग्रहण करके अनेक उत्तरगुणों को भी प्राप्त करना है। पुन: तपश्चरण और ध्यान विशेष के द्वारा कर्मों को नष्ट कर देना ही इसके स्वाध्याय का फल है।

प्रश्न १३— श्रीमद् कुन्दकुन्दाचार्य एवं वट्टकेराचार्य श्री ने मूलाचार ग्रंथ के मंगलाचरण में किनको नमस्कार किया है और प्रतिज्ञा में क्या कहा है ?

उत्तर—

मूलगुणेसु विसुद्धे वंदित्ता सव्वसंजदे सिरसा।
इहपरलोगहिदत्थे मूलगुणे कित्तइस्सामि।।१।

श्रीमद् कुन्दकुन्दाचार्य एवं वट्टकेराचार्य श्री ने मूलाचार ग्रंथ के मंगलाचरण में प्रमत्त संयत से लेकर अयोग केवली पर्यंत तक सभी संयत और भूतपूर्व न्याय से सभी सिद्धों को नमस्कार किया है। लोक और परलोक के लिए हितकर मूलगुणों का वर्णन करूँगा, ऐसी प्रतिज्ञा में कहा है।

प्रश्न १४— मूलगुण किसे कहते है ?

उत्तर—मुनियों के प्रधान आचरण को मूलगुण कहते हैं। इनका आचरण करने से मुनियों को उत्तरगुण धारण करने की योग्यता उत्पन्न होती है।

प्रश्न १४— रत्नत्रय की सिद्धि के उपाय बताइए ?

उत्तर—

णाणादिरयणतियमिह सज्झं तं साधयंति जमणियमा।
जत्थ जमा सस्सदिया णियमा णियतप्पपरिणामा।। --कुंद. मूला.।।

सम्यग्ज्ञानादि रत्नत्रय की सिद्धि करने के लिए यम—नियम रूप व्रतों का पालन करना उपाय है।

प्रश्न १५— यम और नियम किसे कहते हैं ?

उत्तर—महाव्रत आदि आजीवन धारण करने योग्य होने से यमरूप है। और सामायिक, प्रतिक्रमण आदि अल्पकालावधि होने से नियम कहलाते हैं।

प्रश्न १६— मूलगुण और उत्तरगुण कितने हैं ?

उत्तर—

ते मूलुत्तरसण्णा मूलगुणा महव्वदादि अडवीसा।
तव परिसहादि भेदा, चोत्तीसा उत्तरगुणक्खा।। कुन्द. मूला.।।

मूलगुण और उत्तरगुण जीव के परिणाम हैं। महाव्रतादिक मूलगुण अट्ठावीस हैं। बारह तपश्चरण और बाईस परीषह इनको उत्तरगुण कहते हैं। इस प्रकार चौंतीस उत्तरगुण हैं।

प्रश्न १७— मूलगुण के नाम बताइए ?

उत्तर—

पंचय महव्वयाइं समिदीओ पंच जिणवरुद्दिट्ठा।
पंचेिंवदियरोहा छप्पि य आवासया लोओ।।२।।
आचेलकमण्हाणं खिदिसयणमदंतघंसणं चेव।
ठिदिभोयणेयभत्तं मूलगुणा अट्ठवीसा दु।।३।।

पाँच महाव्रत, पाँच समिति, पाँच इन्द्रियों का निरोध, छह आवश्यक लोच, आचलेक्य, अस्नान, क्षितिशयन, अदन्तधावन, स्थितिभोजन और एकभक्त ये अट्ठाईस मूलगुण जिनेन्द्रदेव ने यतियों के लिए कहे हैं।

प्रश्न १८— महाव्रत किसे कहते हैं ?

उत्तर—मुख्य व्रतों को महाव्रत कहते हैं। महान शब्द का अर्थ प्रधान ऐसा है। पापों से निवृत्त होना व्रत शब्द का अर्थ है। मोक्ष प्राप्ति के लिए कारणभूत िंहसादि के त्याग को व्रत कहते हैं।

प्रश्न १९— महाव्रतों के नाम निर्देशन करें ?

उत्तर—

हसाविरदी सच्चं अदत्तपरिवज्जणं च बंभं च।'
संगविमुत्ती य तहा महव्वया पंच ण्ण्णत्ता।।४।।

िंहसा का त्याग, सत्य बोलना, अदत्त वस्तुग्रहण का त्याग, ब्रह्मचर्य और परिग्रह त्याग ये पाँच महाव्रत हैं।

प्रश्न २०— अिंहसा महाव्रत किसे कहते हैं ?

उत्तर—

कायोंदियगुणमग्गणकुलाउजोणीसु सव्वजीवाणं।
णाऊण य ठाणादिसु िंहसादिविवज्जणमिंहसा।।५।।

काय, इन्द्रिय, गुणस्थान, मार्गणा, जीवसमास, कुल, योनि इनमें सभी जीवों का स्वरूप जानकर बैठना उठना, सोना, गमन करना, भोजन करना, हाथ पांव पैâलाना, संकुचित करना वगैरह क्रियाविशेष में होने वाला प्राणघात अर्थात् हिंसा को छोड़ना यह अिंहसा महाव्रत है।

प्रश्न २१— सत्य महाव्रत किसे कहते हैं ?

उत्तर—

रागादीहिं असच्चं चत्ता परतावसच्चवयणुत्तिं।
सुत्तत्थाणविकहणे अयधावयणुज्झणं सच्चं।।६।।

रागादि के द्वारा असत्य बोलने का त्याग करना और पर को ताप करने वाले सत्य वचनों के भी कथन का त्याग करना तथा सूत्र और अर्थ के कहने में अयथार्थ वचनों का त्याग करना सत्य महाव्रत है।

प्रश्न २२— अचौर्य महाव्रत किसे कहते हैं ?

उत्तर—

गामादिसु पडिदाइं अप्पप्पहुिंद परेण संगहिदं।
णादाणं परदव्वं अदत्तपरिवज्जणं तं तु।।७।।

ग्राम आदि में गिरी हुई, भूली हुई, रखी हुई इत्यादि जो कुछ भी छोटी बड़ी वस्तु है उनको ग्रहण नहीं करना और दूसरों ने जिनका संग्रह किया है ऐसे क्षेत्र, वास्तु धन, धान्य, पुस्तक, उपकरण, छात्र— शिष्य इनको भी ग्रहण नहीं करना अचौर्य महाव्रत अदत्त—परित्याग महाव्रत है।

प्रश्न २३— ब्रह्मचर्य महाव्रत किसे कहते हैं ?

उत्तर—

मादुसुदाभगिणीव य दट्ठूणित्थित्तियं च पडिरूवं।
इत्थिकहादिणियत्ती तिलोयपुज्जं हवे बंभं।।८।।

वृद्धा, बाला और युवती इन तीन प्रकार की स्त्रियों को माता, पुत्री और बहन के समान समझना और स्त्री कथा आदि से निवृत्त होना, तथा चित्र कर्म, लेप कर्म आदि भेदों में बने हुए स्त्रियों के प्रतिबिम्ब को एवं देव, मनुष्य और तिर्यंच सम्बन्धी स्त्रियों के रूप देखकर उनसे विरक्त होना ब्रह्मचर्य महाव्रत कहलाता है।

काष्ठ कर्म— नाचना, हँसना, गाना तथा तुरई व वीणा आदि वाद्यों को बजाने रूप क्रियाओं में प्रवृत्त हुए देव, मानुषी, तिर्यंच और मनुष्यों की काष्ठ से र्नििमत प्रतिमाओं को काष्ठ कर्म कहते हैं।

चित्र कर्म— चित्र से जो किये जाते हैं वे चित्रकर्म हैं।

पोत्त कर्म— पोत्त का अर्थ वस्त्र है उससे की गई मनुष्य, तिर्यंच आदि की प्रतिमाओं का नाम पोत्तकर्म है।

लेप्य कर्म— खड़िया मिट्टी, शर्वâरा (बालू) व मृत्तिका आदि के लेप का नाम लेप्य है, उससे र्नििमत मनुष्य आदि की प्रतिमाएँ लेप्यकर्म कही जाती है।

लयन कर्म— लयन का अर्थ पर्वत है, उसमें र्नििमत स्त्री आदि की प्रतिमाओं का नाम लयन कर्म है।

शैल कर्म— शैल का अर्थ पत्थर है, उसमें र्नििमत सभी प्रकार की स्त्रियों की प्रतिमाओं का नाम शैल कर्म है।

गृह कर्म— घोड़ा, हाथी, मनुष्य एवं वराह (सूकर) आदि के स्वरूप से र्नििमत घर गृहकर्म कहलाते हैं।

भित्ति कर्म— घर की दीवालों में उनसे अभिन्न रची गई स्त्री आदि प्रतिमाओं का नाम भित्तिकर्म है।

भेद कर्म— वस्त्र आदि को वैंâची से कतर कर बनाई गयी सभी प्रकार की स्त्रियों की प्रतिमाओं का नाम भेद कर्म है।

भाण्ड कर्म— बर्तनों पर सभी प्रकार की स्त्रियों के चित्र भाण्डकर्म है।

धातु कर्म— सोना—चाँदी आदि धातुओं पर उकेरे स्त्री चित्रों/प्रतिमाओं को धातु कर्म कहते हैं।

दत्त कर्म— हाथी के दाँतों पर खोदी गयी स्त्री आदि की प्रतिमाओं को दन्त कर्म कहते हैं।

प्रश्न २४— विकथा के कितने भेद हैं नाम निर्देशन करें ?

उत्तर—विकथा के चार भेद हैं—

१.स्त्री कथा— स्त्री कथनरूप कथा

२.भोजन कथा— भोजन का वर्णनरूप कथा

३.राजकथा— राजा की कथा

४.चोर कथा— चोरों का वर्णन करने वाली कथा

प्रश्न २५— ब्रह्मचर्य व्रत कितने प्रकार का होता है ?

उत्तर—ब्रह्मचर्य व्रत नौ प्रकार का, इक्यासी प्रकार का और एक सौ बासठ प्रकार का होता है। स्त्री पर्याय तिर्यंच, मनुष्य और देव इन तीन गतियों में पाई जाती हैं इसलिए स्त्री के मूलरूप से तीन भेद किये गये हैं। देवी में यद्यपि स्वभावत: बाल, वृद्ध और युवती का विकल्प नहीं होता तथापि विक्रिया से यह भेद सम्भव हैं। इन तीनों प्रकार की स्त्रियों के बाल, वृद्ध, और यौवन की अपेक्षा तीन अवस्थाएँ होती हैं। इस प्रकार ३ ² ३ · ९ प्रकार के भेदों में मन वचन काय गुणा करने पर ९ ² ३ · २७ को कृत कारित अनुमोदना से गुणा करने पर २७ ² ३ · ८१ इक्यासी को चेतन और अचेतन से गुणा करने पर ८१ ² २ · १६२ संख्या प्राप्त होती है।

प्रश्न २६— परिग्रह महाव्रत किसे कहते हैं ?

उत्तर—

जीवणिबद्धाऽबद्धा परिग्गहा जीवसंभवा चेव।
तेिंस सक्कच्चागो इयम्हि य णिम्ममोऽसंगो।।९।।

जो जीव से निबद्ध परिग्रह हं, जो जीव से अबद्ध परिग्रह क्षेत्र आदि हैं और जीव से सम्भव परिग्रह हैं, उन सबका मन वचन काया से सर्वत: त्याग करना और इतर संयम आदि उपकरणों में आसक्ति नहीं रखना, अति मूच्र्छा से रहित होना यह परिग्रह त्याग महाव्रत है।

प्रश्न २७— जीव निबद्ध परिग्रह किसे कहते हैं ? उत्तर—जो जीवों के आश्रित मिथ्यात्व वेद, राग, हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा, क्रोध, मान, माया, लोभ ये अंतरंग चौदह परिग्रह को जीवन निबद्ध परिग्रह कहते हैं।

प्रश्न २८— जीव अबद्ध परिग्रह किसे कहते हैं ? उत्तर—जीव से पृथक रहने वाले परिग्रह जैसे क्षेत्र, वास्तु, धन—धान्य आदि को जीव अबद्ध परिग्रह कहते हैं।

प्रश्न २९— चेतन परिग्रह किसे कहते हैं ?

उत्तर—दास, दासी, घोड़ा, वगैरह को चेतन परिग्रह कहते हैं।

प्रश्न ३१—जीव से सम्भव परिग्रह किसे कहते हैं ?

उत्तर—जीवों से उत्पत्ति है जिनकी ऐसे मोती, शंख, दाँत, कम्बल आदि अथवा क्रोध आदि को जीव से सम्भव परिग्रह कहते हैं।

प्रश्न ३२— समिति किसे कहते हैं ?

उत्तर—सम्यक् प्रकृति को समिति कहते हैं।

प्रश्न ३३— समितियाँ कितनी और कौन—कौन सी हैं ?

उत्तर—

इरिया भासा एसण णिक्खेवादाणमेव समिदीओ।
पदिठावणिया य तहा उच्चरादीण पंचविहा।।१०।।

ईर्या, भाषा, एषणा, आदान निक्षेपण और मल—मूत्रादि का प्रतिष्ठापन ये पाँच प्रकार की ही समितियाँ हैं।

प्रश्न ३४— ईर्या समिति किसे कहते हैं ?

उत्तर—

फासुयमग्गेण दिवा जुंगतरप्पेहिणा सकज्जेण।
जंतूणि परिहरंतेणिरियासमिदी हवे गमणं।।११।।

तीर्थयात्रा, गुरु वन्दना आदि धर्म कार्य के निमित्त चार हाथ आगे देखते हुए साधु के द्वारा दिवस में प्रासुक मार्ग से जो गमन किया जाता है वह ईर्या समिति कहलाती है।

प्रश्न ३५— प्रासुक मार्ग किसे कहते हैं ?

उत्तर—निकल गये हैं प्राणी जिसमें से उसे प्रासुक कहते हैं अर्थात् हाथी, ऊँट, गाय आदि और मनुष्य के समुदाय के गमन से उपर्मिदत हुआ जो मार्ग है। उसे प्रासुक मार्ग कहते हैं।

प्रश्न ३६— ईर्या समिति का समय कब का है ?

उत्तर—सूर्य के उदित होने पर, चक्षु से वस्तु स्पष्ट दिखने पर गमन करें।

प्रश्न ३७— भाषासमिति का स्पष्टीकरण करें ? </

उत्तर—

पेसुण्णहासकक्कसपरिंणदाप्पपसंसविकहादी।
वज्जित्ता सपरहियं भासासमिदी हवे कहणं।।१२।।

पैशून्य हँसी, कठोरता, परनिन्दा, अपनी प्रशंसा और विकथा आदि को छोड़कर अपने और पर के लिए हित रूप बोलना भाषा समिति है।

प्रश्न ३८— एषणा समिति का स्पष्टीकरण करें ?

उत्तर—

छादालदोससुद्धं कारणजुत्तं विसुद्धणवकोडी।
सीदादीसमभुत्ती परिसुद्धा एसणासमिदी।।१३।।

उद्गम, उत्पादन, आदि छियालीस दोषों से रहित शुद्ध, कारण से सहित, नवकोटि से विशुद्ध और शीत उष्ण आदि में समान भाव से आहार ग्रहण करना यह एषणा समिति है।

प्रश्न ३९— आदान निक्षेपण समिति किसे कहते हैं ?

उत्तर—

णाणुवहि संजमुविंह सउचुविंह अण्णमप्पमुविंह वा।
पयदं गहणिक्खेवो समिदी आदाणिक्खेवा।।१४।।

ज्ञान, संयम, शौच का उपकरण अथवा अन्य उपकरणों को भी प्रयत्नपूर्वक ग्रहण करना और रखना आदान निक्षेपण समिति है। ज्ञानोपकरण—शास्त्र, संयमोपकरण—पीछी, शौचोपकरण—कमण्डलु।

प्रश्न ४०— प्रतिष्ठापन समिति किसे कहते हैं ?

उत्तर—

एगंते अच्चित्ते दूरे गूढे विसालमविरोहे।
उच्चरादिच्चाओ पदिठावणिया हवे समिदी।।१५।।

एकांत, अचित, दूर, गूढ़, विशाल और विरोध रहित प्रदेशों में सावधानी पूर्वक मल आदि विसर्जन करना प्रतिष्ठापन समिति है।

एकांत— जहाँ पर असंयतजनों का गमनागमन नहीं है ऐसे निर्जन स्थान।

अचित्त— हरितकाय और त्रयकाय आदि से रहित जले हुए अथवा जले के समान स्थण्डिल— खुला मैदान।

दूर— ग्राम आदि से दूर स्थान को यहाँ दूर शब्द से सूचित किया गया है।

गूढ़— मर्यादा सहित स्थान अर्थात् जहाँ लोगों की दृष्टि नहीं पड़ सकती है।

विशाल— विस्तीर्ण या बिलादि से रहित स्थान।

विरोध रहित—जहाँ लोगों का विरोध नहीं है।

प्रश्न ४१—इन्द्रिय निरोध व्रत किसे कहते हैं ?

उत्तर—

चक्खू सोदं घाणं जिब्भा फासं च इंदिया पंच।
सगसगविसएिंहतो णिरोहियव्वा सया मुणिणा।।१६।

चक्षु, कर्ण, घ्राण, जिह्वा और स्पर्शन इन पाँच इन्द्रियों को मुनिराज अपने विषय में हमेशा नियंत्रण करते हैं यह इन्द्रिय निरोध व्रत है।

प्रश्न ४२— चक्षु निरोध व्रत किसे कहते हैं ?

उत्तर—

सच्चित्ताचित्ताणं किरियासंठाणवण्णभेएसु।
रागादिसंगहरणं चक्खुणिरोहो हवे मुणिणा।।१७।।

सचेतन और अचेतन पदार्थों की क्रिया चित्रकर्म आदि संस्थान और वर्ण के भेदों में मुनिराज के जो राग द्वेष आदि संग का त्याग है वह चक्षुनिरोध व्रत होता है।

प्रश्न ४३— श्रोत्रेन्द्रिय निरोध व्रत किसे कहते हैं ?

उत्तर—

सड्जादि जीवसद्दे वीणादिअजीवसंभवे सद्दे।
रागादीण णिमित्ते तदकरणं सोदरोधो दु।।१८।।

षड्ज आदि जीव शब्द और वीणा आदि से उत्पन्न हुए अजीव शब्द ये सभी राग द्वेष के हेतु हैं। इनका जो नहीं सुनना और नहीं करना है मुनिराज का वह श्रोत्रेन्द्रिय निरोध व्रत है।

प्रश्न ४४— घ्राणेन्द्रिय निरोध व्रत किसे कहते हैं ?

उत्तर—

पयडीवासणगंधे जीवाजीवप्पगे सुहे असुहे।
रागद्देसाकरणं घाणणिरोहो मुणिवरस्स।।१९।।

जीव और अजीव स्वरूप सुख और दु:ख रूप प्राकृतिक तथा पर—निमित्तिक गन्ध में जो राग—द्वेष का नहीं करना है वह घ्राणेन्द्रिय निरोध व्रत है।

प्रश्न ४५— रसनेन्द्रिय निरोध व्रत किसे कहते हैं ?

उत्तर—

असणादिचदुवियप्पे पंचरसे फासुगम्हि णिरवज्जे।
इट्ठाणिट्ठाहारे दत्ते जिब्भाजओऽगिद्धी।।२०।।

अशन आदि से चार भेदरूप, पंच रसयुक्त, प्रासुक, निर्दोष, पर के द्वारा दिये गये रूचिकर अथवा अरुचिकर आहार में लम्पटता का नहीं होना रसनेन्द्रिय निरोध व्रत है।

प्रासुक—सम्मूर्छन आदि जीवों से रहित को प्रासुक कहते हैं।

निर्दोष—आगम कथित आहार के दोषों से रहित भोजन निर्दोष कहलाता है।

प्रश्न ४६— भोज्य वस्तु के चार भेद कौन से हैं ?

उत्तर—अशन रोटी भात आदि, पान—दूध आदि पीने योग्य पदार्थ, स्वाद्य—इलायची आदि स्वादिष्ट वस्तुएँ, खाद्य—लड्डू आदि।

प्रश्न ४७— स्पर्शनेन्द्रिय निरोध व्रत किसे कहते हैं ?

उत्तर—

जीवाजीवसमुत्थे कक्कडमउगादिअट्ठभेदजुदे।
फासे सुहे य असुहे फासणिरोहो असंमोहो।।२१।।

जीव—स्त्री आदि के निमित्त से और अजीव से उत्पन्न हुए एवं कठोर कोमल आदि आठ भेदों से युक्त सुख और दु:ख रूप स्पर्श में मोह रागादि नहीं करना स्पर्शनेन्द्रिय निरोध व्रत है।

प्रश्न ४८— षट् आवश्यक क्रिया कौन सी हैं ?

उत्तर—

समदा थवो य वंदण पडिक्कमणं तहेव णादव्वं।
पच्चक्खाणं विसग्गो करणीयावासया छप्पि।।२२।।

सामायिक, स्तुति, वन्दना, प्रतिक्रमण, प्रत्याख्यान और कायोत्सर्ग—इस प्रकार छह आवश्यक हैं। जो कि निश्चय क्रियाएँ अर्थात् नियम से करने योग्य हैं।

प्रश्न ४९— सामायिक किसे कहते हैं ?

उत्तर—

जीविदमरणे लाभालाभे संजोयविप्पओगे य।
बंधुरिसुहदुक्खादिसु समदा सामाइयं णाम।।२३।।

जीवन मरण में, लाभ—अलाभ में, संयोग—वियोग में, मित्र—शत्रु में, सुख—दु:ख इत्यादि में समभाव होना सामायिक नाम का व्रत है।

समभाव को समता कहते हैं अर्थात् राग—द्वेष से रहित होना अथवा त्रिकाल में पंच नमस्कार का करना।

प्रश्न ५०— स्तव किसे कहते हैं ?

उत्तर—

उसहादिजिणवराणं णामणिरुत्तिं गुणाणुकििंत्त च।
काऊण अच्चिदूण य तिसुद्धिपणमो थवो णेओ।।२४।।

ऋषभ आदि तीर्थंकरों के नाम का कथन और गुणों का कीर्तन करके तथा उनकी पूजा करके उनको मन वचन काय पूर्वक नमस्कार करना स्तव नाम का आवश्यक है। तीर्थंकरों के असाधारण धर्मरूप गुणों का वर्णन करना गुणानुकीर्तन है।

प्रश्न ५१—वन्दना किसे कहते हैं ?

उत्तर—

अरहंतसिद्ध पडिमातवसुदगुणगुरुगुरूण रादीणं।
किदियम्मेणिदरेण य तियरणसंकोचणं पणमो।।२५।।

कृतिकर्म पूर्वक वन्दना करना अर्थात् सिद्धभक्ति, श्रुतभक्ति, आचार्यभक्ति पूर्व कायोत्सर्ग आदि के द्वारा मन—वचन काय की शुद्धिपूर्वक प्रणाम करना वन्दना है। अर्हंत—सिद्धों की प्रतिमा, तपोगुरु, श्रुतगुरु, गुणगुरु, दीक्षागुरु और दीक्षा में अपने से बड़े गुरु—इन सबका कृतिकर्म पूर्वक अथवा बिना कृतिकर्म के नमस्कार मात्र करके मन वचन काय की विशुद्धि द्वारा विधिपूर्वक जो नमस्कार किया जाता है वह वन्दना नाम का मूलगुण कहलाता है।

प्रश्न ५२— प्रतिक्रमण किसे कहते हैं ?

उत्तर—

दव्वे खेत्ते काले भावे य कयावराहसोहणयं।
णदणगरहजुत्तो मणवचकाएण पडिक्कमणं।।२६।।

अपनी सीमा का उल्लंघन करके अतिक्रमण किया था। वापसी अपने स्वस्थान में आना प्रतिक्रमण है। निन्दा और गर्हा से युक्त होकर साधु मन वचन काय की क्रिया के द्वारा द्रव्य क्षेत्र काल और भाव के विषय में अथवा इन द्रव्यादिकों के द्वारा किये गये व्रत विषयक अपराधों का जो शोधन करते हैं उसका नाम प्रतिक्रमण है।

प्रश्न ५३— द्रव्यादि प्रतिक्रमण किसे कहते हैं ?

उत्तर—द्रव्य प्रतिक्रमण—आहार शरीर आदि द्रव्य के विषय में जो अपराध हो जाता है उनका निन्दा गर्हापूर्वक निराकरण करना। क्षेत्र प्रतिक्रमण—वसतिका, शयन, आसन और गमन—आगमन आदि मार्ग के रूप क्षेत्र के विषय में जो अपराध हो जाता है, उनका निन्दा गर्हापूर्वक निराकरण करना। काल प्रतिक्रमण—पूर्वाह्न, अपराह्न, दिवस, रात्रि, पक्ष, मास, संवत्सर तथा भूत—भविष्यत्—वर्तमान आदि काल के विषय में जो अपराध हो जाता है, उनका निन्दा गर्हापूर्वक निराकरण करना। भाव प्रतिक्रमण—मन के व्यापार रूप, भाव के विषय में जो अपराध हो जाता है, उनका निन्दा गर्हापूर्वक निराकरण करना।

प्रश्न ५४— निन्दा और गर्हा में क्या अन्तर है ?

उत्तर—अपने दोषों को आत्मसाक्षी पूर्वक प्रकट करना निन्दा है, अपने दोषों को आचार्य आदि गुरुओं के पास आलोचना पूर्वक कहना गर्हा है।

प्रश्न ५५— प्रत्याख्यान किसे कहते हैं ?

उत्तर—

णामादीणं छण्हं अजोगपरिवज्जणं तियरणेण।
पच्चक्खाणं णेयं अणागयं चागमे काले।।२७।।

अनागत आगत काल में आने वाले नाम, स्थापना आदि छहों अयोग्य का मन वचन काय से वर्जन करना प्रत्याख्यान कहलाता है।

प्रश्न ५६— अनागत काल और आगत काल किसे कहते हैं ?

उत्तर—अनागत शब्द से दूर भविष्य में आने वाला काल और आगत शब्द से निकट में आने वाले मुहूर्त दिन आदि रूप भविष्य काल को लिया है।

प्रश्न ५७— प्रतिक्रमण और प्रत्याख्यान में क्या अन्तर है ?

उत्तर—'अतीतकाल के दोषों का निराकरण करना प्रतिक्रमण है और अनागत तथा वर्तमान काल में होने वाले द्रव्यादि सम्बन्धी दोषों का निराकरण करना प्रत्याख्यान है।

प्रश्न ५८— कायोत्सर्ग किसे कहते हैं ?

'उत्तर—

देवस्सियणियमादिसु जहुत्तमाणेण उत्तकालम्हि।
जिणगुणिंचतजुत्तो काउस्सग्गो तणुविसग्गो।।२८।।

दैवसिक आदि नियमों में, शास्त्र में, कथित समयों में जो शास्त्रोक्त उच्छ्वास की गणना से णमोकार मंत्र पूर्वक जिनेन्द्र गुणों के चिन्तन सहित शरीर से ममत्व का त्याग किया जाता है उसका नाम कायोत्सर्ग है।

प्रश्न ५९— लोच मूलगुण का स्वरूप क्या है ?

उत्तर—सिर, दाढ़ी, मूँछ के केश हाथ से उखाड़ना यह लोच का लक्षण है।

प्रश्न ६०— लोच कैसे किया जाता है ?

उत्तर—

वियतियचउक्कमासे लोचो उक्कस्समज्झिमजहण्णो।
सपडिक्कमणे दिवसे उववासेणेव कायव्वो।।२९।।

प्रतिक्रमण सहित दिवस में, दो तीन या चार मास में उत्तम मध्यम या जघन्य रूप लोच उपवासपूर्वक ही करना चाहिए। लोच मौनपूर्वक कहते हैं।

प्रश्न ६१— मुनिराज केशलोंच क्यों करते हैं ?

उत्तर—सम्मूच्छन आदि जीवों के परिहार के लिए अर्थात् जूँ आदि उत्पन्न न हो जावें इसलिए शरीर से रागभाव आदि को दूर करने के लिए, अपनी शक्ति को प्रकट करने के लिए, सर्वोत्कृष्ट तपश्चरण के लिए और निग्र्रंथ मुद्रा आदि के गुणों को बतलाने के लिए हाथ से मस्तक तथा मूँछ के केशों का उखाड़ना लोच कहलाता है।

प्रश्न ६२— अचेलकत्व किसे कहते हैं ?

उत्तर—

वत्थाजिणवक्केण य अहवा पत्ताइणा असंवरणं।
णिब्भूसणं णिग्गंथं अच्चेलक्वंâ जगदि पूज्जं।।३०।।

वस्त्र, चर्म और वल्कलों से अथवा पत्ते आदि से शरीर को नहीं ढकना, भूषण अलंकार से और परिग्रह से रहित निग्र्रंथ वेष जगत में पूज्य अचेलकत्व नाम का मूलगुण है।

प्रश्न ६३— अस्नान व्रत किसे कहते है ?

उत्तर—

ण्हाणादिवज्जणेण ये विलित्तजल्लमलसदेसव्वंगं।
अण्हाणं घोर गुणं संजमदुगपालयं मुणिणो।।३१।।

स्नान आदि के त्याग कर देने से जल्ल, मल और पसीने से सर्वांग लिप्त हो जाता है। स्नान नहीं करने से इन्द्रियों का निग्रह होता है तथा प्राणियों को बाधा नहीं पहुँचने से प्राणी संयम भी पलता है।

जल्ल—सर्वांग को प्रच्छादित करने वाला मल। मल—शरीर के एकदेश को प्रच्छादित करने वाला मल।

प्रश्न ६४— स्नानादि का त्याग करने से मुनिराज को अशुचिपना प्राप्त होगा ?

उत्तर—ऐसा नहीं है क्योंकि व्रतों से पवित्रता मानी गई है। यदि जल—स्नान आदि से पवित्र हो जावें तो फिर मत्स्य, मकर आदि जल जन्तु और दुश्चारित्र से दूषित असंयत जन आदि सभी पवित्र हो जावें। किन्तु ऐसी बात नहीं है, इसलिए व्रत, नियम, संयम के द्वारा जो पवित्रता है, वही पवित्रता है।

प्रश्न ६५— क्षितिशयन व्रत किसे कहते हैं ?

उत्तर—

फासुयभूमिपएसे अप्पमसंथादिदम्हि पच्छण्णे।
दंडं धणुव्व सेज्जं खिदिसयणं एयपासेण।।३२।।

(१) जहाँ जीविंहसा, मर्दन, कलह, संक्लेशपरिणाम नहीं होते हैं ऐसे जीववधरहित निर्जन्तुक भूमि प्रदेश में,

(२) जहाँ शयन के लिए थोड़ा भी तृण नहीं है,

(३) जहाँ अल्पसंस्तर है अर्थात् तृणमय काष्ठ का बना हुआ फलक या शिला है,

(४) ऐसे भूमि प्रदेश में जो कि गृहस्थयोग्य प्रच्छादन और शय्या से रहित है।

(५) जहाँ आत्मना—स्वत: तृणादिक बिछाया हो ऐसे भूमि प्रदेश में

(६) अपने शरीर के प्रमाणानुसार—संस्तर—चारित्रयोग्य—प्रासुक तृणादिक।

(७) वह भूमिप्रदेश गुप्त अर्थात् एकान्त युक्त होना चाहिए तथा स्त्री पशु व नपुंसकरहित, असंयत लोगों के संचार से रहित होना चाहिए

(८) ऐसे भूमि प्रदेश में दण्ड के समान अथवा धनुष के आकार में एक बगल से सोना चाहिए। (९) नीचे मुख करके अथवा ऊपर मुख करके नहीं सोवें।

प्रश्न ६६— क्षितिशयन का प्रयोजन क्या है ?

उत्तर—(१) इन्द्रिय सुखों का परिहार करने के लिए, (२) तप की भावना के लिए, (३) शरीर आदि से नि:स्पृहता आदि के लिए यह भूमिशयन व्रत होता है। पृथ्वी पर सोने से या तृण घास पाटे आदि पर सोने पर कोमल—कोमल बिछौने आदि का त्याग हो जाने से इन्द्रियों का सुख समाप्त हो जाता है, तपश्चरण में भावना बढ़ती चली जाती है, शरीर से ममत्व का निरास होता है, और भी अनेकों गुण प्रकट होते हैं।

प्रश्न ६७— अदंतधावन व्रत किसे कहते हैं ?

उत्तर

अंगुलिणहावलेहणिकलीिंह पासाणछल्लियादीिंह।
दंतमलासोहणयं संजमगुत्ती अदंतमणं।।३३।।

अंगुली, नख, दांतोन और तृण विशेष के द्वारा पत्थर या छाल आदि के द्वारा दाँत के मल का शोधन नहीं करना यह संयम की रक्षारूप अदन्तधावन व्रत है।

प्रश्न ६८— अदंतधावन से क्या प्रयोजन है ?

उत्तर—इन्द्रिय संयम के रक्षण हेतु, वीतरागता बताने के लिए और सर्वज्ञदेव की आज्ञा के पालन हेतु यह व्रत कहा गया है।

प्रश्न ६९— स्थितिभोजन किसे कहते हैं ?

उत्तर—

अंजलिपुडेण ठिच्चा कुड्डाइ विवज्जणेण समपायं।
पडिसुद्धे भूमितिए असणं ठिदिभोयणं णाम।।३४।।

दीवाल आदि का सहारा न लेकर, जीव—जन्तु से रहित, स्थान की भूमि निरीक्षण करके समान पैर रखकर खड़े होकर, दोनों हाथ की अंजुलि बनाकर भोजन करना स्थितिभोजन नाम का व्रत है।

प्रश्न ७०— तीन स्थान कौन से हैं ?

उत्तर—(१) अपने पैर रखने के स्थान को, (२) उच्छिष्ट गिरने के स्थान को और (३) परोसने वाले के स्थान को जीवों के गमनागमन या वध आदि से रहित विशुद्ध देखकर आहार ग्रहण करना होता है। वह स्थितिभोजन नामक व्रत कहलाता है।

प्रश्न ७१—एकभक्त व्रत किसे कहते हैं ?

उत्तर—

उदयत्थमणे काले णालीतियवज्जियम्हि मज्झम्हि।
एक्कम्हि दुअ तिए वा मुहत्तकालेयभत्तं तु।।३५।।

सूर्योदय के बाद ती घड़ी और सूर्योस्त के पहले तीन घड़ी काल को छोड़कर शेषकाल के मध्य में एक मुहूर्त, दो मुहूर्त या तीन मुहूर्त पर्यन्त जो एक बार आहार ग्रहण है वह एकभक्त नाम का व्रत है।

प्रश्न ७२— मुनि भिक्षावृत्ति से आहार लेते हैं उसको याचना दीनता कह सकते हैं या नहीं ?

उत्तर—नहीं ! मुनि भोजन के लिए कभी भी किसी की स्तुति नहीं करते और कुछ भी माँगते नहीं। वे मौन व्रत से बिना कुछ कहे भिक्षा के निमित्त विचरते हैं। ‘तुम हमको ग्रास दो’ ऐसा करुणारूप दीन वचन कहने की इच्छा नहीं करते और भिक्षा न मिलने पर लौट आते हैं। परन्तु वे धीर मुनि मौन को नहीं छोड़ते हैं। याचना नहीं करते केवल बिजली की चमक के समान मुद्रा दिखाते हैं। याने श्रावक अपने अतिथि संविभाग व्रत के कारण अपने घर के सामने द्वाराप्रेक्षण के लिए रहते ही हैं। नवधा भक्ति से आहार दान के लिये श्रावक खड़े रहते हैं। इसलिए जैन साधुओं की भिक्षावृत्ति को याचना या दीनता नहीं कह सकते।

प्रश्न ७३— मूलगुणों का फल प्रतिपादन करते हुए किस प्रकार से उपसंहार किया हुआ है ?

उत्तर-

एवं विहाणजुत्ते मूलगुणे पालिऊण तिविहेण।
होऊण जगदि पुज्जो अक्खयसोक्खं लभइ मोक्खं।।३६।।

मूलगुणों को मन वचन काय से पालन करके मनुष्य जगत में पूज्य होकर अक्षय सुखरूप मोक्ष को प्राप्त कर लेता है।