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०१ . राजसभा में मंत्री गणों द्वारा नगरी की शोभा का वर्णन

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१ - राजसभा में मंत्री गणों द्वारा नगरी की शोभा का वर्णन एवं राजा पुहुपाल की रानी निपुणसुन्दरी के साथ चर्चा

राजा पुहुपाल अपने राजसिंहासन पर आरूढ़ थे। मंत्रीगण नगरी की शोभा का बखान कर रहे थे। प्रधानमंत्री ने कहा—

‘राजन्! इस उज्जयिनी नगरी में राजपथ के दोनों ओर गगनचुम्बी राजप्रासादों की कतार बनी हुई है। उनके ऊपरी भाग में कंगूरे के ऊपर कलश और ध्वजा की अपूर्व शोभा दिखाई दे रही है। आपके नगर में कुबेर जैसे धनपति निवास कर रहे हैं, अपनी प्रजावर्ग में अनेक श्रेष्ठ विद्वान् भी हैं। आपके पराक्रम की प्रशंसा सारे देश में फैल रही है। इस वैभवशाली नगर में कोई भी दु:खी एवं दरिद्र नहीं है। यह नगर अनेक वन, उपवन, वापी, तालाब, कोट, खाई इत्यादि से युक्त और सभी साधनों से सम्पन्न है।

इत्यादि चर्चा से मंत्रीगण महाराजा पुहुपाल का मन प्रसन्न कर रहे थे। इसी मध्य महारानी निपुणसुंदरी आ गईं। यद्यपि राजा के अनेक रानियाँ थीं तथापि निपुणसुंदरी को पट्टरानी का सम्मान प्राप्त होने से वे ही सर्व में प्रधान थीं। इनके सुरसुंदरी और मैनासुंदरी नाम की दो कन्यायें थीं। ये कन्यायें जैसे रूप में विशेष थीं, वैसे ही गुणों में भी सर्वश्रेष्ठ थीं। जब रानी ने यथोचित आसन ग्रहण कर लिया तब कुछ यत्र-तत्र की चर्चा के अनंतर राजा ने कहा—

‘अपनी इन दोनों पुत्रियों को विद्या अध्ययन कराना चाहिए क्योंकि विद्या धन ही जगत् में महाधन है। इन दोनों की अवस्था भी अब विद्या सीखने की हो चुकी है। नीति भी यही कहती है कि जीवन के प्रारंभ काल में विद्या का अर्जन करना चाहिए। ये कन्याएँ दो कुल की भूषण हैं अत: इन्हें अच्छी से अच्छी सर्व विद्या-कलाओं में पारंगत कर देना चाहिए। फिर इन कन्याओं की बुद्धि भी तो बहुत सूक्ष्म है।’

इतना सुनते ही प्रसन्नचित्त हुई रानी ने कहा—

‘स्वामिन्! आपने बहुत ही अच्छा सोचा है। इन पुत्रियों का कोमल हृदय विद्या से सुसंस्कारित होकर खिल उठेगा। इन बालिकाओं में विनम्रता, सरलता, दया आदि स्वाभाविक गुण विद्यमान हैं वे विद्या के संस्कार से चमकने लगेंगे और इनका जीवन भी धन्य हो जावेगा।’

तभी राजा ने बड़ी पुत्री सुरसुंदरी को बुलवाया। पुत्री सभा में प्रवेश कर पिता को प्रणाम करते हुए बोली—

‘पिताजी प्रणाम!’

‘पिता ने पुत्री को पास में बिठाते हुए बड़े प्रेम से कहा—

‘खुश रहो बेटी!’

पुन: प्यार से उसके माथे पर हाथ फिराते हुए पूछा—

‘बेटी! तुम्हारी अब विद्या पढ़ने की उम्र हो गई है। कहो पढ़ोगी न?’

पुत्री खुश होकर कहती है—

‘हाँ पिताजी! अवश्य पढूँगी। मुझे सभी विद्यायें पढ़ा दो।

पिता पुहुपाल बहुत ही प्रसन्न हो गए और पूछने लगे—

‘अच्छा बेटी! बताओ, तुम किस गुरु से पढ़ना चाहती हो?’

सुरसुंदरी ने कहा—

‘मैं शैव गुर से पढ़ना चाहती हूँ।’

राजा ने शैव गुरु को बुलवाया। शैव गुरु ने सभा में प्रवेश करते ही राजा को शुभाशीर्वाद देते हुए कहा—

‘स्वस्ति हो महाराज!’

राजा ने विनय से उन्हें उच्च आसन पर बिठाया और कुशल क्षेम पूछने के बाद निवेदन किया—

‘गुरुदेव! आप हमारी सुरसुंदरी कन्या को विद्या अध्ययन कराइए।’

ब्राह्मण गुरु प्रसन्न होते हुए बोले—

‘बहुत अच्छा महाराज! आपने बहुत ही सुंदर विचार बनाया है। कन्याओं को विद्या अध्ययन कराकर सर्वकलाओं में निपुण बना देना ही माता-पिता का कर्तव्य है।’

रानी ने कहा—

‘गुरु महाराज! मेरी कन्या सुशीला है, सर्वगुणसम्पन्न है, अब आप इसे विद्याओं में और निष्पन्न कर दीजिए।’

ब्राह्मण महोदय ने कन्या की ओर देखकर पूछा—

‘बेटी! तुम्हें पढ़ना है ना?’

सुरसुंदरी ने विनय से उत्तर दिया—

‘हाँ, हमें पढ़ना है।’

तभी राजा ने ब्राह्मण गुरु को बहुत कुछ भेंट देकर अपनी सुरसुंदरी कन्या सौंप दी और कहा—

‘ठीक है, गुरुदेव! आप इसे अब अपनी ही कन्या समझें और समुचित रीति से सम्पूर्ण विद्याओं में, सर्वशास्त्रों में कुशल बना दें।’

ब्राह्मणदेव खुशी से राजा के आदेशानुसार पुत्री को साथ लेकर चले गये। तभी राजा पुहुपाल ने अपनी छोटी कन्या मैनासुंदरी को बुलाया। पुत्री ने आकर विनय से माता-पिता को प्रणाम किया

‘पिताजी! प्रणाम!’

पिता पुहुपाल ने प्यार से कन्या के शिर पर हाथ फैरते हुए कहा—

‘चिरंजीव रहो बेटी! आओ यहाँ बैठो।’

उसी मध्य मैनासुंदरी ने माता को भी नमस्कार किया—

‘माताजी प्रणाम!’

माता निपुणसुंदरी ने भी कन्या की पीठ थपथपाकर आशीर्वाद दिया—

‘खुश रहो बेटी!’

पुत्री माता-पिता के पास बैठ गई। तब पिता ने कहा—

‘बेटा! अब तुम्हारी उम्र खेलने की नहीं है प्रत्युत् विद्या अध्ययन करने की है। बोलो! पढ़ना है क्या?’

मैना ने बड़े हर्ष से उत्तर दिया—

‘हाँ पिताजी! हमें पढ़ना है।’

‘अच्छा! तो बताओ, तुम किसके पास पढ़ोगी?’

‘पिताजी! मैं मंदिर जी में जाऊँगी। वहीं पर मुनिराज के पास पढूगी।’

कन्या के उत्तर को सुनकर माता-पिता बहुत ही प्रसन्न हुए और बोले—

‘बहुत अच्छा बेटी! प्रात: जिनमंदिर में चलकर तुम्हें जिन गुरु के पास पहुँचाकर आयेंगे। तुम्हारी इच्छा के अनुसार ही तुम्हारी पढ़ाई करायेंगे।’

मैना प्रसन्न हो गई। इसी मध्य मंत्रियों ने कहा—

‘यह कन्या बहुत ही होनहार है। देखो, यह जैनमुनि के पास विद्या सीखना चाहती है।’

कन्या मैनासुन्दरी का आर्यिका के पास विद्याध्ययन

प्रात:काल राजा-रानी अपनी मैना कन्या को साथ लेकर अनेक परिकर के साथ जिनमंदिर में पहुँच गए। वहाँ पहुँचकर चैत्यालय की तीन प्रदक्षिणा दीं। पश्चात्—

‘नि:सही, नि:सही, नि:सही’ मंत्र का उच्चारण करते हुए अंदर प्रवेश कर—

‘ॐ णमो अरिहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आइरियाणं।
णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्वसाहूणं।।’

ऐसा मंत्र पढ़कर भगवान को पंचांग नमस्कार किया। अनंतर रानी निपुणसुंदरी ने भक्ति में गद्गद हो भगवान का स्तवन करना प्रारंभ कर दिया। साथ में मैनासुंदरी भी स्तोत्र पाठ बोलने लगी|

‘दर्शनं देवदेवस्य, दर्शनं पापनाशनम्।
दर्शनं स्वर्गसोपानं, दर्शनं मोक्षसाधनम्।’

इत्यादि प्रकार से दर्शन स्तोत्र पढ़कर अनुचर जनों के हाथ से अष्टद्रव्य की सामग्री लेकर राजा ने रानी और पुत्री के साथ भगवान की अष्टद्रव्य से पूजा की पुन: वहीं पर विराजमान मुनिराज के निकट पहुँचकर उन्हें नमस्कार किया—

‘हे भगवन्! नमोऽस्तु, नमोऽस्तु, नमोऽस्तु।’

मुनिराज ने तीनों को आशीर्वाद दिया—

सद्धर्मवृद्धिरस्तु।’

पुन: राजा ने पूछा—

‘भगवन्! आपके रत्नत्रय में कुशलता तो है?’

मुनिराज ने कहा—

‘हे वत्स! जिनेन्द्रदेव की कृपाप्रसाद से मेरा रत्नत्रय सकुशल है। जिनेन्द्रदेव के चरणकमल का प्रसाद ही भव्यों को सर्व कुशल मंगल देने वाला है। राजा-रानी बहुत ही प्रसन्न हुए और मैनासुंदरी भी बहुत ही प्रसन्न हुई। पुन: राजा ने कहा—

‘प्रभो! मेरी यह पुत्री मैना आपके पास विद्या अध्ययन करना चाहती है। सो आप कृपा कर इस पुत्री को विद्यादान देकर कृतार्थ करें।’

इतने में ही मैना ने भी हाथ जोड़कर विनय से प्रार्थना की—

‘‘हे गुरुदेव! कृपा करके आप मुझे विद्यारूपी निधि दीजिये।

मुनिराज ने प्रसन्नमुद्रा में कहा—

‘‘राजन्! आप की तथा आपकी पुत्री मैना की भावना बहुत ही उज्ज्वल है जो कि जैनगुरु के पास पढ़ानें का आपने निर्णय लिया है। सचमुच में समीचीन विद्या ही इस जीव को संसार समुद्र से पार कर देती है।....

अच्छा तो आप इस कन्या को आर्यिका के पास ले जाओ। वहीं पर इसे पढ़ने के लिए छोड़ दो।’’

राजा पुहुपाल बहुत ही प्रसन्न हुए और पुन: पुन: मुनिराज को नमस्कार कर आर्यिका जी के पास पहुँच गये। तीनों ने विनय से आर्यिका को नमस्कार किया—

‘‘हे माताजी! वंदामि,वंदामि।’

आर्यिका ने तीनों को आशीर्वाद दिया—

सद्धर्मवृद्धिरस्तु।’

‘आपके रत्नत्रय की कुशलता तो है?’

‘अरिहंत प्रभु की कृपा से सब कुशल है।’

पुन: राजा विनय से निवेदन करते हैं—

‘माताजी! यह मेरी कन्या है, इसका नाम मैनासुंदरी है। यह मुनिराज के पास विद्या पढ़ना चाहती थी किन्तु मुनिराज जी ने इसे आपके पास भेजा है। सो अब आप कृपाकर इसे अपना वरदहस्त प्रदान कीजिए।’

इतना सुनकर आर्यिका ने प्रसन्नता से उत्तर दिया—

‘‘बहुत अच्छी बात है। मुझे मुनिराज की आज्ञा स्वीकार है। मैं इस बालिका को इसकी इच्छा के अनुसार ही विद्या अध्ययन कराऊँगी।’’

तब मैनासुंदरी ने हाथ जोड़कर गदगद वाणी में कहा—

‘‘अहो! आज मेरा जीवन धन्य हो गया, आज मुझे साक्षात् धर्म की प्रतिमूर्ति आर्यिका जी गुर्वानी के रूप में मिल गर्इं। मैं कृतार्थ हो गई।

ऐसा कहते हुए मैना ने आगे बढ़कर माताजी के चरण- कमलों का स्पर्श कर उनकी चरणरज को मस्तक पर चढ़ाया और उन्हीं के पास बैठ गई।

आर्यिकाजी ने भी मैना के शिर पर पिच्छिका रखकर शुभ आशीर्वाद प्रदान किया और वात्सल्य भाव से उसकी पीठ पर हाथ फिराकर आश्वासन दिया।

पिता पुहुपाल आर्यिका जी के इस वात्सल्य प्रेम को देखकर बहुत ही प्रसन्न हुए और अपनी रानी से बोले—

‘‘इस कन्या को यहाँ धर्म माँ मिल गई हैं जो कि हम और आप से भी अधिक प्यार देंगी तथा अमृत के समान विद्यादान भी देंगी।’’

रानी ने भी पुत्री वियोग का किंचित् शोक और उचित स्थान मिलने का हर्ष इन दोनों से मिश्रित भाव को मन में धारण करते हुए संतोष की सांस लेकर कहा–

‘बड़े ही संतोष की बात है कि कन्या की इच्छा के अनुरूप ही उसे जैनगुरु—आर्यिका जी के पास पढ़ने का सौभाग्य मिल गया है। अब अपने को कोई चिंता नहीं रही।’

इतना कहकर राजा पुहुपाल रानी के साथ ही आर्यिका माता को नमस्कार कर पुत्री को यथोचित शिक्षा देकर वहीं मंदिरजी में माताजी के पास उसे छोड़कर वापस अपने राज- महल में आ गये।

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