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०२.इन्द्रियमार्गणाधिकार

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इन्द्रियमार्गणाधिकार

अथ इंद्रियमार्गणाधिकार:

अथ चतुर्भि:स्थलै: एकविंशतिसूत्रै: स्पर्शनानुगमे इन्द्रियमार्गणानाम द्वितीयोऽधिकार: प्रारभ्यते। तत्र तावत् प्रथमस्थले एकेन्द्रियाणां सूक्ष्मबादरभेदसहितानां स्पर्शनप्ररूपणत्वेन ‘‘इंदियाणुवादेण’’ इत्यादिना षट् सूत्राणि। तत: परं द्वितीयस्थले विकलत्रयाणां स्पर्शनकथनत्वेन ‘‘बीइंदिय’’ इत्यादिसूत्रचतुष्टयं। तदनंतरं तृतीयस्थले पंचेन्द्रियाणां स्पर्शननिरूपणत्वेन ‘‘पंचिंदिय-’’ इत्यादिसूत्रषट्कं। तत्पश्चात् चतुर्थस्थले पंचेन्द्रियापर्याप्तजीवानां स्पर्शनप्रतिपादनत्वेन ‘‘पंचिंदियअपज्जत्ता’’ इत्यादिना पंच सूत्राणि इति समुदायपातनिका भवति।
अधुना एकेन्द्रियजीवानां स्पर्शनप्रतिपादनाय सूत्रषट्कमवतार्यते-
इंदियाणुवादेण एइंदिया सुहुमेइंदिया पज्जत्ता अपज्जत्ता सत्थाण-समुग्घाद-उववादेहि केवडियं खेत्तं फोसिदं ?।।४९।।
सव्वलोगो।।५०।।
बादरेइंदिया पज्जत्ता अपज्जत्ता सत्थाणेहि केवडियं खेत्तं फोसिदं ?।।५१।।
लोगस्स संखेज्जदिभागो।।५२।।
समुग्घाद-उववादेहि केवडियं खेत्तं फोसिदं ?।।५३।।
सव्वलोगो।।५४।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-इन्द्रियमार्गणायां सामान्येन एकेन्द्रिया एकेन्द्रियपर्याप्ता एकेद्रियापर्याप्ताश्च, सूक्ष्मैकेन्द्रिया: सूक्ष्मैकेन्द्रियपर्याप्ता: सूक्ष्मैकेन्द्रियापर्याप्ताश्च इमे षड्विधा जीवा: वर्तमानक्षेत्रस्पर्शनापेक्षया क्षेत्रवत् स्पृशन्ति। अतीतकालापेक्षया स्वस्थान-वेदना-कषाय-मारणान्तिक-उपपादपदै: सर्वलोकं स्पृशन्ति, वैक्रियिकपदेन लोकस्य संख्यातभागं स्पृशन्ति। विशेषेण-सूक्ष्माणां जीवानां वैक्रियिकपदं नास्ति।
सामान्येन बादरैकेन्द्रिया बादरैकेन्द्रियपर्याप्ता: बादरैकेन्द्रियापर्याप्ताश्च त्रिविधा अपि जीवा लोकस्य संख्यातभागं स्पृशन्ति।
वायुकायिकजीवापूरितं पंचरज्जुबाहल्यं रज्जुप्रतरं, बादरैकेन्द्रियजीवापूरितसप्तपृथिव्यश्च, तासां पृथिवीनां अध:-स्थितविंशति-विंशतियोजनसहस्रबाहल्यं त्रि-त्रिवातवलयक्षेत्राणि लोकान्तस्थितवायुकायिकक्षेत्रं च एकत्रीकृते त्रयाणां लोकानां संख्यातभाग:, नरतिर्यग्लोकाभ्यामसंख्यातगुण: क्षेत्रविशेष उत्पद्यते। तेन संख्यातभागोऽतीतवर्तमानयो: कालयो: लभ्यते।
एतेषां बादरैकेन्द्रियाणां स्पर्शनं वेदना-कषायाभ्यां अतीते काले त्रयाणां लोकानां संख्यातभाग:, नर-तिर्यग्लोकाभ्यामसंख्यातगुण: स्पृष्टो भवति। एवं वैक्रियिकपदेनापि, पंचरज्जु-आयततिर्यक्प्रतरे सर्वत्र विक्रियमाण वायुकायिकानां अतीतकाले उपलंभात्। मारणान्तिकोपपादाभ्यां सर्वलोक: स्पृष्ट:।
एवं प्रथमस्थले एकेन्द्रियसूक्ष्म-बादर-पर्याप्तापर्याप्तजीवानां स्पर्शनप्रतिपादनत्वेन षट्सूत्राणि गतानि।
इदानीं विकलत्रयजीवानां स्पर्शनप्रतिपादनाय सूत्रचतुष्टयमवतार्यते-
बीइंदिय-तीइंदिय-चउरिंदिय-पज्जत्तापज्जत्ताणं सत्थाणेहि केवडियं खेत्तं फोसिदं ?।।५५।।
लोगस्स असंखेज्जदिभागो।।५६।।
समुग्घाद-उववादेहि केवडियं खेत्तं फोसिदं ?।।५७।।
लोगस्स असंखेज्जदिभागो सव्वलोगो वा।।५८।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्राणामर्थ: सुगमोऽस्ति। अत्र स्वस्थानक्षेत्रे आनीयमाने स्वयंप्रभपर्वतात् परभागस्थितक्षेत्रमानीय संख्यातसूच्यंगुलै: गुणिते तिर्यग्लोकस्य संख्यातभागमात्रं स्वस्थानक्षेत्रं भवति। विहारवत्स्वस्थानक्षेत्रमानीयमाने तिर्यक्प्रतरं स्थापयित्वा संख्यातयोजनानि बाहल्यं भवन्ति, इति संख्यातयोजनै: गुणयित्वा पुन: एतद् बाहल्यस्य एकोनपंचाशत्खण्डानि प्रतराकारेण स्थापिते तिर्यग्लोकस्य संख्यातभागो भवति। अपर्याप्तविकलेन्द्रियाणां विहारवत्स्वस्थानं नास्ति।
एषां जीवानां असंख्यातभाग: क्षेत्रं वर्तमानकालापेक्षया वर्तते। वेदना-कषाय-पदाभ्यां अतीते काले त्रयाणां लोकानामसंख्यातभाग:, तिर्यग्लोकस्य संख्यातभाग: सार्धद्वयद्वीपादसंख्यातगुण: स्पृष्ट:। किंच-पूर्ववैरिसंबंधेन तिर्यक्प्रतरे सर्वस्मिन् क्षेत्रे हिंडमानविकलत्रयाणां सर्वत्रातीते कषायवेदनयोरुपलंभात्। एष वा शब्दस्यार्थ:। मारणान्तिकोपपादाभ्यां सर्वलोक: स्पृष्ट:, सर्वत्र गमनागमनविरोधाभावात्। विकलेन्द्रियापर्याप्तानां वेदनाकषायक्षेत्रयो: स्पर्शनं स्वस्थानवत्, तत्र विहारवत्स्वस्थानस्याभावात्।
एवं द्वितीयस्थले विकलेन्द्रियाणां स्पर्शनकथनत्वेन सूत्रचतुष्टयं गतम्।
इदानीं पंचेन्द्रियपर्याप्तानां स्पर्शनप्रतिपादनाय सूत्रषट्कमवतार्यते-
पंचिंदिय-पंचिंदियपज्जत्ता सत्थाणेहि केवडियं खेत्तं फोसिदं ?।।५९।।
लोगस्स असंखेज्जदिभागो अट्ठचोद्दसभागा वा देसूणा।।६०।।
समुग्घादेहि केवडियं खेत्तं फोसिदं ?।।६१।।
लोगस्स असंखेज्जदिभागो अट्ठचोद्दसभागा वा देसूणा असंखेज्जा वा भागा सव्वलोगो वा।।६२।।
उववादेहि केवडियं खेत्तं फोसिदं ?।।६३।।
लोगस्स असंखेज्जदिभागो सव्वलोगो वा।।६४।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-लोकस्यासंख्यातभाग: वर्तमानापेक्षया। संप्रति वाशब्दस्यार्थ: कथ्यते। सामान्यपंचेन्द्रियै: पर्याप्तपंचेन्द्रियैश्च स्वस्थानपदै: त्रयाणां लोकानामसंख्यातभाग:, तिर्यग्लोकस्य संख्यातभाग:, सार्धद्वयद्वीपादसंख्यातगुणश्च स्पृष्ट:। एतस्मिन् क्षेत्रे आनीयमाने रज्जुप्रतरं स्थापयित्वा संख्यातांगुलै: गुणयित्वा त्रसजीववर्जितसमुद्रै: व्याप्तक्षेत्रमपनीय प्रतराकारेण स्थापिते तिर्यग्लोकस्य संख्यातभागो भवति।
अपर्याप्तपंचेन्द्रियतिरश्चां अपर्याप्तविकलेन्द्रियाणां च स्वस्थानक्षेत्रं पुन: स्वयंप्रभपर्वतस्य परत: एव भवति, भोगभूमिप्रतिभागे तेषामुत्पत्तेरभावात्।
अथवा पूर्ववैरिदेवप्रयोगेण भोगभूमिप्रतिभागद्वीप-समुद्रेषु पतिततिर्यक्कलेवरेषु अपर्याप्त-त्रसाणामुत्पत्तिरस्ति इति केचिद् भणन्ति, तेषामभिप्रायेण क्षेत्रे आनीयमाने संख्यातांगुलबाहल्यं रज्जुप्रतरं स्थापयित्वा एकोनपंचाशत्-खण्डानि कृत्वा प्रतराकारेण स्थापिते अपर्याप्तस्वस्थानक्षेत्रं तिर्यग्लोकस्य संख्यातभागो भवति। एवं विहारवत्स्वस्थानेनापि, मित्रामित्रदेवप्रयोगेण सर्वद्वीपसमुद्रेषु विहारस्य विरोधाभावात्।
विशेषेण-देवानां विहारमाश्रित्य अष्टचतुर्दशभागा: देशोना भवन्ति। एषामेव पंचेन्द्रियाणां वेदना-कषाय-वैक्रियिकपदै: अष्टचतुर्दशभागा: स्पृष्टा:, विहरमाणदेवानां सर्वत्र वेदना-कषाय-विक्रियाणां विरोधाभावात्। तैजसाहारपदाभ्यां चतुर्णां लोकानामसंख्यातभाग:, मानुषक्षेत्रस्य संख्यातभाग:। दण्डगतैश्चतुर्णां लोकानामसंख्यातभाग: मानुषक्षेत्रादसंख्यातगुण:। एवं कपाटगतैरपि, केवलं तु तिर्यग्लोकात् संख्यातगुण:। एष वा शब्दस्यार्थ:। प्रतरगतैरसंख्यातभागा:, वातवलयान् मुक्त्वा सर्वत्रापूरणात्। मारणान्तिकेन लोकपूरणसमुद्घातैश्च सर्वलोक: स्पृष्ट:।
सर्वलोकस्थितसूक्ष्मैकेन्द्रियेभ्य: पंचेन्द्रियेषु आगत्य उत्पद्यमानप्रथमसमयजीवानां सर्वलोके व्याप्तत्वदर्शनात् उपपादापेक्षया सर्वलोक: स्पृष्ट:।
स्वस्थान-समुद्घात-उपपादेषु एकविकल्परूपेषु कथं सर्वत्र बहुवचननिर्देश: सूत्रे ?
नैतद् वक्तव्यं, तेषु सर्वेषु स्वगतानेकविकल्पसंभवात्।
एवं तृतीयस्थले पर्याप्तपंचेन्द्रिय-सामान्यपंचेन्द्रियाणां स्पर्शनकथनेन सूत्रषट्कं गतम्।



अथ इन्द्रियमार्गणा अधिकार प्रारंभ

अब चार स्थलों में इक्कीस सूत्रों के द्वारा स्पर्शनानुगम में इन्द्रियमार्गणा नाम का द्वितीय अधिकार प्रारंभ होता है। उनमें से प्रथम स्थल में सूक्ष्म और बादर भेदों सहित एकेन्द्रिय जीवों का स्पर्शन प्ररूपित करने वाले ‘‘इंदियाणुवादेण’’ इत्यादि छह सूत्र हैं। उसके बाद द्वितीय स्थल में विकलत्रय जीवों का स्पर्शन कथन करने वाले ‘‘बीइंदिय’’ इत्यादि चार सूत्र हैं। तदनंतर तृतीय स्थल में पंचेन्द्रिय जीवों का स्पर्शन निरूपित करने वाले ‘‘पचिंदिय’’ इत्यादि छह सूत्र हैं। तत्पश्चात् चतुर्थ स्थल में पंचेन्द्रिय अपर्याप्त जीवों का स्पर्शन प्रतिपादन करने हेतु ‘‘पंचिंदियअपज्जत्ता’’ इत्यादि पाँच सूत्र हैं। इस प्रकार यह सूत्रों की समुदायपातनिका सूचित की गई है।

अब एकेन्द्रिय जीवों का स्पर्शन बतलाने हेतु छह सूत्र अवतरित हो रहे हैं-

सूत्रार्थ-

इंद्रियमार्गणा के अनुवाद से एकेन्द्रिय, एकेन्द्रिय पर्याप्त, एकेन्द्रिय अपर्याप्त, सूक्ष्म एकेन्द्रिय, सूक्ष्म एकेन्द्रिय पर्याप्त और सूक्ष्म एकेन्द्रिय अपर्याप्त जीव स्वस्थान, समुद्घात व उपपाद पदों की अपेक्षा कितना क्षेत्र स्पर्श करते हैं ?।।४९।।

उपर्युक्त जीव उक्त पदों से सर्व लोक स्पर्श करते हैं।।५०।।

बादर एकेन्द्रिय, बादर एकेन्द्रिय पर्याप्त और बादर एकेन्द्रिय अपर्याप्त जीव स्वस्थान पदों की अपेक्षा कितना क्षेत्र स्पर्श करते हैं ?।।५१।।

उपर्युक्त जीव स्वस्थान पदों की अपेक्षा लोक का संख्यातवाँ भाग स्पर्श करते हैं।।५२।।

समुद्घात व उपपाद की अपेक्षा उक्त जीवों द्वारा कितना क्षेत्र स्पृष्ट है ?।।५३।।

उक्त जीवों द्वारा समुद्घात व उपपाद की अपेक्षा सर्व लोक स्पृष्ट है।।५४।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-इन्द्रियमार्गणा में सामान्य से एकेन्द्रिय, एकेन्द्रिय पर्याप्त और एकेन्द्रिय अपर्याप्त, सूक्ष्म एकेन्द्रिय, सूक्ष्म एकेन्द्रिय पर्याप्त और सूक्ष्म एकेन्द्रिय अपर्याप्त ये छहों प्रकार के भेद वाले एकेन्द्रिय जीव वर्तमान क्षेत्र स्पर्शन की अपेक्षा क्षेत्रप्ररूपणा के समान स्पर्श करते हैं। अतीतकाल की अपेक्षा स्वस्थान, वेदनासमुद्घात, कषायसमुद्घात, मारणान्तिकसमुद्घात और उपपाद पदों से सर्व लोक का स्पर्श करते हैं। वैक्रियिक पद से लोक का संख्यातवाँ भाग स्पर्श करते हैं। विशेष इतना है कि सूक्ष्म जीवों के वैक्रियिक पद नहीं होता है।

सामान्य से बादर एकेन्द्रिय जीव, बादर एकेन्द्रिय पर्याप्त जीव और बादर एकेन्द्रिय अपर्याप्त जीव इस प्रकार तीनों ही एकेन्द्रिय जीव लोक का संख्यातवाँ भाग स्पर्श करते हैं।

वायुकायिक जीवों से परिपूर्ण पाँच राजु बाहल्यरूप राजु प्रतर, बादर एकेन्द्रिय जीवों से परिपूर्ण सात पृथिवियाँ हैं, उन पृथिवियों के नीचे स्थित बीस-बीस सहस्र योजन बाहल्यरूप तीन-तीन वातवलय क्षेत्र हैं तथा लोकान्त में स्थित वायुकायिक क्षेत्र को एकत्रित करने पर तीन लोकों का संख्यातवाँ भाग और मनुष्य लोक व तिर्यग्लोक से असंख्यातगुणा क्षेत्र विशेष उत्पन्न होता है। इसलिए अतीत व वर्तमान कालों में लोक का संख्यातवाँ भाग प्राप्त होता है।

उन बादर एकेन्द्रिय जीवों के द्वारा वेदनासमुद्घात और कषायसमुद्घात पदों से अतीतकाल में तीन लोकों का संख्यातवाँ भाग तथा मनुष्यलोक व तिर्र्यग्लोक से असंख्यातगुणा क्षेत्र स्पृष्ट होता है। इसी प्रकार वैक्रियिक पद की अपेक्षा भी तीन लोकों का संख्यातवाँ भाग और मनुष्यलोक व तिर्यग्लोक से असंख्यातगुणा क्षेत्र स्पृष्ट है, क्योंकि अतीतकाल की अपेक्षा पाँच राजु आयत तिर्यक प्रतर में सर्वत्र विक्रिया करने वाले वायुकायिक जीव पाये जाते हैं। मारणान्तिकसमुद्घात व उपपाद पदों से सर्वलोक स्पृष्ट है।

इस प्रकार से प्रथम स्थल में एकेन्द्रिय सूक्ष्म-बादर-पर्याप्त और अपर्याप्त जीवों का स्पर्शन प्रतिपादन करने वाले छह सूत्र पूर्ण हुए।

अब विकलत्रय जीवों का स्पर्शन बतलाने हेतु चार सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

द्वीन्द्रिय, द्वीन्द्रिय पर्याप्त, द्वीन्द्रिय अपर्याप्त, त्रीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय पर्याप्त, त्रीन्द्रिय अपर्याप्त, चतुरिन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय पर्याप्त और चतुरिन्द्रिय अपर्याप्त जीवों द्वारा स्वस्थान पदों से कितना क्षेत्र स्पृष्ट है ?।।५५।।

उपर्युक्त जीवों द्वारा लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पृष्ट है।।५६।।

समुद्घात व उपपाद की अपेक्षा उक्त जीवों द्वारा कितना क्षेत्र स्पृष्ट है ?।।५७।।

समुद्घात व उपपाद की अपेक्षा उक्त जीवों द्वारा लोक का असंख्यातवाँ भाग अथवा सर्वलोक स्पृष्ट है।।५८।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-उपर्युक्त सभी सूत्रों का अर्थ सुगम है। यहाँ स्वस्थान क्षेत्र को लाने पर स्वयंप्रभ पर्वत के पर-उत्तर भाग में स्थित क्षेत्र को लाकर संख्यात सूच्यंगुलों से गुणित करने पर तिर्यग्लोक का संख्यातवाँ भागमात्र स्वस्थान क्षेत्र होता है। विहारवत्स्वस्थान क्षेत्र के निकालने पर तिर्यक्प्रतर को स्थापित कर संख्यात योजन बाहल्य हैं, अत: संख्यात योजनों से गुणित कर पुन: इस बाहल्य के उनंचास खण्ड करके प्रतराकार से स्थापित करने पर तिर्यग्लोक का संख्यातवाँ भाग होता है। अपर्याप्त जीवों के विहारवत्स्वस्थान नहीं है।

इन जीवों का लोक का असंख्यातवाँ भाग क्षेत्र है यह निर्देश वर्तमान काल की अपेक्षा है। वेदनासमुद्घात और कषायसमुद्घात पदों की अपेक्षा अतीतकाल में तीन लोकों का असंख्यातवाँ भाग, तिर्यग्लोक का संख्यातवाँ भाग और ढाई द्वीप से असंख्यातगुणा क्षेत्र स्पृष्ट है, क्योंकि पूर्व जन्म के बैरियों के संबंध से सर्व तिर्यक्प्रतर में घूमने वाले विकलेन्द्रिय जीवों के सर्वत्र अतीतकाल की अपेक्षा कषाय समुद्घात व वेदनासमुद्घात पद पाये जाते हैं। यह ‘‘वा’’ शब्द से सूचित अर्थ है। मारणान्तिक समुद्घात व उपपाद पदों से सर्व लोक स्पृष्ट है, क्योंकि सर्वत्र उक्त जीवों के गमनागमन में कोई विरोध नहीं पाया जाता है। विकलेन्द्रिय अपर्याप्त जीवों के वेदनासमुद्घात और कषायसमुद्घात पदों की अपेक्षा क्षेत्र का निरूपण स्वस्थान पद के समान है, क्योंकि विहारवत्स्वस्थान पद का उनमें अभाव देखा जाता है।

इस प्रकार द्वितीय स्थल में विकलेन्द्रिय जीवों का स्पर्शन बतलाने वाले चार सूत्र पूर्ण हुए।

अब पंचेन्द्रिय पर्याप्तक जीवों का स्पर्शन प्रतिपादन करने हेतु छह सूत्र अवतरित किये जाते हैं-

सूत्रार्थ-

पंचेन्द्रिय और पंचेन्द्रिय पर्र्याप्त जीव स्वस्थान पदों से कितने क्षेत्र को स्पर्श करते हैं ?।।५९।।

उपर्युक्त जीव स्वस्थानपदों से लोक का असंख्यातवाँ भाग अथवा कुछ कम आठ बटे चौदह भाग राजू का स्पर्श करते हैं।।६०।।

समुद्घातों की अपेक्षा उक्त जीवों द्वारा कितना क्षेत्र स्पृष्ट है ?।।६१।।

समुद्घातों की अपेक्षा उक्त जीवों द्वारा लोक का असंख्यातवाँ भाग, कुछ कम आठ बटे चौदह भाग, असंख्यात बहुभाग, अथवा सर्वलोक स्पृष्ट है।।६२।।

उपर्युक्त जीवों द्वारा उपपाद की अपेक्षा कितना क्षेत्र स्पृष्ट है ?।।६३।।

उपर्युक्त जीवों के द्वारा उपपाद की अपेक्षा लोक का असंख्यातवाँ भाग अथवा सर्व लोक स्पृष्ट है।।६४।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-‘लोक का असंख्यातवाँ भाग’ यह कथन वर्तमानकाल की अपेक्षा किया गया है। अब यहाँ ‘वा’ शब्द का अर्थ कहा जा रहा है। सामान्य पंचेन्द्रिय और पर्याप्त पंचेन्द्रिय जीवों के द्वारा स्वस्थानपदों से तीन लोकों का असंख्यातवाँ भाग, तिर्यग्लोक का संख्यातवाँ भाग और ढाईद्वीप से असंख्यातगुणा क्षेत्र स्पृष्ट है। इस क्षेत्र के निकालने में राजुप्रतर को स्थापित कर व संख्यात अंगुलों से गुणित कर और उनमें से त्रस जीव रहित समुद्रों से व्याप्त क्षेत्र को कम कर प्रतराकार से स्थापित करने पर तिर्यग्लोक का संख्यातवाँ भाग प्राप्त होता है।

किन्तु पंचेन्द्रिय तिर्यंच अपर्याप्त और विकलेन्द्रिय अपर्याप्त जीवों का स्वस्थान क्षेत्र स्वयंप्रभ पर्वत के पर भाग में ही है, क्योंकि भोगभूमिप्रतिभाग में उनकी उत्पत्ति का अभाव है।

अथवा पूर्ववैरी देवों के प्रयोग से भोगभूमि प्रतिभागरूप द्वीप-समुद्रों में पड़े हुए तिर्यंच शरीरों में त्रस अपर्याप्तों की उत्पत्ति होती है, ऐसा कहने वाले आचार्यों के अभिप्राय से उक्त क्षेत्र के निकालते समय संख्यात अंगुल बाहल्यरूप राजुप्रतर को स्थापित करके व उनके उनचास खण्ड करके प्रतराकार से स्थापित करने पर अपर्याप्त जीवों का स्वस्थान क्षेत्र तिर्यग्लोक के संख्यातवें भाग प्रमाण प्राप्त होता है। इसी प्रकार विहारवत्स्वस्थान पद की अपेक्षा भी स्पर्शन प्ररूपणा करना चाहिए, क्योंकि मित्र व शत्रु स्वरूप देवों के प्रयोग से सर्वद्वीप- समुद्रों में विहार का कोई विरोध नहीं है।

विशेष इतना है कि-देवों के विहार का आश्रय करके कुछ कम आठ बटे चौदह भाग होते हैं। इन्हीं पंचेन्द्रिय जीवों के द्वारा वेदनासमुद्घात, कषायसमुद्घात और वैक्रियिकसमुद्घात पदों से आठ बटे चौदह भाग स्पृष्ट हैं, क्योंकि विहार करने वाले देवों के सर्वत्र वेदनासमुद्घात, कषायसमुद्घात और वैक्रियिक- समुद्घात पदों के विरोध का अभाव है। तैजससमुद्घात व आहारकसमुद्घात पदों से चार लोकों का असंख्यातवाँ भाग और मानुषलोक का संख्यातवाँ भाग स्पृष्ट है (क्योंकि यह मुनियों के ही होगा)। दण्ड- समुद्घात को प्राप्त केवलियों द्वारा चार लोकों का असंख्यातवाँ भाग और मानुषक्षेत्र से असंख्यातगुणा क्षेत्र स्पृष्ट है। इसी प्रकार कपाटसमुद्घात को प्राप्त जीवों द्वारा भी स्पृष्ट है। विशेष इतना है कि उनके द्वारा तिर्यग्लोक से संख्यातगुणा क्षेत्र स्पृष्ट है। यह ‘वा’ शब्द से सूचित अर्थ है। प्रतरसमुद्घात को प्राप्त जीवों के द्वारा लोक का असंख्यात बहुभाग प्रमाण क्षेत्र स्पृष्ट है, क्योंकि इस अवस्था में लोक वातवलयों को छोड़कर सर्वत्र जीव प्रदेशों से पूर्ण होता है। मारणान्तिकसमुद्घात व लोकपूरणसमुद्घात पदों से सर्वलोक स्पृष्ट है। सर्वलोक में स्थित सूक्ष्म एकेन्द्रिय जीवों में से पंचेन्द्रिय जीवों में आकर उत्पन्न होने के प्रथमसमयवर्ती जीवों के सर्व लोक में व्याप्त देखे जाने से उपपाद की अपेक्षा सर्वलोक स्पृष्ट है।

शंका-स्वस्थान, समुद्घात और उपपाद पदों के एक विकल्परूप होने पर सर्वत्र बहुवचन का निर्देश कैसे किया है ?

समाधान-ऐसा नहीं कहना चाहिए, क्योंकि उनमें स्वगत अनेक विकल्पों की संभावना है।

इस प्रकार से तृतीय स्थल में पर्याप्त पंचेन्द्रिय और सामान्य पंचेन्द्रिय जीवों का स्पर्शन बतलाने वाले छह सूत्र पूर्ण हुए।



अधुना अपर्याप्तपंचेन्द्रियाणां स्पर्शनकथनाय सूत्रपंचकमवतार्यते-

पंचिंदियअपज्जत्ता सत्थाणेण केवडियं खेत्तं फोसिदं ?।।६५।।

लोगस्स असंखेज्जदिभागो।।६६।।
समुग्घादेहि उववादेहि केवडियं खेत्तं फोसिदं ?।।६७।।
लोगस्स असंखेज्जदिभागो।।६८।।
सव्वलोगो वा।।६९।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-अतीतकालापेक्षया त्रयाणां लोकानामसंख्यातभाग:, तिर्यग्लोकस्य संख्यातभाग:, सार्धद्वयद्वीपादसंख्यातगुणश्च स्पृष्ट:। समुद्घातै:-वेदना-कषायपदै: त्रयाणां लोकानामसंख्यातभाग:, तिर्यग्लोकस्य संख्यातभाग:, सार्धद्वयद्वीपादसंख्यातगुणश्च स्पृष्ट:। एष वा शब्दार्थ:। मारणान्तिकोपपादै: सर्वलोक: स्पृष्ट:।
तात्पर्यार्थ:-पंचेन्द्रियलब्ध्यपर्याप्ततिरश्चां लब्ध्यपर्याप्तमनुष्याणां चैतत् स्पर्शनं कथितं। एतत्सर्वं पठित्वा लब्ध्यपर्याप्तभवा: कदाचिदपि अस्माकं न भवेयुरिति भावयितव्यं। पंचेन्द्रियेषु पर्याप्तेषु मनुष्यपर्यायं लब्ध्वा चतुर्विंशतितीर्थंकराणां शासनं जिनशासनं संप्राप्तं मया महता पुण्ययोगेन, तस्मिन्नपि अंतिमतीर्थकर-सिद्धार्थराजात्मज-प्रियकारिणीनंदन-वर्धमान-सन्मति-वीर-महावीरातिवीरनामधेयस्य श्रीमहावीरस्वामिन: शासनं संप्रति वर्तते तत्पंचमकालान्त्यवीरांगजमुनिपर्यंतं अविच्छिन्नं चलिष्यति, तस्य भगवत: चतुर्विंशत्यधिक- पंचविंशतिशततमस्य वीरनिर्वाणसंवत्सरस्य नूतनवर्षस्य प्रथमदिवस: वर्षपर्यन्तं मह्यं संघस्य जगतां च सर्वभव्यानां मंगलं तनोतु इति भाव्यतेऽद्य कार्तिकशुक्लाप्रतिपत्तिथौ नववर्षमंगलवेलायां।
पावापुर्यां सरोवरमध्यस्थितो महतिमहावीरभगवान् कार्तिककृष्णामावस्यायां प्रात: प्रत्यूषबेलायां निर्वाणपदं प्राप, तत्क्षणे इंद्रादिदेवगणै: निर्वाणपूजां कृत्वा दीपमालिकाभि: पावानगरी प्रकाशिता, तत: प्रभृति दीपावलीपर्व प्रसिद्धं जातं।
उक्तं च श्री जिनसेनाचार्येण-
ज्वलत्प्रदीपालिकया प्रवृद्धया, सुरासुरै: दीपितया प्रदीप्तया।
तदा स्म पावानगरी समन्तत:, प्रदीपिताकाशतला प्रकाशते।।१९।।
ततस्तु लोक: प्रतिवर्षमादरात्, प्रसिद्धदीपालिकयात्र भारते।
समुद्यत: पूजयितुं जिनेश्वरं, जिनेन्द्रनिर्वाणविभूतिभक्तिभाक्१।।२१।।
तीर्थकृद्गुणरत्नानां, गणना कैर्न पार्यते।
अनन्तशो नमस्तेभ्यस्त्रयरत्नस्य लब्धये।।१।।
इति श्रीषट्खण्डागमस्य क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखण्डे स्पर्शनानुगमे महाधिकारे गणिनीज्ञानमतीकृत-सिद्धान्तचिंतामणिटीकायां इन्द्रियमार्गणानाम द्वितीयोऽधिकार: समाप्त:।


अब अपर्याप्त पंचेन्द्रिय जीवों का स्पर्शन बतलाने हेतु पाँच सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

पंचेन्द्रिय अपर्याप्त जीव स्थान की अपेक्षा कितना क्षेत्र स्पर्श करते हैं ?।।६५।।

चेन्द्रिय अपर्याप्त जीव स्वस्थान की अपेक्षा लोक के असंख्यातवें भाग प्रमाण क्षेत्र का स्पर्श करते हैं।।६६।।

पंचेन्द्रिय अपर्याप्त जीवों द्वारा समुद्घात और उपपाद पदों की अपेक्षा कितना क्षेत्र स्पृष्ट है ?।।६७।।

पंचेन्द्रिय अपर्याप्त जीवों द्वारा उक्त पदों की अपेक्षा लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पृष्ट है।।६८।।

अथवा पंचेन्द्रिय अपर्याप्त जीवों द्वारा उक्त पदों से सर्व लोक स्पृष्ट है।।६९।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-अतीतकाल की अपेक्षा तीनों लोकों का असंख्यातवाँ भाग, तिर्यग्लोक का संख्यातवाँ भाग और ढाई द्वीप से असंख्यातगुणा क्षेत्र स्पृष्ट है। समुद्घात पद से पंचेन्द्रिय अपर्याप्तों द्वारा वेदनासमुद्घात और कषायसमुद्घात पदों से तीन लोकों का असंख्यातवाँ भाग, तिर्यग्लोक का संख्यातवाँ भाग और ढाईद्वीप से असंख्यातगुणा क्षेत्र स्पृष्ट है। यह ‘वा’ का अर्थ है। मारणान्तिकसमुद्घात और उपपाद की अपेक्षा सर्वलोक स्पृष्ट है।

यहाँ तात्पर्य यह है कि-पंचेन्द्रियलब्ध्यपर्याप्तक तिर्यंचों का एवं लब्ध्यपर्याप्तक मनुष्यों का यह स्पर्शन कहा गया है। यह सब पढ़कर हमें यह भावना भानी चाहिए कि हमें कभी भी लब्ध्यपर्याप्तक जीवों में जन्म न लेना पड़े। पंचेन्द्रियपर्याप्तकों में मनुष्यजन्म प्राप्त करके हमने चौबीस तीर्थंकर भगवन्तों का जिनशासन बड़े पुण्ययोग से प्राप्त किया है, उसमें भी आज वर्तमान में अंतिम तीर्थंकर, राजा सिद्धार्थ के पुत्र, रानी प्रियकारिणी (त्रिशला) के नंदन, वर्धमान-सन्मति-वीर-महावीर और अतिवीर नाम से प्रसिद्ध श्री महावीर स्वामी का जिनशासन चल रहा है, यह जिनशासन पंचमकाल के अंत तक श्री वीरांगजमुनि पर्यन्त अविच्छिन्न रूप से चलता रहेगा। उन भगवान महावीर के नाम से प्रचलित वीर निर्वाण संवत् पच्चीस सौ चौबीसवें वर्ष के नूतन संवत्सर का प्रथम दिवस (१ नवम्बर १९९७) मेरे संघ के लिए तथा सम्पूर्ण विश्व के लिए पूरे वर्ष तक मंगलमय होवे, यह आज कार्तिक शुक्ला एकम् तिथि की नूतन वर्ष की मंगल बेला में महावीर भगवान के चरणों में मेरी भावना है।

पावापुरी नगरी में सरोवर के मध्य स्थित होकर महति महावीर भगवान के कार्तिक कृष्णा अमावस तिथि की प्रत्यूष बेला में (ब्रह्ममुहूर्त में) जब निर्वाणपद को प्राप्त किया था, तब उसी क्षण इन्द्रादि देवगणों ने उनके निर्वाणकल्याणक की पूजा करके दीपमालिका सजाकर पावानगरी को प्रकाशमान किया था, उसी समय से इस धरती पर दीपावली पर्व प्रसिद्ध हुआ है-प्रारंभ हुआ है। श्री जिनसेनाचार्य ने हरिवंशपुराण में कहा है-

श्लोकार्थ-भगवान महावीर के परिनिर्वाण के पश्चात् सुर और असुरों के द्वारा जलाई गई बहुत भारी दैदीप्यमान दीपकों की पंक्ति से पावानगरी का आकाश सब ओर से जगमगा उठा।।१९।।

उस समय से लेकर भगवान के निर्वाणकल्याण की भक्ति से युक्त संसार के प्राणी इस भरतक्षेत्र में प्रतिवर्ष आदरपूर्वक प्रसिद्ध दीपमालिका के द्वारा भगवान महावीर की पूजा करने के लिए उद्यत रहने लगे अर्थात् उन्हीं की स्मृति में दीपावली का उत्सव मनाने लगे।।२१।।

भावार्थ-वर्तमान में भारत की धरती पर अनेक संवत् (वीर निर्वाण संवत्, विक्रम संवत्, शक संवत्, ईसवी सन् आदि) प्रचलित हैं किन्तु इन सभी में सबसे अधिक प्राचीन वीर निर्वाण संवत् ही है अत: सम्पूर्ण जैन समाज को यही संवत् प्रधानता से मानना चाहिए और अपने बही खाते को कार्तिक शुक्ला एकम् के नव वर्ष से प्रारंभ करना चाहिए।

श्लोकार्थ-तीर्थंकर भगवान के गुणरत्नों की गणना किसी के द्वारा पार नहीं पाई जा सकती है अर्थात् उनके गुणों की गणना कोई नहीं कर सकता है। तीन रत्नों की प्राप्ति हेतु मेरा उन्हें अनन्तबार नमस्कार है।।१।।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम ग्रंथ में क्षुद्रकबंध नाम के द्वितीय खण्ड में स्पर्शनानुगम नामके महाधिकार में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणिटीका में इन्द्रियमार्गणा नाम का द्वितीय अधिकार समाप्त हुआ।