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०२. गुणस्थानों में आलाप कथन (चार्ट सहित)

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विषय सूची

गुणस्थानों में आलाप कथन (चार्ट सहित)

अव्धुपना सामान्येन पर्याप्तजीवानामालापाः कथ्यन्ते-

पर्याप्तावस्थाविशिष्टजीवानामोघालापे भण्यमाने चतुर्दशगुणस्थानानि, अतीतगुणस्थानं नास्ति, पर्याप्तेषु तस्याः सिद्धावस्थायाः संभवाभावात् । सप्त पर्याप्ता जीवसमासाः, अतीतजीवसमासो नास्ति। षट् पर्याप्तयः पञ्च पर्याप्तयः चतस्रः पर्याप्तयः अतीतपर्याप्तिर्नास्ति। दश प्राणा नव प्राणा अष्टौ प्राणाः सप्तप्राणाः षट्प्राणाश्चत्वारः प्राणाः, अतीतप्राणो नास्ति। चतस्रः संज्ञा, क्षीणसंज्ञा अपि अस्ति।
चतस्रो गतयः सिद्धगतिर्नास्ति पर्याप्तेषु इति। एकेन्द्रियादिपञ्चजातयः सन्ति, अतीतजातिर्नास्ति। पृथिवीकायादयः षट्कायाः सन्ति, अकायो नास्ति। औदारिकमिश्र-वैक्रियिकमिश्र-आहारकमिश्र-कार्मणकाययोगैर्विना एकादश योगाः अयोगोऽप्यस्ति। त्रयो वेदाः, अपगतवेदोऽप्यस्ति। चत्वारः कषायाः, अकषायोऽप्यस्ति। अष्टौ ज्ञानानि। सप्त संयमाः, नैव संयमो नैव संयमासंयमो नैवासंयमः एतत्स्थानं नास्ति। चत्वारि दर्शनानि। द्रव्यभावाभ्यां षड्लेश्याः, अलेश्या अपि अस्ति, अत्र द्रव्येण षड्लेश्या इति भणिते शरीरे षड्वर्णा गृहीतव्याः। भावेन षड्लेश्या इति कथिते योगकषायाः षड्भेदस्थिता गृहीतव्याः।
उक्तं च-
वण्णोदयेण जणिदो सरीरवण्णो दु दव्वदो लेस्सा[१]
जोगपउत्ती लेस्सा कसायउदयाणुरंजिदा होई[२]।।
भव्यसिद्धिकाः अभव्यसिद्धिकाः सन्ति, नैव भव्यसिद्धिकाः नैवाभव्यसिद्धिका एतत्स्थानं नास्ति। षट् सम्यक्त्वानि। संज्ञिनोऽसंज्ञिनः सन्ति, नैव संज्ञिनो नैवासंज्ञिनोऽपि सन्ति। आहारिणोऽनाहारिणः सन्ति। साकारोपयुक्ता वा अनाकारोपयुक्ता वा, साकारा-नाकारोपयोगाभ्यां युगपदुपयुक्ता अपि सन्ति।

१ पर्याप्त जीवों के सामान्य-आलाप.

गु. जी. प. प्रा. सं. ग. इं. का यो. वे. क. ज्ञा. संय. द. ले. भ. स. संज्ञि. आ. उ.
१४ ७ प. ६प.५प.४ प. १०।९ ८।७ ६।४ ११ औ. मि.वै.मि.आ.मि. कार्म. के विना ३ अपगत ४ अकषाय ६ द्रव्य ६ भाव २ भव्य अभव्य २ संज्ञी असंज्ञी २ आहार अनाहार २ साकार अनाकार

अब सामान्य से पर्याप्तक जीवों के आलाप कहे जाते हैं-

पर्याप्त अवस्थारूप विशेषण से विशिष्ट जीवों के ओघालापों का कथन करने पर उनके चौदह गुणस्थान होते हैं, उनके गुणस्थानातीत अवस्था नहीं होती है क्योंकि पर्याप्तक जीवों की सिद्ध अवस्था नहीं रहती है अर्थात् सिद्ध जीव पर्याप्त-अपर्याप्त इन दोनों अवस्थाओं से रहित होते हैं इसलिए पर्याप्तजीवों को गुणस्थानातीत नहीं माना गया है।

पर्याप्तक जीवों के चौदह जीवसमासों में सात पर्याप्तक जीवसमास होते हैं, अतीत-जीवसमास उनके नहीं होता है। छह पर्याप्तियों में से उनके छह, पाँच और चार पर्याप्तियाँ होती हैं, अतीतपर्याप्ति अवस्था उन पर्याप्त जीवों में नहीं होती है। पर्याप्त जीवों में दशप्राणों में से अपनी-अपनी योग्यतानुसार दश, नव, आठ, सात, छह और चार प्राण होते हैं, वे अतीतप्राण नहीं होते हैं। उनके चारों संज्ञाएं होती हैं तथा क्षीणसंज्ञा वाले भी होते हैं।

पर्याप्त जीवों में चारों गतियाँ होती हैं और उनके सिद्धगति नही है। एकेन्द्रिय आदि पाँचों जातियाँ होती हैं तथा अतीतजाति अवस्था वहाँ नहीं है। पृथ्वीकायिक आदि छहों काय पर्याप्त जीवों में पाई जाती है, वे अकाय-कायरहित नहीं होते हैं। उन पर्याप्तक जीवों के पन्द्रह योगों में से औदारिकमिश्र, वैक्रियकमिश्र, आहारकमिश्र और कार्मणकाययोग के बिना ग्यारह योग होते हैं और वे अयोगी भी होते हैं। उनमें तीनों वेद होते हैं और वे अपगत वेदी भी होते हैं। उनमें चारों कषाय हैं और अकषाय भी है। पर्याप्त जीवों में आठों ज्ञान होते हैं। उनमें सातों संयम होते हैं किन्तु संयम, संयमासंयम, और असंयम इन तीनों से रहित स्थान नहीं होता है। उनमे चारों दर्शन होते हैं। द्रव्य और भाव के भेद से छहों लेश्याएं होती हैं और अलेश्यास्थान भी होता है। यहाँ द्रव्य से छहों लेश्याएं होती हैें ऐसा कथन करने पर शरीर सम्बन्धी छह वर्णों का ही ग्रहण करना चाहिए। भाव से छहों लेश्याओं के कथन से योग और कषायों के छह भेदोें को प्राप्त मिश्रित अवस्था को ग्रहण करना चाहिए।

कहा भी है-

गाथार्थ-वर्ण नामकर्म के उदय से उत्पन्न होने वाले शरीर के वर्ण को द्रव्यलेश्या कहते हैं और कषाय के उदय से अनुरञ्जित योग की प्रवृत्ति भावलेश्या कही जाती है।

भव्यमार्गणा की अपेक्षा उन पर्याप्त जीवों में भव्यसिद्धिक और अभव्यसिद्धिक दोनों प्रकार होते हैं किन्तु भव्यसिद्धिक और अभव्यसिद्धिक इन दोनों विकल्पों से रहित स्थान उनमें नहीं पाया जाता है। उनमें छहों सम्यक्त्व होते हैं। उनमें संज्ञी और असंज्ञी दोनों प्रकार के जीव रहते हैं किन्तु संज्ञी-असंज्ञी से रहित अवस्था भी उनमें (तेरहवे-चौदहवें गुणस्थान की अपेक्षा) पाई जाती है। पर्याप्त जीवों में आहारक और अनाहारक दोनों प्रकार के भेद होते हैं। साकार और अनाकार दोनों उपयोग होते हैं तथा दोनोें उपयोगों का युगपत् सद्भाव भी उनमें होता है।


इदानीं सामान्येनापर्याप्तानामालापाः कथ्यन्ते-

संप्रति अपर्याप्तावस्थाविशिष्टजीवानामोघालापे कथ्यमाने मिथ्यादृष्टि-सासादनसमयग्दृष्टि-असंयतसम्यग्दृष्टि-प्रमत्तसंयत-सयोगिकेवलिन इति पंच गुणस्थानानि। सप्तापर्याप्ता जीवसमासाः। षडपर्याप्तयः पञ्चापर्याप्तयः चतस्रोऽपर्याप्तयः। सप्त प्राणाः सप्तप्राणाः षट्प्राणाः पञ्च प्राणाः त्रयः प्राणाः। चतस्रः संज्ञाः, अतीतसंज्ञाप्यस्ति।

चतस्रो गतयः, एकेन्द्रियादिपंचजातयः, पृथिवीकायादिषट्कायाः, औदारिक-वैैक्रियिक-आहार मिश्र-कार्मणकाययोगा इति चत्वारो योगाः, त्रयो वेदाः, अपगतवेदोऽप्यस्ति, चत्वारः कषायाः, अकषायोऽप्यस्ति, मनःपर्यय-विभंगज्ञानाभ्यां विना षड्ज्ञानानि, चत्वारः संयमाः सामायिक-छेदोपस्थापन-यथाख्याता असंयमाश्च, चत्वारि दर्शनानि।
द्रव्येण कापोत-शुक्ललेश्ये, भावेन षड्लेश्याः, यस्मात् सर्वकर्मणो विस्रसोपचयः शुक्लो भवति तस्माद् विग्रहगतौ वर्तमानसर्वजीनानां शरीरस्य शुक्ललेश्या भवति, पुनः शरीरं गृहीत्वा यावत्पर्याप्तिपूर्णतां करोति तावत् षड्वर्ण-परमाणुपुञ्ज-निष्पद्यमानशरीरत्वात् तस्य शरीरस्य लेश्या ‘कापोतलेश्या’ इति भण्यते। एवमपर्याप्तावस्थायां द्वे शरीरलेश्ये भवतः। भावेन षड्लेश्याः इति कथिते नारक-तिर्यग्भवनवासि-वानव्यन्तर-ज्योतिष्कदेवानामपर्याप्तकाले कृष्ण-नील-कापोतलेश्या भवन्ति। सौधर्माद्युपरिमदेवा नामपर्याप्तकाले तेजः-पद्म-शुक्ललेश्या भवन्ति।
भव्यसिद्धिका अभव्यसिद्धिकाः, सम्यग्मिथ्यात्वेन विना पञ्च सम्यक्त्वानि, संज्ञिनोऽसंज्ञिनोऽनुभया वा, आहारिणोऽनाहारिणः, साकारोपयुक्ता अनाकारोपयुक्ता वा तदुभयेन युगपदुपयुक्ता अपि सन्ति ।

इंदौरमहानगरे सुदामानगरकालोनीमध्ये वीराब्दे द्वाविंशत्यधिकपंचविंशतिशततमे चैत्रकृष्णामावस्यायां जिनमंदिरस्योपरि त्रिचतुर्विंशतितीर्थंकराणां चरणानि स्थापयितुं मया प्रेरणा कृता। इमे द्वासप्ततितीर्थंकरा अस्माकं सर्वभाक्तिकानां च सर्वसौख्यं प्रयच्छन्तु।
धर्मतीर्थस्य कर्तारः त्रिचतुर्विंशतिर्जिनाः।
नमस्तेभ्यः त्रिशुद्धयाथ, त्रैलोक्याग्रपदाप्तये[३]।।१।।

२ अपर्याप्त जीवों के सामान्य-आलाप.

गु. जी. प. प्रा. सं. ग. इं. का यो. वे. क. ज्ञा. संय. द. ले. भ. स. संज्ञि. आ. उ.
५ १ मि. २ सा.४ अवि.६ प्र.१३सयो. ७ अप. ६अप.५अप.४अप. ७ ७ ६ ५ ४ ३ ४ अ.स . ४ औ. मि. वै. मि.आ. मि.कार्म. ३ अपगत ४ अंक ६ मन .विभ.विना. ४सामां.छे यथा.असं. द्र.२ का.शु.भा. ६ २भ.अ . ५ सम्यग्मि. विना. २ सं. असं.अनु. २ आहार अनाहार २ साकार अनाकार

अब सामान्य से अपर्याप्त जीवों के आलाप कहे जाते हैैं-

अब अपर्याप्त अवस्था से युक्त अपर्याप्तक जीवों के ओघालाप कहने पर उनमें मिथ्यादृष्टि, सासादनसम्यग्दृष्टि, असंयतसम्यग्दृष्टि, प्रमत्तसंयत, सयोगकेवली ये पाँच गुणस्थान होते हैं। चौदह जीवसमासों मे से अपर्याप्त रूप सात जीवसमास होते हैं। छह, पाँच और चार अपर्याप्तियाँ होती हैं अर्थात् अपर्याप्त संज्ञी जीवों के छहों अपर्याप्तियाँ, अपर्याप्त असंज्ञी और विकलत्रयों के पाँच अपर्याप्तियाँ तथा अपर्याप्त एकेन्द्रिय जीवों के चार अपर्याप्तियाँ होती है। प्राणों की अपेक्षा अपर्याप्त जीवों में यथायोग्य सात, सात, छह, पाँच और तीन प्राण होते है। उनमें चारों संज्ञाएं पाई जाती हैं और अतीतसंज्ञारूप स्थान भी होता है।

पुनः उन अपर्याप्त अवस्था वाले जीवों के चारों गतियाँ होती हैं, एकेन्द्रिय आदि पाँचों जातियाँ होती हैं, पृथ्वीकाय आदि छहों काय होते हैं, औदारिकमिश्र, वैक्रियकमिश्र, आहारकमिश्र, और कार्मणकाययोग ये चार योग होते हैं। तीनों वेद हैं तथा अपगतवेदरूप स्थान भी है। चारों कषाएं हैं तथा अकषायरूप स्थान भी है। मनःपर्यय और विभंगज्ञान (कुअवधिज्ञान) के बिना छह ज्ञान होते हैं। सामायिक, छेदोपस्थापना, यथाख्यात संयम और असंयम ये चार संयम होते हैं। चारों दर्शन होते हैं।

लेश्या की अपेक्षा अपर्याप्त जीवोें के द्रव्य से कापोत और शुक्ल ये दो लेश्याएं होती हैं और भाव से छहों लेश्याएं हैं। जिस कारण से सम्पूर्ण कर्मों का विस्रसोपचय शुक्ल ही होता है इसलिए विग्रहगति में विद्यमान सम्पूर्र्ण जीवों के शरीर की शुक्ललेश्या होती है पुनः शरीर को ग्रहण करने के बाद जब तक पर्याप्तियों को पूर्ण करता है तब तक छह वर्ण वाले परमाणुओं के पुंजों से शरीर की उत्पत्ति होती है इसलिए उस शरीर की कापोत लेश्या कही जाती है। इस प्रकार अपर्याप्त अवस्था में शरीर सम्बन्धी दो ही लेश्याएं मानी गई हैं। आगे भाव की अपेक्षा छहों लेश्याएं होती हैं ऐसा कथन करने पर नारकीr, तिर्यञ्च, भवनवासी, वानव्यन्तर और ज्योतिर्वासी देवों के अर्याप्त काल में वृृष्ण, नील, कापोत ये तीन लेश्याएं होती हैं तथा सौधर्म आदि ऊपर के देवों में अपर्याप्त काल में पीत, पद्म और शुक्ल ये तीन लेश्याएं होती हैं।

भव्यमार्गणा की अपेक्षा अपर्याप्त जीवों में भव्यसिद्धिक और अभव्य सिद्धिक दोनों होते हैं। सम्यग्मिथ्यात्व के बिना पाँच सम्यक्तत्व होते हैं। संज्ञी और असंज्ञी दोनों अवस्थाएं वहाँ पाई जाती हैं तथा संज्ञी-असंज्ञी दोनों विकल्पों से रहित अवस्था भी होती है। आहारक और अनाहारक दोनों प्रकार के जीव रहते हैं। साकार और अनाकार दोनों उपयोग वाले जीव रहते हैं तथा युगपत् दोनों उपयोगों से युक्त जीव भी होते हैं।

इंदौर (म.प्र.) महानगर की सुदामानगर कालोनी में वीरनिर्वाण संवत् पचीस सौ बाईस (२५२२) में चैत्र कृष्णा अमावस तिथि को मैंने वहाँ के निर्माणाधीन जिनमंदिर के ऊपर तीन चौबीसी तीर्थंकरों के बहत्तर चरण स्थापित करने की प्रेरणा दी। ये ७२ तीर्थंकर हमारे एवं सभी भाक्तिकों के लिए सर्वसुख प्रदान करें यही अभिलाषा है।

संप्रति मिथ्यादृष्टीनां सामान्यालापो भण्यते-

मिथ्यादृष्टिजीवानामोघालापे भण्यमाने एकं गुणस्थानमस्ति, चतुर्दश जीवसमासाः, षट्-पञ्च-चतुःपर्याप्त-यस्तथैवापर्याप्तयश्च। दश-नव-अष्ट-सप्त-षट्-चतुःप्राणास्तथैव सप्त-सप्त-षट्-पंच-चतुस्त्रिप्राणाश्चापर्याप्तानां प्राणाः। चतुःसंज्ञाः, चतुर्गतयः, पंच जातयः, षट् कायाः, आहारद्विकेन विना त्रयोदश योगाः, त्रयो वेदाः, चत्वारः कषायाः, त्रीण्यज्ञानानि, असंयमः, द्वे दर्शने, द्रव्यभावाभ्यां षड्लेश्याः, भव्यसिद्धिकाः अभव्यसिद्धिकाः, मिथ्यात्वं, संज्ञिनोऽसंज्ञिनः, आहारिणोऽनाहारिणः, साकारोपयुक्ता अनाकारोपयुक्ता वा भवन्ति।


नं. ३ मिथ्यादृष्टि जीवों के सामान्य-आलाप.

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तेषामेव मिथ्यादृष्टीनां पर्याप्तौघालापे कथ्यमाने अस्त्येकं गुणस्थानं, सप्त जीवसमासाः, षट्-पञ्च-चतुःपर्याप्तयः दश-नव-अष्ट-सप्त-षट्-चतुःप्राणाः, चतस्रः संज्ञाः, चतुर्गतयः, एकेन्द्रियादि-पञ्चजातयः, पृथिवीकायादिषट्कायाः, दश योगाः औदारिकमिश्र-वैक्रियिकमिश्र-आहारद्विक-कार्मणकाययोगन्यूनाः, त्रयो वेदाः, चत्वारः कषायाः, त्रीण्यज्ञानानि, असंयमः, द्वे दर्शने आद्ये, द्रव्यभावाभ्यां षड्लेश्याः, भव्यसिद्धिका अभव्यसिद्धिकाः, मिथ्यात्वं, संज्ञिनोऽसंज्ञिनः, आहारिणोऽनाहारिणः, साकारोपयोगिनोऽनाकारोपयोगिनः वा भवन्ति ।

नं. ४ मिथ्यादृष्टि जीवों के पर्याप्त-आलाप.

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अब मिथ्यादृष्टि जीवों के सामान्य आलाप कहे जाते हैं-

मिथ्यादृष्टि जीवों के ओघालाप का कथन करने पर उनमें एक गुणस्थान, चौदहों जीवसमास हैं। छह, पाँच और चार पर्याप्तियाँ होती हैं तथा इसी प्रकार छह, पाँच और चार अपर्याप्तियाँ होती हैं। अर्थात् मिथ्यादृष्टि संज्ञी पर्याप्त जीवों के छहों पर्याप्तियाँ और अपर्याप्त के छहों अपर्याप्तियाँ होती हैं, मिथ्यादृष्टि असंज्ञी पर्याप्त के मन के बिना पाँच पर्याप्तियाँ एवं अपर्याप्त के पाँच अपर्याप्तियाँ होती हैं, विकलत्रय पर्याप्तकों के पाँच पर्याप्तियाँ तथा अपर्याप्तकों के पाँच अपर्याप्तियाँ हैं, एकेन्द्रिय पर्याप्तक जीवों के चार पर्याप्तियाँ एवं अपर्याप्तकों के चार अपर्र्याप्तियाँ होती हैं।

प्राणों की अपेक्षा मिथ्यादृष्टि संज्ञी पर्याप्त जीवों के दश प्राण होते हैं और अपर्याप्त के सात प्राण होते हैं। पंचेन्द्रिय असंज्ञी पर्याप्त के नौ प्राण एवं अपर्याप्त के सात प्राण होते हैं। चतुरिन्द्रिय पर्याप्त के आठ प्राण एवं अपर्याप्त के छह प्राण होते हैं। तीन इन्द्रिय वाले पर्याप्त जीवों के सात प्राण एवं अपर्याप्त के पांच प्राण होते हैं। दो इन्द्रिय पर्याप्त जीवों के छह प्राण तथा अपर्याप्तक के चार प्राण होते हैं। एकेन्द्रिय पर्याप्तक के चार प्राण और अपर्याप्तक के तीन प्राण होते हैं।

संज्ञा की अपेक्षा चार संज्ञाएं होती हैं, चारों गतियाँ हैं, पाँचों जातियाँ हैं और छहों काय होते हैं। आहारककाययोग और आहारकमिश्रकाययोग के बिना तेरह योग हैं, तीनों वेद हैं, चारों कषाएं होती हैं, तीन अज्ञान हैं, असंयम है, चक्षु-अचक्षु ये दो दर्शन होते हैं, द्रव्य और भाव से छहों लेश्याएं रहती हैं, भव्य और अभव्यसिद्धिक दोनों होते हैं, सम्यक्त्व की अपेक्षा उन मिथ्यादृष्टि पर्याप्त और अपर्याप्त दोनों प्रकार के जीवों को मिथ्यात्व रहता है, वे संज्ञी और असंज्ञी दोनों होते हैं, आहारक भी होते हैं और अनाहारक भी होते हैं एवं साकार-अनाकार दोनों उपयोगों से युक्त होते हैं। उन्हीं मिथ्यादृष्टि जीवों के पर्याप्तकालसम्बन्धी ओघालाप कहने पर-एक मिथ्यात्व गुणस्थान, पर्याप्त सम्बन्धी सात जीवसमास, संज्ञी के छहों पर्याप्तियाँ, असंज्ञी और विकलत्रयों के पांचपर्याप्तियाँ, एकेन्द्रियों के चार पर्याप्तियाँ हैं। संज्ञीपर्याप्त के दश प्राण और असंज्ञी के नौ प्राण, चतुरिन्द्रिय के आठ प्राण, तीन इन्द्रिय के सात प्राण, दो इन्द्रिय के छह प्राण और एकेन्द्रिय के चार प्राण होते हैं। संज्ञा की अपेक्षा पर्याप्त जीवों के चारों संज्ञाएं हैं, चारों गतियाँ, एकेन्द्रिय आदि पाँचों जातियाँ पृथ्वीकायादि छहों काय, आहारकद्विक और अपर्याप्त सम्बन्धी तीनों योगों के बिना दश योग, तीनों वेद, चारों कषाएं, तीनों अज्ञान, असंयम, चक्षु-अचक्षु ये दो दर्शन, द्रव्य और भाव से छहों लेश्याएं, भव्यसिद्धिक और अभव्यसिद्धिक, मिथ्यात्व, संज्ञिक और असंज्ञिक, आहारक, साकारोपयोगी और अनाकारोपयोगी होते हैं।

तेषामेवापर्याप्तालापे भण्यमानेऽस्त्येकं गुणस्थानं, सप्तापर्याप्तजीवसमासाः, षट्-पंच-चतुरपर्याप्तयः, सप्त-सप्त-षट्-पंच-चतुःत्रिप्राणाः, चतुःसंज्ञाः, चतुर्गतयः पञ्चजातयः, षट्कायाः, त्रयो योगाः-औदारिकमिश्र-वैक्रियिकमिश्र-कार्मणकाययोगाः, त्रयो वेदाः, चत्वारः कषायाः, विभंगज्ञानेन बिना कुमतिकुश्रुतनामनी द्वे अज्ञाने, असंयमः,द्वे दर्शने, द्रव्येण कापोतशुक्ललेश्ये, भावेन षड्लेश्याः, भव्यसिद्धिका अभव्य-सिद्धिकाः, मिथ्यात्वं, संज्ञिनोऽसंज्ञिनः, आहारिणोऽनाहारिणः, साकारोपयोगिनोऽनाकारो-पयोगिनो वा भवन्ति ।

नं. ५ मिथ्यादृष्टि जीवों के अपर्याप्त-आलाप.

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सासादनसम्यग्दृष्टीनां सामान्यालापे कथ्यमानेऽस्त्येकं गुणस्थानं सासादनमेव, द्वौ जीवसमासौ संज्ञिपर्याप्तापर्याप्तौ, षट्पर्याप्तयः षडपर्याप्तयः। दश प्राणाः सप्त प्राणाः, चतस्रः संज्ञाः, चतस्रो गतयः, पंचेन्द्रियजातिः, त्रसकायः, त्रयोदश योगाः आहारद्विकेन विना, त्रयो वेदाः, चत्वारः कषायाः, त्रीण्यज्ञानानि, असंयमः, द्वे दर्शने, द्रव्यभावाभ्यां षड्लेश्याः, भव्यसिद्धिकाः, सासादनसम्यक्त्वं, संज्ञिनः, आहारिणोऽनाहारिणः, साकारोपयुक्ता अनाकारोपयुक्ता अपि सन्ति ।
नं.६ सासादन सम्यग्दृष्टि जीवों के सामान्य-आलाप

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एषामेव सासादनसम्यग्दृष्टिपर्याप्तानामालापे कथ्यमानेऽस्त्येकं गुणस्थानं एको जीवसमासः, षट् पर्याप्तयः, दश प्राणाः, चतस्रः संज्ञाः, चतस्रो गतयः, पंचेन्द्रियजातिः, त्रसकायो, दश योगाः, त्रयो वेदाः, चत्वारः कषायाः, त्रीण्यज्ञानानि, असंयमः, द्वे दर्शने, द्रव्यभावाभ्यां षड्लेश्याः, भव्यसिद्धिकाः, सासादनसम्यक्त्वं, संज्ञिनः, आहारिणः, साकारोपयुक्ता अपि भवन्ति अनाकारोपयुक्ता अपि ।
नं. ७ सासादन सम्यग्दृष्टियों के पर्याप्त-आलाप.

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उन्हीं मिथ्यादृष्टि जीवों के अपर्याप्तकाल सम्बन्धी ओघालाप कहने पर-एक मिथ्यात्व गुणस्थान तथा अपर्याप्त सम्बन्धी सात जीवसमास होते हैंं। संज्ञी जीवों के छहों अपर्याप्तियाँ, असंज्ञी और विकलत्रय जीवों के पाँच अपर्याप्तियाँ तथा एकेन्द्रिय जीवों के चार अपर्याप्तियाँ होती हैं। उन मिथ्यादृष्टि अपर्याप्त जीवों में संज्ञी के सात प्राण, असंज्ञी के सात प्राण, चतुरिन्द्रियों के छह प्राण, तीन इन्द्रिय वालों के पाँच प्राण, दो इन्द्रिय जीवों के चार प्राण और एकेन्द्रियों के तीन प्राण होते हैं। इसी प्रकार अपर्याप्त मिथ्यादृष्टियों के चारों संज्ञाएं, चारों गतियाँ, एकेन्द्रिय आदि पाँचों जातियाँ, पृथ्वीकायादि छहों काय और औदारिकमिश्र, वैक्रियकमिश्र तथा कार्मणकाययोग ये तीन योग होते हैं, तीनों वेद हैं, चारों कषाएं हैं, कुअवधिज्ञान के बिना दो-कुमति-कुश्रुतज्ञान होते हैं। अपर्याप्त अवस्था में सभी जीवों के कोई भी संयम न रहकर मात्र असंयम होता है, चक्षु और अचक्षु ये दो दर्शन, द्रव्य की अपेक्षा कापोत और शुक्ल ये दो लेश्या एवं भाव की अपेक्षा छहों लेश्याएं होती हैं। वे अपर्याप्त जीव भव्यसिद्धिक भी होते हैं और अभव्यसिद्धिक भी होते हैं, उनके कोई सम्यक्त्व न होकर मिथ्यात्व रहता है, वे संज्ञी भी होते हैं और असंज्ञी भी होते हैं, आहारक भी होते हैं और अनाहारक भी होते हैं, वे साकारोपयोग और अनाकारोपयोग दोनों प्रकार के अलग-अलग उपयोगों से समन्वित होते हैं।

अब सासादनसम्यग्दृष्टि जीवों के सामान्य आलाप का कथन करने पर-एक सासादन सम्यग्दृष्टि नामक गुणस्थान होता है, संज्ञी पर्याप्त और संज्ञी अपर्याप्त नाम के दो जीवसमास होते हैं, छहों पर्याप्तियाँ और छहों अपर्याप्तियाँ होती हैं, पर्याप्त के दश प्राण और अपर्याप्त के सात प्राण होते हैं, चारों संज्ञाएं हैं, चारों गतियाँ हैं, एक पञ्चेन्द्रिय जाति होती है, त्रसकाय होती है, आहारकद्विक के बिना तेरह योग, तीनों वेद, चारों कषाएं, तीनों अज्ञान, एक असंयम, चक्षु और अचक्षु ये दो दर्शन, द्रव्य और भावरूप छहों लेश्याएं, भव्यसिद्धिक, सासादनसम्यक्त्व, संज्ञिक, आहारक, अनाहारक, साकारोपयोगी और अनाकारोपयोगी होते हैं।

एतेषामेवापर्याप्तकानामालापे भण्यमानेऽस्त्येकं गुणस्थानं, एको जीवसमासः, षड्पर्याप्तयः, सप्त प्राणाः, चतस्रः संज्ञा, तिस्रो गतयः नरकगत्या विना, पंचेन्द्रियजातिः, त्रसकायाः, त्रयो योगाः, चत्वारः कषायाः, विभंगज्ञानेन विना द्वेऽज्ञाने, असंयमः, द्वे दर्शने, द्रव्येण कापोत-शुक्ललेश्ये, भावेन षड्लेश्याः, भव्यसिद्धिकाः, सासादनसम्यक्त्वं, संज्ञिनः, आहारिणोऽनाहारिणः, साकारोपयुक्ता अनाकारोपयुक्ता वा भवन्ति ८ ।

८ सासादन सम्यग्दृष्टियों के अपर्याप्त-आलाप.

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सम्यग्मिथ्यादृष्टीनां सामान्येनालापे भण्यमाने एकमस्ति गुणस्थानं, एको द्वौ जीवसमासः, षट् पर्याप्तयः, दश प्राणाः, चतस्रः संज्ञा, चतस्रे गतयः, पंचेन्द्रियजातिः, त्रसकायः, दशयोगाः, त्रयो वेदाः, चत्वारः कषायाः, अज्ञानमिश्राणि त्रीणि ज्ञानानि, असंयमः, द्वे दर्शने, द्रव्यभावाभ्यां षड्लेश्याः, भव्यसिद्धिकाः, सम्यग्मिथ्यात्वं, संज्ञिनः, आहारिणः, साकारोपयुक्ताः भवन्त्यनाकारोपयुक्ताः वा ।
९ सम्यग्मिथ्यादृष्टियों के आलाप.

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असंयतसम्यग्दृष्टीनां सामान्येनालापे कथ्यमानेऽस्त्येकं गुणस्थानं, द्वौ जीवसमासौ, षट्पर्याप्तयोऽपर्याप्तयश्च, दश प्राणाः सप्त प्राणाः, चतस्रः संज्ञाः, चतस्रो गतयः, पञ्चेन्द्रियजातिः, त्रसकायः, त्रयोदश योगाः, त्रयो वेदाः, चत्वारः, कषायाः, त्रीणि ज्ञानानि, असंयमः, त्रीणि दर्शनानि, द्रव्यभावाभ्यां षड्लेश्याः, भव्यसिद्धिकाः, त्रीणि सम्यक्त्वानि, संज्ञिनः, आहारिणोऽनाहारिणः, साकारोपयुक्ता भवन्त्यनाकारोपयुक्ता वा ।
नं. १० असंयतसम्यग्दृष्टियों के सामान्य आलाप.

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असंयतसम्यग्दृष्टीनां पर्याप्तानामालापे कथ्यमानेऽस्त्येकं गुणस्थानं, एको जीवसमासः, षट् पर्याप्तयः, दश प्राणाः, चतस्रः संज्ञाः, चतस्रो गतयः, पञ्चेन्द्रियजातिः, त्रसकायः, दश योगाः, त्रयो वेदाः, चत्वारः कषायाः, त्रिज्ञानानि, असंयमः, त्रिदर्शनानि, द्रव्यभावाभ्यां षड्लेश्याः, भव्यसिद्धिकाः, त्रीणि सम्यक्त्वानि, संज्ञिनः, आहारिणः साकारोपयुक्ता भवन्त्यनाकारोपयुक्ता वा ।
११ असंयतसम्यग्दृष्टियों के पर्याप्त आलाप.

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एतेषामेवापर्याप्तानामोघप्ररूपणे भण्यमानेऽस्त्येकं गुणस्थानं, एकोऽपर्याप्त-जीवसमासः, षडपर्याप्तयः, सप्त प्राणाः, चतस्रः संज्ञाः चतस्रो गतयः, पंचेन्द्रियजातिः, त्रसकायः, त्रयो योगाः, स्त्रीवेदेन विना द्वौ वेदौ, चत्वारः कषायाः, त्रिज्ञानानि, असंयमः, त्रिदर्शनानि, द्रव्येण कापोतशुक्ललेश्ये, भावेन षड्लेश्याः, नरकादागत्य मनुष्येषूत्पन्ना-संयतसम्यग्दृष्टीनामपर्याप्तकाले कृष्णनीलकापोतलेश्या लभ्यन्ते। भव्यसिद्धिकाः, त्रीणि सम्यक्त्वानि, अनादिमिथ्यादृष्टयो वा सादिमिथ्यादृष्टयो वा चतसृष्वपि गतिषु उपशमसम्यक्त्वं गृहीत्वा स्थितजीवा न कालं कुर्वन्ति।
कश्चिदाह-उपशमसम्यग्दृष्टयो न म्रियन्त इति कथं ज्ञायते?

आचार्यः प्राह-आचार्यवचनाद् व्याख्यानाच्च ज्ञायते, किन्तु चारित्रमोहोपशामका मृता देवेषूत्पद्यन्ते तानाश्रित्यापर्याप्तकाले उपशमसम्यक्त्वं लभ्यते। वेदकसम्यक्त्वं पुनः देवमनुष्ययोरपर्याप्तकाले लभ्यते, वेदकसम्यक्त्वेन सह मृतदेवमनुष्ययो-रन्योन्यगमनागमनविरोधाभावात्। कृतकृत्यवेदकं प्रतीत्य वेदकसम्यक्त्वं तिर्यग्नारकयोरपर्याप्तकाले लभ्यते। क्षायिकसम्यक्त्वमपि चतुसृष्वपि गतिषु पूर्वायुर्बंधं प्रतीत्यापर्याप्तकाले लभ्यते तेन त्रीणि सम्यक्त्वान्य-पर्याप्तकाले भवन्ति। संज्ञिनः, आहारिणोऽनाहारिणः, साकारोपयुक्ता भवन्त्यनाकारोपयुक्ता वा ।
१२ असंयतसम्यग्दृष्टियों के अपर्याप्त-आलाप.

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उन्हीं सासादनसम्यग्दृष्टि जीवों के पर्याप्तकाल

उन्हीं सासादनसम्यग्दृष्टि जीवों के पर्याप्तकाल सम्बन्धी ओघालाप कहने पर-एक दूसरा गुणस्थान, एक संज्ञीपर्याप्त जीवसमास, छहों पर्याप्तियाँ, दशों प्राण, चारों संज्ञाएं, चारों गतियाँ, पञ्चेन्द्रिय जाति, त्रसकाय, आहारकद्विक और अपर्याप्त तीन योगों के बिना दश योग, तीनों वेद, चारों कषायें, तीनों अज्ञान, असंयम, चक्षु और अचक्षु दर्शन ये दो दर्शन होते हैं। उपर्युक्त पर्याप्तक जीवों के द्रव्य और भावरूप छहों लेश्याएं होती हैं, भव्यसिद्धिक होते हैं, उनके एक सासादन सम्यक्त्व होता है, वे संज्ञी होते हैं, आहारक होते हैं, साकारोपयोगी और अनाकारोपयोगी होते हैं।

उन्हीं सासादनसम्यग्दृष्टि जीवों के अपर्याप्तकालसम्बन्धी ओघालाप कहने पर-एक दूसरा गुणस्थान, एक संज्ञीअपर्याप्त जीवसमास, छहों अपर्याप्तियाँ, मनोबल, वचनबल और स्वासोच्छ्वास के बिना सात प्राण, चारों संज्ञाएं, नरकगति के बिना तीन गतियाँ, एक पञ्चेन्द्रिय जाति, त्रसकाय, आहारकमिश्र के बिना अपर्याप्त सम्बन्धी तीन योग, तीनों वेद, चारोें कषायें और विभंगज्ञान के बिना दो अज्ञान होते हैं।

उपर्युक्त सासादनसम्यग्दृष्टि गुणस्थानवर्ती जीवों के अपर्याप्त अवस्था में असंयम रहता है, चक्षु और अचक्षु ये दो दर्शन होते हैं, द्रव्य से कापोत और शुक्ल लेश्या एवं भाव से छहों लेश्याएं होती हैं, वे भव्यसिद्धिक होते हैं, उनके सासादनसम्यक्त्व नामक एक सम्यक्त्व होता है, संज्ञी होते हैं, आहारक भी होते हैं और अनाहारक भी होते हैं तथा साकारोपयोगी और अनाकारोपयोगी होते हैं।

सम्यग्मिथ्यादृष्टि नामक तृतीयगुणस्थानवर्ती जीवों के सामान्य से आलाप कहने पर- उनके एक तीसरा गुणस्थान होता है, संज्ञीपर्याप्तक नामका एक जीवसमास है, छहों पर्याप्तियाँ हैं, दशों प्राण हैं, चारों संज्ञाएं हैं, चारों गतियाँ हैं, एक पञ्चेन्द्रिय जाति है, एक त्रसकाय है, आहारकद्विक और अपर्याप्त सम्बधी तीन योगों के बिना दश योग होते हैं, तीनों वेद होते हैं, चारों कषाएं होती हैं, अज्ञान से मिश्रित प्रारम्भिक तीन ज्ञान होते हैं, एक असंयम होता है, चक्षु और अचक्षु ये दो दर्शन होते हैं, द्रव्य और भावरूप छहों लेश्याएं होती हैं, भव्यसिद्धिक होते हैं, सम्यग्मिथ्यात्व नाम का एक सम्यक्त्व होता है, संज्ञिक होते हैं, आहारक होते हैं तथा साकारोपयोगी और अनाकारोपयोगी होते हैं।

असंयतसम्यग्दृष्टि जीवों के सामान्य से ओघालाप कहने पर-उनमें एक चतुर्थ गुणस्थान होता है, संज्ञी पर्याप्त और संज्ञी अपर्याप्त ये दो जीव समास होते हैं, छहों पर्याप्तियाँ तथा छहों अपर्याप्तियाँ होती हैं, दशप्राण (पर्याप्त की अपेक्षा) और सात प्राण (अपर्याप्त की अपेक्षा) होते हैं, चारों संज्ञाएं होती हैं, चारों गतियाँ होती हैं, एक पञ्चेन्द्रिय जाति होती है, एक त्रसकाय होता है, आहारकद्विक के बिना तेरह योग होते हैं, तीनों वेद होते हैं, चारों कषाएं होती हैं, तीन अज्ञान होते हैं, असंयम होता है, तीन दर्शन होते हैं, द्रव्य और भावरूप छहों लेश्याएं होती हैं, भव्यसिद्धिक होते हैं, तीन सम्यक्त्व (औपशमिक, क्षायिक, क्षायोपशमिक) होते हैं, संज्ञिक होते हैं, आहारक और अनाहारक दोनों प्रकार के होते हैं, साकारोपयोेगी और अनाकारोपयोगी होते हैं।

असंयतसम्यग्दृष्टि जीवों के पर्याप्तकाल सम्बन्धी ओघालाप कहने पर-उनमेें एक चौथा गुणस्थान होता है, संज्ञीपर्याप्तक एक जीवसमास होता है, छहों पर्याप्तियाँ होती हैं, दशों प्राण होते हैं, चारों संज्ञाएं होती हैं, चारोें गतियाँ होती हैं, एक पञ्चेन्द्रिय जाति होती है, एक त्रसकाय होता है, आहारकद्विक और अपर्याप्तसम्बन्धी तीन योगों के बिना दश योग होते हैं, तीनों वेद होते हैं, चारों कषाएं होती हैं, तीन ज्ञान होते हैं, एक असंयम होता है, केवलदर्शन के बिना तीन दर्शन होते हैं, द्रव्य और भावरूप छहों लेश्याएं होती हैं, भव्यसिद्धिक होते हैं, औपशमिक, क्षायिक और क्षायोपशमिक ये तीन सम्यक्त्व होते हैं, संज्ञिक होते हैं, आहारक होते हैं तथा साकारोपयोगी और अनाकारोपयोगी होते हैं।

उन्हीं असंयतसम्यदृष्टि जीवों के अपर्याप्तकालसम्बन्धी ओघालाप कहने पर-उनमें एक चौथा गुणस्थान होता है तथा एक संज्ञी-अपर्याप्त जीवसमास, छहों अपर्याप्यिाँ, सात प्राण (मन,वचनबल और स्वासोच्छ्वास को छोड़कर), चारों संज्ञाएं, चारों गतियाँ, पञ्चेन्द्रियजाति, त्रसकाय, औदारिकमिश्र, वैक्रियकमिश्र और कार्मण ये तीन योग, स्त्रीवेद के बिना दो वेद, चारों कषाएं, मति, श्रुत, अवधि ये तीन ज्ञान, असंयम, केवलदर्शन के बिना तीन दर्शन, द्रव्य से कापोत और शुक्ललेश्या तथा भाव से छहों लेश्याएं होती हैं। छहों लेश्याएं होने का यह कारण है कि नरकगति से आकर मनुष्यों में उत्पन्न होने वाले असंयत सम्यग्दृष्टि जीवों के अपर्याप्त काल में कृष्ण, नील और कापोत ये तीन लेश्याएं पाई जाती हैं। लेश्याओं के आगे वे असंयतसम्यग्दृष्टि अपर्याप्तक जीव भव्यसिद्धिक होते हैं, उनमें उपर्युक्त तीनों सम्यक्त्व होते हैं क्योंकि अनादिमिथ्यादृष्टि अथवा सादिमिथ्यादृष्टि जीव चारों ही गतियों में उपशमसम्यक्त्व को ग्रहण करके पाये जाते हैं किन्तु मरण को प्राप्त नहीं होते हैं।

शंका-यह कैसे जाना जाता है कि उपशमसम्यग्दृष्टि जीव मरण नहीं करते हैं?

समाधान-आचार्यों के वचन और सूत्र व्याख्यान से जाना जाता है कि उपशमसम्यग्दृष्टि जीव मरते नहीं है किन्तु चारित्रमोह के उपशम करने वाले जीव मरते हैं और देवों में उत्पन्न होते हैं अतः उनकी अपेक्षा अपर्याप्त काल में उपशमसम्यक्त्व पाया जाता है। वेदकसम्यक्त्व तो देव और मनुष्यों के अपर्याप्तकाल में पाया ही जाता है क्योंकि वेदकसम्यक्त्व के साथ मरण को प्राप्त हुए देव और मनुष्यों के परस्पर गमनागमन में कोई विरोध नहीं पाया जाता है। कृतकृत्यवेदक की अपेक्षा तो वेदकसम्यक्त्व तिर्यंच और नारकी जीवों के अपर्याप्त काल में भी पाया जाता है। क्षायिक सम्यक्त्व भी सम्यग्दर्शन के पहले बांधी गई आयु के बन्ध की अपेक्षा से चारों ही गतियों के अपर्याप्त काल में पाया जाता है इसलिए असंयतसम्यग्दृष्टि जीव के अपर्याप्त काल में तीनों ही सम्यक्त्व पाये जाते हैं।

भावार्थ

-जैसे राजा श्रेणिक ने मिथ्यात्व अवस्था में यशोधर मुनिराज के गले में मरा हुआ सर्प डालते समय सप्तम नरक की आयु का बन्ध किया था। पुनः भगवान् महावीर के समवसरण में उन्हें क्षायिक सम्यग्दर्शन की प्राप्ति हुई थी। जिसके कारण उन्होंने अपनी तीव्र भावविशुद्धि के बल पर तेंतीस सागर की आयु को ८४ हजार वर्ष के रूप में अपवर्तित कर ली थी अतः उन्हें मरकर प्रथम नरक में जन्म लेना पड़ा। इसी अपेक्षा से यह नियम पुष्ट होता है कि सम्यग्दृष्टि जीव मरकर प्रथम नरक के अतिरिक्त छह नरकों में उत्पन्न नहीं हो सकते हैं और नरक में पहुँचकर जब तक उसकी पर्याप्तियाँ पूर्ण नहीं होती हैं तब तक अपर्याप्त अवस्था में भी असंयतसम्यग्दृष्टि जीव के सम्यग्दर्शन पाया जाता है इसमें कोई संदेह वाली बात नहीं है।

दूसरी बात चारित्रमोह के उपशम को प्राप्त उपशमसम्यग्दृष्टि के मरण सम्बन्धी उदाहरण में पाण्डव नकुल और सहदेव का उदाहरण स्पष्ट है कि अग्नि उपसर्ग के समय उनके तीन भ्राता युधिष्ठिर, भीम तथा अर्जुन ने क्षपक श्रेणी पर चढ़कर घातिया कर्म नाशकर अंतकृत्केवली अवस्था से मोक्षपद प्राप्त किया और नकुल-सहदेव ने उपशम सम्यक्त्व के साथ उपशम श्रेणी पर आरोहण किया था अतः ग्यारहवें उपशान्तमोह गुणस्थान में उपशमसम्यक्त्व और औपशमिक चारित्र के साथ उन्होंने मरण करके सर्वार्थसिद्धि विमान में अहमिन्द्र पद प्राप्त किया। भविष्य में वे मनुष्य जन्म धारण कर नियम से मोक्ष प्राप्त करेंगे। इसी अपेक्षा से सम्यग्दृष्टि जीव के अपर्याप्तकाल में उपशम सम्यक्त्व स्वीकार किया गया है किन्तु साधारणरूप से सादि अथवा अनादिमिथ्यादृष्टि जीव के अपर्याप्तकाल में उपशमसम्यक्त्व नहीं माना जाता है।

संयतासंयतानामोघालापे भण्यमानेऽस्त्येकं गुणस्थानं

संयतासंयतानामोघालापे भण्यमानेऽस्त्येकं गुणस्थानं, एको जीवसमासः, षट्पर्याप्तयः, दश प्राणाः, चतस्रः संज्ञाः, द्वे गती, पंचेन्द्रियजातिः, त्रसकायः, नव योगाः, त्रयो वेदाः, चत्वारः कषायाः, त्रीणि ज्ञानानि, संयमासंयमः, त्रीणि दर्शनानि, द्रव्येण षड्लेश्याः, भावेन तेजःपद्मशुक्ललेश्याः। केचित् शरीरनिर्वर्तनार्थमागतपरमाणुवर्णं गृहीत्वा संयतासंयतादीनां भावलेश्यां प्ररूपयन्ति, तन्न घटते।

कुतो न घटते?
किंच, द्रव्यभावलेश्ययोर्भेदाभावात् ‘लिम्पतीति लेश्या’ इति वचनव्याघाताच्च। अतः कर्मलेपहेतोर्योगकषायौ एव भावलेश्येति गृहीतव्यम्।
भव्यसिद्धिकाः, त्रीणि सम्यक्त्वानि, संज्ञिनः, आहारिणः, साकारोपयुक्ता वा भवन्त्यनाकारोपयुक्ता वा।

नं. १३ संयतासंयतोें के आलाप.

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प्रमत्तसंयतानामोघालापे भण्यमानेऽस्त्येकं गुणस्थानं, द्वौ जीवसमासौ, षट्पर्याप्तयः, षड् अपर्याप्तयः, दश प्राणाः, सप्त प्राणाः, चतस्रः संज्ञा, मनुष्यगतिः, पञ्चेन्द्रियजातिः, त्रसकायः, एकादश योगाः, त्रयो वेदाः, चत्वारः कषायाः, चत्वारि ज्ञानानि, त्रयः संयमाः, त्रीणि दर्शनानि, द्रव्येण षड्लेश्याः, भावेन तेजःपद्मशुक्ललेश्याः, भव्यसिद्धिकाः, त्रीणि सम्यक्त्वानि, संज्ञिनः, आहारिणः, साकारोपयुक्ता वा भवन्त्यनाकारोपयुक्ता वा।

नं. १४ प्रमत्तसंयत-आलाप

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अप्रमत्तसंयतानामोघालापे भण्यमानेऽस्त्येकं गुणस्थानं, एको जीवसमासः, षट्पर्याप्तयः, दश प्राणाः, तिस्त्र संज्ञाः, असातावेदनीयस्योद्वीरणाभावात् आहारसंज्ञाप्रमत्तसंयतस्य नास्ति। कारणभूतकर्मोदयसंभवात् उपचारेण भयमैथुनपरिग्रहसंज्ञाः सन्ति। मनुष्यगतिः, पंचेन्द्रियजातिः, त्रसकायः, नवयोगाः, त्रयो वेदा-भाववेदापेक्षया, चत्वारः कषायाः, चत्वारि ज्ञानानि त्रयःसंयमाः, त्रीणि दर्शनानि, द्रव्येण षड्लेश्याः, भावेन तेजःपद्मशुक्ललेश्याः, भव्यसिद्धिका, त्रीणि सम्यक्त्वानि, संज्ञिनः, आहारिणः, साकारोपयुक्ता भवन्त्यनाकारोपयुक्ता वा।

नं. १५ अप्रमत्तसंयतों के आलाप

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अपूर्वकरणानामोघालापे कथ्यमानेऽस्त्येकं गुणस्थानं, एको जीवसमासः, षट्पर्याप्तयः, दश प्राणाः, तिस्त्रः संज्ञाः, मनुष्यगतिः, पंचेन्द्रियजातिः, त्रसकायः, नव योगाः।
कश्चिदाह-ध्यानलीनापूर्वकरणानां भवतु नाम वचनबलस्यास्तित्वं, भाषापर्याप्तिसंज्ञित-पुद्गलस्कंधजनित-शक्तिसद्भावात्। न पुनः वचनयोगः काययोगो वा इति चेत् ?
आचार्यः प्राह-नैतद् वक्तव्यं, अन्तर्जल्पप्रयत्नस्य कायगतसूक्ष्मप्रयत्नस्य च तत्र सत्त्वात्।
त्रयो वेदाः, चत्वारः कषायाः, चत्वारि ज्ञानानि, परिहारशुद्धिसंयमेन विना द्वौ संयमौ त्रीणि दर्शनानि, द्रव्येण षड्लेश्याः, भावेन शुक्ललेश्या, भव्यसिद्धिकाः, द्वे सम्यक्त्वे संज्ञिनः, आहारिणः, साकारोपयुक्ता भवन्त्यनाकारोपयुक्ता वा।

नं. १६ अपूर्वकरण-आलाप

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अनिवृत्तिकरणगुणस्थानवर्तिनां प्रथमभागे भण्यमानेऽस्त्येकं गुणस्थानं एको जीवसमासः, षट् पर्याप्तयः, दश प्राणाः, द्वे संज्ञे, अपूर्वकरणस्य चरमसमये भयस्य उदीरणोदयो नष्टस्तेन भयसंज्ञा नास्ति।
मनुष्यगतिः, पंचेन्द्रियजातिः, त्रसकायो, नव योगाः, त्रयो वेदाः, चत्वारः कषायाः, चत्वारि ज्ञानानि, द्वौ संयमौ, त्रीणि दर्शनानि, द्रव्येण षड्लेश्याः, भावेन शुक्ललेश्या, भव्यसिद्धिकाः, द्वे सम्यक्त्वे, संज्ञिनः, आहारिणः, साकारोपयुक्ताः, भवन्त्यनाकारोपयुक्ता वा।

नं. १७ अनिवृत्तिकरण-प्रथमभाग-आलाप

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द्वितीयस्थानस्थित-अनिवृत्तिकरणगुणस्थानवर्तिनां भण्यमानेऽस्त्येकं गुणस्थानं, एको जीवसमासः, षट् पर्याप्तयः, दश प्राणाः, परिग्रहसंज्ञा, अन्तरकरणं कृत्वा पुनः अन्तर्मुहूर्तं गत्वा वेदोदयो नष्टस्तेन मैथुन, संज्ञा नास्ति। मनुष्यगतिः, पंचेन्द्रियजातिः, त्रसकायः, नव योगाः, अपगतवेदः, चत्वारः कषायाः, चत्वारि ज्ञानानि, द्वौ संयमौ, त्रीणि दर्शनानि, द्रव्येण षड् लेश्याः, भावेन शुक्ललेश्या, भव्यसिद्धिकाः, द्वे सम्यक्त्वे, संज्ञिनः, आहारिणः, साकारोपयुक्ता भवन्त्यनाकारोपयुक्ता वा।

नं. १८ अनिवृत्तिकरण-द्वितीयभाग-आलाप

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संयतासंयत जीवों के ओघालाप

संयतासंयत जीवों के ओघालाप कहने पर-एक पाँचवां गुणस्थान, एक संज्ञीपर्याप्त जीवसमास, छहों पर्याप्तियाँ, दशों प्राण, चारोें संज्ञाएं, तिर्यंच और मनुष्य ये दो गतियाँ, पञ्चेन्द्रिय जाति, त्रसकाय, नौ योग (चार मनोयोग, चार वचनयोग और औदारिककाययोग), तीनों वेद चारों कषाएं, आदि के तीन ज्ञान, संयमासंयम, आदि के तीन दर्शन, द्रव्य की अपेक्षा छहों लेश्याएं एवं भाव की अपेक्षा तेज (पीत), पद्म और शुक्ल ये तीन शुभ लेश्याएं होती हैं।

कुछ आचार्य ऐसा मानते हैं कि शरीर को बनाने हेतु आए हुए परमाणुओं के वर्ण को ग्रहण करके संयतासंयत जीवों के भावलेश्या बनती है, किन्तु उनका यह कथन घटित नहीं होता है। क्यों घटित नहीं होता है?

क्योंकि वैसा मानने पर द्रव्य और भावलेश्या में कोई भेद ही नहीं रह जाता है और ‘‘जो लिम्पन करती है उसे लेश्या कहते हैं’’ इस आगमवचन का व्याघात भी होता है। इसलिए ‘‘कर्मलेप का हेतु होने से योग और कषाय से अनुरञ्जित प्रवृत्ति ही भावलेश्या है’’ ऐसा अर्थ ग्रहण करना चाहिए। लेश्याओं के इस कथन के पश्चात् संयतासंयत जीवों में भव्यमार्गणानुसार भव्यसिद्धिक होते हैं, क्योंकि अभव्यजीवों के देशसंयतपना होता ही नहीं है। पुनश्च उन संयतासंयतों के तीनोें सम्यक्त्व होते हैं, वे संज्ञी होते हैं, आहारक होते हैं और साकार तथा अनाकार दोनों उपयोग वाले होते हैं।

भावार्थ-

इस संयतासंयत नामक पंचमगणुस्थान में तिर्यंचगति को सम्मिलित करने के विषय में यह विशेष ध्यान देने योग्य बात है कि पशु-पक्षी आदि पञ्चेन्द्रिय तिर्यंच भी मनुष्यों के समान अणुव्रतों को ग्रहण कर देशसंयमी बन सकते हैं, जबकि स्वर्ग जैसी उत्तमगति में उत्पन्न देवताओं के पंचम गुणस्थान नहीं हो सकता है। चूँकि देवताओं में संयम ग्रहण की योग्यता का सर्वथा अभाव रहता है।

पुराणग्रन्थों के अनुसार हाथी, सिंह आदि पशु एवं गृद्ध पक्षी आदि अनेक तिर्यञ्चों ने मुनियों के मुखारविन्द से उपदेश ग्रहण करके अणुव्रत धारण किये और उसके प्रभाव से देवगति को प्राप्त किया है।

प्रमत्तसंयत जीवों के ओघालाप

प्रमत्तसंयत जीवों के ओघालाप कहने पर-उनमें एक प्रमत्तसंयत गुणस्थान होता है तथा संज्ञीपर्याप्त और संज्ञी अपर्याप्त ये दो जीवसमास, छहों पर्याप्तियाँ, छहों अपर्याप्तियाँ, दशों प्राण, और सात प्राण (पर्याप्त-अपर्याप्त की अपेक्षा) होते हैं। उनके चारों संज्ञाएं, एक मनुष्यगति, एक पञ्चेन्द्रिय जाति, एक त्रसकाय, ग्यारह योग (मन के ४, वचन के ४, औदारिक और आहारकद्विक), तीनों वेद, चारों कषाय, केवलज्ञान के अतिरिक्त चारों ज्ञान, तीन संयम (सामायिक, छेदोपस्थापना और परिहारविशुद्धि), तीन दर्शन (चक्षु, अचक्षु और अवधि), द्रव्य से छहों लेश्याएं, भाव से पीत, पद्म और शुक्ललेश्या भव्यसिद्धिक, तीनों सम्यक्त्व (उपशम, क्षायिक, क्षायोपशमिक), संज्ञिक, आहारक, साकारोपयोगी और अनाकारोपयोगी होते हैं।

भावार्थ-

छठे प्रमत्तसंयत नामक गुणस्थान में जो अपर्याप्त अवस्था बतलाई है वह आहारक शरीर की अपेक्षा है। अर्थात् आहारकशरीर की प्रगटता इसी गुणस्थान में होती है और जब तक उस आहारकशरीर सम्बन्धी पर्याप्ति पूर्ण नहीं होती हैं तब तक वह निर्वृत्त्यपर्याप्त अवस्था ही अपर्याप्त संज्ञा से कही गई है। आहारकशरीर के अतिरिक्त मात्र औदारिक शरीर वाले प्रमत्तसंयतों में अपर्याप्त नहीं होते हैं, उनमें केवल पर्याप्तक ही होते हैं।

अप्रमत्तसंयत जीवों के ओघालाप

अप्रमत्तसंयत जीवों के ओघालाप कहने पर-उनके एक सातवां गुणस्थान, एक संज्ञीपर्याप्त जीवसमास, छहों पर्याप्तियाँ, दशों प्राण, भय, मैथुन और परिग्रह ये तीन संज्ञाएं हैं क्योंकि असातावेदनीय कर्म की उदीरणा का अभाव हो जाने से अप्रमत्तसंयत जीवों के आहारसंज्ञा नहीं होती है किन्तु भय आदि संज्ञाओं के कारणभूत कर्मोें का उदय संभव है इसलिए उपचार से भय, मैथुन और परिग्रह संज्ञाएं हैं।

संज्ञा के पश्चात् उन अप्रमत्तसंयतों के एक मनुष्यगति, पञ्चेन्द्रिय जाति, त्रसकाय, चार मनोयोग, चार वचनयोग और औदारिककाययोग ये नौ योग, तीनों वेद, चारों कषाएं, केवलज्ञान के बिना चार ज्ञान, तीन संयम (सामायिक, छेदोपस्थापना, परिहारविशुद्धि), केवलदर्शन के बिना तीन दर्शन, द्रव्य से छहों लेश्याएं और भाव से पीत, पद्म और शुक्ल ये तीन शुभ लेश्याएं, भव्यसिद्धिक, तीन सम्यक्त्व (औपशमिक, क्षायिक, क्षायोपशमिक), संज्ञिक, आहारक, साकारोपयोगी और अनाकारोपयोगी होते हैं।

भावार्थ-

पंचमगुणस्थान के पश्चात् इन गुणस्थानवर्ती जीवों में जो तीनों वेदों का अस्तित्व बतलाया है उसका अभिप्राय भाववेद से है। अर्थात् द्रव्य से तो इनके एक पुरुषवेद ही होता है और भाव से स्त्री तथा नपुंसक ये दोनों वेद नवमें गुणस्थान तक पाये जाते हैं। यह कथन ‘‘सत्प्ररूपणा’’ ग्रन्थ के सूत्रों में विस्तार से आया है अतः इस आलाप अधिकार में भी विद्वानों को सर्वत्र ऐसा ही अर्थ ग्रहण करना चाहिए।

अपूर्वकरण गुणस्थानवर्ती जीवों के ओघालाप

अपूर्वकरण गुणस्थानवर्ती जीवों के ओघालाप कहने पर-एक आठवां गुणस्थान, एक संज्ञी पर्याप्त जीवसमास, छहों पर्याप्तियाँ, दशों प्राण, आहारसंज्ञा के बिना शेष तीन संज्ञाएं, एक मनुष्यगति, एक पञ्चेन्द्रियजाति, एक त्रसकाय और नौ योग (चार मनोयोग, चार वचनयोग, एक औदारिककाययोग) होते हैं।

यहाँ कोई शंका करता है कि-

ध्यान में लीन अपूर्वकरणगुणस्थानवर्ती जीवों के वचनबल का अस्तित्व भले ही मान लिया जावे क्योंकि भाषापर्याप्ति नामक पुद्गलस्कन्धों से उत्पन्न हुई शक्ति का उनके सद्भाव पाया जाता है, लेकिन उनके वचनयोग या काययोग का सद्भाव तो नहीं मानना चाहिए ?

आचार्यदेव इसका समाधान करते हैं कि-

ऐसा नहीं कहना चाहिए क्योंकि ध्यान अवस्था में अन्तर्जल्प के लिए वचनरूप वचनयोग और कायगत सूक्ष्म प्रयत्नरूप काययोग का सत्त्व अपूर्वकरणगुणस्थानवर्ती जीवों के पाया ही जाता है इसलिए वहाँ वचनयोग और काययोग भी संभव है।

योगों के पश्चात् उन अपूर्वकरणगुणस्थानवर्ती जीवों का कथन करने पर उनमें तीनों वेद, चारों कषायें, चार ज्ञान (केवलज्ञान के बिना), सामायिक और छेदोपस्थापना ये दो संयम (परिहारविशुद्धि संयम नहीं है), केवलदर्शन के बिना तीन दर्शन, द्रव्य से छहों लेश्याएं और भाव से एक शुक्ललेश्या, भव्यसिद्धिक, दो सम्यक्त्व (औपशमिक और क्षायिक), संज्ञिक, आहारक, साकारोपयोगी और अनाकारोपयोगी होते हैं।

अनिवृत्तिकरण गुणस्थानवर्ती के प्रथम (सवेद) भागवर्ती जीवों के ओघालाप

अनिवृत्तिकरण गुणस्थानवर्ती के प्रथम (सवेद) भागवर्ती जीवों के ओघालाप कहने पर-उनमें एक नवमाँ, गुणस्थान होता है, उनके एक संज्ञीपर्याप्त जीवसमास है, छहों पर्याप्तियाँ हैं, दशों प्राण हैं, मैथुन और परिग्रह ये दो संज्ञाएं हैंं। दो संज्ञाएं इसलिए मानी गई हैं कि अपूर्वकरण गुणस्थान के अन्तिम समय में भय की उदीरणा तथा उदय समाप्त हो जाता है इसलिए अनिवृत्तिकरण में भय संज्ञा नहीं पाई जाती है।

उसके आगे नवमें गुणस्थानवर्ती जीवों के एक मनुष्यगति, एक पञ्चेन्द्रियजाति, त्रसकाय, नौ योग, तीनों वेद, चारो कषाएं, केवलज्ञान के बिना चार ज्ञान, सामायिक और छेदोपस्थापना ये दो संयम, तीन दर्शन, द्रव्य से छहों लेश्याएं और भाव से एक शुक्ललेश्या, भव्यसिद्धिक, औपशमिक और क्षायिक ये दो सम्यक्त्व, संज्ञिक, आहारक, साकार और अनाकार उपयोगी होते हैं।

भावार्थ-

नवमें गुणस्थान के मूल में दो भेद होते हैं-

१. सवेदभाग


२. अवेदभाग।


इनमें से अवेद भाग को चार भागों में विभक्त किया है, जिनके एक-एक भाग में संज्वलन की एक-एक कषाय की उदय व्युच्छित्ति होती है पुनः अंतिम अवेद भाग तक संज्वलन लोभ कषाय की सूक्ष्मकृष्टि विद्यमान रहती है जिसकी सत्ता दशवें गुणस्थान तक पाई जाती है। यहाँ नवमें गुणस्थान के पाँचों भागों के अलग-अलग ओघालाप कह कर विषय को बहुत ही सरल कर दिया गया है। इसीलिए पाँचों के कोष्ठक भी अलग-अलग दिये गये हैं।

अनिवृत्तिकरण गुणस्थान के द्वितीय भागवर्ती जीवों के ओघालाप

अनिवृत्तिकरण गुणस्थान के द्वितीय भागवर्ती जीवों के ओघालाप कहने पर-उनके एक नौवां गुणस्थान, एक संज्ञी पर्याप्त, जीवसमास, छहों पर्याप्तियाँ, दशों प्राण एवं एक परिग्रहसंज्ञा, होती है। इस गुणस्थान में एक परिग्रह संज्ञा के होने का कारण यह है कि अन्तरकरण करने के अनन्तर अन्तर्मुहूर्त जाकर वेद का उदय नष्ट हो जाता है इसलिए द्वितीय भागवर्ती जीव के मैथुन संज्ञा नहीं रहती है। संंज्ञा आलाप के पश्चात् उनके एक मनुष्यगति पञ्चेन्द्रियजाति, त्रसकाय, पूर्वोक्त नौ योग, अपगतवेद, चारों कषाएं, चार ज्ञान, सामायिक और छेदोपस्थापना ये दो संयम, तीन दर्शन, द्रव्य से छहों लेश्याएं और भाव से शुक्ललेश्या, भव्यसिद्धिक, औपशमिक और क्षायिक ये दो सम्यक्त्व, संज्ञी, आहारी, साकारोपयोगी और अनाकारोपयोगी होते हैं।


तृतीयस्थानस्थित-अनिवृत्तिकरणमुनीनां भण्यमानेऽस्त्येकं गुणस्थानं, एको जीवसमासः, षट् पर्याप्तयः, दश प्राणाः, परिग्रहसंज्ञा, मनुष्यगतिः, पंचेन्द्रियजातिः, त्रसकायः, नव योगाः अपगतवेदः, त्रयः कषायाः, वेदेषु क्षीणेषु अन्तर्मुहूर्तं गत्वा क्रोधोदयो नश्यति तेन क्रोधकषायो नास्ति। चत्वारि ज्ञानानि, द्वौ संयमौ, त्रीणि दर्शनानि, द्रव्येण षड् लेश्याः, भावेन शुक्ललेश्या, भव्यसिद्धिकाः, द्वे सम्यक्त्वे, संज्ञिनः, आहारिणः, साकारोपयुक्ता भवन्त्यनाकारोपयुक्ता वा।

१९ अनिवृत्तिकरण-तृतीयभाग-आलाप

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चतुःस्थानस्थित-अनिवृत्तिकरणानां कथ्यमानेऽस्त्येकं गुणस्थानं, एको जीवसमासः, षट् पर्याप्तयः, दश प्राणाः, परिग्रहसंज्ञा, मनुष्यगतिः, पंचेन्द्रियजातिः, त्रसकायः, नव योगाः, अपगतवेदः, द्वौ कषायौ, क्रोधोदये विनष्टे पुनोऽन्तर्मुहूर्तं गत्वा मानोदयोऽपि नश्यति तेन मानकषायोऽत्र नास्ति। चत्वारि ज्ञानानि, द्वौ संयमौ, त्रीणि दर्शनानि, द्रव्येण षड्लेश्याः, भावेन शुक्ललेश्या, भव्यसिद्धिकाः, द्वे सम्यक्त्वे, संज्ञिनः, आहारिणः, साकारोपयुक्ता भवन्त्यनाकारोपयुक्ता वा।
२० अनिवृत्तिकरण-चतुर्थभाग-आलाप

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पंचमस्थानस्थित-अनिवृत्तिनां भण्यमानेऽस्त्येकं गुणस्थानं, एको जीवसमासः, षट् पर्याप्तयः, दश प्राणाः परिग्रहसंज्ञा, मनुष्यगतिः, पञ्चेन्द्रियजातिः, त्रसकायः, नव योगाः, अपगतवेदः, लोभकषायः, मानोदये विनष्टे पुनः अन्तर्मुहूर्तं गत्वा मायोदयोऽपि नश्यति तेन मायाकषायस्तत्र नास्ति। चत्वारि ज्ञानानि, द्वौ संयमौ, त्रीणि दर्शनानि, द्रव्येण षड्लेश्याः, भावेन शुक्ललेश्या, द्वे सम्यक्त्वे, संज्ञिनः, आहारिणः, साकारोपयुक्ता, भवन्त्यनाकारोपयुक्ता वा।
२१ अनिवृत्तिकरण-पंचमभाग-आलाप

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सूक्ष्मसाम्परायिकानामोघालापे भण्यमानेऽस्त्येकं गुणस्थानं, एको जीवसमासः, षट् पर्याप्तयः, दश प्राणाः, सूक्ष्मपरिग्रहसंज्ञा, मनुष्यगतिः, पञ्चेन्द्रियजातिः, त्रसकायो, नव योगाः, अपगतवेदः, सूक्ष्मलोभकषायः, चत्वारि ज्ञानानि, सूक्ष्मसाम्परायशुद्धिसंयमः, त्रीणि दर्शनानि, द्रव्येण षड्लेश्याः, भावेन शुक्ललेश्या, भव्यसिद्धिकाः, द्वे सम्यक्त्वे- द्वितीयोपशमसम्यक्त्वं क्षायिकं च। संज्ञिनः, आहारिणः, साकारोपयोगिनो भवन्त्य-नाकारोपयोगिनो वा।
२२ सूक्ष्मसाम्पराय-आलाप

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रेवाणइए तीरे पच्छिमभायम्मि सिद्धवरकूडे।
दो चक्की दहकप्पे आहुट्ठयकोडिणिव्वुदे वंदे।।१।।
मध्यप्रदेशस्थित-सिद्धवरकूटसिद्धक्षेत्रे वीराब्दे द्वाविंशत्यधिक पंचविंशतिशततमे चैत्र शुक्लासप्तम्यां अस्मत्संघसान्निध्येऽत्र पुनः त्रयोदशद्वीपरचनाया मन्दिरस्य शिलान्यासः कारितो महामहोत्सवेन भव्य भाक्तितजनैः। एषु त्रयोदशद्वीपेषु विराजयिष्यमाणाः सर्वा जिनप्रतिमा अस्माकं सर्वेषां श्रावकश्राविकाणां च मंगलं कुर्वन्तु।
मध्यलोकस्थितान् सर्वान्, अष्टापञ्चाशदुत्तराः।
चतुःशताकृत्रिमांस्तान्, जिनगेहन् नमाम्यहम् ।।१।।
उपशान्तकषायाणामोघालापे भण्यमानेऽस्त्येकं गुणस्थानं, एको जीवसमासः, षट् पर्याप्तयः, दश प्राणाः, उपशान्तसंज्ञा, मनुष्यगतिः, पञ्चेन्द्रियजातिः, त्रसकायो, नव योगाः, अपगतवेदः, उपशान्तकषायः, चत्वारि ज्ञानानि, यथाख्यातशुद्धिसंयमः, त्रीणि दर्शनानि, द्रव्येण षड्लेश्याः, भावेन शुक्ललेश्या।
केन कारणेन शुक्ललेश्या किंचात्र कषायोदयो नास्तीति चेत् ?
अस्मिन् गुणस्थाने कर्म-नोकर्मलेपनिमित्तयोगोऽस्ति, अतएव शुक्ललेश्या कथ्यते।
भव्यसिद्धिकाः, द्वे सम्यक्त्वे, संज्ञिनः, आहारिणः, साकारोपयुक्ता भवन्त्यनाकारोपयुक्ता वा।
२३ उपशान्तकषाय-आलाप

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क्षीणकषायाणां कथ्यमानेऽस्त्येकं गुणस्थानं, एको जीवसमासः, षट्पर्याप्तयः, दश प्राणाः, क्षीणसंज्ञा, मनुष्यगतिः, पञ्चेन्द्रियजातिः, त्रसकायो, नव योगाः, अपगतवेदः, क्षीणकषायः, चत्वारि ज्ञानानि, यथाख्यातशुद्धिसंयमः, त्रीणि दर्शनानि, द्रव्येण षड्लेश्याः, भावेन शुक्ललेश्या, भव्यसिद्धिकाः, क्षायिकसम्यक्त्वं, संज्ञिनः, आहारिणः, साकारोपयुक्ताः भवन्त्यनाकारोपयुक्ता वा।
२४ क्षीणकषाय-आलाप

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अनिवृत्तिकरण गुणस्थान के तृतीयभागवर्ती जीवों के ओघालाप

अनिवृत्तिकरण गुणस्थान के तृतीयभागवर्ती जीवों के ओघालाप कहने पर-उनके एक नवमां गुणस्थान होता है तथा एक संज्ञी पर्याप्त जीवसमास, छहों पर्याप्तियाँ, दशों प्राण, परिग्रह संज्ञा, मनुष्यगति, पञ्चेन्द्रिय जाति, त्रसकाय, पूर्वोक्त नौ योग, क्रोध कषाय के बिना तीन कषाएं होती हैं। यहाँ तीन कषायों के होने का कारण यह है कि तीनों वेदों के क्षय हो जाने पर पुनः एक अन्तर्मुहूर्त जाकर क्रोध कषाय का उदय नष्ट हो जाता है इसलिए इस भाग में क्रोधकषाय नहीं है। आगे केवलज्ञान के बिना चार ज्ञान, सामायिक ओैर छेदोपस्थापना ये दो संयम, केवलदर्शन के बिना तीन दर्शन, द्रव्य से छहों लेश्याएं और भाव से शुक्ललेश्या, भव्यसिद्धिक, औपशमिक और क्षायिक ये दो सम्यक्त्व, संज्ञिक, आहारक, साकारोपयोगी और अनाकारोपयोगी होते हैं।

अनिवृत्तिकरण गुणस्थान के चतुर्थभागवर्ती जीवों के ओघालाप

अनिवृत्तिकरण गुणस्थान के चतुर्थभागवर्ती जीवों के ओघालाप कहने पर-एक नवमां गुणस्थान, एक संज्ञीपर्याप्त जीवसमास, छहों पर्याप्तियाँ, दशों प्राण, एक परिग्रह संज्ञा, मनुष्यगति, पञ्चेन्द्रिय जाति, त्रसकाय, पूर्वोक्त नौ योग, अपगतवेद, माया और लोभ ये दो कषाएं होती हैं। दो कषायों के होने का कारण यह है कि क्रोधकषाय का उदय नष्ट होने पर पुनः एक अन्तर्मुहूर्त आगे जाकर मानकषाय का उदय भी नष्ट हो जाता है इसलिए मानकषाय इस भागवर्ती जीवों के नहीं है। कषाय के पश्चात् उन अनिवृत्तिकरण गुणस्थानवर्ती जीवों के केवलज्ञान के बिना चार ज्ञान होते हैं, सामायिक और छेदोपस्थापना ये दो संयम होते हैं, केवलदर्शन के बिना तीन दर्शन होते हैं, द्रव्य से छहों लेश्याएं तथा भाव से एक शुक्ललेश्या होती है। वे भव्यसिद्धिक होते हैं, उनके औपशमिक और क्षायिक ये दो सम्यग्दर्शन होेते हैं, वे संज्ञी होते हैं, आहारक होते हैं तथा साकारोपयोगी और अनाकारोपयोगी होते हैं।

अनिवृत्तिकरण गुणस्थान के पंचमभागवर्ती जीवों के भागवर्ती ओघालाप

अनिवृत्तिकरण गुणस्थान के पंचमभागवर्ती जीवों के भागवर्ती ओघालाप कहने पर-उनके एक नवमां गुणस्थान, एक संज्ञीपर्याप्त जीवसमास, छहों पर्याप्तियाँ, दशों प्राण, परिग्रह संज्ञा, मनुष्यगति, पञ्चेन्द्रिय जाति, त्रसकाय, पूर्वोक्त नौ योग, अपगतवेद, लोभकषाय है। यहाँ लोभकषाय होने का कारण यह है कि मानकषाय का उदय नष्ट हो जाने पर पुनः एक अन्तर्मुहूर्त आगे जाकर माया कषाय का उदय भी नष्ट हो जाता है इसलिए इस भाग में मायाकषाय नहीं पाई जाती है। आगे केवलज्ञान के बिना चार ज्ञान, सामायिक और छेदोपस्थापना ये दो संयम, केवलदर्शन के बिना तीन दर्शन, द्रव्य से छहों लेश्याएं और भाव से एक शुक्ल लेश्या, भव्यसिद्धिक, औपशमिक और क्षायिक ये दो सम्यक्त्व, संज्ञिक, आहारक, साकारोपयोगी और अनाकारोपयोगी होते हैं।

सूक्ष्मसाम्पराय गुणस्थानवर्ती जीवों के ओघालाप

सूक्ष्मसाम्पराय गुणस्थानवर्ती जीवों के ओघालाप कहने पर-उनके एक दशवां गुणस्थान होता है, एक संज्ञी पर्याप्तक जीवसमास होता है, छहों पर्याप्तियाँ होती हैं, दशों प्राण होते हैं, एक सूक्ष्मपरिग्रहसंज्ञा होती है, मनुष्यगति है, पंचेन्द्रिय जाति है तथा उनकी एक त्रसकाय है, चार मनोयोग होते हैं, चार वचन योग और एक काययोग ये नौ योग होते हैंं। वे अपगतवेदी होते हैं, उनमें एक सूक्ष्मलोभ कषाय है, केवलज्ञान के बिना चार ज्ञान हैं, एक सूक्ष्मसाम्परायविशुद्धि संयम है, केवलदर्शन के बिना तीन दर्शन हैं, द्रव्य से छहोें लेश्याएं हैं और भाव से एक शुक्ललेश्या है, वे भव्यसिद्धिक हैं, उनमें औपशमिक और क्षायिक ये दो सम्यक्त्व होते हैं, वे संज्ञी हैं, आहारक हैं, साकारोपयोगी एवं अनाकारोपयोगी होते हैं।

उपशान्तकषाय गुणस्थानवर्ती जीवों के ओघालाप

उपशान्तकषाय गुणस्थानवर्ती जीवों के ओघालाप कहने पर-उनमें एक ग्यारहवां गुणस्थान है, एक संज्ञीपर्याप्त जीवसमास है, छहों पर्याप्तियाँ हैं, दशों प्राण हैं, उपशान्त संज्ञा है अर्थात् इस ग्यारहवें गुणस्थान में समस्त संज्ञाएं उपशांत रहती हैं। क्योंकि यहाँ पर मोहनीय कर्म का पूर्ण उपशम रहता है इसलिए उसके निमित्त से होने वाली संज्ञाएं भी उपशान्त ही रहती हैं। आगे मनुष्यगति, पञ्चेन्द्रियजाति त्रसकाय, नौ योग (चारों मनोयोग, चारों वचनयोग और एक औदारिक काययोग) अपगतवेद, उपशान्तकषाय, केवलज्ञान के बिना चार ज्ञान, यथाख्यातशुद्धिसंयम, केवलदर्शन के बिना तीन दर्शन, द्रव्य से छहों लेश्याएं और भाव से एक शुक्ल लेश्या होती है।

शंका-जब इस गुणस्थान में कषायों का उदय नहीं रहता है तो फिर यहाँ शुक्ललेश्या किस कारण से कही गई है ?

समाधान-इस गुणस्थान में कर्म और नोकर्म के लेप के निमित्तभूत योग का सद्भाव पाया जाता है इसलिए शुक्ललेश्या कही गई है।

पुनः इस गुणस्थानवर्ती जीव भव्यसिद्धिक होते हैं, उनमें औपशमिक और क्षायिक ये दो सम्यक्त्व होते हैं, वे संज्ञी हैं, आहारक हैं, साकारोपयोगी तथा अनाकारोपयोगी होते हैं।

क्षीणकषायगुणस्थानवर्ती जीवों के ओघालाप

क्षीणकषायगुणस्थानवर्ती जीवों के ओघालाप कहने पर-एक बारहवां गुणस्थान, एक संज्ञीपर्याप्त जीवसमास, छहों पर्याप्तियाँ, दशों प्राण, क्षीणसंज्ञा होती है। मनुष्यगति है, पञ्चेन्द्रिय जाति है, त्रसकाय, नौ योग, अपगतवेद, क्षीणकषाय, चार ज्ञान, यथाख्यात शुद्धिसंयम, तीन दर्शन, द्रव्य से छहों लेश्या और भाव से एक शुक्ललेश्या है, वे भव्यसिद्धिक, क्षायिकसम्यक्त्वी, संज्ञी, आहारक, साकारोपयोगी और अनाकारोपयोगी होते हैं। यहाँ क्षीणसंज्ञा होने का यह कारण है कि कषायों का यहाँ पर सर्वथा क्षय हो जाता है इसलिए संज्ञाओं का क्षीण हो जाना स्वाभाविक ही है।

मध्यप्रदेशस्थित सनावदनगरे णमोकारधाम तीर्थस्य शिलान्यास:

मध्यप्रदेशस्थित सनावदनगरे द्वाविंशत्यधिकपञ्चविंशतिशततमे चैत्रशुक्लाद्वादश्यां तिथौ अस्मत्संघसानिध्ये क्षुल्लकमोतीसागरजन्मभूमिस्थले ‘णमोकारधाम’ तीर्थस्य शिलान्यासःकारितो भव्यश्रावकजनैः अस्मिन् तीर्थे स्थापयिष्यमाणाः पञ्चपरमेष्ठिमूर्तयो णमोकारमहामन्त्राक्षराणि चास्माकं सर्वभाक्तितानां च सर्वसौख्यं क्षेमं सुभिक्षं च वितरन्तु इति कामयामहे[४]


अर्हन्तो मंगलं कुर्युः, सिद्धाः कुर्युश्च मंगलम्।
आचार्याः पाठकाश्चापि, साधवो मम मंगलम् ।।१।।

सयोगिकेवलिनां भण्यमानेऽस्त्येकं गुणस्थानं, द्वौ जीवसमासौ, षट् पर्याप्तयः, षडपर्याप्तयः।
केवली भगवान् कपाट-प्रतर-लोकपूरणगतः पर्याप्तोऽपर्याप्तो वा ?
न तावत्पर्याप्तः, ‘औदारिकमिस्सकायजोगो अपज्जत्ताणं’ इत्येतेन सूत्रेण तस्य अपर्याप्तसिद्धेः।
सयोगिनं-मुक्त्वान्ये औदारिकमिश्रकाययोगिनः अपर्याप्ताः ‘सम्मामिच्छाइट्ठि-संजदासंजद-संजदट्ठाणे णियमा पज्जत्ता’ इति सूत्रनिर्देशात् ?
नैतद् वक्तव्यं, आहारकमिश्रकाययोगप्रमत्तसंयतानां अपि पर्याप्तत्वप्रसंगात्। न चैवं,‘आहारमिस्सकायजोगो अपज्जत्ताणं’ इति सूत्रेण तस्यापर्याप्तभावसिद्धेः?
‘आहारमिस्सकायजोगो अपज्जत्ताणं’ अस्य सूत्रस्यानवकाशत्वात्। एतेन सूत्रेण ‘संजदट्ठाणे णियमा पज्जत्ता’ एतत्सूत्रं बाधिष्यते ‘‘औदारिकमिस्सकायजोगो अपज्जत्ताणं’’ इति एतेन न बाध्यते सावकाशत्वेन बलाभावात् ?
न, ‘संजदट्ठाणे णियमा पज्जत्ता ‘इत्येतस्यापि सूत्रस्य सावकाशत्वदर्शनात्।
द्वयोरपि सूत्रयोः सावकाशयोः सयोगिस्थानं युगपत् प्राप्तयोः ‘संजदट्ठाणे णियमा पज्जत्ता’ इति एतेन सूत्रेण ‘ओरालियमिस्सकायजोगो अपज्जत्ताणं’ इति एतत्सूत्रं बाध्यते परत्वात् ?
नैतद् वक्तव्यं, परशब्दः इष्टवाचक इति गृह्यमाणे पूर्वेण बाध्यते इत्यनैकान्तिकत्वात्।
नियमशब्दः सप्रयोजनो निष्प्रयोजनो वा ?
अनयोद्र्वयोः पक्षयोर्न द्वितीयपक्षः संभवति, श्रीपुष्पदन्तवचनविनिर्गतस्य निष्फलत्वविरोधात्। न नैतस्य सूत्रस्य नित्यत्वप्रकाशनफलं, नियमशब्दव्यतिरिक्तसूत्राणामनित्यत्वप्रसंगात्। न चैवं, ‘ओरालियकायजोगो पज्जत्ताणं’ इति सूत्रे नियमाभावेनापर्याप्तेषु अपि औदारिककाययोगस्यास्तित्वप्रसंगात्। ततो नियमशब्दो ज्ञापकः। अन्यथा अनर्थकत्वप्रसंगात्।
किमतेन ज्ञाप्यते ?
‘सम्मामिच्छाइट्ठि-संजदासंजद-संजदट्ठाणे णियमा पज्जत्ता’ इत्येतत्सूत्रमनित्यमिति तेनोत्तरशरीरमुत्थापितसम्य-ग्मिथ्यादृष्टि-संयतासंयत-संयतानां कपाट-प्रतर-लोकपूरणगतसयोगिनां च सिद्धमपर्याप्तम्।
प्रारब्धार्धशरीरी अपर्याप्तो नाम। न च सयोगकेवलिनि शरीरारंभोऽस्ति, ततो न तस्यापर्याप्तमिति चेत् ?
न, तस्य केवलिनो भगवतः षट्पर्याप्तिशक्तिवर्जितस्यापर्याप्तव्यपदेशात् । षड्भििरीन्द्रियैर्विना चत्वारः प्राणा द्वौ वा। द्रव्येन्द्रियाणां निष्पत्तिं प्रतीत्य केऽपि दश प्राणान् भणन्ति। तन्न घटते। कुतः? भावेन्द्रियाभावात्। भावेन्द्रियं नाम पंंचानामिन्द्रियाणां क्षयोपशमः। न सः क्षीणावरणेऽस्ति। अथ द्रव्येन्द्रियस्य यदि ग्रहणं क्रियते तर्हि संज्ञिनामपर्याप्तकाले सप्तप्राणान् पिंडीकृत्य द्वौ चैव प्राणौ स्तः, पञ्चानां द्रव्येन्द्रियाणामभावात्। तस्मात् सयोगिकेवलिनः चत्वारः प्राणाः द्वौ प्राणौ वा।
क्षीणसंज्ञा, मनुष्यगतिः, पञ्चेन्द्रियजातिः, त्रसकायः, सप्त योगाः-सत्यमनोयोगः, असत्यमृषामनोयोगः, सत्यवचनयोगः, असत्यमृषावचनयोगः, औदारिककाययोगः, कपाटगतस्य औदारिकमिश्रकाययोगः, प्रतर-लोकपूरणयोः कार्मणकाययोगः एवं सयोगिकेवलिभगवतः सप्त योगाः भवन्ति। अपगतवेदः, अकषायः, केवलज्ञानं, यथाख्यातशुद्धिसंयमः, केवलदर्शनं, द्रव्येण षड् लेश्याः, भावेन शुक्ललेश्या, भव्यसिद्धिकाः, क्षायिकसम्यक्त्वं, नैव संज्ञिनो नैवासंज्ञिनः, आहारिणोऽनाहारिणः, साकारानाकाराभ्यां युगपदुपयुक्ता भवन्ति।
२५ सयोगिकेवली के आलाप

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वैशाखासितद्वितये, दीक्षार्यिकातिथेर्दिनं, एकचत्वारिंशत्तमं भूयादाजन्म मंगलम्।।१।।
नमः श्रीपार्श्वनाथाय कमठासुर मर्दिने। यस्य भक्तिप्रसादेन लब्धं संयतिकाव्रतम्।।२।।
कं गुणस्थानं, एको जीवसमासः, षट् पर्याप्तयः-पूर्वोक्तपर्याप्तयस्तथैव स्थिताः सन्ति इति षट्पर्याप्तयो भणिताः। न पुनः तत्र पर्याप्तिजनितकार्यमस्ति, आयुःप्राण एक एव।
केन कारणेन ?
न तावद् ज्ञानावरणक्षयोपशमलक्षण-पञ्चेन्द्रियप्राणास्तत्र सन्ति, क्षीणावरणे क्षयोपशमाभावात्। आनापान-भाषा-मनःप्राणा अपि न सन्ति, पर्याप्तिजनित-प्राणसंज्ञित-शक्त्यभावात्। न शरीरबलप्राणोऽप्यस्ति, शरीरोदय-जनित-कर्म-नोकर्मागमाभावात्। तत् एकश्चैव प्राणः। उपचारमाश्रित्य एको वा षड् वा सप्त वा प्राणाः भवन्ति। एषः प्राणः पुनः अप्रमाणः।
क्षीणसंज्ञा, मनुष्यगतिः, पञ्चेन्द्रियजातिः, त्रसकायः, अयोगः, अपगतवेदः, अकषायः, केवलज्ञानं, यथाख्यातविहारशुद्धिसंयमः, केवलदर्शनं, द्रव्येण षड्लेश्याः, भावेन अलेश्या, लेपकारणयोगकषायाभावात्। भव्यसिद्धिकाः, क्षायिकसम्यग्दृष्टयो, नैव संज्ञिनो नैवासंज्ञिनः, अनाहारिणः, साकारानाकाराभ्यां युगपदुपयुक्ता वा भवन्ति।
२६ अयोगिकेवली के आलाप

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सिद्धानामिति भण्यमानेऽस्त्येकं अतीतगुणस्थानं, अतीतजीवसमासः, अतीतपर्याप्तयः, अतीतप्राणाः, क्षीणसंज्ञा, सिद्धगतिः, अनिन्द्रियाः, अकायाः, अयोगिनः, अपगतवेदाः, क्षीणकषायाः, केवलज्ञानिनः, नैव संयता नैवासंयता नैव संयतासंयताः, केवलदर्शनिनः, द्रव्यभावाभ्यां अलेश्याः, नैव भव्यसिद्धिकाः, क्षायिकसम्यग्दृष्टयो, नैव संज्ञिनः, नैवासंज्ञिनः, अनाहारिणः, साकारानाकाराभ्यां युगपदुपयुक्ता वा भवन्ति ।
२७ सिद्धों के आलाप

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इतो विस्तरः-गुणस्थानानामालापान् पठित्वा पुनश्च गुणस्थानातीतानां सिद्धानां चालापान् अभ्यस्य सिद्धपदप्राप्त्यर्थमेव भावना संजायते तर्हि एतत्सिद्धपदं कथं लभेत ? इति जिज्ञासायां श्रीयोगीन्दुदेवस्य दोहकसूत्रं स्मर्यते-
मेल्लिवि सयल अवक्खडी जिय णिच्चिंतउ होइ।
चित्तु णिवेसहि परमपए देउ णिरंजणु जोइ[५]।।११५।।
अस्यायमर्थः-हे जीव! दृष्टश्रुतानुभूतभोगाकांक्षास्वरूपापध्यानादिसमस्तचिन्ताजालं मुक्त्वा निश्चिन्तो भूत्वा चित्तं परमात्मस्वरूपे स्थिरं कुरु, तदनन्तरं भावकर्मद्रव्यकर्मनोकर्माञ्जनरहितं देवं परमाराध्यं निजशुद्धात्मानं ध्यायेति भावार्थः।
अस्य परमात्मनो ध्यानेनैव परंपरया सिद्धपदं लप्स्यते नात्र संदेहः कर्तव्यः।
एवं चतुर्दशगुणस्थानेषु आलापे कथ्यमाने सप्तविंशतिः संदृष्टयो गताः।
‘ऊनाख्यात्सिद्धक्षेत्राद् ये, स्वर्णभद्रादिसाधवः।[६]
चत्वारो मुक्तिधामापुस्तेभ्यो नित्यं नमोऽस्तु मे।।१।।
इति श्रीमद्भगवत्पुष्पदन्तभूतबलिप्रणीत-षट्खण्डागमस्य प्रथमखण्डे श्रीपुष्पदन्ताचार्यविरचित-सत्प्ररूपणान्तगते श्रीवीरसेनाचार्यकृतविंशतिप्ररुपणाधारेण विंशतितमे शताब्दौ प्रथमाचार्यश्चारित्रचक्रवर्ती श्रीशांतिसागरस्तस्य प्रथमपट्टाधीशः श्रीवीरसागरा-चार्यस्तस्य शिष्या-गणिनीज्ञानमतीकृत-सिद्धान्तचिन्ता-मणिटीकायां गुणस्थानेषु विंशतिप्ररूपणाप्ररूपकःप्रथमो महाधिकारः समाप्तः।

सनावद-मध्यप्रदेश में णमोकारधाम का शिलान्यास

मध्यप्रदेश में बसे हुये निमाड़ प्रान्त के एक ‘‘सनावद’’ नामक नगर में वीरनिर्वाण संवत् २५२२ में चैत्र शुक्ला द्वादशी तिथि को मेरे संघ सानिध्य में मेरे शिष्य पीठाधीश क्षुल्लक मोतीसागर महाराज की जन्मभूमि में उनके गृहस्थावस्था के लघुभ्राता प्रकाश चन्द्र जैन द्वारा प्रदत्त एक सुन्दर भूखण्ड पर ‘‘णमोकार धाम’’ नाम के एक नूतन तीर्थ का शिलान्यास भव्य श्रावकों के द्वारा किया गया। इस तीर्थ में स्थापित होने वाली पञ्चपरमेष्ठी भगवन्तों की मूर्तियाँ और णमोकार महामंत्र के पैंतीसों अक्षर हम लोगों को तथा समस्त भक्तजनों के लिए सभी प्रकार के सुख, क्षेम (कल्याण) तथा सुभिक्षता प्रदान करें यही मेरी अभिलाषा है।

श्लोकार्थ-

अर्हन्त भगवान् मेरा मंगल करें, सिद्ध भगवान् मंगलकारी होवें, आचार्य और उपाध्याय परमेष्ठी तथा सर्वसाधुपरमेष्ठी मेरा एवं सभी का मंगल करें। सन् १९६७ में पूज्य गणिनी आर्यिकारत्न श्री ज्ञानमती माताजी ने अपने आर्यिका संघ सहित सनावद नगर में चातुर्मास किया था। उस समय उनकी प्रबल प्रेरणा के फलस्वरूप वहाँ के श्रेष्ठी श्री अमोलक चन्द्र जैन सर्राफ के बड़े सुपुत्र ब्र. मोतीचन्द जी ने माताजी का शिष्यत्व स्वीकार कर संघ में प्रवेश किया। पुनः अपने कर्तव्य का पूर्ण निर्वाह करते हुये हस्तिनापुर में जम्बूद्वीप रचना का निर्माण कराया, देशभर में ज्ञानज्योतिरथ का प्रवर्तन करवाया तथा दिगम्बर जैन त्रिलोक शोध संस्थान द्वारा संचालित प्रत्येक गतिविधियों को वृद्धिंगत करने के पश्चात् ८ मार्च सन् १९८७ को फाल्गुन शुक्ला नवमी के दिन क्षुल्लक दीक्षा धारण की और २ अगस्त, १९८७ को उन्हें जम्बूद्वीप धर्मपीठ के पीठाधीश पद पर अभिषिक्त किया गया। अभिनव चामुण्डराय का आदर्श प्रस्तुत करने वाले उन क्षुल्लक मोतीसागर महाराज ने पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी संघ के साथ मांगीतुुंगी सिद्ध क्षेत्र की ओर पद विहार करते हुये अपनी जन्मभूमि सनावद में प्रवेश किया और कुछ नूतन निर्माण की प्रेरणा भी प्रदान की, एतदर्थ उनके लघु भ्राता प्रकाशचंद जैन सर्राफ ने सनावद-इन्दौर मार्ग पर पहाड़ों के मध्य अपने द्वारा क्रय की गई एक भूमि को नवनिर्माण योजना हेतु दान में देने की घोषणा कर दी पुनः पूज्य माताजी द्वारा बताई गई ‘‘णमोकार धाम’’ योजना का ३१ मार्च १९९६ को सनावद एवं आसपास निमाड़ प्रांत के भक्तों द्वारा शिलान्यास किया गया। उसका निर्माण कार्य चल रहा है उसी का वर्णन उपर्युक्त टीका की पंक्तियों में टीकाकत्र्री ने किया है।

सयोगकेवली नामक तेरहवें गुणस्थानवर्ती जीवों के ओघालाप

सयोगकेवली नामक तेरहवें गुणस्थानवर्ती जीवों के ओघालाप कहने पर-उनके एक तेरहवां गुणस्थान होता है, संज्ञीपर्याप्त और संज्ञी अपर्याप्त ये दो जीवसमास होते हैं, छहों पर्याप्तियाँ और छहों अपर्याप्तियाँ होती हैं।

शंका-कपाट, प्रतर और लोकपूरण समुद्घात को प्राप्त करने वाले जो केवली भगवान् हैं वे पर्याप्त होते हैं या अपर्याप्त ?

समाधान- वे पर्याप्त तो कहे नहीं जा सकते क्योंकि ‘‘औदारिकमिश्रकाययोग अपर्याप्तक जीवों के होता है’’ इस सूत्र से उनके अपर्याप्तपना सिद्ध है इसलिए वे अपर्याप्तक ही हैं।

शंका-सयोगकेवलियोें को छोड़कर अन्य औदारिक मिश्रकाययोगीजीव अपर्याप्तक होते हैं क्योंकि ‘‘सम्यग्मिथ्यादृष्टि, संयतासंयत और संयत गुणस्थान में जीव नियम से पर्याप्तक होते हैं’’ इस सूत्र निर्देश से यही सिद्ध होता है। यहाँ शंकाकार का यह अभिप्राय है कि औदारिकमिश्रयोग वाले जीव अपर्याप्तक होते हैं यह सामान्यविधि है और सम्यग्मिथ्यादृष्टि, संयतासंयत एवं संयत जीव पर्याप्तक होते हैं यह विशेष विधि है और संयतों मेें सयोगकेवलियों का अन्तर्भाव हो ही जाता है अतएव ‘‘विशेषविधिना सामान्यविधिर्बाध्यते’’ इस नियम के अनुसार उक्त विशेष विधि से सामान्य विधि बाधित हो जाती है जिससे कपाटादि समुद्घात को प्राप्त केवली भगवान् को अपर्याप्त सिद्ध करना असंभव है ?

समाधान- ऐसा नहीं कहना चाहिए क्योंकि ऐसा कहने पर तो आहारकमिश्रकाययोग वाले प्रमत्तसंयत जीवों को भी पर्याप्तपना मानना पड़ेगा किन्तु ऐसा नहीं है क्योंकि ‘‘आहारकमिश्रकाययोग’’ अपर्याप्तकों के होता है’’ इस सूत्र से वे अपर्याप्तक ही सिद्ध होते हैं।

शंका-‘‘आहारकमिश्रकाययोग अपर्याप्तकों के ही होता है’’ यह सूत्र अनवकाश है अर्थात् इस सूत्र की प्रवृत्ति के लिए कोई दूसरा स्थल नहीं है अतः इस सूत्र से ‘‘संयतों के स्थान में जीव नियम से पर्याप्तक ही होते हैं’’ यह सूत्र बाधित हो जाता है किन्तु ‘‘औदारिक मिश्रकाययोग अपर्याप्तकों के ही होता है’’ इस सूत्र वचन से संयतों के स्थान में जीव पर्याप्तक ही होते हैं’’ यह सूत्र बाधित नही होता है क्योंकि ‘‘औदारिकमिश्रकाययोग अपर्याप्तकों के होता है’’ यह सूत्र सावकाश होने के कारण अर्थात् इस सूत्र की प्रवृत्ति के लिए सयोगियों को छोड़कर अन्य स्थल भी होने के कारण निर्बल है अतः आहारकसमुद्घात को प्राप्त जीवों के जिस प्रकार अपर्याप्तपना सिद्ध किया जा सकता है उस प्रकार समुद्घातगत केवलियों के नहीं किया जा सकता है ?

समाधान-ऐसा नही हैं क्योंकि ‘‘संयतों के स्थान में जीव नियम से पर्याप्तक होते हैं’’ यह सूत्र भी सावकाश देखा जाता है। अर्थात् सयोगी को छोड़कर अन्य स्थल में भी इस सूत्र की प्रवृत्ति देखी जाती है अतः निर्बल है और इसीलिए ‘‘औदारिकमिश्रकाययोग अपर्याप्तकों के ही होता है’’ इस सूत्र की प्रवृत्ति को नहीं रोक सकता है।

शंंका-दोनों ही सूत्रवचनों का सावकाश होते हुये भी सयोगी गुणस्थान में युगपत् प्राप्त हैं फिर भी ‘‘संयतों के स्थान में जीव नियम से पर्याप्तक होते हैं’’ इस सूत्र के द्वारा ‘‘औदारिक- मिश्रकाययोग अपर्याप्तकों के ही होता है’’ यह सूत्र बाधित हो जाता है क्योंकि यह सूत्र पर है और ‘‘परो विधिर्बाधको भवति’’ अर्थात् पर विधि बाधित होती है ?

समाधान-ऐसा नहीं कहना चाहिए क्योंकि पर शब्द इष्ट अर्थात् अभिप्रेत अर्थ का वाचक है ऐसा अर्थ ग्रहण कर लेने पर पूर्वसूत्र के द्वारा बाधित हो जाता है। अतः शंकाकार के पूर्वकथन में अनेकान्त दोष आ जाता है।

'शंका'-नियम शब्द सप्रयोजन है कि निष्प्रयोजन ?

समाधान-इन दोनों विकल्पों में से दूसरा विकल्प तो माना नहीं जा सकता है क्योंकि श्री पुष्पदंत स्वामी के वचन से निकले हुये तत्त्व में निरर्थकता का होना विरुद्ध है तथा सूत्र की नित्यता का प्रकाशन करना भी नियम शब्द का फल नहीं हो सकता है क्योंकि ऐसा मानने पर जिन सूत्रों में नियम शब्द नहीं पाया जाता है उन्हें अनित्यता का प्रसंग आ जायेगा, परन्तु ऐसा नहीं हैै क्योंकि ऐसा मानने पर ‘‘औदारिककाययोग पर्याप्तकों के होता है’’ इस सूत्र में नियम शब्द का अभाव होने से अपर्याप्तकों में भी औदारिककाययोग के अस्तित्व का प्रसंग प्राप्त होगा जो कि इष्ट नहीं है अतः सूत्र में आया हुआ नियम शब्द ज्ञापक है नियामक नहीं। यदि ऐसा न माना जाये तो उसको अनर्थकपने का प्रसंग आ जायेगा।

शंका-इस नियम शब्द के द्वारा क्या ज्ञापित होता है ?

समाधान-इससे यह ज्ञापित होता है कि ‘‘सम्यग्मिथ्यादृष्टि, संयतासंयत और संयतस्थान में जीव नियम से पर्याप्तक होते हैं’’ यह सूत्र अनित्य है। अपने विषय में सर्वत्र समान प्रवृत्ति का नाम नित्यता है और अपने विषय में ही कहीं प्रवृत्ति हो तथा कहीं न हो इसका नाम अनित्यता है। इससे उत्तरशरीर को उत्पन्न करने वाले सम्यग्मिथ्यादृष्टि और संयतासंयतों के तथा कपाट, प्रतर और लोकपूरण समुद्घात को प्राप्त केवलियोें के अपर्याप्तपना सिद्ध हो जाता है।

शंका-जिस जीव का आरंभ किया हुआ शरीर अर्ध अर्थात् अपूर्ण है उसे अपर्याप्त कहते हैं परन्तु सयोगी अवस्था में शरीर का आरंभ तो होता नहीं अतः सयोगी के अपर्याप्तपना कैसे बन सकता है ?

समाधान-नहीं, क्योंकि कपाट आदि समुद्घात अवस्था में सयोगी छह पर्याप्तिरूप शक्ति से रहित होते हैं अतएव उन्हें अपर्याप्त कहा है। सयोगकेवलियों के पाँच भावेन्द्रियाँ और भावमन नहीं रहता है अतः इन छह के बिना चार प्राण पाये जाते हैं और दो प्राण भी होते हैं। अर्थात् समुद्घात की अपर्याप्त अवस्था में वचनबल और स्वासोच्छ्वास का अभाव हो जाने से तेरहवें गुणस्थान के अन्त में आयु और कायबल ये दो ही प्राण रह जाते हैं। वहाँ द्रव्येन्द्रियों की पूर्णता होने के कारण कितने ही आचार्य सयोगकेवलियों के दश प्राण भी कहते हैं परन्तु उनका ऐसा कथन घटित नहीं होता है। क्यों घटित नहीं होता है? ऐसा प्रश्न होने पर आचार्य श्रीवीरसेन स्वामी ने कहा है कि चूँकि सयोगी जिनेन्द्र के भावेन्द्रियाँ नहीं पाई जाती हैं। पाँचों इन्द्रियावरण कर्मों के क्षयोपशम को भावेन्द्रिय कहते हैं परन्तु जिनका आवरण कर्म समूल नष्ट हो गया है उनके वह क्षयोपशम नहीं होता है और यदि प्राणों में द्रव्येन्द्रियों का ही ग्रहण किया जावे तो संज्ञी जीवों के अपर्याप्त काल में सात प्राणों के स्थान पर कुल दो ही प्राण कहे जायेंगे क्योंकि उनके द्रव्येन्द्रियों का अभाव पाया जाता है। अतः निष्कर्ष यह निकला कि सयोगकेवली नामक तेरहवें गुणस्थानवर्ती जीवों के चार अथवा दो ही प्राण होते हैं।

तेरहगुणस्थान में इस प्रकार प्राण आलाप के पश्चात् आगे की श्रंखला में उनके क्षीणसंज्ञा है, अर्थात् चार संज्ञाओं में से कोई भी संज्ञा नहीं रहती है, एक मनुष्य गति है, पञ्चेन्द्रियजाति है, त्रसकाय है और सात योग होते हैं। उन सात योगों के नाम इस प्रकार हैं-सत्यमनोयोग, अनुभय- मनोयोग, सत्यवचनयोग, अनुभय वचनयोग, औदारिककाययोग, कपाटसमुद्घात को प्राप्त केवली के औदारिक मिश्रकाययोग और प्रतर तथा लोकपूरण समुद्घात करने वाले केवलियों के कार्मणकाययोग इस प्रकार सात योग सयोगकेवली के होते हैं। योग के पश्चात् उनके अपगतवेद है अर्थात् वेदरहित अवस्था होती है क्योंकि मात्र द्रव्यवेद वहाँ विवक्षित है, भाववेद नहीं। इसी प्रकार वे कषायरहित अकषाय होते हैं, उनके एक केवलज्ञान पाया जाता है, एक यथाख्यातशुद्धि संयम होता है, केवलदर्शन होता है, द्रव्य से उनमें छहों लेश्याएं और भाव से एक शुक्ललेश्या पाई जाती है, वे भव्यसिद्धिक हैं, उनके एक क्षायिक सम्यक्त्व होता है, वे संज्ञी और असंज्ञी के विकल्प से रहित होते हैं, वे आहारी और अनाहारी दोनों प्रकार की अवस्थाओं से सहित होते हैं तथा साकार और अनाकार दोनों उपयोगों से युक्त होते हैं।

श्लोकार्थ-

वैशाख कृष्णा द्वितीया तिथि जो मेरी आर्यिकादीक्षा का दिवस है, आज चालीस वर्ष उस दीक्षा के पूर्ण करके मैंने इकतालीसवें वर्ष में प्रवेश किया है अतः यह दीक्षा की इकतालीसवीं वर्षगाँठ जीवन के लिए मंगलमयी होवे।।१।।

कमठ नामक असुर का मर्दन करने वाले तीर्थंकर श्री पार्श्वनाथ भगवान् को मेरा नमस्कार है, जिनकी भक्ति के प्रसाद से मैंने संयतिका-आर्यिका के व्रतों को प्राप्त किया है।।२।।

भावार्थ-

भगवान् पार्श्वनाथ के गर्भकल्याणक से पावन वैशाख कृष्णा द्वितीया तिथि को माधोराजपुरा (राज.) में इन्होंने पूज्य आचार्य श्री वीरसागर महाराज के करकमलों से आर्यिकादीक्षा ग्रहण कर ‘‘ज्ञानमती’’ नाम प्राप्त किया था। उस तिथि को ही उपर्युक्त प्रकरण लिखते समय ‘‘खरगोन’’ मध्यप्रदेश में स्मरण करते हुये तेईसवें तीर्थंकर उपसर्ग विजेता भगवान् पार्श्वनाथ को नमन किया है ताकि आगे का लेखनकार्य भी निर्विघ्न सम्पन्न होवे। संभवतः ज्ञानमती माताजी के जीवन पर इस दीक्षातिथि का ही प्रभाव है कि बड़े-बड़े संघर्ष एवं विघ्नों को भी उपसर्ग समझ कर अपने आत्मबल से सहन करके महान् कार्यों को सम्पन्न कर लेती हैं और कभी किसी के प्रति द्वेषभाव न करके समदर्शिता का भाव रखती हैं। ऐसे संतों के प्रति ही ‘‘मेरीभावना’’ के लेखक ने लिखा है-

स्वार्थत्याग की कठिन तपस्या बिना खेद जो करते हैं।

ऐसे ज्ञानी साधु जगत के दुःख समूह को हरते हैं।।
रहे सदा सत्संग उन्हीं का ध्यान उन्हीं का नित्य रहे।
उन ही जैसी चर्या में यह चित्त सदा अनुरक्त रहे।।

उन निःस्वार्थ त्याग-तपस्या की धनी पूज्य ज्ञानमती माताजी के कुछ गुण मुझमें भी अवतरित हों यही अभिलाषा है।

अयोगकेवली गुणस्थानवर्ती जीवों के ओघालाप

अयोगकेवली गुणस्थानवर्ती जीवों के ओघालाप कहने पर-उनके एक चौदहवां गुणस्थान है, एक पर्याप्त जीवसमास है, छहों पर्याप्तियॉँ होती हैं। पूर्व से आई हुई पर्याप्तियाँ इस चौदहवें गुणस्थान में उसी प्रकार स्थित रहती हैं, इसीलिए यहाँ पर छहों पर्याप्तियाँ कही गई हैं किन्तु यहाँ पर पर्याप्तिजनित कोई कार्य नहीं होता है अतः आयु नामक एक ही प्राण होता है।

शंका-एक आयुप्राण होने का क्या कारण है ?

समाधान-ज्ञानावरणकर्म के क्षयोपशमरूप पाँच इन्द्रिय प्राण तो अयोगकेवली के हैं नहीं, क्योंकि ज्ञानावरणादि कर्मों के क्षय हो जाने पर क्षयोपशम का अभाव पाया जाता है। इसी प्रकार आनापान, भाषा और मनःप्राण भी उनके नहीं है क्योंकि पर्याप्ति से उत्पन्न प्राणसंज्ञा वाली शक्ति का उनके अभाव है। इसी प्रकार उनके शरीर-कायबल नाम का भी प्राण नहीं है क्योंकि उनके शरीर नामकर्म के उदयजनित कर्म और नोकर्मांे के आगमन का अभाव है, इसलिए अयोगकेवली के एक आयु प्राण ही होता है ऐसा समझना चाहिए किन्तु उपचार का आश्रय लेकर उनके एकप्राण, छहप्राण अथवा सातप्राण भी होते हैं। यह आयुप्राण भी यहाँ उपचार से ही है क्योंकि वहाँ अवस्थान के कारणभूत नये कर्मों का आना और योगप्रवृत्ति आदि भी नष्ट हो गये हैं इसलिए आयुप्राण को भी अप्राणरूप से ही समझना चाहिए, केवल औपचारिकरूप से उसका अस्तित्व है। प्राण आलाप के पश्चात् उन अयोगकेवली गुणस्थानवर्ती जीवों के क्षीणसंज्ञा है, मनुष्यगति है, पञ्चेन्द्रिय जाति है, त्रसकाय है, वे योगरहित होने से अयोगी हैं, अपगतवेदी हैं, कषायरहित अकषायी हैं, उनके एक केवलज्ञान है, एक यथाख्यात-विहारशुद्धि संयम है, एक केवलदर्शन है, उनके द्रव्य से छहों लेश्याएं और भाव से लेश्यारहित स्थान होता है अतः अलेश्या कहे जाते हैं। यहाँ लेश्या न होने का कारण यह है कि कर्मलेप के कारणभूत योग और कषाय इन दोनों का ही उनके अभाव पाया जाता है। लेश्या आलाप के आगे भव्यसिद्धिक, क्षायिकसम्यग्दृष्टि, संज्ञी और असंज्ञी विकल्पों से रहित, अनाहारक, साकारोपयोग तथा अनाकारोपयोग इन दोनों ही उपयोगों से समन्वित होते हैं।

विशेषार्थ-

चौदह गुणस्थानों में ‘‘अयोगकेवली’’ अन्तिम चौदहवाँ गुणस्थान है और उसका काल मात्र अन्तर्मुहूर्त तक ही रहता है। अतः उसकी तो सम्पूर्ण व्यवस्था योगप्रक्रिया से रहित होने के कारण उपचार मात्र है तथापि जिन प्राण और पर्याप्तियों का कथन इसमें किया गया है उसका स्पष्टीकरण इस प्रकार है-

वास्तव में अयोगीजिन के एक आयुप्राण ही होता है फिर भी उपचार से उनके यहाँ पर एक या छह या सात प्राण बतलाए हैं। जहाँ मुख्य का तो अभाव हो किन्तु उसके कथन करने का प्रयोजन या निमित्त हो वहाँ पर उपचार की प्रवृत्ति होती है। उपचार की इस व्याख्या के अनुसार यहाँ चौदहवें गुणस्थान में क्षयोपशम रूप मुख्य इन्द्रियों का तो अभाव है। फिर भी अयोगी जिनके पंचेन्द्रियजाति नामकर्म का उदय पाया जाता है और वह जीवविपाकी है, इस निमित्त से उन्हें पंचेन्द्रिय कहना बन जाता है। इसलिए उनके पाँच इन्द्रिय प्राणों का कथन करना भी सप्रयोजन है। इस प्रकार पाँच इन्द्रियों में आयु को मिला देने पर छह प्राण हो जाते हैं। यहाँ पर इन्द्रियों से अभिप्राय उस शक्ति से है जिससे अयोगी जिनमें पंचेन्द्रियपने का व्यवहार होता है परन्तु उस शक्ति के सम्पादन का या पाँच इन्द्रियों का आधार शरीर है, अतः इस निमित्त से अयोगी जिनके कायबल का कथन करना भी सप्रयोजन है। इस प्रकार पूर्वोक्त छह प्राणों में कायबल के और मिला देने पर सात प्राण हो जाते हैं। यद्यपि उनके पहले की छह पर्याप्तियाँ उसी प्रकार से स्थित हैं, अतः वे पर्याप्तक कहे जाते हैं तथा पर्याप्तक अवस्था में मनःप्राण भी होता है, इसलिए उनके मनःप्राण का भी कथन करना चाहिए था। परंतु उसके कथन नहीं करने का यह कारण प्रतीत होता है कि उनमें संज्ञी व्यवहार लुप्त हो गया है। औपचारिक संज्ञीव्यवहार भी उनमें नहीं माना गया है, अतः अयोगियों के मनः प्राण नहीं कहा। इसी प्रकार वचनबल और श्वासोच्छ्वास के अभाव का भी कारण समझ लेना चाहिए। ऊपर सयोगी जिनके जो पाँच इन्द्रियाँ और एक मन इस प्रकार छह प्राणों का निषेध करके केवल चार ही प्राण बतलाए हैं वह मुख्य कथन है अतः जिस उपचार की अपेक्षा यहाँ छह अथवा सात प्राण कहे हैं वही उपचार वहाँ भी लागू होता है। आयु प्राण तो अयोगियों के मुख्य प्राण है फिर भी उसे भी उपचार में ले लिया है, इसलिए इसे कथन का विवक्षा भेद ही समझना चाहिए। यहाँ उपचार का प्रयोजन ऐसा प्रतीत होता है कि विवक्षित पर्याय में रखना जो आयु का काम है वह यहाँ भी पाया जाता है, इसलिए तो वह मुख्य प्राण है। फिर भी जीवन का अवस्थान अल्प है और अवस्थान के कारणभूत नये कर्मों का आना, योगप्रवृत्ति आदि भी नष्ट हो गये हैं, अतः आयु भी इस अपेक्षा से औपचारिक प्राण कहा जाता है। इस प्रकार अयोगियों के उपचार से एक या छह या सात प्राण कहे गये हैं।

सिद्धपरमेष्ठियों के ओघालाप

सिद्धपरमेष्ठियों के ओघालाप कहने पर-उनमें एक अतीतगुणस्थान अर्थात् गुणस्थान से रहित अवस्था पाई जाती है। इसी प्रकार अतीतजीवसमास, अतीतपर्याप्ति, अतीतप्राण, क्षीणसंज्ञा, सिद्धगति, अनिन्द्रिय, अकाय, अयोगी, अवेदी, क्षीणकषाय, केवलज्ञानी, संयत-असंयत और संयतासंयत विकल्पोें से रहित, केवलदर्शनी, द्रव्य और भाव से अलेश्य (लेश्या रहित), भव्यसिद्धिक (विकल्पातीत), क्षायिक सम्यग्दृष्टि, संज्ञी और असंज्ञी इन दोनों विकल्पों से मुक्त, अनाहारक, साकारोपयोगी और अनाकारोपयोगी दोनों प्रकार के होते हैं।

इसका विस्तार करते हैं-गुणस्थानों के अलापों को पढ़कर पुनः गुणस्थानातीत सिद्धों के आलाप का अभ्यास करके सिद्धपद को प्राप्त करने की ही भावना उत्पन्न होती है। तब वह सिद्धपद कैसे प्राप्त हो? ऐसी जिज्ञासा होने पर श्रीयोगीन्दुदेव का यह दोहकसूत्र स्मरण आता है-

श्लोकार्थ-

हे जीव! सम्पूर्ण चिन्ताओं को छोड़कर निश्चिन्त होकर अपने मन को परम पद में लगाकर निरञ्जनदेव को देख।।११५।।

इसका यह अर्थ है कि हे जीव! देखे, सुने और भोगे हुए भोगों की वाञ्छारूप खोटे ध्यान आदि समस्त चिंताजाल को छोड़कर निश्चिन्त होकर अपने चित्त को परमात्मस्वरूप में स्थिर करो, उसके पश्चात् भावकर्म, द्रव्यकर्म और नोकर्म के अंजन से रहित परम आराध्यदेवस्वरूप निज शुद्धात्मा का ध्यान करो ऐसा भावार्थ है। इस परमात्मा के ध्यान से ही परंपरा से सिद्धपद प्राप्त हो सकता है इसमें कोई संदेह नहीं करना चाहिए। इस प्रकार चौदह गुणस्थानों में आलापों का कथन करने वाली सत्ताईस संदृष्टियाँ पूर्ण हुर्इं।

श्लोकार्थ-

मध्यप्रदेश के ऊन (पावागिरि) नामक सिद्धक्षेत्र से जिन स्वर्णभद्र आदि चार मुनिराजों ने मोक्षधाम को प्राप्त किया है उनको मेरा नित्य ही नमस्कार होवे।।१।।

इस प्रकार श्रीमद्भगवत्पुष्पदंत एवं भूतबलि द्वारा रचित षट्खण्डागम ग्रन्थराज के प्रथम खण्ड में श्रीपुष्पदंत आचार्य विरचित सत्प्ररूपणा प्रकरण के अंतर्गत श्रीवीरसेनाचार्य कृत बीस प्ररूपणा के आधार से बीसवीं शताब्दी के प्रथम दिगम्बराचार्य चारित्रचक्रवर्ती श्री शान्तिसागर महाराज के प्रथमपट्टशिष्य आचार्य श्री वीरसागर महाराज की शिष्या गणिनीप्रमुख ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्त चिंतामणि नाम की टीका में गुणस्थानों में बीस प्ररूपणाओं का प्ररूपण करने वाला प्रथम महाधिकार समाप्त हुआ।

टिप्पणी

  1. गोम्मटसार जीवकांड गाथा ४९४।
  2. गोम्मटसार जीवकांड गा. ४९०।
  3. १९-३-१९९६ को सुदामानगर-इंदौर में तीन चौबीसी के चरण स्थापना की प्रेरणा दी थी। पुन: वहाँ चरण के स्थान पर ७२ प्रतिमाओं के विराजमान करने की योजना निर्णीत हुई जो अब साकार हो चुकी है।
  4. सनावद नगर में (क्षुल्लक मोतीसागर जी की जन्मभूमि में) ‘णमोकार धाम’ इस नूतन तीर्थ का ३१-३-१९९६ को शिलान्यास सम्पन्न हुआ।
  5. परमात्मप्रकाश।
  6. यहाँ पर भी स्वर्णभद्रादि चार मुनियों की एवं आचार्य श्री शांतिसागरजी, आ. श्री वीरसागर जी के चरण स्थापना की घोषणा की गई। ६-४-१९९६ को यहाँ मेरा ४१वाँ आर्यिकादीक्षा दिवस मनाया गया।