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०२. द्वितीय महाधिकार-इन्द्रियमार्गणा

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विषय सूची

द्वितीय महाधिकार - इन्द्रियमार्गणा

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अथ इन्द्रियमार्गणाधिकार:

अथ त्रिभिः स्थलैः नवसूत्रैः इन्द्रियमार्गणानाम द्वितीयोऽधिकारः प्रारभ्यते। तत्र प्रथमस्थले एकेन्द्रियविकलेन्द्रियाणां स्पर्शनप्रतिपादनत्वेन ‘‘इंदिया’’ इत्यादि त्रीणि सूत्राणि। तदनु द्वितीयस्थले पंचेन्द्रियाणां स्पर्शननिरूपणत्वेन ‘‘पंचिंदिय’’ इत्यादिसूत्रचतुष्टयं। ततः परं तृतीयस्थले पंचेन्द्रियपर्याप्तानां स्पर्शनकथनत्वेन ‘‘पंिंचदियअपज्जत्त’’ इत्यादिसूत्रद्वयं इति समुदायपातनिका।
अधुना सामान्यैकेन्द्रियाणां स्पर्शननिरूपणाय सूत्रमवतरति-
इंदियाणुवादेण एइंदिय-बादर-सुहुम-पज्जत्तापज्जत्तएहि केवडियं खेत्तं फोसिदं? सव्वलोगो।।५७।।
सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-इन्द्रियमार्गणानुवादेन एकेन्द्रिय-एकेन्द्रियपर्याप्त-एकेन्द्रियापर्याप्त-बादरैकेन्द्रिय-बादरैकेन्द्रियपर्याप्त-बादरैकेन्द्रियापर्याप्त-सूक्ष्मैकेन्द्रिय-सूक्ष्मैकेन्द्रियपर्याप्त-सूक्ष्मैकेन्द्रियापर्याप्तैः नवविधैः एकेन्द्रियजीवैः कियत् क्षेत्रं स्पृष्टं? सर्वलोकः स्पृष्टः इति ज्ञातव्यं।
स्वस्थानस्वस्थान-वेदना-कषाय-मारणान्तिक-उपपादपरिणतैः एकेन्द्रियजीवैः अतीतवर्तमानयोः सर्वलोकः स्पृष्टः। वैक्रियिकगतैः वर्तमाने काले चतुर्लोकानामसंख्यातभागः, मनुषलोकस्य प्रमाणं न ज्ञायते। तैरेवातीतकाले त्रिलोकानामसंख्यातभागः, नरतिर्यग्लोकयोः असंख्यातगुणश्च स्पृष्टः, अतीतकाले पंचरज्जुबाहल्यं तिर्यक्प्रतरं विक्रियमाणाः स्पृशन्ति वायुकायिकाः जीवाः।
वादरैकेन्द्रियैः बादरैकेन्द्रियपर्याप्तैः स्वस्थान-वेदना-कषायपरिणतैः वर्तमानकाले त्रिलोकानां संख्यातभागः, नरतिर्यग्लोकाभ्यामसंख्यातगुणश्च स्पृष्टः। येन पंचरज्जुबाहल्यं रज्जुप्रतरप्रमाणं वायुकायिक-जीवैरापूरितं, बादरैकेन्द्रियजीवैः आपूरिता अष्टपृथिव्यश्च, तासां पृथिवीनां अधः स्थितविंशतिविंशति-सहस्रयोजनबाहल्यं त्रित्रिवातवलयान् लोकान्तस्थितवायुकायिकक्षेत्रं च एकत्रीकृते लोकस्य संख्यातभागो भवतीति। एतैः जीवैः अतीतकालेऽपि इयच्चैव क्षेत्रं स्पृष्टं, विवक्षितपदगतानामेतेषां सर्वकालं अन्यत्रावस्थानाभावात्। वैक्रियिकपदगतैः एभिरेव जीवैः वर्तमाने काले चतुर्लोकानामसंख्यातभागः मानुषक्षेत्रादज्ञातविशेषक्षेत्रं च स्पृष्टः। अतीतकाले त्रिलोकानाम् संख्यातभागः नरतिर्यग्लोकाभ्यां असंख्यातगुणश्च स्पृष्टः। मारणान्तिकोपपादपरिणतैः जीवैः अतीतवर्तमानयोः सर्वलोकः स्पृष्टः। एवमेव एकेन्द्रियापर्याप्त जीवानां स्पर्शनक्षेत्रं वक्तव्यं। विशेषतया तेषां वैक्रियिकपदं नास्ति। सूक्ष्मैकेन्द्रिय-सूक्ष्मैकेन्द्रियपर्याप्त-सूक्ष्मैकेन्द्रियापर्याप्तै: त्रिभिरपि जीवै: त्रिकालेष्वपि सर्वलोक: स्पृष्ट:।
‘‘सुहुमा जलथलागासे सव्वत्थ होंति’’ इति वचनात्।
तात्पर्यमेतत्-सूक्ष्मा जीवाः तिलेषु तैलवत् सर्वत्र त्रिलोकेषु निविडरूपेण भृताः सन्ति, सर्वे इमे पंचस्थावराः अपि इति ज्ञातव्यं।
द्वीन्द्रियादीनां स्पर्शनक्षेत्रनिरूपणाय सूत्रमवतरति-
वीइंदिय-तीइंदिय-चउरिंदिय-तस्सेव पज्जत्त-अपज्जत्त कवेडियं खेत्तं फोसिदं? लोगस्स असंखेज्जदिभागो।।५८।।
सूत्रस्यार्थः सुगमः।


अथ इन्द्रियमार्गणा अधिकार प्रारंभ

अब तीन स्थलों में नौ सूत्रों के द्वारा इन्द्रियमार्गणा नाम का द्वितीय अधिकार प्रारंभ होता है। उनमें से प्रथम स्थल में एकेन्द्रिय और विकलेन्द्रिय जीवों का स्पर्शन प्रतिपादित करने हेतु ‘‘इंदिया’’ इत्यादि तीन सूत्र कहेंगे। उसके पश्चात् द्वितीयस्थल में पंचेन्द्रिय जीवों का स्पर्शक्षेत्र बताने हेतु ‘‘पंचिंदिय’’ इत्यादि चार सूत्र हैं। पुन: आगे तृतीय स्थल में पंचेन्द्रिय अपर्याप्त जीवों का स्पर्श कथन करने वाले ‘‘पंचिंदिय अपज्जत्त’’ इत्यादि दो सूत्र हैं। यह अधिकार के प्रारंभ में सूत्रों की समुदायपातनिका है।

अब सामान्य एकेन्द्रिय जीवों का स्पर्शन निरूपण करने हेतु सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

इन्द्रियमार्गणा के अनुवाद से एकेन्द्रिय, एकेन्द्रियपर्याप्त, एकेन्द्रियअपर्याप्त, बादरएकेन्द्रिय, बादर एकेन्द्रियपर्याप्त, बादर एकेन्द्रिय अपर्याप्त, सूक्ष्म एकेन्द्रिय, सूक्ष्म एकेन्द्रिय पर्याप्त और सूक्ष्म एकेन्द्रिय अपर्याप्त जीवों ने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है? सर्वलोक का स्पर्श किया है।।५७।।

हिन्दी टीका-सूत्र का संक्षिप्त अभिप्राय यह है कि नौ प्रकार के एकेन्द्रिय जीवों ने कितने क्षेत्र का स्पर्श किया है? ऐसा प्रश्न होने पर उत्तर प्राप्त होता है कि सर्वलोक का स्पर्श उन जीवों ने किया है।

स्वस्थानस्वस्थान, वेदना, कषाय, मारणान्तिक समुद्घात और उपपाद पदों से परिणत एकेन्द्रिय जीवों ने अतीत और वर्तमानकाल में सर्वलोक का स्पर्श किया है। वैक्रियिक पदपरिणत एकेन्द्रिय जीवों ने वर्तमान काल में चारों लोकों का असंख्यातवाँ भाग स्पर्श किया है। इस विषय में मनुष्यक्षेत्र का प्रमाण ज्ञात नहीं है। उन्हीं जीवों ने अतीतकाल में सामान्यलोक आदि तीन लोकों का असंख्यातवाँ भाग और नरलोक तथा तिर्यग्लोक का असंख्यातगुणा क्षेत्र स्पर्श किया है, क्योंकि अतीतकाल में पाँच राजु बाहल्यप्रमाण तिर्यक्प्रतर को विक्रिया करने वाले वायुकायिक जीव निरन्तर स्पर्श करते हैं। स्वस्थान, वेदना और कषाय समुद्घात, इन पदों से परिणत बादर एकेन्द्रिय और बादर एकेन्द्रिय पर्याप्त जीवों ने वर्तमानकाल में सामान्यलोक आदि तीन लोकों का संख्यातवाँ भाग और नरलोक तथा तिर्यग्लोक, इन दोनों लोकों से असंख्यातगुणा क्षेत्र स्पर्श किया है। पांच राजु बाहल्यवाला राजुप्रतरप्रमाण क्षेत्र वायुकायिक जीवों से परिपूर्ण है और बादर एकेन्द्रिय जीवों से आठों पृथिवियां व्याप्त हैं। उन पृथिवियों के नीचे स्थित बीस-बीस हजार योजन बाहल्यवाले तीन-तीन वातवलयों को और लोकांत में स्थित वायुकायिक जीवों के क्षेत्र को एकत्रित करने पर सामान्यलोक आदि तीन लोकों का संख्यातवाँ भाग हो जाता है।

इन्हीं उक्त जीवों ने अतीतकाल में भी इतना ही क्षेत्र स्पर्श किया है, क्योंकि विवक्षित पदपरिणत इन उक्त जीवों के सभी कालों में अन्यत्र रहने का अभाव है। वैक्रियिक समुद्घात से परिणत बादर एकेन्द्रिय और बादर एकेन्द्रिय पर्याप्त जीवों ने वर्तमानकाल में सामान्यलोक आदि चार लोकों का असंख्यातवाँ भाग और मानुषक्षेत्र से अज्ञात विशेष प्रमाणक्षेत्र स्पर्श किया है। अतीतकाल में उन्हीं जीवों ने सामान्यलोक आदि तीन लोकों का संख्यातवाँ भाग और नरलोक तथा तिर्यग्लोक, इन दोनों लोकों से असंख्यातगुणा क्षेत्र स्पर्श किया है। मारणान्तिकसमुद्घात और उपपादपदपरिणत उक्त जीवों ने अतीत और वर्तमानकाल में सर्वलोक का स्पर्श किया है।

इसी प्रकार से बादर एकेन्द्रिय अपर्याप्त जीवों का भी स्पर्शनक्षेत्र कहना चाहिए। विशेष बात यह है कि उनके वैक्रियिकसमुद्घात नहीं होता है। सूक्ष्म एकेन्द्रिय, सूक्ष्म एकेन्द्रिय पर्याप्त और सूक्ष्म एकेन्द्रिय अपर्याप्त जीवों ने तीनों ही कालों में सर्वलोक स्पर्श किया है, क्योंकि सूक्ष्मकायिक जीव जल, स्थल और आकाश में सर्वत्र होते हैं। ऐसा आगम का वचन है।

तात्पर्य यह है कि सूक्ष्म जीव तिलों में तेल के समान तीन लोक में सर्वत्र निविडरूप से-सघनरूप से ठसाठस भरे हुए हैं, ये सभी पंचस्थावर भी हैं ऐसा जानना चाहिए।

अब दो इन्द्रिय आदि जीवों का स्पर्शनक्षेत्र बतलाने हेतु सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

द्वीन्द्रिय, द्वीन्द्रियपर्याप्त, द्वीन्द्रिय अपर्याप्त, त्रीन्द्रिय, त्रीन्द्रियपर्याप्त, त्रीन्द्रियअपर्याप्त, चतुरिन्द्रिय, चतुरिन्द्रियपर्याप्त और चतुरिन्द्रियअपर्याप्त जीवों ने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है? लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पर्श किया है।।५८।।

सूत्र का अर्थ सुगम है। अत: विशेष कथन नहीं किया जा रहा है।

पुनरपि एषामेव स्पर्शनकथनाय सूत्रमवतरति-

सव्वलोगो वा।।५९।।

सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-सूत्रं सुगमं। विशेषतया-स्वस्थानस्वस्थानस्था विकलेन्द्रियाः स्वयंप्रभपर्वतस्य परभागे एव भवन्ति, अत: परभागे पूर्ववत् प्रतराकारेण स्थापिते विकलेन्द्रियस्वस्थानस्वस्थानक्षेत्रं तिर्यग्लोकस्य संख्यातभागमात्रं भवति। शेषपदैः वैरिसंबंंधेन विकलेन्द्रियाः सर्वत्र तिर्यक्प्रतरस्याभ्यंतरे भवन्तीति प्रतराकारेण स्थापिते इदमपि क्षेत्रं तावच्चैव भवति। मारणान्तिकोपपादगताभ्यां सर्वलोकः स्पृष्टः।
तैरेवापर्याप्तैः विकलेन्द्रियैः स्वस्थान-वेदना-कषायपरिणतैः त्रिलोकानामसंख्यातभागः, तिर्यग्लोकस्य संख्यातभागः, सार्धद्वयद्वीपादसंख्यातगुणश्च स्पृष्टः। मारणान्तिकोपपादगताभ्यां सर्वलोक: स्पृष्ट:।
पंचेन्द्रियतिर्यगपर्याप्तानां यथा कारणमुक्तं, तथा अत्रापि पृथक्-पृथक् विकलेन्द्रियापर्याप्तानां वक्तव्यं।
एवं प्रथमस्थलेएकेन्द्रियविकलेन्द्रियाणां स्पर्शननिरूपणत्वेन त्रीणि सूत्राणि गतानि।
पंचेन्द्रियाणां मिथ्यादृष्टीनां स्पर्शनकथनाय सूत्रद्वयमवतरति-
पंचिंदिय-पंचिंदियपज्जत्तएसु मिच्छादिट्ठीहि केवडियं खेत्तं फोसिदं? लोगस्स असंखेज्जदिभागो।।६०।।
अट्ठ चोद्दसभागा देसूणा, सव्वलोगो वा।।६१।।
सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-सूत्रे सुगमे स्त:। द्विविधपंचेन्द्रियमिथ्यादृष्टि-स्वस्थानपरिणतै: त्रिलोकानामसंख्यातभाग:, तिर्यग्लोकस्य संख्यातभाग:, सार्धद्वयद्वीपादसंख्यातगुणश्च स्पृष्ट:। अत्र पूर्ववत् ज्योतिष्कव्यंतरावासरुद्धक्षेत्रं अतीतकाले पंचेन्द्रियतिर्यग्भिः स्वस्थानीकृतक्षेत्रं च गृहीत्वा तिर्यग्लोकस्य संख्यातभागो दर्शयितव्यः। विहारवत्स्वस्थान-वेदना-कषाय-वैक्रियिकपरिणतैः अष्ट चतुर्दशभागाः स्पृष्टाः, मेरुमूलादुपरि षट्, अधो द्विरज्जुक्षेत्रस्याभ्यन्तरे सर्वत्र पूर्वपदपरिणतद्विविधपंचेन्द्रिययोः उपलंभात्। मारणान्तिकोपपादपरिणताभ्यां सर्वलोकः स्पृष्टः, विवक्षितातीतकालत्वात्।
सासादनादीनां एषामेव स्पर्शननिरूपणाय सूत्रमवतरति-
सासणसम्मादिट्ठिप्पहुडि जाव अजोगिकेवलि त्ति ओघं।।६२।।
सूत्रं सुगमं।
सयोगिकेवलिनां स्पर्शनकथनाय सूत्रावतारः क्रियते-
सजोगिकेवली ओघं।।६३।।
सूत्रं सुगमं वर्तते।
एवं द्वितीयस्थले पंचेन्द्रिय-पंचेन्द्रियपर्याप्तानां स्पर्शननिरूपणत्वेन सूत्रचतुष्टयं।
पंचेन्द्रियापर्याप्तानां स्पर्शनकथनाय सूत्रमवतरति-
पंचिंदिय-अपज्जत्तएहि केवडियं खेत्तं फोसिदं? लोगस्स असंखेज्ज-दिभागो।।६४।।
एतस्यापि प्ररूपणा क्षेत्रवत् ज्ञातव्या।
पुनरपि एषामेव स्पर्शननिरूपणार्थं सूत्रमवतरति-
सव्वलोगो वा।।६५।।
सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-सूत्रं सुगमं। अत्रापि मारणान्तिकोपपादगताभ्यां सर्वलोकः स्पृष्टः, सर्वलोके एताभ्यां पदाभ्यां सह सर्वलब्ध्यपर्याप्तानां गमनागमनप्रतिषेधाभावात्।
एवं तृतीयस्थले पंचेन्द्रियलब्ध्यपर्याप्तानां स्पर्शनप्रतिपादनपरे द्वे सूत्रे गते।
इति षट्खण्डागमस्य प्रथमखण्डे चतुर्थग्रन्थे स्पर्शनानुगमे श्रीज्ञानमती-कृत सिद्धान्तचिन्तामणिटीकायां इन्द्रियमार्गणानाम द्वितीयोऽधिकारो समाप्तः।


अब उन्हीं दो इन्द्रिय आदि जीवों का पुन: अन्य रीति से स्पर्शन कथन करने के लिए सूत्र अवतरित हो रहा है-

सूत्रार्थ-

द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय और चतुरिन्द्रिय जीव तथा उन्हीं के पर्याप्त और अपर्याप्त जीवों ने अतीत और अनागत काल की अपेक्षा सर्वलोक स्पर्श किया है।।५९।।

हिन्दी टीका-सूत्र सुगम है। इसमें विशेषता यह है कि स्वस्थानस्वस्थान में स्थित विकलेन्द्रिय जीव स्वयंप्रभपर्वत के परभाग में ही होते हैं, इसलिए परभागवर्ती क्षेत्र को पूर्व के समान प्रतराकार से स्थापित करने पर विकलेन्द्रिय जीवों का स्वस्थानस्वस्थानक्षेत्र तिर्यग्लोक के संख्यातवें भाग मात्र होता है। शेष पदों की अपेक्षा वैरी जीवों के संबंध से विकलेन्द्रिय जीव सर्वत्र तिर्यक्प्रतर के भीतर ही होते हैं, इसलिए प्रतराकार से स्थापित करने पर यह क्षेत्र भी तिर्यग्लोक के संख्यातवें भाग मात्र ही होता है। मारणान्तिक समुद्घात और उपपादपद से परिणत उक्त जीवों ने सर्वलोक का स्पर्श किया है। उन्हीं अपर्याप्त विकलेन्द्रिय जीवों में से स्वस्थानस्वस्थान, वेदना और कषायसमुद्घात परिणत अपर्याप्त जीवों ने सामान्यलोक आदि तीन लोकों का असंख्यातवाँ भाग, तिर्यग्लोक का संख्यातवाँ भाग तथा अढ़ाईद्वीप से असंख्यातगुणा क्षेत्र स्पर्श किया है। मारणान्तिक समुद्घात तथा उपपादपदपरिणत जीवों ने सर्वलोक का स्पर्श किया है। पंचेन्द्रिय तिर्यंच अपर्याप्त जीवों का स्पर्शनक्षेत्र बतलाते समय जिस प्रकार (उक्त क्षेत्र होने का जो) कारण कहा है, उसी प्रकार से यहाँ पर भी पृथक्-पृथक् द्वीन्द्रियादि विकलेन्द्रिय अपर्याप्त जीवों का क्षेत्र बतलाते हुए उसी कारण को कहना चाहिए।

इस प्रकार प्रथम स्थल में एकेन्द्रिय और विकलेन्द्रिय जीवों का स्पर्शन निरूपित करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

अब पंचेन्द्रिय मिथ्यादृष्टि जीवों का स्पर्शन कथन करने के लिए दो सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

पंचेन्द्रिय और पंचेन्द्रियपर्याप्तों में मिथ्यादृष्टि जीवों ने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है? लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पर्श किया है।।६०।।

पंचेन्द्रिय और पंचेन्द्रियपर्याप्त जीवों ने अतीत और अनागत काल की अपेक्षा कुछ कम आठ बटे चौदह भाग और सर्वलोक का स्पर्श किया है।।६१।।

हिन्दी टीका-दोनों सूत्रों का अर्थ सरल है।

स्वस्थानस्वस्थान पदपरिणत पंचेन्द्रिय और पंचेन्द्रियपर्याप्त इन दोनों ही प्रकार के पंचेन्द्रिय मिथ्यादृष्टि जीवों ने सामान्यलोक आदि तीन लोकों का असंख्यातवाँ भाग, तिर्यग्लोक का संख्यातवाँ भाग और अढ़ाईद्वीप से असंख्यातगुणा क्षेत्र स्पर्श किया है। यहाँ पर पूर्व के समान ही ज्योतिष्क और व्यन्तर देवों के आवासों से रुद्ध क्षेत्र को तथा अतीतकाल में पंचेन्द्रिय तिर्यंचों के द्वारा स्वस्थानीकृत अर्थात् स्वस्थानस्वस्थानरूप से परिणत क्षेत्र को लेकर तिर्यग्लोक का संख्यातवाँ भाग दिखाना चाहिए।

विहारवत्स्वस्थान, वेदना, कषाय और वैक्रियिक समुद्घात से परिणत जीवों ने आठ बटे चौदह (८/१४) भाग स्पर्श किये हैं, क्योंकि मेरुपर्वत के मूलभाग से ऊपर छह राजु और नीचे दो राजु, इस प्रकार आठ राजु क्षेत्र के भीतर सर्वत्र पूर्वपदपरिणत दोनों प्रकार के पंचेन्द्रिय जीव पाये जाते हैं। मारणान्तिक समुद्घात और उपपादपद से परिणत उक्त दोनों प्रकार के जीवों ने सर्वलोक का स्पर्श किया है, क्योंकि यहाँ पर अतीतकाल की विवक्षा की गई है।

अब सासादनगुणस्थानवर्ती उपर्युक्त जीवों का ही स्पर्शन कथन करने हेतु सूत्र अवतरित हो रहा है-

सूत्रार्थ-

सासादनसम्यग्दृष्टि गुणस्थान से लेकर अयोगिकेवली गुणस्थान तक प्रत्येक गुणस्थानवर्ती पंचेन्द्रिय और पंचेन्द्रियपर्याप्त जीवों का स्पर्शनक्षेत्र ओघ के समान है।।६२।।

सूत्र का अर्थ सुगम है, अत: विशेष कथन नहीं किया जा रहा है।

अब सयोगिकेवलियों का स्पर्शन कथन करने के लिए सूत्र का अवतार किया जा रहा है-

सूत्रार्थ-

सयोगिकेवली जीवों का स्पर्शनक्षेत्र ओघ के समान है।।६३।।

सूत्र का अर्थ सुगम है, इसलिए विशेष व्याख्यान नहीं किया जा रहा है।

इस प्रकार द्वितीय स्थल में पंचेन्द्रिय पर्याप्त जीवों के स्पर्शनक्षेत्र का निरूपण करने वाले चार सूत्र पूर्ण हुए।

अब पंचेन्द्रिय अपर्याप्त जीवों के स्पर्शन को बताने हेतु सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

लब्ध्यपर्याप्त पंचेन्द्रिय जीवों ने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है? लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पर्श किया है।।६४।।

इस सूत्र की प्ररूपणा क्षेत्रप्ररूपणा के समान जानना चाहिए।

पुनश्च इन्हीं अपर्याप्त पंचेन्द्रिय जीवों का स्पर्शन कहने हेतु सूत्र प्रगट हो रहा है-

सूत्रार्थ-

लब्ध्यपर्याप्त पंचेन्द्रिय जीवों ने अतीत और अनागतकाल की अपेक्षा सर्वलोक स्पर्श किया है।।६५।।

सूत्र सुगम है। यहाँ भी मारणान्तिक और उपपादपद को प्राप्त लब्ध्यपर्याप्त पंचेन्द्रिय जीवों ने सर्वलोक का स्पर्श किया है, क्योंकि संपूर्ण लोक में इन दोनों पदों के साथ सभी पंचेन्द्रिय लब्ध्यपर्याप्त जीवों के गमन और आगमन के प्रतिषेध का अभाव है।

इस प्रकार तृतीय स्थल में पंचेन्द्रिय लब्ध्यपर्याप्त जीवों का स्पर्शन क्षेत्र प्रतिपादित करने वाले दो सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार षट्खण्डागम के प्रथम खण्ड में चतुर्थ ग्रंथ में स्पर्शनानुगम नामक चतुर्थप्रकरण में गणिनी ज्ञानमती कृत सिद्धान्तचिंतामणि टीका में इन्द्रियमार्गणा नामक द्वितीय अधिकार पूर्ण हुआ।

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