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०२. द्वितीय महाधिकार-गतिमार्गणा में नरकगति का वर्णन

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विषय सूची

द्वितीय महाधिकार-गतिमार्गणा में नरकगति का वर्णन

अथ द्वितीयो महाधिकार:

नम: श्रीमुनिसुव्रतनाथतीर्थंकराय।
यो भगवान् वर्तमानवीरनिर्वाणाब्द-द्वाविंशत्यधिकपंचविंशतिशतकतमात् एकादशलक्ष-षडशीतिसहस्र-पंचशतकचतुर्विंशतिवर्षपूर्वं मोक्षं जगाम। यस्य च शासने नवलक्षवर्षपूर्वं श्रीरामचन्द्रादयो नवनवतिकोटि-मुनयस्तुंगीगिरिचूलिकात: मुक्तिश्रियमवापु:, अतएव तस्य भगवत: श्रीविंशतितमतीर्थकरस्य चतुर्दशहस्तोत्तुंग (२१ फुट उत्तुंग) प्रतिमां अत्र प्रतिष्ठाप्य ज्येष्ठशुक्लाषष्ठ्यां बृहज्जनसमूहमध्ये महामस्तकाभिषेक: संजात: पुन: पुनश्च तस्मै नमो नम:।
अथ षट्खण्डागमस्य प्रथमखण्डस्य तृतीय ग्रन्थे द्रव्यप्रमाणानुगमस्य प्रकरणस्य द्वितीयमहाधिकारे चतुर्दशाधिकाराः संति। तस्मिन् प्रथमे चतुर्गतिप्ररूपकेऽधिकारे चत्वारोऽन्तराधिकारा: सन्ति। तत्र तावत् स्थलद्वयेन नवसूत्रै: प्रथमोनरकगतिनामान्तराधिकार: प्रारभ्यते।
तस्मिन्नपि प्रथमस्थले नरकगतौ प्रथमपृथिव्यां मिथ्यादृष्ट्यादिजीवानां द्रव्यकालक्षेत्रापेक्षया प्रमाणनिरूपणत्वेन ‘आदेसेण’ इत्यादिसूत्रपंचकं। तदनु द्वितीयादिपृथिव्यां नारकाणां गुणस्थानापेक्षया संख्याप्रतिपादनत्वेन द्वितीयस्थले चत्वारि सूत्राणि। एवं प्रथमान्तराधिकारे स्थलद्वयेन नवसूत्रै: समुदायपातनिका।
संप्रति पर्यायार्थिकनयमवलम्ब्य स्थितशिष्याणामनुग्रहार्थं विशेषेण नारकाणां संख्यानिरूपणाय सूत्रावतारो भवति-
आदेसेण गदियाणुवादेण णिरयगईए णेरइएसु मिच्छाइट्ठी दव्वपमाणेण केवडिया? असंखेज्जा।।१५।।
सिद्धांत चिन्तामणि टीका-आदेसेण-मार्गणापेक्षया-विशेषेण पर्यायार्थिकनयापेक्षया वा गदियाणुवादेण-इयं गतिमार्गणा आचार्यपरंपरया अनादिनिधनरूपेण समागता अस्ति इति ज्ञापनार्थं अनुवादशब्दस्य ग्रहणं वर्तते। णिरयगईए-नरकगतौ णेरइएसु-नारकेषु नरकगतिषु उत्पन्नजीवेषु मिच्छाइट्ठी दव्वपमाणेण केवडिया? मिथ्यादृष्टयो जीवा: द्रव्यप्रमाणेन-संख्यया कियन्त: सन्ति? एतत्प्रश्ने सति असंखेज्जा-असंख्याता: सन्तीति ज्ञातव्या भवन्ति। अत्र मध्यम-असंख्यातासंख्यातप्रमाणं ज्ञातव्यं[१]
अस्मिन् सूत्रे शेषा: गती: मुक्त्वा पूर्वं नरकगते: कथनं किमर्थं क्रियते? नैतत् वक्तव्यं, किंच-नारकाणां स्वरूपज्ञानेन समुत्पन्नभयस्य भव्यजीवस्य दशलक्षणे धर्मे निश्चलरूपेण बुद्धिस्तिष्ठतीति कृत्वा पूर्वं तत्प्ररूपणत्वात्[२]
अत्र सूत्रे ‘केवडिया’ इति पृच्छाया: किं फलं?
जिनानामर्थकर्तृत्वप्रतिपादनमुखेन आत्मन: कर्तृत्वप्रतिषेधफलत्वादेव पृच्छावचनं क्रियते श्रीभूतबलि-सूरिवर्येण। तथाहि-
‘‘एवं गोदमसामिणा पुच्छिदे महावीरभयवंतेण केवलणाणेणावगदतिकालगोयरासेसपयत्थेण असंखेज्जा इति तेसिं पमाणं परूविदं[३]।’’
अत्र नाम१-स्थापना२-द्रव्य३ शाश्वत४-गणना५-अप्रदेशिक६-एक७-उभय८-विस्तार९-१०सर्व-११भावै: एकादशविधा असंख्याता: सन्ति। तत्रापि गणनानामपंचमभेदेऽपि परीतासंख्यात-युक्तासंख्यातअसंख्यातासंख्यातनामत्रिविधेषु प्रत्येकमपि उत्कृष्टमध्यमजघन्यभेदै: त्रिविधं। अस्मिन्नपि अत्र मध्यमअसंख्यातासंख्यातप्रमाणं गृहीतव्यमस्तीति सूच्यते आचार्यश्रीवीरसेनेन।

अथ द्वितीय महाधिकार प्रारम्भ

‘‘तीर्थंकर श्री मुनिसुव्रतनाथ भगवान को नमस्कार हो’’

जिन मुनिसुव्रत भगवान ने वर्तमान वीर निर्वाण संवत् पच्चीस सौ बाईस (२५२२)से ग्यारह लाख छियासी हजार पाँच सौ चौबीस वर्ष पूर्व मोक्षधाम को प्राप्त कया है एवं जिनके शासन में आज से नौ लाख वर्ष पूर्व श्री रामचन्द्र आदि निन्यानवे करोड़ मुनियों ने तुंगीगिरि पर्वत की चूलिका-चोटी से मुक्तिलक्ष्मी को प्राप्त किया इसलिए उन बीसवें तीर्थंकर भगवान मुनिसुव्रतनाथ की चौदह हाथ (इक्कीस फुट)उत्तुंग खड्गासन प्रतिमा उस मांगीतुंगी सिद्धक्षेत्र पर ज्येष्ठ शुक्ला षष्ठी तिथि(सन् १९९६,वीर नि.सं.२५२२) के दिन विराजमान करके विशाल जनसमूह के मध्य उनका महामस्तकाभिषेक महोत्सव सम्पन्न किया गया, उन भगवान मुनिसुव्रत को मेरा पुनः पुनः नमस्कार है।

भावार्थ-

यहाँ संस्कृत टीकाकत्र्री चारित्रचन्द्रिका पूज्य गणिनी प्रमुख आर्यिका शिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी ने प्रसंगवश मांगीतुुंगी सिद्धक्षेत्र एवं मुनिसुव्रत तीर्थंकर भगवान को विशेषरूप से इस द्वितीय अध्याय के प्रारंभ में स्मरण किया है। उसका अभिप्राय यह है कि अप्रैल सन् १९९६ में पूज्य माताजी ससंघ मांगीतुंगी पहुँचीं, वहाँ मई (ज्येष्ठ मास)में उनके सानिध्य में विशाल नूतन मंदिर में प्रतिष्ठापित भगवान मुनिसुव्रतनाथ की २१ फुट ऊंची प्रतिमा एवं चौबीसों तीर्थंकरों की ५-५फुट खड्गासन प्रतिमाओं (पंचम पट्टाचार्य स्व.आचार्य श्री श्रेयांससागर महाराज की प्रेरणा से निर्मित) की पंचकल्याणक प्रतिष्ठा सम्पन्न हुई पुनः वहीं पर संघ का वर्षायोग सम्पन्न हुआ,उसी प्रवास के मध्य पूज्य माताजी ने इस ग्रंथ की टीका लिखी है इसीलिए भगवान मुनिसुव्रत को पुनः पुनः नमस्कार किया है।

यहाँ यह ज्ञातव्य है कि निन्यानवे करोड़ मुनिराजों में सभी भगवान् रामचंद्र के साथ ही मोक्ष नहीं गये हैं, कई करोड़ मुनि रामचंद्र से पहले भी मोक्ष गये होंगे और अनेकों उनके अनंतर मोक्ष गये होंगे। इसीलिए यहाँ उस पर्वत से मोक्ष जाने वाले मुनियों की कुल संख्या ९९ करोड़ कही गई है। इस षट्खण्डागम ग्रंथ के प्रथम खण्ड के इस तृतीय ग्रंथ (पुस्तक) में द्रव्यप्रमाणानुगम नाम के द्वितीय प्रकरण के द्वितीय महाधिकार में चौदह अधिकार हैं उनमें चतुर्गति का प्ररूपण करने वाले प्रथम अधिकार में चार अन्तराधिकार हैं। उसमें दो स्थल में नौ सूत्रों के द्वारा प्रथम नरकगति नाम का अन्तराधिकार प्रारम्भ होता है। उसमें भी प्रथमस्थल में प्रथम नरकपृथिवी में मिथ्यादृष्टि आदि जीवों के द्रव्य-काल-क्षेत्र की अपेक्षा प्रमाण निरूपण की मुख्यता से ‘‘आदेसेण’’ इत्यादि पाँच सूत्र हैं। उसके बाद द्वितीयादि पृथिवी में नारकियों के गुणस्थान की अपेक्षा संख्याप्रतिपादन की मुख्यता से द्वितीय स्थल में चार सूत्र हैं। इस प्रकार प्रथम अन्तराधिकार में दो स्थल के द्वारा नौ सूत्रों की समुदायपातनिका हुई है। अब यहाँ पर्यायार्थिक नय का अवलम्बन लेकर स्थित हुए शिष्यों पर अनुग्रह करने हेतु विशेषरूप से नारकी जीवों की संख्या निरूपण करने के लिए सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

आदेश की अपेक्षा गतिमार्गणा के अनुवाद से नरकगति को प्राप्त नारकियों में मिथ्यादृष्टि जीव द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा कितने हैं ? असंख्यात हैं ।।१५।।

हिन्दी टीका-विशेषरूप से पर्यायार्थिक नय की अपेक्षा गदियाणुवादेण का अर्थ यह समझना चाहिए कि यह गतिमार्गणा आचार्य परम्परानुसार अनादिनिधनरूप से चली आ रही है, इस बात की सूचना देने के लिए अनुवाद शब्द का ग्रहण किया गया है। यहाँ प्रश्न उठाया गया है कि नरक में उत्पन्न हुए मिथ्यादृष्टि नारकी जीवों में द्रव्यप्रमाण से कितनी संख्या मानी है ? इसका उत्तर मिलता है कि वे असंख्यात होते हैं। यहाँ असंख्यात शब्द से मध्यम असंख्यातासंख्यात प्रमाण जानना चाहिए ।

प्रश्न-इस सूत्र में शेष गतियों को छोड़कर सर्वप्रथम नरकगति का ही कथन क्यों किया गया है ?
उत्तर-ऐसा नहीं कहना, क्योंकि नारकियों के स्वरूप का ज्ञान हो जाने से जिसे भय उत्पन्न हो गया है, ऐसे भव्य जीव की दशलक्षण धर्म में निश्चलरूप से बुद्धि स्थिर हो जाती है, ऐसा सोचकर ही पहले नरकगति का वर्णन किया है ।

प्रश्न-सूत्र में ‘‘केवडिया’’ अर्थात् कितने हैं ? इस पृच्छा का क्या फल है ?
उत्तर-जिनेन्द्रदेव ही अर्थकर्ता हैं इस कथन के प्रतिपादन की मुख्यता से अपने-आचार्य भूतबला के कर्तापन का निषेध करना उक्त पृच्छा का फल है। उसी को देखें धवलाटीकाकार के शब्दों में-

इस प्रकार गौतमस्वामी के द्वारा पूछने पर जिन्होंने केवलज्ञान के द्वारा त्रिकाल के विषयभूत समस्त पदार्थों को जान लिया है, ऐसा भगवान महावीर ने ‘‘असंख्यात हैं ’’इस प्रकार नारकियों के प्रमाण का प्ररूपण किया।

यहाँ नाम, स्थापना, द्रव्य, शाश्वत, गणना, अप्रदेशिक, एक, उभय, विस्तार, सर्व और भाव इस प्रकार ये ग्यारह प्रकार के असंख्यात होते हैं। उनमें भी गणना नाम के पाँचवें भेद में भी परीतासंख्यात, युक्तासंख्यात, असंख्यातासंख्यात, तीन प्रकार के भेदों में प्रत्येक के उत्कृष्ट, मध्यम और जघन्य ये तीन भेद होते हैं। इसमें भी यहाँ मध्यम असंख्यातासंख्यात का प्रमाण ग्रहण करना चाहिए, ऐसा श्री वीरसेनाचार्य द्वारा सूचित होता है।

अधुना कालापेक्षया नारकमिथ्यादृष्टीनां प्रमाणप्रतिपादनार्थं सूत्रमवतरति-

असंखेज्जासंखेज्जाहि ओसप्पिणि-उस्सप्पिणीहि अवहिरंति कालेण।।१६।।

कालेण-कालापेक्षया असंखेज्जासंखेज्जाहि-असंख्यातासंख्याताभि: ओसप्पिणि-उस्सप्पिणीहि-अवसर्पिणी-उत्सर्पिणीभि: अवहिरंति-अपहृता भवन्तीति।
नारकाणां कालापेक्षया संख्यानिरूपणं कथं क्रियते?
संपूर्णापि असंख्याता जीवराशि: नारकाणां समाप्ता भवितुं शक्नोतीति ज्ञापनार्थं कालापेक्षया प्ररूपणा क्रियते।
क्षेत्रप्रमाणमुल्लंघ्य पूर्वं कालप्रमाणं कथं क्रियेत?
नैष दोष:, यदल्पवर्णनीयं तत्पूर्वमेव वर्णयितव्यमिति वचनात्।
कथं क्षेत्रप्रमाणस्य बहुत्वं?
यत: क्षेत्रे जगत्श्रेणी-जगत्प्रतर-विष्कंभप्ररूपणाणामस्तित्वात्।
अत्र विशेष:-क्षेत्रं सूक्ष्मं, ततोऽपि सूक्ष्मं द्रव्यं, किंच-एकस्मिन् द्रव्यांगुले गणनापेक्षया अनन्ता: क्षेत्रांगुला भवंति।
उक्तं च-
सुहुमं तु हवदि खेत्तं, तत्तो सुहुमं खु जायदे दव्वं।
दव्वंगुलम्हि एक्के, हवंति खेत्तंगुलाणंता[४]।।
अत्र कश्चिदाशंकते-एकस्मिन् द्रव्यांगुले एकस्मिन् क्षेत्रांगुले च परमाणुप्रदेशा: आकाशप्रदेशाश्च समाना भवन्ति अत: पूर्वोक्तं व्याख्यानं न घटते?
नैतत् किंच्, एकस्मिन् क्षेत्रांगुले अवगाढभृतानन्तद्रव्यांगुलदर्शनात्। असंख्यातासंख्यातानां अवसर्पिण्युत्सर्पिणीणां समया: शलाकारूपेण एकत्र स्थापयित्वा अन्यत्र च नारकमिथ्यादृष्टीनां राशिं स्थापयित्वा शलाकाराशिभ्य: एक: समय: अपनेतव्य:, ततश्च नारकमिथ्यादृष्टिराशिभ्य: एको जीव: निष्कासयितव्य:। एवं उभयराशिभ्य: पुन: पुन: अपह्रियमाणे शलाकाराशि: मिथ्यादृष्टिनारकजीवराशिश्च युगपत् समाप्ता भवति।
अथवा अवसर्पिण्युत्सर्पिण्यौ द्वे अपि मिलित्वा एक: कल्पकालो भवति, तेन कल्पेन कालेन नारकमिथ्या- दृष्टिराशिषु भागे कृते यत् भागलब्धं, तावन्मात्रा: कल्पकाला: नारकमिथ्यादृष्टिजीवराशिगणना भवन्ति एवं कालप्रमाणापेक्षया मिथ्यादृष्टिनारकाणां संख्या प्ररूपिता भवति।
संप्रति क्षेत्रापेक्षया मिथ्यादृष्टिनारकाणां प्रमाणनिरूपणार्थं सूत्रावतारो भवति-
खेत्तेण असंखेज्जाओ सेढीओ जगपदरस्स असंखेज्जदिभागमेत्ताओ। तासिं सेढीणं विक्खंभसूची अंगुलवग्गमूलं विदियवग्गमूलगुणिदेण।।१७।।
खेत्तेण-क्षेत्रापेक्षया कथनेन जगपदरस्स असंखेज्जदि भागमेत्ताओ-जगत्प्रतरस्य असंख्यातभागमात्रा असंखेज्जाओ सेढीओ-असंख्यात जगत्श्रेणीप्रमाणा सामान्यनारक-मिथ्यादृष्टिजीवराशिर्भवति। सूच्यंगुलस्य प्रथमवर्गमूलस्य तेनैव द्वितीयवर्गमूलेन गुणिते सति यावल्लब्धा तावन्मात्रा एव तासां जगच्छ्रेणीणां विष्कंभसूची अस्ति।
पल्य-सागर-सूच्यंगुल-प्रतरांगुल-घनांगुल-जगच्छ्रेणी-लोकप्रतर-लोका: इमाः उपमाप्रमाणभेदा: ज्ञातव्या:।
अस्य द्रव्यप्रमाणानुगमानुयोगद्वारस्य पठनपाठनयो: उपमाप्रमाणस्याभ्यासो विधातव्य एव।

अब यहाँ काल की अपेक्षा से मिथ्यादृष्टि नारकियों का प्रमाण बतलाने हेतु सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ- काल की अपेक्षा नारक मिथ्यादृष्टि जीव असंख्यातासंख्यात अवसर्पिणियों और उत्सर्पिणियों के द्वारा अपहृत होते हैं। ।।१६।।

प्रश्न-मिथ्यादृष्टि नारकियों का काल की अपेक्षा से संख्या का निरूपण क्यों किया गया है ?

उत्तर-सम्पूर्ण असंख्यात जीवराशि भी नारकियों की समाप्त हो सकती है, ऐसा ज्ञापित करने के लिए ही काल की अपेक्षा से प्ररूपणा की गई है।

प्रश्न-क्षेत्रप्रमाण का उल्लंघन करके पहले कालप्रमाण का प्ररूपण किसलिये किया जा रहा है ?

उत्तर-इसको कोई दोष मत समझना, क्योंकि ‘‘ जो अल्पवर्णनीय होता है, उसका वर्णन पूर्व में ही करना चाहिए ’’ इस कथनानुसार पहले कालप्रमाण का प्ररूपण किया है।

प्रश्न-काल से क्षेत्रप्रमाण का बहुत्व कैसे है ?

उत्तर-क्योेंकि क्षेत्र में जगत्श्रेणी, जगत्प्रतर और विष्कम्भसूची की प्ररूपणा पाई जाती है, इसलिए काल की अपेक्षा क्षेत्र में बहुत्व पाया जाता है अर्थात् क्षेत्र बहुवर्णनीय होता है। यहाँ इस बात को विशेषरूप से इस प्रकार समझना कि-क्षेत्र जितना सूक्ष्म है, उससे भी सूक्ष्म द्रव्य होता है क्योंकि एक द्रव्यांगुल में गणना की अपेक्षा अनन्त क्षेत्रांगुल होते हैं।

धवला टीका में भी कहा है-

गाथार्थ-

क्षेत्र सूक्ष्म होता है और उससे भी सूक्ष्म द्रव्य होता है, क्योंकि एक द्रव्यांगुल में अनन्त द्रव्यांगुल पाये जाते हैं ।

यहाँ कोई शंका करता है कि एक द्रव्यांगुल में और एक क्षेत्रांगुल में परमाणुप्रदेश और आकाशप्रदेश समान होते हैं, इसलिए पूर्वोक्त व्याख्यान घटित नहीं होता है ? किन्तु ऐसा नहीं समझना, क्योंकि एक क्षेत्रांंगुल में ठसाठस भरे हुए अनन्त द्रव्यांगुल देखे जाते हैं।

असंख्यातासंख्यात अवसर्पिणियों और उत्सर्पिणियों के समय शलाकारूप से एक ओर स्थापित करके और दूसरी ओर मिथ्यादृष्टि नारकियों की संख्या स्थापित करके शलाकाराशि में से एक समय कम करना चाहिए और नारक मिथ्यादृष्टि जीवराशि में से एक जीव निकालना चाहिए। इस प्रकार शलाकाराशि और नारकमिथ्यादृष्टि जीवराशि में से पुनः-पुनः एक-एक कम करने पर शलाकाराशि और नरक मिथ्यादृष्टि जीव राशि एक साथ समाप्त हो जाती हैं।

अथवा अवसर्पिणी और उत्सर्पिणी ये दोनों मिलकर एक कल्पकाल होता है। उस कल्पकाल का नारक मिथ्यादृष्टि जीवराशि मेंं भाग देने पर जो भाग लब्ध आवे, उतने कल्पकाल नारक मिथ्यादृष्टि जीवराशि की गणना में पाये जाते हैं।

इस प्रकार कालप्रमाण की अपेक्षा मिथ्यादृष्टि नारकी जीवों की संख्या का प्ररूपण किया गया है।

अन्यत्र ग्रंथे सरल भाषायां उक्तं-

‘‘नरकगतौ प्रथमनरकभूमौ नारका मिथ्यादृष्टयोऽसंख्याता: श्रेणय:।

कोऽर्थ:?
प्रतरा संख्येयभागप्रमिता इत्यर्थ:।
अथ केयं श्रेणिरिति चेत् ?
उच्यते-सप्तरज्जुकमयी मुक्ताफलमालावत् आकाशप्रदेशपंक्ति: श्रेणि रुच्यते, मानविशेष इत्यर्थ:।
प्रतरासंख्येयभागप्रमिता इति यदुक्तं-स प्रतर: कियान् भवति?
श्रेणिगुणिता श्रेणि: प्रतर उच्यते।
प्रतरासंख्यातभागप्रमितानामसंख्यातानां श्रेणीनां यावन्त: प्रदेशा: तावन्त: तत्र नारका: इत्यर्थ:[५]।’’
एवं नारकमिथ्यादृष्टिजीवराशिप्रमाणं निरूपणं जातम्।
अधुना सासादनाद्यसंयतसम्यग्दृष्टिपर्यंतानां नारकाणां संख्याप्रतिपादनार्थं सूत्रावतारो भवति-
सासणसम्माइट्ठिप्पहुडि जाव असंजदसम्माइट्ठि त्ति दव्वपमाणेण केवडिया? ओघं।।१८।।
नरकगतौ नारकाणां सासादनसम्यग्दृष्टि-सम्यङ्मिथ्यादृष्टि-असंयतसम्यग्दृष्टिजीवा: द्रव्यप्रमाणेन कियन्त:? इति प्रश्ने सति ओघं-गुणस्थानप्ररूपणावत् इति उत्तरं वर्तते।
कश्चिदाह-सामान्येन कथितचतुर्गतिसंबंधिसासादनादिगुणस्थानवर्तिजीवराशे: समाना एव नरकगतौ सासादनादिगुणस्थानवर्तिनां राशि: तर्हि तिर्यगादिगतिषु त्रयगुणस्थानवर्तिजीवानां अभावो भवेत्?
आचार्य: प्राह-नैतत्, सासादनादिगुणस्थानवर्तिनारकाणां संख्या चातुर्गतिकजीवानां संख्यां प्रति समाना कथिता तत्र तु पल्योपमस्य असंख्यातभागत्वं प्रति अविशेष एव। तथापि पर्यायार्थिकनयापेक्षया द्वयोर्भेदोऽस्त्येव।
तस्य किंचिदुहारणं दीयते-सामान्येन कथितासंयतसम्यग्दृष्टिजीवराशे: असंख्यातबहुभागप्रमिता देवगतौ असंयतसम्यग्दृष्टिजीवराशि: अस्ति।
कथमेतत्?
देवेषु बहूनां सम्यक्त्वोत्पत्तिकारणानामुपलम्भात्।
देवानां सम्यक्त्वोत्पत्तिकारणानि कानि इति चेत्?
उच्यते श्रीवीरसेनाचार्येण-
‘‘जिणबिंबिद्धिमहिमादंसण-जाइस्सरण-महिद्धिंदादिदंसण-जिणपायमूलधम्मसवणादीणि। तिरिक्खणेरइया पुण गरुवपावभारेणोट्ठद्धत्तादो संकिलिट्ठतरत्तादो मंदबुद्धित्तादो बहूणं सम्मत्तुप्पत्तिकारणाणम-भावादो च सम्माइट्ठिणो थोवा हवंति[६]।’’
एवमेव सर्वत्र ज्ञातव्यमिति।

अब क्षेत्र की अपेक्षा मिथ्यादृष्टि नारकी जीवों का प्रमाण बतलाने हेतु सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

क्षेत्र की अपेक्षा जगत् प्रतर के असंख्यातवें भागमात्र असंख्यात जगत्श्रेणीप्रमाण सामान्य नारक मिथ्यादृष्टि जीवराशि हैं। उन जगत् श्रेणियों की विष्कंभ सूची, सूच्यंगुल के प्रथम वर्गमूल को उसी के द्वितीय वर्गमूल से गुणित करने पर जितना लब्ध आवे, उतनी है ।।१७।।

हिन्दी टीका-क्षेत्र की अपेक्षा कथन करने से जगत्प्रतर के असंख्यातवें भागमात्र असंख्यात जगत्- श्रेणीप्रमाण सामान्य मिथ्यादृष्टि नारकियों की संख्या होती है। सूच्यंगुल के प्रथम वर्गमूल को उसी के द्वितीय वर्गमूल के द्वारा गुणित करने पर जो लब्ध आता है, वही जगच्छ्रेणी की विष्कंभसूची जाननी चाहिए।

पल्य, सागर, सूच्यंगुल, प्रतरांगुल, घनांगुल, जगच्छ्रेणी, लोकप्रतर और लोक ये सभी उपमाप्रमाण के भेद जानना चाहिए।

इस द्रव्यप्रमाणानुगम नामक अनुयोगद्वार के पठन-पाठन में उपमाप्रमाण का अभ्यास करने योग्य ही है।

अन्यत्र ग्रंथ में सरल भाषा में कहा है-

‘‘नरक गति में प्रथम नरक भूमि में मिथ्यादृष्टि नारकियों की असंख्यात श्रेणियाँ हैं।’’ इसका क्या अर्थ है ?

जगत् प्रतर के असंख्यातवें भागप्रमाण उनकी संख्या है, ऐसा अर्थ निकलता है।

प्रश्न-जगत्श्रेणी का क्या अभिप्राय है?
उत्तर-सात राजू वाली मोती की माला के समान आकाशप्रदेश की पंक्ति ‘‘श्रेणी’’ कहलाती है। इसका अभिप्राय मान-प्रमाणविशेष है।

प्रश्न-प्रतर के असंख्यातभाग प्रमाण ऐसा जो कहा गया है,वह प्रतर कितना होता है ?
उत्तर-श्रेणी से गुणित श्रेणी को प्रतर कहते हैं।

प्रतर के असंख्यातभागप्रमाण असंख्यात श्रेणियों के जितने प्रदेश होते हैं, उतने मिथ्यादृष्टि नारकी जीव प्रथम नरक में होते हैं ऐसा अभिप्राय है। इस प्रकार नारकी मिथ्यादृष्टि जीवराशि के प्रमाण का कथन पूर्ण हुआ।

अब सासादन गुणस्थान से लेकर असंयतसम्यग्दृष्टिपर्यन्त नारकियों की संख्या प्रतिपादन करने के लिए सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

सासादनसम्यग्दृष्टि गुणस्थान से लेकर असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थान तक प्रत्येक गुणस्थान में नारकी जीव द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा कितने हैं ? गुणस्थानप्ररूपणा के समान हैं ।।१८।।

हिन्दी टीका-नरकगति में सासादन सम्यग्दृष्टि, सम्यग्मिथ्यादृष्टि, असंयतसम्यग्दृष्टि नारकी जीव द्रव्यप्रमाण से कितने हैं ? ऐसा प्रश्न होने पर गुणस्थान के समान उनकी प्ररूपणा है, ऐसा उत्तर प्राप्त होता है।

यहाँ कोई शंका करता है कि-

सामान्य से कहे गये चारों गतियों से सम्बन्धित सासादनगुणस्थानवर्ती जीवराशि के समान ही नरकगति में सासादन आदि तीनों गुणस्थानवर्ती जीवों की राशि होती है, तब तो तिर्यंचआदि शेष तीन गतियों में तीनों गुणस्थानवर्ती जीवों का अभाव प्राप्त हो जावेगा ?

इस शंका का समाधान करते हुए आचार्यदेव ने कहा है कि-

ऐसा नहीं है,क्योंकि सासादन आदि गुणस्थानवर्ती नारकियों की संख्या चतुर्गति के जीवों की संख्या के प्रति समान कही है, वहाँ तो तीनों गुणस्थानसम्बन्धी जीवराशि के प्रमाण के साथ पल्योपम के असंख्यातवें भागत्व के प्रति कोई विशेषता नहीं है।

इसलिए दोनों को समान मान लेने पर कोई विरोध की बात नहीं आती है फिर भी पर्यायार्थिकनय की अपेक्षा से दोनों में भेद है ही है।

यहाँ उसका किंचित् उदाहरण देते हैं-

सामान्य से कही गई असंयतसम्यग्दृष्टि जीवराशि का असंख्यात बहुभागप्रमाण देवगति में असंयतसम्यग्दृष्टि जीवराशि है।

प्रश्न-ऐसा क्यों है ?
उत्तर-क्योंकि देवों में सम्यक्त्व की उत्पत्ति के बहुत से कारण पाये जाते हैंं। देवों में सम्यक्त्व उत्पत्ति के कौन-कौन से कारण हैं? ऐसा प्रश्न होने पर श्रीवीरसेनाचार्य ने धवला टीका मेें कहा है-

जिनबिम्बसम्बन्धी अतिशय की महिमा का दर्शन, जातिस्मरण का होना, महद्र्धिक इन्द्रादिक का दर्शन और जिनेन्द्रभगवान के पादमूल में धर्म का श्रवण आदि कारणों से देवों में सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति होती है। किन्तु चूंकि तिर्यंच और नारकी गुरुतर पापों के भार से व्याप्त रहते हैं, उनके परिणाम अतिशय संक्लिष्ट रहते हैं, वे मन्दबुद्धि होते हैं इसलिए उनमें सम्यक्त्व की उत्पत्ति के बहुत से कारणों का अभाव पाया जाता है और संख्या में भी वहाँ कम जीवों को सम्यग्दर्शन की प्राप्ति होती है।

इसी प्रकार सर्वत्र जान लेना चाहिए।

विशेषार्थ-

धवला आदि सिद्धान्त गंथों में वर्णन आया है कि देवों में पर्याप्तकमिथ्यादृष्टिदेव अन्तर्मुहूर्त काल से लेकर ऊपर कभी भी प्रथम सम्यक्त्व प्राप्त कर सकते हैं, अन्तर्मुहूर्त से पहले नहीं। इसी प्रकार चारों गतियों में सम्यग्दर्शन उत्पत्ति के विभिन्न कारण बतलाते हुए नरक जैसी हीन पर्याय में भी उन कारणों को बतलाया है कि देवों में पर्याप्तक मिथ्यादृष्टि देव अन्तर्मुहूर्त काल से लेकर ऊपर कभी भी प्रथम सम्यक्त्व प्राप्त कर सकते हैं, अन्तर्मुहूर्त से पहले नहीं प्राप्त कर सकते हैं। जिन कारणोें से देवोें मेें सम्यक्त्व की उत्पत्ति संभव है उन चार कारणोें को तो ऊपर बताया जा चुका है उनमें से देवद्र्धिदर्शन से उत्पन्न होने वाला सम्यक्त्व भी बड़ा महत्वपूर्ण है क्योंकि मिथ्यादृष्टि देवों को जब सौधर्म इन्द्र आदि देवों की महाऋद्धियाँ देखकर यह ज्ञान उत्पन्न होता है कि ये ऋद्धियाँ सम्यग्दर्शन से युक्त संयम पालन करने के फलस्वरूप इन्हें प्राप्त हुई हैं किन्तु मैं सम्यक्त्व रहित द्रव्यसंयम के फल से निम्न जाति का देव हुआ हूँ तब किन्हीं-किन्हीं देवों के सम्यक्त्व प्राप्ति की योग्यता प्रगट हो जाती है और ये बाह्य कारण भी उनके लिए प्रबल निमित्त बन जाते हैं। सम्यक्तव की उत्पत्ति के उपर्युक्त चार कारण भवनवासी, व्यंतरवासी, ज्यातिर्वासी और प्रथम स्वर्ग से लेकर बारहवें स्वर्ग तक के विमानवासी देवों मेें होते हैं। आगे आनत, प्राणत, आरण, अच्युत इन चार स्वर्गों के देवों में देवद्र्धिदर्शन को छोड़कर शेष तीन कारण ही होते हैं। नवग्रैवेयक देवों में जातिस्मरण और धर्मोपदेश दो ही कारण होते हैं तथा उसके ऊपर अनुदिश और अनुत्तर विमानों में तो नियम से सम्यग्दृष्टि ही होते हैं। यहाँ कहने का सार यह है कि देवों में सम्यक्त्व उत्पत्ति के लिए कारण अधिकार मिलते ही रहते हैं यद्यपि नरकों में पाप की बहुलता एवं संक्लिष्ट परिणामों के कारण सम्यक्त्व की उत्पत्ति के कारण बहुत कम मिल पाते हैं फिर भी आगम में सम्यक्त्व के कारण बतलाये गये हैं-अर्थात् नरक में स्थित कितने ही नारकी जीव जातिस्मरण से, कितने ही धर्मोपदेश सुनकर और कितने ही वेदना से अभिभूत होकर सम्यक्त्व को प्रगट कर लेते हैं ।

यहाँ एक प्रश्न हुआ है कि नारकी जीवों में धर्मश्रवण कैसे संभव है क्योंकि वहाँ तो ऋषियों के गमन का अभाव है ? इसका समाधान यह दिया है कि कोई-कोई सम्यग्दृष्टि देव किसी नारकी को अपने पूर्वभव का सम्बन्धी जान लेते हैं और यदि उसको धर्म में लगाना चाहते हैं तो वे वहाँ प्रथम तीन नरकों तक जाकर उन्हें धर्मोपदेश देकर सम्यक्त्व ग्रहण करा देते हैं।

प्रसंगानुसार यहाँ एक शंका यह भी उत्पन्न की गई है कि नरकों में सम्यग्दृष्टि नारकी जीव ही अन्य नारकियों को धर्मश्रवण क्यों नही करा देते हैं? इसका समाधान दिया है कि भव सम्बन्ध से या पूर्व वैर के सम्बन्ध से परस्पर विरोधी नारकी जीवों को अनुगृह्य-अनुग्राहक भाव उत्पन्न होना असंभव है, अर्थात् नारकी परस्पर में एक दूसरे के प्रति उपकार का भाव ही नहीं कर पाते हैं। ऐसा नरकपर्याय एवं नरकधरा का ही प्रभाव होता है। इसी प्रकार धवला ग्रंथ की छठी पुस्तक में चारों गतियों के जीवों में सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति के कारणों का विस्तृत वर्णन है। उसके अनुसार एवं अन्य भी अनेक ग्रंथों के आधार से पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने ‘‘प्रवचन निर्देशिका’’ नामक ग्रंथ में अत्यंत सुन्दर वर्णन किया है जो कि पठनीय है। यहाँ साररूप में यह समझना चाहिए कि सभी जीवों में सम्यक्त्व की उत्पत्ति के लिए बाह्य और अन्तरंग ये दो कारण पाये जाते हैं। जैसाकि श्रीकुन्दकुन्ददेव ने कहा है-

सम्मत्तस्स णिमित्तं, जिणसुत्तं तस्स जाणया पुरिसा।

अंतरहेऊ भणिदा, दंसणमोहस्स खयपहुदी ।।

अर्थात् जिनसूत्र और उसके जानने वाले पुरुष (महर्षि) सम्यक्त्व के लिए बाह्य निमित्त हैं एवं दर्शनमोहनीय कर्म का क्षय, क्षयोपशम आदि अन्तरंग हेतु है।

द्वादशांग या उसके अंशरूप सूत्र तथा उन सूत्रों के जानने वाले महर्षिगण-आचार्य, उपाध्याय, साधु ये तो बाह्य हेतु हैं एवं दर्शनमोहनीय का क्षय आदि अन्तरंग हेतु है। इस गाथा से यह स्पष्ट है कि परम आध्यात्मिक महर्षि श्रीकुन्दकुन्ददेव भी सम्यक्त्व उत्पत्ति के लिए निमित्तों को स्वीकार करते हैं क्योेेंकि इन अन्तरंग-बहिरंग निमित्तों के बिना सम्यक्त्व असंभव है।

युक्ति से भी इस बात को अच्छी तरह समझा जा सकता है। देखो! बाह्य वातावरण-जलवायु आदि का अंतरंग पर कितना प्रभाव पड़ता है! स्वच्छ जल, वायु, औषधि आदि से स्वास्थ्य लाभ होता है और गन्दे जल,वायु या अपथ्यसेवन आदि से मलेरिया, हैजा आदि अनेकों रोगों के प्रकोप उत्पन्न हो जाते हैं। फूलों के बगीचे में प्रवेश करने से बिना इच्छा के भी फूलों की सुगन्धि नाक में प्रवेश कर जाती है तथा मिट्टी के तेल, पेट्रोल अािद की दुर्गन्धि से प्रायः बहुत से लोगों को वमन तक हो जाता है।

इष्ट वस्तु के वियोग आदि से चिंता होकर मन मेें क्षोभ बना रहता है, प्रिय वस्तु के संयोग से हृदय आनंदविभोर हो जाता है । अचेतन वस्तुएं अचेतन पर भी अपना विशेष प्रभाव डाल देती हैं। चुम्बक लोहे को अपनी ओर खींच लेता है। विष मारणशक्ति को रखते हुए भी कुछ उचित वस्तुओं के मिश्रण से रसायन बन जाता है। जब ऐसे-ऐसे अगणित उदाहरण लोक व्यवहार में देखे जाते हैं तब पुनः जिनबिम्बदर्शन आदि बाह्य कारण अन्तरंग के दर्शनमोह आदि के उपशम मेें निमित्त बन जावें, इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है।

इस प्रसंग में एक विशेष बात यह बताई है कि चारों गतियों में सम्यक्त्वोत्पत्ति के जो अनेक कारण बताये हैं, उनमें ‘‘जिनबिम्बदर्शन’’ को सर्वाधिक महत्व दिया है कि जिनबिम्बदर्शन कभी भी निरर्थक नहीं हो सकता है। इससे कदाचित् सम्यक्त्व की उत्पत्ति नहीं भी हुई तो भी अनंत-अनंत जन्म के संचित पापकर्म- समूह का नाश होकर महान पुण्यकर्म का संचय होना पाया ही जाता है। कहा भी है-

अनंतानंत संसार-संततिच्छेद कारणम् ।

जिनराज पदाम्भोज, स्मरणं शरणं मम ।।
एकापि समर्थेयं, जिनभक्तिर्दुर्गतिं निवारयितुम्।
पुण्यानि च पूरयितुं, दातुं मुक्तिश्रियं कृतिनः ।।

अर्थात् जिनेन्द्रदेव के चरणों का स्मरण अनंत-अनंत संसार की परम्परा को समाप्त करने में समर्थ है, वही मेरे लिए शरण है।

यह एक जिनभक्ति ही विद्वानों के दुर्गति निवारण करने में समर्थ है तथा पुण्य को परिपूर्ण करने और मुक्तिलक्ष्मी को देने में समर्थ है।

ऐसे ही अन्य जो भी कारण हैं वे दर्शनमोह आदि के उपशम में निमित्त बन जाते हैं । यहाँ विशेष ज्ञातव्य है कि आजकल इस पंचमकाल में उपशम और क्षयोपशम ये दो ही सम्यक्त्व होते हैं, क्षायिक सम्यक्त्व नहीं होता है, क्योंकि इस काल में केवली या श्रुतकेवली का पादमूल नहीं प्राप्त है।

अधुना प्रथमपृथिवीगतनारकप्रमाणनिरूपणार्थं सूत्रमवतरति-

एवं पढमाए पुढवीए णेरइयाणं।।१९।।

एवं-सामान्येन कथितनारकाणां द्रव्यप्रमाणेन समानम् प्रथमपृथिव्यां नारकाणां द्रव्यप्रमाणमस्ति।
कथमेतत्, एवं मन्यमाने तु द्वितीयादिपृथिवीगतनारकाणामेवाभावो भविष्यति?
नैष दोष:, सामान्यकथनमेत् किन्तु विशेषापेक्षया कथ्यते-
प्रथमपृथिवीगतनारकाणां द्रव्यकालप्रमाणयो: भण्यमानयो: ओघद्रव्यकालप्रमाणे चैव असंख्यातभागहीने भवत:। तत्र क्षेत्रप्रमाणमपि ओघक्षेत्रप्रमाणात् असंख्यातभागन्यूनं भवति[७]
एवं प्रथमपृथिव्यां मिथ्यादृष्ट्याद्यसंयतसम्यग्दृष्टिनारकाणां द्रव्यकालक्षेत्रप्रमाणै: संख्यानिरूपणपरत्वेन प्रथमस्थले सूत्रपंचकं समाप्तम्।
संप्रति द्वितीयादिपृथिवीषु मिथ्यादृष्टिनारकाणां संख्याप्रतिपादनाय सूत्रावतारो भवति-
विदियादि जाव सत्तमाए पुढवीए णेरइएसु मिच्छाइट्ठी दव्वपमाणेण केवडिया? असंखेज्जा।।२०।।
पूर्ववत्सुगममेतत्सूत्रं।
अन्यत्रापि उच्यते-‘‘द्वितीयनरकभूम्यादिषु सप्तमीभूमिर्यावत् मिथ्यादृष्टयो नारका: श्रेण्यसंख्येय-भागप्रमिता:। स चासंख्येयभाग: असंख्येययोजनकोटिकोट्य:[८]।’’
कालापेक्षया द्वितीयादिपृथिवीनारकाणां प्रमाणनिरूपणाय सूत्रावतारो भवति-
असंखेज्जासंखेज्जाहि ओसप्पिणि-उस्सप्पिणीहि अवहिरंति कालेण।।२१।।
कालप्रमाणापेक्षया द्वितीयपृथिवीत: सप्तमीपृथिवीपर्यंता: प्रत्येकपृथिवीगतनारका: मिथ्यादृष्टिजीवा: असंख्यातासंख्यातावसर्पिणी-उत्सर्पिणीभ्यां अपहृता भवन्ति।
एता: द्रव्यकालप्रमाणप्ररूपणा: स्थूला:, श्रोत¸णां निर्णयानुत्पादनत्वात्। द्रव्यप्ररूपणात: कालप्ररूपणा सूक्ष्मा, असंख्यातासंख्यातसंख्याविशिष्टद्रव्यनिरूपणात्।
अधुना द्रव्यकालप्ररूपणात: सूक्ष्मं क्षेत्रप्रमाणनिरूपणाय सूत्रावतारो भवति-
खेत्तेण सेढीए असंखेज्जदिभागो। तिस्से सेढीए आयामो असंखेज्जाओ जोयण-कोडीओ पढमादियाणं सेढिवग्गमूलाणं संखेज्जाणं अण्णोण्णब्भासो।।२२।।
खेत्तेण-क्षेत्रापेक्षया द्वितीयादिषट्पृथिवीषु प्रत्येकं पृथिवीणां नारकमिथ्यादृष्टिजीवा जगच्छ्रेण्य-संख्यातभागप्रमाणा: सन्ति। तस्या जगच्छ्रेण्या: असंख्यातभागस्य या श्रेणि: तस्या आयामोऽसंख्यात-योजनकोटय:। तस्यासंख्यातकोटियोजनस्य प्रमाणं, जगच्छ्रेण्या: संख्यातानां प्रथमादिवर्गमूलानां परस्परगुणिते सति यावत्प्रमाणमुपलभ्यते तावत्प्रमाणं ज्ञातव्यम्।
संप्रति सासादनाद्यसंयतसम्यग्दृष्टीनां संख्यानिर्धारणार्थं सूत्रमवतरति-
सासणसम्माइट्ठिप्पहुडि जाव असंजदसम्माइट्ठि त्ति ओघं।।२३।।
सासादनसम्यग्दृष्टिसम्यङ्मिथ्यादृष्टि-असंयतसम्यग्दृष्टिजीवानां संख्याद्वितीयादिषट्पृथिवीषु गुणस्थानवत् ज्ञातव्या। अत्रापि पल्योपमस्यासंख्यातभागत्वं प्रति विशेषाभावात् ओघवत् प्ररूपणा कृता द्रव्यार्थिकनयापेक्षि-शिष्यानुग्रहार्थं, किन्तु पर्यायार्थिकनयावलम्बिशिष्यापेक्षया अस्ति विशेष:। स एवोच्यते-
‘‘नारकजीवराशे: असंख्यातखण्डेषु कृतेषु तत्र बहुखण्डभागा: प्रथमपृथिवीगतमिथ्यादृष्टय: सन्ति। शेषैकभागस्य असंख्यातखण्डेषु कृतेषु तत्र बहुखंडभागा द्वितीयपृथ्वीमिथ्यादृष्टियो भवन्ति। एवं तृतीयचतुर्थ-पंचमषष्ठसप्तमपृथिवीनां मिथ्यादृष्टि नारकाणां अव्यामोहेन भागाभागः कर्तव्यः। पुनः सप्तमपृथिवीमिथ्यादृष्टि-नारकाणामनंतरं शेषस्यैकभागस्य असंख्यातेषु भागेषु कृतेषु तत्र बहुभागा: प्रथमपृथिव्या: असंयतसम्यग्दृष्टयो भवन्ति। शेषैकभागस्य असंख्यातेषु भागेषु कृतेषु तत्र बहुभागा: प्रथमपृथिवीसम्यङ्मिथ्यादृष्टयो भवन्ति। शेषस्य संख्यातेषु भागेषु कृतेषु तत्र बहुभागा: प्रथमपृथिवीसासादनसम्यग्दृष्टयो भवन्ति। शेषैकभागस्य असंख्यातेषु भागेषु कृतेषु तत्र बहुभागा द्वितीयपृथिवी-असंयतसम्यग्दृष्टयो भवन्ति। शेषस्यैकभागस्य असंख्यातेषु भागेषु कृतेषु तत्र बहुभागा: तत्रतनसम्यङ्मिथ्यादृष्टयो भवन्ति। शेषस्यैकभागस्य संख्यातेषु भागेषु कृतेषु तत्र बहुभागा: तत्रतनसासादनसम्यग्दृष्ट्यो भवन्ति। एवं तृतीयादिपृथ्वीत: सप्तमपृथिवीपर्यंतं गुणस्थान-प्रतिपन्ननारकाणां भागाभाग: कर्तव्य:[९]।’’
इत्थं द्वितीयादि सप्तमपृथिवीपर्यंतनारकाणां गुणस्थानापेक्षया प्रमाणनिरूपणपरत्वेन द्वितीयस्थले चत्वारि सूत्राणि गतानि।
एवं स्थलद्वयेन नवभि: सूत्रै: नारकसंख्याप्ररूपक: प्रथमोऽन्तराधिकार: समाप्त:।

अब प्रथम नरक में उत्पन्न होने वाले नारकियों के प्रमाण का निरूपण करने हेतु सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

सामान्य नारकियों के द्रव्यप्रमाण के समान पहली पृथिवी में नारकियों का द्रव्यप्रमाण है ।।१९।।

हिन्दी टीका-सामान्य से कथित नारकी जीवों के द्रव्यप्रमाण के समान पहली पृथिवी में नारकियों का द्रव्यप्रमाण है।

प्रश्न-ऐसा क्यों है, क्योंकि ऐसा मानने पर तो द्वितीय आदि पृथिवी में जीवों का अभाव प्राप्त हो जाएगा?

उत्तर-यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि यह सामान्य कथन है किन्तु विशेष की अपेक्षा कथन किया जा रहा है-

प्रथम पृथिवी के नारकियों के द्रव्य और काल की अपेक्षा प्रमाण का कथन करने पर सामान्य से कहे गये द्रव्यप्रमाण और कालप्रमाण को असंख्यातवें भाग न्यून कर देने पर पहली पृथिवी के नारकियों का द्रव्य और काल की अपेक्षा प्रमाण प्राप्त होता है।

इस प्रकार प्रथम पृथिवी में मिथ्यादृष्टि से लेकर असंयतसम्यग्दृष्टि तक नारकियों के द्रव्य, काल और क्षेत्र प्रमाणों के द्वारा संख्यानिरूपण की मुख्यता से प्रथम स्थल में पांच सूत्र समाप्त हुए ।

अब द्वितीयादि नरक पृथिवियों से लेकर सातवीं पृथिवी तक के मिथ्यादृष्टि नारकियों की संख्या का प्रतिपादन करने के लिए सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

दूसरी पृथिवी से लेकर सातवीं पृथिवी तक प्रत्येक पृथिवी में नारकियों में मिथ्यादृष्टि जीव द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा कितने हैं? असंख्यात हैं।।२०।।

यह सूत्र पूर्ववत् ही सुगम है।

अन्यत्र भी कहा है-द्वितीय नरकभूमि आदि से लेकर सातवीं भूमि तक श्रेणी के असंख्यात भागप्रमाण मिथ्यादृष्टि नारकी हैं। वह संख्या असंख्यात कोड़ाकोड़ी योजन के असंख्यातवें भागप्रमाण है।

अब काल की अपेक्षा द्वितीय आदि पृथिवी के नारकियों का प्रमाणनिरूपण करने हेतु सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

कालप्रमाण की अपेक्षा दूसरी पृथिवी से लेकर सातवीं पृथिवी तक प्रत्येक पृथिवी के नारक मिथ्यादृृष्टि जीव असंख्यातासंख्यात अवसर्पिणियों और उत्सर्पिणियों के द्वारा अपहृत होते हैं ।।२१।।

हिन्दी टीका-दूसरी नरक पृथिवी से लेकर सातवें नरक तक प्रत्येक नरक के मिथ्यादृष्टि नारकी जीव कालप्रमाण की अपेक्षा असंख्यातासंख्यात अवसर्पिणियों और उत्सर्पिणियों के द्वारा अपहृत होते हैं।

ये द्रव्य और कालप्रमाण की अपेक्षा प्ररूपणाएं सभी स्थूलरूप से कही गई हैं, क्योंकि श्रोताओं को इस प्ररूपणा से निर्णय नहीं हो सकता है।

द्रव्यप्ररूपणा से भी कालप्ररूपणा सूक्ष्म है, क्योंकि कालप्ररूपणा के द्वारा असंख्यातासंख्यात संख्या से विशिष्ट द्रव्य का प्ररूपण किया गया है।

अब द्रव्य और काल इन दोनों ही प्ररूपणाओं से सूक्ष्म क्षेत्रप्रमाण का प्ररूपण करने के लिए आगे का सूत्र कहते हैं-

सूत्रार्थ-

क्षेत्र की अपेक्षा द्वितीयादि छह पृथिवियों में प्रत्येक पृथिवी के मिथ्यादृष्टि नारकी जीव जगत्श्रेणी के असंख्यातवें भागप्रमाण हैं। उस जगत्श्रेणी के असंख्यातवें भाग की जो श्रेणी है, उसका आयाम असंख्यातकोटि योजन है, जिस असंख्यातकोटि योजन का प्रमाण, जगत्श्रेणी के संख्यात प्रथमादि वर्गमूलों के परस्पर गुणा करने से जितना प्रमाण उत्पन्न हो,उतना है ।।२२।।

हिन्दी टीका-द्वितीय आदिक छह पृथिवियों में प्रत्येक पृथिवी के मिथ्यादृष्टि जीव क्षेत्र की अपेक्षा जगत्श्रेणी के असंख्यातवें भागप्रमाण हैं। उस जगत्श्रेणी के असंख्यातवें भाग की जो श्रेणी है , उसकीr लम्बाई असंख्यात करोड़ योजन है। उस असंख्यात करोड़ योजन का प्रमाण, जगत्श्रेणी के संख्यात प्रथमादि वर्गमूलों को परस्पर में गुणित करने पर जितना प्रमाण उत्पन्न हो, उतना प्रमाण जानना चाहिए ।

विशेषार्थ-

यहाँ सूत्र में जो नारकी मिथ्यादृष्टि जीवों का प्रमाण असंख्यात कहा है, परन्तु वह असंख्यात पल्य, सागर, अंगुल, जगत्श्रेणी, जगत्प्रतर और लोक आदि के भेद से अनेक प्रकार का है इसलिए इनमें से यहाँ असंख्यात लिया गया है,यह कुछ नहीं जाना जाता है अतः जगत्श्रेणी और जगत्प्रतर आदि उपरिम संख्या का निवारण करने के लिए ‘‘द्वितीयादि छह पृथिवियों के मिथ्यादृष्टि नारकी जगत्श्रेणी के असंख्यातवें भाग हैं ’’ ऐसा कहा है। जगत्श्रेणी का असंख्यातवां भाग भी पल्य, सागर, कल्प और अंगुल आदि के भेद से अनेक प्रकार का है, इसलिए सूच्यंगुल आदि अधस्तन विकल्पों का निषेध करने के लिए ‘‘उस श्रेणी का आयाम असंख्यातकोटि योजन है यह कहा है।

धवला टीका के अनुसार यहाँ किंचित् स्पष्टीकरण और किया जा रहा है कि सूत्र मेें ‘‘सेढीए असंखेज्जदिभागो’’ यह पुाल्लंग निर्देश है और ‘‘तिस्से’’ यह स्त्रीलिंग निर्देश है। अतः इन दोनों पदों का समान अधिकरण नहीं है इसलिए सूत्र में असंबद्धता प्रगट हो रही है किन्तु श्रीवीरसेनस्वामी ने स्वयं कहा है कि यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि यहाँ पर ‘तिस्से सेढीए’ इस पद का श्रेणी के असंख्यातवें भाग का आयाम अथवा जगत्श्रेणी का आयाम यह अर्थ नहीं करना चाहिए, क्योंकि एक तो भिन्नाधिकरण है और दूसरे विशेषण की कोई सार्थकता नहीं रहती है किंतु प्रकृत में ‘जगत्श्रेणी के असंख्यातवें भाग की जो श्रेणी अर्थात् पंक्ति है, उस श्रेणी का आयाम’ ऐसा अर्थ करना चाहिये। असंख्यात कोटि योजन भी प्रतरांगुल और घनांगुल आदि के भेद से असंख्यात प्रकार का है, इसलिए जगत्श्रेणी के प्रथम वर्गमूल, द्वितीय वर्गमूल आदि नीचे की संख्या का प्रतिषेध करने के लिए सूत्र में ‘जगत्श्रेणी के प्रथमादि संख्यात वर्गमूलों के परस्पर गुणा करने से’ इतना पद कहा है। उनमें से यहाँ जगत्श्रेणी के प्रथम वर्गमूल से लेकर नीचे के बारह वर्गमूलों के परस्पर गुणा करने से जितनी संख्या उत्पन्न हो, उतना दूसरी पृथिवी के नारक मिथ्यादृष्टि राशि का प्रमाण है तथा जगत्श्रेणी के उसी पहले वर्गमूल से लेकर दश वर्गमूलों के परस्पर गुणा करने पर तीसरी पृथिवी के नारक मिथ्यादृष्टि द्रव्य का प्रमाण होता है तथा जगत्श्रेणी के उसी प्रथम वर्गमूल से लेकर आठ वर्गमूलों के परस्पर गुणा करने पर जो राशि आवे, उतना चौथी पृथिवी के नारक मिथ्यादृष्टि द्रव्य का प्रमाण है तथा जगत्श्रेणी के प्रथमादि छह वर्गमूलों के परस्पर गुणा करने से जो राशि उत्पन्न हो, उतना छठी पृथिवी के मिथ्यादृष्टि द्रव्य का प्रमाण है तथा पहले और दूसरे वर्गमूल के परस्पर गुणा करने से जो राशि उत्पन्न हो, उतना सातवीं पृथिवी के मिथ्यादृष्टि द्रव्य का प्रमाण है।

शंका-इतने-इतने वर्गमूल के परस्पर गुणा करने पर द्वितीयादि पृथिवी के मथ्यादृष्टि द्रव्य का प्रमाण होता है, यह कैसे जाना जाता है ?

समाधान-आचार्य परम्परा से आए हुए अविरुद्ध उपदेश से जाना जाता है कि इतने-इतने वर्गमूलों के परस्पर गुणा करने पर द्वितीयादि पृथिवियों के मिथ्यादृष्टि द्रव्य का प्रमाण होता है। अथवा-

नारकियों के द्वितीयादि पृथिवियों का द्रव्य लाने के लिए जगत्श्रेणी का बारहवां, दशवां, आठवां, छठा, तीसरा, और दूसरा वर्गमूल अवहारकाल है और वेदों में सानत्कुमार आदि पाँच कल्पयुगलों का द्रव्य लाने के लिए जगत्श्रेणी का ग्यारहवाँ, नौवाँ, सातवां, पांचवां और चौथा वर्गमूल अवहारकाल है।

इन अवहार कालों के प्ररूपण करने वाले इस गाथासूत्र से जाना जाता है। अथवा, परिकर्म के वचन से जाना जाता है कि जगत्श्रेणी के प्रथमादि इतने-इतने वर्गमूलों के परस्पर गुणा करने से द्वितीयादि पृथिवियों का द्रव्य आता है।

एक वर्गात्मक राशि के प्रथम आदि जितने वर्गमूल होंगे, उनमें से जिस वर्गमूल का उक्त वर्गात्मक राशि में भाग देने से जो लब्ध आएगा, वह जिस वर्गमूल का भाग दिया उस वर्गमूल तक प्रथमादि वर्गमूलों के परस्पर गुणा करने से जो राशि उत्पन्न होगी, उतना ही होेगा। उदाहरणार्थ ६५५३६ में उसके चौथे वर्गमूल २ का भाग देने से ३२७६८ लब्ध आाते हैं। अब यदि प्रथमादि चार वर्गमूलों का परस्पर गुणा किया, तो भी ३२७६८ प्रमाण ही राशि उत्पन्न होगी। ६५५३६ पहला वर्गमूल २५६, दूसरा १६, तीसरा ४ और चौथा २ है। अब इनके परस्पर गुणा करने से २५६²१६²४²२·३२७६८ ही आते हैं। पर नरकों में जो अंकसंदृष्टि की अपेक्षा राशियां बतलाई हैं, उनके निकालने में कल्पित वर्गमूल लिए गए हैं, इसलिए ही वहाँ यह नियम नहीं घटाया जा सकता है।

अब इन पृथिवियों के द्रव्य के महत्त्व का ज्ञान कराने के लिए किंचित् अर्थप्ररूपणा करते हैं। वह इस प्रकार है-उसमें भी पहले दूसरी पृथिवी के मिथ्यादृष्टि द्रव्य को तीसरी पृथिवी के मिथ्यादृष्टि द्रव्य प्रमाण से उत्पन्न करते हैं-जगत्श्रेणी के बारहवें वर्गमूल से जगत्श्रेणी के ग्यारहवें वर्गमूल को गुणित करके जो लब्ध आवे, उससे तीसरी पृथिवी के मिथ्यादृष्टि द्रव्य के गुणित करने पर दूसरी पृथिवी के मिथ्यादृष्टि द्रव्य का प्रमाण होता है। अथवा उक्त गुणकार के(बारहवें वर्गमूल से ग्यारहवें वर्गमूल को गुणा करने से जो लब्ध आया, उसके) जितने अर्धच्छेद हों, उतनी बार तीसरी पृथिवी के मिथ्यादृष्टि द्रव्य के द्विगुणित करने पर भी दूसरी पृथिवी के मिथ्यादृष्टि द्रव्य का प्रमाण होता है। अथवा, उक्त गुणकार की अर्धच्छेद शलाकाओं का विरलन करके और उनको दो रूप करके परस्पर गुणा करने से जो राशि उत्पन्न हो, उससे तीसरी पृथिवी के मिथ्यादृष्टि द्रव्य के गुणित कर देने पर भी दूसरी पृथिवी के मिथ्यादृष्टि द्रव्य का प्रमाण होता है। यहाँ जिस प्रकार उक्त तीन प्रकार से तीसरी पृथिवी के द्रव्य से दूसरी पृथिवी का द्रव्य उत्पन्न किया है, उसी प्रकार चौथी आदि शेष चार पृथिवियों के द्रव्य से उक्त तीन-तीन प्रकार से दूसरी पृथिवी का द्रव्य उत्पन्न कर लेना चाहिए। इस प्रकार उत्पन्न करने पर पन्द्रह भंग प्राप्त होते हैं।

चौथी पृथिवी की अपेक्षा दूसरी पृथिवी का द्रव्य उत्पन्न करते समय जगत्श्रेणी के नौवें वर्गमूल से बारहवें वर्गमूल तक चार वर्गमूलों के परस्पर गुणा करने से जो राशि उत्पन्न हो, उससे चौथी पृथिवी के द्रव्य को गुणित करने पर दूसरी पृथिवी का द्रव्य आता है। पांचवीं पृथिवी की अपेक्षा जगत्श्रेणी के सातवें वर्गमूल से लेकर बारहवें वर्गमूल तक छह वर्गमूलों के परस्पर गुणा करने से जो राशि उत्पन्न हो, उससे पांचवीं पृथिवी के द्रव्य को गुणित करने पर दूसरी पृथिवी का द्रव्य आता है। छठी पृथिवी की अपेक्षा जगत्श्रेणी के चौथे वर्गमूल से लेकर बारहवें वर्गमूल तक नौ वर्गमूलों के परस्पर गुणा करने से जो राशि उत्पन्न हो, उससे छठी पृथिवी के द्रव्य को गुणित करने पर दूसरी पृथिवी का द्रव्य आता है। सातवीं पृथिवी की अपेक्षा जगत्श्रेणी के तीसरे वर्गमूल से लेकर बारहवें वर्गमूल तक दश वर्गमूलों के परस्पर गुणा करने से जो राशि उत्पन्न हो, उससे सातवीं पृथिवी के द्रव्य के गुणित करने पर दूसरी पृथिवी का द्रव्य आता है। गुणाकार राशि के अर्धच्छेदों का विरलनादि करते समय भी जहाँ जितने वर्गमूलों का परस्पर गुणा करके जो राशि लाई गई हो, उसी राशि के अर्धच्छेदों का विरलन करके और उस विरलित राशि को दो रूप करके परस्पर गुणा करने से जो लब्ध आवे, उससे उस-उस पृथिवी के द्रव्य को गुणित करना चाहिए। अथवा, इसी क्रम से अर्धच्छेद लाकर उतनी बार उस-उस पृथिवी के द्रव्य को द्विगुणित करना चाहिए। इस प्रकार करने से दूसरी पृथिवी के द्रव्य का प्रमाण आता है।

अब पहली पृथिवी के मिथ्यादृष्टि द्रव्य से दूसरी पृथिवी के मिथ्यादृष्टि द्रव्य के उत्पन्न करने की विधि बतलाते हैं-पहली पृथिवी की मिथ्यादृष्टि विष्कंभ सूची से जगत्श्रेणी के बारहवें वर्गमूल को गुणित करके जो लब्ध आवे, उससे पहली पृथिवी के मिथ्यादृष्टि द्रव्य के भाजित करने पर दूसरी पृथिवी का मिथ्यादृष्टि द्रव्य आता है।

उदाहरण- द्वि.पृ.मि.द्र.

उक्त भागहार के जितने अर्धच्छेद हों, उतनी बार भाज्यमान राशि प्रथम पृथिवी के द्रव्य के अर्धच्छेद करने पर भी दूसरी पृथिवी के मिथ्यादृष्टि द्रव्य का प्रमाण आता है ।

अथवा, जगत्श्रेणी के बारहवें वर्गमूल के अर्धच्छेदों में पहली पृथिवी की मिथ्यादृष्टि विष्कंभसूची के अर्धच्छेद मिला देने पर जितना योग हो, उतनी राशि का विरलन करके और उसे दो रूप करके परस्पर गुणा करने से जो राशि उत्पन्न हो, उससे पहली पृथिवी के मिथ्यादृष्टि द्रव्य के भाजित करने पर दूसरी पृथिवी के मिथ्यादृष्टि द्रव्य का प्रमाण आता है। इन तीन भंगों को पूर्वोक्त भंगों में मिला देने पर दूसरी पृथिवी के अठारह भंग होते हैं। इसी प्रकार सभी पृथिवियों में प्रत्येक पृथिवी के अठारह-अठारह भंग उत्पन्न कर लेना चाहिए। इन सब भंगों का जोड़ एक सौ छब्बीस होता है।

अब सासादन गुणस्थान से लेकर असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थानपर्यन्त नारकी जीवों की संख्या निरूपण करने के लिए सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

सासादनसम्यग्दृष्टि गुणस्थान से लेकर असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थान तक प्रत्येक गुणस्थान में द्वितीय आदि छह पृथिवियों में से प्रत्येक पृथिवी के नारकी जीव सामान्य प्ररूपणा के समान पल्योपम के असंख्यातवें भाग हैं ।।२३।।

हिन्दी टीका-सासादन सम्यग्दृष्टि, सम्यग्मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि जीवों की संख्या द्वितीयादि छह नरक पृथिवियों में अपने-अपने गुणस्थान के समान जानना चाहिए। यहाँ भी पल्योपम के असंख्यातवें भागप्रमाण के प्रति विशेषता का अभाव होने से सभी प्ररूपणाएं गुणस्थान के समान ही बताई गई हैं, यह कथन द्रव्यार्थिकनय की अपेक्षा रखने वाले शिष्यों पर अनुग्रह करने की दृष्टि से है किन्तु पर्यायार्थिक नय का अवलम्बन लेने वाले शिष्यों की अपेक्षा उस कथन में कुछ विशेषता है, उसे कहते हैं-

‘‘सभी नरकों की नारकी जीवराशि के असंख्यात खंड करने पर उनमें से बहुखण्डभाग संख्या प्रथम पृथिवी के मिथ्यादृष्टि नारकियों की है। उनमें अवशेष बचे एक भाग के असंख्यात खण्ड करने पर उनमें से बहुखंडभाग संख्या द्वितीय पृथिवी के मिथ्यादृष्टि नारकियों की है। इसी प्रकार तीसरी, चौथी, पांचवी, छठी और सातवीं पृथिवी की जीवराशि का सावधानीपूर्वक (व्यामोहरहित होकर) भागाभाग कर लेना चाहिए पुनः सातवीं पृथिवी के मिथ्यादृष्टियों के अनन्तर जो एकभाग शेष रहे, उसके असंख्यात भाग करने पर उनमें से बहुभागप्रमाण पहली प ृथिवी के असंयतसम्यग्दृष्टि जीव होते हैं। शेष एक भाग के असंख्यात खण्ड करने पर उनमें से बहुभागप्रमाण पहली पृथिवी के सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीव होते हैं। शेष एक भाग के संख्यात भाग करने पर उनमें से बहुभागप्रमाण प्रथम पृथिवी के सासादन सम्यग्दृष्टि जीव होते हैं। शेष एक भाग के असंख्यात भाग करने पर उसमें बहुभाग द्वितीय पृथिवी के असंयतसम्यग्दृष्टि होेते हैं। शेष एक भाग के असंख्यात भाग करने पर उनमें से बहुभागप्रमाण दूसरी पृथिवी के सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीव होते हैं। शेष एक भाग के संख्यात भाग करने पर उनमें से बहुभागप्रमाण दूसरी पृथिवी के सासादनसम्यदृष्टि जीव होते हैं। इसी प्रकार तीसरी पृथिवी से लेकर सातवीं पृथिवी तक गुणस्थानप्रतिपन्न जीवों का भागाभाग करना चाहिए।

इस प्रकार द्वितीय पृथिवी से लेकर सातवीं पृथिवी तक के नारकी जीवोें का गुणस्थान की अपेक्षा प्रमाण निरूपण की मुख्यता से द्वितीय स्थल में चार सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार दो स्थलों में नौ सूत्रों के द्वारा नारकियों की संख्या का प्ररूपण करने वाला प्रथम अन्तराधिकार समाप्त हुआ।


टिप्पणी

  1. षट्खण्डागम पु. ३ (धवला टीका समन्वित) पृ. १२२।
  2. षट्खण्डागम पु. ३ (धवला टीका समन्वित) पृ. १२२।
  3. षट्खण्डागम पु. ३ (धवला टीका समन्वित) पृ. १२२।
  4. षट्खण्डागम पु. १ (धवला टीका समन्वित) पृ. १३०।
  5. तत्त्वार्थवृत्ति अ. १, सूत्र ८ के अंतर्गत।
  6. षट्खण्डागम पु. ३ (धवला टीका समन्वित) पृ. १५७।
  7. षट्खण्डागम पु.३ (धवला टीका समन्वित) पृ. १६२।
  8. तत्त्वार्थवृत्ति, अ. १, सूत्र ८।
  9. षट्खण्डागम पु. ३ (धवला टीका समन्वित) पृ. २०७-२०८।