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०२. मूलगुण-उत्तरगुण

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२. मूलगुण-उत्तरगुण

साधु के उत्तरगुण

मुनियों के बारह तप और बाईस परीषहजय ऐसे ये १२±२२·३४ उत्तरगुण होते हैं।

अट्ठाईस मूलगुण तो आचार्य, उपाध्याय और साधु इन तीनों में पाये ही जाते हैं। इनके बिना वे दिगम्बर मुनि हो ही नहीं सकते हैं। अनन्तर आचार्य पद और उपाध्याय पद की दीक्षा में उनके गुण होना चाहिए। किन्तु ये ३४ उत्तरगुण इन तीनों में से किसी में भी पाये जा सकते हैं।

बारह तप - जो कर्म निर्जरा हेतु तपा जाता है, वह तप है। उसके दो भेद हैं-बाह्य और अभ्यन्तर। इन दोनों के भी छह-छह भेद होने से बारह भेद हो जाते हैं। बाह्य तप के छह भेद-अनशन, अवमोदर्य, रसपरित्याग, वृत्तिपरिसंख्यान, कायक्लेश और विविक्तशयनासन।

१. अनशन - चतुराहार का त्याग अनशन कहलाता है। इसके दो भेद हैं-इत्तिरिय और यावज्जीवन। इत्तिरिय को साकांक्ष-सापेक्ष या सावधि भी कहते हैं और यावज्जीवन अनशन को निराकांक्ष-निरपेक्ष या निरवधि भी कहते हैं।

एक दिन में भोजन की दो बेला मानी है। उसमें से एक बेला के भोजन का त्याग करके एक एक बार भोजन करना एकभक्त है। उपवास के पहले दिन और अगले दिन एकभुक्ति करके एक-एक भक्त का त्याग करना तथा बीच के दिन दोनों भोजन का त्याग करना, इस प्रकार चार भक्त के त्याग के चतुर्थ-उपवास हैं। ऐसे ही दो दिन उपवास और अगले दिन एक-एक भक्त का त्याग इसे षष्ठ-बेला कहते हैं।

ऐसे ही एक, दो, तीन, चार, पाँच उपवास अथवा पक्षोपवास मासोपवास आदि रूप से उपवास के अनेक भेद हैं तथा कनकावली, एकावली, विमानपंक्ति, सिंहनिष्क्रीडित आदि अनेक प्रकार तपों का अनुष्ठान करना। छह महीने तक के उपवास को उत्क्ृष्ट अनशनतप कहते हैं। इनमें ‘‘इतने काल तक मैं आहार का त्याग करूँगा’’ ऐसी काल की अपेक्षा होने से साकांक्ष तप है। इस तपोविधि को ‘सिद्धिप्रासादव्रत’ कहते हैं, क्योंकि ऐसी तपोविधि से सिद्धि-मुक्तिरूपी-राजमहल की प्राप्ति होती है।

सल्लेखना के समय जीवनपर्यन्त के लिए जो आहार का त्याग किया जाता है, वह निराकांक्ष अनशन है। इसके भक्त प्रतिज्ञा१, इंगिनी और प्रायोपगमन ये तीन भेद हैं और भी इसी प्रकार के उपवास को निराकांक्ष तप कहते हैं।

२. अवमोदर्यतप - पुरुषों का आहार बत्तीस कवल प्रमाण है और स्त्रियों का अट्ठाईस कवलमात्र है। अर्थात् एक हजार चावल२ का एक कवल होता है, ऐसे बत्तीस कवल मात्र ही एक पुरुष का स्वाभाविक आहार है इससे न्यून-कम ग्रहण करना अवमोदर्य तप है। उपवास करने की शक्ति नहीं होने से एक ग्रास, दो ग्रास आदि कम करके अल्प भोजन किया जाता है। इसमें कम करते-करते एक चावल तक भी ग्रहण करना अवमोदर्य है। ध्यान स्वाध्याय की सिद्धि हेतु प्रमाद परिहार के लिए यह तप किया जाता है।

३. रसपरित्याग - दूध, दही, घी, तेल, गुड़ और नमक इन रसों का, इनमें से किसी एक, दो आदि का त्याग करना रसपरित्याग तप है तथा तिक्त, कटु, कषायला, आम्ल और मीठा इन रसों में से त्याग करना तप है। ये पदार्थ प्रासुक हैं फिर भी तपोबुद्धि से इनका त्याग किया जाता है।

नवनीत-मक्खन, मद्य, मांस और मधु ये चार महाविकृतियाँ हैं। साधु तो क्या श्रावक भी इनका जीवनपर्यंत के लिए त्याग कर देते हैं। क्योंकि ये त्रसजीवों के पिंड हैं।

४. वृत्तपरिसंख्यान - आहार के लिए जाते समय साधु कुछ भी अटपटा नियम, घरों का, दातार का या अशन आदि का नियम कर लेते हैं, उसे वृत्तपरिसंख्यान तप कहते हैं। ‘जैसे कोई वृद्ध पड़गाहन करेगा’ तो ही आज आहार लेंगे, या कांसे के पात्र से अथवा सुवर्ण पात्र या मिट्टी के पात्र से आहार देगा, तभी लेंगे अन्यथा नहीं। ऐसा नियम करना वृत्तपरिसंख्यान है।

५. कायक्लेश - कायोत्सर्ग करना, एक पाश्र्व से या दण्डाकार सोना, उत्कुटिकासन, पर्यंकासन, मकरमुखासन आदि अनेक प्रकार के आसन से ध्यान करना, इत्यादि प्रकारों से शास्त्रानुसार जो शरीर को कष्ट दिया जाता है, उसे कायक्लेश तप कहते हैं। वृक्षमूल, अभ्रावकाश, आतापन आदि योगों के द्वारा शरीर को क्लेश देना यह सब कायक्लेश तप है। इस तप से शरीर से ममत्व नष्ट होता है और सहनशीलता बढ़ते हुए अनेकों उपसर्ग परीषहों को विजय करने की शक्ति आती है।

६. विविक्त शयनासन - पशु, स्त्री, वेश्या, व्यंतरिणी आदि से रहित, गृहस्थों के संसर्ग से भी रहित ऐसे स्थान में शयन करना और बैठना, यह विविक्तशयनासन तप है। इससे स्वाध्याय और ध्यान की सिद्धि होती है।

ये छह प्रकार के तप बाह्य-गृहस्थ और मिथ्यादृष्टि आदि सभी में प्रसिद्ध हैं। इसलिए बाह्य कहे जाते हैं। साधु अपनी शक्ति के अनुसार आत्मविशुद्धि हेतु इन तपों को अनुष्ठान करते रहते हैं-अभ्यन्तर तप के भी छह भेद होते हैं-प्रायश्चित्त, विनय, वैयावृत्य, स्वाध्याय, ध्यान और व्युत्सर्ग।

७. प्रायश्चित्त - पूर्वकृत अपराध का शोधन करना प्रायश्चित्त है। इसके दस भेद हैं-

आलोचना - आचार्य के अथवा देव के पास जाकर चारित्राचारपूर्वक उत्पन्न हुए अपराधों का निवेदन करना।

प्रतिक्रमण - दैवसिक, रात्रिक, पाक्षिक आदि प्रतिक्रमण करना।

तदुभय - आलोचना और प्रतिक्रमणपूर्वक दोषों का निराकरण करना।

विवेक - कदाचित् कोई अप्रासुक वस्तु ग्रहण करने या कराने में आ जाये अथवा त्यागी हुई प्रासुक भी वस्तु आदि भूल से ग्रहण करने में आ जाये, तो उसको छोड़ देना विवेक है१।

व्युत्सर्ग - दु:स्वप्न आदि अतिचार शोधन हेतु कायोत्सर्ग करना व्युत्सर्ग है।

तप - अपराधजन्य दोष दूर करने हेतु उपवास आदि करना।

छेद - एक दिन, दो दिन, मास, वर्ष आदि की दीक्षा छेद देना-कम कर देना।

मूल - सम्पूर्ण दीक्षा छेदकर पुन: दीक्षा देना।

परिहार - कुछ दिन के विभाग से साधु का अलग कर देना परिहार है।

श्रद्धान - तत्त्व में रुचि करना अथवा क्रोधादि का परित्याग करना।

प्रमाद से या अज्ञान से साधुओं को भी व्रतों में कुछ न कुछ छोटे या बड़े दोष लग जाया करते हैं। तब साधु आचार्य के निकट एकान्त में बैठकर विधिवत्-दश दोष रहित अपने दोषों की आलोचना करते हैं। तब गुरु भी अपरिस्रावी आदि गुणों से संयुक्त हुए उपर्युक्त दश भेदों में से यथायोग्य प्रायश्चित्त देते हैं। लघु दोषों में आलोचना आदि प्रायश्चित्त देते हैं और बड़े दोषों में छेद, मूल आदि प्रायश्चित्त देते हैं। ‘‘अर्हंत-गेह, सिद्ध क्षेत्र आदि प्रशस्त स्थानों में शुभ दिन, शुभ नक्षत्रों में प्रायश्चित्त देते हैं पुन: उसके दोष को कभी किसी के सामने प्रगट नहीं करते हैं।’’

आलोचना प्रायश्चित्त में एक बात विशेष समझने की है कि यदि मुनि अपने दोषों की आलोचना करते हैं तो आचार्य के पास एकांत में करते हैं और यदि आर्यिकाएँ करती हैं, तो वे अकेली आचार्य के पास नहीं बैठती हैं। उनके साथ या तो एक आर्यिका रहती हैं, या आचार्य के निकट एक मुनि बैठते हैं। आलोचना करते समय दश दोषों का त्याग करना चाहिए-

उन दश दोषों के नाम-आकंपित, अनुमानित, दृष्ट, बादर, सूद्वम, छन्न, शब्दाकुल, बहुजन, अव्यक्त और तत्सेवित।

१. आचार्य बड़ा प्रायश्चित्त न दे दें इस भय से और शंका से उन्हें उपकरण आदि देकर अथवा किसी अन्य उपाय से उनको थोड़ा प्रायश्चित्त देने के लिए अपने अनुकूल करने का नाम आकंपित दोष है।

२. प्रार्थना करने पर मुझे थोड़ा ही प्रायश्चित्त देंगे इस हेतु से ‘उन वीर पुरुषों को धन्य है जो महान् तप करते हैं मैं तो शक्तिहीन हूँ त्यादि’ प्रकार से अपनी अशक्ति प्रगट कर अपना अपराध कहना अनुमानित दोष है।

३. यदि अपना अपराध किसी ने देख लिया है, तो गुरु के पास कह दिया अन्यथा नहीं, यह दृष्ट दोष है।

४. गुरु के साथ छोटे-छोटे दोष छिपाकर बड़े-बड़े को कहना बादर दोष है।

५. स्थूल दोषों को छिपाकर केवल सूक्ष्म दोषों को ही कहना सूक्ष्म दोष है।

६. अपने दोष को न कहकर युक्ति से गुरु से पूछना कि भगवन्! इस अपरााध् के हो जाने पर क्या प्रायश्चित्त है, उत्तर सुनकर आप चुपके से वह अनुष्ठान कर लेना छन्न दोष है।

७. पक्षादि प्रतिक्रमण के समय जब बहुत से लोगों का शब्द हो रहा हो, उस समय कोलाहल में ही गुरु के समक्ष अपने दोष प्रगट करना शब्दाकुल दोष है।

८. बहुत गुरु मिलकर जो आलोचना करते हैं, वह बहुजन दोष है।

९. अपने से ज्ञान या संयम में जो हीन हैं, उनसे प्रायश्चित्त लेना अव्यक्त दोष है।

१०. अपने समान अपराधी पाश्र्वस्थ से प्रायश्चित्त लेना तत्सेवित दोष है। साधु इन दश दोषों से रहित आलोचना करके गुरुमुख से प्रायश्चित्त ग्रहण कर दोषों से मुक्त हो जाते हैं।

८. विनय-अनुद्धत वृत्ति अर्थात् विनम्रता को विनय कहते हैं। इसके पाँच भेद हैं-दर्शन, ज्ञान, चारित्र, तप और औपचारिक।

दर्शन विनय - निर्दोष सम्यक्त्व का पालन करना, पंचपरमेष्ठी की भक्ति, पूजा करना, उनके अवर्णवाद-असत्य आरोपों को दूर करना और उनकी आसादना-अवज्ञा आदि को दूर करना। इत्यादि कार्यों से दर्शन विनय होता है।

ज्ञान विनय - काल शुद्धि आदि आठ प्रकार से ज्ञान की आराधना ज्ञान का विनय है।

चारित्रविनय - इन्द्रिय और कषायों के व्यापार से हटना, गुप्ति समिति का पालना इत्यादि चारित्र का विनय है।

तपोविनय - तप में उत्तरगुणों में अनुराग और उत्साह रखना, तप से अधिक साधु में भक्ति करना और तप से हीन से अवहेलना नहीं करना इत्यादि तपोविनय है।

उपचार विनय - इसके प्रत्यक्ष और परोक्ष ऐसे दो भेद हैं। उसमें भी मन, वचन, काय की अपेक्षा दोनों के तीन भेद हो जाते हैं।

प्रत्यक्ष विनय - गुरु को सामने आते हुए देखकर उठकर खड़े जाना, कृतिकर्मपूर्वक नमस्कार करना, आसन देना, चलते समय उनके पीछे चलना, उनसे नीचे बैठना इत्यादि कायिक विनय है। हे भगवन्! इत्यादिरूप से पूजा सत्कार सूचक वचन बोलना, हित, मित, मधुर, आगमानुकूल, अनिष्ठुर-मृदु, कर्वशता रहित अच्छे वचन बोलना वाचनिक विनय है। गुरु के अपमान आदि के परिणाम या पापरूप परिणाम नहीं करना प्रत्युत सम्यग्ज्ञानादि में परिणाम लगाना मानसिक विनय है।

परोक्ष विनय</font color> - गुरुजनों के परोक्ष में की जाने वाली विनय परोक्ष विनय है। काय से-हाथ जोड़कर कृतिकर्मपूर्वक वंदना करना, उनके प्रति आदर सूचक वचन कहना, मन में भक्ति रखना, उनकी आज्ञा का पालन करना आदि परोक्ष विनय है।

‘‘साधुजन अपने से एक रात्रि भी दीक्षा में बड़े ऐसे मुनियों की, अपने से लघु मुनियों की, आर्यिकाओं की और श्रावकों की भी यथा योग्य१ विनय करते हैं।’’ अर्थात् बड़ों को नमस्कार करना, वैयावृत्ति आदि से लघु मुनियों की प्रतिवंदना, वैयावृत्य, मधुर भाषण आदि से ऐसे आर्यिका और श्रावकों के प्रति यथायोग्य व्यवहार, आदरभाव, वात्सल्य भाव आदि रूप विनय करते हैं। क्योंकि अपने से दीक्षा में लघु को या आर्यिका, श्रावक आदि को मुनि नमस्कार नहीं करते।

९. वैयावृत्य-अपनी शक्ति के अनुसार उपकार करना वैयावृत्ति है। आचार्य, उपाध्याय, स्थविर, प्रवर्तक और गणधर इनकी तथा बाल-वृद्ध मुनियों से व्याप्त जो गच्छ-साधु-संघ्ज्ञ है इनकी सर्व सामथ्र्य से वैयावृत्ति करनी चाहिए अर्थात् आहार, उपकरण, औषधि, पुस्तक आदि के द्वारा इनका उपचार करना चाहिए। जो अपने से गुणों में अधिक हैं, तपस्वी हैं, शास्त्र शिक्षण में तत्पर हैं, दुर्बल हैं या व्याधिग्रस्त हैं, ऐसे मुनियों की तथा चतुर्विध संघ की सेवा करना।

कोई साधु मार्ग से थके हुए आये हैं या शत्रु, पशु, राजा आदि के द्वारा त्रास हुआ है। ऐसे साधुओं को वसतिका देना, आसन आदि देकर आहार आदि की व्यवस्था कराकर और भी यथोचित शुश्रूषा करना, शास्त्र सुनाना, ‘सोंठ, पीपल आदि औषधि’ दिलाना इत्यादि सभी वैयावृत्ति तप है।

‘‘जो अपने समान रत्नत्रय साधन करने वालों के ऊपर आई हुई आपत्ति को देखकर भी सो जाता है-दूर करने की चेष्टा नहीं करता है, वह समस्त सम्पत्तियों के विषय में भी सो जाता है। क्योंकि अर्हंत देव ने अन्तरंग और बहिरंग सम्पूर्ण तपस्याओं का हृदय तप ही बतलाय है।’’

१०. स्वाध्याय-स्व-अपने लिए हितकर जो श्रुत का सम्यक् अध्ययन है वह स्वाध्याय है। इसके वाचना, पृच्छना, अनुप्रेक्षा, आम्नाय और धर्मोपदेश ऐसे पाँच भेद हैं। यह भी कर्मनिर्जरा और ध्यानसिद्धि के लिए मुख्यतया साधन होने से अन्तरंग तप है।

‘‘बाह्याभ्यंतर भेद युक्त बारह प्रकार के तप में स्वाध्याय के समान तप न हुआ है न होगा।’’

११. ध्यान-एकाग्रचिंतानिरोध का नाम ध्यान है अर्थात् किसी एक विषय पर उपयोग का स्थिर होना। इसके चार१ भेद हैं-आर्त, रौद्र, धर्म और शुक्ल।

१२. व्युत्सर्ग-परिग्रह के त्याग को व्युत्सर्ग कहते हैं। इसके दो भेद हैं-अभ्यंतर और बाह्य। क्रोधादि कषायें ४, मिथ्यात्व १, वेद ३ और हास्यादि ६, ऐसे चौदह प्रकार के अभ्यंतर परिग्रह हैं तथा क्षेत्र, वस्तु, धन, धान्य, द्विपद, चतुष्पद, यान, शयनआसन, कुप्य और भांड (हिंगु मरीचादि) ये दश प्रकार के बाह्य परिग्रह हैं इनका त्याग करना व्युत्सर्ग है।

‘‘अथवा शरीर से भिन्न अपनी आत्मा को देखते हुए तीन गुप्ति का आश्रय लेना और शरीर में भी नि:स्पृह होकर ध्यान करना व्युत्सर्ग है।’’

शरीर के त्याग को भी पूर्वाचार्यों ने अन्तरंगोपधि व्युत्सर्ग कहा है। इसके भी दो भेद हैं-नियतकाल और सार्वकालिक। नियतकाल के भी दो भेद हैं-नित्य और नैमित्तिक। आवश्यक क्रिया आदि में किया जाने वाला काय का त्याग (काय के ममत्व के त्यागरूप कायोत्सर्ग) नित्य है और अष्टमी आदि पर्व संबंधी नैमित्तिक हैं। सार्वकालिक कायत्याग के भक्त प्रतिज्ञा, इंगिनी, प्रायोपगमन की अपेक्षा तीन भेद हैं।’’

इस प्रकार से बारह भेद रूप तप का वर्णन हुआ।

बाईस परीषह

‘‘मोक्षमार्ग से च्युत न होने के लिए और कर्मों की निर्जरा करने के लिए जो सहन करने योग्य हों, वे परीषह हैं। उनके क्षुधा, तृषा, शीत, उष्ण, दंशमशक, नग्नता, अरति, स्त्री, चर्या, निषद्या, शय्या, आक्रोश, वध, याचना, अलाभ, रोग, तृणस्पर्श, मल, सत्कार-पुरस्कार, प्रज्ञा, अज्ञान और अदर्शन। मोक्षार्थी पुरुष जब इनकी बाधाओं को शांत भाव से सहन करते हैं, तब इन्हें परीषहजय कहते हैं।’’

१. क्षुधा-आहार न मिलने पर या अल्प मिलने पर क्षुधाजन्य बाधा से खेद को प्राप्त नहीं होना क्षुधापरीषहजय है।

२. तृषा-पित्तादि के प्रकोप से उत्पन्न हुई प्यास की बाधा को समाधिरूपी जल से शांत करना तृषापरीषहजय है।

३. शीत-आवरण-वस्त्रादि से रहित खुले स्थान पर बर्प आदि की ठंडी को सहन करना शीत परीषहजय है।

४. उष्ण-ग्रीष्मकालीन सूर्य से संतप्त पृथ्वी पर उष्णता को सहन करना उष्णपरीषहजय है।

५. दंशमसक-डांस-मच्छर, बिच्छू, सर्प आदि के काट लेने पर उनकी पीड़ा को सहन करना दंशमशक परीषहजय है।

६. नग्नता-नग्नमुद्रा में अखण्ड ब्रह्मचर्य को धारण करते हुए भी बालकवत् निर्विकार रहना नग्नपरीषहजय है।

७. अरति-शून्यस्थान, गुफा आदि मनविरुद्ध स्थानों में भी अरुचि न करना अरति परीषहजय है।

८. स्त्री-स्त्रियों द्वारा विभ्रम भाव से बाधा पहुँचाने पर भी निश्चल मन रहना स्त्री परीषहजय है।

९. चर्या-कंकरीली सड़कों पर चलते समय खेदखिन्न नहीं होना चर्या परीषहजय है।

१०. निषद्या-नियतकाल तक बैठने से कष्ट होने पर उसे शांति से सहन करना निषद्या परीषहजय है।

११. शय्या-स्वाध्याय आदि से थककर एक करवट शयन करते समय कंकरीली आदि पृथ्वी के निमित्त से हुए कष्ट को सहन करना शय्या परीषहजय है।

१२. आक्रोध-अज्ञानियों द्वारा कठोर, असभ्य, निंद्य, वचन सुनकर भी क्रोध नहीं करना आक्रोश परीषहजय है।

१३. वध-अज्ञानी द्वारा तीक्ष्ण मुद्गर आदि से ताड़ित किये जाने पर भी दु:खी नहीं होना वध परीषहजय है।

१४. याचना-शरीर के शुष्क हो जाने पर भी आहार, औषधि आदि की याचना नहीं करना याचना परीषहजय है।

१५. अलाभ-बहुत काल तक आहार का लाभ न मिलने पर भी ‘लाभादलाभो वरं मे’ मेरे लिए लाभ की अपेक्षा अलाभ ही अच्छा है चूँकि अधिक कर्मों की निर्जरा हो जावेगी, ऐसा मानना अलाभ परीषहजय है।

१६. रोग-अनेकों रोगों के हो जाने पर भी औषधि उपचार आदि की अपेक्षा नहीं करना रोग परीषहजय है।

१७. तृणस्पर्श-तृण, कंकर, कांटे, आदि की बाधा को सहन करते हुए चर्या शय्या निषद्या में प्राणी पीड़ा के परिहार की भावना रखना तृणस्पर्श परीषहजय है।

१८. मल-स्नानत्याग व्रत होने से मल से लिप्त शरीर होते हुए खुजली आदि से उत्पन्न हुई पीड़ा की उपेक्षा कर देना, मलिन शरीर से मन में ग्लानि नहीं लाना मल परीषहजय है।

१९. सत्कार-पुरस्कार-महातपस्वी, सिद्धान्तवेत्ता, कुशल साधु होने पर भी कदाचित् किसी के द्वारा सत्कार और पुरस्कार को प्राप्त नहीं होने पर मन में खेदखिन्न नहीं होना सत्कार पुरस्कार परीषहजय है।

२०. प्रज्ञा-‘मैं बहुत ज्ञानी हूँ’ इत्यादि रूप से विद्या-बुद्धि का मद नहीं करना प्रज्ञापरीषहजय है।

२१. अज्ञान-‘यह मूर्ख है’ इत्यादि शब्दों से दूसरे से अमानित होने पर भी और ‘मैंने घोर तपश्चरण आदि किया है फिर भी मुझमें ज्ञानातिशय नहीं हो रहा है’ इत्यादि रूप से खेद खिन्न नहीं होना अज्ञान परीषहजय है।

२२. अदर्शन-‘मैं शुद्ध परिणामी हूँ, चिरकाल से दीक्षित हूँ, तपस्वी हूँ’ फिर भी मेरी देवादिकों द्वारा कोई पूजा आदि नहीं हो रही है। शास्त्रों में लिखा है कि ‘महोपवास आदि से देवों द्वारा अतिशय किया जाता है’ सो यह सब कथन असत्य दिखता है। इत्यादि रूप से मन में नहीं सोचना अदर्शन परीषहजय है।

साधु आगामी कर्मों का संवर और पूर्व संचित कर्मों की निर्जरा के लिए अपनी शक्ति के अनुसार इन उत्तरगुणों का भी पालन करते हैं। इनके अतिरिक्त आतापन आदि त्रिकालयोग भी उत्तरगुण हैं, इस प्रकार अधिक से अधिक चौरासी लाख उत्तरगुण होते हैं।

साधुओं को मूलगुणों का पालन अतिआवश्यक है। आज के युग में हीन संहनन आदि के निमित्त से मूलगुणों को निरतिचार पालन करने का प्रयत्न करना चाहिए। ‘‘जो साधु मूलगुणों को-अहिंसादिव्रतों को नष्ट कर बाह्य योग को-वृक्ष मूलयोग, अभ्रावकाशयोग और आतापन आदि योगों को धारण करता है उसके वे योग मूलगुणरहित होने से निष्फल हो जाते हैं अर्थात् उनमें कर्मक्षय करने की सामथ्र्य नहीं रहती है१।’’ ‘‘जो मुनि उत्तरगुणों के लोभ से मूलगुणों में से किसी की विराधना कर देते हैं तो समझिए कि वे अंगुली की रक्षा के लिए शिरच्छेद कर डालते हैं।’’

विशेष-इन छत्तीस प्रकार के उत्तरगुणों को पालन करने वाले आचार्य या सामान्य मुनि उत्तरगुणधारी कहलाते हैं। कोई-कोई उत्तरगुण से रहित होते हैंं कोई कुछ उत्तरगुणों को पालन करते हैं और कोई पूर्णतया उत्तरगुणों को पालन करते हैं। अत: उत्तरगुणों की अपेक्षा दिगम्बर मुनियों में अनेकों भेद हो जाते हैं।

शील के भेद

शील के १८००० हजार भेद होते हैं। यथा-३ योग, ३ करण, ४ संज्ञायें,५ इंद्रिय, १० पृथ्वीकायिक आदि जीव भेद और १० श्रमणधर्म इनका परस्पर गुण करने से ३²३²४²५²१०²१०·१८००० भेद हो जाते हैं।

मन, वचन, काय को योग कहते हैं। अशुभ कर्म के ग्रहण में कारणभूत क्रियाओं के निग्रह को करण कहते हैं। निमित्त के भेद से इसके भी मन, वचन और काय ये तीन भेद हैं। आहार, भय, मैथुन और परिग्रह ये चार संज्ञाये हैं। स्पर्शन आदि पाँच इंद्रियाँ हैं। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, प्रत्येक वनस्पति, साधारण वनस्पति, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय और पंचेन्द्रिय ये दश जीव भेद हैं। क्षमा मार्दव आदि दश धर्म हैं।

इनके सिवाय शील के १८००० भेदों के और भी प्रकार हैं-

(१) विषयाभिलाषा आदि १० (विषयाभिलाषा, वस्तिमोक्ष, प्रणीतरससेवन, संसक्तद्रव्यसेवन, शरीरांगोपांगावलोकन, प्रेमी का सत्कार पुरस्कार, शरीरसंस्कार, अतीतभोगस्मरण, अनागत भोगाकांक्षा, इष्टविषयसेवन)।

चिंता आदि १० (चिंता, दर्शनेच्छा, दीर्घनि:श्वास, ज्वर दाह, आहाररुचि, मूच्र्छा, उन्माद, जीवनसंदेह, मरण)। इन्द्रिय ५, योग ३ और कृतकारित अनुमोदना ये ३, जाग्रत और स्वप्न ये २ तािा चेतन और अचेतन ये २। सबको गुणित करने से १०²१०²५²३²३²२²२·१८००० भेद हो जाते हैं।

(२) स्त्री ३ (देवी, मानुषी, तिरश्ची) को योग ३, कृतकारित अनुमोदना ३, संज्ञायें ४ और इंद्रिय १० (५ द्रव्येन्द्रिय ५ भावेन्द्रिय) तथा १६ कषाय से गुणने पर १७२८० भेद होते हैं। इनमें अचेतन स्त्री संबंधी ७२० भेद जोड़ना। यथा अचेतन स्त्री के ३ भेद (काष्ठ, पाषाण, चित्र) योग २ (मन और काय) कृतादि ३ और कषाय ४ तथा इन्द्रिय भेद १० से गुणा करने पर ३²२²३²४²४²१०·७२० भेद होते हैं। १७२८०±७२०·१८०००।

(३) स्त्री ४² योग ३²कृतादि ३²इन्द्रिय ५²शृंगाररसभेद १०² और कायचेष्टा भेद १०·१८००० भेद हो जाते हैं।

ये सभी भेद अयोगी के पूर्ण माने गये हैं। यथा-जो शील के भेदों के स्वामी हो चुके हैं, जिनके सम्पूर्ण आस्रव रुक चुका है, जो कर्मरज से विप्रमुक्त हैं, ऐसे काययोग से भी रहित अयोग केवली होते हैं।’’

चौरासी लाख उत्तरगुण

हिंसादि २१, अतिक्रमादि ४, पृथ्वी आदि १००, अब्रह्म १०, आलोचना के दोष १० और प्रायश्चित्त के भेद १० इनको परस्पर गुणने से २१²४²१००²१०²१०²१०·८४००००० उत्तरगुण होते हैं।

हिंसादि-२१ हिंसा, असत्य, अचौर्य, परिग्रह, क्रोध, मान, माया, लोभ, रति, अरति, भय, जुगुप्सा, मनोमंगुल, वचनमंगुल, कायमंगुल, (पाप संचय करने वाली क्रिया मंगुल है) मिथ्यादर्शन, प्रमाद, पैशून्य, अज्ञान और अनिग्रह (इन्द्रियों की स्वच्छन्द प्रवृत्ति)

अतिक्रम आदि ४-अतिक्रमण (विषयों की इच्छा), व्यतिक्रमण (विषयों के उपकरण मिलाने के विचार), अतिचार (व्रतों में शिथिलता आ जाना), अनाचार (व्रत भंग हो जाना)।

पृथ्वी आदि १००-पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, प्रत्येक वनस्पति, अनंत कायिक वनस्पति, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय और पंचेन्द्रिय इनको परस्पर में गुणित क देने से १०²१०·१०० हो जाते हैं।

अब्रह्म १०-स्त्रीसंसर्ग, प्रणीतरसभोजन, गंधमाल्यसंस्पर्श, शयनासन (कोमल शय्या आसन की अभिलाषा), गीतवादित्र, अर्थसंप्रयोग (सुवर्णादि की अभिलाषा), कुशील, संसर्ग, राजसेवा (विषयों की आशा से राजा की सेवा) और रात्रिसंचरण ये १० शील विराधनाएं हैं।

आलोचना के १० दोष-आकंपित, अनुमानित, दृष्ट, बादर, सूक्ष्म, छन्न, शब्दाकुलित, बहुजन, अव्यक्त और तत्सेवी, आलोचना के ये १० दोष हैं। प्रायश्चित्त के १० भेद-आलोचना, प्रतिक्रमण, तदुभय, विवेक, व्युसर्ग, तप, छेद, मूल, परिहार और श्रद्धान ये दोनों की शुद्धि के १० उपाय हैं। सबका परस्पर गुणन करने से ८४००००० उत्तरगुण होते हैं। इनकी पूर्ति भी चौदहवें गुणस्थान में ही होती है।

इस प्रकार से १० धर्म, १२ तप, २२ परीषहजय, १८००० शील और ८४००००० गुण ये सभी उत्तरगुण कहलाते हैं।

विशेष-इन अठारह हजार शीलों की और चौरासी लाख उत्तरगुणों की पूर्ति अयोगकेवली नाम के चौदहवें गुणस्थान में ही होती है। उसके पहले दिगम्बर मुनि इनकी भावना भाते हुए इन्हीं की पूर्ति के लिए सारे पुरुषार्थ करते हैं और जितने अंशों में पाल सकते हैं पालते हैं। इसलिए इन शील और गुणों की अपेक्षा भी दिगम्बर मुनियों के अनेकों भेद हो जाते हैं।

आराधना के भेद

जिसके द्वारा मोक्ष सुख के अर्थीजन सम्यग्दर्शन आदि को आराधित-सेवित करते हैं उसे आराधना कहते हैं। इसमें चार विषय ज्ञातव्य हैं-आराध्य, आराधक, आराधना और उसका फल।

‘‘रत्नत्रय आराध्य हैं, विशुद्धात्मा भव्य आराधक है, उपाय आराधना है और उसका फल अभ्युदय तथा मोक्ष है।’’

आराधना के चार भेद हैं-दर्शनाराधना, ज्ञानाराधना, चारित्राराधना और तप आराधना।

शंका-आदि दोषों से रहित और आठ अंग रूप निर्दोष सम्यक्त्व धारण करना दर्शनाराधना है।

अर्थ, व्यंजन की शुद्धि आदि आठ भेदों से युक्त ज्ञान का संचय करना ज्ञानाराधना है।

तेरह प्रकार का चारित्र पालना चारित्राराधना है।

बारह प्रकार के तपों का विधिवत् पालन करना तप आराधना है। दर्शनाराधना में ज्ञानाराधना और चारित्राराधना में तप आराधना गर्भित हो जाने से संक्षेप में आराधनाएं दो ही हैं। ‘‘अथवा अतिसंक्षेप में चारित्राराधना ही एक आराधना है चूँकि सम्यक्त्व के बिना चारित्र अचारित्र है और ज्ञान भी मिथ्याज्ञान ही है और तप भी बालतप ही है अत: सम्यक्चारित्र के सेवन से सभी आराधनाएँ आराधित हो जाती हैं। इसलिए आराधना एक भी मानी जाती है।’’ भेदरूप से इन चार आराधनाओं की आराधना करने वाले भव्यजीव संसार के अनेक अभ्युदयों को प्राप्त कर क्रमश: मोक्ष को प्राप्त कर लेते हैं।

विशेष-इन चार आराधनाओं में से प्रारंभ की तीन आराधनाएँ तो प्राय: सभी दिगम्बर मुनियों के पाई जाती हैं। किन्तु तप आराधना उत्तरगुणधारी मुनियों में ही खास कर विवक्षित हैं। अत: इन आराधनाओं की अपेक्षा दिगम्बर मुनियों के भेद हो जाते हैं।

मुनियों और आचार्यों में उत्तरगुण और श्रुत से भेद

मुनियों के सामान्यतया चार भेद और आचार्यों में भी सामान्यतया चार भेद किये जा सकते हैं।

प्रथम तो सामान्य मुनि होते हैं जो कि अपने मूलगुणों का पालन करते हैं। दूसरे मुनि वे हैं जो मूलगुणों साथ उत्तरगुणों को भी पालन करते हैं। तीसरे मुनि वे हैं जो मूल गुणधारी हैं, उत्तरगुणों से शून्य हैं किन्तु सिद्धान्त के विशेष वेत्ता हैं और चौथे मुनि वे हैं, जो मूलगुण तथा उत्तरगुणों का पालन करते हैं और सिद्धान्त के वेत्ता भी हैं।

ऐसे ही अट्ठाईस मूलगुण और आचार्य के छत्तीस गुणों को धारण करने वाले सामान्य आचार्य होते हैं। दूसरे आचार्य नाना प्रकार के उत्तरगुणों से और अपने शरीर को क्लेश देने वाले भी हैं। तीसरे प्रकार के आचार्य उत्तरगुणधारी नहीं है किन्तु सिद्धान्त के वेत्ता हैं और चौथे प्रकार के आचार्य मूलगुणों तथा उत्तरगुणों से सहित होते हुए सिद्धान्त के वेता भी हैं।

विशेष-आजकल यद्यपि प्रथम भेदरूप मुनि और प्रथम भेदरूप आचार्य ही देखे जाते हैं। फिर भी कोई मुनि या आचार्य उत्तरगुणों को भी कुछ-कुछ अंशों में धारण करते हैं और कोई-कोई तात्कालिक श्रुतज्ञान के भी मर्मज्ञ होते हैं। इन भेदों की अपेक्षा भी दिगम्बर मुनि-आचार्यों में भेद देखा जाता है।