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दिव्य शक्ति ब्राह्मी-सुंदरी स्वरूपा गाणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ससंघ का मंगल चातुर्मास अवध की धरती जन्मभूमि टिकेटनगर में 15-7-19 से प्रारंभ हुआ |

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०२. वृहत्प्रत्याख्यानसंस्तरस्तवाधिकार-

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विषय सूची

वृहत्प्रत्याख्यानसंस्तरस्तवाधिकार

अध्याय २

प्रश्न १—यतियों के लिए कौन से छह काल होते हैं नाम निर्देशन करें ?

उत्तर—यतियों के छह काल निम्नलिखित हैं—

१. आत्म संस्कार काल

२. सल्लेखना काल

३. उत्तमार्थ काल

४. दीक्षा काल

५. शिक्षा काल

६. गणपोषण काल

प्रश्न २—इन छह काल का वर्णन किस ग्रंथ में किया है ?

उत्तर—आत्म संस्कार काल, सल्लेखना काल और उत्तमार्थ काल इन तीन कालों का वर्णन भगवती आराधना ग्रंथ में है और दीक्षाकाल, शिक्षाकाल, गणपोषण काल इन तीन कालों का वर्णन मूलाचार में है।

प्रश्न ३—वृहत् प्रत्याख्यान अधिकार के मंगलाचरण में आचार्यश्री ने किनको नमस्कार किया है ?

उत्तर—

सव्वदुक्खप्पहीणाणं सिद्धाणं अरहदो णमो।
सद्दहे जिणपण्णत्तं पच्चक्खामि य पावयं।।३७।।
णमोत्थु धुदपावाणं सिद्धाणं च महेसिणं।
संथरं पडिवज्जामि जहा केवलिदेसियं।।३८।।

आठ गुण सहित सिद्धों को, नव केवल लब्धि युक्त अरिहंतों को, केवलज्ञान की ऋद्धि जिनको प्राप्त हुई है ऐसे मर्हिषयों को नमस्कार किया है।

प्रश्न ४—संस्तर कितने प्रकार के हैं ?

उत्तर—संस्तर दो प्रकार हैं—

(१) भाव संस्तर : सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चारित्र और तप रूप चार आराधनाओं को भावसंस्तर करते हैं।

(२) द्रव्य संस्तर : भूमि, पाषाण, फलक और तृण को द्रव्य संस्तर कहते हैं।

प्रश्न ५—आत्मसंस्कार काल, सल्लेखना काल और उत्तमार्थ काल इन तीन कालों में यदि मरण उपस्थित हो तो मुनि क्या करते हैं ?

उत्तर—इन तीन कालों में यदि मरण उपस्थित हो तो मुनि संस्तर का आश्रय लेते हैं।

प्रश्न ६—आचार्य श्री किस प्रकार प्रतिज्ञा का निर्वाह करते हैं ?

उत्तर—

जं िंकचि मे दुच्चरियं सव्वं तिविहेण वोसरे।
सामाइयं च तिविहं करेमि सव्वं णिरायारं।।३९।।

जो िंकचित् भी मेरा दुश्चरित है उस सभी का मैं मन—वचन—काय से त्याग करता हूँ और सभी तीन प्रकार की सामायिक को र्नििवकल्प करता हूँ। इस प्रकार प्रतिज्ञा करते हैं।

प्रश्न ७—मुनिराज कितने प्रकार से उपाधि का त्याग करते हैं ?

उत्तर—

सरीराइं च सभोयणं।
मणसा वचि काएण सव्वं तिविहेण वोसरे।।४०।
        सव्वं पाणारंभं पच्चक्खामि अलीयवयणं च।
सव्वमदत्तादाणं मेहूण परिग्गहं चेव।।४१।।

बाह्य—अभ्यन्तर परिग्रह का, शरीर आदि का और भोजन आदि का मन वचन काय से और कृत कारित अनुमोदना से त्याग करते हैं। सम्पूर्ण िंहसा, झूठ, चोरी, कुशील और मूच्र्छा स्वरूप परिग्रह का भी त्याग करते हैं।

प्रश्न ८— अब्रह्मचर्य के कितने भेद होते हैं ?

उत्तर—

छक्करणं चउव्विहत्थी किदकारिद अणुमोदिदं चेव।
जोगेसु अबम्भस्स य भंगा खलु होंति अक्खसंचारे।। कुन्द. मूला.।।

स्पर्शन आदि मन सहित छ: इन्द्रियाँ, देवागंना, मनुष्यिनी, तिर्यंचनी और चित्रस्त्री इन चार प्रकार की स्त्रियों के साथ मन वचन काय से कृत कारित अनुमोदना से सेवन करना ६ ² ४ ² ३ ² ३ · २१६ भेद अब्रह्मचर्य के हो जाते हैं।

प्रश्न ९—सामायिक का स्वरूप और समाधि धारण की प्रतिज्ञा किस प्रकार से कहते हैं ?

उत्तर—

सम्मं मे सव्वभूदेसु वेरं मज्झं ण केणवि।
आसा वोसरित्ताणं समािंह वडिवज्जए।।४२।।

मेरा सभी जीवों में समताभाव है, मेरा किसी के साथ वैर नहीं है। सम्पूर्ण आशा को छोड़कर इस समाधि को स्वीकार करता हूँ।

प्रश्न १०—समाधि धारक का किसी के साथ वैर क्यों नहीं रहता है ?

उत्तर—

खमामि सव्व जीवाणं सव्वे जीवा खमंतु मे।
मित्ती मे सव्वभूदेसु वेरं मज्झं ण केणवि।।४३।।

समाधि धारक सोचता है सभी जीवों को मैं क्षमा करता हूँ, सभी जीव मुझे क्षमा करें, सभी जीवों के साथ मेरा मैत्री भाव है, मेरा किसी के साथ वैर भाव नहीं है।

प्रश्न ११— वैर के निमित्त कौन से हैं ?

उत्तर—

रायबंधं पदोसं च हरिसं दीणभावयं।
उस्सुगत्तं भयं सोगं रदिमरिंद च वोसरे।।४४।।

राग का अनुबंध, प्रकृष्ट द्वेष, हर्ष, दीनभाव, उत्सुकता, भय, शोक, रति, और अरति इन सब वैर के निमित्तों का समाधि धारक त्याग करता है।

प्रश्न १०—साधक किसका ग्रहण और किसका त्याग करता है ?

उत्तर—

ममिंत्त परिवज्जामि णिम्ममत्तिमुवट्ठिदो।
आलंबणं च मे आदा अवसेसाइं वोसरे।।४५।।'

मैं ममत्व को छोड़ता और निर्ममत्व भाव को प्राप्त होता हूँ, आत्मा ही मेरा आलम्बन है और मैं अन्य सभी का त्याग करता हूँ।

प्रश्न ११—साधक आत्मा का त्याग क्यों नहीं करते हैं ?

उत्तर—

आदा हु मज्झ णाणे आदा मे दंसणे चरित्ते य।
आदा पच्चक्खाणे आदा में संवरे जोए।।४६।।

निश्चित रूप से मेरा आत्मा ही ज्ञान में है, मेरा आत्मा ही दर्शन में और चारित्र में है, प्रत्याख्यान में है और मेरा आत्मा ही संवर तथा योग में है। स्वभाव का, स्वरूप का त्याग नहीं होता, विभाव का त्याग होता है।

प्रश्न १२—कर्म का कर्ता कौन है ?

उत्तर—

एओ य मरइ जीवो एओ य उववज्जइ।
एयस्स जाइमरणं एओ सिज्झइ णीरओ।।४७।।
एओ मे सस्सओ अप्पा णाणदंसणलक्खणो।
सेसा में बाहिरा भावा सव्वे संजोगलक्खणा।।४८।।

जीव अकेला ही मरता है और अकेला ही जन्म लेता है। एक जीव के ही यह जन्म और मरण है और अकेला ही कर्म रहित होता हुआ सिद्ध पद प्राप्त करता है। मेरा आत्मा एकाकी है, शाश्वत है और ज्ञान दर्शन लक्षण वाला है। शेष सभी संयोग लक्षण वाले जो भाव हैं वह मेरे से बहिर्भूत हैं।

प्रश्न १३—संयुक्त पदार्थों का त्याग क्यों करते हैं ?

उत्तर—

संजोयमूलं जीवेण पत्तं दुक्खपरंपरं।
तम्हा संजोय संबंधं सव्वं तिविहेण वोसरे।।४९।।

इस जीव ने संयोग के निमित्त से दु:खों के समूह को प्राप्त किया है इसलिए मैं समस्त संयोग सम्बन्ध को मन वचन काय पूर्वक छोड़ता हूँ।

प्रश्न १४—आचार्य दुश्चरित का परिहार किस प्रकार से करते हैं ?

'उत्तर-

मूलगुण उत्तरगुणे जो मे णाराहिओ पमाएण।
तमहं सव्वं िंणदे पडिक्कमे आगमिस्साणं।।५०।।
अस्संजममण्णाणं मिच्छत्तं सव्वमेव य ममिंत्त।
जीवेसु अजीवेसु य तं िंणदे तं च गरिहामि।।५१।।

मैंने मूलगुण और उत्तरगुणों में प्रमाद से जिस किसी की आराधना नहीं की है उस सम्पूर्ण की मैं निन्दा करता हूँ और भूत वर्तमान ही नहीं भविष्य में आने वाले का भी मैं प्रतिक्रमण करता हूँ। असंयम, अज्ञान और मिथ्यात्व तथा जीव और अजीव विषयक सम्पूर्ण ममत्व—उन सबकी मैं निन्दा करता हूँ और उन सबकी मैं गर्हा करता हूँ।

प्रश्न १५— क्षपक और किसका त्याग करता है ?

'उत्तर—

सत्त भय अट्ठ मए सण्णा चत्तारि गारवे तिण्णि।
तेत्तीसाच्चासणाओ रायद्दोसं च गरिहामि।।५२।।

सात भय, आठ मद, चार संज्ञा, तीन गारव, तैंतीस आसादना तथा राग और द्वेष इन सबकी मैं गर्हा करता हूँ।

प्रश्न १६—सप्त भय और आठ मद का स्वरूप क्या है ?

उत्तर—

इहपरलोयत्ताणं अगुत्तिमरणं च वेयणाकम्हिभया।
विण्णाणिस्सरियाणा कुलबलतवरूवजाइ मया।।५३।।

१.इहलोक भय : लोक में शत्रु, विष, वंâटक आदि से भयभीत होना।

२.परलोक भय : अगले भव में कौन–सी गति मिलेगी ? क्या होगा ? इत्यादि सोचकर भयभीत होना।

३.अत्राणभय : मेरा कोई रक्षक/त्राता नहीं है ऐसा सोचकर डरना।

४.अगुप्तिभय : इस ग्राम में परकोटे आदि नहीं है अत: शत्रु आदि से वैâसे मेरी रक्षा होगी ? ऐसा सोचकर डरना।

५.मरणभय : मरने से डरना।

६.वेदनाभय : रोग आदि से उत्पन्न हुई पीड़ा से डरना।

७.आकस्मिक भय : अकस्मात् मेघ गर्जना, विद्युत्पात आदि होने से डरना। ये सात भय हैं।

आठ मद :

१.विज्ञान मद : अक्षरज्ञान और संगीत आदि ज्ञान का गर्व होना।

२.ऐश्वर्य मद : द्रव्यादि सम्पत्ति वैभव का गर्व होना।

३.आज्ञामद : मेरी अज्ञा कोई उल्लंघन नहीं करता है ऐसे विचार से मन में पूâलना।

४.कुलमद : पिता के वंश परम्परा की शुद्धि का होना ऐसा अभिमान करना। इक्ष्वाकु, हरि, नाथ वगैरह कुल में मैं उत्पन्न हुआ हूँ ऐसा गर्व करना।

५.बलमद : शरीर आहार आदि से उत्पन्न हुई शक्ति का गर्व करना।

६.तपमद : कायक्लेशादि कठिन तपश्चरण मैं करता हूँ ऐसा गर्व होना।

७.रूपमद : अपने सौन्दर्य, कांति, तारूण्यादिक का गर्व होना।

८.जातिमद : अपने माता के वंश परम्परा की शुद्धि का मद होना।

प्रश्न १७—संज्ञा और गारव कितने होते हैं ?

उत्तर—

आहारदिसण्णा चत्तारि वि होंति जाण जिणवयणे।
सादादिगारवा ते तिण्णि वि णियमा पवज्जेजो।। कुन्द. मूला.।।

आहार संज्ञा, भयसंज्ञा, मैथुन संज्ञा और परिग्रह संज्ञा ये चार संज्ञा हैं। सातागारव, रसगारव, ऋद्धिगारव ये तीन गारव हैं।

सातागारव—मैं यदि होकर भी इन्द्रत्व सुख, चक्रवर्ती सुख अथवा तीर्थंकर जैसे सुख का उपयोग ले रहा हूँ, ये दीनयति सुखों से रहित हैं इत्यादि रूप से अभिमान करना।

रसगारव—मुझे आहार में रसयुक्त पदार्थ सहज ही उपलब्ध हैं, ऐसा अभिमान होना।

ऋद्धिगारव—मेरे शिष्य आदि बहुत हैं दूसरे यतियों के पास नहीं है, ऐसा अभिमान होना।

प्रश्न १८—संज्ञा किसे कहते हैं ?

उत्तर—

इह जाहि वाहिया वि य जीवा पावंति दारुणं दुक्खं।
सेवंता वि य उभये ताओ चत्तारि सण्णाओ।। कुन्द. मूला.।

जिनसे संक्लेशित होकर जीव इस लोक में और जिनके विषयों का सेवन से दोनों ही भवों में दारूण दु:ख को प्राप्त होते हैं, उन्हें संज्ञा कहते हैं।

प्रश्न १९—आहार संज्ञा का स्वरूप बताइए ?

उत्तर—

आहारदंसणेण व तस्सुवजोगेण ओम कोठाए।
सादिदरुदीरणाए हवदि हु आहारसण्णा हु।। कुन्द. मूला.।।

आहार के देखने से अथवा उसके उपयोग से और पेट के खाली होने से तथा असातावेदनीय के उदय और उदीरणा होने पर जीव के नियम से आहार संज्ञा होती है।

प्रश्न २०— भय संज्ञा का स्वरूप बताइए ?

उत्तर—

अइभीमदंसणेण य तस्सुवजोएण ओमसत्तीए।
      भयकम्मुदीरणाए भयसण्णा जायदे चदुिंह।। कुन्द. मूला.।।

अत्यन्त भयंकर पदार्थ देखने से अथवा पहले देखे हुए भयंकर पदार्थ के स्मरण से अथवा अधिक निर्बल होने पर और अंतरंग में भयकर्म की उदय उदीरणा होने पर इत्यादि कारणों से भय संज्ञा होती है।

प्रश्न २१— मैथुन संज्ञा का स्वरूप बताइए ?

उत्तर—

पणिदरसभोयणेण य तस्सुवजोगे कुसीलसेवाए।
वेदस्सुदीरणाए मेहुणसण्णा हु जायदे चदुिंह।। कुन्द. मूला.।।

स्वादिष्ट और गरिष्ठ रसयुक्त भोजन करने से और पहले भुक्त विषयों का स्मरण आदि करने से तथा कुसील आदि सेवन करने से और वेदकर्म का उदय उदीरणा आदि से मैथुन संज्ञा होती है।

प्रश्न २२— परिग्रह संज्ञा का स्वरूप बताइए ?

उत्तर—

उवयरणदंसणेण य तस्सुवजोएण मुच्छिदाए य।
लोहस्सुदीरणाए परिग्गहे जायदे सण्णा।। कुन्द. मूला.।।

इत्र, भोजन, उत्तम स्त्री आदि भोगोपभोग के साधन भूत पदार्थों के देखने से अथवा पहले भुक्त पदार्थों का स्मरण करने से और ममत्व परिणामों के होने से, लोभकर्म का उदय, उदीरणा इत्यादि कारणों से परिग्रह संज्ञा होती है।

प्रश्न २३— आसादना किसे कहते हैं ?

उत्तर—महाव्रतों में, समिति गुप्तियों के अतिचार आदि का होना आसादना है और अस्तिकाय तथा पदार्थों में श्रद्धान का अभाव का विपरीत श्रद्धान आदि का होना आसादना है तथा षट्काय जीवों की िंहसा का हो जाना ही आसादना है।

प्रश्न २४— आसादना के भेद कौन से हैं ?

उत्तर—

पंचेव अत्थिकाया छज्जीवणिकाय महव्वया पंच।
पवयणमाउपयत्था तेतीसच्चासणा भणिया।।५४।।

आसादनायें ३३ होती हैं। पाँच अस्तिकाय—जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश पृथ्वीकायिक आदि छ: जीव निकाय, पाँच महाव्रत पाँच समिति और तीन गुप्ति ये आठ प्रवचन मातृका। जीव, अजीव, आस्रव, बन्ध, संवर, निर्जरा, मोक्ष, पुण्य और पाप से नव पदार्थ हैं। इस प्रकार ये तैंतीस आसादनायें हैं।

प्रश्न २५— आचार्य क्षपक के लिए क्या आज्ञा देते हैं ?

उत्तर—िं

णदामि िंणदणिज्जं गरहामि य जं च मे गरहणीयं।
आलेचेमि य सव्वं सब्भंतरबाहिरं उविंह।।५५।।

आत्म संस्कार काल से संन्यास काल तक को आलोचना के लिए क्षपक आलोचना करते हैं—जो उपधि और परिग्रह निन्दा करने योग्य हैं उनकी मैं निन्दा करता हूँ, जो गर्हा करने योग्य हैं उनकी गर्हा करता हूँ और समस्त बाह्य अभ्यन्तर उपधि की आलोचना करके अपने से दूर करता हूँ।

प्रश्न २६— आलोचना वैâसे करनी चाहिए ?

उत्तर—

जह बालो जंप्पंतो कज्जमकज्जं च उज्जयुं भणदि।
तह आलोचेयव्वं माया मोसं च मोत्तूण।।५६।।

जैसे बालक सरल भाव से बोलता हुआ कार्य और अकार्य, अच्छे और बुरे सभी को कह देता है उसी प्रकार से माया भाव का अभाव और असत्य को छोड़कर आलोचना करनी चाहिए।

'प्रश्न २७— जिनके पास आलोचना की जाती है वे आचार्य किन गुणों से विशिष्ट होने चाहिए ?

उत्तर—

णाणम्हि दंसणम्हि य तवे चरित्ते य चउसुवि अवंâपो।
       धीरो आगमकुसलो अपरिस्साई रहस्साणं।।५७।।

जो ज्ञान, दर्शन, तप और चारित्र इन चारों में भी अविचल हैं, धीर हैं, आगम में निपुण हैं, और रहस्य अर्थात् गुप्त दोषों को प्रकट नहीं करने वाले हैं वे आचार्य आलोचना सुनने के योग्य हैं।

प्रश्न २८—आलोचना के अनन्तर क्षमण किस प्रकार करते हैं ?

उत्तर—

रागेण य दोसेण य जं मे अकदण्हुयं पमादेण।
जो मे िंकचिवि भणिओ तमहं सव्वं खमावेमि।।५८।।

जो मैंने राग से अथवा द्वेष से न करने योग्य कार्य किया है, प्रमाद से जिसके प्रति कुछ भी कहा है उन सबसे मैं क्षमायाचना करता हूँ।

प्रश्न २९— भगवती आराधना ग्रंथ में मरण के कितने भेद बताए हैं ?

उत्तर—भगवती आराधना ग्रंथ की २६ वी गाथा में मरण के पाँच भेद बताए हैं—

(१)पण्डित पण्डित मरण

(२)पण्डित मरण

(३)बाल पण्डित मरण

(४)बाल मरण

(५)बाल—बाल मरण

प्रश्न ३०—इन मरण का स्वामी कौन—कौन है ?

उत्तर(१) पण्डित पण्डित मरण क्षीणकषाय केवली भगवान का होता है।

(२)प्रमत्त संयत से आगे मुनियों को पण्डित मरण होता है।

(३)विरताविरत संयमी जीव के मरण को बाल पण्डित मरण कहते हैं।

(४)अविरत सम्यग्दृष्टि जीव के मरण को बाल मरण कहते हैं।

(५)मिथ्यादृष्टि जीव के मरण को बाल—बाल मरण कहते हैं।

प्रश्न ३०— मरण के सत्रह भेद कौन से है। ?

उत्तर—(१)आवीचिमरण

(२)तद्भवमरण

(३)अवधिमरण

(४)आदिअंतायमरण

(५)बालमरण

(६)पंडितमरण

(७)आसण्णमरण

(८)बालपंडित मरण

(९)ससल्यमरण

(१०)बलायमरण

(११)वोसट्टमरण

(१२)विप्पाणस मरण

(१३)गिद्धपुट्ठ मरण

(१४)भत्तपच्चक्खाण मरण

(१५)प्रायोपगमन मरण

(१६)इंगिनीमरण

(१७)केवलिमरण

प्रश्न ३१— मरण के कितने भेद हैं ?

उत्तर—

तिविहं भणंति मरणं बालाणं बालपंडियाणं च।
तइयं पंडियमरणं जं केवलिणो अणुमरंति।।५९।।

मरण के तीन भेद हैं—बालमरण, बालपण्डितमरण और पण्डितमरण। असंयतसम्यग्दृष्टि जीव बाल कहलाते हैं। इनका मरण बालमरण है। संयतासंयत जीव बालपण्डित कहलाते हैं क्योंकि एकेन्द्रिय जीवों के वध से विरत न होने से ये बात हैं और द्वीन्द्रिय आदि जीवों के वध से विरत होने से पण्डित हैं इसलिए इनका मरण बालपण्डित मरण है। पण्डितों के मरण अर्थात् देह परित्याग अथवा शरीर का अन्यथा रूप होना पण्डितमरण है जिसके द्वारा केवल शुद्ध ज्ञान के धारी केवली भगवान मरण करते हैं।

प्रश्न ३२— आराधना के अपात्र वैâसे होते हैं ?

उत्तर—

जे पुण पणट्ठमदिया पचलियसण्णा य वक्कभावा य।
असमाहिणा मरंते ण हु ते आराहया भणिया।।६०।।

जो पुन: नष्ट बुद्धि वाले हैं, जिनकी आहार आदि संज्ञाएँ उत्कट हैं और जो कुटिल परिणामी हैं वे असमाधि से मरण करते हैं। निश्चित रूप से वे आराधक नहीं कहे गये हैं।

प्रश्न ३३— यदि मरण काल में परिणाम बिगड़ जाते हैं तो जीव किस गति में जाता है ?

उत्तर—

मरणे विराहिए देवदुग्गई दुल्लहा य किर बोही।
संसारो य अणंतो होइ पुणो आगमे काले।।६१।।

मरण की विराधना हो जाने पर देवदुर्गति होती है। भवन, व्यंतर ज्योतिष्कादि देवों में जन्म लेते हैं तथा निश्चितरूप से बोधि की प्राप्ति दुर्लभ हो जाती है और फिर आगामी काल में उस जीव का संसार अनन्त हो जाता है।

प्रश्न ३४— एक बार सम्यक्त्व होने पर संसार अनन्त वैâसे रहेगा क्योंकि वह अद्र्धपुद्गल प्रमाण ही तो है अत: अद्र्धपुद्गल को अनन्त संज्ञा वैâसे दी ?

उत्तर—यह अद्र्धपुद्गल परिवर्तन प्रमाण काल भी अनन्त नाम से कहा गया है क्योंकि वह केवलज्ञान का ही विषय है।

प्रश्न ३५— क्षपक आचार्यश्री से कौन—कौन से प्रश्न पूछते हैं ?

उत्तर—

का देवदुग्गईओ का बोही केण व बुज्झए मरणं।
केण व अणंतपारे संसारे िंहडए जीवो।।६२।।

देव दुर्गति का क्या लक्षण है ? बोधि का क्या स्वरूप है ? किस परिणाम से मरण नहीं जाना जाता है ? तथा किन कारणों से यह जीव, जिसका पार पाना कठिन है ऐसे अपार संसार में भ्रमण करता है ?

प्रश्न ३६— कन्दर्प, आभियोग्य, किल्पिषक, स्वमोह और आसुरी भावना का स्वरूप बताकर फल बताइए ?

उत्तर—

असत्तमुल्लावेंतो पण्णावेंतो य बहुजणं कुणइं।
वंâदप्पं रइसमावण्णो वंâदप्पेसु उववज्जइ।।६४।।
अभिजुंजइ बहुभावे साहू हस्साइयं च बहुवयणं।
अभिजोगेिंह कम्मेिंह जुत्तो वाहणेसु उववज्जई।।६५।।
तित्थयराणं पडिणीओ संघस्स य चेइयस्स सुत्तस्स।
अविणीदो णियडिल्लो किव्विसियेसूववज्जेई।।६६।।
उम्मग्गदेसओ मग्गणासओ मग्गविपडिवण्णो य।
मोहेण य मोहंतो संमोहेसूववज्जेदि।।६७।।
खुद्दी कोही माणी माई तह संकलिट्ठो तवे चरित्ते य।
अणुबद्धवेररोई असुरेसुव्वज्जदे जीवो।।६८।।

जो साधु असत्य बोलता हुआ और उसी को बहुतजनों में प्रतिपादित करता हुआ रागभाव को प्राप्त होता है, कन्दर्प भाव करता है तो वह कन्दर्प जाति के देवों में उत्पन्न होता है। जो साधु अनेक प्रकार के भावों का और हास्य आदि अनेक प्रकार के वचनों का प्रयोग करता है वह अभियोग कर्म से युक्त होता हुआ वाहन जाति के देवों में उत्पन्न होता है। जो तीर्थंकरों के प्रतिवूâल है, संघ, जिनप्रतिमा और सूत्र के प्रति अविनयी है और मायाचारी है वह किल्विषक जाति के देवों में जन्म लेता है।

जो उन्मार्ग का उपदेशक है, सन्मार्ग के विघातक तथा विरोधी है। वह मोह से अन्य को भी मोहित करता हुआ सम्मोह जाति के देवों में उत्पन्न होता है।

जो क्षुद्र, क्रोधी, मानी, मायावी है तथा तप और चारित्र में संक्लेश रखने वाला है, जो वैर को बाँधने में रूचि रखता है वह जीव असुर जाति के देवों में उत्पन्न होता है।

प्रश्न ३७— बोधि की प्राप्ति किसको दुर्लभ और सुलभ है ?

उत्तर—

मिच्छादंसणरत्ता सणिदाणा किण्हलेसमोगाढा।
इह जे मरंति जीवा तेिंस पुण दुल्लहा बोही।।६९।।
सम्मद्दंसणरत्ता अणियाणा सुक्कलेसमोगाढा।
इह जे मरंति जीवा तेिंस सुलहा हवे बोही।।७०।।

जो जीव मिथ्यादर्शन से अनुरक्त, निदान सहित और कृष्ण लेश्या से मरण करते हैं उनके लिए बोधि की प्राप्ति होना दुर्लभ है। जो सम्यग्दर्शन में तत्पर हैं, निदान भावना से रहित हैं और शुक्ल लेश्या से परिणत हैं ऐसे जो जीव मरण करते हैं उनके लिए बोधि सुलभ है।

प्रश्न ३८— संसार परिभ्रमण का क्या कारण है ?

उत्तर—

जे पुण गुरुपडिणीया बहुमोहा ससबला कुसीला य।
असमाहिणा मरंते ते होंति अणंतसंसारा।।७१।।

जो साधु गुरुओं की आज्ञा नहीं पालते हैं, मोही हैं, अतिचार सहित चारित्र पालते हैं, कुत्सित आचरण वाले हैं वे असमाधि से मरण करते हैं और अनन्त संसारी हो जाते हैं।

प्रश्न ३९— परीत संसारी किसे कहते हैं ?

उत्तर—संसार परिभ्रमण का अंत करने वाले को परीत संसारी कहते हैं।

प्रश्न ४०— परीत संसारी का अंत वैâसे करता है ?

उत्तर—

जिणवयणे अणुरत्ता गुरुवयणं जे करंति भावेण।
असबल असंकिलिट्ठा ते होंति परित्तसंसारा।।७२।।

जो जिनेन्द्रदेव के वचनों में अनुरागी है, भाव से गुरु आज्ञा का पालन करते हैं, अतिचार रहित हैं तथा संक्लेशभाव रहित हैं वे संसार का अंत करने वाले होते हैं।

प्रश्न ४१— यदि जिन वचन में अनुराग नहीं होगा तो क्या होगा ?

उत्तर—

बालमरणाणि बहुसो बहुयाणि अकामयाणि मणाणि।
मरिहंति ते वराया जे जिणवयणं ण जाणंति।।७३।।

जो जिनवचन को नहीं जानते हैं वे बेचारे अनेक बार बालमरण करते हुए अनेक प्रकार के अनिच्छित बाल—बाल मरणों से मरण करते रहेंगे।

प्रश्न ४२— किन कारणों से बाल बाल मरण होता है ?

उत्तर—

सत्थग्गहणं विसभक्खणं च जलणं जलप्पवेसो य।
अणयारभंडसेवी जम्मणमरणाणुबंधीणि।।७४।।

शस्त्रों के घात से मरना, विष भक्षण करना, अग्नि में जल जाना, जल में प्रवेश कर मरना और पाप क्रियामय द्रव्य का सेवन करके मरना ये मरण—जन्म और मृत्यु की परम्परा को करने वाले बाल—बाल मरण हैं।

प्रश्न ४३— क्षपक संसार परिभ्रमण से भयभीत होकर संवेग वैराग्यपूर्वक क्या कहता है ?

उत्तर—

उड्ढमधो तिरियाह्मि दु कदाणि बालमरणाणि बहुगाणि।
दंसणणाणसहगदो पंडियमरणं अणुमरिस्से।।७५।।
उव्वेयमरणं जादीमरणं णिरएसु वेदणाओ य।
एदाणि संभरंतो पंडियमरणं अणुमरिस्से।।७६।।

ऊध्र्वलोक, अधोलोक और तिर्यग् लोक में मैंने बहुत बार बालमरण किये हैं अब मैं दर्शन और ज्ञान से सहित होता हुआ पण्डित मरण से मरूँगा। उद्वेग पूर्वक मरण, जन्मते ही मरण और जो नरकों की वेदनाएँ हैं इन सबका स्मरण करते हुए अब मैं पण्डित मरण से प्राण त्याग करूँगा।

प्रश्न ४४— सभी मरणों में पण्डितमरण ही अधिक शुभ क्यों है ?

उत्तर—

एक्वंâ पंडिदमरणं िंछददि जादीसयाणि बहुगाणि।
तं मरणं मरिदव्वं जेण मदं सुम्मदं होदि।।७७।।

एक पण्डितमरण सौ—सौ जन्मों का नाश कर देता है अत: ऐसे ही मरण से मरना चाहिए कि जिससे मरण सुमरण हो जावे।

प्रश्न ४५— क्षपक को यदि संन्यास के समय भूख प्यास आदि पीड़ाएँ उत्पन्न हो जावें तो क्या करना चाहिए ?

उत्तर—

जइ उप्पज्जइ दु:खं तो दट्ठव्वो सभावदो णिरए।
कदमं मए ण पत्तं संसारे संसरंतेण।।७८।।

यदि असातावेदनीय कर्म के उदय से दु:ख उत्पन्न होता है तो नरक के स्वरूप का अवलोकन मन से करना चाहिए। जिससे भूख आदि वेदनाओं से धैर्य च्युत नहीं होता है।

प्रश्न ४६— क्षपक किस प्रकार िंचतवन करता है ?

उत्तर—

संसारचक्कवालम्मि मए सव्वेवि पुग्गला बहुसो।
आहारिदा य परिणामिदा य ण य मे गदा तित्ती।।७९।।

चतुर्गति के जन्म मरण रूप भँवर में मैंने सभी पुद्गल वर्गणाओं को अनन्त बार ग्रहण किया है, खलभाग रसभाग रूप से परिणमाया भी है, अर्थात् उन्हें जीर्ण भी किया है किन्तु आज तक उनसे मुझ तृप्ति नहीं हुई, प्रत्युत आकांक्षाऐं बढ़ती ही गयी है।

प्रश्न ४७— जीव की तृष्णा किस प्रकार तृप्त नहीं होती उदहारण देवें ?

उत्तर—

तिणकट्ठेण व अग्गी लवणसमुद्दो णदीसहस्सेिंह।
ण इमो जीवो सक्को तिप्पेदुं कामभोगेिंह।।८०।।

जैसे अग्नि तृण और लकड़ियों के समूह से तृप्त नहीं होती है। जैसे हजारों नदियों से लवण समुद्र तृप्त नहीं होता उसी प्रकार से इच्छित सुख के साधनभूत आहार, स्त्री, वस्त्र आदि काम भोगों से इस जीव को संतुष्ट करना शक्य नहीं है।

प्रश्न ४८— भावना मात्र से भी कर्मों का बंध हो सकता है उदाहरण देवें ?

उत्तर—

वंâखिदकलुसिदभूदो कामभोगेसु मुच्छिदो संतो।
अभुंजंतोवि य भोगे परिणामेण णिवज्झेइ।।८१।।
आहारणिमित्तं किर मच्छा गच्छंति सत्तिंम पुढिंव।
सच्चित्तो आहारो ण कप्पदि मणसावि पत्थेदुं।।८२।।

आकांक्षा और कलुषता से सहित हुआ यह जीव काम और भोगों में र्मूिच्छत होता हुआ, भोगों को नहीं भोगता हुआ भी परिणाम मात्र से कर्मों के द्वारा बन्ध को प्राप्त होता है। स्वयंभूरमण समुद्र में महामत्स्य के कर्ण में तन्दुल मत्स्य होते हैं जो कि तन्दुल के समान ही लघु शरीर वाले हैं। वे मत्स्य आदि जन्तु महामत्स्य के मुख में प्रवेश करते हुए और निकलते हुए तमाम जीवों को देखते हैं तो सोचते रहते हैं कि यदि मेरा बड़ा शरीर होता तो मैं इन सबको खा लेता, एक को भी नहीं छोड़ता किन्तु वे खा नहीं पाते हैं। तथापि इस भावना मात्र से पाप बन्ध करते हुए वे तंदुल मत्स्य जीव भी सातवें नरक में चले जाते हैं।

प्रश्न ४९— क्षपक को परिणाम शुद्धि के लिए किस प्रकार समझते है ?

उत्तर—

पुव्वं कदपरियम्मो अणिदाणो ईहिदूण मदिबुद्धी।
पच्छा मलिदकसाओ सज्जो मरणं पडिच्छाहि।।८३।।
हंदि चिरभाविदावि य जे पुरुसा मरणदेसयालम्मि।
पुव्वकदकम्मगरुयत्तणेण पच्छा परिबडंति।।८४।।

पूर्व में कहे हुए कन्दर्प आदि भावना रूप या सदोष आहार की इच्छा रूप विपरीत परिणाम से जीव नरक में चला जाता है इसलिए प्रत्यक्ष और परोक्ष प्रमाण द्वारा आगम में जो कहा गया है उसका निश्चय करके पहले तपश्चरण का अनुष्ठान करो। पुन: निदान भाव रहित होते हुए तथा कषायों का त्याग करते हुए तुम इस समय कृतकृत्य होकर समाधिमरण का अनुष्ठान करो। जिन्होंने चिरकाल तक अभ्यास किया है ऐसे पुरुष भी मरण के देश—काल में पूर्व में किये गये कर्मों के भार से पुन: च्युत हो जाते हैं।

प्रश्न ५०— चन्द्रकवेध्य के निमित्त अपने को गुणयुक्त करने वाले पुरुष ने जो कार्य किया था उसका किस प्रकार विवेचन करते हैं ?

उत्तर—

तह्मा चंदयवेज्झस्स कारणेण उज्जदेण पुरिसेण।
जीवो अविरहिदगुणो कादव्वो मोक्खमग्गमि।।८५।।
कणयलदा णागलदा विज्जुलदा तहेव वुंâदलदा।
एदाविय तेण हदा मिथिलाणयरिए मिंहदयत्तेण।।८६।।
सायरगो बल्लहगो कुलदत्तो वड्डमाणगो चेव।
दिवसेणिक्केण हदा मिहिलाए मिंहददत्तेण।।८७।।

चंद्रकवेध यंत्र को वेधने के लिए खूब अभ्यास करना पड़ता है। ऐसे चंद्रक वेध्य के लिए उद्युक्त हुए वीर पुरुष यंत्र की तरफ एकाग्र चित्त होकर उसको विद्ध करने में सफल होता है, वैसे ही सल्लेखना मरण के लिए उद्युक्त हुआ क्षपक ज्ञानदर्शन चारित्रादि में स्थिर रहेगा तभी समाधिमरण कार्य में सफल होगा।

उदा. मिथिला नगरी में महेन्द्र दत्त नामक पुरुष ने सागरक, वल्लभक, कुलदत्त और वर्धमानक ऐसे चार पुरुषों को चंद्रकवेध्य के समय मारा था। तथा उसी ने ही उसी नगरी में कनकलता, नागलता, विद्युलता और वुंâदलता इन स्त्रियों को मारा था उसी प्रकार मुनि भी समाधिमरण के समय यत्न करके क्रोधादि कषायों का नाश करें।

प्रश्न ५१— निर्यापकाचार्य के अभाव में क्षपक की वैâसी अवस्था होती है ?

उत्तर—

जह णिज्जावयरहिया णावाओ वररदण सुपुण्णाओ।
पट्ठणमासण्णाओ खु पमादमला णिबुड्डंति।।८८।।

जैसे उत्तम रत्नों से भी हुई नौकाएँ नगर के समीप किनारे पर आकार भी, कर्णधार के अभाव में प्रमाद के कारण नौकाएँ डूब जाती हैं वैसे क्षपक रूपी नौकाएँ भी रत्नत्रय रूपी रत्नों से परिपूर्ण हैं। संन्यास रूपी पत्तन—किनारे तक आ चुकी हैं फिर भी निर्यापकाचार्य के अभाव में प्रमाद से वे क्षपकरूपी नौकाएँ संसार समुद्र में डूब जाती हैं अत: सावधानी रखनी चाहिए।

प्रश्न ५२— संन्यास काल में अभ्रावकाशादिक योग धारण करना क्षपक के लिए अशक्य है अत: उस समय किस प्रकार यत्न करना चाहिए ?

उत्तर—

बाहिर जोग विरहिओ अब्भंतरजोग झाणमालीणो।
तह तम्हि देसयाले अमूढसण्णो जहसु देहं।।८९।।

अभ्रावकाश, आतापन और वर्षायोग इन योगों को बाह्ययोग कहते हैं। हिमकाल में नदी के तट समीप ध्यानस्थ होकर शीतपरीषह सहन करना अभ्रावकाश योग है। गर्मी के दिनों में पर्वत के शिलापर ध्यान में निमग्न रहना आतापन योग है तथा वर्षाकाल में झाड़ के नीचे ध्यान करना वर्षायोग अथवा वृक्षमूलयोग है। संन्यास काल में इन योगों से तपश्चरण करने का सामथ्र्य क्षपक में नहीं रहता है। ऐसी परिस्थिति में वह क्षपक अपने आत्मा के स्वरूप का िंचतन करते हुए जो ध्यान होता है वह आभ्यन्तर योग है। इन योग का आश्रय लेकर क्षपक आहारादि संज्ञाओं का त्याग करके देह को छोड़े।

प्रश्न ५३— आहारादि संज्ञाओं से रहित होकर शरीर त्याग करने पर क्या फल प्राप्त होता है ?

उत्तर—

हंतूण रागदोसे छेत्तूण य अट्ठकम्मसंखलियं।
जम्मणमरणरहट्टं भेत्तूण भवाहि मुच्चिहसि।।९०।।

हे क्षपक ! जब तुम आहारादि संज्ञा से रहित होकर राग द्वेष का त्याग करोगे तब तुम्हारे ज्ञानावरणादि आठ कर्मों की शृंखला टूट जाने से जन्म करण रूपी अरहट भी नष्ट होगा जिससे तुम संसार भ्रमण से मुक्त होकर नित्य सुखी होगे।

प्रश्न ५४— निर्यापकाचार्य का उपदेश सुनकर क्षपक क्या कहता है ?

उत्तर—

सव्वमिदं उवदेसं जिणदिट्ठं सद्दहामि तिविहेण।
तसथावरखेमकरं सारं णिव्वाणमग्गस्स।।९१।।

जिनेन्द्रदेव द्वारा कथित सम्पूर्ण इस उपदेश का मन वचन काय से श्रद्धान करता हूँ। यह निर्वाण मार्ग का सार है और त्रस तथा स्थावर जीवों का क्षेम—सुख करने वाला है।

प्रश्न ५५— संन्यास काल में द्वादशांग श्रुतज्ञान में क्षपक श्रद्धान करता है परन्तु सम्पूर्ण श्रुत का िंचतन और पठन भी करता है क्या ?

उत्तर—

ण हि तम्हि देसयाले सक्को बारसविहो सुदक्खंधो।
सव्वो अणुिंचतेदुं बलिणावि समत्थचित्तेण।।९२।।

समाधि काल में सम्पूर्ण द्वादशांग ज्ञानरूपी श्रुतवृक्ष का िंचतन करना अर्थात् उसके अर्थ की भावना करना और उसका पठन करना शरीर बल युक्त ऐसे क्षपक को भी अशक्य है। यद्यपि उसका शरीर बल युक्त हो और मन भी एकाग्र हो तो भी समस्त श्रुतज्ञान का चिन्तन शरीर त्याग के समय होना अशक्य है।

प्रश्न ५६— यदि अंत समय में सम्पूर्ण द्वादशांग को स्मरण नहीं कर सकता है तो उस क्षपक को क्या करना चाहिए।

उत्तर—

सत्तक्खरसज्झाणं अरहंताणं णमोत्ति भावेण।
जो कुणदि अणण्णमदी सो पावदि उत्तमं ठाणं।। कुन्द. मूला.।।

‘णमो अरहंताणं’ यह सप्त अक्षर युक्त मन्त्र है। जो क्षपक एकाग्रचित होकर इस मन्त्र का ध्यान करता है, वह उत्तम स्थान—मोक्ष को प्राप्त कर लेता है और यदि क्षपक अचरम शरीरी है तो स्वर्ग में इन्द्रादि पद का धारक होता है।

एक्कह्मि बिदियह्मि पदे संवेगो वीयराय मग्गम्मि।
वच्चदिणरो अभिक्खं तं मरणंते ण मोत्तव्वं।।९३।।

‘नमोऽर्हद्भ्य:’ नम: सिद्धेभ्य: इन दोनों नमस्कार पदों को मरणसमय में क्षपक को विस्मरण न हो तथा सर्वसंग परित्याग किये हुए क्षपक को वीतराग मार्ग का प्रतिपादन करने वाले जिनागम में अतिशय हर्ष रखना चाहिए। वंâठगत प्राण होने पर भी ‘ऊँ—ह्रीं’ आदि बीजाक्षर पदों का िंचतन करते करते प्राण त्याग करना चाहिए।

यहाँ पर ‘पद’ शब्द का अर्थ : अर्थ पद या ग्रंथ पद या प्रमाण पद या नमस्कार पद है।

‘एक बीजपद’ का अर्थ है : ‘ऊँ, ह्रीं’ या ‘असिआउसा’ आदि बीजाक्षर पदों का आश्रय लेना।

एदह्मादो एक्वंâ हि सिलोगं मरणदेसयालह्मि।
आराहणउवजुत्तो िंचतंतो आराधओ होदि।।९४।।

आराधना में लगा हुआ साधु मरण के काल में इस श्रुत समुद्र से एक भी श्लोक का, पद का चिन्तवन करता हुआ आराधक हो जाता है।

प्रश्न ५७— मरणकाल में पीड़ा उत्पन्न हो जावे तो क्या औषधि है ?

उत्तर—

जिणवयणमोसहमिणं विसयसुहविरेयणं अमिदभूदं।
जरमरणवाहिवेयणखयकरणं सव्वदुक्खाणं।।९५।।

विषय सुख का विरेचन कराने वाले और अमृतमय ये जिनवचन ही औषध हैं। ये जरा मरण और व्याधि से होने वाली वेदना को तथा सर्व दु:खों को नष्ट करने वाले हैं।


प्रश्न ५८— मरण समय में शरण कौन है ?

उत्तर—

णाणं सरणं मे दंसणं च सरणं चरियसरणं च।
तव संजमं च सरणं भगवं सरणो महावीरो।।९६।।

(यह गाथा वुंâदवुंâदाचार्य कृत मूलाचार में नहीं है।)

मरण समय में ज्ञान, दर्शन, चारित्र और तप ये ही मेरे रक्षक हैं और इनके उपदेष्टा भगवान महावीर ही मेरे रक्षक हैं।

प्रश्न ५९— सल्लेखना का फल क्या है ?

उत्तर—

आराहण उवजुत्तो कालं काऊण सुविहिओ सम्मं।
उक्कस्सं तिण्णि भवे गंतूण य लहइ णिव्वाणं।।९७।।

आराधना में तत्पर हुआ साधु आगम में कथित सम्यक््âप्रकार से मरण करके उत्कृष्ट रूप से तीन भव को पाकर पुन: निर्वाण को प्राप्त कर लेता है।

प्रश्न ६०— सल्लेखना के प्रति क्षपक र्हािदक प्रसन्नता दृढ़ता किस प्रकार दिखलाता है ?

उत्तर—

समणो मेत्ति य पढमं बिदियं सव्वत्थ संजदो मेत्ति।
सव्वं च वोस्सरामि य एदं भणिदं समासेण।।९८।।
लद्धं अलद्धपुव्वं जिणवयण सुभासिदं अमिदभूदं।
गहिदो सुग्गइमग्गो णाहं मरणस्स बीहेमि।।९९।।

पहला तो मेरा श्रमण यह रूप है और दूसरा सभी जगह मेरा संयत—संयमित होना यह रूप है इसलिए संक्षेप से कहे गये इन सभी अयोग्य का मैं त्याग करता हूँ। जिनको पहले कभी प्राप्त नहीं किया था। ऐसे अलब्धपूर्ण, अमृतमय, जिनवचन सुभाषित को मैंने अब प्राप्त किया है। अब मैंने सुगति के मार्ग को ग्रहण कर लिया है इसलिए अब मैं मरण से नहीं डरता हूँ।

प्रश्न ६१— सल्लेखना के समय मृत्यु भय से मुक्त होने के लिए निर्यापकाचार्य क्षपक को किस प्रकार उपदेश देते हैं ?

उत्तर—

धीरेण वि मरिदव्वं णिद्धीरेण वि अवस्स मरिदव्वं।
जदि दोिंह वि मरिदव्वं वरं हि धीरत्तणेण मरिदव्वं।।१००।।
सीलेणवि मरिदव्वं णिस्सीलेणवि अवस्स मरिदव्वं।
जइ दोिंह वि मरियव्वं वरं हु सीलत्तणेण मरियव्वं।।१०१।।

धीर वीर को भी मरना पड़ता है और निश्चित रूप से धैर्य रहित जीव को भी मरना पड़ता है। यदि दोनों को मरना ही पड़ता है तब तो धीरता सहित होकर ही मरना अच्छा है शीलयुक्त को भी मरना पड़ता है और शील रहित को भी मरना पड़ता है यदि दोनों को ही मरना पड़ता है तब तो शील सहित होकर ही मरना श्रेष्ठ है।

प्रश्न ६२— ब्रह्मचर्य उपासना का फल क्या है ?

उत्तर—

चिरउसिदबंभयारी पप्फोडेदूण सेसयं कम्मं।
अणुपुव्वीय विसुद्धो सुद्धो सिद्धिं गिंद जादि।।१०२।।

चिरकाल तक ब्रह्मचर्य का उपासक साधु शेष कर्म को दूर करके क्रम से विशुद्ध होता हुआ शुद्ध होकर सिद्ध गति को प्राप्त कर लेता है।

प्रश्न ६३— सल्लेखना का पात्र आराधक वैâसा होता है ?

उत्तर—

qणम्ममो णिरहंकारो णिक्कसाओ जििंददिओ धीरो।
अणिदाणो दिठिसंपण्णो मरंतो आराहओ होज।।१०३।।
णिक्कसायस्स दंतस्स सूरस्स ववसाइणो।
संसारभयभीदस्स पच्चक्खाणं सुहं हबे।।१०४।।

जो ममत्व रहित, अहंकार रहित, कषाय रहित, जितेन्द्रिय, धीर, निदान रहित और सम्यग्दर्शन से सम्पन्न है वह मरण करता हुआ आराधक होता है। जो कषाय रहित है। इन्द्रियों का दमन करने वाला है, शूर है, पुरुषार्थी है और संसार से भयभीत है उसके सुखपूर्वक प्रत्याख्यान होता है।

प्रश्न ६४— उपसंहार द्वारा आराधना फल का कथन कीजिए ?

उत्तर—

एदं पच्चक्खाणं जो काहदि मरणदेसयालम्मि।
धीरो अमूढसण्णो सो गच्छइ उत्तमं ठाणं।।१०५।।

धैर्यवान, आहार, भय, आदि संज्ञाओं में लम्पटता रहित जो साधु मरण के समय उपर्युक्त प्रत्याख्यान को करते हैं वे उत्तम अर्थात् निर्वाण स्थान को प्राप्त कर लेते हैं।

प्रश्न ६५— अंतिम मंगल और क्षपक समाधि के लिए किस प्रकार प्रार्थना करता है ?

उत्तर—

वीरो जरमरणरिऊ वीरो विण्णाणणाण संपण्णो।
लोगस्सुज्जोययरो जिणवरचंदो दिसदुबोिंध।।१०६।।

वीर भगवान ज्ञान, दर्शन, चारित्र से सम्पन्न हैं लोक का उद्योत करने वाले हैं, जरा—मरण को नष्ट करने वाले हैं, ऐसे हे वर्धमान भगवान मुझे बोधि—समाधि प्रदान करें।

प्रश्न ६६— वट्टकेराचार्य भगवान से क्या प्रार्थना करते हैं ?

उत्तर—

जा गदी अरहंताणं णिट्ठिदट्ठाणं च जा गदी।
जा गदी वीदमोहाणं सा मे भवदु सस्सदा।।१०७।।

हे भगवान, जो गति अर्हंतों की, सिद्धों की और क्षीणकषायी जीवों की होती है वही गति मेरी हमेशा होवें और मैं कुछ भी आपसे नहीं माँगता हूँ।