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०२. सर्वोच्च विजय से आत्मालोचन तक

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सर्वोच्च विजय

दुर्जय संग्राम में लाखों शत्रुओं को जीतने की अपेक्षा एक अपनी आत्मा को जीतना सर्वश्रेष्ठ विजय है।

दश शत्रु

पाँच इन्द्रिय और चार कषाय (क्रोध, मान, माया और लोभ) दुर्जेय हैं। इनसे भी अधिक कठिन अपनी आत्मा पर विजय पाना है। आत्मा को जीत लेने पर ये सब स्वत: ही वश में हो जाते हैं।

आत्मा—संयम

जिस प्रकार कछुआ अपने अंगों को अपने शरीर में समेट लेता है, उसी प्रकार मेधावी पुरुष आध्यात्मिक भावना द्वारा पाप कर्मों से अपने आपको हटा लेता है।

अनुशासन किस पर ?

वह औरों पर अनुशासन कैसे करेगा, जो अपने आप पर अनुशासन नहीं रख पाता है?

आत्म—निरीक्षण

साधक प्रत्येक दिवस के अंत में विचार करे—मैंने क्या सत्कर्म किया और क्या नहीं किया है? और वह कौन—सा कार्य है, जिसे मैं क्षमता होते हुए भी नहीं कर पाया हूँ ?

आत्मालोचन

जिस प्रकार बालक बोलता हुआ अच्छे व बुरे किये हुए कार्य को सरलता से कह देता है, उसी प्रकार सरलता से अपने दोषों की आलोचना करनेवाला व्यक्ति माया व घमंड से मुक्त होता है।

प्रायश्चित

व्यक्ति जान या अनजान में कोई अधर्म कार्य कर बैठे तो अपनी आत्मा को तुरंत उससे हटा ले तथा ऐसी प्रतिज्ञा करे कि वह ऐसा कार्य पुन: नहीं करेगा।