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०३३.अकृत्रिम जिनमंदिर के बावड़ी में जिनमंदिर

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अकृत्रिम जिनमंदिर के बावड़ी में जिनमंदिर

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चउजोयणउच्छेहा उवरिं पीढस्स कणयवरखंभा।

विविहमणिणियरखचिदा चामरघंटापयारजुदा।।१९१२।।
सव्वेसुं थंभेसुुं महाधया विविहवण्णरमणिज्जा।
णामेण महिंदधया छत्तत्तयसिहरसोहिल्ला।।१९१३।।
पुरदो महाधयाणं मकरप्पमुहेहिं मुक्कसलिलाओ।
चत्तारो वावीओ कमलुप्पलकुमुदछण्णाओ।।१९१४।।
पण्णासकोसउदया कमसो पणुवीस रुंददीहत्ता।
दस कोसा अवगाढा वावीओ वेदियादिजुत्ताओ।।१९१५।।
को ५० । १०० । गा १० ।
वावीणं बहुमज्झे चेट्ठदि एक्को जिणिंदपासादो।
विप्पुरिदरयणकिरणो किंबहुसो सो णिरुवमाणो।।१९१६।।
तत्तो दहाउ पुरदो पुव्वुत्तरदक्खिणेसु भागेसुं।
पासादा रयणमया देवाणं कीडणा होंति।।१९१७।।

पीठ के ऊपर विविध प्रकार के मणिसमूह से खचित और अनेक प्रकार के चमर व घंटाओं से युक्त चार योजन ऊंचे सुवर्णमय खम्भे हैं ।।१९१२।। सब खम्भों के ऊपर अनेक प्रकार के वर्णों से रमणीय और शिखररूप तीन छत्रों से सुशोभित महेन्द्र नामक महाध्वजायें हैं।।१९१३।। महाध्वजाओं के आगे मगर आदि जलजन्तुओं से रहित जलवाली और कमल, उत्पल व कुमुदों से व्याप्त चार वापिकाएँ हैं।।१९१४।। वेदिकादि से सहित वापिकायें प्रत्येक पचास कोस प्रमाण विस्तार से युक्त, इससे दुगुणी अर्थात् सौ कोस लम्बी और दश कोस गहरी हैं।।१९१५।। को. ५० । १०० । ग. १०।

वापियों के बहुमध्य भाग में प्रकाशमान रत्नकिरणों से सहित एक जिनेन्द्रप्रासाद स्थित है। बहुत कथन से क्या, वह जिनेन्द्रप्रासाद निरूपम है।।१९१६।। अनन्तर वापियों के आगे पूर्व, उत्तर और दक्षिण भागों में देवों के रत्नमय क्रीड़ाभवन हैं।।१९१७।। (तिलोयपण्णत्ति महाअधिकार-४,पृ॰ ३९१)