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०३-कायमार्गणाधिकार

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विषय सूची

कायमार्गणाधिकार

अथ कायमार्गणाधिकार:

अथ षड्भि: स्थलै एकोनसप्ततिसूत्रै: अल्पबहुत्वानुगमे कायमार्गणानामतृतीयोऽधिकार: प्रारभ्यते। तत्र प्रथमस्थले त्रसकायिकादिजीवानामल्पबहुत्वकथनत्वेन ‘‘कायाणुवादेण’’ इत्यादिसूत्रसप्तकं। तत: परं द्वितीयस्थले विशेषेण वनस्पतिकायिकादिजीवानामल्पबहुत्वनिरूपणत्वेन ‘‘सव्वत्थोवा-’’ इत्यादिना पंचदशसूत्राणि। तदनु तृतीयस्थले अन्येन भिन्नप्रकारेण जीवानामल्पबहुत्वप्रतिपादनत्वेन ‘‘सव्वत्थोवा’’ इत्यादिना षोडशसूत्राणि। तत्पश्चात् चतुर्थस्थले पुनरपि अन्यप्रकारेण बादरतेजस्कायिकादिजीवानामल्प-बहुत्वनिरूपणत्वेन ‘‘सव्वत्थोवा’’ इत्यादिना एकत्रिंशत्सूत्राणि, इति समुदायपातनिका भवति।
इदानीं कायमार्गणायामल्पबहुत्वप्रतिपादनाय सूत्रसप्तकमवतार्यते-
कायाणुवादेण सव्वत्थोवा तसकाइया।।३८।।
तेउकाइया असंखेज्जगुणा।।३९।।
पुढविकाइया विसेसाहिया।।४०।।
आउक्काइया विसेसाहिया।।४१।।
वाउक्काइया विसेसाहिया।।४२।।
अकाइया अणंतगुणा।।४३।।
वणप्फदिकाइया अणंतगुणा।।४४।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सर्वस्तोका: त्रसकायिका: कायमार्गणायां त्रसेषूत्पत्तियोग्यपरिणामेषु जीवानामतीवतनुत्वात्। न च शुभपरिणामेषु बहवो जीवा: संभवन्ति, शुभपरिणामानां प्रायेणासंभवात्। एभ्य: तेजस्कायिका: असंख्यातगुणा:, जगत्प्रतरस्यासंख्यातभागमात्रै: त्रसजीवै: अपवर्तिततेजस्कायिक- प्रमाणत्वात्। पृथिवीकायिका: विशेषाधिका:, अत्र विशेषप्रमाणमसंख्याता: लोका:, तेजस्कायिकाना- मसंख्यातभाग:। अप्कायिका: विशेषाधिका:, वायुकायिका: विशेषाधिका:, अकायिका अनन्तगुणा:, अत्र गुणकार: अभव्यसिद्धजीवैरनन्तगुण:।
कुत: ? असंख्यातलोकमात्रवायुकायिकभाजिताकायिकप्रमाणत्वात्।
तत्तो वनस्पतिकायिका: अनन्तगुणा: सन्ति।
एवं प्रथमस्थले सामान्येन षट्कायिकानामल्पबहुत्वकथनत्वेन सप्त सूत्राणि गतानि।
अधुना विशेषेणान्यप्रकारेण वा त्रसकायिकादिजीवानामल्पबहुत्वप्रतिपादनाय पंचदशसूत्राण्यवतार्यन्ते-
सव्वत्थोवा तसकाइयपज्जत्ता।।४५।।
तसकाइयअपज्जत्ता असंखेज्जगुणा।।४६।।
तेउक्काइयअपज्जत्ता असंखेज्जगुणा।।४७।।
पुढविकाइयअपज्जत्ता विसेसाहिया।।४८।।
आउक्काइयअपज्जत्ता विसेसाहिया।।४९।।
वाउक्काइयअपज्जत्ता विसेसाहिया।।५०।।
तेउक्काइयपज्जत्ता संखेज्जगुणा।।५१।।
पुढविकाइयपज्जत्ता विसेसाहिया।।५२।।
आउकाइयपज्जत्ता विसेसाहिया।।५३।।
वाउकाइयपज्जत्ता विसेसाहिया।।५४।।
अकाइया अणंतगुणा।।५५।।
वणप्फदिकाइयअपज्जत्ता अणंतगुणा।।५६।।
वणप्फदिकाइयपज्जत्ता संखेज्जगुणा।।५७।।
वणप्फदिकाइया विसेसाहिया।।५८।।
णिगोदा विसेसाहिया।।५९।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-प्रतरांगुलस्य असंख्यातभागेनापवर्तितजगत्प्रतरप्रमाणत्वात् त्रसकायिका: पर्याप्ता: सर्वस्तोका: सन्ति। त्रसकायिकापर्याप्ता: तत्तोऽसंख्यातगुणा:, अत्र आवलिकाया: असंख्यातभागो गुणकार:।
कुत: ?
प्रतरांगुलस्य असंख्यातभागेनापवर्तितजगत्प्रतरमात्रा: त्रसकायिका: अपर्याप्ता:, इति ‘‘द्रव्यानियोगद्वारे प्ररूपितत्वात्।’’
तेजस्कायिका: अपर्याप्ता: असंख्यातगुणा:, अत्र गुणकारोऽसंख्याता: लोका:, पृथिवीजलवायुकायिका: अपर्याप्ता: क्रमेण विशेषाधिका:, अत्र विशेषप्रमाणमसंख्याता: लोका:। एभ्य: क्रमेण तेजस्कायिकपर्याप्ता: संख्यातगुणा:। पृथिवी-जल-वायुकायिका: पर्याप्ता: विशेषाधिका: क्रमश:, अत्रापि विशेषप्रमाणं असंख्याता लोका:। वायुकायिकपर्याप्तेभ्य: अकायिका: सिद्धा: अनन्तगुणा: सन्ति।
अकायिकेभ्यो वनस्पतिकायिका: अपर्याप्ता: अनन्तगुणा: सन्ति। एभ्य: पर्याप्ता: वनस्पतिकायिका: संख्यातगुणा:, एभ्यो वनस्पतिकायिका: विशेषाधिका:।
कियन्मात्रो विशेष: ?
वनस्पतिकायिकापर्याप्तमात्र:। एभ्यो निगोदा: विशेषाधिका:।
कियन्मात्रो विशेष: ?
बादरवनस्पतिप्रत्येकशरीर-बादरनिगोदप्रतिष्ठितमात्र:।
एवं द्वितीयस्थले अन्यप्रकारेणाल्पबहुत्वकथनत्वेन पंचदशसूत्राणि गतानि।


अथ कायमार्गणा अधिकार

अब चार स्थलों में उनहत्तर (६९) सूत्रों के द्वारा अल्पबहुत्वानुगम में कायमार्गणा नाम का तृतीय अधिकार प्रारंभ होता है। उनमें से प्रथम स्थल में त्रसकायिक आदि जीवों का अल्पबहुत्व कथन करने वाले ‘‘कायाणुवादेण’’ इत्यादि सात सूत्र हैं। उसके बाद द्वितीय स्थल में विशेषरूप से वनस्पतिकायिक आदि जीवों का अल्पबहुत्व निरूपण करने वाले ‘‘सव्वत्थोवा’’ इत्यादि पन्द्रह सूत्र हैं। इसके पश्चात् तृतीय स्थल में अन्य प्रकार से जीवों का अल्पबहुत्व प्रतिपादन करने हेतु ‘‘सव्वत्थोवा’’ इत्यादि सोलह सूत्र हैं। तत्पश्चात् चतुर्थ स्थल में पुनरपि अन्य प्रकार से बादर तेजस्कायिक आदि जीवों का अल्पबहुत्व निरूपण करने वाले ‘‘सव्वत्थोवा’’ इत्यादि इकतीस सूत्र हैं। इस प्रकार सूत्रों की समुदायपातनिका हुई।

अब सर्वप्रथम सामान्यरूप से कायमार्गणा में अल्पबहुत्व का प्रतिपादन करने हेतु सात सूत्र अवतरित किये जाते हैं-

सूत्रार्थ-

कायमार्गणा के अनुसार त्रसकायिक जीव सबसे कम हैं।।३८।।

त्रसकायिकों से तेजस्कायिक जीव असंख्यातगुणे हैं।।३९।।

तेजस्कायिकों से पृथिवीकायिक जीव विशेष अधिक हैं।।४०।।

पृथिवीकायिकों से अप्कायिक जीव विशेष अधिक हैं।।४१।।

अप्कायिकों से वायुकायिक जीव विशेष अधिक हैं।।४२।।

वायुकायिकों से अकायिक जीव अनन्तगुणे हैं।।४३।।

अकायिकों से वनस्पतिकायिक जीव अनन्तगुणे हैं।।४४।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-कायमार्गणा में सबसे कम त्रसकायिक जीव है, क्योंकि त्रसों में उत्पन्न होने के योग्य परिणामों में जीव अत्यन्त थोड़े पाये जाते हैं और शुभ परिणामों में बहुत जीवों का होना संभव नहीं हैं, क्योंकि शुभ परिणाम प्राय: करके असंभव हैं। इनसे तेजस्कायिक जीव असंख्यात हैं, क्योंकि जगत्प्रतर के असंख्यातवें भागप्रमाण त्रसकायिक जीवों का तेजस्कायिक जीवराशि में भाग देने पर जो लब्ध आवे उतना प्रमाण होता है। पृथिवीकायिक जीव विशेष अधिक होते हैं, यहाँ विशेष प्रमाण असंख्यातलोक प्रमाण है, क्योंकि वे तेजस्कायिक जीवों के असंख्यातवें भागप्रमाण हैं। इनसे जलकायिक जीव विशेष अधिक हैं, जलकायिक से वायुकायिक जीव विशेष अधिक हैं और उनसे अकायिक-कायरहित जीव अनन्तगुणे हैं। यहाँ गुणकार अभव्यसिद्ध जीवों से अनन्तगुणे है।

कैसे ? क्योंकि असंख्यातलोकमात्र वायुकायिक जीवों से भाजित अकायिक जीवों का प्रमाण होता है।

उनसे वनस्पतिकायिक जीव अनन्तगुणे हैं।

इस प्रकार से प्रथम स्थल में सामान्य से षट्कायिक जीवों का अल्पबहुत्व बतलाने वाले सात सूत्र पूर्ण हुए।

अब विशेषरूप से अथवा अन्य प्रकार से त्रसकायिक आदि जीवों का अल्पबहुत्व प्रतिपादन करने हेतु पन्द्रह सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

त्रसकायिक पर्याप्त जीव सबमें स्तोक हैं।।४५।।

त्रसकायिक पर्याप्तों से त्रसकायिक अपर्याप्त जीव असंख्यातगुणे हैं।।४६।।

त्रसकायिक अपर्याप्तों से तेजस्कायिक अपर्याप्त जीव असंख्यातगुणे हैं।।४७।।

तेजस्कायिक अपर्याप्तों से पृथिवीकायिक अपर्याप्त जीव विशेष अधिक हैं।।४८।।

पृथिवीकायिक अपर्याप्तों से अप्कायिक अपर्याप्त जीव विशेष अधिक हैं।।४९।।

अप्कायिक अपर्याप्तों से वायुकायिक अपर्याप्त जीव विशेष अधिक हैं।।५०।।

वायुकायिक अपर्याप्तों से तेजस्कायिक पर्याप्त जीव संख्यातगुणे हैं।।५१।।

तेजस्कायिक पर्याप्तों से पृथिवीकायिक पर्याप्त जीव विशेष अधिक हैं।।५२।।

पृथिवीकायिक पर्याप्तों से अप्कायिक पर्याप्त जीव विशेष अधिक हैं।।५३।।

अप्कायिक पर्याप्तों से वायुकायिक पर्याप्त जीव विशेष अधिक हैं।।५४।।

वायुकायिक पर्याप्तों से अकायिक जीव अनन्तगुणे हैं।।५५।।

अकायिकों से वनस्पतिकायिक अपर्याप्त जीव अनन्तगुणे हैं।।५६।।

वनस्पतिकायिक अपर्याप्तों से वनस्पतिकायिक पर्याप्त जीव संख्यातगुणे हैं।।५७।।

वनस्पतिकायिक पर्याप्तों से वनस्पतिकायिक जीव विशेष अधिक हैं।।५८।।

वनस्पतिकायिकों से निगोदजीव विशेष अधिक हैं।।५९।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-प्रतरांगुल के असंख्यातवें भाग से अपवर्तित जगत्प्रतरप्रमाण होने से त्रसकायिक पर्याप्त जीव सबसे कम हैं। त्रसकायिक अपर्याप्त जीव उनसे असंख्यातगुणे हैं, यहाँ आवली का असंख्यातवाँ भाग गुणकार है।

कैसे ? क्योंकि प्रतरांगुल के असंख्यातवें भाग से अपवर्तित जगत्प्रतरप्रमाण त्रसकायिक अपर्याप्त जीव हैं, ऐसा द्रव्यानुयोगद्वार में प्ररूपित किया है। तेजस्कायिक अपर्याप्त जीव असंख्यातगुणे हैं, यहाँ गुणकार असंख्यात लोकप्रमाण है। पृथिवीकायिक, जलकायिक, वायुकायिक ये जीव क्रम से विशेष अधिक हैं, यहाँ विशेष का प्रमाण असंख्यातलोक है। इनमें से क्रम से तेजस्कायिक पर्याप्त जीव संख्यातगुणे हैं। पृथिवी, जल और वायुकायिक पर्याप्त जीव क्रम-क्रम से विशेष अधिक हैं, यहाँ भी विशेष का प्रमाण असंख्यातलोक है। वायुकायिक पर्याप्त जीवों से अकायिक सिद्ध भगवान अनन्तगुणे हैं। अकायिक जीवों से वनस्पतिकायिक अपर्याप्त जीव अनन्तगुणे हैं। इनसे पर्याप्त वनस्पतिकायिक जीव संख्यातगुणे हैं, इनसे वनस्पतिकायिक जीव विशेष अधिक हैं।

कितना विशेष हैं ? वनस्पतिकायिक अपर्याप्त जीवों के जितना प्रमाण है, उतना प्रमाण इनका है।

इनसे-वनस्पतिकायिक जीवों से निगोदिया जीव विशेष अधिक हैं।

कितने विशेष हैं ? बादर वनस्पतिकायिक प्रत्येक शरीर-बादर निगोद प्रतिष्ठित जीवों के प्रमाणमात्र है।

इस प्रकार द्वितीय स्थल में अन्य प्रकार से अल्पबहुत्व का कथन करने वाले पन्द्रह सूत्र पूर्ण हुए।


अधुना अन्येनैकेन प्रकारेण त्रसकायिकादिअल्पबहुत्वसूचनाय पंचदशसूत्राण्यवतार्यन्ते-

सव्वत्थोवा तसकाइया।।६०।।

बादरतेउकाइया असंखेज्जगुणा।।६१।।
बादरवणप्फदिकाइयपत्तेयसरीरा असंखेज्जगुणा।।६२।।
बादरणिगोदजीवा णिगोदपदिट्ठिदा असंखेज्जगुणा।।६३।।
बादरपुढविकाइया असंखेज्जगुणा।।६४।।
बादरआउकाइया असंखेज्जगुणा।।६५।।
बादरवाउकाइया असंखेज्जगुणा।।६६।।
सुहुमतेउकाइया असंखेज्जगुणा।।६७।।
सुहुमपुढविकाइया विसेसाहिया।।६८।।
सुहुमआउकाइया विसेसाहिया।।६९।।
सुहुमवाउकाइया विसेसाहिया।।७०।।
अकाइया अणंतगुणा।।७१।।
बादरवणप्फदिकाइया अणंतगुणा।।७२।।
सुहुमवणप्फदिकाइया असंखेज्जगुणा।।७३।।
वणप्फदिकाइया विसेसाहिया।।७४।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सर्वस्तोका: त्रसकायिका:। एभ्यो बादरतेजस्कायिका: असंख्यातगुणा:। बादरवनस्पतिकायिकप्रत्येकशरीरेभ्य आरभ्य बादरवायुकायिकपर्यन्ता: असंख्यातगुणा असंख्यातगुणा: सन्ति, अत्र सर्वत्र गुणकार: असंख्याता लोका: सन्ति, गुणकारस्य अद्र्धच्छेदशलाका: पल्योपमस्यासंख्यातभागोऽस्ति।
एतत्कुतोऽवगम्यते ?
गुरूपदेशादवगम्यते। केवलं वायुकायिकानामद्र्धच्छेदशलाका: सपूर्णं सागरोपमं भवति।
सूक्ष्मतेजस्कायिका: बादरवायुकायिकेभ्योऽसंख्यातगुणा: सन्ति। अग्रे सूक्ष्मपृथिवीजलवायुकायिका: क्रमश: विशेषाधिका:, अत्रापि विशेषप्रमाणमसंख्याता लोका: ज्ञातव्या:।
सूक्ष्मवायुकायिकेभ्योऽकायिका: अनन्तगुणा:, तेभ्यो बादरवनस्पतिकायिका: अनंतगुणा: सन्ति। एभ्य: सूक्ष्मवनस्पतिकायिका: असंख्यातगुणा:, अत्रापि गुणकार: असंख्याता लोका: कथयितव्या:। एभ्यो वनस्पतिकायिका विशेषाधिका:।
कियन्मात्रो विशेष: ?
बादरवनस्पतिकायिकमात्र:।
अत्र श्रीवीरसेनाचार्यो वदति-‘‘अण्णेसु सुत्तेसु सव्वाइरियसंमदेसु एत्थेव अप्पाबहुगसमत्ती होदि, पुणो उवरिमअप्पाबहुगपयारस्स प्रारंभो।’’ एत्थ पुण सुत्ते अप्पाबहुगसमत्ती ण होदि।’’
अत एव अस्मिन् षट्खण्डागमस्य द्वितीयखण्डे अल्पबहुत्वानुगमे निगोदजीवस्य कायप्रतिपादनार्थं अन्यमपि एकं सूत्रं कथयिष्यते।
संप्रति निगोदजीवानां विशेषाधिकप्ररूपणार्थं एकं सूत्रमवतरति-
णिगोदजीवा विसेसाहिया।।७५।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-वनस्पतिकायिकेभ्यो निगोदजीवा: विशेषाधिका: सन्ति।
अत्र कश्चिदाह-निष्फलमेतत्सूत्रं, वनस्पतिकायिकेभ्य: पृथग्भूतनिगोदानामनुपलंभात्। न च वनस्पतिकायिकेभ्य: पृथग्भूता निगोदा: पृथिवीकायिकादिषु सन्तीति आचार्याणामुपदेशोऽस्ति येनैतस्य वचनस्य सूत्रत्वं प्रसज्यते इति चेत् ?
अत्र परिहार उच्यते-भवतु नाम युष्माभिरुक्तार्थस्य सत्यत्वं, बहुषु सूत्रेषु वनस्पतीनामुपरि निगोद-पदस्यानुपलंभात् निगोदानामुपरि वनस्पतिकायिकानां पठनस्योपलंभात् बहुकैराचार्यै: संमतं च। किन्तु एतत्सूत्रमेव न भवतीति नावधारणं कर्तुं युक्तं।
अत्र श्रीवीरसेनाचार्यस्यैव पंक्तयोऽवलोकनीया भवन्ति-
‘‘सो एवं भणदि जो चोद्दसपुव्वधरो केवलणाणी वा। ण वट्टमाणकाले ते अत्थि, ण च तेसिं पासे सोदूणागदा वि संपहि उवलब्भंति। तदो थप्पं काऊण बे सुत्ताणि सुत्तासायणभीरूहि आइरिएहि वक्खाणेयव्वाणि त्ति।’’
पुनरपि कश्चिदाह-
‘निगोदजीवानामुपरि वनस्पतिकायिका विशेषाधिका भवन्ति बादरवनस्पतिकायिकप्रत्येकशरीरमात्रेण, पुन: वनस्पतिकायिकानामुपरि निगोदा: केन विशेषाधिका भवन्तीति चेत् ?
आचार्येण उच्यते-‘वनस्पतिकायिका’’ इत्युत्ते बादरनिगोदप्रतिष्ठिताप्रतिष्ठितजीवा न गृहीतव्या:।
कुत: ?
आधेयात् आधारस्य भेददर्शनात्।
वनस्पतिनामकर्मोदयत्वेन सर्वेषामेकत्वमस्ति इति चेत् ?
भवतु तेनैकत्वं, किन्तु तदत्राविवक्षितं, अत्राधारानाधारत्वमेव विवक्षितं। तेन वनस्पतिकायिकेषु बादरनिगोदप्रतिष्ठिताप्रतिष्ठिता न गृहीता:।
वनस्पतिकायिकानामुपरि ‘‘णिगोदा विसेसाहिया’’ इति सूत्रे भणिते बादरवनस्पतिकायिकप्रत्येकशरीरैर्बादर-निगोदप्रतिष्ठितैश्च विशेषाधिका: गृहीतव्या:।
कश्चिदाशंकते पुन:-बादरनिगोदप्रतिष्ठिताप्रतिष्ठितानां कथं निगोदव्यपदेश: ?
आचार्यदेव: समाधत्ते-नैतद् वक्तव्यं, आधारे आधेयोपचारात् तेषां निगोदत्वसिद्धे:।
पुनरप्याशंकावतार्यते-
वनस्पतिनामकर्मोदयसहितानां सर्वेषां ‘वनस्पतिसंज्ञा’ सूत्रे दृश्यते, बादरनिगोदप्रतिष्ठिताप्रतिष्ठितानामत्र सूत्रे ‘वनस्पतिसंज्ञां’ किन्न निर्दिष्टा ?
पुनरपि श्रीवीरसेनाचार्यो ब्रूते-
‘‘गोदमो एत्थ पुच्छेयव्वो। अम्हेहि गोदमो बादरणिगोदपदिट्ठिदाणं वणप्फदिसण्णं णेच्छदि त्ति तस्स अहिप्पाओ कहिओ।’’
अस्या शंकाया उत्तरं ‘‘श्रीगौतमगणधरदेव एव पृष्टव्य:’ श्रीइन्द्रभूतिगणधरस्वामी बादरनिगोदप्रतिष्ठितानां वनस्पतिसंज्ञां नेच्छति अस्माभि: तस्याभिप्राय: कथित:।
अनेन कथनेन आचार्यश्रीवीरसेनदेवस्य पापभीरुत्वं श्रीभूतबलिसूरिं प्रतिविशेषश्रद्धानं च दृश्यते। वर्तमानसाधूनां साध्वीनां विदुषां चैतदुदाहरणं सदैव गृहीतव्यमिति।
एवं तृतीयस्थले भिन्नप्रकारेणाल्पबहुत्वनिरूपणत्वेन षोडश सूत्राणि गतानि।

अब अन्य एक प्रकार से त्रसकायिक आदि जीवों का अल्पबहुत्व सूचित करने हेतु पन्द्रह सूत्र अवतरित किये जाते हैं-

सूत्रार्थ-

त्रसकायिक जीव सबसे स्तोक हैं।।६०।।

त्रसकायिकों से बादर तेजस्कायिक जीव असंख्यातगुणे हैं।।६१।।

बादर तेजस्कायिकों से बादर वनस्पतिकायिक प्रत्येकशरीर जीव असंख्यातगुणे हैं।।६२।।

बादर वनस्पतिकायिक प्रत्येकशरीर जीवों से बादर निगोदजीव निगोदप्रतिष्ठित असंख्यातगुणे हैं।।६३।।

बादर निगोद जीव निगोद प्रतिष्ठितों से बादर पृथिवीकायिक जीव असंख्यातगुणे हैं।।६४।।

बादर पृथिवीकायिकों से बादर अप्कायिक जीव असंख्यातगुणे हैं।।६५।।

बादर अप्कायिकों से बादर वायुकायिक जीव असंख्यातगुणे हैं।।६६।।

बादर वायुकायिकों से सूक्ष्म तेजस्कायिक जीव असंख्यातगुणे हैं।।६७।।

सूक्ष्म तेजस्कायिकों से सूक्ष्म पृथिवीकायिक जीव विशेष अधिक हैं।।६८।।

सूक्ष्म पृथिवीकायिकों से सूक्ष्म अप्कायिक जीव विशेष अधिक हैं।।६९।।

सूक्ष्म अप्कायिकों से सूक्ष्म वायुकायिक जीव विशेष अधिक हैं।।७०।।

सूक्ष्म वायुकायिकों से अकायिक जीव अनन्तगुणे हैं।।७१।।

अकायिक जीवों से बादर वनस्पतिकायिक जीव अनन्तगुणे हैं।।७२।।

बादर वनस्पतिकायिकों से सूक्ष्म वनस्पतिकायिक जीव असंख्यातगुणे हैं।।७३।।

सूक्ष्म वनस्पतिकायिकों से वनस्पतिकायिक जीव विशेष अधिक हैं।।७४।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-त्रसकायिक जीव सबसे स्तोक-कम हैं, उनसे असंख्यातगुणे अधिक बादर अग्निकायिक जीव हैं। बादरवनस्पतिकायिक प्रत्येकशरीर से आरंभ करके बादरवायुकायिक पर्यन्त सभी जीव असंख्यातगुणे-असंख्यातगुणे हैं, यहाँ सर्वत्र गुणकार असंख्यातलोकप्रमाण है। गुणकार की अर्धच्छेदशलाकाएं पल्योपम के असंख्यातवें भागप्रमाण हैं।

शंका-यह बात कैसे जानी जाती है ?

समाधान-यह बात गुरु के उपदेश से जानी जाती है। केवल वायुकायिक जीवों की अर्धच्छेद शलाकाएं सम्पूर्ण सागरोपम होती हैं।

सूक्ष्मतेजस्कायिक जीव बादर वायुकायिक जीवों से असंख्यातगुणे हैं। आगे सूक्ष्मपृथिवीकायिक-जलकायिक-वायुकायिक जीव क्रमश: विशेष अधिक-विशेष अधिक हैं, यहाँ भी विशेष का प्रमाण असंख्यातलोक जानना चाहिए।

सूक्ष्मवायुकायिक जीवों से अकायिक अनन्तगुणे हैं, उनसे बादरवनस्पतिकायिक अनंतगुणे हैं। इनसे सूक्ष्मवनस्पतिकायिक जीव असंख्यातगुणे हैं, यहाँ भी गुणकार असंख्यातलोक प्रमाण कहना चाहिए। इनसे वनस्पतिकायिक जीव विशेष अधिक हैं।

विशेष कितने प्रमाण है ?

बादर वनस्पतिकायिक जीवों के प्रमाणमात्र यह विशेष है।

यहाँ श्रीवीरसेन आचार्य कहते हैं-‘‘अन्य सूत्रों में सभी आचार्यों से सम्मत यहाँ ही अल्पबहुत्व की समाप्ति होती है, पुन: आगे के अल्पबहुत्व का प्रारंभ होता है। परन्तु इस सूत्र में अल्पबहुत्व की समाप्ति यहाँ पर नहीं होती है।’’

इसलिए इस षट्खण्डागम ग्रंथ के द्वितीय खण्ड में अल्पबहुत्वानुगम में निगोदिया जीव का काय प्रतिपादित करने हेतु अन्य भी एक सूत्र कहेंगे।

अब निगोदिया जीवों का विशेष अधिक कथन करने हेतु एक सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

वनस्पतिकायिक जीवों से निगोद जीव विशेष अधिक हैं।।७५।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-वनस्पतिकायिक जीवों की अपेक्षा निगोदिया जीव विशेष अधिक होते हैं। यहाँ कोई शंका करता है कि-यह सूत्र निष्फल है, क्योंकि वनस्पतिकायिक जीवों से पृथग्भूत निगोद जीव नहीं पाये जाते हैं तथा ‘वनस्पतिकायिक जीवों से पृथग्भूत पृथिवीकायिकादिकों में निगोद जीव हैं’ ऐसा आचार्यों का उपदेश भी नहीं है, जिससे इस वचन को सूत्रत्व का प्रसंग प्राप्त हो सके ?

यहाँ उक्त शंका का परिहार करते हुए कहते हैं-तुम्हारे द्वारा कहे गये अर्थ में भले ही सत्यता हो, क्योंकि बहुत से सूत्रों में वनस्पतिकायिक जीवों के आगे ‘निगोद’ पद नहीं पाया जाता है और निगोद जीवों के आगे वनस्पतिकायिकों का पाठ पाया जाता है और यह कथन बहुत से आचार्यों से सम्मत है। किन्तु ‘‘यह सूत्र ही नहीं है’ ऐसा निश्चय करना उचित नहीं है।

यहाँ श्री वीरसेनाचार्य की ही पंक्तियाँ देखने योग्य हैं-‘‘इस प्रकार तो वही कह सकता है जो चौदहपूर्वों का धारक हो अथवा केवलज्ञानी हो। परन्तु वर्तमानकाल में न तो वे दोनों हैं और न उनके पास में सुनकर आये हुए अन्य महापुरुष भी इस समय उपलब्ध होते हैं। अतएव सूत्र की आसादना-छेद या तिरस्कार से भयभीत रहने वाले आचार्यों ने इस विवाद को स्थगित मानकर दोनों ही सूत्रों का व्याख्यान कर दिया है।’’

यहाँ पुन: शंका होती है-निगोद जीवों के ऊपर वनस्पतिकायिक जीव बादर वनस्पतिकायिक प्रत्येक शरीर मात्र से विशेष अधिक होते हैं, परन्तु वनस्पतिकायिक जीवों के आगे निगोद जीव किससे विशेषाधिक होते हैं ?

ऐसा प्रश्न होने पर आचार्य कहते हैं-‘वनस्पतिकायिक जीव’ ऐसा कहने पर बादर निगोदों से प्रतिष्ठित-अप्रतिष्ठित जीवों का ग्रहण नहीं करना चाहिए। क्यों ?

आधेय से आधार का भेद देखा जाता है।

शंका-वनस्पति नामकर्म के उदयपने की अपेक्षा सबमें ही एकता माननी पड़ेगी ?

समाधान-उस अपेक्षा से भले ही एकता रहे, परन्तु वह यहाँ विवक्षित नहीं है। यहाँ आधार और अनाधार की ही विवक्षा है। इस कारण जो वनस्पति जीव हैं उनमें बादर निगोद प्रतिष्ठित-अप्रतिष्ठित जीवों का ग्रहण नहीं किया गया है।

अत: वनस्पतिकायिक जीवों के ऊपर ‘निगोद जीव विशेष अधिक है’ ऐसा सूत्र कहने पर बादर वनस्पतिकायिक प्रत्येक शरीर जीवों से तथा बादर निगोद प्रतिष्ठित प्रत्येक जीवों से विशेष अधिक हैं, ऐसा समझना चाहिए।

पुन: कोई शंका करता है कि-बादर निगोद प्रतिष्ठित तथा अप्रतिष्ठित जीवों को निगोद संज्ञा कैसे घटित होती है ?

आचार्य देव समाधान देते हैं कि-ऐसा नहीं कहना चाहिए, क्योंकि आधार में आधेय का उपचार करने से उनके निगोदपना सिद्ध होता है।

पुनरपि अगली शंका अवतरित होती है कि-वनस्पति नामकर्म के उदय से संयुक्त सभी जीवों के ‘वनस्पति’ संज्ञा सूत्र में देखी जाती है। बादर निगोद प्रतिष्ठित और अप्रतिष्ठित जीवों को यहाँ सूत्र में वनस्पति संज्ञा क्यों नहीं निर्दिष्ट की है ?

तब पुन: आचार्य श्री वीरसेन स्वामी कहते हैं कि-इस शंका का उत्तर गौतम गणधर से पूछना चाहिए। हमनें तो गौतम गणधर देव जो कि बादर निगोद प्रतिष्ठित जीवों को ‘वनस्पति’ यह संज्ञा इष्ट नहीं मानते, इस तरह उनका अभिप्राय कह दिया है।

अर्थात् इस शंका का उत्तर श्री गौतम गणधर से ही पूछना चाहिए, क्योंकि श्री इन्द्रभूति गणधर स्वामी बादर निगोद प्रतिष्ठित की ‘वनस्पति’ संज्ञा नहीं स्वीकार करते हैं, ऐसा हमने कह दिया है।

इस कथन से आचार्यश्री वीरसेनदेव की पापभीरुता एवं श्री भूतबली आचार्य के प्रति विशेष श्रद्धान दिखाई देती है। वर्तमान साधु-साध्वियों एवं विद्वानों को यह उदाहरण सदैव ग्रहण करना चाहिए।

इस प्रकार से तृतीय स्थल में भिन्न प्रकार से अल्पबहुत्व का निरूपण करने वाले सोलह सूत्र पूर्ण हुए।


पुनरप्यन्येन प्रकारेणाल्पबहुत्वप्ररूपणार्थं एकत्रिंशत्सूत्राण्यवतार्यन्ते-

सव्वत्थोवा बादरतेउकाइयपज्जत्ता।।७६।।

तसकाइयपज्जत्ता असंखेज्जगुणा।।७७।।
तसकाइयअपज्जत्ता असंखेज्जगुणा।।७८।।
बादरवणप्फदिकाइयपत्तेयसरीरपज्जत्ता असंखेज्जगुणा।।७९।।
बादरणिगोदजीवा णिगोदपदिट्ठिदा पज्जत्ता असंखेज्जगुणा।।८०।।
'बादरपुढविकाइयपज्जत्ता असंखेज्जगुणा।।८१।।'
'बादरआउकाइयपज्जत्ता असंखेज्जगुणा।।८२।।
बादरवाउकाइयपज्जत्ता असंखेज्जगुणा।।८३।।
बादरतेउकाइयअपज्जत्ता असंखेज्जगुणा।।८४।।
बादरवणप्फदिकाइयपत्तेयसरीरअपज्जत्ता असंखेज्जगुणा।।८५।।
बादरणिगोदजीवा णिगोदपदिट्ठिदा अपज्जत्ता असंखेज्जगुणा।।८६।।
बादरपुढविकाइया अपज्जत्ता असंखेज्जगुणा।।८७।।
बादरआउकाइयअपज्जत्ता असंखेज्जगुणा।।८८।।
बादरवाउकाइयअपज्जत्ता असंखेज्जगुणा।।८९।।
सुहुमतेउकाइयअपज्जत्ता असंखेज्जगुणा।।९०।।
सुहुमपुढविकाइयअपज्जत्ता विसेसाहिया।।९१।।
सुहुमआउकाइयअपज्जत्ता विसेसाहिया।।९२।।
सुहुमवाउकाइयअपज्जत्ता विसेसाहिया।।९३।।
सुहुमतेउकाइयपज्जत्ता संखेज्जगुणा।।९४।।
सुहुमपुढविकाइयपज्जत्ता विसेसाहिया।।९५।।
सुहुमआउकाइयपज्जत्ता विसेसाहिया।।९६।।
सुहुमवाउकाइयपज्जत्ता विसेसाहिया।।९७।।
अकाइया अणंतगुणा।।९८।।
बादरवणप्फदिकाइयपज्जत्ता अणंतगुणा।।९९।।
बादरवणप्फदिकाइयअपज्जत्ता असंखेज्जगुणा।।१००।।
बादरवणप्फदिकाइया विसेसाहिया।।१०१।।
सुहुमवणप्फदिकाइयअपज्जत्ता असंखेज्जगुणा।।१०२।।
सुहुमवणप्फदिकाइयपज्जत्ता संखेज्जगुणा।।१०३।।
सुहुमवणप्फदिकाइया विसेसाहिया।।१०४।।
वणप्फदिकाइया विसेसाहिया।।१०५।।
णिगोदजीवा विसेसाहिया।।१०६।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-बादरतेजस्कायिकपर्याप्ता: सर्वस्तोका:, असंख्यातप्रतरावलिप्रमाणत्वात्। त्रसकायिकपर्याप्ता: असंख्यातगुणा:, अत्र गुणकार: जगत्प्रतरस्य असंख्यातभाग:। त्रसकायिकापर्याप्ता: असंख्यातगुणा:, अत्र गुणकार: आवलिकाया: असंख्यातभाग:। बादरवनस्पतिकायिकप्रत्येकशरीरपर्याप्ता: असंख्यातगुणा:, अत्र गुणकार: पल्योपमस्यासंख्यातभाग:। बादरनिगोदजीवा: निगोदप्रतिष्ठिता: पर्याप्ता: असंख्यातगुणा:, अत्र गुणकार: आवलिकाया असंख्यातभाग:।
कश्चिदाह-अस्मिन् अशीतितमे सूत्रे बादरनिगोदजीवनिर्देश: किमर्थं कृत:, बादरनिगोदप्रतिष्ठिता इति वक्तव्यं ?
तस्य समाधानं क्रियते-नैतत्, बादरनिगोदप्रतिष्ठितानां निगोदजीवाधाराणां स्वयं प्रत्येकशरीराणा-मुपचारबलेन ‘निगोदसंज्ञा’ अत्र भवतु इति ज्ञापनार्थं कृत:।
तेभ्यो बादरपृथिवीकायिकपर्याप्ता: असंख्यातगुणा:, गुणकार: आवलिकाया असंख्यातभाग:। बादराप्यकायिकपर्याप्ता: असंख्यातगुणा:, गुणकार: आवलिकाया असंख्यातभाग:। बादरवायुकायिकपर्याप्ता: असंख्यातगुणा:, अत्र गुणकार: प्रतरांगुलस्यासंख्यातभागमात्रा: असंख्याता: जगच्छ्रेण्य: सन्ति। बादरतेजस्कायिकापर्याप्ता: असंख्यातगुणा:, गुणकार: असंख्याता लोका:, गुणकाराद्र्धच्छेदशलाका: सागरोपमं पल्योपमस्यासंख्यातभागेनोनं। तेभ्य: बादरवनस्पतिकायिकप्रत्येकशरीरापर्याप्ता: असंख्यातगुणा:, अत्र गुणकार: असंख्याता लोका:, गुणकाराद्र्धच्छेदशलाका: पल्योपमस्यासंख्यातभाग:।
बादरनिगोदजीवा निगोदप्रतिष्ठिता: अपर्याप्ता: असंख्यातगुणा:, अत्र गुणकारोऽसंख्याता लोका:। एवं बादरपृथिवी-जल-अग्निकायिकापर्याप्ता:, सूक्ष्मतेजस्कायिका अपर्याप्ताश्च सर्वे क्रमश: असंख्यातासंख्यातगुणा:, अत्र सर्वत्र गुणकार: असंख्याता: लोका:।
सूक्ष्मपृथिवीजलवायुकायिका: अपर्याप्ता: विशेषाधिका विशेषाधिका:, अत्र अपि विशेषप्रमाणमसंख्याता लोका: ज्ञातव्या:।
सूक्ष्मतेजस्कायिकपर्याप्ता: संख्यातगुणा:, अत्र गुणकार: तत्प्रायोग्यसंख्यातसमया:। सूक्ष्मपृथिवी-जल-वायुकायिका: पर्याप्ता: तत्तो विशेषाधिका: क्रमेण, अत्रापि विशेषप्रमाणमसंख्यातलोका: ज्ञातव्या:।
सूक्ष्मवायुकायिकपर्याप्तेभ्योऽकायिका: सिद्धा: अनन्तगुणा: सन्ति। अत्र गुणकार:, अभव्यसिद्धि-कैरनन्तगुणोऽस्ति, सूक्ष्मवायुकायिकपर्याप्तैरपवर्तिताकायिकप्रमाणत्वात्।
तेभ्यो बादरवनस्पतिकायिकपर्याप्ता अनन्तगुणा:, अत्र गुणकार: अभव्यसिद्धिकेभ्य: सिद्धपरमेष्ठिभ्य: सर्वजीवानां प्रथमवर्गमूलादपि अनन्तगुणोऽस्ति।
एभ्यो बादरवनस्पतिकायिकापर्याप्ता: असंख्यातगुणा:, अत्र गुणकार: असंख्याता लोका्र:। बादरवनस्पति-कायिका विशेषाधिका:। अत्र विशेष: बादरवनस्पतिकायिकपर्याप्तमात्रोऽस्ति। सूक्ष्मवनस्पतिकायिकापर्याप्ता: असंख्यातगुणा:, अत्र गुणकार: असंख्याता लोका:। सूक्ष्मवनस्पतिकायिक-पर्याप्तास्तेभ्य: संख्यातगुणा:, गुणकार: संख्याता: समया:। सूक्ष्मवनस्पतिकायिका: विशेषाधिका:, अत्र विशेष: सूक्ष्मवनस्पतिकायिका-पर्याप्तमात्रोऽस्ति। एभ्यो वनस्पतिकायिका: विशेषाधिका:, अत्र विशेष: बादरवनस्पतिकायिकमात्र:। बादरवनस्पतिकायिकेषु बादरनिगोदप्रतिष्ठिताप्रतिष्ठिता: न सन्ति, तेषां वनस्पतिकायिकव्यपदेशाभावात्।
एभ्यो निगोदजीवा विशेषाधिका: सन्ति।
अत्र कियन्मात्रो विशेष: ?
बादरवनस्पतिकायिकप्रत्येकशरीरै: बादरनिगोदप्रतिष्ठितैश्च विशेषोऽधिकोऽस्ति।
तात्पर्यमेतत्-इमे निगोदजीवा: वनस्पतिकायिकसंज्ञका: न सन्ति श्रीमद्गौतमगणधरदेवाभिप्रायेण इति सूचितं भवति प्रागेव पंचसप्ततितमे सूत्रे। अत एव नेदानीं पुन: कथ्यते। एतानि सूत्राणि ज्ञात्वा नित्यनिगोदपर्यायेभ्यो निर्गत्य ये त्रसराशिषु आगता: जीवा अहमपि तेभ्य एक एव जीवोऽस्मि पुन: इतरनिगोदेषु बादरसूक्ष्मस्थावरेषु न गन्तुमिच्छामि। अधुना रत्नत्रयं देशव्रतरूपेण लब्ध्वा भेदाभेदरत्नत्रयं पूर्णीकर्तुं प्रयत्नं विदधेऽहम् मम पुरुषार्थ: सफलीभवेदिति याचे जिनेन्द्रपादारविंदेषु नित्यम्।
एवं चतुर्थस्थले चतुर्थप्रकारेणाल्पबहुत्वनिरूपणत्वेन एकत्रिंशत्सूत्राणि गतानि।
इति श्रीषट्खण्डागमस्य क्षुदक्रबंधनाम्नि द्वितीयखण्डे अल्पबहुत्वानुगमे महाधिकारे गणिनीज्ञानमतीकृत-सिद्धान्तचिंतामणिटीकायां कायमार्गणानाम- तृतीयोऽधिकार: समाप्त:।


पुन: भी अन्य प्रकार से अल्पबहुत्व का निरूपण करने हेतु इकतीस सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

बादर तेजस्कायिक पर्याप्त जीव सबमें स्तोक हैं।।७६।।

बादर तेजस्कायिक पर्याप्तकों से त्रसकायिक पर्याप्त जीव असंख्यातगुणे हैं।।७७।।

त्रसकायिक पर्याप्तों से त्रसकायिक अपर्याप्त जीव असंख्यातगुणे हैं।।७८।।

त्रसकायिक अपर्याप्तों से बादर वनस्पतिकायिक प्रत्येकशरीर पर्याप्त जीव असंख्यातगुणे हैं।।७९।।

वनस्पतिकायिक प्रत्येकशरीर पर्याप्तों से बादर निगोदजीव निगोदप्रतिष्ठित पर्याप्त असंख्यातगुणे है।।८०।।

बादर निगोदजीव निगोदप्रतिष्ठित पर्याप्तों से बादर पृथिवीकायिक पर्याप्त जीव असंख्यातगुणे हैं।।८१।।

बादर पृथिवीकायिक पर्याप्तों से बादर अप्कायिक पर्याप्त जीव असंख्यातगुणे हैं।।८२।।

बादर अप्कायिक पर्याप्तों से बादर वायुकायिक पर्याप्त जीव असंख्यातगुणे हैं।।८३।।

बादर वायुकायिक पर्याप्तों से बादर तेजस्कायिक अपर्याप्त जीव असंख्यातगुणे हैं।।८४।।

बादर तेजस्कायिक अपर्याप्तों से बादर वनस्पतिकायिक प्रत्येकशरीर अपर्याप्त जीव असंख्यातगुणे हैं।।८५।।

बादर वनस्पतिकायिक प्रत्येकशरीर अपर्याप्तों से निगोदप्रतिष्ठित बादर निगोदजीव अपर्याप्त असंख्यातगुणे हैं।।८६।।

निगोदप्रतिष्ठित बादर निगोद जीव अपर्याप्तों से बादर पृथिवीकायिक अपर्याप्त जीव असंख्यातगुणे हैं।।८७।।

बादर पृथिवीकायिक अपर्याप्तों से बादर अप्कायिक अपर्याप्त जीव असंख्यातगुणे हैं।।८८।।

बादर अप्कायिक अपर्याप्तों से बादर वायुकायिक अपर्याप्त जीव असंख्यातगुणे हैं।।८९।।

बादर वायुकायिक अपर्याप्तों से सूक्ष्म तेजस्कायिक अपर्याप्त जीव असंख्यातगुणे हैं।।९०।।

सूक्ष्म तेजस्कायिक अपर्याप्तों से सूक्ष्म पृथिवीकायिक अपर्याप्त जीव विशेष अधिक हैं।।९१।।

सूक्ष्मपृथिवीकायिक अपर्याप्तों से सूक्ष्म अप्कायिक अपर्याप्त जीव विशेष अधिक हैं।।९२।।

सूक्ष्म अप्कायिक अपर्याप्तों से सूक्ष्म वायुकायिक अपर्याप्त जीव विशेष अधिक हैं।।९३।।

सूक्ष्म वायुकायिक अपर्याप्तों से सूक्ष्म तेजस्कायिक पर्याप्त जीव संख्यातगुणे हैं।।९४।।

सूक्ष्म तेजस्कायिक पर्याप्तों से सूक्ष्म पृथिवीकायिक पर्याप्त जीव विशेष अधिक हैं।।९५।।

सूक्ष्म पृथिवीकायिक पर्याप्तों से सूक्ष्म अप्कायिक पर्याप्त जीव विशेष अधिक हैं।।९६।।

सूक्ष्म अप्कायिक पर्याप्तों से सूक्ष्म वायुकायिक पर्याप्त जीव विशेष अधिक हैं।।९७।।

सूक्ष्म वायुकायिक पर्याप्तों से अकायिक जीव अनन्तगुणे हैं।।९८।।

अकायिक जीवों से बादर वनस्पतिकायिक पर्याप्त जीव अनन्तगुणे हैं।।९९।।

बादर वनस्पतिकायिक पर्याप्तों से बादर वनस्पतिकायिक अपर्याप्त जीव असंख्यातगुणे हैं।।१००।।

बादर वनस्पतिकायिक अपर्याप्तों से बादर वनस्पतिकायिक जीव विशेष अधिक है।।१०१।।

बादर वनस्पतिकायिकों से सूक्ष्म वनस्पतिकायिक अपर्याप्त जीव असंख्यातगुणे हैं।।१०२।।

सूक्ष्म वनस्पतिकायिक अपर्याप्तों से सूक्ष्म वनस्पतिकायिक पर्याप्त जीव संख्यातगुणे हैं।।१०३।।

सूक्ष्म वनस्पतिकायिक पर्याप्तों से सूक्ष्म वनस्पतिकायिक जीव विशेष अधिक हैं।।१०४।।

सूक्ष्म वनस्पतिकायिकों से वनस्पतिकायिक जीव विशेष अधिक हैं।।१०५।।

वनस्पतिकायिकों से निगोद जीव विशेष अधिक हैं।।१०६।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-बादर तेजसकायिक पर्याप्त जीव सबसे कम हैं, क्योंकि वे असंख्यात प्रतरावली प्रमाण हैं। त्रसकायिक पर्याप्त जीव असंख्यातगुणे हैं, यहाँ गुणकार जगत् प्रतर का असंख्यातवाँ भाग है। त्रसकायिक अपर्याप्त जीव इनसे असंख्यातगुणे हैं, यहाँ गुणकार आवली का असंख्यातवाँ भाग है। उनसे बादरवनस्पतिकायिक प्रत्येकशरीरपर्याप्तक जीव असंख्यातगुणे हैं, यहाँ गुणकार पल्योपम का असंख्यातवाँ भाग है। बादर निगोद जीव, निगोद प्रतिष्ठित पर्याप्त जीव असंख्यातगुणे हैं, यहाँ गुणकार आवली का असंख्यातवाँ भाग है।

यहाँ कोई शंका करता है कि-इसमें अस्सीवें (८०वें) सूत्र में बादर निगोद जीव पद का निर्देश किसलिए किया है, बादर निगोद प्रतिष्ठित इतना ही पद कहना चाहिए ?

इस शंका का समाधान किया जाता है-ऐसा नहीं है, क्योंकि जो स्वयं तो प्रत्येक शरीर हैं किन्तु निगोद जीवों के आधारभूत प्रत्येक शरीर ऐसे बादर जीवों से प्रतिष्ठित हैं, उन जीवों को यहाँ उपचार के बल से ‘‘निगोदजीव’’ यह संज्ञा हो इस बात को बतलाने हेतु बादरनिगोद जीव पद का निर्देश किया है।

उनसे बादर पृथिवीकायिक पर्याप्त जीव असंख्यातगुणे हैं, यहाँ गुणकार आवली का असंख्यातवाँ भाग है। बादर जलकायिक पर्याप्त जीव असंख्यातगुणे हैं, यहाँ गुणकार आवली का असंख्यातवाँ भाग है। बादर वायुकायिक पर्याप्त जीव असंख्यातगुणे हैं, यहाँ गुणकार प्रतरांगुल का असंख्यातवाँ भागमात्र असंख्यात जगच्छ्रेणी है। बादर अग्निकायिक अपर्याप्त जीव असंख्यातगुणे हैं, यहाँ गुणकार असंख्यातलोक प्रमाण है। गुणकार की अर्धच्छेद शलाकाएं पल्योपम के असंख्यातवें भाग से हीन सागरोपमप्रमाण हैं। उनसे बादर वनस्पतिकायिक प्रत्येक शरीर अपर्याप्त जीव असंख्यात गुणे हैं। यहाँ गुणकार असंख्यातलोक प्रमाण है। गुणकार की अर्धच्छेद शलाकाएँ पल्योपम के असंख्यातवें भाग प्रमाण हैं।

बादर निगोद जीव निगोदप्रतिष्ठित अपर्याप्त जीव असंख्यातगुणे हैं, यहाँ गुणकार असंख्यातलोक हैं। इस प्रकार बादर पृथिवीकायिक-जलकायिक-अग्निकायिक और सूक्ष्मतेजस्कायिक अपर्याप्त जीव असंख्यातगुणे-असंख्यातगुणे हैं, यहाँ सर्वत्र गुणकार असंख्यात लोक प्रमाण हैं।

सूक्ष्म पृथिवीकायिक-जलकायिक और वायुकायिक पर्याप्त जीव विशेष अधिक-विशेष अधिक हैं, यहाँ भी विशेष का प्रमाण असंख्यात लोक प्रमाण जानना चाहिए।

सूक्ष्म तेजस्कायिक पर्याप्त जीव संख्यातगुणे हैं, यहाँ गुणकार तत्प्रायोग्यसंख्यातसमय है। सूक्ष्मपृथिवीकायिक-जलकायिक-वायुकायिक पर्याप्त जीव उनसे क्रमश: विशेष-विशेष अधिक हैं। यहाँ भी विशेष का प्रमाण असंख्यातलोक जानना चाहिए।

सूक्ष्मवायुकायिक पर्याप्त जीवों से अकायिक सिद्ध भगवान अनन्तगुणे हैं। यहाँ गुणकार अभव्यसिद्धिक जीवों से अनन्तगुणा है, क्योंकि वह सूक्ष्म वायुकायिक पर्याप्त जीवों से अपवर्तित अकायिक जीवों के प्रमाणमात्र है।

उनसे बादरवनस्पतिकायिक पर्याप्त जीव अनन्तगुणे हैं, यहाँ गुणकार अभव्यसिद्धिक जीवों से, सिद्ध परमेष्ठी से तथा सर्व जीवों के प्रथम वर्गमूल से भी अनन्तगुणा है।

इनसे बादर वनस्पतिकायिक अपर्याप्त जीव असंख्यातगुणे हैं, यहाँ गुणकार असंख्यातलोक है। बादरवनस्पतिकायिक जीव विशेष अधिक हैं। यहाँ विशेष का प्रमाण बादरवनस्पतिकायिक पर्याप्त के प्रमाण मात्र है। सूक्ष्मवनस्पतिकायिक अपर्याप्त जीव असंख्यातगुणे हैं, यहाँ गुणकार असंख्यात लोक है। उनसे सूक्ष्मवनस्पतिकायिक पर्याप्त जीव संख्यातगुणे हैं, यहाँ गुणकार संख्यात समयप्रमाण है। सूक्ष्म वनस्पतिकायिक जीव उनसे विशेष अधिक हैं, यहाँ विशेष का प्रमाण सूक्ष्मवनस्पतिकायिक अपर्याप्त जीवों के बराबर है। इनसे वनस्पतिकायिक जीव विशेष अधिक हैं, यहाँ विशेष का प्रमाण बादरवनस्पतिकायिकमात्र है। बादर वनस्पतिकायिक जीवों में बादर निगोद सप्रतिष्ठित-अप्रतिष्ठित नहीं हैं, क्योंकि उनके वनस्पतिकायिक संज्ञा का अभाव देखा जाता है।

इनसे निगोदिया जीव विशेष अधिक हैं।

यहाँ विशेष का प्रमाण कितना है ?

बादरवनस्पतिकायिक प्रत्येकशरीर तथा बादर निगोद प्रतिष्ठित जीवों से विशेष का प्रमाण अधिक है।

तात्पर्य यह है कि-‘‘ये निगोदिया जीव वनस्पतिकायिक संज्ञा वाले नहीं हैं’’ ऐसा श्रीमान् गौतम गणधर देव के अभिप्रायानुसार पहले ही पचहत्तरवें सूत्र में सूचित किया गया है, इसलिए यहाँ पुन: उसका कथन नहीं कर रहे हैं। इन सभी सूत्रों को जानकर नित्यनिगोद की पर्याय से निकलकर त्रसराशि में आने वाले जो जीव हैं, उनमें से एक जीव मैं भी हूँ और अब मैं पुन: इतर निगोदों में तथा बादर-सूक्ष्म स्थावर जीवों में नहीं जाना चाहता हूँ। अब रत्नत्रय को देशरूप से प्राप्त करके भेदाभेदरत्नत्रय को पूर्ण करने का मैं प्रयत्न करता हूँ, मेरा पुरुषार्थ सफल होवे, यही भगवान जिनेन्द्र के पादारविन्दों में नित्य ही मैं याचना करता हूँ।

इस प्रकार से चतुर्थ स्थल में चतुर्थ प्रकार से अल्पबहुत्व का निरूपण करने वाले इक्कीस सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम ग्रंथ में क्षुद्रकबंध नाम के द्वितीय खण्ड में अल्पबहुत्वानुगम नामक महाधिकार में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणिटीका में कायमार्गणा नाम का तृतीय अधिकार समाप्त हुआ।